कुल पेज दृश्य

बुधवार, 18 जुलाई 2018

मैं मृत्‍यु सिखाता हूं--(प्रवचन--01)

योजित मृत्यु अर्थात ध्यान और समाधि के प्रायोगिक रहस्य(प्रवचनपहला)


यह शरीर एक बीज है और जीवन चेतना और आत्मा का एक अंकुर भीतर है। जब वह अंकुर फूटता है तो मनुष्य का बीज होना समाप्त होता है और मनुष्य वृक्ष बनता है।
संकल्प हम करें तीव्रता से, टोटल, समग्र, कि मैं वापस लौटता हूं अपने भीतर। सिर्फ आधा घंटा भी कोई इस बात का संकल्प करे कि मैं वापस लौटना चाहता हूं, मैं मरना चाहता हूं? मैं डूबना चाहता हूं अपने भीतर, मैं अपनी सारी ऊर्जा को सिकोड़ लेना चाहता हूं, तो थोड़े ही दिनों में वह इस अनुभव के करीब पहुंचने लगेगा कि ऊर्जा सिकुड़ने लगी है भीतर। शरीर छूट जाएगा बाहर पड़ा हुआ। एक तीन महीने का थोड़ा गहरा प्रयोग, और आप शरीर अलग पड़ा है, इसे देख सकते हैं।

 मेरे प्रिय आत्मन्!

जीवन क्या है, मनुष्य इसे भी नहीं जानता है। और जीवन को ही हम न जान सकें, तो मृत्यु को जानने की तो कोई संभावना ही शेष नहीं रह जाती। जीवन ही अपरिचित और अज्ञात हो, तो मृत्यु परिचित और ज्ञात नहीं हो सकती है। सच तो यह है कि चूंकि हमें जीवन का पता नहीं, इसलिए ही मृत्यु घटित होती प्रतीत होती है। जो जीवन को जानते 'हैं, उनके लिए मृत्यु एक असंभव शब्द है, जो न कभी घटा, न घटता है, न घट सकता है।

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—18)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
क्‍या हम दस हजार बुद्धों का उत्‍सव मना सकते है?


      आनन्‍दो तथा निर्वाणों ने ओशो के लिए उद्यान में वाक-वेबनने का निश्‍चय किया ताकि वे कुछ घूम-फिर सकें और अस्‍वस्‍थ होने के कारण जब प्रवचन देने के लिए न जा सकें तो उद्यान को देख सकें। वे मान गए यद्यपि उन्‍हें ज्ञात था कि वह एक दो बार से अधिक उसका उपयोग नहीं कर सकेंगे। इन दोनों का विचार ओशो के लिए एक चित्र कला कक्ष बनाने का था। वर्षों पहले वे बहुत चित्र बनाया करते थे। परंतु उन्‍हें फैल्‍ट पैन तथा स्‍याही की गंध ऐ एलर्जी हो गई थी। उनके बेड़ रूम के साथ वाले कमरे को चित्रकला-कक्ष बनाया गया। जहां वे चित्र बना सकें हम उनके लिए ऐसे एयर ब्रश,इंक और रंग ढूंढने में सफल हो गए थे जिनमें किसी प्रकार की कोई गंध नहीं आती थी। यह कमरा सफेद तथा हरे संगमरमर से बनाया गया और यह उन्‍हें इतना पसंद अया कि बहुत ही छोटी होने के बावजूद वे वहां नौ महीने सोए। वे इसे अपनी छोटी सी कुटिया कहते थे। परंतु उन्‍होंने इसमें एक ही बार पेंटिंग बनाई।

      एक दिन उन्‍होंने मुझे अपनी छोटी सी कुटिया में बुलाया। वर्षा ऋतु थी। पानी जोरों से बरस रहा था। हाइकु ऐसे ही लिखे जाते है:ध्‍यान।

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—08)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
अमरीका—क़ैद—(अध्‍याय—08)

