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शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--69

अनूठा अस्‍तित्‍व में—(प्रवचन—नौंवा)

दिनांक 9 जनवरी  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 
योग—सूत्र :

प्रत्ययस्य परिचित्‍तज्ञानम्।। 19।।
जो प्रतिछवि दूसरों के मन को घेरे रहती है, उसे संयम द्वारा जाना जा सकता है।

            न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्।। 20।।
लेकिन संयम द्वारा आया बोध उन मानसिक तथ्यों का ज्ञान नहीं करवा सकता जो कि दूसरे के मन की छवि—प्रतिछवि को आधार देते है, क्‍योंकि वह बात संयम की विषय—वस्‍तु नहीं होती है।

            कायरूपसंयमत्‍तद्ग्राह्मशक्‍तिस्‍तम्‍भे चक्षु: प्रकाशसंप्रयोगेउन्‍तर्धानम्।। 21।।
ग्राह्म—शक्‍ति को हटा देने के लिए, शरीर के स्‍वरूप पर संयम संपन्‍न करने से द्रष्‍टा की आँख और शरीर से उठती प्रकाश—किरणों के बीच संबंध टूट जाता है, और तब शरीर अदृश्‍य हो जाता है।

            एतन शब्‍दद्यन्‍तर्धानमुक्‍तम्।। 22।।
यही नियम शब्‍द के तिरोहित हो जाने की बात को भी स्‍पष्‍ट कर देता है।

दीया तले अंधेरा--(झेन--कथा) प्रवचन--20

'मैं' की मुक्ति नहीं, 'मैं' से मुक्ति—(प्रवचन—बीसवां)
दिनांक 10 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!

सदगुरु तोसोत्सु ने तीन रोधक (ईंततपमते) निर्मित किये। और उन्हें वे साधुओं से पार करवाते थे।
पहला रोधक: झेन का अध्ययन है। झेन के अध्ययन का उद्देश्य है, अपने ही सच्चे स्वभाव का दर्शन करना।
अब तुम्हारा सच्चा स्वभाव क्या है?
दूसरा: जब कोई अपने सच्चे स्वभाव को प्राप्त कर लेता है तब वह जन्म और मृत्यु से मुक्त हो जायेगा।
अब जब तुम प्रकाश को अपनी आंखों से छिपा लेते हो और एक लाश हो रहते हो, तब तुम अपने को कैसे मुक्त कर सकते हो?
तीसरा: यदि तुम अपने को जन्म और मृत्यु से मुक्त कर लेते हो, तो तुम्हें जानना चाहिये कि तुम कहां हो?
अब तुम्हारा शरीर चार तत्वों में अलग-अलग हो जाता है।
तुम कहां हो?

भगवान! इन झेन रोधकों को हमारे लिए स्पष्ट करने की अनुकंपा करें।

दीया तले अंधेरा--(झेन--कथा) प्रवचन--19

परिधि के विसर्जन से केंद्र में प्रवेश—(प्रवचन—उन्नीसवां)
दिनांक 9 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!

सदगुरु जोशु उस जगह पर गए जहां एक भिक्षु ध्यान कर रहा था। उन्होंने भिक्षु से पूछा, 'जो है, सो क्या है?' 'What is, is what?'
भिक्षु ने अपनी मुट्ठी उठाई।
जोशु ने उत्तर दिया, 'जहाज वहां नहीं रह सकते जहां पानी बहुत उथला हो।' और वे चले गए।
कुछ दिनों के बाद सदगुरु जोशु फिर उस भिक्षु के पास गए, और उन्होंने वही प्रश्न पूछा। भिक्षु ने पुराने ढंग से ही उत्तर दिया।
जोशु ने कहा, 'अच्छा दिया, अच्छा लिया, अच्छा मारा, अच्छा बचाया।' 'Well given, well taken, well Killed, well saved.’और उन्होंने भिक्षु को झुककर प्रणाम किया।

