योग—सूत्र
:
प्रत्ययस्य
परिचित्तज्ञानम्।।
19।।
जो
प्रतिछवि
दूसरों के मन
को घेरे रहती
है, उसे संयम
द्वारा जाना
जा सकता है।
न च
तत्सालम्बनं
तस्याविषयीभूतत्वात्।।
20।।
लेकिन
संयम द्वारा
आया बोध उन
मानसिक
तथ्यों का
ज्ञान नहीं करवा
सकता जो कि
दूसरे के मन
की छवि—प्रतिछवि
को आधार देते
है, क्योंकि
वह बात संयम
की विषय—वस्तु
नहीं होती है।
कायरूपसंयमत्तद्ग्राह्मशक्तिस्तम्भे
चक्षु:
प्रकाशसंप्रयोगेउन्तर्धानम्।।
21।।
ग्राह्म—शक्ति
को हटा देने
के लिए, शरीर के स्वरूप
पर संयम संपन्न
करने से द्रष्टा
की आँख और
शरीर से उठती
प्रकाश—किरणों
के बीच संबंध
टूट जाता है, और तब शरीर
अदृश्य हो
जाता है।
एतन
शब्दद्यन्तर्धानमुक्तम्।।
22।।
यही
नियम शब्द के
तिरोहित हो
जाने की बात
को भी स्पष्ट
कर देता है।



