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शनिवार, 13 मई 2017

नहीं राम बिन ठांव-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-11

नहीं राम बिन ठांव-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रवचन-ग्याहरवां 
दिनांक 04 जून सन् 1974
ओशो आश्रम, पूना।

होतेई का झोला
सिद्धत्व उस दिन पूरा है, जिस दिन छोड़ा, छोड़े हुए में वापस रहने की कला भी आ गई। दूर हट गए और फिर पास भी आ गए, लेकिन अब संसार स्पर्श नहीं करता है।

प्रश्न:
भगवान, झेन फकीर होतेई कंधे पर झोला लटकाए घूमता,
बच्चों को मिठाइयां बांटता और उनके साथ सिर्फ खेला करता था।
जब रास्ते पर कोई झेन भक्त मिल जाता, तो वह नमस्कार करके उससे इतना ही कहता कि एक पैसा दे दो।
और जब कोई उससे कहता कि मंदिर में चलकर उपदेश करो, तब भी होतेई यही कहता कि एक पैसा दे दो।
एक बार जब वह बच्चों के साथ खेल रहा था, एक दूसरा झेन संत मिला, जिसने उससे पूछा: झेन का अर्थ क्या है? होतेई ने मूक उत्तर में अपना झोला जमीन पर डाल दिया। और जब उस संत ने पूछा कि झेन की उपलब्धि क्या है?
तब वह हंसता हुआ बुद्ध अपना झोला कंधे पर रखकर चलता बना।
और यह संत बहुत प्रसिद्ध संत हो गया। इनके संदेश क्या थे, कृपया समझाएं।


संतों का वक्तव्य या उनका जीवन किसी तर्क-सरणी के आधार पर नहीं चलता। उनके जीवन का कोई गणित नहीं है। वे किसी बंधी-बंधाई लकीर के फकीर नहीं होते। उनका जीवन है एक सहज स्पंदन। उस स्पंदन में हम कुछ अनुभव कर सकते हैं। उस स्पंदन का हम रहस्य-आस्वाद कर सकते हैं। लेकिन उस स्पंदन की कोई तार्किक, बुद्धिगत व्याख्या नहीं हो सकती।
तो पहली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि संतों का जीवन किसी नीति-नियम, किसी शास्त्र, किसी परंपरा, किसी ढांचे का जीवन नहीं है। वह नहर की भांति नहीं है, वह बहती हुई सरिता की भांति है। आयोजित नहीं है, क्षण-क्षण चेतना से जो स्पंदन उठते हैं, उनको उनकी परिपूर्णता में जीने से संत का जीवन निकलता है।
दुर्जन हम उसे कहते हैं, जिसके जीवन में बुराई का ढांचा है; जो ढांचे से जीता है, लेकिन ढांचा बुराई का है। जिसने चोरी का, बेईमानी का आयोजन कर रखा है; जो सोच-विचारकर, हिसाब लगाकर, बुराई के मार्ग पर चल रहा है। बुराई उसकी चुनी हुई जीवन की शैली है, यह उसका निर्णय है।
सज्जन हम उसे कहते हैं, जिसने भलाई को जीवन का ढांचा बनाया है। अच्छा करना, दान, दया, इन सबको उसने सोचा-विचारा है, हिसाब लगाया है। और फिर इनके अनुसार उसने अपने जीवन को ढाला है।
बुरे आदमी और भले आदमी दोनों के जीवन ढांचे में बंधे जीवन हैं। एक तीसरा जीवन है संत का, जो ढांचे से मुक्त जीवन है। इसलिए दो संतों के जीवन एक जैसे नहीं होंगे। एक जैसा जीवन तो तभी हो सकता है, जब एक ढांचे में ढाला गया हो। तो फिएट कारें एक जैसी हो सकती हैं करोड़ों, एक ढांचे से निकलती हैं। लेकिन दो पौधे एक जैसे नहीं हो सकते। पौधे तो दूर, दो पत्ते एक जैसे नहीं हो सकते। दो कंकड़ इस बड़ी पृथ्वी पर एक जैसे नहीं खोजे जा सकते। क्योंकि हर कंकड़ उठा है अनंत से, वह किसी ढांचे से पैदा नहीं हुआ है।
इसलिए अस्तित्व में कोई चीज दोहरती नहीं, पुनरुक्त नहीं होती। प्रत्येक वस्तु अनूठी है, बेजोड़ है।
संत अपने को आयोजित नहीं करता--न बुराई की तरफ, न भलाई की तरफ। संत अपने जीवन को कोई व्यवस्था नहीं देता। संत अराजकता में होश से जीता है। यह बात बहुत गहराई से समझ लेने जैसी है। क्योंकि अराजकता में आप बेहोशी से भी जी सकते हैं।
अगर आप अराजकता में बेहोशी से जीए, तो दुर्जन पैदा होगा। आप कितना ही सोचें कि ढांचा नहीं है, ढांचा होगा। अगर आप होश से न जीए, नियम-अनुशासन से जीए, अराजकता से नहीं, तो सज्जन पैदा होगा।
लेकिन अराजकता--कोई नियम नहीं, कोई शास्त्र नहीं, कोई ढांचा नहीं--और होश, जैसे होश ही एकमात्र शास्त्र है। अपने को जगाए रखना ही जैसे एकमात्र नियम है, परम नियम है। यही संत की जीवनचर्या है। इसे चर्या कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि चर्या में लगता है कि कुछ सोचा-विचारा हुआ आचरण है। जागे हुए जीने से जो घट जाए, वही संत का आचरण है। अमूर्च्छित आचरण संतत्व है। इसलिए दो संतों के जीवन एक जैसे न होंगे। और किसी भी संत को समझना हो, तो उसके जीवन को रहस्य की भांति देखना शुरू करना।
समझने के दो रास्ते हैं। एक फूल खिला है, एक रास्ता तो वैज्ञानिक का है: इस फूल को तोड़ो, इसकी पंखुड़ियां अलग करो, इसका विश्लेषण करो, इसके तत्वों को भिन्न-भिन्न करो; कितने रासायनिक हैं, कितने खनिज हैं, कैसे यह फूल बना है, इस सबकी पूरी व्यवस्था खोज लो--यह विज्ञान का ढंग है समझने का। इसमें तोड़ना जरूरी है, विश्लेषण, एनालिसिस जरूरी है।
फूल खो जाएगा, फूल का ढांचा समझ में आ जाएगा। बिलकुल पक्का पता चल जाएगा कि किन-किन रासायनिक तत्वों से मिलकर बना। लेकिन इस पता चलने में फूल का सौंदर्य तिरोहित हो जाएगा, क्योंकि फूल कुछ भी था तो अपनी पूर्णता में था। पंखुड़ियां अलग होकर, टूटकर, रासायनिक द्रव्य अलग-अलग शीशियों में रख जाएंगे, फार्मूला कागज पर आ जाएगा, लेकिन फूल खो जाएगा। वह खिलापन, वह सौंदर्य, वह ताजगी, वह सब खो जाएगी। वह जो फूल परमात्मा के एक गीत के टुकड़े की तरह था; वह फूल, जो परमात्मा के एक इंगित-इशारे की तरह था, वह खो गया। कागज पर सूत्र हाथ आ गया। यह विज्ञान का ढंग है समझने का।
इसलिए विज्ञान कभी आत्मा को नहीं समझ पाता, क्योंकि आत्मा को तोड़ने का कोई उपाय नहीं। शरीर को समझ लेता है, क्योंकि शरीर तोड़ा जाता है। शरीर को समझ लेता है, क्योंकि उसके तत्व अलग किए जा सकते हैं--कितना है पानी, कितना ऑक्सीजन, कितना हाइड्रोजन, कितने खनिज। आत्मा अखंड है। वह किन्हीं चीजों से मिलकर नहीं बनी। इसलिए उसका विश्लेषण नहीं होता। जिसका विश्लेषण नहीं होता, विज्ञान कहता है, वह है ही नहीं, क्योंकि उसको समझने का कोई उपाय नहीं। इतना भी समझने का उपाय नहीं कि वह है।
इसलिए विज्ञान आत्मा को स्वीकार कभी भी नहीं करेगा, जब तक कि आत्मा खंडित होने को राजी न हो, जो कि आत्मा का स्वभाव नहीं है। इसलिए विज्ञान परमात्मा को कभी स्वीकार नहीं करेगा। जगत को स्वीकार करता है, सृष्टि को मानता है, स्रष्टा को नहीं। क्योंकि सृष्टि की व्याख्या हो सकती है। एक तो यह ढंग है।
एक और ढंग है, वह है रहस्यवादी का; वैज्ञानिक का नहीं, संत का। अगर संत को पूछें कि फूल क्या है, तो संत फूल को तोड़ेगा नहीं। क्योंकि टूटते ही फूल का स्वरूप बदल जाएगा। फिर तुम जो भी जानोगे, वह वही नहीं है, जिसको तुम जानने चले थे। उसका गुणधर्म बदल गया। तो संत तो फूल को वृक्ष से अलग भी नहीं करेगा। क्योंकि वृक्ष के साथ अलग हुआ फूल और ही चीज है। वृक्ष के साथ जुड़ा हुआ फूल और ही चीज है। ये दोनों इतनी पृथक हैं चीजें! क्योंकि वृक्ष के साथ जीवंत था, वृक्ष से अलग होकर मृत है। यह फर्क उतना ही है, जितना तुम जिंदा और तुम मुर्दा, तुम्हारी लाश और तुममें है। तो संत तो कहेगा कि तुमने तोड़ा, वहीं गुणधर्म बदल गया; अब तुम जिसे जानोगे, वह मुर्दा होगा। वह खबर मृत्यु के संबंध में होगी। पूछा था जीवित फूल के संबंध में; सूत्र जब तुम लाओगे निकालकर प्रयोगशाला से, वह मरा हुआ होगा। तो संत फूल को वृक्ष से तोड़ेगा नहीं। फिर संत क्या करेगा?
