कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 19 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-10

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 10 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-दसवां-(प्रश्न-सार)

01—पिय को खोजन मैं चली, पिया मिलन कैसे हो?
02—कुछ दिनों से आप आंखों से पिलाते हैं, लेकिन मदहोश आंखें ढल जाती हैं। तत्क्षण अहोभाव में डूब जाता हूं और हृदय से पुकार उठती है:
गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊं,
दीजो ध्यान हरिगुन गाऊं।
मन तड़पत हरि-दर्शन को आज।
03—क्या मारवाड़ियों में कुछ प्रशंसाऱ्योग्य नहीं होता है?


पहला प्रश्न: भगवान!
पिय को खोजन मैं चली, पिया मिलन कैसे हो?

योग नीलम!
पिया दूर नहीं है। इतना भी दूर नहीं कि मिलन की भी जरूरत हो। सिर्फ विस्मरण हुआ है, विछोह नहीं। विछोह हो ही नहीं सकता। पिया तो भीतर विराजमान है। वही तो हमारी श्वासों की श्वास है। वही तो हमारे हृदय की धड़कन है। उसके बिना तो हमारा कोई होना नहीं है। वह है तो हम हैं। जैसे सागर है तो लहरें हैं। सागर तो बिना लहरों के हो सकता है, मगर लहरें बिना सागर के नहीं हो सकतीं।
लेकिन लहर को एक भ्रांति हो सकती है--इस बात की भ्रांति कि मैं सागर से पृथक हूं। बस उसी भ्रांति में विस्मरण हो जाता है। विस्मरण ही होता है, विछोह तो हो सकता नहीं।
उस प्यारे की सारी खोज स्मरण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है--पुनर्स्मरण। इसलिए संतों ने उसकी खोज का नाम दिया: सुरति।
सुरति का अर्थ होता है स्मरण, स्मृति। सुरति शब्द स्मृति का ही लोक-प्रचलित रूप है। बुद्ध ने जिसे स्मृति कहा है, वही आते-आते कबीर और नानक तक, सुरति हो गया। प्यारा हो गया, स्मृति से भी प्यारा हो गया। लोगों के हाथों में शब्द सौंदर्य ले लेते हैं। उनका इरछा-तिरछापन चला जाता है। उनकी व्याकरण खो जाती है। उनका काव्य प्रकट हो जाता है। स्मृति में व्याकरण है, भाषा की शुद्धि है; लेकिन वह गोलाई नहीं, वह सौंदर्य नहीं, जो सुरति में है। स्मृति में थोड़ी परुषता है, थोड़ी कठोरता है। सुरति में कोमलता है। लेकिन अर्थ वही है। उसका स्मरण भर करना है।
स्मरण में कौन सी चीज बाधा बन रही है?
सिवाय हमारे और कोई बाधा नहीं है। यह मैं-भाव एकमात्र बाधा है। एक क्षण को भी मैं को छोड़ कर देखो--और पिया मिला ही हुआ है! खोजने कहीं जाना नहीं है, इंच भर यात्रा नहीं करनी है। पलक नहीं झपनी है। एक क्षण गंवाने की जरूरत नहीं है। लेकिन एक चीज तो गंवानी ही होगी और वह है--मैं। और मैं को गंवाने में हर्ज कुछ भी नहीं है, क्योंकि मैं एक भ्रांति है, एक झूठ है।
इस जगत का सबसे बड़ा झूठ अहंकार है। और उसी झूठ में, उसी झूठ के धुएं में हम अपने सत्य को विस्मृत कर गए हैं। लोग खोजना तो चाहते हैं परमात्मा को, लोग प्रेम में भी डूबना चाहते हैं, मगर एक शर्त है उनकी और वह शर्त कोई भी पूरी नहीं कर सकता। वह शर्त यह है कि मैं मैं भी रहूं और पिया भी मिले। मैं भी रहूं और तू भी मिले।
और उनका तर्क भी मुझे समझ में आता है। बहुत बार बुद्ध से लोगों ने आकर यही प्रश्न पूछा है। स्वभावतः, क्योंकि बुद्ध कहते थे, तुम नहीं हो। बुद्ध ने जितनी प्रगाढ़ता से, जितनी सघनता से अहंकार पर चोट की है, मनुष्य-जाति के इतिहास में किसी ने भी नहीं की--न महावीर ने, न मोहम्मद ने, न मूसा ने, न क्राइस्ट ने, न कृष्ण ने, न कनफ्यूशियस ने। इन सबने कहा है अहंकार छोड़ना है, लेकिन इन सबने एक बात और कही कि तुम्हारे भीतर आत्मा है। और वहीं चूक हो गई। लोगों ने अहंकार छोड़ा ही नहीं, आत्मा के बहाने फिर बचा लिया। आत्मा का अर्थ भी तो यही होता है: मैं। बुद्ध ने चोट पूरी-पूरी की, रत्ती भर गुंजाइश नहीं छोड़ी। कहा, अहंकार छोड़ना है, क्योंकि अहंकार है ही नहीं।
लोग पूछते थे, आत्मा तो है न?
बुद्ध कहते, आत्मा भी नहीं है। क्योंकि मैं जानता हूं तुम्हारी चालबाजियां। मैं जानता हूं तुम्हारी चालाकियां। मैं जानता हूं तुम्हारी बेईमानियां। तुम धोखा देने में कुशल हो। आत्मा भी नहीं है। तुम हो ही नहीं--किसी अर्थ में नहीं, किसी आयाम में नहीं, किसी पहलू से नहीं। भीतर अनस्तित्व है, अनात्मा है, अनत्ता है।
लोग झिझकते, कंधे बिचकाते। वे कहते, तो फिर जब हम हैं ही नहीं, आत्मा भी नहीं है, तो सत्य को खोजें ही क्यों? उनका कहना यह था, जब मैं ही नहीं हूं तो फिर तू को खोजें क्यों? खोजेगा कौन? मिलेगा कौन? सार क्या है?
उनका तर्क भी समझने जैसा है। वही तर्क तुम्हारे सबके भीतर बैठा है। चेतन हो या अचेतन, स्पष्ट हो न हो स्पष्ट, साफ-साफ हो कि धुंधला-धुंधला हो, मगर सबके भीतर वह तर्क बैठा हुआ है। मन का वह तर्क मन को बचाने के लिए अपरिहार्य है--कि अगर मुझे ही मिट जाना है तो फिर प्यारे को पाकर भी क्या करूंगा? मन कहता है, तुम भी बचो और प्यारे को भी पाओ, तब मजा है। तभी तो मिलन का मजा है। यह क्या सुहागरात हुई कि या तो हम थे तो प्यारा न था और प्यारा था तो हम न थे!
मगर अस्तित्व तर्कों से नहीं चलता। अस्तित्व बड़ा अतक्र्य है, तर्कातीत है। और अस्तित्व जैसा है वैसा ही तुम्हें समझना होगा। तुम्हारे तर्कों की अपेक्षाएं पूरा करने के लिए अस्तित्व न कभी राजी हुआ है, न कभी राजी होगा। तुम्हें अपने तर्क ही छोड़ने पड़ेंगे। और तुम्हें अपने तर्क की बुनियादी भूल देखनी पड़ेगी। तुम्हारा तर्क तर्क नहीं है, तर्काभास है। लहर कहे कि जब तक मैं हूं तभी तक तो सागर से मिलने का मजा है--ऐसे ही तुम कह रहे हो। लहर जब तक अपने को अलग मानती है, पृथक मानती है, जब तक मैं-भाव है, तब तक सागर से मिलना हो नहीं सकता। मैं-भाव गिरे तो लहर सागर से मिली ही हुई है। मिलना भी नहीं होता, सदा से ही मिलन था।
बुद्ध को जब पहली बार ज्ञान हुआ तो वे हंसे और उन्होंने कहा, आश्चर्यों का आश्चर्य कि मैं जिसे खोजता था वह तो मुझे सदा से मिला हुआ था! एक क्षण को भी मैंने उसे गंवाया नहीं था! कैसा आश्चर्य कि जिसे मैंने कभी गंवाया नहीं था, जन्म-जन्म गंवाए उसे खोजने में! कभी भी लौट कर भीतर देख लेता, जरा पलट लेता अपनी नजरों को, तो तत्क्षण उसे पा लेता। दौड़ता रहा, दौड़ता रहा। कहां-कहां नहीं दौड़ा! क्या-क्या विधियां, क्या-क्या योग, क्या-क्या साधनाएं नहीं कीं!
योग नीलम, तू पूछती है: "पिया मिलन कैसे हो?'
कैसे का अर्थ है: विधि बताओ, मार्ग बताओ, साधना बताओ, पद्धति बताओ। विधि पूछने का अर्थ है कि कोई प्रक्रिया बताओ, कि उससे हम टूट गए हैं, कैसे जुड़ें!
और मैं कहना चाहता हूं कि तू टूटी ही नहीं। कोई भी नहीं टूटा है उससे। जैसे पत्ता टूट जाए वृक्ष से, बस मरना शुरू हो गया, सूखना शुरू हो गया; उसकी हरियाली गई, उसमें से रसधार खो गई। पत्ता वृक्ष से जुड़ा रहे तो अस्तित्व से जुड़ा है; शाखाओं से जुड़ा है नहीं, पृथ्वी से भी जुड़ा है, चांदत्तारों से भी जुड़ा है, सूरज से भी जुड़ा है। यहां सब चीजें जुड़ी हुई हैं। यह सारा अस्तित्व एक है--एक महासागर, जिसकी हम सब लहरें हैं।
मगर मनुष्य के साथ यह दुर्भाग्य घटित होना ही था। यह होना भी जरूरी था। शायद मनुष्य के विकास की प्रक्रिया का यह अनिवार्य चरण है कि उसको यह भ्रांति हो कि मैं टूटा हूं, कि उसको यह भ्रांति हो कि विछोह हो गया है। और फिर वह एक दिन इस भ्रांति को छोड़े। यह उसके विकास की प्रक्रिया का अंग है।
जीसस ने कहा है, संत फिर छोटे बच्चों की भांति हो जाते हैं।
कोई पूछे, पूछना चाहिए ही। जिससे जीसस ने यह कहा था--निकोडेमस से--वह एक बहुत प्रसिद्ध पंडित था, धर्मगुरु था। उसने तत्क्षण पूछा था कि अगर बच्चे जैसे होने से ही ईश्वर का मिलन है तो फिर सभी बच्चों को ईश्वर क्यों नहीं मिल जाता?
जीसस ने कहा, तुमने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया। मैंने कहा--जो बच्चों जैसा है। मैंने यह नहीं कहा कि जो बच्चा है। बच्चों जैसा--अर्थात जो बच्चा नहीं भी है और बच्चा है भी। यूं तो बच्चा नहीं है। यूं तो बचपन पार कर आया। बचकाना नहीं है।
लेकिन बचकाने न होने के लिए किस प्रक्रिया से गुजरना होता है? बच्चे को बचपन छोड़ना पड़ता है, बचपन का सारा आश्चर्य-बोध, सरलता, निर्दोषता, पवित्रता, सब छोड़ देनी पड़ती है। वह निश्छलता, वह शुभ्रता, सब खो जाती है। सब तरह की चालबाजियां, सब तरह की राजनीतियां, सब तरह की कूटनीतियां उसे सीखनी पड़ती हैं। खूब दूर निकल जाता है अपने से।
लेकिन जितने दूर जाता है उतनी पीड़ा पाता है। जितने दूर जाता है उतना कुम्हलाता है। जितने दूर जाता है उतने फूल नहीं खिलते। जितने दूर जाता है उतना जीवन निष्फल, निरर्थक मालूम होता है। तब एक दिन इस बात की स्मृति सघन होनी शुरू होती है कि यह मैंने क्या कर लिया! यह मैंने कैसा आत्मघात किया! यह कैसे मैंने अपने को अपने हाथों से नष्ट किया! अब लौट चलूं। अब अपने घर लौट चलूं। अब वापस लौट चलूं उस दुनिया में, जहां मैं पहले ही से था। वही बचपन, जब समुद्र के तट पर शंख और सीपियां बीनता था, रंगीन पत्थर बीनता था--और लगता था यूं कि हीरे-जवाहरात बीन लिए! वही बचपन, जब कि फूलों को बटोरता था--और लगता था यूं कि अपनी झोली में तारे भर लिए! वही बचपन, वही सरलता के दिन। न कोई उलझन थी, न सुलझाने का कोई सवाल था। न कोई समस्या थी, न समाधान की कोई आकांक्षा थी। आश्चर्य-विमुग्ध कर देती थी हर चीज। छोटी से छोटी चीज अवाक कर देती थी, रहस्य से भर देती थी। लौट चलूं!
