मेरे
प्रिय आत्मन्,
मुझे
पता नहीं कि
आप किस लिए
यहां आए हैं।
शायद आपको भी
ठीक से पता न
हो,
क्योंकि हम
सारे लोग
जिंदगी में इस
भांति ही जीते
हैं कि हमें
यह भी पता
नहीं होता कि
क्यों जी रहे
हैं, यह भी
पता नहीं होता
कि कहां जा
रहे हैं, और
यह भी पता
नहीं होता कि
क्यों जा रहे
हैं।
मूर्च्छा
और जागरण:
जिंदगी
ही जब बिना पूछे
बीत जाती हो
तो आश्चर्य
नहीं होगा कि
आपमें से बहुत
लोग बिना पूछे
यहां आ गए हों
कि क्यों जा
रहे हैं। शायद
कुछ लोग जानकर
आए हों, संभावना
बहुत कम है।
हम सब ऐसी
मूर्च्छा में
चलते हैं, ऐसी
मूर्च्छा में
सुनते हैं, ऐसी
मूर्च्छा में
देखते हैं कि
न तो हमें वह दिखाई
पड़ता जो है, न वह सुनाई
पड़ता जो कहा
जाता है, और
न उसका स्पर्श
अनुभव हो पाता
जो सब ओर से बाहर
और भीतर हमें
घेरे हुए है।




