धारा की अविरलता कल-कल,
क्या तुम कभी राधा नहीं बनना चाहोगी?
चाहे हो कोई भी काल खंड
तुम तो चलती हो अपनी ही चाल
तेरी तरलता तेरा उच्छवास
क्यों ना....हो तुम्हें
आखिर तुम से ही तो जीवन का संचार
पुकारता है असीम तुम्हें पल्लवित-पुकार
वो दे रहा आवाज विशाल ह्रदय..
वो पूर्ण सागर सा...
आओ प्रिय धारा आओ,
तुम अब तो राधा बन जाओ
कब तक धारा बन कर
यूं ही राधा न बन पाओगे।
कब तक यूं ही भटकती रहोगी
इस तमस भर जग की
इस अंधेरी गलियों में।
कितने भागे जग से आगे।
टूटे पल-छल जीवन धागे।
सोते-सोते रात बीत गई
अब तक हम न नींद से जागे।।
मेरे नयनों को भा गया रे,
आ दिल में समा गया रे।
डूबी यादों के इस सागर में,
अब हमको ने बचाना रे।
जब गीत मेरे छूते तेरे लब को,
वो मेध मल्हार बन जाते है।
होंठ मेरे जब छूते जब लब को,
वो मधुरस बन छा जाते है।।
सुंदर मधु वन सजा हुआ,
दूब सजी जब गांव में।
पथ के चिन्ह वो फूल बने,
पा छाप सजता प्रतिमा तुम जब पांव में—
(ओशो की मधुशालाा)
मनसा-मोहनी दसघरा
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