      अक्‍टूबर 28, 1985।
      अलियर जैट शारटल उतरी कैरोलिया के हवाई-अड्डे पर उतरने वाला था और मैंने बाहर अंधेरे में देखा, हवाई अड्डा सूनसान पडा था। कुछ लम्‍बी, पतली झाड़ियां जैट द्वारा उड़ाई गई हवा में झूल रही थी।     जैसे ही जैट ने ज़मीन को छुआ और इंजन बंद हुआ। निरूपा ने हान्‍या को देखा। हास्‍या,जिसके हाथ हम शारलट में रहनेवाले थे निरूपा की अत्‍यंत युवा सास थी। वह तारकोल की विमान पट्टी पर अपने मित्र प्रसाद के साथ खड़ी थी। निरूपा ने उत्‍साहपूर्वक हान्‍या को पुकारा और ठीक उसी समय कई दिशाओं से आई हैंड्स आप की आवाज़ों ने मुझे किसी अन्‍या सच्‍चाई में पहुंचा दिया। एक पल के विचार थम गए। एक भयावह अंतराल और फिर मन ने कहा—नहीं, यह सत्‍य नहीं है। कुछ ही क्षणों में लगभग पंद्रह बंदूकधारी व्‍यक्‍तियों ने बंदूकों का निशाना हम पर साधे हुए विमान को चारों और से घेर लिया।
      यह वस्‍तुत: सत्‍य था—अँधेरा कौंधती बत्‍तियां, कर्कश ध्‍वनि करती ब्रेक्स, चीखें,आतंक, भय सब मेरे आस-पास बुना हुआ था। मैं खतरे के प्रति इतनी सजग थी की शांत रहने के अतिरिक्‍त और कुछ न कर सकती थी। छींकना भी मत मैंने स्‍वयं से कहा। ये लोग गोली मार देंगे। वे लोग भयभीत दिखाई दे रहे थे। और होते भी क्‍यों न।

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—04)

हीरा पाया बांठ गठियायों-(मा प्रेम शून्यो )-आत्म कथा 
ऊर्जा दर्शन—(अध्‍याय—04)  

       ओशो 21 मार्च 1953 में बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध हुए। उसी दिन से वे उन लोगों की खोज में है जो उन्‍हें समझ सकें। और बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध हो सकें। उन्‍होंने उन सैंकड़ों सशस्त्रों की सहायता की है जो आत्‍म-बोध के मार्ग पर है।
      मैंने उन्‍हें कहते सूना है :
      मनुष्‍य की सत्‍य के लिए प्‍यास जन्‍मों-जन्‍मों तक चलती है। कई जन्‍मों के पश्‍चात वह उसे पाने में समर्थ होता है। और जो इसकी खोज करते है सोचते है कि इसकी प्राप्‍ति के बाद वे शान्ति का अनुभव करेंगे। लेकिन जो इसे पाने में सफल हो जाते है, पाते है उन्‍हें पता चलता है कि उनकी सफलता एक नई प्रसव-पीड़ा की शुरूआत है, बिना किसी पीड़ा-मुक्‍ति के। सत्‍य जब एक बार मिल जाता है, एक नई प्रसव-पीड़ा को जन्‍म देती है।
      वे फूल की बात करते है जिसे अपनी सुगन्‍ध बिखेरनी ही है—वे नीर भरे बादल की बात करते है जिसे बरसना ही है।

रविवार, 15 जुलाई 2018

मन ही पूजा मन ही धूप--(प्रवचन--01)

आग के फूल—(पहला प्रवचन)

सूत्र:

बिनु देखे उपजै नहि आसा। जो दीसै सो होई बिनासा।।
बरन सहित जो जापै नामु। सो जोगी केवस निहकामु।।
परचै राम रवै जो कोई। पारसु परसै ना दुबिधा होई।।
सो मुनि मन की दुबिधा खाइ। बिनु द्वारे त्रैलोक समाई।।
मन का सुभाव सब कोई करै। करता होई सु अनभे रहै।।
फल कारण फूली बनराइ। फलु लागा तब फूल बिलाई।।
ग्‍यानै कारन कर अभ्‍यासू। ग्‍यान भया तहं करमैं नासू।।
घृत कारन दधि मथै सयान जीवन मुकत सदा निरवान।।
कहि रविदास परम बैराग। रिदै राम को न जपसि अभाग।।

भज गोंविंदम मुढ़मते (आदि शंक्राचार्य) प्रवचन--04

कदम कदम पर मंजिल—(प्रवचन—चौथा)
प्रश्न-सार

1—कहा जाता है कि शंकर हिंदू वेदांती थे और आपने कहा कि शंकर छिपे हुए बौद्ध हैं; इसे कृपया स्पष्ट करें।

2—शंकर और आप भजन करने को कहने के पहले हमें हर बार मूढ़ कह कर क्यों संबोधित करते हैं?

3—रेचन में केवल क्रोध,र् ईष्या, दुख आदि के नकारात्मक भाव ही बाहर आते हैं। क्यों?

4—कृपया डूबने तथा होश और बेहोशी की सीमा-रेखाओं को स्पष्ट करें।

5—क्या प्रार्थना की जगह भजन भी धन्यवाद ज्ञापन मात्र है?

