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मंगलवार, 18 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रेम बड़ा दांव हैतीसरा प्रवचन
१३ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, मैं कौन हूं, क्या हूं, कुछ पता नहीं। आपसे अपना पता पूछने आया हूं।

नारायण शंकर! यह पता तुम्हें कोई और नहीं दे सकता। न मैं, न कोई और। यह तो तुम्हें खुद ही अपने भीतर खोदना होगा। बाहर पूछते फिरोगे, भटकाव ही हाथ लगेगा। बहुत मिल जाएंगे पता देनेवाले। जगह-जगह बैठे हैं पता देनेवाले। बिना खोजे मिल जाते हैं। तलाश में ही बैठे हैं कि कोई मिल जाए पूछनेवाला। सलाह देने को लोग इतने उत्सुक हैं, ज्ञान थोपने को एक-दूसरे के ऊपर इतने आतुर हैं कि जिसका हिसाब नहीं। क्योंकि अहंकार को इससे ज्यादा मजा और किसी बात में नहीं आता।
जब भी तुम दूसरे को ज्ञान की बातें देने लगते हो, तो दो बातें सिद्ध हो जाती हैं--दूसरा अज्ञानी है और तुम ज्ञानी हो; दूसरा नहीं जानता और तुम जानते हो। और यह मजा कौन नहीं लेना चाहता। इसलिए मुश्किल है तुम्हें वह आदमी मिलना जो तुम्हें सलाह न दे, ज्ञान न दे। हालांकि कोई किसी से ज्ञान लेता नहीं। और ज्ञान कुछ ऐसी बात है भी नहीं कि काई और दे दे। अच्छा ही है कि लोग लेते नहीं। जो दूसरे से ले लिया, कचरा है।

सोमवार, 17 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02


साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
ये फूल लपटें ला सकते हैं—दूसरा प्रवचन
१२ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, आपकी मधुशाला में ढाली जानेवाली शराब पी-पीकर मखमूर हो गया हूं। भगवान, प्यार करने वालों पर दुनिया तो जलती है मगर अपनी मधुशाला के दूसरे पियक्कड़ भी प्रेम के इतने विरोध में हैं--खासकर पचास प्रतिशत भारतीय, जो कि आज दस-बारह वर्षों से आपके साथ हैं। प्रभु, हमारे विदेशी मित्र तो प्यार करनेवालों को देखकर खुश होते हैं, मगर भारतीय सिर्फ जलते ही नहीं बल्कि अपराधजनक दृष्टि से देखते हैं और घंटों व्यंग्यपूर्ण बातचीत करते रहते हैं। यह जमात प्रेम का बस एक ही मतलब जानती है--"काम'। ऐसा क्यों, प्रभु? क्या प्रेम कर कोई और आयाम नहीं है, खासकर नर-नारी के संबंध में?

स्वभाव! भारतीय चित्त सदियों से कलुषित हैं। प्रेम के प्रति निंदा की एक गहन अवधारणा हजारों वर्षों से कूट-कूटकर भारतीय मन में भरी गयी है। वह भारतीय खून का हिस्सा हो गयी है। उसे ही हम संस्कृति कहते हैं, धर्म कहते हैं और बड़े-बड़े सुंदर शब्दों में छिपाते हैं। लेकिन सारे आवरणों के भीतर प्रेम का निषेध है। और प्रेम का निषेध मूलतः जीवन के ही निषेध का एक अंग है।

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)--प्रवचन-01

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

भगवान श्री रजनीश का पूर्ण मनुष्य—

""...हसन ने कहा," राबिया, तूने तो बात ही बदल दी, तूने तो मुझे बहुत झेंपाया। क्षमा कर, आता हूं, भीतर आता हूं, तू ही ठीक कहती है।'
और राबिया ने कहा,"बाहर तो सब माया है, भ्रम है, सत्य तो भीतर है।'

वहां मैं राजी नहीं हूं। बहार भी सत्य है, भीतर भी सत्य है। तुम्हारी नजर जहां पड़ जाए। तुम बाहर को देखोगे तो भीतर के सत्य से वंचित रह जाओगे। और तुम भीतर देखोगे तो तुम बाहर के सत्य से वंचित रह जाओगे। और अब तक यही हुआ। पूरब ने भीतर देखा, बाहर के सत्य से वंचित रह गया। इसलिए दीन है, दरिद्र है, भूखा है,प्यासा है, उदास है, क्षीण है। जैसे मरणशय्या पर पड़ा है। क्योंकि बाहर तो सब माया है। तो फिर कौन विज्ञान को जन्म दे? कौन उलझे माया में? और कौन खोजे माया के सत्यों को? और माया में सत्य हो कैसे सकते हैं?
इस देश की दरिद्रता में तुम्हारे अध्यात्मवादियों का हाथ है। जाने न सही तो अनजाने सही, मगर हाथ तो है; उसे इनकारा नहीं जा सकता।