और यह वापसी की यात्रा शुरू होती है। फिर से बचपन मिलता है संत को। संत वही है जिसने दुबारा बचपन को पा लिया। मगर दुबारा--याद रखना, उसे भूलना मत।
पहला बचपन तो गंवाना ही होगा, क्योंकि पहला बचपन अचेतन है। पहला बचपन अबोध है। यह तो खोकर ही पता चलता है कि क्या खो दिया। और पुनः पाओगे तो आनंद का अनुभव होगा। जैसे मछली को कोई सागर से खींच ले। फेंके जाल, फांस ले। डाल दे रेत पर, तपती हुई रेत पर, आग बरसती हुई हो दुपहरी की, सूरज आग का गोला हो और रेत यूं जलती हो कि मछली तड़पे--तब जानेगी पहली बार कि सागर का आनंद क्या था! तब पहचानेगी पहली बार कि अरे जिसमें मैं थी वही मेरा घर था, वही मेरा सागर था!
सागर में थी तो सोचा होगा बहुत बार कि सागर कहां है? सुना तो बहुत है। बुजुर्गों से सुना है, कहानियां सुनी हैं, शास्त्रों में लिखा है। सागर की बड़ी चर्चा है। सागर के आनंद के बड़े उल्लेख हैं। सागर के संबंध में महाकाव्य लिखे गए हैं। जिन्होंने सागर को जान लिया उन्हें बुद्ध कहा गया है, जिन कहा गया है। वह सागर कहां है?
मछली को पता नहीं चल सकता, क्योंकि मछली सागर में ही पैदा हुई। पता चलने के लिए थोड़ी सी दूरी चाहिए, थोड़ा फासला चाहिए।
तुम्हें दर्पण में अपनी तस्वीर देखनी हो तो थोड़ा फासला चाहिए। अगर बिलकुल दर्पण से मुंह लगा कर खड़े हो जाओ तो कुछ भी दिखाई न पड़ेगा, अपनी तस्वीर भी न दिखाई पड़ेगी।
मछली जब रेत पर तड़पेगी तब उसे दिखाई पड़ जाएगा, अनुभव में आ जाएगा। अब अगर सरक कर वह किसी तरह वापस सागर में गिर जाए तो एक अर्थ में तो यह वही मछली है और दूसरे अर्थ में वही नहीं। पहली मछली अबोध थी, दूसरी मछली बुद्धत्व को उपलब्ध हो गई।
बस इतना ही भेद है तुममें और बुद्धों में। तुम भी वहीं हो जहां बुद्ध हैं।
योग नीलम, तू भी वहीं है जहां मैं हूं। तू भी वहीं है जहां कृष्ण हैं। तू भी वहीं है जहां बुद्ध हैं। जरा भी भेद नहीं है। मगर तुझे विस्मरण है, उन्हें स्मरण आ गया है। प्रत्येक बच्चा वहीं है जहां जगत के श्रेष्ठतम ऋषियों ने प्रवेश पाया है। मगर बच्चों को खोना होगा। यह मंदिर उन्हें खोना होगा। उन्हें भटकना होगा बाजारों में। उन्हें झेलनी होगी धूपत्ताप जीवन की--कष्ट, पीड़ाएं, कंटकाकीर्ण मार्ग--और तब उन्हें याद आएगी। और तब उन्हें पीड़ा सताएगी। और तब वापसी संभव हो पाएगी। जब दुबारा ये वापस अपने मंदिर में आएंगे तो पहली बार अनुभव होगा कि हम कितनी बड़ी संपदा के मालिक थे और उसको यूं ही छोड़ कर चल दिए थे! पीछे लौट कर भी नहीं देखा था।
तू पूछती है: "पिय को खोजन मैं चली...।'
खोजने हम सब चले हैं, मगर खोजने के पहले अपने को खोने की तैयारी करनी होगी। अपने को हमने पा लिया है; अपने को बना लिया है कहना चाहिए। एक अपनी कल्पना बना ली है। हम हैं क्या--सिवाय एक कल्पना के, एक आभास के? नाम भी झूठ है; रूप भी झूठ है। प्रतिपल सब बदल रहा है, बहाव है। तुम्हारे भीतर सच क्या है?
पहले क्षण, जब मां के पेट में गर्भ रहता है, अगर उसकी तस्वीर तुम्हें दिखाई जाए तो तुम पहचान भी न सकोगे कि यह दशा कभी तुम्हारी थी। खाली नंगी आंखों से तो उसे देखा भी नहीं जा सकता। उसके लिए खुर्दबीन चाहिए पड़ेगी। खुर्दबीन से देखोगे तो जरा सा एक बिंदु, एक जीवकोष्ठ। तुमसे उसकी शक्ल मिलेगी नहीं, जरा भी नहीं मिलेगी। न नाक है, न नक्शा है, कुछ भी नहीं है। मगर तुम थे वही। फिर रोज-रोज तुम बड़े हुए।
वैज्ञानिक कहते हैं कि नौ महीने में मां के पेट में बच्चा, मनुष्य-जाति ने जो अनंत काल में विकास किया है, उन सारी सीढ़ियों को पार करता है। जीवन सबसे पहले सागर में पैदा हुआ होगा, तो बच्चा पहले मछली की तरह होता है। अगर वह तस्वीर तुम्हारे सामने हो--तुम्हारी ही तस्वीर--तो तुम पहचान न सकोगे कि यह मैं हूं। तुम कहोगे, है किसी मछली की तस्वीर। मेरी? असंभव! मुझसे न नाक-नक्शा मिलता है, न रूप-रंग मिलता है।
फिर धीरे-धीरे बच्चा विकसित होता है। वह सारी सीढ़ियों से गुजरता है, तेजी से गुजरता है। जो मनुष्य-जाति ने हजारों साल में पूरी की है यात्रा, वह बच्चा नौ महीने में पूरी करता है। एक दिन तुम बिलकुल लंगूर की तरह मालूम पड़ोगे, बंदर की तरह। पहचान में ही न आओगे। अपने को ही पहचान में न आओगे। मगर तुम एक दिन वही थे।
अगर तुम जिस दिन पैदा हुए थे, उस दिन की तस्वीर तुम्हारे सामने रख दी जाए, क्या तुम अपने को पहचान सकोगे? असंभव! बिलकुल असंभव!
रोज बदलाहट हो रही है। यह शरीर तो रोज पानी के बहाव की तरह बह रहा है। यह तुम नहीं हो। और मन तो और भी तेजी से बहता है। शरीर को बहने में तो थोड़ी देर भी लगती है, मन तो बिलकुल ही हवा की गति से बहता है। शायद और भी तेज उसकी गति है। इन सबके भीतर थिर क्या है? उस थिर को समझ लो, तो पिया मिल गया। इन सबके भीतर शाश्वत क्या है? अमृत क्या है? उस अमृत को पहचान लो, पी लो, तो पिया मिल गया। इन सबके भीतर सिर्फ साक्षी-भाव, सिर्फ द्रष्टा-भाव मात्र शाश्वत है, शेष सब बदल जाता है। शेष सबका कोई मूल्य नहीं है।
ध्यान उसी साक्षी-भाव की तुम्हें स्मृति दिलाता है। ध्यान तुम्हें नया कुछ भी नहीं देता, तुम्हारा पुराना बचपन तुम्हें वापस लौटा देता है। जो तुमने कभी खोया नहीं वही तुम्हें दे देता है।
इसलिए मैं कहता हूं कि मैं तुम्हें वही दूंगा जो तुम्हारे पास है ही; और तुमसे वही छीन लूंगा जो तुम्हारे पास कभी था ही नहीं। मेरी बात तुम्हें बड़ी उलटबांसी जैसी लगेगी। मगर जरा भी उलटबांसी नहीं है; सीधी-साफ है; दो और दो चार जैसी साफ है। मैं फिर दोहरा दूं: मैं तुमसे वही छीन लूंगा जो तुम्हारे पास है ही नहीं--तुम्हारा अहंकार, जो कि सरासर झूठ है। और तुम्हें वही दे दूंगा जो तुमने कभी खोया ही नहीं, एक क्षण को नहीं खोया--तुम्हारा पिया, तुम्हारा परमात्मा।
ध्यान तो केवल स्मरण की एक प्रक्रिया है। जिसे हम भूल गए हैं उसको याद कर लेना है। यह जैसे भी याद आ जाए, जिस विधि से याद आ जाए, वे सब विधियां बहाने हैं। किसको किस ढंग से याद आएगा, कहना कठिन है।
एक मनोवैज्ञानिक के पास एक आदमी गया। दर्शनशास्त्र का बड़ा प्रसिद्ध प्रोफेसर था। उसने जाकर मनोवैज्ञानिक को कहा कि मेरी एक अड़चन है, मैं हर बात भूल जाता हूं। यहां तक कि कभी-कभी मैं अपना नाम भी भूल जाता हूं। मुझे लोगों से पूछना पड़ता है कि मैं कौन हूं? तो लोग हंसते हैं। सच तो यह है कि मैं अपने खीसे में सदा अपने नाम का कार्ड रखता हूं जिसको निकाल कर मैं देख लेता हूं कि मैं कौन हूं। फिर कार्ड वापस रख लेता हूं। एक दिन भूल से किसी और का कार्ड मेरे खीसे में पड़ गया तो मैं बड़ी मुश्किल में पड़ा, बड़ी झंझटों में आया। कहीं-कहीं मुझे याद भी पड़े कि यह मैं नहीं हूं, मगर वह कार्ड साफ कह रहा है कि यही मैं हूं। आज मेरी पत्नी ने मुझे बहुत समझा-बुझा कर भेजा है। आज बात जरा बहुत ही बिगड़ गई, क्योंकि जब मैं घर से विदा हो रहा था तो पत्नी की जगह मैंने नौकरानी का तो चुंबन ले लिया और पत्नी से पूछा कि सब ठीक-ठाक है न? तनख्वाह से तो प्रसन्न है न? पत्नी ने कहा, अब बात बहुत हो गई, अब बहुत बिगड़ गई बात। अब तुम्हें मनोवैज्ञानिक के यहां जाना ही पड़ेगा, इलाज करवाना ही पड़ेगा। सो मैं आया हूं।
मनोवैज्ञानिक ने पूछा, यह बीमारी आपको कब से है?
उसे प्रोफेसर ने चौंक कर देखा, बोला, कौन सी बीमारी? कैसी बीमारी? क्या बातें कर रहे हो जी? होश में आओ!
तब मनोवैज्ञानिक समझा कि मामला तो बहुत बिगड़ा हुआ है, हद से ज्यादा बिगड़ा हुआ है। यह अभी-अभी अपनी बीमारी बता रहा है, वह भी भूल गया! थोड़ी देर सन्नाटा रहा, न मनोवैज्ञानिक को सूझे कि अब क्या कहना। फिर प्रोफेसर को थोड़ी सी याद आई, किसलिए आया था। अपना कार्ड निकाल कर देखा, तब याद आया, कार्ड पर पत्नी ने लिख दिया था कि तुम इसलिए जा रहे हो। तो उसने कहा, अब याद आया कि मैं भूल-भूल जाता हूं चीजों को, तो मैं क्या करूं?