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

पिव पिव लागी प्‍यास-(दादू दयाल)-प्रवचन-08

जिज्ञासा-पूर्ति: चार--प्रवचन: आठवां,

दिनांक १८. ७. १९७५, प्रातःकाल,
श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्‍नसार:
1—प्रवचन कर रहे होते हैं, उस समय यदि आपका मुख निरखता हूं,तो शब्द सुनाई नहीं देते
2—महानिर्वाण को उपलब्ध हो जाने के बाद भी, ज्ञानी प्रकार हमारी सहायता करते हैं?
3— जन्मों-जन्मों से हमने दुख का अनुभव जाना है। लेकिन हमारी भूल नहीं दिख पाती?
4— क्या बुद्धपुरुष के होते हुए साधक को अपना स्वयं का समाधान खोजना अनिवार्य है?
5— ध्यान करते समय एक ओर शांति और आनंद का अनुभव होता है।
6— मुझे तो बड़े प्रयास, अभ्यास और श्रम से गुजरना पड़ रहा है, क्यों?
7— लेकिन जिस लौ के लगाम की बात संत कहते हैं, दादू कहते हैं, वह कहां उपलब्ध है?

बुधवार, 11 जुलाई 2018

धर्म और आनंद-(प्रश्नोंत्तर-विविध)-प्रवचन-10

धर्म और आनंद-(प्रशनोत्तर-विविध)-ओशो

दसवां—प्रवचन
मेरे प्रिय आत्मन्!
अभी एक भजन आपने सुना। मैंने भी सुना। मेरे मन में खयाल आया, कौन से घूंघट के पट हैं जिनकी वजह से प्रीतम के दर्शन नहीं होते हैं? बहुत बार यह सुना होगा कि घूंघट के पट हम खोलें। तो वह जो प्यारा हमारे भीतर छिपा है उसका दर्शन हो सकेगा? लेकिन कौन से घूंघट के पट हैं जिन्हें खोलें? आंखों पर कौन सा पर्दा है? कौन सा पर्दा है जिससे हम सत्य को नहीं जान पाते हैं? और जो सत्य को नहीं जान पाता, जो जीवन में सत्य का अनुभव नहीं कर पाता, उसका जीवन दुख की एक कथा, चिंताओं और अशांतियों की कथा से ज्यादा नहीं हो सकता है। सत्य के बिना न तो कोई शांति है, न कोई आनंद है। और हमें सत्य का कोई भी पता नहीं है। सत्य तो दूर की बात है, हमें स्वयं का भी कोई पता नहीं है। हम क्यों हैं और क्या हैं, इसका भी कोई बोध नहीं है। ऐसी स्थिति में जीवन भटक जाता हो अंधेरे में, दुख में और पीड़ा में, तो यह कोई आश्चर्यजनक नहीं है।
इस सुबह मैं इस संबंध में ही थोड़ी सी आपसे बात करूं। कौनसा पर्दा है और उसे हम कैसे उठा सकते हैं?

धर्म और आनंद-(प्रशनोंत्तर-विविध)-प्रवचन-06

धर्म और आनंद-(प्रशनोत्तर-विविध)-ओशो

छठवांप्रवचन-हर वासना अनंत के लिए है
मैं जिस घर में पैदा हुआ हूं बचपन से मुझे कुछ बातें समझाई गई, सिखाई गई हैं, वे बातें मेरे चित्त में बैठ गई हैं। वे मेरे इतने अबोधपन में सिखाई गई हैं मुझे कि उनके बाबत मेरे मन में कोई विरोध पैदा नहीं हुआ। मैंने उनको सीख लिया। उन्हीं को मैं कहता हूं मेरी श्रद्धा है। यह बिल्कुल संयोग की बात है कि मैं जैन घर था; यह संयोग की बात है कि मैं मुसलमान घर में होता। और यह संयोग की बात है कि मैं नास्तिक घर में हो सकता था; जहां मुझे सिखाया जाता कि कोई ईश्वर नहीं है।
आखिर सोवियत रूस में उन्नीस सौ सत्रह के बाद चालीस वर्षों में उन्होंने पूरे बीस करोड़ लोगों को यह सिखा दिया कि न कोई आत्मा है, न कोई परमात्मा है। चालीस वर्ष के सतत प्रचार में बीस करोड़ लोगों के दिमाग में यह बात बिठा दी कि न कोई आत्मा है, न कोई परमात्मा है।