भगवान! इस झेन बोध-कथा का अभिप्राय समझाने की कृपा करें।

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

गीता दशर्न--(भाग--5) प्रवचन--130

धर्म है आश्‍चर्य की खोज—(प्रवचन—तीसरा)

अध्‍याय—11
सूत्र—

दिवि सूर्यसहसस्थ भवेह्यगफत्सिता।
यदि भा: सदृशी सा स्यादृभासस्तस्थ महात्मन:।। 12।।
तत्रैकस्थं जगकृत्‍स्‍नं प्रविभक्तमनेकधा।
अयश्यद्देवदेवस्थ शरीरे पाण्डवस्तदा।। 13।।
तत: छ विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजय:।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताज्जलिरभाषत।। 14।।

अर्जुन उवाच:

पश्यामि देवास्तव देव देहे सर्वास्तंथा भूतविशेषसंघान्।
ब्रह्माणमीश कमलासनस्थमृषीश्च सर्वागुरगांश्ब दिव्यान्।। 15।।
अनेकबाहूदरवक्तनेत्र यश्यामि त्वां सर्वतोउनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न गुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूय।। 16।।
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्य      समन्ताद्दीप्तानलार्कह्यतिमप्रमेयम्।। 17।।

और हे राजन् आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्‍न हुआ जो प्रकाश हो वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित ही होवे।

दीया तले अंधेरा--(सूफी--कथा) प्रवचन--18

समर्पित हृदय में ही सत्य का अवतरण—(प्रवचन—अठारहवां)
दिनांक 8 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!

सूफी सत्य के खोजी माने जाते हैं--उस सत्य के जो विषयगत हकीकत ९ठइरमबजपअम तमंसपजल० का ज्ञान होता है।      
एक अज्ञानी, लालची और प्रजापीड़क राजा ने निश्चय किया कि मैं इस सत्य को भी अपने अधिकार में ला कर रहूंगा। स्पेन के मुर्सिया नामक स्थान का स्वामी था वह और नाम था उसका रोडरिक। उसने यह भी तय किया कि तरागोना के सूफी उमर-अल-अलावी को यह सत्य बताने के लिए मजबूर किया जाये।
फलतः उमर को गिरफ्तार कर राज-दरबार में हाजिर किया गया। रोडरिक ने उनसे कहा, 'मैंने निर्णय किया है कि जो सत्य आप जानते हैं उसे आप मुझे उन शब्दों में बता देंगे जिन्हें मैं समझ सकूं। और यदि ऐसा नहीं हुआ तो आपको अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ेगा।'

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--68

नहीं और हां के गहनतम तल—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 8 जनवरी  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 
प्रश्‍नसार:
 1—क्‍या सार्त्र में झेन—चेतना है?

2. हरमन हेस के सिद्धार्थ ने बुद्ध से कहा : मुझे अपने ही ढंग से चलते जाना है—या मर जाना है। इस पर आप कुछ कहेंगे?

3—अगर कहीं कोई व्‍यक्‍ति रूप परमात्‍मा नहीं है, तो आप हर सुबह मेरे मनोविचारों का उत्‍तर क्‍यों देते है?

4—उस करीब—करीब योगी ह्रदय के विषय में आपके उत्‍तर न मुझे निम्‍नलिखित संवाद की याद दिला दी है:
पत्‍नी: प्रिय, जब से हमारा विवाह हुआ तुम मुझे ज्‍यादा प्‍यार करते हो या कम?
पति: ज्‍यादा या कम।

बुधवार, 21 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--129

दिव्‍य—चक्षु की पूर्व—भूमिका—(प्रवचन—दूसरा)

अध्‍याय—11
सार—सूत्र

            न तु मां शक्यसे द्रष्‍टुमनेनैव स्वच्रुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम।। 8।।

संजय उवाच:

