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गुरुवार, 26 मई 2016

कहे होत अधीर--(प्रवचन--08)



प्रेम एकमात्र नाव है—(प्रवचन—आठवां)

प्रश्न-सार :

1—आपने कहा कि गणित या ज्ञान से उपजा वैराग्य झूठा है; प्रेमजनित वैराग्य ही वैराग्य है। लेकिन प्रेम तो राग लाता है; उससे वैराग्य कैसे फलित होगा?
2—आप कहते हैं कि जीवित बुद्ध ही तारते हैं। तब यह कैसी विडंबना है कि बुद्धों को जीते जी निंदा मिलती है और मरने पर पूजा? यह कैसा विधान है?
3—मैं परम आलसी हूं। क्या मैं भी परमात्मा को पा सकता हूं?



पहला प्रश्न:

भगवान! आपने कहा कि गणित या ज्ञान से उपजा वैराग्य झूठा है; प्रेमजनित वैराग्य ही वैराग्य है। लेकिन प्रेम तो राग लाता है; उससे वैराग्य कैसे फलित होगा?

नंद मैत्रेय! प्रेम तो सीढ़ी है; उससे नीचे भी उतर सकते हो, उससे ऊपर भी चढ़ सकते हो। प्रेम तो द्वार है; उससे भीतर भी आ सकते हो, उससे बाहर भी जा सकते हो। प्रेम न तो राग पैदा करता है, न वैराग्य पैदा करता है। प्रेम तो तटस्थ है। तुम्हारे हाथ में सब है। प्रेम का कैसे उपयोग करोगे, परिणाम इस पर निर्भर होता है।
प्रेम पतित हो तो राग बन जाता है। प्रेम विकसित हो तो वैराग्य बन जाता है। जैसे घर में कोई खाद को इकट्ठा कर ले तो दुर्गंध फैलेगी और उसी खाद को बगिया में छितरा दे तो सुगंध उठेगी। वही खाद वृक्षों का पोषण बनेगी; फूलों में रंग, रस और गंध बनेगी। वही खाद, जो घर में इकट्ठी कर ली होती तो जीना दूभर हो जाता--तुम्हारा ही नहीं, पड़ोसियों का भी।
ऐसा ही प्रेम है। प्रेम तो खाद है। अगर कामवासना में ही बंद रह गया तो सड़ांध पैदा होगी और अगर प्रार्थना में मुक्त हो गया तो परम सुवास पैदा होगी।
मैं तुम्हारा प्रश्न समझता हूं; नया नहीं है, सदियों-सदियों से पूछा गया है। क्योंकि जिसने भी परमात्मा की तलाश की है, उसके सामने यह प्रश्न निश्चित ही खड़ा हुआ है। होगा ही, क्योंकि प्रेम तुम्हारी प्रकृति है। इस प्रेम का क्या करें? परमात्मा को खोजने जो जाएगा, उसे प्रेम के संबंध में कुछ निर्णय लेने ही होंगे--कुछ निर्णय जो कि निर्णायक सिद्ध होने वाले हैं। या तो उसे तय करना होगा कि मैं प्रेम को दबाऊं, क्योंकि प्रेम से राग पैदा होता है। और जिसने दबाया प्रेम को, उसने भर लिया अपना भवन खाद से; अब सड़ांध पैदा होगी।
इसलिए तुम्हारा तथाकथित धार्मिक आदमी ऊपर-ऊपर धार्मिक होता है; जरा खरोंचो उसे और उसके भीतर से अधर्म निकल आता है। तुम्हारा धार्मिक आदमी ही तो मंदिर जलाता, मस्जिद जलाता, हिंदुओं को मारता, मुसलमानों को मारता, छुरे भोंकता, आगजनी करता, बलात्कार करता। तुम्हारे धार्मिक आदमी के कुकृत्यों से इतिहास भरा हुआ है। इतना अनाचार अधार्मिक लोगों ने नहीं किया है। इस पृथ्वी पर जितने लहू के धब्बे धार्मिक आदमी ने छोड़े हैं, उतने अधार्मिक आदमियों ने नहीं छोड़े हैं।
और भी एक मजा: अधार्मिक आदमी तो अगर पाप भी करता है तो व्यक्तिगत रूप से करता है--कोई चोरी कर लेता है, कोई हत्या कर देता है। धार्मिक आदमी जब पाप करता है तो सामूहिक रूप से करता है। और जब सामूहिक रूप से पाप किए जाते हैं तो अनंत गुने हो जाते हैं। हिंदुओं की भीड़, मुसलमानों की भीड़, ईसाइयों की भीड़ जब पाप करने पर उतारू होगी तो फिर हिसाब नहीं रखे जाते।
और यह भी ध्यान में रहे कि जब व्यक्ति पाप करता है, तो उसके भीतर चिंता पैदा होती है; उसके भीतर विचार पैदा होता है। उसकी आत्मा कहती है: क्या कर रहे हो? पापी से पापी की आत्मा कहती है: क्या कर रहे हो? ठहरो, मत करो! बुरा है। ऐसे ही अंधेरे में हो, और अंधेरे में चले जाओगे। चोर, जो हजार बार चोरी कर चुका है, वह भी जब फिर चोरी करने जाता है तो कोई भीतर खींचता है, रोकता है। कोई अंतरात्मा की आवाज, चाहे कितनी ही धीमी पड़ गई हो, सुनाई पड़ती है--ठहर जाओ। मत करो बुरा।
लेकिन भीड़ की कोई आत्मा नहीं होती। इसलिए भीड़ के पास अंतरात्मा की कोई आवाज नहीं होती। जब हिंदुओं की भीड़ मस्जिद को जलाती हो, जब मुसलमानों की भीड़ मंदिर को तोड़ती हो, तो मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि भीड़ में जुड़े हुए व्यक्ति को उत्तरदायित्व का बोध मिट जाता है। उसे यह सवाल ही नहीं उठता कि मैं अपराध कर रहा हूं। मैं तो सिर्फ संगी-साथी हूं; भीड़ कर रही है। और भीड़ अच्छे लोगों की है--पंडित, पुरोहित, मौलवी, पादरी उसके नेता हैं। मैं तो सिर्फ पीछे चलने वाला एक अनुयायी मात्र। धर्मयुद्ध में लगा हूं, जेहाद कर रहा हूं।
और तुम्हारे तथाकथित धर्मगुरुओं ने तुम्हें सिखाया है कि धर्मयुद्ध में अगर मारे गए तो स्वर्ग सुनिश्चित है; जेहाद में अगर मरे तो बहिश्त पाओगे। खूब प्रलोभन--पाप के लिए प्रलोभन! निपट पाप के लिए स्वर्ग का पुरस्कार! भयंकर अपराधों के लिए दंड नहीं--प्रशंसा, स्तुति। तो उत्तरदायित्व का बोध टल जाता है व्यक्ति का, जब वह भीड़ में पाप करता है। इसलिए भीड़ जैसे पाप करती है, व्यक्ति ने कभी भी नहीं किए, व्यक्ति कर ही नहीं सकता।
तुम अगर किसी भीड़ के हिस्से होकर पाप करो और फिर तुमसे अकेले में पूछा जाए कि क्या तुम अकेले भी ऐसा कर सकते थे? तो तुम चकित होओगे, तुम्हारे भीतर ही कोई कहेगा कि नहीं, अकेले में मैं ऐसा नहीं कर सकता था। भीड़ में एक सुविधा है: इतने लोग कर रहे हैं तो ठीक ही कर रहे होंगे। इतने लोग तो गलत नहीं हो सकते। मैं गलत हो सकता हूं; मगर ये हजारों-हजारों हिंदू, ये तो गलत नहीं हो सकते; ये तो ठीक ही कर रहे होंगे। फिर पंडित-पुरोहित आगे हैं, संत-महात्माओं का आशीष है, गलती हो कैसे सकती है? और फिर जहां इतने लोग कर रहे हैं, दायित्व बंट गया, तुम्हारे सिर पर ही न रहा। बोझ बहुत हलका है। अकेले होते तो सागर तुम्हारे ऊपर टूटता पाप का; भीड़ में एकाध बूंद तुम पर पड़ जाए तो पड़ जाए। एक बूंद की कौन चिंता करता है!
फिर भीड़ में तुम सदा उत्तरदायित्व दूसरे पर टाल सकते हो--कि महात्मा ने कहा था, कि मौलवी ने कहा था, कि पंडित ने कहा था। मैं क्या करूं? मैंने तो सिर्फ माना। मैंने किया नहीं, मैंने तो आदेश पालन किया है।
अभी कल ही मैं पढ़ रहा था कि अमरीका और रूस के वैज्ञानिक ऐसे कंप्यूटर बनाने में सफल हो गए हैं जो बिलकुल मनुष्यों जैसे हैं। पढ़ा तो मैंने सोचा: और आगे पढूं। मनुष्यों जैसे अगर कंप्यूटर बनाने में सफल हो गए हैं तो बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन वह एक व्यंग्य था। आगे कहा गया था कि मनुष्यों जैसे कंप्यूटर बनाने में समर्थ हो गए हैं, क्योंकि अब उन्होंने ऐसे कंप्यूटर बना लिए हैं, जो भूल तो खुद करते हैं, दोष दूसरे को देते हैं।
मशीनें अब तक इतनी चालाक नहीं थीं--कि मैं क्या करूं, उत्तरदायित्व दूसरे का है!
और यह सारा मनुष्य का दुर्गंधयुक्त अतीत एक बुनियाद पर खड़ा है कि हमने प्रेम को दबाया। हमने प्रेम के फूल न खिलने दिए। हमने प्रेम की खाद इकट्ठी कर ली। और जिससे सुगंध पैदा हो सकती थी, उससे केवल दुर्गंध पैदा हुई।
इसलिए मेरी मौलिक देशना है: प्रेम को सीढ़ी समझो। उसका एक छोर पृथ्वी पर है और दूसरा छोर आकाश में। प्रेम की सीढ़ी पर ऊर्ध्वगमन करो। प्रेम को निखारो, शुद्ध करो। निखारो--कामना से, वासना से, क्रोध से, वैमनस्य से,र् ईष्या से, प्रतिस्पर्धा से।
मुल्ला नसरुद्दीन सुबह-सुबह चाय पीते वक्त अपनी पत्नी से बोला, कहना तो नहीं चाहिए, लेकिन तुझसे मैं कुछ छिपाना भी नहीं चाहता। दुख तुझे होगा, मगर ध्यान रखना यह केवल सपने की बात है, यह कोई सच नहीं है। नाहक तूल मत दे देना। तिल का पहाड़ मत बना लेना। इधर कुछ दिनों से रात सपने में रोज तेरी सहेली को देखता हूं।
पत्नी तो भन्ना गई। सपने में ही सही, मगरर् ईष्या जग उठी। चाय की केतली उसने जमीन पर पटक दी।
मुल्ला ने कहा, मैंने पहले ही कहा था कि यह सिर्फ सपने की बात है।
पत्नी ने कहा, तो फिर तुम भी सुन लो, मैं भी कहना नहीं चाहती थी। मेरी सहेली अकेली ही दिखाई पड़ती होगी सपने में।
मुल्ला ने कहा, यह बात तो सच है, लेकिन तुझे कैसे पता चला?
उसने कहा, क्योंकि उसका पति तो मेरे सपने में आता है।
मुल्ला ने लकड़ी उठा ली, डंडा उठा लिया।
पत्नी ने कहा, सपना ही है, ऐसे क्या भन्नाए जाते हो!