मनोवैज्ञानिक ने कहा, और कुछ करना न करना, पहले मेरी फीस चुका दो। तुम आदमी भरोसे के नहीं हो। जब तुम अपनी बीमारी भूल जाते हो, कल तुम मुझे ही नहीं पहचानोगे। कल तुम कहने लगोगे--कैसी फीस! काहे की फीस! पहले फीस चुका दो, फिर आगे इलाज।
अक्सर यूं हो जाता है। दार्शनिकों के संबंध में बहुत कथाएं हैं भूल जाने की। आकस्मिक नहीं हो सकती हैं, कारण वहां हैं। दार्शनिक बड़ी ऊंची बातों में उलझे रहते हैं, मन का बड़ा जाल बुनते हैं। जैसे कि मकड़ी जाला बुनती है, ऐसा दार्शनिक विचारों के जाल बुनते हैं। सुंदर-सुंदर जाल! मकड़ी के जाले भी सुंदर होते हैं। मगर मकड़ियां तो मक्खियों को पकड़ती हैं जालों में, मच्छरों को पकड़ती हैं। दार्शनिक खुद फंस जाते हैं। ऐसे जाल बुन लेते हैं कि भूल ही जाते हैं--अब निकलना कहां से। व्यूह तो रच लेते हैं, लेकिन निकलने का रास्ता भूल जाते हैं।
बहुत बड़े विचारक इमेनुअल कांट के संबंध में तो बहुत कहानियां हैं। एक दिन रात घर लौटा घूम कर, सो अपने हाथ की छड़ी को तो बिस्तर पर लिटा दिया और खुद, जहां छड़ी को टिकाना था कमरे के कोने में, वहां टिक कर खड़ा हो गया। थोड़ा-थोड़ा सोच में भी आए कि कुछ न कुछ गड़बड़ मालूम होती है। मतलब आराम नहीं मालूम हो रहा, जैसा रोज मालूम होता था। बात क्या है! यूं सब ठीक-ठाक हुआ है। और बिजली भी जल रही है! तभी नौकर ने देखा कि बिजली जली हुई है, तो उसने झांक कर खिड़की से देखा। तो देखा कि मालिक तो कोने में खड़े हैं टिके हुए और उनकी छड़ी बिस्तर पर आराम कर रही है--कंबल ओढ़े हुए, तकिए पर सिर है! उसने कहा, मालिक, भूल-चूक हो रही है। आपने चीजें गलत जगह रख दी हैं। अपने को बिस्तर पर रखिए और छड़ी को कोने में रखिए। उसने कहा, ठीक याद दिलाया। वही मैं सोच रहा हूं थोड़ी देर से कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है। यूं सब मैंने व्यवस्थित किया है, मगर कहीं चूक हुई है।
यह जो इमेनुअल कांट है, नौकर के साथ ही जीया। क्योंकि एक महिला ने इससे प्रार्थना की थी शादी की, वह भूल ही गया। तीन साल बाद उसे याद आई, जब अपनी नोट-बुक देख रहा था, जिसमें उसने नोट कर रखा था कि इस महिला ने शादी की प्रार्थना की है। अरे उसने कहा कि...! भागा हुआ उसके घर पहुंचा, दरवाजा खटखटाया।
उसके पिता ने द्वार खोला और पूछा, कहिए महानुभाव, कैसे आगमन हुआ?
तो उसने कहा कि आपकी लड़की ने मुझसे विवाह का निवेदन किया था। मैं कहने आया हूं कि मैं राजी हूं।
उन्होंने कहा, जरा देर हो गई। अब तो लड़की के दो बच्चे भी हैं, उसकी शादी भी हो गई। कब कहा था उसने आपसे?
उसने जल्दी से अपनी नोट-बुक निकाली, तारीख बताई। तीन साल बीत चुके थे। फिर शादी कभी हुई नहीं। अच्छा ही हुआ कि एक महिला उपद्रव से बची।
यह नौकर पर इतना निर्भर हो गया था इमेनुअल कांट, क्योंकि नौकर को ही सब याद रखना पड़ता था--कब चाय पीनी, कब भोजन करना, कब सोना, कब युनिवर्सिटी जाना, कब युनिवर्सिटी से घर आना। नौकर चौबीस घंटे छाया की तरह उसके पीछे लगा रहता था। इस पर यह इतना निर्भर हो गया था कि नौकर जितनी तनख्वाह मांगता उतनी देनी पड़ती। नहीं तो वह धमकी देता कि मैं जा रहा हूं। उसके बिना तो एक दिन नहीं रह सकता था। उसके बिना तो एक इंच नहीं चल सकता था। उसके बिना तो कोई उपाय ही नहीं था।
और ऐसा इमेनुअल कांट के संबंध में ही नहीं है, ऐसी स्थिति बहुत से दार्शनिकों के संबंध में रही है। उसका कारण? विचारों में खो गए, बहुत विचारों में खो गए। इतने ज्यादा विचारों में खो गए कि द्रष्टा का खयाल ही न रहा। दर्शन में इतने खो गए कि द्रष्टा का खयाल ही न रहा। अपने को भूल ही गए।
हम सब भी छोटे-मोटे दार्शनिक हैं। इमेनुअल कांट जैसे बड़े न भी हों, उतने बड़े जाले बनाना न भी जानते हों; मगर हम सबके भी छोटे-छोटे जाले हैं। हम सबने भी अपने जाले बुन रखे हैं। हम सबके भी छोटे-छोटे शास्त्र हैं। हम सबकी भी धारणाएं हैं। ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है, जिसकी अपनी कोई दार्शनिक धारणा न हो। सही हो, गलत हो, यह और बात है। यूं तो यह है कि सभी धारणाएं गलत होती हैं, और सभी दर्शनशास्त्र गलत होते हैं। द्रष्टा होना एकमात्र सत्य है, बाकी तो सब सपने का जाल है। तुम्हारे भीतर न तो शरीर सत्य है, न मन सत्य है। तुम्हारे भीतर इन दोनों को देखने वाला सत्य है। उसकी जिस विधि से याद आ जाए...।
अलग-अलग विधियां उपयोग की गई हैं, वे सब विधियां मात्र स्मृति के कृत्रिम उपाय हैं। कैसे यह घटना घटेगी, कहा नहीं जा सकता। क्योंकि अलग-अलग लोगों को अलग-अलग तरह से घटी है। मगर इतना जरूर कहा जा सकता है कि जब भी यह घटना घटी है तब किसी न किसी बहाने द्रष्टा में ठहरना हो गया है। चाहे सुबह सूरज को ऊगते देख कर तुम्हारे भीतर विचार शांत हो जाएं। जरूर किसी को कभी न कभी सूरज को ऊगते देख कर विचार शांत हो गए होंगे और तभी से सूर्य-नमस्कार चला होगा। तभी से हजारों लोग सूरज को जलधार अर्पण करते हैं। मगर वह उपचार कृत्रिम है। उनको कुछ पता नहीं--क्यों ऐसा कर रहे हैं। सूरज को झुक कर नमस्कार करते हैं। जरूर किसी को चांद को देख कर भीतर सन्नाटा छा गया होगा। तो इसलाम चांद से ही अपने महीनों की गणना करता है। जरूर पीछे खोदने पर कोई व्यक्ति मिलेगा, जिसने चांद को देख कर ही जीवन की संपदा पा ली। मगर ये सब बहाने मात्र हैं।
बुद्ध को तो ज्ञान हुआ था सुबह का आखिरी तारा डूबते देख कर। अब भी चीन, कोरिया, जापान और बौद्ध देशों में सुबह का आखिरी तारा डूबते देखने की धारणा प्रचलित है। लाखों लोग देखते हैं और सोचते हैं कुछ हो जाएगा। मगर कुछ होता नहीं। ये कोई विधियां नहीं हैं। यह कोई विज्ञान नहीं है। ये सांयोगिक घटनाएं हैं। बुद्ध शांत थे, मौन थे। आकाश को देखते थे। आकाश और उनके बीच में कोई विचारों का जाल नहीं था। यह तो संयोग की बात थी कि उस समय आखिरी तारा डूब रहा था। उस आखिरी तारे के डूबने से कोई कार्य-कारण का संबंध नहीं है। इसलिए हजारों विधियां हो सकती हैं ध्यान की, क्योंकि अलग-अलग लोगों को अलग-अलग तरह से...।
जैसे तुमने सुना होगा बाल्मीकि के संबंध में, कि नारद ने तो कहा था बाल्मीकि को कि तू राम-राम जपना; मगर बाल्मीकि था अपढ़, वह भूल गया। और यूं भी अगर तुम तेजी से राम-राम, राम-राम, राम-राम जपोगे, तो थोड़ी देर बाद तय करना मुश्किल हो जाएगा कि तुम राम-राम जप रहे हो कि मरा-मरा जप रहे हो। अगर दो राम के बीच में जगह नहीं छोड़ी, जैसे कि कोई एक ही लकीर में राम-राम राम-राम लिखता रहे, तो फिर कोई उसको मरा-मरा भी पढ़ सकता है और राम-राम भी पढ़ सकता है। वैसी ही घटना बाल्मीकि को घट गई। बेपढ़ा-लिखा आदमी था, वह भूल ही गया राम-राम। वह धीरे-धीरे मरा-मरा-मरा-मरा जपने लगा। मगर यूं ही उसे परम प्राप्ति हो गई।
अब कुछ मरा शब्द में मंत्र नहीं है, न राम शब्द में मंत्र है, खयाल रखना। अगर राम शब्द में ही मंत्र होता तो बाल्मीकि को उपलब्धि नहीं हो सकती थी। बाल्मीकि को तो मरा जपते-जपते उपलब्धि हो गई। मगर वह तन्मयता, वह तल्लीनता, वह समग्रता किस तरह हो जाए, यह सवाल है।
अंग्रेजी का प्रसिद्ध कवि टेनिसन कहता था, मैं तो अपना ही नाम पांच बार दोहरा देता हूं और एकदम सन्नाटा छा जाता है।
बचपन में टेनिसन के पिता ने उसको कहा था कि कभी क्रोध नहीं करना मेरे सामने। मैं नहीं चाहता कि तुम जीवन में क्रोध सीखो। मैं बहुत क्रोध में जला हूं और मैंने बहुत दुख पाया है। तो उसने पूछा कि मैं क्या करूं अगर क्रोध आ जाए? तो टेनिसन के पिता ने कहा कि स्मरण रखना।
कैसे स्मरण रखूंगा?
तो उसके पिता ने कहा कि तू यूं स्मरण रखना कि अगर क्रोध की कोई स्थिति आ जाए तो अपने भीतर ही कहना: टेनिसन, सावधान! टेनिसन, सावधान! इससे तुझे स्मृति आ जाएगी।
तो यह उसे अभ्यास हो गया। पिता के साथ ही नहीं, जब भी पिता कुछ कहता उसको, उसको क्रोध आ जाता, तो वह कहता: टेनिसन, सावधान! मन में ही कहता। फिर तो उसे आनंद आने लगा। आनंद इसलिए आने लगा कि जब भी वह यह कहता--"टेनिसन, सावधान!' क्रोध तिरोहित हो जाता। जैसे आया ही नहीं, पता ही नहीं चला कहां गया! फिर तो दूसरों के साथ भी प्रयोग करने लगा। छोटे बच्चों में एक अन्वेषण की वृत्ति होती है। किसी ने गाली दी, और वह भीतर कहता, टेनिसन, सावधान! और गाली यूं जैसे आई, नहीं आई; दी, नहीं दी। उसे तो बड़ा सुख अनुभव होता कि मेरे हाथ में एक कुंजी लग गई। फिर तो सावधान कहने की भी जरूरत न रही, बस इतना ही कहना काफी था--टेनिसन! फिर तो उसे एक सूत्र और हाथ लग गया कि जब भी वह टेनिसन कहता है अपने भीतर तो एक अपूर्व शांति अनुभव होती है।
तो रात अगर कभी नींद न आए तो वह तीन-चार बार कहे--टेनिसन, टेनिसन, टेनिसन! और एकदम नींद आ जाए। कितना ही मन तनावग्रस्त हो, वह टेनिसन कहे और मन का तनाव खो जाए। सूत्र हाथ लग गया। जीवन भर वह इसका अभ्यास करता रहा। यही उसका महामंत्र था। अपना ही नाम, राम का नाम भी नहीं, परमात्मा का भी नाम नहीं, कोई हरिभजन भी नहीं किया--और यूं ही उसने अपने द्रष्टा को धीरे-धीरे-धीरे-धीरे उघाड़ लिया।
तू पूछती है: "पिया मिलन कैसे हो?'