श्वमुक्ला ततो राजन्यहायोगेश्वरो हरि:।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।। 9।।
अनेकवक्तनयनमनेकादूभुतदर्शनम्।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतामुधम्।। 10।।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धागुलेयनम्।
सर्वाश्चर्यमय देवमनन्तं विश्वतोमुखम्।। 11।।

परंतु मेरे को इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने को तू निःसंदेह समर्थ नहीं है इसी से मैं तेरे लिए दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूं, उससे तू मेरे प्रभाव को और योगशक्ति को देख।
संजय बोले हे राजन— महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान ने इस प्रकार कहकर उसके उपरांत अर्जुन के लिए परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्य स्वरूय दिखाया।
और उस अनेक मुख और नेत्रों से युक्त तथा अनेक अदभुत दर्शनों वाले एवं बहुत— से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत— से दिव्य शस्त्रों को हाथों में उठाए हुए तथा दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किए हुए और दिव्य गंध का अगुलेपन किए हुए एवं सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त सीमारहित विराटस्वरूय परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा।

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--128

विराट से साक्षात की तैयारी—(प्रवचन—पहला)

      श्रीमद्रभगवद्रगीता
अथ एकादशोउध्‍याय:

      अर्जुन उवाच:

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्।
यत्वयोक्तं वचस्तेन मोहोउयं विगतो मम।। 1।।
भवाध्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।
त्वत: कमलयत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्।। 2।।
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्ट्रमिच्छामि ते रूपमैश्वरं गुरुषोत्तम।। 3।।
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रछमिति प्रभो।
योगेश्वर ततो मे त्‍वं दर्शयात्मानमव्ययम्।। 4।।

श्रीभगवानुवान:

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोउथ सहस्रश:।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च।। 5।।

यश्यादित्यान्वसून्क्रद्रानश्विनौ मरूतस्तथा।
बहून्यदृष्टयूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत।। 6।।
ड़हैकस्थं जगत्कृत्‍स्‍नं पश्याद्य सचराचरम्।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्दष्ट्रमिच्छसि।। 7।।

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--67

उदासीन ब्रह्मांड में—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 7 जनवरी  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 
योग—सूत्र:

कमान्यत्वं परिणामन्‍यत्‍वे हेतु:।। 15।।
आधारभूत प्रक्रिया में छिपी अनेकरूपता द्वारा रूपांतरण में
कई रूपांतरण घटित होते हैं।

      परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।। 16।।
निराध, समाधि, एकाग्रता—इन तीन प्रकार के रूपांतरणों में
संयम उपलब्‍ध करने से—अतीत और भविष्य का ज्ञान उपलब्‍ध, होता है।

शब्‍दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्‍यासात्।। 17।।
शब्द और अर्थ और उसमें अंतर्निहित विचार, ये सब उलझाव पूर्ण स्‍थिति में,
मन में एक साथ चले आते है। शब्‍द पर संयम पा लेने से पृथकता घटित होती है
और तब किसी भी जीव द्वारा नि:सृत ध्‍वनियों के अर्थ का व्‍यापक बोध घटित होता है।

दीया तले अंधेरा--(सूफी--कथा) प्रवचन--17

अतियों से बचकर मध्य में जीना प्रज्ञा है—(प्रवचन—सत्रहवां)
दिनांक 7 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान !

महान सुलतान महमूद एक दिन अपनी राजधानी गजनी की सड़कों पर घूम रहे थे। उन्होंने देखा कि एक गरीब भारिक पीठ पर भारी पत्थर का बोझ लिये दम तोड़ रहा है। उसकी हालत से द्रवीभूत होकर महमूद ने शाही ढंग से हुक्म दिया,  'ओ भारिक, उस पत्थर को नीचे गिरा दे।'
तुरंत ही आज्ञा का पालन हुआ। पर पत्थर उस रास्ते पर राहगीरों की बाधा बन कर बहुत वर्षों पड़ा रहा। अंत में अनेक नागरिकों ने बादशाह से प्रार्थना की कि वे उस पत्थर के हटाये जाने का हुक्म निकालें। प्रशासकीय बुद्धि से विचार कर सुलतान ने कहा, 'जो हुक्म के द्वारा किया गया है, वह वैसे ही समान हुक्म से रद्द नहीं किया जा सकता। क्योंकि उससे लोग यही सोचेंगे कि शाही फरमान झक से प्रेरित होते हैं। पत्थर जहां है, वहीं रहेगा।'
नतीजा हुआ कि सुलतान महमूद के जीते जी वह पत्थर वहीं रहा। और जब वे मरे, तब भी शाही हुक्म के आदर के लिए उसे नहीं हटाया गया।