धर्म और आनंद-(प्रशनोंत्तर-विविध)-प्रवचन-05

धर्म और आनंद-(प्रशनोत्तर-विविध)-ओशो

पांचवां—प्रवचन-मिथ्या साधना पहुंचाते नहीं

अपूर्ण से अपूर्ण हम हों लेकिन पूर्ण तक उन्मुक्त होने की एक अनिवार्य प्यास सबके साथ जुड़ी है। हम सब प्यासे हैं आनंद के लिए, शांति के लिए। और सच तो यह है कि जीवन में भी जो हम दौड़ते हैं..धन के, पद के, प्रतिष्ठा के पीछे, उस दौड़ में भी भाव यही होता है कि शायद शांति, शायद समृद्धि मिल जाए। वासनाओं में भी जो हम दौड़ते हैं, उस दौड़ में भी यही पीछे आकांक्षा होती है कि शायद जीवन की संतृप्ति उसमें मिल जाए, शायद जीवन आनंद को उपलब्ध हो जाए, शायद भीतर एक सौंदर्य और शांति और आनंद के लोक का उदघाटन हो जाए। लेकिन निरंतर एक-एक इच्छा में दौड़ने के बाद भी वह गंतव्य दूर रहता है, निरंतर वासनाओं के पीछे चल कर भी वह परम संपत्ति उपलब्ध नहीं होती है।

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-08

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

आठवां प्रवचन-विध्वंस: सृजन का प्रारंभ

यह सवाल नहीं है। पहली बात तो यह कि मैं निपट एक व्यक्ति की भांति, जो मुझे ठीक लगता है वह में कहूं। न तो मेरी कोई संस्था है, न कोई संगठन। हां, कोई संगठन बना कर मेरी बात उसे ठीक लगती है और लोगों तक पहुंचाए, तो वैसा संगठन जीवन जागृति केंद्र है। वह उसका संगठन है, जिन्हें मेरी बात ठीक लगती है और वे लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं। लेकिन मैं उस संगठन का हिस्सा नहीं हूं और उस संगठन का मेरे ऊपर कोई बंधन नहीं है, इसलिए वह संगठन रोज मुश्किल में है। क्योंकि कल मैंने कुछ कहा था, वह संगठन के लोगों को ठीक लगता था। आज कुछ कहता हूं, नहीं ठीक लगता है। वे मुश्किल में पड़ जाते हैं। मेरी तो उनसे कोई शर्त नहीं है, उनसे मैं बंधा हुआ नहीं हूं, इसलिए जितनी प्रवृत्तियां चलती हैं, जिन्हें मेरी बात ठीक लगती है, उनके द्वारा चलती हैं।

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—प्रवचन-07

देख कबीरा रोया-(राष्ट्रीय ओर सामाजिक)—ओशो

सातवां-प्रवचन-तोडने का एक उपक्रम
जो ठीक है और सच है वह मुझे कहना ही पड़ेगा। इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं। आखिर जो सत्य है, लोगों को उसके साथ आना पड़ेगा--चाहे वे आज दूर जाते हुए मालूम पड़ें। और लोग पास हैं इसलिए मैं असत्य नहीं बोल सकता। क्योंकि सच जब भी बोला जाएगा, तब भी प्राथमिक परिणाम उसका यही होगा कि लोग दूर भागेंगे। क्योंकि हजारों वर्षों की धारणा में वे पले हैं, उस पर चोट पड़ेगी। सत्य का हमेशा ही यही परिणाम हुआ है। सत्य हमेशा डिवास्टेंटिंग है। एक अर्थ है कि वह जो हमारी धारणा है उसको तो तोड़ डालेगा। और अगर धारणा तोड़ने से हम बचना चाहें तो हम सत्य नहीं बोल सकते। जान कर मैं किसी को चोट नहीं पहुंचाना चाह रहा हूं। डेलिब्रेटली मैं किसी को चोट नहीं पहुंचाना चाहता। लेकिन सत्य जितनी चोट पहुंचाता है उसमें मैं असमर्थ हूं, उतनी चोट पहुंचेगी। उसको बचा भी नहीं सकता हूं। फिर मैं कोई राजनीतिक नेता नहीं हूं कि मैं इसकी फिक्र करूं कि लोग मेरे पास आएं, कि मैं इसकी फिक्र करूं कि पब्लिक ओपिनियन क्या है?