संत फूल को छुएगा भी नहीं, क्योंकि छूना बाहर से होगा। तो परिधि को हम पहचान सकते हैं स्पर्श से कि कोमल है, कि खुरदरी है। लेकिन अंतरात्मा को हम कैसे छुएंगे? उसे छूने का कोई उपाय नहीं, वह स्पर्श के बाहर है। और संत फूल के शरीर में उत्सुक भी नहीं है। क्योंकि फूल में जब आपको सौंदर्य दिखता है तो वह शरीर नहीं है, वह शरीर के भीतर से आती हुई आत्मा की किरणें हैं। संत क्या करेगा?
संत ध्यान करेगा, फूल के पास बैठ जाएगा। फूल में कुछ भी बदलाहट न करेगा, अपने में बदलाहट करेगा; कि सब विचार शांत हो जाएं। फूल को जरा भी न छुएगा, अपने को रूपांतरित करेगा; कि यहां हृदय बिलकुल मौन हो जाए। यहां हृदय इतना मौन हो जाए कि फूल पूरी तरह प्रवेश कर सके। यहां भीतर की सब सीमाएं गिर जाएं, ताकि फूल भी अपनी सुरक्षा का आयोजन तोड़ दे।
क्योंकि जब तुम आयोजित होते हो सुरक्षा में, तो दूसरा भी तैयार होता है। जब तुम अपने चारों तरफ दीवाल खड़ी करते हो, तो दूसरा भी खड़ी करता है। दूसरा तुमसे डरा है। जब तुम अपनी सब दीवाल हटा लेते हो, तो दूसरा भी निर्भय हो जाता है।
संत ध्यान से प्रेमपूर्वक फूल के पास बैठेगा। यह फूल का जो ध्यान है, इसमें वह अपने को फूल में लीन करेगा, फूल को अपने में लीन होने देगा। एक घड़ी आएगी, जब संत भी वहां नहीं बचेगा, फूल भी वहां नहीं बचेगा। दोनों की जीवनधाराएं एक-दूसरे में लीन, एक-दूसरे में लयबद्ध हो जाएंगी। तब संत जानेगा कि फूल क्या है! तब वह कहेगा, जिसने एक फूल को जान लिया, उसने सब परमात्मा को जान लिया। यह रहस्यवादी का ढंग है।
होतेई की यह जीवन की घटना है। यह बड़ा अनूठा संत हुआ होतेई। इसको अगर आप पुराने किसी और संत से तौलेंगे, तो मुश्किल खड़ी होगी, क्योंकि तुलना हो नहीं सकती। इस जैसा दूसरा संत कभी हुआ नहीं। यह होतेई जीवनभर एक गांव से दूसरे गांव चलता रहा, कहीं रुका नहीं, रुकना उसकी आदत न थी। किसी ने होतेई से एक बार पूछा कि ध्यान का सार-सूत्र क्या है? तो होतेई ने कहा, वाक ऑन! चलते जाओ, रुको मत। रुके कि ध्यान गया। जहां हम रुकते हैं, वहीं मन निर्मित होता है। जहां नदी रुकती है, वहीं सरोवर हो जाती है और सड़ने लगती है। होतेई कहता है, चलते रहो, रुको मत। कोई मंजिल नहीं, चलना ही मंजिल है। कहीं पहुंचना नहीं, बहना ही पहुंचना है--बहाव।
यह बुद्ध की एक बहुत गहरी अंतरानुभूति पर निर्भर बात है। क्योंकि बुद्ध ने कहा, जगत में वस्तुएं नहीं हैं, प्रक्रियाएं हैं। तुम भी व्यक्ति नहीं हो, एक प्रक्रिया हो। आमतौर से भाषा के कारण हम सब चीजों को वस्तुओं में बदल देते हैं। हम कहते हैं, नदी है। बुद्ध से पूछो। बुद्ध कहते हैं, है जैसा कुछ भी नहीं, नदी हो रही है। है में तो स्थिरता मालूम पड़ती है, लेकिन नदी कभी भी है की अवस्था में नहीं होती, हमेशा होती रहती है। हम कहते हैं, वृक्ष है। तो ऐसा लगता है, सब ठहरा हुआ है, भाषा के कारण। वृक्ष प्रतिपल हो रहा है। कोई पुराना पत्ता गिरा होगा, जब मैंने कहा, वृक्ष है, कोई नया पत्ता जन्मा होगा। कोई फूल हवा में झड़ गया होगा, कोई कली फूल बन रही होगी। तो वृक्ष कोई ठहरी हुई चीज नहीं है, एक प्रवाह है, एक प्रोसेस है।
तुम भी एक प्रवाह हो। इसलिए बुद्ध कहते हैं, आदमी में कोई आत्मा नहीं। क्योंकि आत्मा कहते ही से ऐसा लगता है, कोई चीज, कोई ठहरी हुई चीज। बुद्ध कहते हैं, आदमी एक प्रवाह है, एक सतत धारा है। जैसे हम दीए को जलाते हैं, तो ज्योति दिखाई पड़ती है। लेकिन ज्योति ठहरी हुई नहीं है, प्रतिपल बदल रही है, बदलती ही जा रही है। परिवर्तन के अतिरिक्त और कुछ भी शाश्वत नहीं है, बुद्ध कहते हैं। बस एक ही चीज सदा है और वह परिवर्तन है। और प्रत्येक वस्तु वस्तु नहीं है, प्रक्रिया है।
तो यह जो होतेई ने कहा वाक ऑन, बस यही सार है ध्यान का कि बढ़ते जाओ। मन सदा रुकना चाहता है। इसलिए मन हमेशा मंजिल की तलाश करता है और कहीं भी मंजिल को मानकर ठहर जाता है। कोई मन धन पर रुक जाता है, कोई मन यश पर रुक जाता है, कोई मन कहीं और, लेकिन रुकना मन चाहता है कि बस रुको। जिस दिन तुम रुकने की आकांक्षा से मुक्त हो जाओगे, जिस दिन तुम मंजिल मांगोगे ही नहीं, उस दिन तुम्हारी मंजिल आ गई। उस दिन तुम्हारे चित्त में कोई भी तनाव न रह जाएगा। क्योंकि कहीं पहुंचना नहीं, तो तनाव क्या है?
कभी तुमने खयाल किया, सुबह तुम घूमने निकले हो, तब कोई तनाव नहीं होता। रास्ता वही है, दिशा वही है; दोपहर उसी रास्ते पर फिर तुम दफ्तर की तरफ या दुकान की तरफ जाते हो, तब तनाव होता है। रास्ता वही है, तुम भी वही हो, दिशा भी वही है, लेकिन अब तुम कहीं जा रहे हो, कहीं पहुंचना है। अगर न पहुंचे, देर हो गई, तो अड़चन है, तो तनाव है। लेकिन सुबह तुम वहीं घूमने निकले थे। वही रास्ता था। लेकिन तुम्हारी चाल में जो मस्ती थी, वह अब नहीं है। और तुम्हारा हृदय हल्का-फुल्का था। क्योंकि न कहीं पहुंचना था, न कोई जल्दी थी। न पहुंचे तो चलेगा, पहुंचे तो चलेगा, पहुंचना कहीं था नहीं, कहीं से भी वापस लौट आए तो चलेगा। इसलिए घूमने में जो आनंद आता है, वह कहीं जाने में नहीं आता।
तुम खेल खेलते हो, तब एक सुख की प्रतीति होती है। लेकिन वही खेल तुम एक प्रोफेशनल की तरह खेलो, तब सुख की प्रतीति नहीं होती। तुम ताश खेल रहे हो या कि शतरंज खेल रहे हो, सिर्फ खेल रहे हो। हारे तो ठीक, जीते तो ठीक। जीत में रस नहीं है, खेल में ही रस है। तब एक बात है। लेकिन किसी ने तुमको नौकरी पर रखा है शतरंज खेलने के लिए, तब बिलकुल बात दूसरी है। तब खेल खेल न रहा, व्यवसाय हो गया।
जहां साध्य आया, वहां व्यवसाय आया। जहां मंजिल आई, वहां धंधा आया। अब यह जरा कठिन होगा समझना। क्योंकि हम सोचते हैं, एक आदमी ने दुकान छोड़ दी है, हिमालय चला गया, सब व्यवसाय छोड़ दिया। वह वहां भी व्यवसाय कर रहा है, अगर साध्य उसके मन में है। अगर वह सोच रहा है, हिमालय पर बैठकर मैं परमात्मा को पा लूंगा, तो धंधा जारी है। दि एंड, वह जो पीछे अंत-फल है, अगर उस पर नजर लगी है, तो धंधा जारी है।
अगर वह हिमालय पर बैठकर आनंदित है--परमात्मा मिले तो, न मिले तो, मिल गया तो ठीक, न मिला तो उतना ही ठीक--तो उसका हिमालय पर बैठना धार्मिक कृत्य हो गया। जहां साधन ही साध्य है। यहीं होना जहां मंजिल पर होना है। इसको ही अगर हम दूसरी भाषा में कहें तो परमतृप्ति कहते हैं, संतोष। संतोष का अर्थ है, जहां साधन ही साध्य है। असंतोष का अर्थ है, साधन अलग, साध्य अलग। और साधन को हम इसीलिए चला रहे हैं कि किसी तरह साध्य मिल जाए। और हमारा मन साध्य में जीता है। तो जब तक तुम्हारे जीवन में कोई भी साध्य है--मोक्ष, परमात्मा, शांति, आनंद--कुछ भी साध्य है, तब तक तुम दुकानदार ही रहोगे। तब तक तुम्हारे जीवन में वह हल्कापन नहीं हो सकता, जो ध्यानी के जीवन में आता है।