रविवार, 16 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-10

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

अंतर-आकाश के फूल—प्रवचन-दसवां
दिनांक 09 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्
      यस्मिन देवा अधि विश्वे निषेदुः।
यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति
      य इत् दद् विदुस्त इमे समासते।।
जिसमें सब देवता भलीभांति स्थित हैं उसी अविनाशी परम व्योम में सब वेदों का निवास है। जो उसे नहीं जानता वह वेदों से क्या निष्कर्ष निकालेगा? परंतु जो जानता है
उसे वह उसी में से भलीभांति मिल जाता है।
भगवान, श्वेताश्वर उपनिषद के इस सूत्र को हमारे लिए खोलने की अनुकंपा करें।

 सत्यानंद,
यह सूत्र उन थोड़े-से अदभुत सूत्रों में से एक है जिन्हें गलत समझना तो आसान, सही समझना बहुत मुश्किल। एक-एक शब्द की गहराई में उतरना जरूरी है। एक-एक शब्द जैसे जीवन-अनुभव का निचोड़ है। हजारों गुलाबों से जैसे इत्र की कुछ बूंदें बनें, ऐसे हजारों समाधि के अनुभव इस एक सूत्र में पिरोए हुए हैं।

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-09

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

जिसको पीना हो आ जाए—प्रवचन—नौवां
दिनांक 07 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
आपको लोग गलत क्यों समझते हैं? क्या सत्य को सदा ही गलत समझा गया है? मैं डरता हूं कि शायद जनमानस आपकी आमूल क्रांति को पचा नहीं सकेगा। आप क्या करने की सोच रहे हैं?

 अभयानंद,
यह देख कर कि तुम्हारे भीतर बहुत भय है, मैंने तुम्हें नाम दिया--अभयानंद। अचेतन तुम्हारा भय की पर्तों से भरा हुआ है। तुम अपने ही भय को प्रक्षेपित कर रहे हो। और तब बजाए आनंदित होने के तुम मेरे पास बैठ कर भी चिंतित हो जाओगे। ये सारी चिंताएं तुम्हें पकड़ लेंगी कि आपको लोग गलत क्यों समझते हैं! क्या फिक्र? तुमने समझा, उतना बहुत। तुम्हारे भीतर का दीया जला, उतना तुम्हारे मार्ग की रोशनी के लिए काफी है।

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-08

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

स्वाध्याय ही ध्यान है—प्रवचन-आठवां
दिनांक 08 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि।
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः।।
देहाभिमान के गलने और परमात्मा के जानने के बाद जहां-जहां मन जाता है वहां-वहां उसे समाधि अनुभव होती है।
भगवान, इस सूत्र को समझाने की कृपा करें।

 चिदानंद,
यह वक्तव्य तो सूत्र कहे जाने योग्य नहीं है। यह तो मूलतः गलत है। संस्कृत में ही होने से कोई बात सही नहीं हो जाती। शास्त्र में ही हो जाने से कोई वचन सत्य नहीं हो जाता। सत्य के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें पूरी करनी होती हैं। और यह सूत्र तो शर्तें पूरी करना तो दूर, अत्यंत मूढ़तापूर्ण भी है।
सोचो। सूत्र कहता है: "देहाभिमान के गलने से...।'
देहाभिमान कब गलता है? देहाभिमान क्या है?

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-07

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

मैं तुम्हारा कल्याण-मित्र हूं-प्रवचन-सातवां
दिनांक 07 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
यह कैसी आजादी है जहां हर आदमी दुखी है और सुख के कोई आसार भी नजर नहीं आते?

