यह
शरीर एक बीज
है और जीवन
चेतना और
आत्मा का एक
अंकुर भीतर है।
जब वह अंकुर
फूटता है तो
मनुष्य का बीज
होना समाप्त
होता है और
मनुष्य वृक्ष
बनता है।
संकल्प
हम करें
तीव्रता से, टोटल, समग्र,
कि मैं वापस
लौटता हूं
अपने भीतर।
सिर्फ आधा
घंटा भी कोई
इस बात का
संकल्प करे कि
मैं वापस
लौटना चाहता
हूं, मैं
मरना चाहता
हूं? मैं
डूबना चाहता
हूं अपने भीतर,
मैं अपनी
सारी ऊर्जा को
सिकोड़ लेना
चाहता हूं, तो थोड़े ही
दिनों में वह
इस अनुभव के
करीब पहुंचने
लगेगा कि
ऊर्जा सिकुड़ने
लगी है भीतर।
शरीर छूट
जाएगा बाहर
पड़ा हुआ। एक
तीन महीने का
थोड़ा गहरा
प्रयोग, और
आप शरीर अलग
पड़ा है, इसे
देख सकते हैं।
मेरे
प्रिय आत्मन्!
जीवन क्या है, मनुष्य
इसे भी नहीं
जानता है। और
जीवन को ही हम
न जान सकें, तो मृत्यु
को जानने की
तो कोई
संभावना ही
शेष नहीं रह
जाती। जीवन ही
अपरिचित और
अज्ञात हो, तो मृत्यु
परिचित और
ज्ञात नहीं हो
सकती है। सच
तो यह है कि
चूंकि हमें
जीवन का पता
नहीं, इसलिए
ही मृत्यु
घटित होती
प्रतीत होती
है। जो जीवन
को जानते 'हैं,
उनके लिए मृत्यु
एक असंभव शब्द
है, जो न
कभी घटा, न
घटता है, न
घट सकता है।





