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--127

मंजिल है स्‍वयं में—(प्रवचन—पंद्रहवां)

गीता दर्शन--(भाग--5) 

अध्‍याय—10
सूत्र—
यच्चायि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्‍स्‍यान्मया भूतं चराचरम्।। 39।।
नान्तोउस्ति मम दिव्यानां विभूतीना परंतप।
एक् तूद्देशत: प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।। 40।।
यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ स्वं मम तेजोंउशसंभवम्।। 41।।
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टथ्याहमिदं कृत्नमेकांशेन स्थितो जगत।। 42।।

और हे अर्जुन जो सब भूतों की उत्पलि का कारण है वह भी मैं ही हूं क्योंकि ऐसा वह चर और अचर कोई भी भूत नहीं है कि जो मेरे से रहित होवे।
हे परंतप मेरी दिव्य विभूतियों का अंत नहीं है। यह तो मैने अपनी विभूतियों का विस्तार तेरे लिए संक्षेप से कहा है। इसलिए हे अर्जुन जो— जो भी विभूतियुक्त अर्थात

दीया तले अंधेरा--(झेन--कथा) प्रवचन--16

धर्म का मूल रहस्य स्वभाव में जीना है—(प्रवचन—सोलहवां)
दिनांक 6 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान!

सेहेई के शिष्य सुईबी ने एक दिन अपने गुरु से पूछा, 'गुरुदेव, धर्म का मूल रहस्य क्या है?'
सदगुरु ने कहा, 'प्रतीक्षा करो। और जब हम दोनों के अतिरिक्त यहां कोई भी नहीं होगा, तब मैं तुम्हें बताऊंगा।'
और फिर उस दिन बहुत बार ऐसे मौके आये जब कि वे दो ही झोपड़े में थे और हर बार सुईबी ने अपने प्रश्न भी दुहराये, लेकिन वह अपना प्रश्न पूरा भी नहीं कर पाता था, कि सेहेई अपने होठों पर उंगली रख कर उसे चुप होने को इशारा कर देते थे।
और फिर सांझ हो गई और सदगुरु का झोपड़ा बिलकुल खाली हो गया। शिष्य ने फिर पूछना चाहा, लेकिन फिर वही होठों पर रखी हुई उंगली उत्तर में मिली।
फिर रात उतर आयी और पूर्णिमा का चांद आकाश में ऊपर उठ आया।
सुईबी ने कहा, 'अब मैं और कब तक प्रतीक्षा करूं?'
तब सेहेई उसे लेकर झोपड़े के बाहर आ गये और उसके कानों में उन्होंने फुसफुसा कर कहा, 'बांसों के ये वृक्ष यहां लम्बे हैं और बांसों के ये वृक्ष यहां छोटे हैं। और जो जैसा है वैसा है--इसकी पूर्ण स्वीकृति ही स्वभाव में प्रतिष्ठा है। और स्वभाव धर्म है। और स्वभाव में जीना धर्म का मूल रहस्य है। शब्द में धर्म की अभिव्यक्ति है--तथाता ९एनबीदमे० और निःशब्द में उसकी अभिव्यक्ति है--शून्यता (विंपकदमे)।'

भगवान! इस झेन बोध-कथा को हमें विस्तार से समझाने की अनुकंपा करें!