मगरर् ईष्याएं ऐसी हैं।र् ईष्याएं घेरे हुए हैं तुम्हारे प्रेम को; वैमनस्य घेरे हुए है; घृणा घेरे हुए है। और अगर इस कारण तुम्हारा प्रेम नरक बन जाता है तो प्रेम का कसूर नहीं है। तुमने प्रेम में जहर घोल दिया है। और जहर को तो निकालोगे नहीं; कहते हो, प्रेम को ही फेंकेंगे तब वैराग्य पैदा होगा।
अंग्रेजी में कहावत है कि जब बच्चे को टब में नहलाओ तो गंदे पानी के साथ बच्चे को भी मत फेंक देना। बच्चे को तो बचा लेना, गंदे पानी को फेंक देना। लेकिन यही होता रहा है। सदियों-सदियों में तुमने गंदे पानी के साथ बच्चे भी फेंक दिए हैं। फिर रोते हो, फिर तड़पते हो, क्योंकि सीढ़ी टूट जाती है--और वही सीढ़ी परमात्मा से जोड़ने वाली है।
इसलिए आनंद मैत्रेय, मैंने बार-बार कहा है: गणित या ज्ञान से उपजा वैराग्य झूठा है।
और तुम्हारा तथाकथित साधु-महात्मा ज्ञान और गणित से ही चलता है। वह वैराग्य भी क्या वैराग्य है जिसमें गणित हो? गणित का अर्थ होता है: लोभ। गणित का अर्थ होता है: हिसाब। गणित का अर्थ होता है: यहां छोड़ेंगे तो स्वर्ग में पाएंगे। मगर क्या पाओगे स्वर्ग में?
तुम जरा, दुनिया के धर्मों ने स्वर्ग की जो तस्वीरें खींची हैं, उन पर ध्यान तो दो। तो साधारण बुद्धि का आदमी भी देख पाएगा जालसाजी। जो तुम यहां छोड़ते हो वही हजार गुना, लाख गुना, करोड़ गुना होकर वहां मिलेगा। यह कोई छोड़ना हुआ! यहां तुमने एक पत्नी छोड़ी और वहां अप्सराएं पाओगे! और पत्नी तो तुम्हारी साधारण पत्नी थी, हड्डी-मांस-मज्जा की देह वाली थी। अप्सराएं स्वर्ण-काया की हैं! उनकी देह से पसीना नहीं बहता, इत्र झरता है। और वे कभी वृद्ध नहीं होतीं। उनकी उम्र जो अटकी है सोलह पर सो अटकी ही है। सदियां बीत गईं, अप्सराएं अभी भी सोलह की हैं। उर्वशी की उम्र अभी भी सोलह ही वर्ष है। एक दिन आगे नहीं बढ़ती।
और वहां कल्पवृक्ष हैं, जिनके नीचे बैठ कर तुम जो भी चाहोगे तत्क्षण पूरा होगा। तत्क्षण! इस जगत में तो कुछ चाहो तो फिर श्रम करना होता है, वर्षों प्रतीक्षा करनी होती है। फिर भी मिलेगा या नहीं मिलेगा, यह पक्का नहीं है। क्योंकि और भी प्रतिस्पर्धी हैं, और भी लोग उसी को पाने चले हैं। लेकिन कल्पवृक्ष के नीचे तत्क्षण, समय नहीं लगता। इधर चाहा, उधर हुआ।
मैंने सुना है, एक आदमी भूला-भटका गलती से स्वर्ग पहुंच गया। गलतियां तो सब जगह होती हैं।
मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन, जब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे, तो उनसे मिलने गया। मुल्ला को गैरिक वस्त्रों में देख कर मोरारजी तो आगबबूला हो गए। मेरे बहुत से संन्यासियों ने मुझे आकर कहा है कि उनके पास गैरिक वस्त्रों में जाने का बड़ा आनंद है, वे एकदम आगबबूला हो जाते हैं। होश ही खो देते हैं। कुछ का कुछ कहने लगते हैं। अल्ल-बल्ल बकने लगते हैं। जैसे लाल झंडी देख कर सांड़ भड़क जाते हैं, ऐसे गैरिक वस्त्र देख कर मोरारजी भड़क जाते हैं।
तो उन्होंने मुल्ला को देखते ही उससे कहा, मुल्ला, बुढ़ापे में तुम्हें यह क्या सूझी? तुम भी रजनीश के चक्कर में आ गए! तुमसे ऐसी आशा न थी। तुम्हें क्या हो गया?
मुल्ला ने कहा, क्या करूं? जब से इस आदमी को देखा तब से मुझे भरोसा आया कि ईश्वर है।
मोरारजी ने कहा, अच्छा! तो मुझे देख कर तुम्हें क्या खयाल आता है?
नसरुद्दीन ने कहा, आपको देख कर खयाल आता है कि ईश्वर से भी गलती हो सकती है।
गलतियां सब जगह होती हैं। तुम खुद ही सोचो, अगर ईश्वर से गलती न होती तो तुम कैसे होते? तुम हो, यह काफी प्रमाण है कि ईश्वर से भी भूल-चूक होती है।
तो यह आदमी भूल-चूक से स्वर्ग पहुंच गया। थका-मांदा था, एक वृक्ष के नीचे लेटा। उसे क्या पता कि यह कल्पवृक्ष है! जब लेटने लगा, कंकड़-पत्थर थे, ऊबड़-खाबड़ जमीन थी--सोचा कि इतना थका हूं कि इस समय अगर सोने के लिए एक सुंदर शय्या मिल जाती, ठीक से विश्राम हो जाता! ऐसा उसका सोचना ही था कि एकदम जैसे शून्य से एक सुंदरतम शय्या प्रकट हुई! सम्राट जिसको देख कर तरस जाएं! वह इतना थका-मांदा था कि उसने यह सोचा भी नहीं कि यह कहां से आई, कैसे आई। वह तो गिर पड़ा और सो गया। जब दो घंटे, तीन घंटे बाद सुस्ता लिया, आंख खुली, बहुत भूख लगी थी, सोचा कि इस समय अगर सुस्वादु भोजन कहीं मिल जाए, कहीं कोई पास में होटल-रेस्तरां इत्यादि होता...यहां कोई दिखाई भी नहीं पड़ता। ऐसी भूख मेरे जीवन में कभी लगी न थी! उसका ऐसा सोचना था कि एकदम थालियों पर थालियां लिए अप्सराएं उपस्थित हो गईं। थोड़ा संदेह तो हुआ, मगर भूख इतनी थी कि जल्दी से वह भोजन करने में लग गया। जब भोजन कर चुका, विश्राम कर चुका, तब उसे खयाल आया कि यह मामला क्या है? यह कहां से बिस्तर आया? और कहां से यह भोजन? और कहां से ये सुंदर स्त्रियां? एकदम आकाश से उतर आईं! कहीं कोई भूत-प्रेत तो नहीं है? और एकदम भूत-प्रेत मौजूद हो गए। भूत-प्रेतों को देख कर उसने कहा, मारे गए! अब मारे गए! और वे झपट पड़े और उन्होंने उसकी गर्दन दबा दी और उस आदमी को मार डाला।
कल्पवृक्ष के नीचे तुम जो सोचोगे वह तत्क्षण हो जाता है। कभी भूल-चूक से पहुंच जाओ कल्पवृक्ष के पास, तो थोड़ा समझ-सोच कर...ऐसी उलटी-सीधी बातें मत सोचना कि कहीं भूत-प्रेत तो नहीं हैं? अब मारे गए!
किनने ये कल्पवृक्ष ईजाद किए हैं? ये उन्हीं लोगों ने, जिन्होंने यहां थोड़ा कुछ दबाया है, कुछ त्यागा है। और किनने ये अप्सराएं पैदा की हैं?
उन्हीं ने जिन्होंने स्त्रियों को नरक का द्वार कहा है। उन्हीं शास्त्रों में स्त्रियां नरक का द्वार हैं, उन्हीं शास्त्रों में अप्सराओं का वर्णन है--जो उनको मिलेंगी जो पुण्यात्मा हैं।
एक महात्मा मरे। संयोग की बात, उनका प्रमुख शिष्य भी घड़ी भर बाद मर गया। शायद दुख में ही मर गया हो। शिष्य चला जा रहा था स्वर्ग की तरफ सोचता हुआ कि मेरे गुरु को तो उर्वशी से कम कोई नहीं मिला होगा। थे भी तो महात्मा बड़े। उर्वशी पैर दाब रही होगी। अहा! शिष्य ने सोचा: आज गुरु के सारे त्यागत्तपश्चर्या का फल आनंद की तरह उन पर बरस रहा होगा। और जब पहुंचा स्वर्ग तो जो देखा, भरोसा आ गया कि जो सोचा था ठीक था। एक बड़ी सुंदर स्त्री गुरु के गले लिपटी थी। शिष्य एकदम पैरों पर गिर पड़ा और उसने कहा कि हे गुरुदेव, आज बिलकुल सिद्ध हो गया कि थे आप महात्मा पहुंचे हुए, कि किए थे पुण्य आपने, कि की थी तपश्चर्या। वृक्ष फलों से जाने जाते हैं और महात्माओं का भी अंतिम निर्णय स्वर्ग में होता है। मालूम होता है बाई उर्वशी है! क्या गले लिपटी है!
गुरु ने कहा, उल्लू के पट्ठे, तू उल्लू का पट्ठा ही रहा! अरे नासमझ...!
शिष्य ने कहा, इसमें नासमझी कैसी? अरे आपको आपके पुण्यों का फल मिल रहा है।
गुरु ने कहा, फिर मैं कहता हूं कि जरा गौर से देख। मेरे पुण्यों का फल यह स्त्री नहीं है; इस स्त्री के पापों का फल मैं हूं। इसको दंड दिया जा रहा है। अब मुझसे ज्यादा हड्डी-हड्डी, क्योंकि तपश्चर्या में...मुझसे ज्यादा दुर्गंधयुक्त, क्योंकि वर्षों से मैं नहाया नहीं, क्योंकि स्नान तो शरीर को सजाना है, शृंगार है...मुझसे ज्यादा घबड़ाने वाला, क्योंकि राख पोते-पोते जिंदगी बिताई--और कहां मिलेगा! मैं इसका दंड हूं, यह मेरा पुरस्कार नहीं।
मगर जिन्होंने सोचे हैं ये पुरस्कार, वे कौन लोग हैं? यह अपनी वासनाओं को ही पीछे के द्वार से वापस ले आना है।
जो प्रेम को दबाएगा वह कभी वासना से मुक्त न हो पाएगा। उसके जीवन में दुर्गंध ही दुर्गंध हो जाएगी। हां, ऊपर से वह आवरण ढांक लेगा; भीतर मवाद होगी, ऊपर से फूल सजा लेगा। मैं नहीं कहता प्रेम को दबाओ। और मैं नहीं कहता गणित से सोचो। गणित का सोचना तो लोभ है, लोभ का ही विस्तार है गणित। गणित की भाषा ही लोभ की भाषा है, और कुछ उसे दिखाई ही नहीं पड़ता।
एक जहाज डूब रहा था। सारे लोग घबड़ा रहे हैं, परेशान हो रहे हैं, लेकिन एक मारवाड़ी निश्चिंत बैठा हुआ है। आखिर किसी ने कहा कि सेठजी, जहाज डूब रहा है!
तो उस मारवाड़ी ने कहा, तो अपने बाप का क्या डूब रहा है? सरकारी जहाज है, डूबने दो!
गणित तो लोभ की भाषा में सोचता है: अपना क्या है? कल का डूबता आज डूब जाए। लेकिन किसी ने कहा कि यह तो ठीक कह रहे हैं आप कि अपना जहाज नहीं है, मगर जहाज में हम भी डूबेंगे।
मारवाड़ी ने कहा, इंश्योरेंस करवा कर चलता हूं। बीमा करवाया है। तुम जैसा बुद्धू नहीं हूं।
मरने की फिक्र नहीं है। शायद मारवाड़ी हिसाब लगा रहा हो कि अहा, आ गया मौका! अब निकला इंश्योरेंस कंपनी का दीवाला! मौत की चिंता नहीं है, हिसाब-किताब है। और यही मारवाड़ी महात्मा हो जाता है, तब भी इसका हिसाब-किताब जारी रहता है। तब यह सोचता है: इतने व्रत किए, इतने उपवास किए, कितना लाभ मिलेगा? तब भी हिसाब-किताब है।