 नारायण प्रसाद,
आजादी से सुख होगा ही, ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है; उलटा भी हो सकता है, दुख भी बढ़ सकता है। और वही हुआ है। आदमी गलत है तो आजादी भी गलत आदमी को मिलेगी। जैसे पागलखाने में पागल बंद हों और हम उन्हें आजाद कर दें, तो क्या तुम सोचते हो स्वर्ग निर्मित हो जाएगा? आजादी तो आ जाएगी, जंजीरें तो टूट जाएंगी, दरवाजे तो खुल जाएंगे, लेकिन पागल तो फिर भी पागल ही होंगे। बंद थे तो पागलपन की सीमा थी; स्वतंत्र हो गए तो पागलपन को पूरी स्वच्छंदता मिल गई।

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-06


सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो
है इसका कोई उत्तर—प्रवचन-छट्ठवां
दिनांक 06 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
न जातु कामात् न भयात् न लोभात्
      धर्म  त्यजेत  जीवितस्यापि  हेतोः।
धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये
      जीवो नित्यो हेतुर अस्य त्वनित्यः।।
अपनी किसी इच्छा की तृप्ति के लिए, भय से, लोभ से या प्राणों की रक्षा के विचार से भी धर्म को न छोड़ना चाहिए। धर्म नित्य है और सुख-दुख थोड़े समय के हैं। आत्मा नित्य है, शरीर नश्वर है।
भगवान, कृपा कर इस सूत्र पर कुछ कहें।

 सहजानंद,

बुधवार, 12 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-05

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

अब प्रेम के मंदिर हों—प्रवचन-पांचवां
दिनांक 05 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
प्रेम यदि मनुष्य का स्वभाव है, तो उसे सहज ही होना चाहिए। तब संत पलटू
क्यों कहते हैं कि सहज आसिकी नाहिं?

 प्रेमानंद,
प्रेम तो निश्चित ही स्वभाव है, स्वरूप है। हम उसे लेकर ही जन्मे हैं, हम उससे ही बने हैं। हमारा रोआं-रोआं, कण-कण, श्वास-श्वास, प्रेम के अतिरिक्त और किसी चीज से अनुप्राणित नहीं है। यह सारा अस्तित्व ही प्रेम का विस्तार है--या कहो परमात्मा का, क्योंकि प्रेम और परमात्मा एक ही सत्य के दो नाम हैं।
जीसस ने कहा है: परमात्मा प्रेम है। जब उन्होंने यह कहा, आज से दो हजार साल पहले, तब बात बड़ी क्रांति की थी, महाक्रांति की थी। जीसस के पहले किसी ने कभी यह बात कही न थी। वस्तुतः परमात्मा के संबंध में ठीक इससे विपरीत बातें बहुत बार कही गई थीं।

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-04

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

संन्यास यानी नया जन्म—प्रवचन-चौथा

दिनांक 04 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
गुरुरेव हरिः साक्षान्नान्य इत्यव्रबीच्छ्रुतिः।।
श्रुत्या यदुक्तं परमार्थमेतत्
      तत्संशयो नात्र ततः समस्तम्।
श्रुत्या विरोधे ने भवेत्प्रमाणं
      अवेदनर्थाय विना प्रमाणम्।।
श्रुति में कहा गया है कि गुरु ही साक्षात हरि हैं, कोई अन्य नहीं। श्रुति का कथन निस्संदेह परमार्थ रूप ही है। श्रुति का विरोधी होने पर कुछ भी प्रमाण नहीं है। जो अप्रमाण होगा वह अनर्थकारी होगा।
भगवान, ब्रह्मविद्या उपनिषद के इस सुभाषित की व्याख्या करने की कृपा करें।

 सत्यानंद,

सोमवार, 10 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-03

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

आत्म-श्रद्धा की कीमिया—प्रवचन-तीसरा
दिनांक 03 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
वर्षों से आप जो समझा रहे हैं और जो कुछ भी मैं समझ सका, उसे ही दूसरों को समझाने में मैंने अब तक समय बिताया। लेकिन पीछे मुड़ कर देखता हूं तो पाता हूं कि असल में वह सब तो खुद को ही समझाना था। भगवान, अब यह समझ ही बोझिल हुई जा रही है। अब इस समझ को ढोना नहीं, खोना चाहता हूं। अब पीना चाहता हूं परमात्मा को। अब जीना चाहता हूं भगवत्ता को। अब शिष्य की तरह नहीं, भगवान अब तो भक्त को ही स्वीकार करें।