शनिवार, 7 जुलाई 2018

कोपलें फिर फूट आईं--(प्रवचन--02)

आत्मिक विकास एकमात्र विकास  --(दूसरा प्रवचन:)

१ अगस्त, १९८६, ४. ०० अपराहन, सुमिला, जुहू, बंबई

प्रश्न: भगवान श्री, आपको समझने में आज की सरकारें और चर्च तो क्या बुद्धिजीवी भी जिस जड़ता का परिचय दे रहे हैं वह घबराने वाली है। ऐसा क्यों हुआ कि मनुष्य-जाति अपने श्रेष्ठतम फूल के साथ यह दुर्व्यवहार हुआ करे? क्या उसकी आत्मा मरी हुई है? आपके साथ पिछले दस महीनों से जो दुर्व्यवहार हुआ है, वह क्या एक किस्म का अंतर्राष्ट्रीय तल का एपारथाइड नहीं है जो साउथ अफ्रीका के एपारथाइड से भी बदतर है? क्या इस पर कुछ कहने की अनुकंपा करेंगे?
मैं एक बात इन दस महीनों में गहराई से अनुभव किया हूं और वह है, हर आदमी के चेहरे पर चढ़ा हुआ झूठा चेहरा। मैं सोचता था कुछ लोग हैं जो नाटक मंडलियों में हैं, लेकिन जो देखा है तो प्रतीत हुआ कि हर आदमी एक झूठे चेहरे के भीतर छिपा है। ये महीने कीमती थे और आदमी को देखने के लिए जरूरी थे; यह समझने को भी कि जिस आदमी के लिए मैं जीवन भर लड़ता रहा हूं, वह आदमी लड़ने के योग्य नहीं है। एक सड़ी-गली लाश है, एक अस्थिपंजर है। मुखौटे सुंदर हैं, आत्माएं बड़ी कुरूप हैं।

बुधवार, 4 जुलाई 2018

कहै वाजिद पुकार--(प्रवचन--08)

कुछ और ही मुकाम मेरी बंदगी का है—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 28 सितम्‍बर, 1976;   श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्‍नसार:

1— आपने इतने ऊंचे, इतने अकल्पनीय शिखर दिखा दिए हैं कि उससे अपनी बौनी और लंगड़ी सामर्थ्य प्रगट हो गई। एक ओर उनके दिखने का आनंद है, तो दूसरी ओर तड़पने के अलावा और कोई रास्ता नहीं दिखता! आप ही सम्हालिएगा! घुटन और छटपटाहट के क्षणों में अनुभव में आइएगा! आपकी अमृत की वर्षा करने वाली आंखें, मेरे अंतस में सदा कौंधती रहें।
आपकी आंखों का आकाश
सजल, श्यामल, सुंदर—सा पाश।
खोया मेरा मन खग नादान
सुध—बुध भूल, भटक अनजान!
2—विरह—अवस्‍था में भक्‍त दुःखी होता है या सुखी?
3—भक्‍त कि चाह क्‍या है—पुण्‍य, या ज्ञान, या स्‍वर्ग?

सोमवार, 2 जुलाई 2018

असंभव क्रांति-(प्रवचन-08)

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 21-10-67 सुबह  

(अति-प्राचीन प्रवचन)
प्रवचन-आठवां-(सृजन का सूत्र)
मेरे प्रिय आत्मन्,
मनुष्य एक तिमंजिला मकान है। उसकी एक मंजिल तो भूमि के ऊपर है, बाकी दो मंजिल जमीन के नीचे। उसकी पहली मंजिल में, जो भूमि के ऊपर है, थोड़ा प्रकाश है। उसकी दूसरी मंजिल में, जो जमीन के नीचे दबी है और भी कम प्रकाश है। और उसकी तीसरी मंजिल में जो बिलकुल भूगर्भ में छिपी है, पूर्ण अंधकार है, वहां कोई प्रकाश नहीं है।
इस तीन मंजिल के मकान में--जो कि मनुष्य है, अधिक लोग ऊपर की मंजिल में ही जीवन को व्यतीत कर देते हैं। उन्हें नीचे की दो मंजिलों का न तो कोई पता होता है, न खयाल होता है। ऊपर की मंजिल बहुत छोटी है। नीचे की दो मंजिलें बहुत बड़ी हैं। और जो अंतिम अंधेरा भवन है नीचे, वही सबसे बड़ा है--वही आधार है सारे जीवन का।

असंभव क्रांति-(प्रवचन-07)

असंभव क्रांति-(साधना-शिविर)
साधना-शिविर माथेरान, दिनांक 20-10-67 रात्री  
 
(अति-प्राचीन प्रवचन)
प्रवचन-सातवां-(सत्य का संगीत)

एक मित्र ने पूछा है कि मैं शास्त्रों को जला डालने के लिए कहता हूं। और मेरी बातों से कहीं थोड़े कम समझ लोग भ्रांत होकर भटक न जाएं?