जहां लोभ है, वहां कहां वैराग्य! वैराग्य लोभ से पैदा नहीं होता। और जो वैराग्य लोभ से पैदा होता है, झूठा होता है। वैराग्य तो पैदा होता है प्रेम की परम शुद्धि से। जैसे सोने को हम आग में डालते हैं और निखर कर कुंदन बन कर निकलता है, ऐसे ही जब हम प्रेम को ध्यान की आग से गुजारते हैं तो जो शुद्ध स्वर्ण की तरह प्रेम उपलब्ध होता है--जिसमें न वासना होती है, न कामना होती है, न कोई हेतु होता, न कोई पाने की आकांक्षा, न कुछ खोने का डर--सिर्फ एक आनंद-उत्सव शेष रह जाता है! एक गीत होता है--शब्द-शून्य! एक संगीत होता है--ध्वनि-मुक्त! अनाहत का नाद होता है। एक प्रफुल्लता होती है। एक झरता हुआ आनंद का झरना होता है तुम्हारा हृदय। तुम अस्तित्व के साथ प्रेमलीन होते हो। नहीं कि तुम किसी को प्रेम करते हो, बल्कि तुम प्रेम होते हो! तब वैराग्य एक नये अर्थों में प्रकट होता है--विधायक अर्थों में। तब वैराग्य की महिमा बहुत है। और नहीं तो पीछे के दरवाजे से सब चीजें लौट आती हैं। दमन से न कभी कोई मुक्त हुआ है और न कभी कोई मुक्त हो सकता है।
मुल्ला नसरुद्दीन को अभी-अभी डाकिया चिट्ठी दे गया था। नसरुद्दीन ने लिफाफा खोला तो ढब्बूजी भी उचक कर देखने लगे कि आखिर किसकी है! इस पर नसरुद्दीन ने लिफाफा उनके हाथ में रख दिया और कहा कि लो, खुद पढ़ कर देख लो। गुलजान ने भेजी है मायके से।
ढब्बूजी ने चिट्ठी खोल कर देखी जो चौंक कर बोले, लेकिन यह तो कोरा कागज है!
हां, आजकल मेरी और उसकी बोलचाल बंद है--नसरुद्दीन ने मायूसी से जवाब दिया--जब से झगड़ा करके गई है, ऐसे ही पत्र डालती है।
मगर पत्र जारी हैं! पीछे के दरवाजे से! पत्र डालना बंद नहीं हुआ।
ऐसे ही तुम्हारा तथाकथित विरागी होता है। ऊपर-ऊपर से वैराग्य, भीतर-भीतर सारी वासनाएं, सारी कामनाएं दबी हुई--दमित चित्त। मनोविज्ञान की दृष्टि से रुग्ण है तुम्हारा विरागी। मैं जिसे वैराग्य कह रहा हूं वह स्वस्थ वैराग्य है। और वह तो प्रेम से ही पैदा हो सकता है। क्योंकि प्रेम, तुम्हारे भीतर जो श्रेष्ठतम है, उसकी अभिव्यक्ति है। प्रेम तुम्हारे भीतर परमात्मा की किरण है। प्रेम तुम्हारे भीतर प्रार्थना का बीज है। इस बीज को बोओ! सींचो!
अंसुअन जल सींचि-सींचि प्रेमबेल बोई! स्मरण करो मीरा को। और ऐसे ही पानी से नहीं सींची जाएगी यह प्रेम की बेल। अंसुअन जल सींचि-सींचि प्रेमबेल बोई! जिस प्रेम की बात मीरा ने कही है, उसी प्रेम की बात मैं भी कह रहा हूं। आंसुओं से सींचो इसे। अपने प्राणों को ढाल दो। मिट जाओ प्रेम में। और तुम्हारे भीतर वैराग्य का फूल खिलेगा--सहस्रदल कमल खिलेगा। तब तुम संसार में रहोगे और संसार के बाहर; जल में जैसे कमल तैरे! कहीं भागना न होगा, पलायन न करना होगा। जीवन को उसकी परम गहराई में जीने की क्षमता आएगी। क्योंकि परमात्मा जीवन की गहराइयों में छिपा है; भगोड़ों को नहीं मिलता। जो भागा वह चूका। परमात्मा मिलता है--जागने से, भागने से नहीं। और प्रेम जिस भांति जगाता है, कोई और चीज नहीं जगाती।
स्मरण करो पलटू के वचन! बार-बार पलटू कहते हैं कि जब से प्रेम उठा है तब से नींद खो गई। जब से प्रेम जगा है तब से कैसे नींद! पता नहीं कब आ जाए मालिक, किस क्षण द्वार पर दस्तक दे दे!
कभी प्रेम में किसी की प्रतीक्षा की है? फिर नींद कहां? नींद में भी चौंक-चौंक पड़ते हो। अगर मेहमान घर आने को है, प्यारा मेहमान घर आने को है, तो रात भर जाग कर प्रतीक्षा करते हो। हवा चलती है जोर से, द्वार, खिड़की-दरवाजे खड़-खड़ होते हैं--भाग कर द्वार पर आ जाते हो, कहीं मेहमान आ तो नहीं गया! कोई भी निकलता है राह से, और लगता है उसी की पदचाप! डाकिया आता है, लगता है उसी का पत्र! याद भीतर सघन है तो कैसे सोओगे?
पलटू ठीक कहते हैं: जिसके भीतर प्रेम जगा, उसकी नींद खो गई।
जबरदस्ती अपने को जगाने वाले लोग भी हैं। मैं एक गांव में गया था। लोगों ने कहा कि इस गांव में एक बड़े महात्मा हैं, उनका नाम है खड़ेश्री बाबा! वे दस साल से खड़े ही हुए हैं।
मैंने कहा, पागल होंगे। क्योंकि परमात्मा ने दस साल तक खड़े होने की किसी को भी आज्ञा नहीं दी है। परमात्मा भीतर से खबर देता है कि अब थक गए, अब बैठो, कि अब लेटो, कि अब विश्राम करो। और क्या गुण हैं उनमें?
कहा, नहीं, और तो कोई गुण नहीं हैं। मगर यह कोई कम बात है, दस साल से खड़े हैं!
मैंने कहा, खड़े होने का आयोजन क्या है?
आयोजन यह है कि रस्सियां लटका रखी हैं। हाथ रस्सियों से बांध रखे हैं। पैरों को डंडों से बांध दिया है, ताकि वे झुक न जाएं। नहीं तो दस साल कोई खड़ा रहेगा! सारा शरीर सूख गया है और पैर हाथी-पांव हो गए हैं, सूज गए हैं। सारा खून पैरों में समा गया है।
इस विक्षिप्त आदमी को महात्मा की तरह पूज रहे हो! दिन-रात पूजन चल रही है!
मैंने कहा, कभी उनसे पूछा है कि क्यों खड़े हो?
तो उन्होंने कहा, ताकि नींद न आ जाए। क्योंकि कृष्ण ने गीता में कहा है--या निशा सर्वभूतायाम् तस्याम् जागर्ति संयमी। जब सब सो जाएं तब भी संयमी जागता है।
मगर, मैंने कहा, कभी कृष्ण को तुमने किसी कहानी में, किसी पुराण में देखा कि ऐसे रस्सियां बांध कर और हाथ बैसाखियों पर रख कर और पैरों में डंडे बांध कर खड़े रहे हों? सोते थे, विश्राम करते थे। कृष्ण की मृत्यु ही ऐसे हुई। एक वृक्ष के तले विश्राम कर रहे थे, तब किसी शिकारी ने भ्रांति से, भूल से उनके पैर में तीर मार दिया। उससे उनकी मृत्यु हुई। खड़ेश्री बाबा नहीं थे वे, सोयेश्री बाबा थे।
उनका अर्थ कुछ और है: भीतर चित्त जागा रहे। देह को तो विश्राम चाहिए। देह तो मिट्टी की है। मिट्टी थक जाती है, उसकी सीमा है। लेकिन चेतना अथक जागी रह सकती है। मगर ये चेतना को जगाने के उपाय पागलखाने में ले जाने योग्य हैं। ये उपाय नहीं हैं चेतना को जगाने के। चेतना को जगाने का सम्यक उपाय है: प्रीति! परमात्मा के प्रति प्रेम जगे। यही प्रेम जो तुमने अभी क्षुद्र चीजों से लगा रखा है--किसी ने धन से, किसी ने पद से, किसी ने प्रतिष्ठा से--यही सारा प्रेम तुम परमात्मा की तरफ उंडेल दो, इसे एकाग्र करो। यह जो हजार धाराओं में बंट गया है--पलटू कहते हैं, यह जो पांच-पच्चीस हो गया है--इसको इकट्ठा करो, एक धारा बनाओ, ताकि यह सागर तक पहुंच जाए। लेकिन लोग अपने ढंग से सोचते-समझते हैं। किसी ने जागने का अर्थ ले लिया कि बस खड़े रहेंगे, नींद नहीं आएगी, तो परम ज्ञान को उपलब्ध हो जाएंगे। ऐसे पागल हुए हैं जिन्होंने आंख की पलकें उखाड़ कर फेंक दीं, ताकि न होगा बांस न बजेगी बांसुरी! मगर तुम्हें पता है, पलकें भी उखाड़ कर फेंक दो तो भी नींद लग जाएगी!
मैं एक महिला को जानता हूं, जिसकी एक पलक में कुछ खराबी आ गई थी कि उसका सहज बंद होना और खुलना बंद हो गया था। हाथ से बंद करो तो बंद हो जाती थी, खोलो तो खुल जाती थी। उसको नींद में भी तुम खोल दो उसकी आंख, तो खुल जाती थी। और आंख बिलकुल पथरीली, सोई हुई। अक्सर वह खुली आंख से सोई रहती थी। मेरे घर मेहमान थी। मेरे पड़ोस में कुछ बच्चे जो मेरे पास आते थे, उनसे मैंने कहा, तुम्हें एक चमत्कार देखना है? तुमने कोई व्यक्ति देखा जो एक आंख बंद करके सोता हो?
उन्होंने कहा कि नहीं देखा।
तो तुम जाकर कमरे में देख लो।
दोपहर थी, गरमी और वह महिला सो रही थी। उन बच्चों ने झांक कर देखा। वे तो घबड़ा कर बाहर आ गए। उन्होंने कहा, यह बात तो सच है। उसकी एक आंख खुली, एक बंद। इस महिला को कहां से ले आए आप? और बड़ा डर लगता है देख कर।
रात में तुम भी अगर किसी को एक आंख खुली और एक आंख बंद सोए देखो तो एक बार तो भीतर घबराहट पैदा हो जाएगी कि अब पता नहीं यह और क्या करे! एक तो स्त्री, फिर एक आंख खोले और एक आंख बंद! अब पता नहीं आगे क्या करे! भाग निकलो!
लोग श्रेष्ठतम सिद्धांतों से भी अपनी विक्षिप्तता के अनुकूल अर्थ निकाल लेते हैं।
ढब्बूजी ने अखबार में शराब की बुराइयां छपी देखीं तो अखबार फेंकते हुए कहा, बंद! आज से बिलकुल बंद!
पास ही बैठे चंदूलाल ने पूछा, ढब्बूजी, क्या बंद कर रहे हो? क्या शराब पीना?
जी नहीं, अखबार लेना--ढब्बूजी ने जवाब दिया।