अजित सरस्वती,

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-02

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो
सहज निर्मलता—प्रवचन-दूसरा
दिनांक 02 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
मुझे ज्ञान दें। आज भिक्षु बन कर आपकी शरण में हूं। क्या आप शरण आए को क्षमा नहीं करेंगे? आपकी शरण आकर ही मैं आज ज्ञान-दान मांग रही हूं। मेरी स्थिति उस कनक ऋषि की पुत्री की तरह है, जो निर्मल थी, जिसे कुछ भी पता न था; जैसा जिसने बताया, सिखाया, उसके हृदय पर लिख गया। क्या इसे मिटा नहीं सकते? आप कहते हैं, जिन्होंने बताया उन्हीं से पूछो। नहीं, मैं आज आपकी शरण हूं। आप ही तटस्थता की स्थिति का मार्ग-दर्शन कराएंगे। क्या निराश वापस जाऊं? नहीं, सिर्फ एक बार मुझे मार्ग-दर्शन कराएं। चाहे किसी भी धर्म की होऊं, आपके लिए तो सब समान हैं न?

 कृष्णा पंजाबी,

रविवार, 9 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-01

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो
यह प्रेम का मयखाना है—प्रवचन-पहला
दिनांक 01 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
संत पलटू ने सावधान किया है: सहज आसिकी नाहिं। समझाने की अनुकंपा करें कि यह आसिकी क्या है?

 योग मुक्ता,
आसिकी तो समझाई नहीं जा सकती; समझी जरूर जा सकती है।
प्रेम की कोई परिभाषा नहीं है। प्रेम स्वाद है। स्वाद की कोई परिभाषा करे तो कैसे करे? प्रेम अनुभव है। जीकर ही जाना जाता है। और यही खतरा है। इसलिए पलटू ने सावधान किया है। पहला कदम ही खतरनाक है; बिना जाने उतरना होता है।
मन तो उन चीजों में जाना चाहता है, जो परिचित हों, जानी-मानी हों, ज्ञात हों, जिनका गणित हमारे वश में हो। मन अज्ञात में जाने से डरता है; इसी किनारे को पकड़ रखना चाहता है, जोर से! पता नहीं दूसरा किनारा हो कि न हो! दिखाई भी तो नहीं पड़ता। दिखाई तो पड़ते हैं तूफान और आंधियां। दिखाई तो पड़ता है अनंत सागर का विस्तार। जहां तक आंखें जाती हैं दूर क्षितिज तक, सागर ही सागर। इस विराट सागर में इस छोटी-सी नौका को लेकर उतरना आसान तो काम नहीं है।

11 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा - (मनसा-मोहनी)

सुबह बच्‍चे ज़िद्द करने लगे की हम आज स्‍कूल नहीं जायेगे। मम्‍मी ने भी उनके साथ जबरदस्‍ती नहीं की शायद वह भी टोनी की मृत्‍यु के कारण दुःख से भरी हुई थी। टोनी की अंतिम विदाई की तैयारी होने लगी। पापा जी ने टोनी को एक कपड़े से लपेट कर उसे स्‍कूटर की जाली में रख दिया। इसी जाली में एक दिन वह बैठ कर कभी वह इस घर में आया था। इस जाली में लेट कर आज बिदा हो रहा था। सब बच्‍चे उसे बिदा करने जा रहे थे। मेरा भी मन कर रहा था मैं भी साथ जाऊं। मैं स्‍कूटर के पास खड़ा हो गया। पापा जी ने कहा पोनी तू भी चलेगा क्या आपने दोस्‍त को अंतिम विदाई देने के लिए। मैंने स्वीकृति में अपनी पूछ हिलाई। और फिर दीदी ने मुझे गोद में बिठा लिया। मैं बहुत ही प्रसन्न था। और कहीं अंतस में उदास भी था कि मृत्यु क्या है। ये शरीर जो अभी कल तक किस तरह से दौड़ता फिर रहा था। मेरे साथ खेलता खाता था और लड़ता था अचानक इस तरह से शांत थिर होकर कैसे लेट गया। क्या मुझे भी इसी तरह से लेटना होगा?

हम सब एक ही स्‍कूटर पर बैठ कर चल दिये। एक सर्कस की झांकी की तरह। आगे वरूण और हिमांशु भैया खड़े हो गये। फावड़ा पीछे बाध दिया। और तीन-चार नमक की थैलियां डिग्‍गी में डाल ली। मम्‍मी ने हमे दुकान से ही बिदा किया। हम जंगल के अंदर काफी दूर गहरे में निकल गये। पापा जी ने उस गहरे नाले को भी हमें बैठे—बिठाये पार कर लिया।

10 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा - (मनसा-मोहनी)

