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मंगलवार, 18 जुलाई 2017
साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03
सोमवार, 17 जुलाई 2017
साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02
साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)--प्रवचन-01
रविवार, 16 जुलाई 2017
सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-10
सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-09
शुक्रवार, 14 जुलाई 2017
सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-08
गुरुवार, 13 जुलाई 2017
सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-07
सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-06
बुधवार, 12 जुलाई 2017
सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-05
मंगलवार, 11 जुलाई 2017
सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-04
सोमवार, 10 जुलाई 2017
सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-03
सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-02
रविवार, 9 जुलाई 2017
सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-01
11 - पोनी - एक कुत्ते की आत्म कथा - (मनसा-मोहनी)
सुबह बच्चे ज़िद्द करने लगे की हम आज स्कूल नहीं जायेगे। मम्मी ने भी उनके साथ जबरदस्ती नहीं की शायद वह भी टोनी की मृत्यु के कारण दुःख से भरी हुई थी। टोनी की अंतिम विदाई की तैयारी होने लगी। पापा जी ने टोनी को एक कपड़े से लपेट कर उसे स्कूटर की जाली में रख दिया। इसी जाली में एक दिन वह बैठ कर कभी वह इस घर में आया था। इस जाली में लेट कर आज बिदा हो रहा था। सब बच्चे उसे बिदा करने जा रहे थे। मेरा भी मन कर रहा था मैं भी साथ जाऊं। मैं स्कूटर के पास खड़ा हो गया। पापा जी ने कहा पोनी तू भी चलेगा क्या आपने दोस्त को अंतिम विदाई देने के लिए। मैंने स्वीकृति में अपनी पूछ हिलाई। और फिर दीदी ने मुझे गोद में बिठा लिया। मैं बहुत ही प्रसन्न था। और कहीं अंतस में उदास भी था कि मृत्यु क्या है। ये शरीर जो अभी कल तक किस तरह से दौड़ता फिर रहा था। मेरे साथ खेलता खाता था और लड़ता था अचानक इस तरह से शांत थिर होकर कैसे लेट गया। क्या मुझे भी इसी तरह से लेटना होगा?
हम सब एक ही स्कूटर पर बैठ कर चल दिये। एक सर्कस की झांकी की तरह। आगे वरूण और हिमांशु भैया खड़े हो गये। फावड़ा पीछे बाध दिया। और तीन-चार नमक की थैलियां डिग्गी में डाल ली। मम्मी ने हमे दुकान से ही बिदा किया। हम जंगल के अंदर काफी दूर गहरे में निकल गये। पापा जी ने उस गहरे नाले को भी हमें बैठे—बिठाये पार कर लिया।
10 - पोनी - एक कुत्ते की आत्म कथा - (मनसा-मोहनी)
इस घटना के बाद निकू कभी कभार ही घर पर आता था। शायद दुकान पर ही आ कर वहीं से ही कुछ खा पी कर चला जाता होगा। ये मैं इसलिए जानता हूं कि पापा जी बच्चों को बता रहे थे कि निकू की हालत कुछ ठीक नहीं थी। ये सब पाप भी मेरे सर पर ही मंढ़ा जायेगा। न मैं ये खुराफात करता और न उस बेचारे की ये हालत होती। क्योंकि वह शायद समझ गया की अब मेरा इस घर से अधिकार खत्म हो गया। मैं बूढ़ा हो गया हूं क्या ये सब मेरे साथ भी होगा तब मैं कुछ डर गया था। पर जिस दवाई ने मेरे शरीर पर कुछ असर दिखाया था, उसी दवाई से भी उसके शरीर पर कोई असर नहीं हुआ। शायद मेरी भी यही हालत होती पर अभी मैं बच्चा था। मेरा शरीर अभी बलिष्ठ था। उस की प्रतिरोधक शक्ति थोड़ी अधिक थी। वह झेल गया। उस समय तक निकू का शरीर बूढ़ा हो गया था। जो उस ज़हरीले खरगोश के जहर को झेल नहीं पाया जिससे उसकी हालत इतनी खराब हो गई।
उसने भी इस पीड़ा को ज्यादा नहीं भोगा। कई बार दुखद सी घटना भी मन को कितनी राहत दे जाती है। एक गहरी उसांस के बाद चलो अच्छा ही हुआ। परंतु वह खरगोश इतना जहरीला था। इस खरगोश में इतना जहर कहां से आया। उसे अभी कुछ ही दिन पहले तो पापा जी लेकर आये थे।
09 - पोनी - एक कुत्ते की आत्म कथा - (मनसा-मोहनी)
(खरगोश का खाना घातक)
सुबह उठकर जब मम्मी—पापा ने हमारी कारस्तानी देखी तो दंग रह गये। जहां देखो वहीं चारों और मिट्टी—मिट्टी का ढेर लगा था। पैरो से खोद—खोद कर फैंकने के कारण दूर आँगन तक भी मिटटी बिखरी हुई थी। हमने इतना गहरा गढ़ा खोद दिया था। दूसरी बात की उसे खोदते हुए हम दबे नहीं। यह हमारा सौभाग्य ही था। इतनी गहराई तक खोदने पर भी वो बड़-बड़े पत्थर ऐसे के ऐसे ही जमे हुए थे। खरगोश के बाल और खून यहां-वहां पर बिखरे हुए थे। बचे हुए खरगोश के अंग भी वहीं पड़े थे। सारा खरगोश हमसे नहीं खाया गया था। ये सब देख कर पापा जी ने मेरी और जब देखा तो वह तुरंत समझ गये कि ये कारस्तानी किस की हो सकती थी। उस समय पापा जी मुझे एक अलग ही अंदाज में देख रहे थे। मैं तुरंत समझ गया कि पापा जी को सब पता चल गया। अब बात छुपाने से कोई लाभ नहीं रहा। और मैं अपनी पूछ हिलाते हुए पापा जी के पास चल दिया।
मैंने आपने को सिकोड़ कर गोल मोल कर लिया और अपने कानों को भी दबोच कर उनके चरणों में लेट गया। पापा जी ने मेरी और देखा और समझ गये कि मैं बहुत बुरी तरह से डर गया हूं। सच पूछो तो मैं बहुत इतना डर गया था। कि मुझे अपने दिल की धड़कन खुद ही सुनाई दे रही थी। वो ऐसे धड़क रहा था जैसे किसी लोहार की धौंकनी हो या कि मैं मीलों दौड़ कर आया हूं।