मुल्ला नसरुद्दीन ने भी एक दफा शराब पीना छोड़ने की कसम खा ली। मुश्किल थी तो एक कि बाजार जाए, दफ्तर जाए, कहीं भी जाए तो बीच में शराबघर पड़ता था। उससे बचने का कोई उपाय नहीं था। रास्ता एक ही था गांव में। वही घबड़ाहट थी कि घर तो किसी तरह हिम्मत बांधे बैठे रहेंगे। इसीलिए तो तुम्हारे साधु-संन्यासी जंगल भाग जाते हैं। डर लगता है, क्योंकि यहां परिस्थितियां ऐसी हैं कि असलियत प्रकट हो जाएगी--चुनौती। अब मुल्ला क्या करे, क्या न करे! दफ्तर जाना होगा, सब्जी भी खरीदने बाजार जाना होगा, और हजार काम हैं--और एक ही रास्ता है गांव में और बीच में ही पड़ता है शराबघर। एक दिन तो गया ही नहीं।
पत्नी ने कहा, ऐसे नहीं चलेगा। यह तो और महंगा पड़ जाएगा। इससे तो तुम अपनी शराब पीनी जारी रखो तो ठीक रहेगा। अगर तुम दफ्तर ही न गए तो हम तो भूखे मर जाएंगे। फिर सब्जी कौन लाएगा? और बाजार से सामान कौन खरीदेगा? और खरीदने को पैसे ही कहां से आएंगे? शराब पीते थे, कम से कम तुम आधी तनख्वाह उड़ा देते थे, ठीक है, आधी तो बचती थी!
मुल्ला ने कहा, जब कसम खाई है तो निभाऊंगा। जाऊंगा बाजार भी। चला, मन ही मन में कुरान की आयतें पढ़ रहा है, अपनी हिम्मत बढ़ा रहा है कि मत घबरा। अपने से कह रहा है: अरे इतने लोग निकल जाते हैं बिना पीए शराबघर के सामने से, तो तू भी मर्द है! दृढ़ संकल्प रख! शराबघर आ गया, पैर डगमगाने लगे, मन डांवाडोल होने लगा। मुल्ला ने कहा कि नहीं, बिलकुल नहीं! आंख से भी नहीं देखा शराबघर की तरफ, आंख भी नीचे रखी।
बौद्ध भिक्षु चार फीट ही देख कर चलते हैं। सिर्फ डर के कारण--कोई स्त्री दिखाई पड़ जाए! अब जब तुम चार फीट ही देखोगे तो ज्यादा से ज्यादा स्त्री के पैर दिखाई पड़ेंगे, और क्या दिखाई पड़ेगा! और पैर दिखाई पड़ गए तो और तीन ही फीट देखना। और घबड़ा जाना तो आंख ही बंद कर लेना। इधर-उधर नहीं देखता बौद्ध भिक्षु, क्योंकि कुछ दिखाई पड़ जाए, प्रलोभन आ जाए, आकर्षण पैदा हो जाए। यह कोई त्याग है!
मुल्ला नीचे जमीन की तरफ देखता हुआ चला जा रहा है। और उसे पता है, जिंदगी भर तो शराबघर आया है कि कब शराबघर आता है! हालांकि नीचे देख रहा है, मगर भीतर तो शराबघर दिखाई पड़ने लगा कि आ गया, अब बिलकुल बगल में है, अब बिलकुल सामने हूं। अब तो भागने लगा, क्योंकि अगर धीमे चला तो उसे डर है कि कहीं मुड़ न जाए शराबघर की तरफ। सौ कदम आगे निकल गया, तब रुका, अपनी पीठ ठोंकी और कहा, शाबाश नसरुद्दीन! आ, अब इस खुशी में तुझे पिलाते हैं! पहुंच गया शराबघर वापस। उस दिन दुगुनी पी। आखिर खुशी भी तो मनानी होगी। संकल्प की ऐसी विजय कि सौ कदम आगे निकल गया बिना शराबघर की तरफ देखे!
ये ही पीठ ठोंकने वाले महात्मा स्वर्गों में अप्सराएं भोगने की आकांक्षाएं कर रहे हैं।
नहीं, मैं इन गणितों में भरोसा नहीं करता हूं। मेरा भरोसा प्रेम में है, हृदय में है; मस्तिष्क में नहीं। मैं तुमसे नहीं कहता कि तुम यह त्याग कर दो तो तुम्हें यह मिलेगा। यह कोई त्याग हुआ जब मिलने की बात पहले ही तय करवा ली? लोग मुझसे आकर पूछते हैं कि हम व्रत करेंगे तो क्या मिलेगा? उपवास करेंगे तो क्या मिलेगा? मिलेगा क्या, पहले तय हो जाना चाहिए। यहां तक कि लोग मुझसे आकर पूछते हैं: ध्यान करेंगे तो क्या मिलेगा? मिलना सुनिश्चित हो जाए, गारंटी हो जाए, तो फिर सब कुछ करने को राजी हैं।
यह व्यवसायी चित्त, यह मारवाड़ी चित्त, यह धार्मिक कैसे हो सकता है? असंभव है! धार्मिक चित्त एक और ही अभियान है, एक और ही आयाम है। धार्मिक चित्त यह नहीं पूछता कि क्या मिलेगा? इसका फल क्या होगा? धार्मिक चित्त यह पूछता है कि मैं दुख में हूं, क्यों हूं दुख में? मैं नरक में हूं, क्यों हूं नरक में? कैसे मैंने यह नरक निर्मित किया है? मैं इतना मूर्च्छित क्यों हूं कि अपने लिए मैंने दुख के जाल बुन लिए हैं? मुझे होश कैसे आए? वह यह नहीं पूछता कि होश से मुझे क्या मिलेगा। वह सिर्फ इतना ही पूछता है कि होश मुझे आ जाए, ताकि मैं ये जो दुख के जाल निर्मित किए चला जाता हूं, और निर्मित न करूं।
और जहां दुख नहीं है वहां आनंद अपने आप झरता है। मूर्च्छा दुख है, जागरण आनंद है। जागरण का फल नहीं है आनंद--जागरण स्वयं आनंद है। मूर्च्छा का फल नहीं है दुख--मूर्च्छा स्वयं दुख है। और प्रेम से ज्यादा जगाने वाली कोई और कीमिया नहीं है।
इसलिए मैं, आनंद मैत्रेय, यही कहता हूं कि जो वैराग्य प्रेम से पैदा होता है, प्रभु-प्रेम से, वही वैराग्य सच्चा है। जिस वैराग्य में पाने की कोई कामना छिपी है, कोई हिसाब छिपा है--इतना करूं, इतना पाऊं--वह दुकानदारी है, वह वैराग्य नहीं है। और ऐसा वैराग्य जो दुकानदारी है, गणित है, हिसाब-किताब है--हमेशा उदास होगा। क्योंकि मिलेगा तो मृत्यु के बाद, क्या भरोसा? क्या पक्का है? कोई गारंटी तो नहीं। मृत्यु के बाद बचोगे भी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं। बच भी गए, तो जो बेईमान यहां सब सुख भोग रहे हैं, वे बेईमान वहां भी बेईमानी न कर जाएंगे, इसका क्या पक्का पता है? जो लुच्चे-लफंगे यहां छीन रहे हैं तुमसे सुख, वे वहां भी नहीं छीन लेंगे, इसका क्या पक्का पता है? स्वर्ग में भी तुम सोचते हो कि दादागिरी नहीं चलती होगी? दादा लोग कहां जाएंगे? तुम स्वर्ग में घुस भी पाओगे? दादा घुसने भी देंगे? जो यहां छाती पर चढ़ बैठे हैं उन्हें छाती पर चढ़ बैठने का अभ्यास हो गया है। और तुम्हें उन्हें छाती पर बिठाए रखने का अभ्यास हो गया है। क्या पक्का, वहां भी बात यही रहे कि वे फिर तुम्हारी छाती पर चढ़ जाएं। और तुम्हें भी अच्छा न लगेगा जब तक कोई तुम्हारी छाती पर चढ़ कर न बैठ जाए; तुम्हें भी खाली-खाली लगेगा, सूना-सूना लगेगा। जैसा यहां है वैसा ही वहां होगा। क्या पक्का कि इससे अन्यथा नियम काम वहां करेगा? आखिर यह जगत भी तो परमात्मा का है! अगर उसका नियम यहां काम नहीं कर रहा है तो स्वर्ग भी उसी का है, उसका नियम वहां कैसे काम करेगा? इसलिए संदेह उठता है, शक उठता है।
जहां तर्क है वहां संदेह है। जहां विश्वास है वहां संदेह है। तो तुम किसी तरह छोड़ते हो थोड़ा-बहुत, मगर संदेह से भरे हुए, पता नहीं! मगर इस आशा में कि कौन जाने...तो अगर हजार कमाते हो तो दस रुपये दान भी कर दो, तो परलोक भी सम्हला रहेगा। वहां भी थोड़ा बैंक बैलेंस होगा। वहां भी जाकर कहने को तो होगा कि मैंने कुछ दान किया था, पुण्य किया था, उसका बदला चाहिए।
एक आदमी मरा। द्वारपाल ने स्वर्ग पर उससे पूछा कि कुछ दान किया है? कुछ पुण्य किया है?
उसने कहा, हां, एक बूढ़ी स्त्री को मैंने तीन पैसे दिए थे।
द्वारपाल मुश्किल में पड़ा--क्या करे, क्या न करे! किताबें खोलीं, बात सच थी, तीन पैसे उसने दिए थे। द्वारपाल ने अपने सहयोगी से कान में पूछा कि अब क्या करें? इसने पुण्य तो किया है, इसको स्वर्ग मिलना चाहिए। मगर कुल तीन पैसे में स्वर्ग पा ले यह, तो बहुत सस्ता हो गया मामला। इसको एकदम नरक भी नहीं भेज सकते, क्योंकि पुण्यात्मा और नरक जाए! तीन ही पैसे का सही पुण्य, लेकिन पुण्यात्मा नरक जाए तो पुण्य पर श्रद्धा उठ जाएगी।
सहयोगी ने कहा, ऐसा करें, इसको तीन पैसे भी दे दें ब्याज सहित और नरक भेजें। और क्या करेंगे? बहुत से बहुत ब्याज ले ले, और क्या करेगा!
तो मैं तुमसे कहे देता हूं: गणित से तुम चलोगे, तो ज्यादा से ज्यादा ब्याज पाओगे। जिंदगी से चूक जाओगे।
जिंदगी उनकी है जो गणित से मुक्त हो जाते हैं; जो हिसाब-किताब से ऊपर उठते हैं, अतिक्रमण करते हैं; जो प्रेम से जीते हैं। जो हृदय से जीते हैं, जिंदगी उनकी है। और जिनकी जिंदगी है उन्हीं का परमात्मा है। और जिनकी जिंदगी है उनका स्वर्ग कल नहीं है, भविष्य में नहीं है, मौत के बाद नहीं है। उनका स्वर्ग अभी है और यहीं है। वे स्वर्ग में ही हैं।
प्रेम को निखारो! प्रेम का दीया जलाओ! प्रेम की दीपावली मनाओ! प्रेम की फाग खेलो! प्रेम के रंग-गुलाल उड़ाओ! जरूर प्रेम अभी बहुत कीचड़ में पड़ा है, लेकिन कीचड़ से ही तो कमल पैदा होते हैं। कीचड़ से मुक्त करो कमल को। मगर नष्ट मत कर देना। नष्ट कर दिया तो सीढ़ी ही टूट गई। नष्ट कर दिया तो नाव ही टूट गई। फिर उस पार कैसे जाओगे?
प्रेम की नाव बनाओ। यही नाव है--एकमात्र नाव, जो उस पार ले जा सकती है।
हिम्मत चाहिए, परवाने की हिम्मत चाहिए--जो प्रेम में ज्योति पर झपट पड़ता है और मर जाता है। उतना साहस चाहिए--जो सब लोक-लाज खो देता है, छोड़ देता है। तो जरूर प्रेम तुम्हारे लिए अभी और यहीं स्वर्ग के द्वार खोल सकता है।