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--66

तुम यहां से वहां नहीं पहुंच सकते—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 6 जनवरी  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 
प्रश्‍नसार:

1—मैं हमेशा एक ही जैसे प्रश्‍न बार—बार क्यों पूछती हूं?

2. मुझे आपके प्रवचनों में आज तक एक भी विरोधाभास नहीं मिला। क्या मुझमें कुछ गलत है?

 3—तुम यहां से वहां नहीं पहुंच सकते।

4—क्‍या स्वच्छ होने की प्रक्रिया मन की झलकी को नए रूप देगी?

5. मेरा शरीर रोगी है, मेरा मन भोगी है, और मेरा ह्रदय करीब—करीब योगी है। क्‍या मेरे इस जन्‍म में संबुद्ध होने की कोई संभावना है?

6 जब आप शरीर छोड़ें, तो मैं भी आपके साथ मर जाना चाहता हूं।

7—जब भी आपके निकट होता हूं तो तनाव महसूस करता हूं।

8—अनुग्रह प्रकट करने के लिए मैं आपके लिए क्‍या कर सकता हूं?

9—कृप्‍या संगीत और ध्‍यान के विषय में कुछ कहें।

10—आप कुर्सी पर इतने आराम से बैठे होते है कि एकदम भारविहीन मालूम पड़ते है।
आप गुरूत्‍वाकर्षण के नियम के साथ क्‍या करते है?

सोमवार, 19 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--126

परम गोपनीय—मौन—(प्रवचन—चौदहवा)

अध्‍याय—10
सूत्र—
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोउस्थि व्यवसायोउस्मि सत्त्वं सत्ववतामहम्।। 36।।
वृष्णीनां वासुदेवोउस्मि पाण्डवानां धनंजय:।
मुनीनामध्यहं व्यास: कवीनामुशना कवि:।। 37।।
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।। 38।।

हे अर्जुन मैं छल करने वालों में जुआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूं तथा मैं जीतने वालों का विजय हूं और निश्चय करने वालों का निश्चय एवं सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूं।
और वृष्णिवंशियों में वासुदेव अर्थात मैं स्वयं तुम्हारा सखा और पांडवों में धनंजय अर्थात तू एवं मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूं।
और दमन करने वालों का दंड अर्थात दमन करने की शक्ति हूं जीतने की ड़च्छा वालों की नीति हूं और गोपनीयों में अर्थात गुप्त रखने योग्य भावों में मौन हूं तथा ज्ञानवानों का तत्व— ज्ञान मैं ही हूं।

पतंजलि: याेगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--65

अस्‍तित्‍व के शून्‍यों का एकात्रीकरण—(प्रवचन—पांचवां)

दिनांक 5 जनवरी  1976 ओशो आश्रम पूूूूना। 
योग—सत्र:

 सर्वार्थतैकाग्रतयो: क्षयोदयौ चित्‍तस्‍य समाधिपारिणाम:।। ।।।।
समाधि परिणाम वह आंतरिक रूपांतरण है, जहां चित को तोड्ने वाली अशांत वृत्तियों का क्रमिक ठहराव आ जाता है और साथ ही साथ एकाग्रता उदित होती है।

 शांन्‍तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणाम:।। 12।।
एकाग्रता परिणाम वह एकाग्र रूपांतरण है, चित्त की ऐसी अवस्‍था है,
जहां चित का विचार—विषय जो कि शांत हो रहा होता है,
वह अगले ही क्षण ठीक वैसे ही विचार विषय द्वारा प्रतिस्‍थापित हो जाता है।

एतेन भूतेन्‍दियेषु धर्मलक्षणावस्‍थापरिणामा व्‍याख्‍याता:।। 13।।
जो कुछ अंतिम चार सूत्रों में कहा गया है, उसके द्वारा मूल—तत्‍वों और इंद्रियों की
विशिष्‍टताओं, उनके गुण—धर्म और उनकी अवस्‍थाओं के
रूपांतरणों की व्‍याख्‍या भी हो जाती है।