मैं सिर्फ इशारे दे सकता हूं। कोई बंधी हुई विधि देना ठीक भी नहीं है, क्योंकि पता नहीं विधि तेरे काम पड़े न पड़े, तुझे रास आए न आए। व्यक्ति-व्यक्ति अलग हैं। लेकिन इशारे काम पड़ जाएंगे। फिर विधि तू खोज लेना।
मीरा को तो कृष्ण पर ही टकटकी बंध गई और उसी से उपलब्धि हो गई। महावीर हंसते। मान ही नहीं सकते थे कि यह हो सकता है, क्योंकि महावीर को ऐसी कोई घटना नहीं घटी थी। महावीर को तो समस्त विचार छोड़ कर निर्विचार होने से घटना घटी थी। और कृष्ण तो एक विचार है। कितनी ही प्यारी प्रतिमा हो--बांसुरी बजाती हो, मोर-मुकुट बंधा हो, बड़ी सुंदर हो, मनभावन हो, लुभावनी हो--पर इससे क्या फर्क पड़ता है? महावीर का मार्ग तो पुरुष का मार्ग है। इसलिए महावीर की परंपरा में यह कहा जाता है कि स्त्री-पर्याय से मोक्ष हो ही नहीं सकता। और इस बात में थोड़ा बल है। महावीर की परंपरा से नहीं हो सकता, क्योंकि महावीर की पूरी परंपरा प्रेम-शून्य है। लेकिन स्त्री पर्याय से मोक्ष ही नहीं हो सकता, यह बात गलत है। क्योंकि और परंपराएं हैं, और मार्ग हैं।
मीरा को निर्विचार होना उतना नहीं जमेगा। मीरा परिपूर्ण स्त्री है। अगर महावीर परिपूर्ण पुरुष हैं, तो मीरा परिपूर्ण स्त्री है। उनमें भेद उतना ही है जितना जमीन और आसमान में। होना स्वाभाविक भी है। साधारण स्त्री और पुरुष में कितने भेद होते हैं! फिर परिपूर्ण स्त्री और परिपूर्ण पुरुष में तो भेद बहुत होंगे। व्यक्तित्व के भेद बहुत होंगे। स्त्री निर्विचार की धारणा में नहीं जा सकती, लेकिन उसका प्रेम इतना गहन हो सकता है, इतना गहन कि उसके प्रेम का परिणाम ही निर्विचार हो जाए। उसकी प्रेम की तल्लीनता ऐसी हो सकती है, ऐसी डुबकी लगे कि निकलने की बात ही न उठे। ऐसी ही डुबकी लगी मीरा को।
नीलम, ऐसी ही डुबकी तुझे लगेगी। मैं तुझे जानता हूं, निकट से जानता हूं। जिन लोगों को मैं बहुत निकट से जानता हूं, उनमें तू एक है। जिनके हृदय में मैंने झांक कर गौर से देखा है, उन सौभाग्यशाली लोगों में से तू एक है। तुझे यूं ही डुबकी लगेगी, प्रेम से ही लगेगी। सच तो यह है, तेरी डुबकी लग ही रही है। तू रोज-रोज पिया के करीब आ ही रही है।
प्रेम में डूब! प्रेम में रो! प्रेम में गा! प्रेम में नाच! प्रेम में आह्लादित हो! प्रेम जो करवाए, कर! प्रेम में मतवाली हो, दीवानी हो, पागल हो। यही तेरी पूजा, यही तेरी अर्चना, यही तेरा मार्ग। प्रेम में अहंकार अपने आप खो जाता है। प्रेम में अहंकार बचता नहीं। प्रेम जहर है अहंकार के लिए और अमृत है परमात्म-अनुभव के लिए। प्रेम यूं है जैसे प्रकाश; अंधेरा तत्क्षण विलीन हो जाता है।
प्रेम के रास्ते से ही तेरी गति होगी। गति हो ही रही है। मैं तेरे कदमों को रोज प्रभु-मंदिर की ओर बढ़ते देख रहा हूं। आह्लादित हूं।
लेकिन अक्सर ऐसा होता है, जितने-जितने हम परमात्मा के करीब आने लगें, उतना ही उतना खिंचाव तीव्रता से मालूम होता है। उतना ही उतना लगता है और जल्दी हो जाए, और जल्दी हो जाए।
इसीलिए तूने पूछा है: "पिय को खोजन मैं चली, पिया मिलन कैसे हो?'
स्वाद लगने लगा है। बूंदा-बांदी होने लगी है।
लेकिन जब बूंदा-बांदी होती है तो मन करता है कि अब बूंदा-बांदी ही क्यों? अब फूट पड़े आसमान! अब टूट पड़े आसमान! अब क्यों न पूरा सागर उतर आए? अब क्यों एकाध-दो किरणें आएं, क्यों न पूरा सूरज आ जाए?
यह स्वाभाविक है। जिनको एक भी बूंद जीवन में नहीं मिली, उनको यह बात पैदा नहीं होती। उनको यह सवाल ही नहीं उठता। वे पूछते ही नहीं: पिय को खोजन मैं चली...! यह बात ही उनकी नहीं है। कोई धन को खोज रहा है। कोई पद को खोज रहा है, प्यारे को खोज कौन रहा है?
तू चल पड़ी है। तेरे पैर ठीक रास्ते पर चल पड़े हैं। तुझमें रोज प्रीति घनी हो रही है, मौन घना हो रहा है। तेरी प्रार्थना सघन हो रही है। तेरा समर्पण रोज-रोज त्वरा को और तीव्रता को उपलब्ध हो रहा है। लेकिन जैसे-जैसे यह होगा, वैसे-वैसे लगेगा--और जल्दी हो जाए, और जल्दी हो जाए। जैसे-जैसे वह मंदिर करीब आएगा, उसकी धूप की गंध तेरे करीब आने लगेगी, मंदिर में जलते हुए दीये तुझे दिखाई पड़ने लगेंगे, वैसे-वैसे दौड़ने का मन होने लगेगा। वैसे-वैसे तेजी बढ़ेगी। वैसे-वैसे तू परवाना बनेगी। जैसे शमा के पास परवाना जैसे-जैसे करीब आता है वैसे-वैसे उसकी तड़प बढ़ती जाती है। और तड़प आखिर कहां ले जाती है? परवाना मिटता है, शमा में जल जाता है। वही पिया का मिलन है। वही प्यारे का मिलन है। उस मिटने में ही मिलन की घड़ी आ जाती है। हालांकि जो मिटता है वह झूठ था और जो पाया जाता है वह परम सत्य है।

दूसरा प्रश्न: भगवान!
कुछ दिनों से आप आंखों से पिलाते हैं, लेकिन मदहोश आंखें ढल जाती हैं। तत्क्षण अहोभाव में डूब जाता हूं और हृदय से पुकार उठती है:
      गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊं?
      दीजो ध्यान हरिगुन गाऊं!
      मन तड़पत हरि-दर्शन को आज!

चितरंजन!
जैसे-जैसे तुम मधुशाला के अंदाज सीखोगे, वैसे-वैसे पीने और पिलाने के नये-नये ढंग भी तुम्हें खयाल में आएंगे।
जो सबसे पहले यहां आता है वह तो मेरे शब्दों से ही परिचित होता है। शब्दों से भी परिचित हो जाए तो बहुत। क्योंकि शब्द भी वह वही सुनता है जो सुन सकता है--जो उसकी धारणाओं, मान्यताओं के अनुकूल पड़ते हैं। जो प्रतिकूल पड़ते हैं उनके लिए तो बहरा हो जाता है वह। या फिर उन शब्दों को तोड़-मरोड़ लेता है। ऐसा कुछ सुन लेता है जो मैंने कहा नहीं, जो मेरा कभी अभिप्राय नहीं था, हो नहीं सकता था।
लेकिन जो प्रथमतः आता है, उसे तो शब्दों की प्यालियों में ही शराब भेंट की जा सकती है। वह और किसी तरह की प्यालियों से तो परिचित नहीं है। फिर जैसे-जैसे तुम मेरे करीब आने लगते हो वैसे-वैसे मयकदे के नये-नये रिवाज, मयकदे की गहराइयां तुम्हारे खयाल में आनी शुरू हो जाती हैं। यह मंदिर नहीं है, ध्यान रखना। जब तक मैं जिंदा हूं तब तक तो यह मधुशाला है। छोटी-मोटी घटनाएं अगर मंदिर जैसी लगती भी हों तो उन पर ध्यान मत देना।
संत महाराज ने कल ही पूछा था कि एक सज्जन अपने मित्र से बुद्धकक्ष से निकलते हुए कहते जा रहे थे कि अब यह स्थान भी एक मंदिर होता जा रहा है। संत से न रहा गया तो उन्होंने पूछा कि आपका अर्थ? तो उन्होंने कहा कि मेरे जूते चोरी चले गए।
ऐसी छोटी-मोटी घटनाएं यहां घटेंगी, इससे इसको मंदिर मत समझ लेना। जूते कभी-कभी मधुशाला से भी चले जाते हैं। चोरी नहीं जाते, यह तो पक्का है। मधुशाला में कहां चोर! मगर कोई ज्यादा पी गया, किसी और के पहन कर चला गया। और चोरी-वोरी नहीं। पियक्कड़ों का क्या, किसी और के जूते पहन कर चले जाएं! यह तो रिंदों की दुनिया है।
नसरुद्दीन एक दिन मुझे दिखाई पड़ा। एक पैर में लाल मोजा पहने हुए, एक पैर में पीला मोजा पहने हुए। मैंने कहा कि नसरुद्दीन, यह कोई नयी फैशन निकली क्या? ये किस ढंग के मोजे खरीद लाए?
उसने कहा, यही तो मैं चकित हूं। और एक ही जोड़ी नहीं है, मेरे घर में दो जोड़ी हैं। इसी तरह की एक और जोड़ी है मेरे घर में! यही मैं सोचता हूं कि माजरा क्या है? यह कंपनियों ने क्या फैशन निकाला है!
पियक्कड़ों का क्या भरोसा! जूते कोई चोरी नहीं ले जाएगा। अन्यथा कोई भूल से यहां आ गया हो, जूते चुराने को ही आ गया हो। वैसे लोग भी आ जाते हैं। कई को भ्रांति है कि यह भी मंदिर है, वे आ जाते हैं भूल से। तो वे फिर वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा मंदिर में करना होता है।
मंदिरों में अक्सर ऐसा होता है कि लोग हाथ जोड़ कर परमात्मा को नमस्कार कर रहे होते हैं, लेकिन लौट-लौट कर जूते देखते रहते हैं। अब इनका नमस्कार परमात्मा को पहुंचे तो कैसे पहुंचे? परमात्मा को नहीं, जूतों को पहुंच रहा है नमस्कार! क्योंकि जहां नजर है वहां नमस्कार है।
लोग मंदिर में तो बिलकुल सड़े-गले जूते पहन कर जाते हैं--यूं कि चोरी भी चले जाएं तो समझो अच्छा ही है, झंझट मिटी। कहने को भी रह जाएगा कि जूते भी चोरी चले गए, अब दूसरे खरीदने पड़ेंगे; या मौका लगा तो वहीं से बदल कर आ जाएंगे।
चंदूलाल मारवाड़ी के पास मैंने एक दिन एक छाता देखा--बिलकुल नया छाता, जैसे आज ही खरीदा हो! मैंने पूछा कि चंदूलाल, बड़ा नया छाता खरीद लाए हो!
उन्होंने कहा, नया छाता नहीं है, सत्रह साल पुराना!
सत्रह साल पुराना! और इसकी यह हालत! भारत में ही बना है? यहां सत्रह दिन छाता नहीं टिकता और सत्रह साल कैसे टिक गया?