इस घटना के बाद निकू कभी कभार ही घर पर आता था। शायद दुकान पर ही आ कर वहीं से ही कुछ खा पी कर चला जाता होगा। ये मैं इसलिए जानता हूं कि पापा जी बच्चों को बता रहे थे कि निकू की हालत कुछ ठीक नहीं थी। ये सब पाप भी मेरे सर पर ही मंढ़ा जायेगा। न मैं ये खुराफात करता और न उस बेचारे की ये हालत होती। क्‍योंकि वह शायद समझ गया की अब मेरा इस घर से अधिकार खत्‍म हो गया। मैं बूढ़ा हो गया हूं क्या ये सब मेरे साथ भी होगा तब मैं कुछ डर गया था। पर जिस दवाई ने मेरे शरीर पर कुछ असर दिखाया था, उसी दवाई से भी उसके शरीर पर कोई असर नहीं हुआ। शायद मेरी भी यही हालत होती पर अभी मैं बच्‍चा था। मेरा शरीर अभी बलिष्‍ठ था। उस की प्रतिरोधक शक्‍ति थोड़ी अधिक थी। वह झेल गया। उस समय तक निकू का शरीर बूढ़ा हो गया था। जो उस ज़हरीले खरगोश के जहर को झेल नहीं पाया जिससे उसकी हालत इतनी खराब हो गई।

उसने भी इस पीड़ा को ज्‍यादा नहीं भोगा। कई बार दुखद सी घटना भी मन को कितनी राहत दे जाती है। एक गहरी उसांस के बाद चलो अच्छा ही हुआ। परंतु वह खरगोश इतना जहरीला था। इस खरगोश में इतना जहर कहां से आया। उसे अभी कुछ ही दिन पहले तो पापा जी लेकर आये थे।

09 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा - (मनसा-मोहनी)

सुबह उठकर जब मम्‍मी—पापा ने हमारी कारस्तानी देखी तो दंग रह गये। जहां देखो वहीं चारों और मिट्टी—मिट्टी का ढेर लगा था। पैरो से खोद—खोद कर फैंकने के कारण दूर आँगन तक भी मिटटी बिखरी हुई थी। हमने इतना गहरा गढ़ा खोद दिया था। दूसरी बात की उसे खोदते हुए हम दबे नहीं। यह हमारा सौभाग्‍य ही था। इतनी गहराई तक खोदने पर भी वो बड़-बड़े पत्थर ऐसे के ऐसे ही जमे हुए थे। खरगोश के बाल और खून यहां-वहां पर बिखरे हुए थे। बचे हुए खरगोश के अंग भी वहीं पड़े थे। सारा खरगोश हमसे नहीं खाया गया था। ये सब देख कर पापा जी ने मेरी और जब देखा तो वह तुरंत समझ गये कि ये कारस्‍तानी किस की हो सकती थी। उस समय पापा जी मुझे एक अलग ही अंदाज में देख रहे थे। मैं तुरंत समझ गया कि पापा जी को सब पता चल गया। अब बात छुपाने से कोई लाभ नहीं रहा। और मैं अपनी पूछ हिलाते हुए पापा जी के पास चल दिया।

मैंने आपने को सिकोड़ कर गोल मोल कर लिया और अपने कानों को भी दबोच कर उनके चरणों में लेट गया। पापा जी ने मेरी और देखा और समझ गये कि मैं बहुत बुरी तरह से डर गया हूं। सच पूछो तो मैं बहुत इतना डर गया था। कि मुझे अपने दिल की धड़कन खुद ही सुनाई दे रही थी। वो ऐसे धड़क रहा था जैसे किसी लोहार की धौंकनी हो या कि मैं मीलों दौड़ कर आया हूं।

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-10

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

मनुष्य बीज है भगवत्ता का—प्रवचन-दसवां

प्रश्न-सार:

1—शतपथ ब्राह्मण में एक प्रश्न है: को वेद मनुष्यस्य? मनुष्य को कौन जानता है?
क्या मनुष्य इतना जटिल और रहस्यपूर्ण है कि उसे कोई नहीं जान सकता है?

2—आप कितनी करुणावश बोल रहे हैं! उसे इस देश के लोग नहीं समझते और क्रुद्ध होते हैं। क्या आप इतना जोखिम लिए बगैर अपना कार्य नहीं संपन्न कर सकते?