लोग भटकेंगे या नहीं, लेकिन जिन्होंने प्रश्न पूछा है, वे मेरी बात सुनकर जरूर भटक गए हैं। मैंने कब कहा कि शास्त्रों को जला डालें। मैंने सिर्फ अपनी किताबों को--अगर वे किसी दिन शास्त्र बन जाएं तो जला डालने को कहा है। मेरी किताबें हैं, उनको जला डालने के लिए मैं कह सकता हूं। लेकिन दूसरों की किताबें जला डालने को मैं क्यों कहूंगा।
और फिर मैंने कहा शास्त्रों को जला डालें--किताबों को जलाने के लिए मैंने कभी कहा नहीं है। अगर इतनी सी बात भी समझ में नहीं आती है तो फिर मैं और जो कह रहा हूं, वह क्या समझ में आता होगा?

रविवार, 1 जुलाई 2018

अमृत की दशा-(प्रवचन-05)

 प्रवचन--पांचवां 

मैं विचार में हूं--किस संबंध में आपसे बातें करूं। और बातें इतनी ज्यादा हैं और दुनिया इतनी बातों से भरी है कि संकोच होना बहुत स्वाभाविक है। बहुत विचार हैं, बहुत उपदेश हैं, सत्य के संबंध में बहुत से सिद्धांत हैं। यह डर लगता है कि कहीं मेरी बातें भी उस बोझ को और न बढ़ा दें, जो कि मनुष्य के ऊपर वैसे ही काफी है। बहुत संकोच अनुभव होता है। कुछ भी कहते समय डर लगता है कि कहीं वह बात आपके मन में बैठ न जाए। बहुत डर लगता है कि कहीं मेरी बात को आप पकड़ न लें। बहुत डर लगता है कि कहीं वह बात आपको प्रिय न लगने लगे; कहीं वह आपके मन में स्थान न बना ले।
चूंकि मनुष्य विचारों और सिद्धांतों के कारण ही पीड़ित और परेशान है। उपदेशों के कारण ही मनुष्य के जीवन में सत्य का आगमन नहीं हो पाता है। दूसरों के द्वारा कही गई और दी गई बातें ही उस सत्य के बीच में बाधा बन जाती हैं जो हमारे पास है और निरंतर है।

अनंत की पुकार—(अहमदाबाद)-प्रवचन-07

सातवां प्रवचन -ध्यान-केंद्र के बहुआयाम

अहमदाबाद -अंतरगंवार्ताएं.....

वह जगह तो किसी भी कीमत पर छोड़ने जैसी नहीं है। हम तो अगर पचास लाख रुपया भी खर्च करें, तो वैसी जगह नहीं बना सकेंगे। दस एकड़ का कंपाउंड है। उसकी जो दीवाल है बनी हुई नौ फीट ऊंची, अपन बनाएं तो पांच लाख रुपये की तो सिर्फ उसकी कंपाउंड वॉल बनेगी। नौ फीट ऊंची पत्थर की दीवाल है। और वह करीब-करीब पंद्रह लाख में मिले तो बिल्कुल मुफ्त है। लेकिन यह सब तो उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना महत्व पूर्ण यह है कि वह  बंबई में होते हुए उसके भीतर जाते से ही आपको लगे नहीं कि बंबई में हैं..माथेरान में हैं। इतने बड़े दरख्त हैं, और इतनी शांत जगह है।

शुक्रवार, 29 जून 2018

ताओ उपनिषद--प्रवचन--114

 प्रवचन-एक सौ चौदहावां 

संत को पहचानना महाकठिन है:

They Know Me Not
My teachings are very easy to understand and very easy to practise,
But no one can understand them and no one can practise them.
In my words there is a principle.
In the affairs of men there is a system.
Because they know not these,
They also know me not.
Since there are few that know me,
Therefore I am distinguished.
Therefore the Sage wears a coarse cloth on top
And carries jade within his bosom.
अध्याय 70

वे मुझे नहीं जानते

मेरे उपदेश समझने में आसान हैं, और साधने में भी आसान हैं।
लेकिन न कोई उन्हें समझ सकता है, और न कोई उन्हें साध सकता है।
मेरे शब्दों में एक सिद्धांत है।
मनुष्य के कारबार में एक व्यवस्था है।
क्योंकि इन्हें वे नहीं जानते हैं, वे मुझे भी नहीं जानते हैं।
चूंकि बहुत कम लोग मुझे जानते हैं, इसलिए मैं विशिष्ट हूं।
इसलिए संत बाहर से तो मोटा कपड़ा पहनते हैं,
लेकिन भीतर हृदय में मणि-माणिक्य लिए रहते हैं।