होतेई कहता है कि ध्यान का अर्थ है, वाक ऑन। कहीं रुको मत, बढ़ते ही जाओ। किसी दिशा में भी बढ़ने का सवाल नहीं है, सिर्फ रुको मत, बहते ही जाओ। तुम्हारा बहाव कहीं ठहरे न, तुम गंदे न हो जाओ।
 सरोवर गंदा होता है, सरिता कभी गंदी नहीं होती। और कितनी ही गंदगी हम सरिता में फेंक दें, वह गंदगी भी निखर जाती है, सरिता स्वच्छ बनी रहती है। और सरोवर में गंदगी न भी फेंको, तो भी गंदा हो जाएगा। क्योंकि बंद है, बहाव नहीं है, सड़ेगा, सूखेगा। सरिता सड़ नहीं सकती।
तुम्हारा जीवन जब धंधे का जीवन होता है, तो एक सरोवर की तरह, एक डबरे की तरह। जब तुम्हारा जीवन ध्यान का जीवन होता है, तो एक सरिता की भांति।
यह होतेई किसी गांव रुकता नहीं था--किसी नियम के कारण नहीं। यही मजा है समझने का। महावीर ने अपने संन्यासियों को कहा है कि तीन दिन से ज्यादा एक गांव में न रुकें। ठीक है। बहुत सोचकर कहा है। क्योंकि तीन दिन हमारे मन की सीमा है। चौथे दिन से लगाव शुरू होता है। अगर आप मकान बदलें और नए मकान में जाएं, तो तीन दिन तक अजनबीपन लगेगा। चौथे दिन से मकान अपना लगेगा।
इसलिए हिंदू, जब कोई मर जाता है, तो तीसरा मनाते हैं। असल में चौथे दिन से, वह जो आदमी जा चुका, सच में जा चुका। तीन दिन तक वह खलता है उसका अभाव, चौथे दिन स्वीकृत होने लगता है।
मनोवैज्ञानिक बहुत अध्ययन करके कहे हैं कि तीन दिन मन की सीमा है। कोई भी चीज के साथ लगाव बनाना हो, तो कम से कम तीन दिन साथ चाहिए। महावीर ने कहा कि तीन दिन से ज्यादा साधु किसी गांव में न रुके। सिर्फ इसलिए, ताकि गांव ठहराव न बन जाए, सरिता रुकने न लगे। तीन दिन के बाद मोह पैदा होंगे। किसी से प्रीति बन जाएगी, किसी से दुश्मनी बन जाएगी, कोई अच्छा लगेगा, कोई बुरा लगेगा। मन होगा कि कोई पास रहे, मन होगा कि कोई पास न रहे। बस, गृहस्थी बननी शुरू हो गई।
लेकिन इसको नियम की तरह जो मानेगा, वह सार से वंचित रह जाएगा। यह कोई नियम नहीं है। क्योंकि तुम तीन क्षण में लगाव बना सकते हो, लगाव ही बनाना है तो। और लगाव न बनाना हो, तो तुम तीन जन्मों तक भी लगाव से मुक्त रह सकते हो। नियम तो ऊपर-ऊपर हैं, कामचलाऊ हैं, नासमझों के लिए हैं। समझदार तो सार को पकड़ेगा।
यह होतेई किसी गांव में रुकता नहीं था, सिर्फ गुजरता था। एक झोला अपने कंधे पर टांगे रखता था। न तो बुद्ध, न कृष्ण, न क्राइस्ट, कोई झोला टांगे हुए दिखाई नहीं पड़े। यह सदा एक झोला अपने कंधे पर टांगे रखता था। और झोले में होती थीं मिठाइयां, खिलौने, फुलझड़ी, पटाखे, बच्चों के सामान। यह आदमी बड़ा अदभुत रहा होगा।
संतों के सामने हम सब बच्चों से ज्यादा नहीं हैं। और हमारी सारी जीवन-व्यवस्था बचकानी है। खिलौनों से ही हम खेलते हैं बूढ़े होकर भी। खिलौनों का थोड़ा रंग-रोगन बदल जाता है। छोटे बच्चे गुड्डा-गुड्डी की शादी करते हैं। हम गुड्डा-गुड्डी की शादी नहीं करते, जीवित गुड्डा-गुड्डी की शादी करते हैं, बेटा-बेटी। लेकिन कभी छोटे बच्चों को शादी करते देखा हो, तो जैसी उत्तेजना और एक्साइटमेंट और जैसा आनंद और अहोभाव उन्हें मालूम पड़ता है, उससे कम हमें नहीं मालूम पड़ता। वही सब, जो छोटे बच्चे करते हैं, हम बड़े होकर करते हैं। विस्तार बड़ा हो जाता है, लेकिन बीज वही रहता है। और न केवल लड़के-लड़कियों की शादियां हम करते हैं, सीता-राम की भी शादी करते हैं। सीता बना लेते हैं, राम बना लेते हैं, जुलूस निकालते हैं, रामलीला करते हैं। उसमें बड़े-बूढ़े भी वैसे ही सम्मिलित होते हैं। बारात जाती है। और उसमें वैसे ही हम रस लेते हैं, जैसा छोटे बच्चे ले रहे हैं। बच्चे का खिलौना टूट जाए तो उसे पीड़ा होती है, तुम्हारे मंदिर की मूर्ति फूट जाए तो तुम्हें पीड़ा होती है। बच्चे को हम कहते हैं, तू बचकाना है, नासमझ है, खिलौना ही टूटा है, किसी की जान तो नहीं निकल गई! लेकिन तुम्हारी मूर्ति खिलौने से ज्यादा कहां है?
तुम कहोगे, लेकिन हमने इस मूर्ति में प्रतिष्ठा की है भगवान की। उस बच्चे ने भी अपने खिलौने में किसी की प्रतिष्ठा की है। अगर प्रतिष्ठा का ही सवाल हो तो बच्चे की प्रतिष्ठा तुमसे ज्यादा गहरी होगी, क्योंकि वह भोला है। तुम तो चालाक हो। तुम मूर्ति को खरीदकर ले आए हो और तुमने पंडित-पुजारियों को बिठाकर, बैंड-बाजा बजाकर घोषणा कर दी कि भगवान की प्रतिष्ठा हो गई। बाकी तुम गहरे में जानते हो कि भगवान अपने ही खरीदे हुए हैं, बेहतर भी खरीदे जा सकते थे, जरा पैसे की कमी थी। सस्ता तुम खरीद लाए हो, खरीदते वक्त तुमने पूरा मोल-भाव किया है। और तुम यह भी जानते हो कि जिन पंडे-पुजारियों ने यह शोरगुल मचाया हुआ है, वे भी खरीदे हुए नौकर थे। न उनका भाव था, न तुम्हारा भाव था, सब धन का खेल था। भगवान खड़े हो गए हैं। अब तुम उन्हीं के सामने सिर झुकाए खड़े हो, प्रार्थना कर रहे हो कि हे पतितपावन!
बचपन अदभुत है। छोटे बच्चे की बात में तो थोड़ी सरलता भी है, क्योंकि उसका भाव गहरा है, खिलौना उसे जीवित हो गया है। लेकिन तुम्हारा परमात्मा तुम्हें जीवित नहीं हुआ है। फिर भी उसका हाथ टूट जाए, पैर टूट जाए, कोई दुश्मन आकर मूर्ति को तोड़ जाए, तो हत्याएं हो जाएंगी। कोई मुसलमान मूर्ति को तोड़ दे कि कोई हिंदू मस्जिद में आग लगा दे, कि सैकड़ों की हत्याएं हो जाएंगी, खून-खराबा हो जाएगा, छुरे निकल आएंगे।
आदमी बचकाना है। होतेई के झोले में पड़े हुए खिलौने तुम्हारे बच्चे होने की खबर है। होतेई यह कह रहा है कि तुम्हें और देने को है भी क्या, तुम कुछ और लेने को राजी भी नहीं हो। या तो खिलौने, फुलझड़ी, पटाखे या मिठाइयां--बस यही तुम्हारा रस है।
होतेई तुम्हें परमात्मा भी दे सकता है। उसके झोले में वह भी है। पर तुम उसे मांगोगे नहीं, तुम उसे चाहते भी नहीं हो। और जो तुमने मांगा ही नहीं, चाहा नहीं, वह तुम्हें दिया भी नहीं जा सकता। तुम चीजें ही अजीब मांगते हो। होतेई का झोला तुम्हारे मन की खबर है। अन्यथा होतेई उस बोझ को न ढोता।
मेरे पास लोग आते हैं, मैं कभी हैरान होता हूं उनकी बातें सुनकर। कोई आ जाता है कि उसे नौकरी नहीं मिल रही, कोई आ जाता है कि बीमारी दूर नहीं हो रही, कोई आ जाता है कि पति-पत्नी में बन नहीं रही।
कब पति-पत्नी में बनी है? कब कौन पूरा स्वस्थ हुआ है कि संतुष्ट हो जाए? और कब कौन-सी नौकरी ऐसी लगी है कि मिल गई जो चाहिए थी?