दूसरा प्रश्न:

भगवान! आप कहते हैं कि जीवित बुद्ध ही तारते हैं।
तब यह कैसी विडंबना है कि बुद्धों को जीते जी निंदा मिलती है और मरने पर पूजा? यह कैसा विधान है?

स्वरूप! इसमें न तो विडंबना है, न कुछ आश्चर्यचकित होने की बात। यह जीवन की सहज व्यवस्था है। जीवित बुद्ध ही तारते हैं, क्योंकि जो स्वयं ही जीवित नहीं है वह तुम्हें कैसे जीवन दे सकेगा? जिसका स्वयं का दीया बुझा है वह तुम्हारे बुझे दीये को कैसे जला सकेगा? जलते दीये के पास ही तुम बुझे दीये को लाओ तो बुझा दीया जलता है। ज्योति से ज्योति जले!
जीवित बुद्ध ही तारते हैं। अगर तुम डूब रहे हो तो कोई जिंदा आदमी ही तुम्हें बचा सकता है। घाट पर हजारों लाशें रखी रहें, तो उन लाशों में से एक भी छलांग लगा कर पानी में नहीं कूदेगी, तुम्हें बचाएगी नहीं। और जीवित भी लोग बैठे हों, लेकिन जीवित में भी केवल वही बचा सकता है तुम्हें जो तैरना जानता हो।
मैं एक बार नदी के किनारे बैठा था और एक आदमी डूबने लगा। मैं भागा। लेकिन जब तक मैं किनारे पर पहुंचूं, एक दूसरा आदमी जो और भी पास था किनारे के, वह कूद ही पड़ा था। तो मैं रुक गया। लेकिन वह जो आदमी कूद गया था, खुद ही डूबने लगा। पहले मुझे उसे बचाना पड़ा। एक की जगह दो आदमी बचाने पड़े। मैंने उस दूसरे आदमी से पूछा कि मेरे भाई, तुझे क्या हुआ?
उसने कहा, मैं भूल ही गया कि मुझे तैरना नहीं आता। इस आदमी को डूबते देख कर मैं एकदम कूद ही गया।
मुरदे तो कूद नहीं सकते। जिंदा कूद सकते हैं, लेकिन तभी काम आ सकते हैं जब उन्हें तैरना आता हो। तो मुरदे नहीं बचा सकते। जिंदा भी नहीं बचा सकते। जिंदा बुद्ध बचा सकते हैं। जिंदा बुद्ध का अर्थ है: जिसे तैरना आता है; जो तैर गया सारा भवसागर। जो उस किनारे को देख कर लौटा है, वही तुम्हें उस किनारे तक पहुंचा सकता है, वही मार्गदर्शक हो सकता है।
लेकिन स्वरूप, तुम्हारा प्रश्न ठीक है कि जिंदा बुद्ध तारते हैं। लेकिन जिंदा बुद्धों को सिवाय गालियों के और कुछ भी नहीं मिलता। ऐसा क्यों?
इसीलिए कि वे तारते हैं और तुम तरना नहीं चाहते। उनकी हालत करीब-करीब ऐसी समझो कि एक स्कूल में एक मिशनरी ने अपने बच्चों को समझाया कि सप्ताह में कम से कम एक पुण्य का कार्य करना ही चाहिए।
बच्चों ने पूछा, लेकिन कौन सा पुण्य का कार्य? जैसे उदाहरण?
तो मिशनरी ने कहा, जैसे कोई बूढ़ी स्त्री रास्ता पार करना चाहती हो तो उसको हाथ पकड़ कर रास्ता पार करा देना चाहिए।
सात दिन बाद जब फिर मिशनरी स्कूल में आया, उसने बच्चों से पूछा कि याद है पुराना पाठ? कोई पुण्य का कार्य किया? किस-किस ने किया?
तीन बच्चों ने जोर से हाथ हिलाए। उसने पहले बच्चे से पूछा, तूने क्या किया?
उसने कहा, मैंने एक बूढ़ी स्त्री को...होगी कोई नब्बे साल की; बहुत बूढ़ी, ऐसी बूढ़ी स्त्री मैंने पहले देखी ही नहीं थी। असल में, कौन बूढ़ियों को देखता है! मगर वह तो मैं चूंकि तलाश में ही था कि कोई बूढ़ी स्त्री मिले तो पुण्य करूं, तो मिल गई। तो मैंने उसे रास्ता पार करवाया।
शिक्षक ने उसकी पीठ ठोंकी और कहा, शाबाश! तूने अच्छा किया। ऐसा ही आगे भी करना।
दूसरे से पूछा, तूने क्या किया?
उसने कहा, मैंने भी एक बूढ़ी स्त्री को पार करवाया। उम्र रही होगी कोई नब्बे वर्ष।
थोड़ा संदेह हुआ मिशनरी शिक्षक को कि दो बूढ़ी स्त्रियां, दोनों नब्बे वर्ष की, कहां मिल गईं! मगर कोई बड़ी आश्चर्य की बात नहीं, दो बूढ़ी स्त्रियां हो सकती हैं इतने बड़े गांव में। और नब्बे वर्ष की हों। उसकी भी पीठ ठोंकी। हालांकि उतने जोर से नहीं ठोंकी, थोड़ा संदेह मन में रहा कि हो सकता है यह सिर्फ इसकी बात दोहरा रहा है।
तीसरे से पूछा, और तूने क्या किया?
उसने कहा कि मैंने भी नब्बे वर्ष की एक स्त्री को...।
तब तो न रहा गया उस मिशनरी से। उसने कहा कि तुम तीनों को नब्बे वर्ष की तीन बूढ़ी स्त्रियां मिल कहां गईं?
उन तीनों ने एक साथ कहा, तीन नहीं थीं, एक ही थी। उसी एक को हम तीनों ने पार करवाया।
उस मिशनरी ने पूछा, तो एक बूढ़ी स्त्री को पार करवाने के लिए तुम तीन की जरूरत पड़ी?
उन्होंने कहा, अरे महाराज, तीन भी बामुश्किल से पार करवा पाए। वह होना ही नहीं चाहती थी। हम खींचें उस तरफ, वह खिंचे इस तरफ। मगर हमने भी पूरी ताकत लगा दी। लाख चिल्लाई, शोरगुल मचाया, हाथ-पैर मारे, पिटाई तक हमारी की उसने; मगर हमने एक न सुनी। अब पुण्य करना ही था, सो हम तो उसको उस पार कर आए। हालांकि अब आपसे क्या छिपाना, जैसे ही हमने उसे छोड़ा वह फिर इस पार आ गई। फिर हमने सोचा अब दूसरे विद्यार्थी भी हैं, उनके लिए छोड़ो, अब हम ही पुण्य करते रहेंगे! फिर हमें पता नहीं दूसरों ने करवाया उसे पार कि नहीं करवाया, हमें और भी काम थे। पुण्य कोई एक ही काम तो नहीं है। उसी में तो उलझे न रहें। और फिर इस बुढ़िया को कितने दफे...दोबारा भी करवाओ, यह मारती-पीटती है, चिल्लाती भी है और फिर लौट कर आ जाएगी।
बुद्धों का काम इसलिए थोड़ा कठिन है। तुम गाली देते हो, क्योंकि तुम पार नहीं होना चाहते। तुम कहते हो: हम भले हैं, मजे में हैं, कहां ले चले? हमें जाना नहीं। हमने यहां घर बना लिया है, गृहस्थी बसा ली है, बहुत फैलाव कर लिया है, बहुत जाल बुन लिया है। हमारे सारे स्वार्थ इस किनारे पर हैं। और तुम कहते हो--उस किनारे चलो। तुम ही जाओ! आएंगे कभी हम भी, मगर अभी नहीं।
लेकिन बुद्धों की भी तकलीफ है। उनको दिखाई पड़ता है कि तुमने जो बनाया है सब झूठा है, माया है, सपना है। वे चाहते हैं कि तुम्हें जगा दें। उनकी करुणा चाहती है कि तुम्हें जगा दे। क्योंकि तुम जो धन इकट्ठा कर रहे हो वह धन नहीं है, कूड़ा-करकट है। तुमने जो हीरे समझे हैं, वे हीरे नहीं हैं, कंकड़-पत्थर हैं। बुद्धों को साफ दिखाई पड़ रहा है कि तुम कंकड़-पत्थरों को इकट्ठे कर रहे हो और समय गंवा रहे हो। वे तुम्हें झकझोरना चाहते हैं। वे कहते हैं: जरा आंख खोल कर भाई मेरे देखो, ये कंकड़-पत्थर हैं! और मुझे हीरों की खदान पता है, मैं तुम्हें ले चलता हूं। और इतने हीरे हैं अकूत!
मगर तुम्हारी भी अड़चन है। तुम जन्मों-जन्मों से इन्हीं कंकड़-पत्थरों को हीरे मान रहे हो। तुम्हारी बड़ी श्रद्धा इन कंकड़-पत्थरों पर है। कोई डिप्टी कलेक्टर है, उसको कलेक्टर होना है। वह कहता है, अभी ठहरो। अभी निर्वाण नहीं, अभी समाधि नहीं। अभी कहां कैवल्य! पहले कलेक्टर तो हो जाऊं! लेकिन कलेक्टर होने से क्या होता है? कमिश्नर होना है। कमिश्नर होने से क्या होता है? गवर्नर होना है! और यह होने की दौड़ का कोई अंत नहीं है।
एक सज्जन मेरे पास आते थे, वे डिप्टी मिनिस्टर थे। आशीर्वाद लेने आए थे कि इस बार मामला न चूके, इस बार तो मिनिस्टर बनवा दें।
मैंने उनसे कहा कि अगर मुझसे आशीर्वाद मांगा तो डिप्टी मिनिस्टर भी न रह जाओगे। तुम किसी बुद्धू से आशीर्वाद मांगो। मैं तो यही आशीर्वाद दे सकता हूं कि जागो।
फिर वे मिनिस्टर भी हो गए। कोई दोत्तीन वर्ष बाद एक ट्रेन में अचानक यात्रा करते वक्त मुझे मिल गए। मैंने कहा, क्या हुआ?
उन्होंने कहा, आपके आशीर्वाद से।
मैंने कहा, झूठ! मैंने आशीर्वाद दिया ही नहीं था।
हमारे मुल्क में तो औपचारिक हो गई हैं ये बातें! कि आपके आशीर्वाद से, वे कहने लगे, मिनिस्टर हो गया।
मैंने कहा, मैंने यह आशीर्वाद दिया नहीं, मुझ पर यह पाप थोपो मत। मुझे क्यों फंसाते हो? कयामत के दिन तुम्हारे साथ मैं भी बंधूंगा कि तुमने इन्हें क्यों आशीर्वाद दिया था? मैंने दिया ही नहीं है। मैंने तभी तुम्हें कह दिया था कि यह आशीर्वाद तुम किसी और से मांगो।
मैंने कहा, कुछ तृप्ति हुई?
उन्होंने कहा कि तृप्ति कहां! अब बस एक ही धुन सवार है कि चीफ मिनिस्टर कैसे हो जाऊं!
मैंने कहा, चीफ मिनिस्टर होकर तुम सोचते हो तृप्ति हो जाएगी?
कहने लगे, अब उतनी हिम्मत से नहीं कह सकता, जितनी जब मैं डिप्टी मिनिस्टर था कह सकता था कि मिनिस्टर होने से तृप्ति हो जाएगी; अब नहीं कह सकता, क्योंकि यह धोखा, नहीं कुछ हल हुआ। मगर फिर भी आकांक्षा है, एक बार चीफ मिनिस्टर हो जाऊं। इस बार तो आशीर्वाद दे दें!
फिर इस देश में तो सभी गधे-घोड़े मिनिस्टर, चीफ मिनिस्टर सभी हो रहे हैं। वे भी आखिर में हो गए। फिर मैं उनकी राजधानी से निकलता था तो मैंने उनको फोन करवाया कि हालांकि मैंने तुम्हें आशीर्वाद नहीं दिया, लेकिन कम से कम आकर धन्यवाद तो दे जाओ। अगर आशीर्वाद दे दिया होता तो कभी न होते, कम से कम इतना तो खयाल रखो!
आए मिलने। मैंने पूछा, कहो तृप्ति कुछ हुई?
उन्होंने कहा कि अब आपसे क्या छिपाना! आपसे छिपता भी नहीं। मैं छिपाऊं तो भी नहीं छिपेगा। अब बस एक ही धुन सवार है कि बहुत दिन हो गए भोपाल में, अब दिल्ली!
मैंने कहा, कब यह दौड़ खतम होगी? कैसे यह दौड़ खतम होगी?
आदमी दौड़े ही चले जाते हैं और बुद्धों की चेष्टा होती है--रोक लें! तुम जब धुन में दौड़े चले जा रहे हो, कोई बुद्ध तुम्हें रोके, तो नाराजगी नहीं होगी? जरूर होगी। क्योंकि बुद्ध बोलते हैं किसी और लोक से, उनकी भाषा और, उनका अनुभव और, उनका जगत और। तुम्हारी दुनिया और। दोनों का कहीं तालमेल नहीं होता। अगर बुद्ध जीतें तो तुम्हारी दुनिया अभी गिर जाए ताश के पत्तों की तरह। और तुमने बड़ी मुश्किल से ताश के पत्ते जमाए हैं।
छोटे-छोटे बच्चे ताश के पत्तों का घर बनाते हैं। तुम जरा फूंक मार दो, उनका ताश के पत्तों का घर गिर जाता है। वे एकदम गुस्से में आ जाएंगे। उनकी मेहनत भी तो देखो! बामुश्किल तो जमा पाए, जमा-जमा कर तो जमा पाए। जमते-जमते भी गिर-गिर जाते थे। जरा सा धक्का खुद के ही हाथ का लग जाता था तो पूरा महल गया। किसी तरह बच्चा जमा पाया है और तुम आए और तुमने फूंक मार दी।
मैं एक घर में मेहमान था। अपने मेजबान के साथ बैठ कर बगीचे में गपशप कर रहा था। उनका छोटा बेटा आया। उसने मुझे आकर कहा कि आप भी आएं। मैंने एक सुंदर महल बनाया है। तो मैं भी गया, उसके पिता भी गए। उसने खूब बड़ा महल बनाया था! कई ताश की गड्डियों का जोड़ किया था। रंग-बिरंगा था। मैंने फूंक मार दी।
वह तो एकदम भरोसा ही नहीं कर सका। उसने कहा, आप भी कैसे आदमी हैं! मैंने इतनी मुश्किल से बनाया, तीन घंटे मेहनत की! गिर-गिर जाता था, सम्हाल-सम्हाल कर बनाया। सब द्वार-दरवाजे बंद कर दिए कि हवा का झोंका न आए। और मैं आपको दिखाने लाया था, अभी मुझे अपने मित्रों को, पड़ोसियों को भी दिखलाना था--और आपने फूंक मार दी!
उसकी नाराजगी साफ है। उसके बाप ने भी कहा कि आपने फूंक क्यों मारी, यह मेरी समझ में भी नहीं आता।
मैंने कहा, यही मैं तुम्हारे साथ कर रहा हूं, यही तुम्हारे बेटे के साथ कर रहा हूं। बेटा भी नाराज है, तुम भी नाराज हो। तुमने भी जो घर बनाया है वह ताश के पत्तों का है।
इसलिए जब बुद्धों को तुम गाली देते हो तो बुद्ध कुछ हैरान नहीं होते; स्वभावतः स्वीकार करते हैं तुम्हारी गालियों को। जानते हैं कि ऐसा होगा ही। भाषा अलग-अलग है, जगत अलग-अलग हैं।