गुरुवार, 28 जून 2018

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--080

कठिनतम पर कोमलतम सदा जीतता है—(प्रवचन—अस्सीवां)

अध्याय 43

कोमलतम तत्व

संसार का कोमलतम तत्व
कठिनतम के भीतर से गुजर जाता है।
और जो रूपरहित है, वह
उसमें प्रवेश कर जाता है,
जो दरारहीन है;
इसके जरिए मैं जानता हूं कि
अक्रियता का क्या लाभ है।
शब्दों के बिना उपदेश करना,
और अक्रियता का जो लाभ है,
वे ब्रह्मांड में अतुलनीय हैं।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--079

ताओ सब से परे है—(प्रवचन—उन्‍नासिवां)

अध्याय 42

हिंसक मनुष्य

ताओ से एक का जन्म हुआ;
एक से दो का; दो से तीन का;
और तीन से सृष्ट ब्रह्मांड का उदय हुआ।
सृष्ट ब्रह्मांड के पीछे यिन का वास है
और उसके आगे यान का;
इन्हीं व्यापक सिद्धांतों के योग से
वह लयबद्धता को प्राप्त होता है।
"अनाथ', "अयोग्य' और "अकेला' होने से
मनुष्य सर्वाधिक घृणा करता है।
तो भी राजा और भूमिपति अपने

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--076

अस्तित्व अनस्तित्व से घिरा है—(प्रवचन—छिहत्‍तरवां)

 अध्याय 40

 प्रतिक्रमण का सिद्धांत

प्रतिक्रमण ताओ का कर्म है। और भद्रता ताओ का व्यवहार है।
संसार की वस्तुएं अस्तित्व से पैदा होती हैं; और अस्तित्व अनस्तित्व से आता है।
 अध्याय 41 : खंड 1

 ताओपंथी के गुणधर्म

 जब सर्वश्रेष्ठ प्रकार के लोग ताओ को सुनते हैं,
तब वे उसके अनुसार जीने की अथक चेष्टा करते हैं।
जब मध्यम प्रकार के लोग ताओ को सुनते हैं,
तब वे उसे जानते से भी लगते हैं और नहीं जानते से भी।
और जब निकृष्ट प्रकार के लोग ताओ को सुनते हैं,
तब वे अट्टहास कर उठते हैं--मानो इस पर

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--075

अस्तित्व में सब कुछ परिपूरक है—(प्रवचन—पिचत्‍हरवां)

अध्याय 39 : खंड 2

परिपूरकों द्वारा एकता

इसलिए अभिजात वर्ग सहारे के लिए साधारण जन पर निर्भर है;
और उच्चस्थ जन आधार के लिए निम्नस्थ पर निर्भर है।
यही कारण है कि राजा और भूमिपति अपने को
"अनाथ,' "अकेला,' और "अयोग्य' कहते हैं।
क्या यह सच नहीं है कि वे सहारे के लिए साधारण जनों पर निर्भर हैं?
सच तो यह है कि रथ के अंगों को अलग-अलग कर दो,
और कोई रथ नहीं बच रहता है।
मणि-माणिक्य की तरह झनझनाने के बजाय
चट्टानों की तरह गड़गड़ाना कहीं अच्छा है।

बुधवार, 27 जून 2018

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--034

संत की पहचान: सजग व अनिर्णीत, अहंशून्य व लीलामय—(प्रवचन—चौंतीसवां) 

अध्याय 15 : खंड 1

प्राचीन समय के संतजन

प्राचीन समय में ताओ में प्रतिष्ठित एवं निष्णात संतजन सूक्ष्म
और अति संवेदनशील अंतर्दृष्टि से उसके रहस्यों को समझने में
सफल हुए। और वे इतने गहन थे कि मनुष्य की समझ के परे थे।
और चूंकि वे मनुष्य के ज्ञान के परे थे, इसलिए उनके संबंध में
इस प्रकार कुछ कहने का प्रयास किया जा सकता है कि वे अत्यंत
सतर्क व सजग हैं, जैसा कोई शीत-ऋतु में किसी नाले को पार करते
समय हो; वे सतत अनिर्णीत व चौकन्ने रहते हैं, जैसा कि
कोई व्यक्ति जो कि सब ओर खतरों से घिरा हो;
वे जीवन में जैसे कि अतिथि हों, ऐसा गंभीर अभिनय करते हैं।
उनकी अस्मिता सतत विसर्जित होती रहती है, जैसे कि प्रतिपल
बिखरता हुआ बर्फ हो; वे अपने बारे में किसी प्रकार की घोषणा
नहीं करते, जैसे कि वह लकड़ी, जिसे अभी कोई भी रूप नहीं
दिया गया है; वे एक घाटी की भांति रिक्त और
मटमैले जल की भांति विनम्र होते हैं।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--025