तुम जो मांगते हो, उसका उत्तर है होतेई के झोले में। होतेई गुजरता है एक गांव से दूसरे गांव, और बांटता जाता है चीजें लोगों को। छोटे बच्चे उसे घेर लेते हैं, वह मिठाइयां बांट देता है, खिलौने बांट देता है।
चलते ही रहना और बांटते ही जाना, संतत्व का आधार है।
इसमें थोड़ा समझ लें। जो रुकेगा, वह बांटने से डरेगा। जो चलता ही रहेगा, वही बांट सकता है। क्योंकि रुकने वाले को अपने चारों तरफ परिग्रह जमाना पड़ता है। जमाना ही पड़ेगा, नहीं तो रुकेगा कहां? घर बनाना हो, घर बसाना हो, तो चीजें आप बांट नहीं सकते, बचानी पड़ेंगी। सिर्फ खानाबदोश ही बांट सकता है।
इसलिए आप देखते हैं, खानाबदोश कौमें हैं, कबीले हैं, हब्शी हैं, बलूची हैं, कभी धनी नहीं हो सकते। कोई हब्शी धनी नहीं हो सकता, कोई उपाय नहीं है। कोई बलूची लाख कोशिश करे, तो भी फोर्ड नहीं हो सकता। कैसे होगा? फोर्ड होने के लिए रुकना जरूरी है। बलूची चलता ही रहता है। जो चलता ही रहता है, वह उतना ही ले चल सकता है, जितना अपने कंधे पर ढो सके, उससे ज्यादा नहीं।
यह जो उर्दू का शब्द है खानाबदोश, यह बड़ा प्यारा शब्द है। इसका मतलब है, जिसका घर अपने कंधे पर है। खाना का मतलब घर और बदोश का मतलब कंधे पर--जिसका घर अपने कंधे पर है। अब घर कंधे पर बनाना हो, तो कोई बहुत बड़ा महल नहीं बना सकते। होतेई का झोला रह जाएगा। और उस झोले में भी चीजें दूसरों के लिए होंगी, बांटने के लिए होंगी।
जो बहेगा, वह बांटेगा भी, यह दोनों का जोड़ है। जो रुकेगा, वह संगृहीत करेगा।
जैनों और बौद्धों ने संन्यासियों को आश्रम में रहने की इसीलिए मनाही कर दी। जैनों और बौद्धों ने आश्रम नहीं बनाए। क्योंकि हिंदू आश्रम जिस हालत में पहुंच गया उससे साफ हो गई बात कि अगर आश्रम बनता है, तो परिग्रह इकट्ठा हो जाएगा। इसलिए जैन और बौद्ध दोनों ने संन्यासियों को कह दिया कि वे चलते ही रहें, परिव्राजक हों।
दोनों के फायदे और हानियां हैं। यह बात तो समझ में आती है कि साधु चलता ही रहे। चलता रहे, तो उसके पास इकट्ठा नहीं होगा, संग्रह नहीं होगा। लेकिन इसका नुकसान था, वह जैनों और बौद्धों को समझ लेना पड़ा। नुकसान यह था कि अगर साधु चलता ही रहे साधना के क्षण में...। होतेई तो सिद्ध है, तो सिद्ध रुके कि चलता रहे, चलता ही रहता है, कोई फर्क नहीं पड़ता। सिद्ध रुके तो भी रुकता नहीं, क्योंकि उसके भीतर तो बहाव होता ही रहता है, चलता भी रहे, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन साधक अगर चलता ही रहे तो सिद्ध कभी हो ही नहीं पाता। क्योंकि चलते रहने का उपद्रव इतना ज्यादा है कि बैठने की उसे सुविधा नहीं मिल पाती। और ध्यान के लिए बैठना उतना ही जरूरी है, जितना चलते रहना। और सिद्ध का अर्थ है, जो चलते हुए भी बैठा हुआ है, जो बैठे हुए भी चल रहा है, जिसने विपरीत को जोड़ लिया।
तो जैनों और बौद्धों से ध्यान बिलकुल खो गया, योग बिलकुल खो गया। आश्रम तो नहीं बने, परिग्रह भी नहीं बना, लेकिन आश्रम की छाया में जो ध्यान गहरा हो सकता था, कहीं बैठकर निश्चिंत भाव से जो अपने में डूब सकते थे, वह मौका नहीं मिला। इसलिए जैन साधु की जीवनचर्या जो है, सुबह से शाम तक बड़ी व्यवसायगत है। सुबह से शाम तक काम ही काम है, उसमें विश्राम का उपाय नहीं है। उसमें बैठने की सुविधा नहीं है। और विश्राम का मौका आए, इसके पहले गांव छोड़ देना है, फिर चल पड़ना है। तो एक फायदा हुआ कि जैन और बौद्ध साधु परिग्रही नहीं हुआ, लेकिन एक नुकसान हुआ कि ध्यानी नहीं हो पाया।
हिंदुओं ने इसीलिए आश्रम बनाए थे ताकि लोग ध्यान को उपलब्ध हो जाएं। और जब ध्यान उपलब्ध हो जाए, तो सिद्ध को फिर कोई सवाल नहीं है, वह चले कि रुके, जैसा उसको सहज हो।
होतेई चलता ही रहता है और बांटता ही जाता है, जो भी उसके झोले में है। लेकिन बच्चे ही उसके आसपास इकट्ठे होते हैं। इसका आप यह मतलब मत समझना कि छोटे बच्चे ही इकट्ठे होते हैं, बच्चे ही हैं--दो तरह की उम्र के, छोटे और बड़े। कोई पांच साल के बच्चे हैं, कोई पचास साल के बच्चे हैं। होतेई जहां भी जाता है, गांव में बच्चे उसे घेर लेते हैं। वह अपने झोले से मिठाइयां उन्हें बांट देता है। वह परमात्मा भी झोले में लाया है, लेकिन कोई मांगने वाला आता नहीं। और जो भी उसके पास आता है, वह कहता है, एक पैसा दे दो।
एक पैसा छोटी से छोटी इकाई है। उससे ज्यादा वह किसी से मांगता नहीं है। कभी जीवनभर उसने इससे ज्यादा नहीं मांगा। एक पैसा वह मांगता है, छोटी से छोटी इकाई, कई कारणों से। एक पैसा भी देना तुम्हें बहुत कष्टपूर्ण है। देना ही कष्टपूर्ण है। लेने में सुख मालूम पड़ता है, देने में कष्ट मालूम पड़ता है। जब कि सचाई बिलकुल उलटी है। देने में जैसा सुख है, वैसा लेने में कभी भी नहीं है। और जब भी तुमने दिया है, तो तुमने सुख पाया है। और जब भी तुमने लिया है, तभी तुम सुख से वंचित रह गए हो।
यहां समझ लेने जैसा है कि होतेई तुमसे एक पैसा मांगता है, शायद तुमको लगता होगा, इसे एक पैसे की जरूरत है, तुम गलत समझे। यह एक पैसा तुमसे मांगता है, ताकि तुम्हें थोड़ा सुख उपलब्ध हो सके, जो कि देने से ही उपलब्ध होता है।
एक बार ऐसा हुआ, एक फकीर के पास एक धनपति आया। वह पांच हजार स्वर्ण-मुद्राएं भेंट करने लाया। उसने स्वर्ण-मुद्राओं का झोला फकीर के द्वार पर जोर से पटका, झन-झन के साथ स्वर्ण-मुद्राएं बजीं। वह आकस्मिक नहीं था पटकना, हालांकि उसने ऐसा ही समझा कि आकस्मिक आवाज हुई है।
मन हमारा बड़ा चालाक है। पत्नी सोचती है कि आकस्मिक रूप से उसके हाथ से बर्तन गिर गया है। आकस्मिक नहीं गिर गया है। आज पति से नाराज है। वह भी समझती है कि यह आकस्मिक गिर रहा है, पति भी समझता है। लेकिन यह आकस्मिक नहीं गिर रहा है। जिस दिन पति और पत्नी में नहीं बनती, उस दिन छह गुने ज्यादा बर्तन गिरते हैं, छह गुनी ज्यादा चीजें टूटती हैं, घर में छह गुनी ज्यादा आवाज होती है। हर बार दरवाजा बंद होता है तो आवाज आती है, हर चीज रखी जाती है तो आवाज आती है। पत्नी, शायद आप पूछें, तो वह यही कहेगी कि दरवाजा जोर से लगा क्योंकि हवा तेज थी। हवा कल भी तेज थी, परसों भी तेज थी, हवा आगे भी तेज रहेगी, हवा की तेजी से दरवाजे में आवाज नहीं आती। भीतर कहीं क्रोध है, वह सब तरफ से निकल रहा है।
उस धनपति ने रुपए पटके तो उसने नहीं सोचा होगा कि मैं जानकर पटक रहा हूं। लेकिन जब भी कोई देता है, तो घोषणा करता है।
हमें मजा देने में नहीं है, दिया, इस अहंकार के अर्जित करने में है।
लेकिन फकीर ने कुछ गौर न किया। उस धनपति ने कहा कि पांच हजार स्वर्ण-मुद्राएं लाया हूं भेंट करने। फकीर ने कहा कि ठीक है, रख जाओ। कोई ज्यादा रस न लिया। धनपति ने सोचा कि शायद फकीर समझा नहीं। पांच हजार स्वर्ण-मुद्राएं! कभी गिनी भी न होंगी, देखी भी न होंगी--मन में सोचा।