उन्होंने कहा, भारत में ही बना है, मगर बड़ा मजबूत छाता है। अरे इसके टिकने की क्या कहें! कम से कम पचास दफे तो बदल चुका है और कम से कम पचास दफे मैं सुधरवा चुका हूं। और अब आपने बात ही पूछ ली, तो आज सुबह मंदिर गया था वहां फिर बदल गया। मगर है गजब का मजबूत छाता! सत्रह साल हो गए, मगर वही ताजगी, वही नयापन।
मंदिर लोग जाते अपने-अपने कारणों से हैं--कोई छाता बदलने जाता है, कोई जूते बदलने जाता है। उनकी बात छोड़ दो। यहां कुछ लोग आते हैं सिर्फ शब्दों को सुनने। जो शब्दों को ही सुनने आए हैं, उनको मैं कुछ और पिलाना भी चाहूं तो नहीं पी सकेंगे।
चितरंजन, लेकिन जो पीने लगे हैं, फिर उनको आंखों से ही पिलाना है। असली चीज तो आंखों और आंखों में ही घट सकती है। वह तो आंखों और आंखों के बीच ही घटती है। उसके लिए शब्द आवश्यक नहीं हैं, मौन काफी है। जिनकी आंखों का और मेरी आंखों का तार जुड़ गया है, वे मेरे शब्दों को और ढंग से ही सुनते हैं फिर। पीते हैं, सुनते नहीं। फिर उनके भीतर न तर्क है, न विवाद है। और जब तर्क और विवाद सब शांत हो जाते हैं तब संवाद पैदा होता है। और संवाद के बिना सत्य की कोई अनुभूति नहीं होती।
यह अच्छा हो रहा है। तुम कहते हो: "कुछ दिनों से आप आंखों से पिलाते हैं।'
कुछ दिनों से तुम करीब आ गए हो। कुछ दिनों से तुम निकट हो गए हो। रोज निकट होते जा रहे हो।
और तुम कहते हो: "लेकिन मदहोश आंखें ढल जाती हैं।'
वह भी ठीक है, कि जब आंखों से पीओगे तो आंखें बंद हो जाएंगी। जब आंखों से पीओगे तो आंखें ढल जाएंगी, मदमस्त हो जाएंगी।
घबड़ाओ न। चिंता न लेना। जबरदस्ती आंखों को खोल कर भी मत रखना। क्योंकि कभी-कभी यूं होता है: खुली आंखें जो नहीं पी पातीं, वे बंद आंखें ही पी पाती हैं। जितना खुली आंखें पी सकती हैं उतना पीएंगी और फिर बंद हो जाएंगी, फिर बंद आंखें पीएंगी। उसकी चिंता मत लेना। एक बार आंखों का संबंध बनना शुरू हुआ, एक बार नजर लड़ी, तो फिर खुली हों आंख कि बंद हों आंख, कोई भेद नहीं पड़ता, पीना जारी रहेगा। मैं बोलूं तो, मैं न बोलूं तो। मैं यह कहूं तो, मैं वह कहूं तो।
कल ही एक मित्र ने पूछा है कि जब आप पिछले वर्ष संतों पर बोल रहे थे, तब मेरे आंसू बहते थे। अब आप लोगों के प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं तो आंसू नहीं बहते। इसका अर्थ क्या हुआ?
इसका अर्थ हुआ: मुझसे नाता नहीं है। वे आंसू वगैरह जो बह रहे थे, मेरे कारण नहीं बह रहे थे। वे तुम्हारी धारणाओं के कारण, क्योंकि तुम्हारे संतों पर बोल रहा था। जब नानक पर बोल रहा था तो यहां सिक्खों की संख्या दिखाई पड़ने लगी थी, और गदगद होते थे वे। उनका कुछ मुझसे लेना-देना नहीं। नानक के खिलाफ एक शब्द कह देता, और वे कृपाण फड़काने लगते। उनको कुछ मुझसे लेना-देना नहीं। वह जो खुश हो रहे थे, वह जो गदगद हो रहे थे, वह गदगद होना सब झूठ है। वह तो उनकी धारणा की मैं पुष्टि कर रहा था, सो उनकी आंखें गीली हो रही थीं, आंसू झर रहे थे। क्योंकि वे कह रहे थे, अहा--दिल ही दिल में--कि हम जो मानते थे, बिलकुल ठीक है। तो आप भी यही कहते हैं! तो आप भी समर्थन करते हैं हमारा!
तो तुम्हें आंसू बहते होंगे। क्योंकि जब मैं सुंदरदास पर बोल रहा था तो कोई सुंदरदास को मानने वाला होगा। जब मैं कबीर पर बोल रहा था तो कोई कबीर को मानने वाला होगा। और जब मैं मीरा पर बोल रहा था तो कोई मीरा को मानने वाला होगा। उन सब मानने वालों के हृदय गदगद होते होंगे। और एक बात यह कि कम से कम वे सब पुराने थे। और पुराने से हमारा ऐसा आग्रह है कि जिसका कोई हिसाब नहीं। उनके शब्दों में चाहे कुछ हो या न हो, लेकिन पुराने से हमें बहुत आग्रह है। और मैं तो उनके शब्दों को केवल खूंटियों से ज्यादा नहीं मानता हूं। टांगना तो मुझे वही है जो मुझे टांगना है। वे सुंदरदास हों, कि कबीरदास हों, कि नानक हों, कि रैदास हों, कुछ भेद नहीं पड़ता--मेरे लिए खूंटियां हैं। मगर तुम खूंटियों से बंधे हुए लोग हो। तुम्हारी खूंटी की मैं प्रशंसा कर दूं तो तुम्हारा हृदय गदगद हो जाता है।
अब जिन सज्जन ने यह पूछा है, उनसे मैं कहूंगा, भैया, तुम घर ही रो लिया करो। पढ़ लिए सुंदरदास को और जी भर कर वहीं रो लिए। यहां आने की क्या जरूरत है?
लेकिन जो मुझे समझते हैं, जिनका मुझसे प्रेम है--सीधा, जिन्हें मेरा पता है, जो यहां केयर ऑफ नहीं आए हैं, उनको कुछ फर्क नहीं पड़ता कि मैं लोगों के प्रश्नों के उत्तर दे रहा हूं...क्योंकि मैं तो वही हूं। और तुम क्या सोचते हो, अगर योग नीलम के प्रश्न का उत्तर दिया तो तुम्हें नहीं जंचेगा, कि ठीक है, योग नीलम क्या पूछेगी! और अगर मीरा के बिलकुल सड़े-गले किसी वचन पर भी मैं बोल दूं तो वह जंचेगा, क्योंकि वह मीरा का वचन है। और नीलम में मुझे कोई कमी नहीं दिखाई पड़ती। एकाध-दो कदम और कि हो जाएगी मीरा--और जीवित मीरा होगी!
चितरंजन के प्रश्न का उत्तर दे रहा हूं, तो तुम्हारी आंखों में आंसू नहीं आएंगे कि अरे यह चितरंजन! वही बड़ौदा वासी चितरंजन! लेकिन अगर मैं यूं ही झूठे भी कोई संत गढ़ लूं...और तुम मेरा भरोसा मत करना, मैं बुद्धुओं के लिए कई काम करता हूं। उल्लू मर जाते हैं, औलाद छोड़ जाते हैं। तो उनकी औलाद की भी तो फिक्र करनी पड़ती है। तो उनके लिए मैं उल्लुओं के वचनों पर बोल देता हूं। अब उल्लू के वचनों में कुछ भी नहीं है--उल्लू ही है! मगर मैं उसमें ऐसे-ऐसे अर्थ बता दूंगा कि औलाद की आंखों में से आंसू बहें! उल्लुओं की औलाद कहे कि वाह, क्या आपने बाप-दादों की याद दिलवा दी! थे पहुंचे हुए, यह तो हम पहले ही जानते थे, मगर हमको पता नहीं था, ठीक-ठीक पता नहीं था कि अपने बाप-दादे कितने पहुंचे हुए थे!
अतीत से, पुरातन से, सड़े-गले से, मुर्दा से, मरघटों से तुम्हारा ऐसा लगाव है, लाशों की तुम ऐसी पूजा करते हो कि जिसका कोई हिसाब नहीं।
जिनका मुझसे संबंध है, उन्हें कुछ भेद नहीं पड़ता।
एक मित्र ने पूछा है कि अगर किसी दिन कोई भी प्रश्न न आए तो आप क्या करेंगे?
तो मैं दिल खोल कर बोलूंगा। प्रश्न की भी बाधा न रही। नहीं तो थोड़ा प्रश्न का खयाल रखना पड़ता है। बोलता तो मैं यूं दिल खोल कर ही हूं, मगर थोड़ा-थोड़ा प्रसंग प्रश्न का मुझे लेना पड़ता है, ताकि तुम्हें ऐसा न लगे कि मैं बहुत दूर निकल गया प्रश्न से। लौट-लौट कर याद दिला देता हूं, कि पिय को खोजन मैं चली! फिर मुझे जहां जाना है मैं वहीं जाता हूं और जहां तुम्हें ले जाना है वहीं ले जाता हूं। फिर महीने, दो महीने में एकाध दफे याद दिला देता हूं--पिय को खोजन मैं चली। तुमको लगता है कि ठीक, विषय पर ही बात चल रही है।
और विषय वगैरह से मुझे क्या लेना है? जब तुमको निर्विषय करना है तो विषय से मुझे क्या लेना-देना है? नहीं कोई प्रश्न आएंगे, तुम चिंता मत करो, उस दिन दिल खोल कर बोलूंगा। मगर उस दिन सिर्फ वही मुझे समझ सकेंगे जिन्होंने मेरी आंखों से पीना सीख लिया है। जो आंखों से पीएगा उसकी आंखें मदमस्त होंगी, नशा छाएगा। और यह नशा ऐसा है, जो बेहोश नहीं करता, होश में लाता है।
तुम पूछते हो चितरंजन: "गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊं?
                    दीजो ध्यान हरिगुन गाऊं!'
उसी गुरु की तो तुम्हें याद दिला रहा हूं। वह गुरु तुम्हारे भीतर बैठा हुआ है। नाम उसका जो भी रख लो, चाहे उसे कहो प्यारा, पिया, परमात्मा, चैतन्य, साक्षी, चाहे कहो गुरु।
मगर थोथे गुरुओं ने इस तरह के वचनों का बहुत लाभ उठाया। वे यही समझाने लगे लोगों को कि गुरु बिन ज्ञान कहां! वे समझाने लगे कि हमारे बिना ज्ञान नहीं होगा। यह अर्थ नहीं है उसका।
तुम्हारे भीतर ही तुम्हारा गुरु छिपा है। बाहर का गुरु सदगुरु है, अगर तुम्हें भीतर के गुरु की याद दिला दे। और बाहर का गुरु मिथ्या गुरु है, अगर बाहर ही तुम्हें उलझा ले और भीतर के गुरु तक न जाने दे, बाधा बन जाए। सौ में निन्यानबे मौकों पर बाहर के गुरु तुम्हारे भीतर के गुरु और तुम्हारे बीच बाधा बन जाते हैं। असल में वे तुम्हारे भीतर के गुरु से डरते हैं, वे नहीं चाहते कि तुम मुक्त हो जाओ। वे नहीं चाहते कि तुम अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। वे नहीं चाहते कि तुम स्वतंत्र हो जाओ। वे तुम्हें सब तरह से निर्भर बनाना चाहते हैं। निर्भरता का अर्थ है गुलामी। वे मजा लेते हैं तुम्हारी गुलामी का। और जैसे और तरह की गुलामियां होती हैं, ऐसे मानसिक गुलामी होती है।
और इस देश में तो बड़ी मानसिक गुलामी है। गांव-गांव गुरु हैं, मोहल्ले-मोहल्ले गुरु हैं। और हर गुरु समझा रहा है लोगों को: गुरु बिन ज्ञान नहीं! और यह इतने दिनों से कहा जा रहा है, सदियों से, कि लोगों को कंठस्थ हो गई है यह बात। लोग कहते हैं होनी चाहिए ठीक। पहले भी गुरु यही कह गए हैं कि गुरु बिन ज्ञान नहीं। तो चरण गहो किसी गुरु के, पकड़ो किसी गुरु को।
मैं उन गुरुओं में से नहीं हूं। सच पूछो तो मैं तुम्हारा गुरु नहीं हूं। मैं तुम्हारा मित्र हूं। मैं आनंदित होऊंगा तुम्हारा मित्र रह कर। मैं तुम्हें साथ देना चाहता हूं--साथी हूं, गुरु नहीं। मैं तुम्हें गुलाम नहीं बनाना चाहता। मैं तुम्हें आंखें देना चाहता हूं, तुम्हारी बैसाखी नहीं बनना चाहता।
बैसाखी कभी नहीं चाहेगी कि तुम्हें आंखें मिलें। क्योंकि बैसाखी कैसे चाहेगी कि तुम्हें आंखें मिलें, कैसे चाहेगी कि तुम्हारा लंगड़ापन दूर हो जाए! अगर तुम लंगड़े न रहे, तुम्हें आंखें मिल गईं, तो तुम बैसाखी को फेंक दोगे। तो बैसाखी तो चाहेगी कि तुम सदा लंगड़े रहो, सदा अंधे रहो, तुम सदा पंगु रहो। पंगु होने में ही तो बैसाखी का बल है तुम्हारे ऊपर।
तुम्हारे तथाकथित गुरुओं की जो भीड़ है, उसका पूरा धंधा इस बात पर निर्भर है कि वे तुम्हें परतंत्र बना कर रखें--एक दिमागी गुलामी, एक आध्यात्मिक गुलामी।
भारत आध्यात्मिक रूप से पहले गुलाम हुआ और इसीलिए फिर राजनैतिक रूप से गुलाम होना पड़ा। जिनकी आत्माएं गुलाम हो गईं, वे कितने दिन तक राजनैतिक रूप से स्वतंत्र रह सकते थे? असंभव था। जो अपनी आत्माओं को भी न बचा सके, वे अपने शरीरों को क्या बचाते! जो अपनी आत्माओं को बेचने को तैयार हो गए, फिर शरीर को बेच देने में उन्हें कोई अड़चन न आई। दो हजार साल तक भारत गुलाम रहा।
क्यों? इतना बड़ा देश, इतनी बड़ी संख्या, इतने लोग, दुनिया का छठवां हिस्सा--और छोटे-छोटे लोग, छोटी-छोटी संख्या वाले लोग, छोटे-छोटे देश, जो इसके जिलों में समा जाएं, वे इस पर हुकूमत करते रहे! हूण आए, मुगल आए, तुर्क आए, अंग्रेज आए, पुर्तगाली आए--जो आया, भारत गुलाम होने को उसने हमेशा तैयार पाया। जैसे हम हाथ ही जोड़े खड़े थे कि आओ और हमें गुलाम बनाओ! जैसे हम भीख मांग रहे थे कि कोई आए और हमें गुलाम बनाए! इसके पीछे क्या कारण होगा?