3—आप अपनी बातों का आधार अक्सर महापुरुषों की निंदा क्यों बना लेते हैं? अच्छा होगा यदि आप अपनी बात विधायक रूप से हमारे सामने रखें।

4—आपने मेरी आंखें खोल दीं। आप अगर मुझ वृद्ध को स्वीकार लें, संन्यास में दीक्षा दें और समाधि का अनुभव कराएं, तो मैं इस धर्मशास्त्रों से भरी झोली को आज ही फेंक दूं। मेरी करबद्ध प्रार्थना है कि आप मुझे गरीबदास झोलीवाले का पुराना नाम न दें, मैं अब गरीबी और झोली दोनों से मुक्त होना चाहता हूं।

शनिवार, 8 जुलाई 2017

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-09

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

अनुशासन नहीं—स्वतंत्रता-प्रवचन-नौवां
प्रश्न-सार

1—अतीत के बुद्धों ने सोए हुए लोगों के लिए भी कुछ अनुशासन बताए, जो अब समय-बाह्य हो गए हैं। उनके लिए आप क्या अनुशासन देंगे?

2—अशनाया वै पात्मामतिः। अर्थात भूख ही सब पापों की जड़ है, वही बुद्धि को भ्रष्ट करती है।
एतरेय ब्राह्मण के इस सूत्र को समझने वाले लोग दरिद्रता को कब और क्यों आदर देने लगे?

पहला प्रश्न: भगवान,
हम सोए हुए लोगों के लिए आप प्रज्ञापुरुषों का शायद एक ही उदघोष है: बहुत सो चुके, जागो। लेकिन सभी तो एक साथ नहीं जाग सकते। मुश्किल से लाखों लोगों में कोई एक जागता है। इसलिए अतीत के बुद्धों ने सोए हुए लोगों के लिए भी कुछ अनुशासन बताए, जो अब समय-बाह्य हो गए हैं। उनके लिए आप क्या अनुशासन देंगे?

वसंत लाहिरी,

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-08

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

जीवन का शंखनाद—प्रवचन-आठवां
प्रश्न-सार

1—देवता परोक्ष से प्रेम करते हैं, प्रत्यक्ष से द्वेष।
गोपथ ब्राह्मण के इस सूत्र को खोलने की अनुकंपा करें।

2—आपके आश्रम में क्या एक नये प्रकार की वर्ण-व्यवस्था, एक नये प्रकार की आश्रम-व्यवस्था नहीं है? क्या आप महर्षि मनु की वैज्ञानिक व्यवस्था और आश्रम-व्यवस्था को गलत सिद्ध कर सकते हैं?

पहला प्रश्न: भगवान,
परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति, प्रत्यक्ष द्विषः।
देवता परोक्ष से प्रेम करते हैं, प्रत्यक्ष से द्वेष।
भगवान, गोपथ ब्राह्मण के इस सूत्र को खोलने की अनुकंपा करें।
प्रदीप भारती,

द्वेष का दिव्यता से कोई भी संबंध नहीं हो सकता। जहां द्वेष है, वहां दिव्यता नहीं।
राबिया-अल-अदाबिया के जीवन में यह प्यारा उल्लेख है। उसके घर एक फकीर, हसन, मेहमान था। राबिया की कुरान को सुबह-सुबह उठ कर पढ़ रहा था। देख कर चकित हुआ कि राबिया ने कुरान में कुछ वचन काट डाले थे। यह बात कोई मुसलमान कल्पना भी नहीं कर सकता। कुरान में सुधार, कुरान में तरमीम मुसलमान के लिए कल्पनातीत है। क्योंकि कुरान तो अंतिम परमात्मा का संदेश है, अब उसमें कोई सुधार कभी नहीं होगा।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-07

राम नाम जान्यो नहीं-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

धर्म-अधर्म के पार : कोरा आकाश—प्रवचन-सातवां

प्रश्न-सार-

1—आपने अपने संन्यासियों के लिए एक से एक सुंदर नाम चुने हैं। लेकिन पिछले दिन मैं एक नाम देख कर चकित रह गया--स्वामी वीत धर्म। क्या धर्म का भी अतिक्रमण करना है? यदि हां, तो कृपया बताएं कि उसके पार क्या है?

2—आप कहते हैं कि जगत सत्य है, जीवन सत्य है; उन्हें स्वीकार कर अहोभाव के साथ जीओ। लेकिन भौतिकवादी तो यही मान कर जी रहे हैं, लेकिन उनके जीवन में भी उत्सव कहां है?

3—आत्मा शरीर धारण करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है तो फिर अपंग, अंधे और लाचार बच्चों के पीड़ा से पूर्ण शरीर का चयन क्यों?