उसने कहा कि पांच हजार, सुना आपने ठीक से? फकीर ने कहा कि दुबारा दोहराने की जरूरत नहीं, मेरे कान अभी बिलकुल ठीक हैं, सुन लिया। धनपति बड़ा बेचैनी में पड़ा कि धन्यवाद तक नहीं। तो धनपति ने कहा कि भला मैं कितना ही अमीर हूं, पांच हजार स्वर्ण-मुद्राएं मेरे लिए भी ज्यादा हैं। उस फकीर ने कहा कि मतलब की बात कहो, धन्यवाद चाहते हो? लंबी चर्चा क्यों बढ़ाते हो? क्या तुम्हारी इच्छा है कि मैं धन्यवाद दूं? अगर देने में ही तुम्हें आनंद नहीं आया, तो मेरे धन्यवाद से कैसे आएगा? तुम चूक ही गए आनंद का क्षण तो। वह देने में था।
होतेई तुमसे एक पैसा मांगता, अगर तुम उसे रास्ते पर मिल जाते। तुम भी यही सोचते कि एक पैसा लेने के लिए, इसे एक पैसे की जरूरत है, इसलिए मांग रहा है। होतेई तुम्हें सिर्फ सुख की थोड़ी-सी सुगंध देना चाहता था।
अगर बुद्धों ने भिक्षा मांगी है तुम्हारे द्वार पर, तो तुम्हें देने का थोड़ा-सा रस लेने के लिए।
उस फकीर ने उस धनपति से कहा, अगर बात ही तू मतलब की समझना चाहता हो, तो धन्यवाद तू मुझे दे। क्योंकि मैंने तुझे मौका दिया है कि तू देने का आनंद ले सके। धन्यवाद तू मुझे दे, अगर बात ही तुझे ढंग की करनी है तो। मुझसे धन्यवाद मांगने का तो कोई सवाल ही नहीं है।
तो होतेई एक पैसा मांगता। और अगर कोई पूछता, कभी कोई साधु, संन्यासी, कोई खोजी मिल जाता और पूछता कि झेन क्या है? ध्यान क्या है? धर्म का रहस्य क्या है? तो भी वह कहता, एक पैसा दे दो। वह कहता कि देना ही ध्यान का रहस्य है। और तुम देने में समर्थ हो जाओ, तो तुम ध्यान में समर्थ हो जाओगे।
जितना ही हम लेना और लेने में रस लेते हैं, उतना ही चित्त विचारों से भरता जाता है। इसलिए धनपति रात सो नहीं पाता, सो नहीं सकता। क्योंकि जितना ही लेने की वासना बढ़ती है, उतना ही विचारों का चक्र भीतर चलने लगता है। थोड़ा सोचो। विचार की आकांक्षा लेने की आकांक्षा है, सब मिल जाए। कैसे सब मिल जाए, इसकी योजना करता है।
एक मनोवैज्ञानिक ने एक रुग्णचित्त व्यक्ति को कहा, नींद नहीं आती है तो तू ऐसा कर कि रात को भेड़ें गिन। कोई भी चीज गिनने से मन ऊब जाता है, नींद आ जाती है। तो मनोवैज्ञानिक कहते हैं, एक से सौ तक गिनती करो, फिर सौ से वापस लौटो, निन्यानबे, अट्ठानबे, सत्तानबे, फिर एक तक। ऐसा करते रहो, करते रहो, चढ़ो सीढ़ी, उतरो, थोड़ी-बहुत देर में सो जाओगे। तो उस आदमी से कहा, तू ऐसा कर एक से गिनती करना शुरू कर, एक भेड़, दो भेड़...। वह भेड़ का धंधा करता था, ऊन का धंधा करता था, तो वह आसान पड़ेगा।
सात दिन बाद वह आदमी आया, उसकी हालत तो बड़ी खराब हो गई थी। पहले आया था, तब से शरीर से न मालूम कितना वजन कम हो गया था, आंखें बिलकुल गङ्ढों में समा गई थीं, जैसे सात दिन सोया ही न हो।
मनोवैज्ञानिक ने कहा, यह क्या हुआ? तरकीब काम नहीं की? उसने कहा, तरकीब जरूरत से ज्यादा काम कर रही है, मैं मुसीबत में पड़ गया हूं। गिनती मैंने शुरू की, तो पूरी रात गिनता ही रहा, कोई तीन लाख भेड़ें, रुके ही न मन, कि थोड़ा और गिन लो। और फिर इतना रस आ गया। फिर उन भेड़ों का ऊन काटना, फिर उसे बाजार में ले जाकर बेचना, फिर इतने धन की उपलब्धि। इन सात दिन से सो नहीं पाया, अच्छी मुसीबत खड़ी कर दी। पहले मैं थोड़ा सो भी जाता था।
वह जो हमारा मन है, मिलता हो तो बिलकुल पागल हो जाता है। तत्क्षण हिसाब बांधने लगता है। जो नहीं मिला है, वह मिलने पर क्या करेंगे, क्या न करेंगे। लोग मेरे पास आते हैं, वे कहते हैं, मन की शांति चाहिए। मन की शांति तब तक नहीं हो सकती, जब तक लेने में रस कम न हो जाए।
अगर ठीक से समझो, तो लोभ मन है और अलोभ ध्यान है। जितना बड़ा लोभ, उतना मन हिसाब लगाता है, उतनी विचारों की तरंगें इकट्ठी होती जाती हैं, उतना ही तुम भीतर विक्षिप्त होने लगते हो। जितना अलोभ, उतना मन को काम नहीं रह जाता करने को। मन को काम तुम देते हो और फिर कहते हो, शांत रहो। मन तो कंप्यूटर है, वह काम में लग जाता है। तुम कहते हो करोड़ कमाने हैं, वह करोड़ के काम में लग जाता है। तुम उसे कहो कमाना ही नहीं है, सब बांट देना है, मन का काम खतम हुआ, वह विश्राम को चला जाता है। इसलिए शास्त्रों ने लोभ से बड़ा पाप नहीं कहा है और दान से बड़ा पुण्य नहीं कहा है। मतलब ठीक से समझ लें, क्योंकि दानी चित्त ध्यानी हो जाएगा।
इसलिए जो कोई पूछता है, ध्यान का क्या अर्थ? होतेई कहता है, एक पैसा दे दो! देना ध्यान का अर्थ है। और जिस दिन तुम सब देने को तैयार हो जाओगे, उस दिन तुम्हें पाने को कुछ भी न बचेगा, सब मिल जाएगा।
एक युवक एक अंधेरी रात में जीसस के पास आया। उस युवक का नाम था निकोडेमस। वह उस इलाके का--जहां जीसस थे उस रात--सबसे बड़ा धनपति था। रात अंधेरे में उसने जीसस को जगाया और कहा कि दिन में मैं जरा आने से डरता हूं, क्योंकि मेरी प्रतिष्ठा है। और तुम्हारे नाम के साथ मेरा नाम जुड़े, इससे नुकसान हो सकता है।
क्योंकि जीसस तो एक आवारा संन्यासी थे। कभी शराबियों के साथ भी रुक जाते, कभी वेश्याओं के घर में भी ठहर जाते। तो कोई प्रतिष्ठा तो थी नहीं, रिस्पेक्टिबिलिटी तो जीसस की थी नहीं। तो कोई भी आदमी जो प्रतिष्ठित है, डरता था। इसलिए रात आया।
जीसस ने कहा, क्या चाहते हो मुझसे?
निकोडेमस ने कहा, बस इतना ही पूछने आया हूं कि शांति कैसे हो? आनंद कैसे मिले? और देखो मैं चरित्रवान हूं, अपनी पत्नी के सिवाय किसी और स्त्री पर नजर नहीं डालता। जो भी धर्म में कहा है, नियम से पूरा करता हूं। जिस दिन मंदिर जाना है, मंदिर जाता हूं। जो भी परंपरागत धर्म है, वह मैं पूरा करता हूं। दान, जितना धर्म में कहा है, उतना नियम से देता हूं। उपवास जब करने हैं, तब उपवास करता हूं। धर्मग्रंथ जब पढ़ना है, तब धर्मग्रंथ पढ़ता हूं। मेरे शील में, चरित्र में, कोई भी कमी नहीं है। न शराब पीता हूं, न धूम्रपान करता हूं, न जुआ खेलता हूं, रात भी जल्दी बिस्तर पर जाता हूं, सुबह ब्रह्म-मुहूर्त में बिस्तर से उठता हूं। कोई कमी नहीं है। फिर भी आनंद नहीं है।
जीसस ने कहा, इस सबसे कुछ भी न होगा, तू एक काम कर--जो भी तेरे पास है, तू दान कर आ और लौट आ।
निकोडेमस ने कहा, यह जरा मुश्किल है।
चरित्रवान है, लेकिन यह जरा मुश्किल है। शराब नहीं पीता है, सिगरेट नहीं पीता है, लेकिन यह जरा मुश्किल है।
तो जीसस ने कहा, इस चरित्र का कोई भी मूल्य नहीं। तेरे पास इतना है कि तू दो-चार कौड़ी दान करके सोचता है, दानी हो गया! और तेरे पास इतना है समय कि तू या तो ताश खेलने में बिताता है या शतरंज खेलने में बिताता है। तो तू मंदिर हो आता है, तो तू समझता है, धार्मिक हो गया! समय तेरे पास बहुत, धन तेरे पास बहुत, सुविधा तेरे पास बहुत, तो तेरा धर्म सिर्फ सुविधा है, और कुछ भी नहीं। तू सब छोड़कर आ।
निकोडेमस ने कहा कि तो फिर मैं जाऊं, यह मुझसे न हो सकेगा।
छोड़नाभर चित्त से नहीं हो सकता। पकड़ना हो सकता है। चित्त पकड़ने की प्रक्रिया है, क्लिंगिंग।
होतेई का कहना कि एक पैसा दे दो, ध्यान का सार है। सवाल एक पैसे का नहीं है, सवाल साम्राज्य का नहीं है। सवाल देने में आनंद और उत्सव अनुभव करने का है, देने में अहोभाग अनुभव करने का है। कुछ भी देने को पास न हो, तो भी देने की भावदशा!