मेरे देखे, इसके पीछे कारण हैं तुम्हारे गुरु। पहले उन्होंने तुम्हें आध्यात्मिक रूप से गुलाम बनाया। जब तुम आत्मिक रूप से गुलाम हो गए, जब तुम्हारी मन और बुद्धि खो गई, फिर क्या कमी रही! तुम निर्वीर्य हो गए। और उन्हीं गुरुओं का जाल अभी भी फैला हुआ है। और अगर मैं उनके खिलाफ कुछ कह देता हूं तो मेरे पास पत्र आते हैं कि आप जैसे आध्यात्मिक व्यक्ति को किसी के विरोध में नहीं बोलना चाहिए।
भाड़ में जाए तुम्हारा अध्यात्म! मुझे कोई रस नहीं है आध्यात्मिक व्यक्ति होने में और इत्यादि में। मैं तो जैसा है वही कहूंगा। ये तुम्हारे जो तरहत्तरह के गुरु खड़े हैं, ये तुम्हें गुलाम बना रहे हैं। ये तुम्हें राख तो बांट रहे हैं विभूति कह कर और तुम्हारी आत्माओं को सड़ा रहे हैं। इनसे जब तक तुम जागोगे नहीं, तब तक तुम कभी भी ज्ञान को उपलब्ध न हो सकोगे।
चितरंजन, यह वचन महत्वपूर्ण है। लेकिन इसका अर्थ हमेशा गलत किया गया है। इसका अर्थ इतना गलत किया गया है कि कृष्णमूर्ति जैसे व्यक्ति को गुरु को ही इनकार करना पड़ा, कि गुरु से ज्ञान हो ही नहीं सकता। यह दूसरी अति हो गई। और मैं इस अति का अर्थ समझ सकता हूं। यह परिपूरक अति है। सदियों से तुम्हें समझाया गया है कि गुरु से ही ज्ञान होगा, गुरु से ही ज्ञान होगा, गुरु के चरण गहो। कृष्णमूर्ति ने देखा कि यह गुलामी का कारण बना, तो इसको पूरा का पूरा जड़ से काट दो। गुरु से ज्ञान हो ही नहीं सकता।
मगर मैं तुमसे कहना चाहता हूं, दोनों अतियां गलत हैं। कृष्णमूर्ति की अति...अगर चुननी ही हो तो कृष्णमूर्ति की अति चुन लेना। कम से कम उससे तुम किसी के गुलाम नहीं बनोगे। मगर सत्य दोनों के बिलकुल मध्य में है। अतियों में कभी सत्य नहीं होता। सत्य बिलकुल मध्य में है। ज्ञान तो गुरु से ही होता है, मगर गुरु तुम्हारे भीतर है। यह मध्य सत्य है। बाहर के गुरु से ज्ञान नहीं होता। और बाहर के गुरु से जो लोग दावा करते हैं ज्ञान देने का, वे झूठा दावा करते हैं। ज्ञान कोई तुम्हें नहीं दे सकता। प्यास दे सकता है, तुम्हारे भीतर एक अहर्निश लपट पैदा की जा सकती है।
वही बाहर के गुरु का काम है कि तुम्हें झकझोर दे, जैसे तूफान झकझोर जाए। एक आंधी की तरह आए और तुम्हें हिला डाले, जड़ों से हिला डाले, ताकि तुम्हारी नींद टूटे! और उसका दूसरा काम है कि तुम्हें फेंक दे तुम्हारे ऊपर। तुम्हें अपने कंधे पर लेकर न ढोता फिरे, न तुम्हारे कंधे पर बैठे। तुम्हें तुम्हारे ऊपर फेंक दे। तुम्हें सजग करे कि तुम्हारी अंतरात्मा में ही तुम्हारा वस्तुतः जीवन-सूत्र छिपा है। वहीं दीया जल रहा है, जो कभी बुझा नहीं है। उसी दीये में ज्ञान है और वही गुरु है।
गुरु शब्द का अर्थ बड़ा प्यारा है। इसका अर्थ होता है--जिससे अंधकार मिटे। गुरु शब्द का अर्थ होता है: दीया, रोशनी। प्यारा शब्द है। मगर प्यारे से प्यारे शब्द गलत लोगों के हाथों में पड़ कर घातक हो जाते हैं। कितना प्यारा शब्द है! लेकिन उसके क्या-क्या अर्थ हो गए! गुरुडम पैदा हो गई इस प्यारे अर्थ से। गुरुघंटाल पैदा हो गए इस प्यारे शब्द से।
देश के कई हिस्सों में तो गुरु का मतलब होता है: गुंडा। पहुंचे हुए गुंडों को लोग कहते हैं: वाह गुरु, क्या बात कही! जैसे बंबई में गुंडा के लिए अच्छा शब्द उपयोग करना पड़ता है, क्योंकि गुंडे से गुंडा कहो तो खोपड़ी खोल दे। तो बंबई में उसको कहते हैं: दादा! गजब की बात है--दादा और गुंडा! ऐसे ही जबलपुर में जहां मैं रहता था, वहां गुंडे को कहते हैं: गुरु। कहना ही पड़ेगा, कुछ न कुछ अच्छा शब्द खोजना पड़ेगा। गुंडे को गुंडा तो नहीं कह सकते।
बहुत गुंडे गुरु शब्द के पीछे छिपे खड़े हैं। और बहुत सी दुकानें गुरु के पीछे छिपी खड़ी हैं। सबसे बड़ी भ्रांति तो यह है कि ज्ञान बाहर से मिल सकता है।
ज्ञान बाहर से मिल ही नहीं सकता। ज्ञान तुम्हारा अंतर-भाव है, तुम्हारे भीतर के सूरज का ऊगना है। फिर बाहर के गुरु का क्या प्रयोजन है? बाहर के गुरु का प्रयोजन वही है जो बाहर के संगीत का होता है। जब कोई तबले पर ताल देता है, तो तुमने अनुभव किया, तुम्हारे पैर नाचने को उत्सुक हो उठते हैं! क्या हुआ? क्या हो गया? इधर तबले पर ताल पड़ी, किसी ने मृदंग बजाई, उधर तुम्हारे पैरों में क्या होने लगा? कैसी हलचल? तुम नाचने को उत्सुक होने लगे।
पश्चिम के बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव जुंग ने इस प्रक्रिया के लिए एक नया ही नाम खोजा है: सिनक्रानिसिटी, समस्वरता। बाहर कोई चीज घट रही है तो ठीक उसके समांतर कोई चीज भीतर घटनी शुरू हो जाती है। बाहर संगीत बजा, और तुम्हारे भीतर भी कोई धुन बजने लगती है। बाहर संगीत बजा, और तुम्हारा सिर हिला, तुम्हारे पैर नाचे। वह संगीत तुम्हारे भीतर था। वह पहले भी था जब संगीत नहीं बज रहा था, लेकिन अब संगीत ने उसे जगा दिया।
यही काम है बाहर के गुरु का, कि वह बाहर की मृदंग बजा दे, कि बाहर की बांसुरी बजा दे, कि बाहर की वीणा छेड़ दे, कि उसके समस्वर तुम्हारे भीतर जो सोए पड़े हैं, उन पर टंकार पड़ जाए। तुम्हें याद आ जाए अपने भीतर की।
चितरंजन, "गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊं'--तब इस वचन का अर्थ तुम्हें समझ में आ जाएगा। निश्चित ही फिर गुरु के बिना कहीं से ज्ञान नहीं मिलता। लेकिन गुरु मेरे अर्थों में, वह केवल समस्वर पैदा करता है। वह केवल एक संगीतज्ञ है; एक नर्तक है, जो अपने पैरों में घुंघरू बांध कर नाचता है; और तुम्हारे भी पैरों में घुंघरू बांधने की इच्छा होने लगती है। चाहे तुम्हें नाच न भी आता हो, तो भी तुम्हारे पैर थिरकने लगते हैं। संगीत चाहे तुम्हें न भी आता हो, मगर सिर हिलने लगता है।
"दीजो ध्यान हरिगुन गाऊं।'
इस वचन का भी एक गलत अर्थ है और एक सही। हर वचन का गलत और सही अर्थ ध्यान में रखना जरूरी है। इसका गलत अर्थ पहले बता दूं। गलत अर्थ तो यह है कि लोग सोचते हैं कि हम मांगेंगे ध्यान और मिलेगा। परमात्मा से मांगना है, गुरु से मांगना है, तो मिलेगा।
मांगने से कुछ भी नहीं मिलता। भिखमंगों को कुछ भी नहीं मिलता। इस दुनिया का बड़ा अजीब नियम है--एस धम्मो सनंतनो, यही शाश्वत धर्म है, यही शाश्वत नियम है--कि यहां बादशाहों को मिलता है, भिखमंगों को नहीं मिलता। जिसने मांगा, वह चूका। जिसने झोली फैलाई, वह सदा के लिए खाली रह जाएगा। बिन मांगे मोती मिलें, मांगे मिले न चून। मांगो मत।
इसका गलत अर्थ तो हो जाता है मांगना, कि दीजो ध्यान हरिगुन गाऊं! कि हे प्रभु, मैं तुम्हारे गुण गाऊंगा, तुम मुझे ध्यान देना! इसका गलत अर्थ तो हो जाता है: हे प्रभु, मैं तुम्हारी स्तुति करूंगा! स्तुति यानी खुशामद। गुणगान करूंगा, बढ़ा-चढ़ा कर तुम्हारे संबंध में बातें कहूंगा, कि तुम ऐसे हो, कि तुम वैसे हो, कि तुम पतितपावन हो, कि तुम रहीम हो, रहमान हो, कि तुम करुणा के सागर हो! और फिर रास्ता देखूंगा कि देखो, मैंने इतना बढ़ा-चढ़ा कर तुम्हारी प्रशंसा की, अब देखें तुम क्या देते हो!