शहर की एक महिला ने
हिम्मत दिखाई
वह प्रौढ़ों को
शिक्षित करने के लिए
गांव में आई।
एक दिन यूं ही
बैठी-बैठी सुस्ता रही थी
और एक गीत गा रही थी--
"ओ सावन के बदरा
आए नहीं हमारे सजना
अब की नहीं बरसना।'
गीत के दर्द भरे बोल लोगों तक पहुंचे
लोग मुखिया के पास पहुंचे
मुखिया जी
शिक्षिका के पास दौड़े
और हाथ जोड़े--
कि बस इतना सा काम?
हमें क्यों नहीं बताती हैं
हम आपके सजना को
कान पकड़ कर ले आते हैं।

शिक्षिका पहले तो हड़बड़ाई
फिर मुखिया को एक डांट पिलाई--
कि ये क्या बला है?
मेरा सजना आए या न आए
ये मेरा निजी मामला है।

मुखिया जी बोले--
"भाड़ में जाए आपका सजना
हमें उससे क्या करना
पर सावन तो आपका निजी नहीं है
उससे क्यों कहती हैं
कि अब की नहीं बरसना?
सूखा पड़ जाएगा
बच्चे हमारे भूखों मरेंगे
आपके सजना के बाप का क्या जाएगा!

"और हमें तो
आपके सजना के लक्षण
अच्छे नहीं लगते
छह महीने हो गए
आपको यहां रहते
उसने एक बार भी पता लगाया नहीं
कि आप जी रही हैं या मर गई हैं
फिर आप उसकी चिंता क्यूं कर रही हैं?
वो अब तक नहीं आया
तो पता नहीं कब आएगा,
और ऐसा सजना
आकर भी क्या कर लेगा!

"हमारी तो
किस्मत ही खराब है
पिछले साल
कीड़े फसल खा गए थे
इस साल आपका सजना मरवाएगा!

"नहीं! हम ये जोखिम नहीं उठा सकते
हमें उसका पता दीजिए
या फिर आप अक्ल से काम लीजिए
आपके सजना का
सावन से क्या लेना-देना?
वो अपने हिसाब से आएगा
इसको अपने हिसाब से
बरसने दीजिए।'

बुद्धों की एक भाषा--वे तुम्हें जगाना चाहते हैं। तुम्हारी दूसरी दुनिया--तुम सोना चाहते हो। नींद तुम्हारा जगत; जागरण उनका जगत। दोनों में कहीं तालमेल नहीं। दोनों कहीं एक-दूसरे को काटते नहीं। इसलिए तुम अगर नाराज हो जाओ, और तुम अगर गालियां देने लगो, और तुम अगर पत्थर फेंकने लगो, और तुम अगर बुद्धों को सूलियों पर चढ़ाओ--सब स्वीकृत है। बुद्धों की तरफ से इसमें कुछ हैरानी नहीं है।

पतिदेव दफ्तर से आकर
पत्नी से बोले
मुस्कुरा कर--
"ये सज-धज, ये सिंगार
क्या इरादा है सरकार!'

पति का ये संबोधन सुन कर
पत्नी बोली रुआंसी होकर--
"आप हमें
कुछ भी कहते रहिए
किंतु सरकार मत कहिए
हम भी अखबार पढ़ते हैं
सरकार कैसी होती है
सब समझते हैं।
भविष्य में,
यदि आप हमें
सरकार कह के बुलाएंगे
तो याद रखना पछताएंगे
मेरा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा
पर आपके हाल
हिंदुस्तान जैसे हो जाएंगे।'