कुछ मिलने को न हो, तो भी लेने की भावदशा बनी रहती है, इसका थोड़ा स्मरण रखो, तो होतेई का सार समझ में आ जाएगा।
होतेई निश्चित ही सिद्ध पुरुष है--सदा बहता चलता, सदा बांटता, सदा दूसरों को देने के सुख की सुगंध का अवसर देता।
और फिर जब किसी संत ने उससे पूछा कि पूरा रहस्य, पूरा राज उस सिद्धि का, जो धर्म से मिलती है? तो उसने अपना झोला नीचे पटक दिया। पूछा पूछने वाले ने, बस इतना ही या और कुछ? तो उसने अपना झोला वापस अपने कंधे पर उठा लिया और चल पड़ा।
इसे थोड़ा समझ लें। यह बहुत इंगित महत्वपूर्ण है।
एक झेन वचन है: साधना के पहले नदियां नदियां हैं, पहाड़ पहाड़ हैं। साधना के मध्य में, न तो नदियां नदियां रह जाती हैं, न पहाड़ पहाड़। साधना के अंत में, फिर नदियां नदियां हो जाती हैं, पहाड़ पहाड़।
अजीब है। एकदम से खयाल में न आए कि क्या मतलब है। साधना के पहले और साधना के अंत में एक-सी स्थिति आ जाती है। तुम बदल जाते हो, लेकिन स्थिति एक-सी आ जाती है। साधना के मध्य में सब डांवाडोल हो जाता है। अभी तुम संसार में खड़े हो, तब तुम परमात्मा में खड़े हो जाओगे। लेकिन मध्य में, जब तुम दोनों के बीच में रहोगे, तब सब अस्तव्यस्त हो जाएगा। नदियां नदियां हैं अभी, फिर जब तुम परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाओगे, नदियां नदियां हो जाएंगी; पहाड़ पहाड़। लेकिन मध्य में सब खो जाएगा, नदियां नदियां न रहेंगी, पहाड़ पहाड़ न रहेंगे, सब अस्तव्यस्त हो जाएगा।
संसारी एक तरह से बसा हुआ है। संन्यासी भी पहुंच गया। साधक बड़ी मुश्किल में है। साधक की कठिनाई है, क्योंकि साधक पार कर रहा है बीच में मार्ग को। संसार से एक कदम उठा लिया, एक कदम संसार में रखा है, एक कदम परमात्मा की तलाश कर रहा है, वह मध्य में त्रिशंकु की भांति अटका हुआ है।
यह होटेई का झोले को पटक देना, इस बात की खबर है कि साधक का पहला चरण है संसार को गिरा देना। साधक का पहला चरण है सारे बोझ को गिरा देना, सारे मन को गिरा देना। वह जो झोला है, उतना ही था अकेला उसके पास, और कुछ बताने को था भी नहीं बेचारे को। तो उसने अपना पूरा झोला गिरा दिया है कि साधक का पहला काम पूरा गिरा देना है।
और सिद्ध का पूरा काम कि फिर झोले को वापस ले लेना है। लेकिन अब बोझ नहीं है। पहले बोझ था। साधक संसार के बाहर चला जाता है, सिद्ध वापस आ जाता है। सिद्ध फिर संसारी हो जाता है। लेकिन अब संसार में तो होता है, लेकिन संसार उसमें नहीं होता। पहले वह भी संसार में था और संसार भी उसमें था।
महावीर चले गए वन, बारह वर्ष मौन, भाषा छोड़ दी, क्योंकि भाषा समाज है। बोलते हैं, तो हम सदा दूसरे से बोलते हैं। अगर अकेले में भी आप बोलेंगे, तो दूसरे की कल्पना से बोलेंगे।
इसलिए जो भाषा बोलता रहेगा, वह समाज में रहेगा। इसलिए मौन, समाज के बाहर जाने की छलांग है। अगर आप बाजार में बैठे भी मौन हो जाएं, समाज मिट गया, क्योंकि समाज का अर्थ है भाषा। इसलिए जानवरों का कोई समाज नहीं है, क्योंकि भाषा नहीं है। कोई राज्य नहीं, कोई समाज नहीं, पुलिस, पुरोहित कोई भी नहीं, क्योंकि भाषा नहीं। आदमी का समाज है, क्योंकि भाषा है। वैज्ञानिक कहते हैं कि भाषा न हो, तो समाज खो जाए।
थोड़ी देर सोचें, चौबीस घंटे को भाषा न रहे दुनिया में। सब खो जाए। सब! कुछ भी बचाना असंभव है। चौबीस घंटे के लिए भाषा न हो, सब सभ्यता खो जाए, सब संस्कृति खो जाए, आप निकट जंगली जानवर हो जाएं। इसलिए सारी सभ्यता-संस्कृति भाषा में भरी है।
महावीर चले गए जंगल और पहला काम उन्होंने किया, मौन ले लिया। क्योंकि जब तक भाषा न कटे, तब तक समाज से बाहर जाना संभव नहीं। जंगल में जाना आसान है, लेकिन समाज पीछा करेगा, भाषा के साथ समाज चलता रहेगा।
आदमी अकेला भी हो जाता है, तो अपने से बात करने लगता है। खुद से ही चर्चा करता है, खुद को दो हिस्सों में बांट लेता है, समाज बना लेता है वहां भी। और जारी हो जाती है बात।
महावीर मौन हो गए एकांत में, बारह वर्ष मौन रहे। और जब परम मौन उपलब्ध हुआ, जब जान लिया, जैसे होतेई ने झोला गिरा दिया, ऐसा जब समाज बिलकुल गिर गया, महावीर वापस लौट आए। अब समाज से कोई भी डर नहीं है। होतेई ने झोला फिर अपने कंधे पर वापस रख लिया और आगे चल पड़ा।
साधक को छोड़ना पड़ेगा समाज, सिद्ध वापस लौट आता है। साधक को हटाना पड़ता है बोझ, सिद्ध फिर बोझ को ले लेता है। साधक अगर बोझ को ढोता रहे, तो कभी सिद्ध न हो पाएगा। और सिद्ध अगर बोझ लेने से डरे, तो जानना कि अभी सिद्ध ही नहीं हुआ है। साधक की तकलीफ है बोझ में, क्योंकि बोझ उसे मिटाता है। सिद्ध की कोई तकलीफ नहीं है, क्योंकि बोझ उसे कोई बोझ नहीं है। सभी संत संसार में वापस लौट आते हैं। एक दिन बाहर जाते हैं, एक दिन वापस लौट आते हैं। सिद्धत्व के दो चरण हुए, झोले को गिराना और झोले को वापस उठा लेना।
यह होतेई बड़े सूक्ष्म संकेतों में सारी बात कह रहा है। लेकिन होतेई आपको रास्ते पर मिल जाए, तो आप पहचान न सकेंगे। क्योंकि खिलौनों में उलझा है, आपको लगेगा। हालांकि वह खिलौनों में आपकी वजह से उलझा है। और उलझा नहीं है, उसका इंगित है कि तुम सब बच्चे हो, मिठाइयां चाहते हो, खेल-खिलौने चाहते हो, फुलझड़ी-पटाखे चाहते हो। आपको लगेगा, एक-एक पैसा मांगता है, अभी भी भीख जारी है इसकी, मांगना जारी है। गलती हो जाएगी, वह तुम्हें देना सिखाता है।
बुद्ध ने भीख मांगी और इस पृथ्वी के हिस्से पर, भारत में, एक अनूठी घटना घटी, जो दुनिया में कहीं भी नहीं घटी। भिखारी को इतना बड़ा सम्मान जितना हमने दिया है, संसार में कभी किसी ने नहीं दिया। भिखारी सब जगह निंदित है। तुम भी, रास्ते पर अगर भिखारी मांगता है, तो निंदा करते हो। तुम भी बड़े रेशनालाइजेशंस खोजते हो कि भिखमंगे बढ़ रहे हैं, इससे तो सब समाज नष्ट हो जाएगा; और भिखमंगे को देना भिखमंगेपन को बढ़ाना है। हालांकि यह सच नहीं है। यह तुम्हारी दलील सिर्फ तुम्हें देने से रोकने की दलील है। तुम्हें प्रयोजन भिखारी के बढ़ने से नहीं है। और अगर तुम देते भी हो कभी, तो मजबूरी में देते हो, भिखारी को टालने को देते हो, या अहंकारवश देते हो, ताकि चार लोग देख लें कि तुमने दिया।
भिखारी भी बड़े कुशल हैं, अकेले आप जा रहे हो, तो पीछा न करेंगे; चार आदमियों के साथ जा रहे हो, पैर पकड़ लेंगे। भिखारी भी जानते हैं कि उनको कोई नहीं देता, वह जो चार आदमी देख रहे हैं, उनको देखकर लोग देते हैं कि अब दे ही दो दो पैसे। ये चार आदमी क्या सोचेंगे कि कैसा कृपण है, दो पैसे न दे पाया! भिखारी को तुम टालते हो, इसलिए नहीं कि तुम चाहते हो कि भिखारी भिखारी न रहे, क्योंकि तुम्हारी पूरी जीवन-व्यवस्था हजारों को भिखारी बना रही है। भिखारी तो तुम पैदा कर रहे हो। लेकिन देने से मन कतराता है, डरता है, भयभीत होता है। एक पैसा देने से भी घबराता है। देने का नाम सुनते ही भीतर कोई मृत्यु जैसी घटने लगती है।
लेकिन भारत ने एक अनूठा प्रयोग किया। बुद्ध ने तो अपने संन्यासियों को भिक्षु का नाम ही दिया। हिंदू अपने संन्यासी को स्वामी कहते हैं। जैन अपने संन्यासी को मुनि कहते हैं। उनके अपने प्रयोजन हैं। मुनि, जो मौन हो गया है या जिसने मौन की प्रतिज्ञा ली या मौन होने की तैयारी की। स्वामी, जो अपना मालिक हो गया और जिसने इंद्रियों की गुलामी छोड़ दी। लेकिन बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को, अपने संन्यासियों को भिक्षु कहा, भिखारी कहा।
सोचने जैसा है। बुद्ध का विचार भी बड़ा कीमती है। बुद्ध ने कहा कि तुम मांगने वाले हो जाओ, ताकि तुम्हारे द्वारा प्रत्येक व्यक्ति देना सीख सके। और जब बुद्ध खुद भीख मांगते थे, तो तुम सोच सकते हो, द्वार पर तुम्हारे बुद्ध आकर खड़े हुए हों और भीख मांग रहे हों, अगर तुम्हारे पास थोड़ी भी समझ होती, तो वही क्षण तुम्हारे लिए महान ध्यान का क्षण हो जाए। बुद्ध को देते वक्त भी अगर तुम्हारा हृदय देने से न भरा; तब भी तुम बचाते रहे, सोचते रहे, कैसे टालो इस आदमी को, कुछ दे-दिवाकर निपटारा करो, अब आ ही गया है द्वार पर; अगर तुम बुद्ध को भी सामने पाकर देने से बच गए, तो कब तुम्हारे जीवन में दान का और ध्यान का क्षण आएगा? भिक्षु को हमने परमपद दिया।
एक गांव में बुद्ध का आना हुआ, और उस गांव के सम्राट ने अपने महामंत्री को पूछा कि क्या यह उचित होगा कि मैं स्वागत करने जाऊं गांव के बाहर? उस मंत्री ने सम्राट की तरफ देखा और कहा कि मेरा इस्तीफा स्वीकार कर लें।
वह बूढ़ा आदमी था, अनुभवी था, जरूरी था राज्य के लिए, वही राज्य चला रहा था। सम्राट ने कहा, यह क्या बात है? मैं सिर्फ पूछ रहा हूं कि क्या मेरा जाना उचित होगा?