यही खुशामद की वृत्ति इस भारत में गहरी घुस गई है। इसलिए यहां स्तुति तुम देखो तो चकित हो जाओगे। टुटपुंजिया राजनेता आ जाए, जिसकी दो कौड़ी भी कीमत नहीं है, तुम भी भलीभांति जानते हो, मगर उसकी प्रशंसा देखो--फूलमालाएं पहनाई जा रही हैं! अभी कल यही आदमी तुम्हारे दरवाजे पर वोट मांगने खड़ा था और तुमने इससे बैठने को भी नहीं कहा था; यह भी नहीं कहा था कि आइए, पधारिए, विराजिए! ऐसे देखा था कि यह दुष्ट कहां से आ गया! इस ढंग से देखा था कि चलो आगे बढ़ो, जैसे लोग भिखारियों को देखते हैं। और आज यह पद पर है तो फूलमालाएं! फूलों की वर्षा हो रही है! मखमली कालीन बिछाए जा रहे हैं! और आज इसकी प्रशंसा सुनो तुम। तुम चकित हो जाओगे।
चंदूलाल चुनाव जीत गए। और स्वभावतः फिर उनका बड़ा स्वागत हुआ, जुलूस निकला, उनकी बड़ी प्रशंसा हुई। उनकी पत्नी गुलाबो भी अपने बच्चों के साथ समारोह में सुनने आई। बड़ी प्रशंसाएं चंदूलाल की की जा रही थीं। पत्नी ने अपने बेटे से कहा, बेटा, मुझे इतने दूर से साफ-साफ दिखाई भी नहीं पड़ता, तू जरा जाकर पास से तो देख, तेरे बाप ही हैं कि कोई और? क्योंकि ऐसी प्रशंसा हो रही है, यह तेरे बाप की तो नहीं हो सकती। तेरे बाप को तो मैं भलीभांति जानती हूं। जरा गौर से तो देख, कोई और तो नहीं बैठा है वहां!
उसको क्या गरीब को पता कि वह जिसको जानती है और जिसकी प्रशंसा हो रही है, यह एक ही आदमी नहीं है अब, ये दो आदमी हैं, ये दो चेहरे हैं, ये दो मुखौटे हैं। वह असली चेहरा है जो वह जानती है; यह नकली चेहरा है जो अब नेता का है।
इस देश में इसीलिए रिश्वत हटानी बहुत मुश्किल है; कोई उपाय नहीं है। क्योंकि हम भगवान तक को रिश्वत देने में शर्म नहीं खाते, तो बेचारे तहसीलदार को, थानेदार को, इन गरीबों को रिश्वत देने में कौन शर्म खाएगा! क्या हर्जा है? लोग हनुमान जी पर चढ़ा आते हैं नारियल और कह आते हैं कि अब ज्यादा नहीं है, खयाल रखना। अरे फूल नहीं तो फूल की पांखुड़ी, इसको ही बहुत समझना। गरीब आदमी हूं, यह नारियल चढ़ाए जा रहा हूं, लड़के की नौकरी लगवा देना!
ऐसे ही वे राजनेताओं के पास पहुंच जाते हैं कि अब जो भी मुझसे बन सके, गरीब आदमी हूं, फूल नहीं तो फूल की पांखुड़ी! थानेदार को दे आते हैं, स्टेशन मास्टर को दे आते हैं, क्लर्क को दे आते हैं। जहां देखो वहां दे आते हैं। और कोई संकोच नहीं है, न देने में कोई संकोच है, न लेने में कोई संकोच है। जब भगवान तक रिश्वत लेता है और संकोच नहीं करता और सदियों से ले रहा है, शर्म नहीं खाई, नहीं तो चुल्लू भर पानी में कभी का डूब मरता! और देने वाले देते रहे और लेने वाला लेता रहा, तो हम तो छोटे-छोटे आदमी हैं, हमें क्या हर्ज है!
भारत से रिश्वत मिटाना मुश्किल है। यह इसका गलत अर्थ है कि हरिगुन गाऊं, दीजो ध्यान!
पर इसका एक सही अर्थ भी है। और सही अर्थ यह है कि ध्यान प्रसाद है। वह तुम्हारे प्रयास से नहीं मिलता, तुम्हारी चेष्टा से नहीं मिलता। तुम जितनी चेष्टा करोगे उतना ही पाना मुश्किल हो जाएगा। तुम्हारी चेष्टा से तनाव पैदा होगा। तनाव से ध्यान दूर हो जाएगा। ध्यान मिलता है विश्राम में। ध्यान मिलता है जब तुम बिलकुल निश्चेष्ट होते हो; जब तुम बिलकुल ही प्रयत्न-शून्य होते हो; जब कोई प्रयास नहीं होता; जब तुम्हारे भीतर कोई साधना नहीं चल रही होती। क्योंकि साधना का अर्थ है: लक्ष्य, पाने की कोई चेष्टा, आकांक्षा, अभीप्सा। जब तुम्हारे भीतर यह कोई आपा-धापी नहीं है, जब तुम बिलकुल चुपचाप हो--न कुछ मांगना है, न कुछ पाना है, न कहीं जाना है--तब अचानक वर्षा हो जाती है। यूं कि पता ही नहीं चलता कि किस अज्ञात द्वार से यह सूरज फूट पड़ा! कहां से ऊग आया यह सूरज! रोशनी ही रोशनी हो जाती है।
इसलिए जिन्होंने जाना है ध्यान को, वे कहेंगे--प्रसाद है यह। फिर प्रसाद यानी परमात्मा का, और तो किसका होगा! परमात्मा से अर्थ किसी व्यक्ति का नहीं है। परमात्मा से अर्थ है--इस पूरे जीवन में जो छाई हुई ऊर्जा है, व्याप्त जो ऊर्जा है--इस जीवन की परम ऊर्जा का नाम परमात्मा है। निश्चित ही जब तुम बिलकुल विश्राम में होते हो, वह ऊर्जा तुम्हारे भीतर प्रविष्ट हो जाती है, लहराने लगती है। जब तुम परम विश्राम में होते हो, तुम होते ही नहीं। जब तुम चेष्टा में होते हो तभी तुम होते हो। जब तुम प्रयत्न में होते हो तभी तुम होते हो। अहंकार हमेशा प्रयास से जीता है। और जहां प्रयास गया वहां अहंकार गया।
इस अर्थ में यह वचन बहुत अदभुत है। और तब स्वभावतः, ध्यान प्रसाद की तरह मिले, तो फिर हमारे पास और क्या है सिवाय इसके कि हम परमात्मा का अनुग्रह मानें, कि हम उसका गुण गाएं! यह तो इसका सम्यक अर्थ है। सम्यक अर्थ ध्यान रखना; असम्यक अर्थ से बचना। क्योंकि वह जो असम्यक अर्थ है वही तुम्हें समझाया गया है।
चितरंजन, अगर मेरी बात तुम्हें समझ में आ गई तो यह वचन प्यारा है, बहुमूल्य है। नहीं तो दो कौड़ी का है और खतरनाक है। समझ-समझ की बात है। समझदार के हाथ में जहर भी औषधि हो जाती है और नासमझ के हाथ में औषधि भी जहर।
"गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊं?
दीजो ध्यान हरिगुन गाऊं।
मन तड़पत हरि-दर्शन को आज!'
तड़प तो होनी चाहिए, मगर तनाव नहीं। तड़प तो जितनी गहरी हो सके होने दो, मगर तनाव मत ले आना। और वहीं सारी कला है धर्म की। वहीं सारा राज है, रहस्य है। नहीं तो क्या फर्क पड़ेगा? एक आदमी धन के लिए तड़प रहा है और एक आदमी ध्यान के लिए तड़प रहा है; कोई फर्क नहीं रह जाएगा। दोनों तड़प रहे हैं। दोनों के भीतर वासना की अग्नि जल रही है। दोनों उद्विग्न हैं। दोनों विक्षिप्त हैं। दोनों के भीतर तनाव है। दोनों के भीतर खिंचाव है। फर्क कहां होगा?
फर्क यहां होगा कि जो ध्यान के लिए तड़प रहा है उसमें कोई तनाव नहीं होगा। वह प्यासा तो पूरा होगा, लेकिन कहेगा--जब तेरी मर्जी! जब हो तभी जल्दी है। अनंत प्रतीक्षा के लिए राजी हूं! अनंत रूप से प्यासा हूं, मगर अनंत प्रतीक्षा के लिए राजी हूं।
जिस दिन यह विरोधाभास तुम्हारे भीतर एक साथ उपस्थित होता है, उस दिन धर्म का तुमने गहनतम सूत्र समझा। अनंत प्रतीक्षा और अनंत प्यास--एक साथ। प्रतीक्षा तो अनंत होनी ही चाहिए और प्यास भी अनंत होनी चाहिए। बस इन दो से मिल कर ही प्रार्थना बनती है।


अंतिम प्रश्न: भगवान!
क्या मारवाड़ियों में कुछ भी प्रशंसाऱ्योग्य नहीं होता है?

सत्य प्रिया!
तू फिक्र छोड़, पागल! तू अब मारवाड़ी नहीं है। कितनी बार तुझे कहूं? कोई मारवाड़ में पैदा होने से थोड़े ही मारवाड़ी होता है। मारवाड़ी होना बड़ी साधना की बात है। यह कोई सरल मामला नहीं है कि हो गए मारवाड़ में पैदा और मारवाड़ी हो गए।
तू तो बिलकुल मारवाड़ी नहीं है--न तेरे पिता मारवाड़ी हैं, न तेरी मां मारवाड़ी हैं। होते मारवाड़ी तो मेरे संन्यासी नहीं हो सकते थे। मारवाड़ी और मेरा संन्यासी--असंभव! मारवाड़ी तो पहले शर्तबंदी करता है; वह तो सौदा करता है। और संन्यास तो जुआ है, सौदा नहीं है।
एक सज्जन ने पत्र लिखा है कि आपकी शर्त है संन्यास में कि गैरिक वस्त्र पहनूं, तो मेरी भी शर्त है कि जब तक मुझे समाधि नहीं दिलवाएंगे तब तक संन्यास नहीं लूंगा।
ये हैं मारवाड़ी! अब ये कहीं भी पैदा हुए हों, इससे क्या फर्क पड़ता है? मारवाड़ी दुनिया के हर कोने में पैदा होते हैं। मारवाड़ी बड़ी घटना है, कुछ मारवाड़ में ही सीमित नहीं है। मारवाड़ और मारवाड़ी का संबंध तू तोड़ दे। यह भौगोलिक मामला नहीं है। मारवाड़ी होना एक मनोवैज्ञानिक घटना है। अब यह आदमी मारवाड़ी है। अब यह कहता है: पहले मुझे समाधि मिलनी चाहिए, तब मैं गैरिक वस्त्र पहनूंगा!
फिर किसलिए गैरिक वस्त्र पहनोगे? मुझे सताने को? फिर क्या कारण है गैरिक वस्त्र पहनने का? जब समाधि ही मिल गई तुम्हें, तो गैरिक वस्त्र किसलिए पहनोगे? फिर तो जैसा दिल चाहे, चाहे महावीर जैसे नंग-धड़ंग घूमना, तो भी कोई अड़चन नहीं है। बुद्ध जैसे पीले वस्त्र पहनना, तो पीले वस्त्र पहनना। और कृष्ण जैसे अगर शृंगार करना हो तो शृंगार करके, बाल इत्यादि संवार कर स्त्रियों जैसे, मोर-मुकुट बांध कर घूमना। जब समाधि ही मिल गई तो अब क्या गैरिक वस्त्र पहनना है और किसलिए पहनना है?
संन्यास इसलिए है कि तुम समाधि की तरफ यात्रा कर सको। और यह आदमी मारवाड़ी है; यह कहता है--पहले समाधि, तब मैं गैरिक वस्त्र पहनूंगा! जैसे गैरिक वस्त्र पहनाने में मेरा रस हो। तो उसके लिए समाधि तक इन्हें देनी पड़ेगी पहले! जैसे मेरा कुल काम और मेरा कुल रस और कुल लक्ष्य इतना है कि लोग गैरिक वस्त्र पहनें। समाधि नहीं, गैरिक वस्त्र अंतिम लक्ष्य है जीवन का! ये समाधि को तो दो कौड़ी की बात समझते हैं। ये तो समाधि को भी शर्त बना रहे हैं गैरिक वस्त्र पहनने की। ये हैं मारवाड़ी, सत्य प्रिया! तू नहीं है मारवाड़ी।
और मारवाड़ियों में किसने कहा कि कुछ भी प्रशंसाऱ्योग्य नहीं होता? बड़ी गजब की चीजें होती हैं।
चंदूलाल मारवाड़ी और ढब्बूजी एक होटल में खाना खा रहे थे। जब खाना खा चुके तो बैरे ने उनके हाथ धुलाए और खूंटी से कोट उतार कर खुद अपने हाथों से चंदूलाल मारवाड़ी को पहनाया। चंदूलाल बैरे पर बहुत खुश हुए और उसे ईनाम के रूप में नगद अठन्नी भेंट दी।
ढब्बूजी तो यह देख कर आश्चर्यचकित रह गए, बोले कि चंदूलाल, मारवाड़ी होकर यह क्या करते हो? मित्र भी मारवाड़ी थे। कहा, क्या बाप-दादों की कमाई इस तरह बर्बाद कर दोगे? ये कोई ढंग हैं? आखिर बैरे को आठ आना ईनाम देने की क्या जरूरत थी? अरे बहुत से बहुत दस पैसे से काम चल जाता। उसकी भी आदत बिगाड़ी, अपने बाप-दादों के धन को भी खराब किया। और मुझको भी शघमदा होना पड़ रहा है तुम्हारी वजह से; अब मैं दस पैसे दूं तो लगता है कंजूस हूं। तुम्हें शर्म नहीं आती?
