प्रेम की झील में
नौका-विहार—(प्रवचन—पहला)
सूत्र:
बसौ मेरे नैनन में नंदलाल।
मोहनी मूरत सांवरी सूरत, नैना बने
बिसाल।
मोर मुकुट मकराकृति कुंडल, अरुण तिलक
शोभे भाल।
अधर सुधारस मुरली राजति, उर वैजंति
माल।
छुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर सबद
रसाल।
मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भक्त
बच्छल गोपाल।
हरि मोरे जीवन प्राण आधार।
और आसिरो नाहिं तुम बिन, तीनूं लोक
मंझार।
आप बिना मोहि कछु न सुहावै, निरखौ सब
संसार।
मीरा कहै मैं दास रावरी, दीज्यौ
मति विसार।
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न
कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति
सोई।
छाड़ि दई कुल की कानि, कहा करि
है कोई।
संतन ढिंग बैठि बैठि
लोकलाज खोई।
अंसुवन जल सींचि सींचि, प्रेम-बेलि
बोई।
अब तो बेलि फैल गई, आनंद फल
होई।
भगत देख राजी हुई, जगत देख
रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर, तारो अब
मोहि।