उस महामंत्री ने कहा, यह पूछना ही पर्याप्त है कि आपके पास बैठना उचित नहीं अब। बुद्ध गांव आते हों--माना कि वे भिखारी हैं--और सम्राट सोचता हो कि उनके स्वागत को जाऊं या न जाऊं, तो वह सम्राट धार्मिक नहीं है, वह सम्राट अज्ञानी है। बुद्ध भिक्षु हैं, कभी सम्राट थे; वही सब, जो तुम्हारे पास है, उसे वे छोड़ चुके हैं। और मूल्य उसका है, जो छोड़ा गया; मूल्य उसका नहीं है, जो पकड़ा गया। क्योंकि मूल्य उस चित्त का है, जो छोड़ता है। मूल्य उस चित्त का नहीं है, जो पकड़ता है। पकड़ने वाला चित्त तो जगत में सर्वाधिक साधारण चित्त है, सभी के पास है। छोड़ने वाला चित्त असाधारण चित्त है।
होतेई मांगता है; आपसे मांगता, तो आप सोचते कि भिखारी है। और भिखारी में तो भगवान को देखना बहुत कठिन है। और भिखारी में सिद्ध को देखना बहुत कठिन है। सम्राट में आपको सिद्ध दिखाई भी पड़ जाए, लेकिन भिखारी में सिद्ध को देखना बहुत कठिन है। और फिर होतेई का झोले को गिरा देना और वापस उठाकर रख लेना तो आपके संन्यास की पूरी धारणा को तोड़ देता है। हमने संन्यास की धारणा का अर्थ समझा है, संसार को छोड़ देना, बस इतना। होतेई कह रहा है, यह आधा है। संन्यास संसार का छोड़ना है, जरूर, और फिर संन्यास संसार में वापस लौट आना है, उतना ही जरूर।
सिद्धत्व उस दिन पूरा है, जिस दिन छोड़ा, छोड़े हुए में वापस रहने की कला भी आ गई। दूर हट गए और फिर पास भी आ गए, लेकिन अब संसार स्पर्श नहीं करता है।


प्रश्न:
भगवान श्री, ध्यान से संवेदनशीलता बढ़ती है।
लेकिन संवेदनशीलता बढ़ने पर जीना और मुश्किल हो जाता है।
क्योंकि मन की प्रतिक्रियाएं तीव्र तथा उत्कट होती हैं।
और बात-बात में जैसे पूरे प्राण दांव पर लग जाते हैं।
तो ऐसी स्थिति में संतुलन का मध्यबिंदु कैसे साधा जाए?

निश्चय ही, जैसे-जैसे ध्यान बढ़ेगा, संवेदनशीलता भी बढ़ेगी। संवेदनशीलता बढ़ने से समस्याएं भी बढ़ेंगी। क्योंकि संवेदनशीलता का अर्थ है, हर चीज, हर घटना उसकी पूरी त्वरा में, तीव्रता में अनुभव होगी। अगर कोई गाली देगा, तो उसकी चोट ध्यानी के भीतर जिस भांति गूंजेगी, वैसी गैर-ध्यानी के बीच नहीं गूंजेगी। अगर कांटा चुभेगा, तो उसकी चुभन का जैसा स्पष्ट बोध ध्यानी को होगा, वैसा गैर-ध्यानी को नहीं होगा। क्योंकि गैर-ध्यानी जीता है मूर्च्छा में, उसका होश धुंधला-धुंधला है। जितना होश धुंधला है, उतनी ही पीड़ा भी कम अनुभव होती है।
शायद पीड़ा कम अनुभव हो, इसीलिए हम होश को कम करके जीते हैं। अगर मनोवैज्ञानिक से पूछें, तो वह कहेगा कि हर बच्चे ने अपने बचपन में होश को कम करना सीख लिया।
सब बच्चे संवेदनशील पैदा होते हैं। फिर अपनी संवेदना को मारना शुरू करते हैं। क्योंकि संवेदना के साथ जीना अति कठिन है। संवेदना का बोथला हो जाना जरूरी है। बच्चे इसलिए, अगर छोटा-सा उनको क्रोध आ जाए, बिलकुल पागल हो जाते हैं। उछलेंगे, कूदेंगे, पैर पटकेंगे, आग जलने लगेगी उनके पूरे व्यक्तित्व में। बात जरा-सी होगी। और हम टाल देते हैं कहकर कि बच्चे हैं, कोई बात नहीं। और हम समझाते हैं उनको कि थोड़ा संयम रखो, थोड़ा नियंत्रण रखो, ऐसा कर देना ठीक नहीं है।
मैं एक मित्र के घर मेहमान था। उनकी गाड़ी में किसी को मिलने गया। उनका छोटा बच्चा भी उनके साथ था। वह ड्राइव कर रहे थे, उनका बच्चा उनके बगल में ही बैठा था। जिनके घर मिलने हम गए थे, उतरकर मिलने चले गए, वह बच्चा गाड़ी में बैठा रहा। लौटकर हम आए, तो बच्चा अपनी गाड़ी में बैठा हुआ था। पर मुझे लगा कि कुछ अड़चन है, जैसे बच्चा कुछ सम्हाल रहा है! जैसे कुछ चीज फूट न पड़े, तो वह उसको रोक रहा है। उसके चेहरे पर, उसके हाथ, उसके पैर में।
जैसे ही घर लौटे, गाड़ी से उतरकर वह इतने जोर से चीखा और रोया, तो मैंने पूछा कि मामला क्या है? तो उसने कहा, जब आप सब लोग भीतर चले गए थे, तब मुझे झपकी आ गई और मेरा सिर स्टीयरिंग-व्हील से लग गया जोर से, बहुत मुझे दर्द हो रहा है। लेकिन पिताजी ने कहा है कि घर के बाहर कोई आवाज या रोना अगर किया, तो दोबारा कभी साथ नहीं ले जाएंगे। तो इसलिए मैं सम्हाले रहा।
वह कोई घंटेभर पहले की बात है। घर आते ही से उसने रोना-धोना और चीखना-चिल्लाना शुरू किया। चोट घंटेभर पहले लगी है, पर उसने सम्हाल ली।
बच्चों को हम सिखा रहे हैं कि सम्हालो, जरूरी है। जितना हम चोटों को सम्हालते हैं, उतनी हमारी संवेदनशीलता बोथली होती जाती है। फिर हम तरकीबें सीख लेते हैं, जिससे पीड़ा का ज्यादा अनुभव न हो। क्योंकि पीड़ा बहुत है, अगर उसका अनुभव हो, तो जी न सकेंगे।
एक युवक खेल रहा है हाकी के मैदान में, पैर में चोट लग जाती है। खेलते वक्त तो पता नहीं चलता; खेल बंद हुआ, तब चलता है। क्योंकि खेलते वक्त उसका पूरा मन खेल की तरफ जा रहा था, पैर की तरफ नहीं जा रहा था, तो चोट पता नहीं चलती।
आपको भी जीवन में चौबीस घंटे चोटें लगती हैं, लेकिन आपका मन कहीं लगा रखते हैं आप--धंधे में, व्यवसाय में, काम में--व्यस्त हैं, कुछ पता नहीं चलता। धीरे-धीरे आपका व्यक्तित्व चारों तरफ से खोल में छिप जाता है। फिर जब आप ध्यान शुरू करेंगे, तो बचपन फिर से वापस लौटेगा, फिर संवेदनशीलता ताजी होगी। फिर प्रतीतियां गहरी होंगी। जो भी होगा, वह बहुत गहरे से होगा। इससे अड़चन खड़ी होती है।
इसलिए ध्यानी को बड़ी मुसीबत होती है और घर के लोगों को, उसके मित्र-परिजनों को और भी अड़चन होती है। क्योंकि उनकी समझ के बाहर होता है। वे तो सोचते हैं, ध्यान करने वाला ज्यादा शांत होगा। और ध्यान करने के पहले यह आदमी इतना क्रोधी नहीं था और अब ध्यान करके ज्यादा क्रोधी मालूम पड़ता है। वे तो सोचते हैं, ध्यान करने वाला आदमी बिलकुल मुर्दे की भांति हो जाएगा, चोट भी मारो उसको, तो वह बैठा हुआ देखता रहेगा।
यह सच है। यह घड़ी भी आती है, लेकिन यह ध्यान के शुरुआत में नहीं आती। यह तो ध्यान की परम निष्पत्ति है। ध्यान के शुरू में तो सब बांध टूट जाएंगे। ज्यादा क्रोध आएगा, ज्यादा लोभ मालूम पड़ेगा, हर चीज ज्यादा मालूम पड़ेगी। क्योंकि जो-जो चीज तुमने बचपन से रोक रखी है, उस सब की सीमा टूटेगी, वह सब बहना शुरू होगा। ज्यादा अशांति होगी। बीमारी होगी, तो ज्यादा बेचैनी मालूम पड़ेगी। खुशी होगी, तो बहुत उत्तेजना आ जाएगी। जरा-सी बात प्रसन्न कर देगी और नाचने की हालत मालूम होने लगेगी। और जरा सी बात उदास कर देगी, लगेगा मर जाएं। ध्यान की शुरुआत में ऐसा होगा।
साधक क्या करे? जब ऐसा हो, तो इसे अगर रोका, तो ध्यान के बढ़ने में बाधा पड़ेगी। क्योंकि यह ध्यान के बढ़ने का अनिवार्य हिस्सा है कि तुम प्रत्येक चीज को उसकी परिपूर्णता में अनुभव कर सको। दुख तो दुख, क्योंकि तभी तुम आनंद को भी उसकी परिपूर्णता में अनुभव कर पाओगे। और अगर तुम संसार को ही उसकी परिपूर्णता में अनुभव नहीं करते, तुम परमात्मा को उसकी परिपूर्णता में कैसे अनुभव करोगे? और अभी तो संसार चारों तरफ है, तो इसकी ही चोट पहले पड़ेगी।
तो पहली तो बात ध्यान रखें, संवेदनशीलता को मारना नहीं है। उसे गहन करना है, बढ़ाना है। लेकिन तब अड़चन होगी, उस अड़चन के कारण अपनी खोल को मजबूत मत करना। और अड़चन इतनी ज्यादा हो सकती है, उस हालत में क्या करना?