चंदूलाल मारवाड?ी ने मुस्कुरा कर ढब्बूजी से कहा, नाहक नाराज हो रहे हो, अरे आठ आने में यह कोट क्या मंहगा है? कोट तो मैं घर से लाया ही नहीं था। और ये आठ आने भी इसी कोट में से निकाल कर दिए हैं। अपने बाप का इसमें कुछ भी नहीं है।
गजब की चीजें होती हैं मारवाड़ियों में!
चंदूलाल मारवाड़ी कार से अपने घर वापस लौट रहे थे। रास्ते में एक सभ्य से दिखने वाले व्यक्ति ने उनसे लिफ्ट मांगी, उन्होंने लिफ्ट दे दी। देना तो नहीं चाहते थे, क्योंकि मारवाड़ी इतनी आसानी से किसी को लिफ्ट दे दे! अरे बैठेगा तो सीट भी घिसेगी न! मगर संकोचवश न न कर सके, इनकार न कर सके। टैक्सियों की हड़ताल थी, इसलिए संकोच खाना पड़ा।
कुछ दूर आगे बढ़ने पर चंदूलाल ने समय देखने के लिए घड़ी देखी--यह देखने के लिए कि यह दुष्ट कितनी देर बैठेगा? कितना बजा है और कितनी देर बैठ कर कितनी सीट खराब करेगा? न केवल वह सीट खराब कर रहा था, बल्कि चंदूलाल का अखबार भी पढ़ रहा था। उससे भी उनके प्राणों पर बहुत मुसीबत आ रही थी। दिल ही दिल में कह रहे थे कि अगर बड़े पढ़क्कड़ हो तो अपना अखबार खरीदा करो। मगर कह भी नहीं सकते थे कि अब कहना क्या है! अब इतनी की है उदारता, तो इतनी सी बात में अब क्या कंजूसी दिखाना, पढ़ लेने दो! ऐसे भी मैं पढ़ चुका हूं, अपना क्या बिगड़ता है!
घड़ी देखने के लिए कलाई टटोली, लेकिन कलाई पर घड़ी न थी। चंदूलाल तो एकदम कड़क कर बोले--गुस्सा तो हो ही रहे थे, एकदम कड़क गए, एकदम चिल्ला कर बोले--चल बे, घड़ी निकाल! हरामजादे कहीं के!
उस सीधे-सादे आदमी ने जल्दी से घड़ी निकाल कर दे दी। चंदूलाल ने उस बदमाश को वहीं गाड़ी से नीचे उतार दिया।
घर पहुंचे तो गुलाबो बोली कि आज तो आपको दफ्तर में बड़ी तकलीफ हुई होगी, क्योंकि घड़ी तो आप घर पर ही भूल गए थे।
होती हैं, खूबी की चीजें होती हैं!
चंदूलाल मारवाड़ी अपने मुनीम की योग्यताओं से बड़े प्रभावित थे। जब मुनीम को कार्य करते हुए पूरे बीस साल हो गए तो उन्होंने उसे बुलवाया और कहा कि श्यामलाल जी, आज आपको हमारे यहां काम करते-करते बीस साल हो गए। यह मेरी जिंदगी में पहला मौका है कि इतनी कम तनख्वाह में किसी ने इतने समय तक किसी के यहां नौकरी की हो। हम सोचते हैं कि आपके लिए कुछ किया जाए। हम सोचते हैं क्यों न आज से आपको स्वामीभक्ति के उपहार की बतौर श्याम की बजाय श्यामबाबू कह कर बुलाया जाए!
नसरुद्दीन पूरे पंद्रह वर्ष के बाद अपने मित्र चंदूलाल से मिलने के लिए आया। दरवाजे पर दस्तक दी, दरवाजा खुला और चंदूलाल मारवाड़ी की पत्नी गुलाबो बाहर आई। नसरुद्दीन ने नमस्ते की और कहा, क्या चंदूलाल जी घर पर हैं?
गुलाबो आंखों में आंसू भर कर बोली कि क्या आपको पता नहीं कि आज से तीन साल पहले उनका स्वर्गवास हो गया? हुआ यह कि घर में कुछ मेहमान आए हुए थे और उनमें से किसी ने हरी मिर्च की मांग की थी। हरी मिर्च लेने के लिए बगीचे में गए तो गए ही गए। वहीं उनका हार्टफेल हो गया। सच बात यह है कि हरी मिर्च उन्होंने खुद ही बगीचे में लगाई थी और अपनी आंखों से वे यह नहीं देख सकते थे कि उनकी हरी मिर्च इस तरह ये मेहमान बर्बाद करें।
नसरुद्दीन की आंखों में भी आंसू आ गए और वह सहानुभूति प्रकट करते हुए बोला कि बड़ा दुख हुआ यह सुन कर। मगर क्या आप बताएंगी कि फिर इसके बाद क्या हुआ?
गुलाबो बोली, हूं, होता क्या? यही हुआ कि फिर हम लोगों ने हरी मिर्च की बजाय लाल मिर्च से ही काम चलाया।
होते हैं गजब के लोग मारवाड़ी! सिद्ध पुरुष समझो! मगर तू सत्य प्रिया, चिंता छोड़ दे। तुझे ये गजब की चीजें नहीं सीखनी हैं। तू तो अब मेरे हाथों में पड़ गई है, जहां कुछ भूल-चूक से भी मारवाड़ की छाप रह गई होगी तो धुल जाएगी। मारवाड़ियों को तो मैं धोने में लगा ही रहता हूं। क्योंकि कितना ही इनको धोओ, पर्त पर पर्त धूल की निकलती चली आती है।
मैं तो मारवाड़ में बहुत भ्रमण किया हूं। एक से एक गजब के लोग! कहानियां ही सुनी थीं पहले, फिर आंखों से दर्शन करके बड़ी तृप्ति हुई। सच में ही पहुंचे हुए लोग हैं। झूठी ही बातें नहीं हैं उनके बाबत जो प्रचलित हैं। अतिशयोक्ति उनके संबंध में की ही नहीं जा सकती, वे हमेशा अतिशयोक्ति से एक कदम आगे रहते हैं। मेरा भी अनुभव यही है कि महा कंजूस! हद दर्जे के कंजूस! धन को यूं पकड़ते हैं जैसे कोई परमात्मा को भी न पकड़े।
धन को पकड़ना एक ही बात की सूचना देता है कि भीतर गहन दुख है, पीड़ा है। आनंदित व्यक्ति न धन को पकड़ता है, न पद को पकड़ता है। आनंदित व्यक्ति को जो मिल जाए उसको भोगता है; जो मिल जाए उसका आनंद लेता है। आनंदित व्यक्ति धन का दुश्मन नहीं होता, न धन को पकड़ता है, न धन को छोड़ कर भागता है।
मारवाड़ी या तो धन को पकड़ेगा या धन को छोड़ेगा। धन को पकड़ेगा तो यूं पकड़ेगा कि वही सब कुछ है। और किसी दिन भयभीत हो जाएगा। और हो ही जाएगा किसी दिन भयभीत, क्योंकि जब मौत करीब आने लगेगी तो दिखाई पड़ेगा--मैंने जीवन अपना यूं ही गंवा दिया। तो फिर धन को छोड़ेगा, फिर ऐसा भागेगा छोड़ कर...। वह भागता भी इसी डर से है कि अगर नहीं भागा तो फिर पकड़ लेगा।
इसलिए मारवाड़ में जैन मुनि का सम्मान है। मारवाड़ अड्डा है जैन मुनियों का। और जैन मुनियों का अड्डा होने का कारण है, क्योंकि मारवाड़ी सिर्फ जैन मुनि से प्रभावित होता है। वह कहता है, वाह, क्या गजब का त्याग है! क्योंकि वह दस पैसे नहीं छोड़ सकता और इन्होंने सब छोड़ दिया। स्वभावतः इनके प्रति उसके मन में बड़ा आदर भाव पैदा होता है।
यह हैरानी की बात है कि इस दुनिया में जितने लोभी लोग हैं, वे हमेशा त्यागियों का सम्मान करते हैं। इस अर्थों में इस पूरे देश में कुछ न कुछ मारवाड़ीपन है। इस देश में त्यागियों का इतना सम्मान इस बात का सबूत है कि हमारी धन के प्रति बड़ी लालसा है, बड़ा लोभ है। उस लोभ के कारण ही, जो उसको छोड़ने में समर्थ हो जाता है, हम कहते हैं कि इसने गजब का काम कर दिया! चमत्कार कर दिखाया, जादू कर दिया!
और वह सिर्फ इसलिए भाग रहा है कि अगर रुका तो फिर पकड़ लेगा। वह सब तरह की बागुड़ लगा रहा है अपने चारों तरफ, ताकि धन को फिर से न पकड़ ले। और यह सम्मान भी बागुड़ का हिस्सा बन जाता है। ये जो सम्मान देने वाले लोग हैं, ये भी कहते हैं कि अब हम इतना सम्मान दे रहे हैं, अगर फिर से पकड़ा धन को तो इतना ही अपमान देंगे।
इस देश को छुटकारा चाहिए--लोभ से भी और त्याग से भी। मेरी पूरी चेष्टा यही है। इसलिए मेरे खिलाफ भोगी भी होंगे और योगी भी होंगे। मुझे संसारी लोग भी गाली देंगे और मुझे तुम्हारे तथाकथित महात्मागण भी गाली देंगे, क्योंकि वे दोनों ही मारवाड़ीपन के दो छोर हैं। मेरा कहना यह है कि न तो भोग के लिए दीवाना होने की जरूरत है, न त्याग के लिए दीवाना होने की जरूरत है। हो हाथ में कुछ तो उसका आनंद लो, न हो तो न होने का आनंद लो। महल हो तो महल सही। क्यों छोड़ना! और न हो महल, वृक्ष के नीचे सोना पड़े, तो खुली हवा का मजा लो! खुले आकाश का मजा लो! खुले तारों का!
लेकिन लोग अजीब पागल हैं! महल में रहेंगे तो उनके मन में यह वासना बनी रहती है कि कब इसको छोड़ें, ताकि जाकर खुले आकाश के नीचे सोएं! और खुले आकाश के नीचे सोएंगे तो उनके भीतर आकांक्षा बनी रहती है कि कब महल में रहें! कब, कैसे महल में प्रवेश हो जाए!
मैं इस देश की--और इस देश की ही क्यों, सारी दुनिया की--इन दोनों अतियों से मुक्ति चाहता हूं। मैं चाहता हूं: व्यक्ति सम्यक हो, स्वस्थ हो। और स्वस्थ व्यक्ति ही मेरी दृष्टि में संन्यासी है। संन्यास अर्थात परम स्वास्थ्य--स्वयं में स्थिर हो जाना। कोई अति नहीं--न लोभ की, न त्याग की; न वासना की, न ब्रह्मचर्य की; न संसार की, न महात्मापन की। ऐसा अति सामान्य हो जाना, जैसे हूं ही नहीं। उस न होने में ही प्रभु-मिलन है, प्यारे का मिलन है।
पिय को खोजन मैं चली, आपुई गई हिराय!
जो भी उसे खोजने चला है, उसे अपने को खो देना पड़ता है। और यह ढंग है खोने का: मध्य में हो जाना अपने को खो देना है। अति पर गए कि अहंकार बच जाएगा। भोगी का भी अहंकार नहीं मरता, त्यागी का भी नहीं मरता है। सच तो यह है, भोगी से भी ज्यादा अहंकार त्यागी का होता है। अहंकार की मृत्यु परमात्मा का अनुभव है। धन्यभागी हैं वे जिनका अहंकार मर जाता है, और जो अपने अहंकार को मर जाने देते हैं। उससे बड़ा कोई सौभाग्य नहीं है।

आज इतना ही।