भाषा की मजबूरियां हैं, भाव की मजबूरियां हैं। अलग लोक हैं।
स्वरूप, तुम पूछते हो: "आप कहते हैं कि जीवित बुद्ध ही तारते हैं। तब यह कैसी विडंबना है कि बुद्धों को जीते जी निंदा मिलती है और मरने पर पूजा?'
मरने पर पूजा आसान है, क्योंकि मरते ही बुद्ध तुम्हारे हाथ में हो जाते हैं। तुम जहां बिठाओ, बैठें। तुम जैसा उठाओ, उठें। देखते नहीं, रामचंद्रजी को जब दिल हो सुला दो! कृष्णजी को जब जी हो झूला झुला दो! चाहे उन्हें चक्कर ही आ रहे हों, मगर वे यह भी नहीं कह सकते कि अभी मत करो, अभी मत सताओ! जब पट खोलो, खोलो। जब पट बंद करना हो, बंद कर दो। जब भोग लगाना हो, लगाओ। दातून करवाओ चाहे न करवाओ। सब तुम्हारे हाथ में है। जैसे ही बुद्ध इस जगत से विदा होते हैं, आसान हो जाता है सब काम। फिर तुम उनकी मूर्तियां बना लेते हो। मूर्तियों की तुम पूजा करते हो। मूर्तियां तुम्हारी बनाई हुई हैं, बुद्धों का मूर्तियों से क्या लेना-देना है! कोई मूर्ति बुद्ध की नहीं है। बुद्धों की तो सिर्फ आकृति है, मूर्ति तो तुमने बनाई है। और शक तो यह है कि आकृति भी तुम बुद्धों की नहीं लेते, आकृति भी तुम अपनी चुनते हो। आकृति भी तुम्हारी ही है, तुमने ही दी है। यह बात सुनिश्चित है कि गौतम बुद्ध का चेहरा ऐसा नहीं था जैसा तुम मूर्तियों में पाते हो। कई कारणों से यह बात सुनिश्चित है। बुद्ध भारत और नेपाल के बीच तराई में पैदा हुए। सच पूछा जाए तो बुद्ध को भारतीय नहीं कहना चाहिए, नेपाली कहना चाहिए। अब नेपालियों की शक्ल ऐसी नहीं होती जैसी बुद्ध की मूर्ति की है। नेपाली तो तिब्बती, चीनी, उनके ज्यादा करीब हैं। उनकी नस्ल उनके ज्यादा करीब है। और बुद्ध की मूर्ति तुम देखते हो, उसमें तुम्हें नेपाली लक्षण मालूम पड़ता है? उसमें गुरखा लक्षण बिलकुल नहीं है। बुद्ध की मूर्ति यूनानी है, भारतीय भी नहीं है।
बुद्ध के मरने के पांच सौ वर्ष तक तो बुद्ध की मूर्ति बनी ही नहीं। उन दिनों कोई फोटोग्राफी तो थी नहीं कि बुद्ध का कोई चित्र बचाया जा सकता। पांच सौ वर्ष बाद मूर्ति जब बुद्ध की बनी, तो तुम जान कर हैरान होओगे, सिकंदर के आधार पर बनी। इस बीच सिकंदर भारत आया और सिकंदर के यूनानी नाक-नक्श खूब भाए मूर्तिकारों को। बुद्ध की प्रतिमा न नेपाली है, न भारतीय--यूनानी है। उसके नाक-नक्श यूनान से उधार लिए गए हैं।
तुमने जैन मंदिर में जाकर देखा, चौबीस तीर्थंकरों की मूर्तियां बिलकुल एक जैसी! जरा भी भेद नहीं। इस दुनिया में दो आदमी भी बिलकुल एक जैसे नहीं होते, जुड़वा भाई भी एक जैसे नहीं होते। मां दोनों में भेद करती है। मां जानती है कौन कौन है। बाकी लोग शायद भेद न भी कर पाएं, क्योंकि बाकी लोग उतने गौर से नहीं देखते।
मुल्ला नसरुद्दीन एक स्त्री के प्रेम में था। वह स्त्री अकेली नहीं थी, उसकी जुड़वां बहन भी थी। दोनों एक जैसी लगती थीं। मैंने एक दिन नसरुद्दीन से पूछा कि नसरुद्दीन, मैं तो दोनों को देखता हूं तो कुछ फर्क नहीं कर पाता, दोनों बिलकुल एक जैसी लगती हैं। तू तो प्रेम करता है एक को, तू भेद कैसे कर पाता है?
नसरुद्दीन ने कहा, भेद! भेद हम करें ही क्यों? एक से प्रेम है, दोनों का मजा ले रहे हैं--जो मिल जाए! हम भेद करेंगे ही नहीं। हम ऐसी कोई चीज देखेंगे ही नहीं जिससे भेद जाहिर हो। हम तो ऐसा ही व्यवहार करते हैं, जो भी मिल जाए, कि इसी से प्रेम है।
लेकिन मां या पिता भेद करने लगते हैं, देखने लगते हैं कि अलग-अलग हैं। जुड़वां भाई, बहन भी बिलकुल एक जैसे नहीं होते। दो आदमी एक जैसे नहीं होते! ये चौबीस आदमी एक जैसे कैसे मिल गए? जैनों को अपनी मूर्तियों के नीचे चिह्न बनाना पड़ते हैं ताकि भेद पता चल सके कि कौन महावीर, कौन नेमिनाथ, कौन पार्श्वनाथ। नीचे चिह्न बनाने पड़ते हैं, क्योंकि चिह्नों के अतिरिक्त और तो कोई भेद नहीं है।
ये मूर्तियां कल्पित हैं। ये मूर्तियां सच्ची नहीं हैं। ये आदमी के द्वारा गढ़ी गई हैं। ये आदमी की धारणा से गढ़ी गई हैं। तीर्थंकर को कैसा होना चाहिए, उस हिसाब से गढ़ी गई हैं।
तुम देखोगे जैन मंदिर में जाकर कि हर तीर्थंकर के कान की लंबाई इतनी है कि कंधे को छूती है। क्राइस्ट की मूर्ति में कान की लंबाई ऐसी नहीं है कि कंधे को छुए, न ही राम, न कृष्ण। मगर जैनों के चौबीस तीर्थंकरों के कान कंधे को छूते हैं। इतने लंबे कान!
जैनों की धारणा यह है कि तीर्थंकरों के कान कंधों को छूने ही चाहिए, तो ही वे तीर्थंकर हैं। तो चौबीसों के कान छुआ दिए। शक की बात है। एकाध के छूते रहे हों, यह हो सकता है। शायद पहले के, जो नंबर एक हुआ, उसके छूते रहे हों, यह हो सकता है। उसके आधार पर फिर धारणा बन गई हो कि हर तीर्थंकर के कान कंधे को छूने चाहिए। फिर जिनके नहीं भी छूते, उनके भी छुआ दिए। फिर जबरदस्ती छुआने पड़े, नहीं तो तीर्थंकरत्व में कमी पड़ जाएगी। लक्षण तो पूरे करने पड़ेंगे।
तुम्हारी मूर्तियां भी कल्पित हैं, तुमने बना ली हैं। और उनकी तुम पूजा करो, मजे से करो। मूर्तियां तुम्हारा क्या बिगाड़ लेंगी? मूर्तियां तुम्हारे सपनों को और शृंगार दे देती हैं; तुम्हारी नींद को और भी शामक दवाओं का काम कर जाती हैं। तुम और मजे से सोते हो।
मूर्ति तो मुर्दा है। क्या तुम्हें खाक जगाएगी! जरा एकाध दिन मूर्ति से कह कर तो सोना रात कि हे गणेशजी, कल सुबह ट्रेन पकड़नी है, जरा चार बजे उठा देना! जिंदगी भर ट्रेन न पकड़ पाओगे। गणेशजी को खुद ही पता नहीं कि चार कब बजते हैं। वहां तो बारह बज गए, अब चार कहां बजना है! वहां तो कांटा थिर हो गया है। मिट्टी के गणेशजी--जब चाहो बनाओ, जब चाहो विसर्जित कर आओ। जब गणेशजी को डुबाने लगते हो तब बेचारे चिल्लाते तक नहीं कि बचाओ, हे बचाओ! कहां डुबा रहे हो! तुम्हारी मौज, तुम्हारे हाथ के खिलौने हैं।
जब बुद्ध जीवित होता है तो तुम्हें बचाता है, तुम्हें जगाता है, तुम्हें झकझोरता है, तुम्हारे न्यस्त स्वार्थों को तोड़ता है। इसलिए नाराजगी पैदा होती है। और जब बुद्ध विदा हो जाते हैं तो तुम्हारे भीतर अपराध का भाव पैदा होता है। इस मनोविज्ञान को ठीक से समझ लेना। क्योंकि तुम जिंदा बुद्धों के साथ इतना दर्ुव्यवहार करते हो कि जब वे मर जाते हैं तो तुम्हारे भीतर बड़ा अपराध का भाव पैदा होता है--कि अरे, हमने यह क्या किया? उस अपराध-भाव की पूर्ति करने के लिए तुम फिर पूजा शुरू करते हो। पूजा तुम्हारे अपराध-भाव की पूर्ति है।
तुम देखते हो, महावीर के कितने अनुयायी हैं? बहुत ज्यादा नहीं, मुश्किल से तीस-पैंतीस लाख। क्या बात हो गई? महावीर जैसा प्रतिभाशाली व्यक्ति केवल तीस-पैंतीस लाख अनुयायी जुटा पाया पच्चीस सौ साल में! अगर महावीर ने पैंतीस जोड़े भी प्रभावित किए होते तो पच्चीस सौ साल में पैंतीस लाख बच्चे पैदा हो गए होते। क्या कारण हो गया कि महावीर इतने थोड़े से अनुयायी जुटा पाए और जीसस ने आधी दुनिया ईसाई कर ली, एक अरब अनुयायी! कारण क्या है?
कारण है: जीसस को फांसी लगी। जीसस को जिन्होंने फांसी दी, वे इतने अपराध-भाव से भर गए कि मरने के बाद पूजा करनी जरूरी हो गई, एकदम जरूरी हो गई। इस निरीह, निहत्थे, सीधे-सादे, सरल चित्त व्यक्ति को फांसी दे दी। देते वक्त तो जोश में कर गए काम, लेकिन देने के बाद पछताए होंगे कि यह हमने क्या किया! अपने हाथ देखे होंगे खून से रंगे हुए। धोए होंगे। लेकिन खून धुलता नहीं--ऐसा खून आसानी से नहीं धुलता।
तुम जान कर यह हैरान होओगे कि पांटियस पायलट, जो उन दिनों रोमन गवर्नर था इजरायल में, जिसकी आज्ञा से जीसस को फांसी लगी, उसे जिंदगी भर एक रोग सताया--हाथ धोने का रोग! जीसस को मार डालने के बाद वह बार-बार हाथ धोता था, अकारण हाथ धोता था।
सिग्मंड फ्रायड से उसका अर्थ पूछो। वह हाथ धोता था, क्योंकि उसे लगता था कि मेरे हाथ खून से रंग गए--और एक निर्दोष आदमी के खून से रंग गए!
मगर लाख हाथ धोओ, यह खून धुल नहीं सकता। क्योंकि यह खून कोई दृश्य खून नहीं है; यह अदृश्य है, सूक्ष्म है। यह तुम्हारे प्राणों पर छा गया। यह काटेगा तुम्हें, सालेगा तुम्हें। इससे बचने का एक ही उपाय है कि जो तुमने किया, उससे उलटा करो अब। गाली दी थी, स्तुति करो। पत्थर मारे थे, फूल चढ़ाओ। सूली दी थी, अब कहानी रचो कि ईसा पुनरुज्जीवित हो गए।
ये सिर्फ अपराध-भाव से बचने के उपाय हैं।
जीवित बुद्धों के साथ तुम असदव्यवहार करते हो। तुम्हारा असदव्यवहार समझा जा सकता है। कारण साफ है। तुम जागना नहीं चाहते, वे तुम्हें जगाते हैं। तुम उस पार नहीं जाना चाहते, वे तुम्हें नाव में बैठने के लिए निमंत्रण देते हैं। निमंत्रण देते हैं, हाथ पकड़-पकड़ कर तुम्हें लाते हैं। तुम झिटक-झिटक कर भागना चाहते हो। तुम जीवित बुद्धों से डरते हो, भयभीत होते हो। उनके पास आना, कहीं तुम्हारी बसी-बसाई दुनिया न उजड़ जाए।
मेरे पास न मालूम कितने पत्र आते हैं। लोग लिखते हैं कि हम आएंगे, जरूर आएंगे! लेकिन अभी समय नहीं आया है।
कौन तय करेगा, कब समय आएगा? कैसे तय करोगे? लगन-महूरत ज्योतिषी से पूछोगे?
लगन-महूरत झूठ सब! जिसको जागना है, उसके लिए प्रत्येक पल जागने के लिए सम्यक है। और जिसे सोए रहना है वह कल पर टालता जाएगा, नये-नये बहाने खोजता जाएगा और कल पर टालता जाएगा।
एक युवक ने संन्यास लिया। उसके पिता आए, बहुत नाराज थे। पिता की उम्र होगी कोई अस्सी वर्ष। कहने लगे, आपने यह क्या किया? यह कैसा संन्यास! मेरे जवान बेटे को संन्यास दे दिया! शास्त्रों में तो साफ कहा है कि पच्चीस साल तक ब्रह्मचर्य, फिर पच्चीस साल तक अर्थात पचास वर्ष की उम्र तक गृहस्थी। अभी मेरा बेटा तो केवल पैंतीस साल का है, अभी पचास साल तक इसको गृहस्थी में रहना चाहिए। और फिर पचहत्तर साल तक वानप्रस्थ। पचहत्तर साल के बाद संन्यास का नियोजन है शास्त्रों में। आप शास्त्र के विपरीत काम कर रहे हैं। आप हमारी संस्कृति को मिटाए डाल रहे हैं।
मैंने उनकी बात सुनी और मैंने कहा, ठीक। तो मैं सौदा करने को तैयार हूं।
उन्होंने कहा, आपका मतलब?
मैंने कहा, मतलब यह कि मैं आपके बेटे को संन्यास से मुक्त करता हूं, आप संन्यास ले लें। आप पचहत्तर पार कर गए। और आपको अब मैं न जाने दूंगा, क्योंकि यह शास्त्र का अपमान हो जाएगा।
तब वे घबड़ा गए। कहने लगे, मैं अभी कैसे ले सकता हूं? हजार काम उलझे पड़े हैं, सब निपटाने हैं।
मैंने कहा, मौत आएगी, पूछेगी नहीं कि कितने काम उलझे पड़े हैं। सब काम उलझे पड़े रह जाएंगे और ले जाएगी।
फिर मैंने कहा, शास्त्र का आधार लेते थे अपने लड़के को संन्यास से बचाने के लिए; अब शास्त्र का आधार नहीं लेते अपने को संन्यास में डुबाने के लिए? तो शास्त्र भी बस तुम्हारे जब काम पड़ें, तुम्हारी मूढ़ता के विस्तार में जब सहयोगी हों, तब उनका उल्लेख कर लेना!
शास्त्रों से भी लोग अपना हेतु सिद्ध करते हैं!
मुल्ला नसरुद्दीन रोज कुरान पढ़ता है और रोज शराब भी पीता है। मैंने उससे कहा, नसरुद्दीन, कम से कम कुरान पढ़ने वाले को तो शराब नहीं पीनी चाहिए। साफ कुरान में कहा हुआ है कि जो शराब पीएगा, वह नरक में सड़ेगा।
मुल्ला ने कहा, मुझे मालूम है, मैं तो रोज पढ़ता हूं।
फिर मैंने कहा कि फिर शराब क्यों पीते हो?
उसने कहा, जितनी अपनी सामर्थ्य है, उतना अभी कर रहा हूं। पूरा वाक्य है: जो शराब पीएगा, वह नरक में सड़ेगा। अभी आधा ही वाक्य पूरा कर रहा हूं--जो शराब पीएगा। अभी बाकी आधे को पूरी करने की मेरी सामर्थ्य नहीं है। अपनी मर्यादा से ही तो चलना पड़ता है। अभी कुरान की ही आज्ञा पूरी कर रहा हूं--जो शराब पीएगा। पीने की आज्ञा साफ है। फिर आगे का आगे देखा जाएगा। और फिर कुरान में ही तो कहा है कि परमात्मा महाकरुणावान है, रहीम है, रहमान है, उसकी क्षमा का पारावार नहीं है। तो जिसकी क्षमा का पारावार नहीं है, यह छोटी-मोटी शराब...एकदम सिर पटक दूंगा उसके पैर पर और कहूंगा कि क्षमा करो, तुम करुणावान हो! तुम्हारी करुणा का कोई पारावार नहीं है! और मैंने शराब कितनी ही पी हो, तुम्हारी करुणा से बड़ा पाप तो नहीं किया है। तुम्हारी करुणा मेरे पाप से बहुत बड़ी है।
लोग अपने मतलब की बात निकाल लेते हैं।
उन बूढ़े सज्जन ने कहा कि मैं सोच कर आऊंगा।
मैंने कहा कि सोच कर कोई कभी नहीं आता। संन्यास सोच कर नहीं लिया जाता। अब यह मौका आ गया है तो चूको मत। फंस ही गए हो! अपने आप आ गए, मैंने बुलाया भी नहीं था। अब कहां जाते हो? और मैंने कहा कि मैं सौदा कर रहा हूं, तुम्हारे बेटे को मुक्त करता हूं।
आज तीन साल हो गए, वे सज्जन लौटे ही नहीं। अब लौटेंगे भी नहीं, क्योंकि अभी दो महीने पहले उनकी मृत्यु हो गई। फिर नहीं आए मुझसे कहने कि बेटे को संन्यास देकर आपने शास्त्रों का उल्लंघन कर दिया। क्योंकि अब किस मुंह से आएं!
लोग चालबाज हैं, लोग बेईमान हैं, लोग धोखेबाज हैं। दूसरों को ही धोखा नहीं देते, अपने को भी धोखा देते हैं। तुम्हारी सब पूजा धोखा है। तुम बदलना नहीं चाहते। तुम चाहते नहीं कि तुम्हारे जीवन में क्रांति हो। तुम पत्थर की मूर्तियों को पूजते हो और तुम जीवित बुद्धों से भागते हो। क्योंकि जीवित बुद्धों के पास क्रांति अनिवार्य है; आए कि बदले। लेकिन मंदिर की मूर्तियां क्या करेंगी? क्या कर सकती हैं? तुम जैसे जाते हो, वैसे ही वापस लौट आते हो।
इसलिए इसमें कुछ विडंबना नहीं है, न ही कोई विचित्र विधान है; यह जीवन का सीधा गणित है।
लेकिन आना हो तो जीवित बुद्धों के पास ही आना--तो ही कुछ संपदा तुम पर बरस सके, कुछ आशीष तुम पर बरस सकें, कुछ अमृत के घूंट तुम्हारे कंठ में उतर सकें। जो भूल दूसरों ने की है, तुम न करना।
और हम भूलें वही की वही दोहराए चले जाते हैं। और मजा यह है कि दूसरे जब भूलें करते हैं तो हम देख लेते हैं; जब हम भूलें करते हैं तो नहीं देख पाते।
जीसस को सूली जिन लोगों ने दी थी, हमें दिखाई पड़ता है गलत किया। मंसूर को जिन्होंने मारा, हमें लगता है गलत किया। बुद्ध पर जिन्होंने पत्थर फेंके, हमें लगता है कि गलत किया। लेकिन आज भी वही हो रहा है। आज भी बुद्धों, मंसूरों के साथ वही व्यवहार हो रहा है। जमाने बदल गए, आदमी नहीं बदलता, आदमी की जड़ता वैसी की वैसी है।
तुमसे यह भूल न हो, इतना ही अगर कर सको तो काफी है।