 आमंत्रण भरा भाव व नमनीय मेधा—(प्रवचन—पचीसवां)

अध्याय 10 : सूत्र 2
अद्वय की स्वीकृति

जनसमूह के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने में और शासन के
व्यवस्थापन की प्रक्रिया में क्या वह सोद्देश्य
कर्म के बिना अग्रसर नहीं हो सकता?
क्या वह स्वर्ग के अपने दरवाजे (नासारंध्र)
को खोलने और बंद करने में एक स्त्रैण
पक्षी की तरह काम नहीं कर सकता?
जब उसकी मेधा सभी दिशाओं की ओर अभिमुख हो,
तब क्या वह ज्ञानरहित होने जैसा नहीं दिख सकता?

विचारशील मनुष्य निरंतर ही पूछता है: जीवन का उद्देश्य क्या? जीएं क्यों? किसलिए? और ऐसा आज नहीं, सदा से ही विचारशील मनुष्य ने पूछा है। समस्त धर्मों का जन्म और समस्त दर्शनों का जन्म इस प्रश्न के आस-पास ही निर्मित हुआ है: उद्देश्य क्या है? प्रयोजन क्या है? लक्ष्य क्या है? अंत क्या है? और जो ऐसा नहीं पूछते हैं, विचारशील लोग सोचते रहे हैं कि वे विचारहीन हैं, अज्ञानी हैं। जो ऐसे ही जीए चले जाते हैं, बिना लक्ष्य को पूछे, उन्हें विचारशील लोग सदा से अज्ञानी समझते रहे हैं।

बुधवार, 20 जून 2018

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-08)


आठवां—प्रवचन

स्‍वप्‍नसर्जन मना विसर्जन और नित्‍य सत्‍य की उपलब्‍धि

अनित्यं ज्जगद्यज्जनित स्वप्‍न  जगअगजादि तुल्यम

तथा देहादि संघातम् मोह गणजाल कलितम्।

तद्रब्यूस्वप्‍न वत् कल्पितम्।

विष्णु विध्यादि शताभिधान लक्ष्यम्।

 अंकुशो मार्ग:।

जगत अनित्य है, उसमें जिसने जन्म लिया है, वह स्वप्‍न के संसार जैसा और आकाश के    हाथी जैसा मिथ्या है। वैसे ही यह देह आदि समुदाय मोह के गुणों से युक्त है। यह सब रस्सी              में भ्रांति से कल्पित किए गए सर्प के समान मिथ्या है।
            विष्णु, ब्रह्मा आदि सैकड़ों नाम वाला ब्रह्म ही लक्ष्य है।
                        अंकुश ही मार्ग है।

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-07)


सातवां—प्रवचन

अखंड जागरण से प्राप्‍तप्ररमानंदी तुरीयावस्‍था





                  शिवयोगनिद्रा च खेचरी मुद्रा च परमानंदी।
                              निर्गुण गुणत्रयम्।
                               विवेक लभ्यम्।
                              मनोवाग् अगोचरम्।

निद्रा में भी जो शिव में स्थित हैं और ब्रह्म में जिनका विचरण है, ऐसे वे परमानदीं हैं।
                        वे तीनों गुणों से रहित हैं।
                  ऐसी स्थिति विवेक द्वारा प्राप्त की जाती है।
                     वह मन और वाणी का अविषय है।

सोमवार, 18 जून 2018

फूल ओर कांटे--(कथा--07)


कथा-सातवी -(कंफ्यूसियस मरणशय्या पर)


मैं जीवन में उन्हें हारते देखता हूँ जो कि जीतना चाहते थे। क्या जीतने की आकांक्षा हारने का कारण नहीं बन जाती है?
आँधी आती है तो आकाश को छूते वृक्ष टूट कर सदा के लिए गिर जाते हैं और घास के छोटे-छोटे पौधे आँधी के साथ डोलते रहते हैं और बच जाते हैं।
पर्वतों से जल की धाराएँ गिरती हैं- कोमल, अत्यंत कोमल जल की धाराएँ और उनके मार्ग में खड़े होते हैं विशाल पत्थर- कठोर शिलाखंड। लेकिन एक दिन पाया जाता है, जल तो अब भी बह रहा है लेकिन वे कठोर शिलाखंड टूट-टूटकर, रेत होकर एक दिन मालूम नहीं कहाँ खो गये हैं।