उस हालत में प्राथमिक चरण एक, कि जब भी ऐसा लगे कि कोई संवेदना बहुत तीव्र हो रही है, तब अपने कमरे को बंद करके अलग, चुपचाप, उस संवेदना को पूरी तरह निकल जाने देना। उसे दूसरों पर मत निकालना। क्योंकि दूसरों पर निकालने का अर्थ, एक लंबी शृंखला का पैदा करना है। अगर क्रोध आ गया है, तो बजाए उसे दूसरे पर निकालने के कमरे में एक तकिए को लेकर उस पर निकाल देना।
पहले तो बहुत अजीब लगेगा कि तकिए पर कैसे क्रोध निकालें। लेकिन यह मैं सैकड़ों प्रयोग के अनुभव से कहता हूं कि तकिए पर क्रोध उतने ही मजे से निकल जाता है, जितना पत्नी पर या पति पर। और तकिया प्रतिकार नहीं करता। और तकिए के साथ कर्म की कोई शृंखला नहीं बनती कि अगले जन्म में तकिया सताएगा, कि आज तकिए पर क्रोध किया तो वह शाम को बदला लेगा। तकिया परम सिद्ध है। और महत्व इस बात का है कि क्रोध को रोकना मत, तकिए पर पूरी तरह टूट पड़ना। पहले दोत्तीन हमले तो ऐसे लगेंगे, क्या मजाक कर रहा हूं! लेकिन दोत्तीन बार तकिए पर चोट करके चौथी चोट आप पाएंगे सजीव हो गई। और भीतर से पूरा जोश आ गया। तकिए को मारना, बोलना, कूटना-पीटना, जो भी करना हो, कुछ भी रोकना मत। कुछ ही दिन में तुम कुशल हो जाओगे। और तुम हैरान हो जाओगे...। पश्चिम में मनोवैज्ञानिक इसका उपयोग कर रहे हैं।
जापान में एक बहुत बड़े अमीर उद्योगपति ने अपने कारखाने के बाहर अपनी प्रतिमा लगवा दी है। बहुत होशियार आदमी है, और उसको मनोवैज्ञानिकों ने सलाह दी कि अपने आफिस के सामने एक प्रतिमा बना दो। जिसको भी क्रोध आए...नौकरों को क्रोध स्वभावतः आता है, कोई कारण भी होना जरूरी नहीं, नौकर होना ही काफी क्रोध का कारण है। किसी की गुलामी करना, किसी की सेवा करना, किसी का नौकर होना, दुख का कारण है। कोई दस हजार लोग उसकी फैक्टरी में काम करते हैं। तो उसने मूर्ति सामने लगवा दी है और आज्ञा दे रखी है कि जिसको भी उस मूर्ति के साथ दर्ुव्यवहार करना हो वह कर सकता है। अक्सर मजदूर, कभी मैनेजर, कभी कोई आकर मूर्ति की पिटाई करके वापस फैक्टरी में चले जाते हैं। इसके परिणाम बड़े महत्वपूर्ण हुए हैं। मालिक और नौकरों के बीच एक सौमनस्य पैदा हुआ है
ऐसा हम आमतौर से करते हैं। अभी भी हम करते हैं। रावण को हम अभी भी जला रहे हैं। रावण को जलाकर हमको जरूर कुछ न कुछ हल्कापन आता है। और जब पहली दफा रावण को जलाया होगा, तब तो बहुत हल्कापन आया होगा। अभी भी जब हम क्रोध से भर जाते हैं, तो किसी का पुतला, इंदिरा का या भुट्टो का या किसी का पुतला लेकर जुलूस निकालकर, जूते मारकर जला देते हैं। हल्कापन आता है। मन हल्का हो जाता है, तृप्ति हो जाती है।
जिसको तुम सामूहिक रूप से करते हो, उसे व्यक्तिगत रूप से करना। अपने ही कमरे में, जिसको तुम ध्यान का कमरा बना लेना, वहां एक तकिया रख छोड़ो। अगर पति पर क्रोध है तो तकिए पर पहले पति को प्रतिष्ठापित कर लो, जैसे भक्त मूर्ति में भगवान को प्रतिष्ठापित करता है, फिर पूरे क्रोध को निकाल डालो। और जब तक क्रोध समाप्त न हो जाए, कमरे के बाहर मत आओ।
और तुम चकित होओगे कि अगर क्रोध पूरा निकल गया, बाहर आकर जब पत्नी पति को देखेगी, तो उसे बड़ी दया और बड़ी ममता और बड़ा प्रेम मालूम होगा, जैसे तूफान के बाद एक हल्की शांति आ जाती है।
अगर पैर में चोट लग जाए और पीड़ा हो, तो कमरे में चले जाओ और रो लो। छोटे बच्चे की तरह हल्के हो लो। पैर में कांटा गड़ा है, तो यह मत कहो कि मेरे जैसा मर्द कहीं रो सकता है! ऐसा कोई मर्द ही नहीं है दुनिया में, जो रो न सकता हो। और जो मर्द रो नहीं सकता, वह मर चुका है।
लेकिन समझाया गया है बचपन से हमें कि मर्द हो, रोना मत। इसलिए बड़ी हैरानी की बात है, सिर्फ स्त्रियां दुनिया में रोने में स्वतंत्र हैं, पुरुष नहीं। हालांकि दोनों की आंखों में आंसू की ग्रंथियां बराबर हैं। इसलिए प्रकृति ने कोई भेद नहीं किया आंसुओं में। नहीं तो पुरुष की आंखों में ग्रंथियां कम होतीं या बिलकुल न होतीं; प्रकृति भी चाहती है कि तुम भी रोओ। तुम्हारे मर्द होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
रोना एक अनूठा प्रयोग है। क्योंकि रोना तुम्हारे भीतर से न मालूम तुम्हारे कितने उभार और ज्वर को बाहर ले जाता है, निष्कासित कर देता है। इसलिए स्त्रियां हत्याएं नहीं करतीं, पुरुष करते हैं। क्योंकि स्त्रियां रोज रोकर अपने दुख को निकाल लेती हैं, पुरुष इकट्ठा करते चले जाते हैं। जब बहुत दुख इकट्ठा हो जाता है, तो उसका विस्फोट खतरनाक है। स्त्रियां कम पागल होती हैं। जो पुरुष रो सकता है, वह भी पागल नहीं होगा। जब तुम रो ही नहीं पाते, तो सब भीतर कुंद, इकट्ठा हो जाता है। और हजार आंसू जब इकट्ठे हो जाते हैं, तो जहर पैदा होता है।
तो मत सोचना कि मर्द हो, कि उम्र तुम्हारी बड़ी है, कि अब तो घर में नाती-पोते हैं, तुम कैसे रो सकते हो! इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। नाती-पोते हैं तो तुम और भी आनंद से रो सकते हो। और जीवन के अनुभव ने अगर तुम्हें कुछ भी सिखाया हो, तो एक बात जरूर सीख लेना कि कुछ भीतर दबाना मत, उसे निकाल देना। और दूसरी बात उसे किसी व्यक्ति पर मत निकालना। क्योंकि उसे कष्ट देने का कोई भी कारण नहीं है। यह तो एकांत में ही निकाला जा सकता है। इसे मैं रेचन कहता हूं, कैथार्सिस कहता हूं। प्रत्येक ध्यानी को रेचन से गुजरना होगा। सिर्फ शांत हो जाना काफी नहीं है; अशांति के क्षण तुम्हारे भीतर दबे हैं, उनको भी निकालना है।
और जब एक घड़ी ऐसी आएगी कि तुम्हारे भीतर न क्रोध बचेगा निकलने को, न अशांति बचेगी निकलने को, तब तुम्हारा ध्यान सहज होगा। तब तुम्हें इस तकिए को जाकर गंगा में विसर्जित कर देना है। इसने बड़ा साथ दिया, इसको धन्यवाद देकर, इसका जुलूस निकालकर, इसको तिरोहित कर देना है। लेकिन तब तक इसकी जरूरत है।
संवेदना बढ़ेगी, अनुभव गहरे होंगे, दुख-सुख सभी बहुत गहरी चोट पहुंचाएंगे, हृदय तक तीर चला जाएगा। रोकोगे, ध्यान नहीं बढ़ेगा; दूसरों पर निकालोगे, अड़चन, उपद्रव, जाल पैदा होगा। एकांत में जाना और संवेदनाओं को उलीच डालना।
ध्यान के साथ रेचन अनिवार्य प्रक्रिया है। और जब रेचन पूर्ण हो चुका होगा, तभी तुम्हारा ध्यान शुद्धतम होगा। शुद्ध ध्यान समाधि है। ध्यान के साथ रेचन चलेगा। जब ध्यान समाधि बनेगी, तभी रेचन बंद हो सकता है।
सिद्ध का कोई रेचन नहीं है, क्योंकि वह कुछ इकट्ठा नहीं करता, लेकिन साधक के जीवन में रेचन अनिवार्य है।

आज इतना ही।