आखिरी प्रश्न:

भगवान! मैं परम आलसी हूं। क्या मैं भी परमात्मा को पा सकता हूं?

योगेंद्र! परमात्मा को पाना न तो कर्म की बात है, न कर्मठता की, न आलस्य की। परमात्मा को पाना तो साक्षी-भाव की बात है। जो कर्मठ है उसको अपने कर्म का साक्षी होना पड़ेगा। और जो आलसी है उसे अपने आलस्य का साक्षी होना पड़ेगा। कर्म है तो कर्म को आधार बना लो साक्षी बनने का। आलस्य है तो आलस्य को आधार बना लो साक्षी बनने का। कोई भी निमित्त काम कर जाएगा। साक्षी हो जाओ, परमात्मा मिल जाएगा।
आलस्य से घबड़ाओ मत। और आलस्य की बहुत निंदा की गई है, इसलिए घबड़ाहट होती है। इसलिए तुम्हें चिंता पैदा होती होगी कि मैं हूं परम आलसी, परमात्मा को कैसे पाऊंगा?
पहली तो बात: परमात्मा को पाना नहीं है, परमात्मा मिला हुआ है। परमात्मा तुम्हारे भीतर विराजमान है। अगर परमात्मा को पाने में कोई खतरा है तो अति कर्मठता खतरा हो सकती है। क्योंकि वह जो हमेशा आपाधापी में भागा-भागा फिर रहा है, दुनिया के ओर-छोर एक किए दे रहा है, कहीं बैठ ही नहीं सकता दो क्षण को--शायद उसे पाना मुश्किल हो जाए। क्योंकि परमात्मा तुम्हारे भीतर बैठा है; अगर तुम भी बैठ जाओ तो मिलन हो जाए।
इसलिए योगेंद्र, घबड़ाओ न, चिंता न लो।
मगर मैं नहीं मानता कि तुम परम आलसी हो। अन्यथा यहां तक कैसे आ गए? परम आलस्य तो बड़ी सिद्धावस्था की बात है।
जापान में एक सम्राट बहुत आलसी था, झक्की भी था। और अजीब-अजीब काम करने के उसे खयाल आते थे। और सम्राट था, इसलिए कर भी सकता था। एक दिन उसे खयाल आया कि दुनिया में सबके लिए व्यवस्था है। विधवा-आश्रम खुले हुए हैं, वृद्धाश्रम खुले हुए हैं। आलसियों के लिए कोई इंतजाम नहीं। और बेचारे आलसियों का क्या कसूर है? अरे परमात्मा ने बनाया जैसा सो वैसा बनाया! उसने आलसी बनाया तो अब आलसी क्या करे? विधवा तो चाहे तो विवाह भी कर ले; कोई परमात्मा ने विधवा नहीं बनाया है, विधवा तो समाज की धारणा है। लेकिन आलसी क्या करे?
उसने अपने वजीरों को कहा कि डुंडी पीट दी जाए पूरे राज्य में कि आलसियों के लिए राज्य की तरफ से जगह-जगह आश्रम खोल दिए जाएं। आलसियों के लिए राज्य का आश्रय मिलेगा--भोजन, रहना, कपड़ा--और वे अपना आलस्य करें।
वजीर चिंतित हुए। वजीरों ने कहा कि आप कहते तो ठीक हैं, आपकी दलील भी ठीक है कि उनका कसूर क्या? परमात्मा ने आलसी बनाया! किसी को नीम बनाया, किसी को आम बनाया। अब नीम क्या करे? मीठी नहीं है, इसमें नीम का क्या कसूर है? और आम मीठा है तो इसमें गुण क्या? जिसको जैसा बनाया वह वैसा है। आप बात तो ठीक कहते हैं। लेकिन बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाएगी। अगर हमने आलसियों को आश्रय दिया तो सभी लोग दावा करेंगे कि वे आलसी हैं। और तय कैसे करेंगे हम कि कौन आलसी है, कौन नहीं है? और अगर सारे लोग दावा करने लगे आलस्य का तो फिर मुश्किल पड़ जाएगी। फिर आलसियों के लिए भोजन बनाने का काम कौन करेगा? उनके लिए बिस्तर लगाने का काम कौन करेगा? और यह सारा देश अड़चन में आ जाएगा। तो पहले तो हमें यह कसौटी खोजनी पड़ेगी कि पक्का आलसी कौन है, परम आलसी कौन है? जब तक इसकी कसौटी न हो जाए...।
राजा ने कहा, यह बात ठीक है, यह जंचती है। तो डुंडी पीट दी जाए कि जो-जो अपने को आलसी समझते हैं, राजमहल आ जाएं, यहां परीक्षा हो जाएगी।
लोगों ने सुना तो लोग चल पड़े। जिन्होंने कभी सोचा भी नहीं था जीवन में कि हम भी आलसी हैं, उन्होंने भी सोचा ऐसा मौका क्यों छोड़ना! कोई दस हजार आदमी एकदम इकट्ठे हो गए। वजीरों ने उनके लिए घास के झोपड़े बनवा दिए। वे उनमें ठहर गए। और रात को झोपड़ों में आग लगवा दी। यह परीक्षा थी। भाग खड़े हुए लोग एकदम, बाहर निकल आए। लेकिन चार आदमी नहीं निकले, उन्होंने और कंबल ओढ़ लिया। और जब किसी ने उनसे कहा कि भाई, आग लगी है! उन्होंने कहा, लगी रहने दो, हमें परेशान न करो। अब जो होगा सो होगा।
दस हजार लोगों में केवल वे चार ही चुने गए, क्योंकि उनको बामुश्किल बचाया जा सका। उनको खींच कर बाहर लाना पड़ा। बिस्तर में ही उनको उठा कर बाहर लाना पड़ा। वे थे परम आलसी, योगेंद्र! तुम कैसे परम आलसी? यहां आ गए, प्रश्न भी पूछ रहे हो! इतने निराश होने की जरूरत नहीं मालूम होती।
गांव का सरपंच नेताजी को गांव की सैर करवा रहा था। सरपंच ने गांव की अनेक चीजें दिखाईं। जब वे रास्ते के किनारे से गुजर रहे थे तो नेताजी ने देखा, एक व्यक्ति आम के वृक्ष पर सो रहा है। सरपंच ने उस व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा, यह हमारे गांव का सबसे बड़ा आलसी व्यक्ति है।
नेताजी ने आश्चर्य से पूछा, आलसी! फिर यह वृक्ष पर कैसे चढ़ गया?
सरपंच बोला, हम लोगों ने जब आम की गुठली यहां बोई थी, तब यह व्यक्ति आकर उस गुठली पर सो गया था, सो आज तक सो रहा है। यह वृक्ष पर चढ़ा नहीं है।
योगेंद्र, इसको कहते हैं परम आलस्य! और ऐसा व्यक्ति परमात्मा को पा ही लिया समझो।
घबड़ाओ न, तुम जिसके पास आ गए हो अब, परमात्मा से बचने का कोई उपाय नहीं--आलस्य भी नहीं। संन्यास और लो। इतना किया, इतना और करो। मुझे आलसी भी स्वीकार हैं। मुझे पापी भी स्वीकार हैं। मुझे शराबी भी स्वीकार हैं। मुझे जुआरी भी स्वीकार हैं। जब तुम परमात्मा को स्वीकार हो तो मैं कौन हूं बीच में जो बाधा डालूं? जब परमात्मा तुम्हें जिलाए जा रहा है तो जरूर तुम्हें स्वीकार करता है।
मैं तुम्हें स्वीकार करता हूं। तुम्हारे आलस्य में से ही रास्ता खोज लेंगे।

गुरु ने चेले से
कहा लेटे-लेटे
कि उठ कर पता लगाओ
बरसात हो रही है या नहीं, बेटे।

तो चेले ने कहा--
"ये बिल्ली
अभी-अभी बाहर से आई है
इसके ऊपर हाथ फेर कर देख लीजिए
अगर भीगी हुई हो
तो बरसात हो रही है, समझ लीजिए।'

गुरु ने दूसरा काम कहा
कि सोने का समय हुआ
जरा दीया तो बुझा दे बचुआ।

बचुआ बोला--
"आप आंखें बंद कर लीजिए
दीया बुझ गया समझ लीजिए।'

अंत में गुरु ने कहा हार कर
कि उठ, किवाड़ तो बंद कर।

शिष्य ने कहा--
"गुरुवर,
थोड़ा तो न्याय कीजिए
दो काम मैंने किए हैं
एक काम तो आप भी कर लीजिए।'

आओ, ऐसा कुछ होगा!

आज इतना ही।