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बुधवार, 10 मई 2017

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-07

 मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 07 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-सातवां   

* अभीप्सा का जन्म
* पात्रता
* प्रतिभा है--निर्विचार चैतन्य
* अंतिम चाह

प्रश्न-सार
*यह परमात्मा की खोज क्या है? लोगों को इस खोज में लगे देखता हूं तो चकित होता हूं। मैं स्वयं तो ऐसी कोई आकांक्षा या अभीप्सा अपने भीतर नहीं पाता हूं!
*परमात्मा को कैसे तृप्त करूं?
*प्रतिभा किसे कहते हैं?
*मैं जिसे चाहता हूं, उसे ही पाना असंभव हो जाता है। जीवन में भी जिन्हें चाहा, प्राणपण से चाहा, मगर न पा सका। कहीं यही स्थिति परमात्मा के संबंध में भी तो नहीं होगी कि परमात्मा को चाहूं और न पा सकूं?

*पहला प्रश्न: भगवान! यह परमात्मा की खोज क्या है? लोगों को इस खोज में लगे देखता हूं तो चकित होता हूं। मैं स्वयं तो ऐसी कोई आकांक्षा या अभीप्सा अपने भीतर नहीं पाता हूं!

सुरेंद्रनाथ! परमात्मा की खोज तो एक ऐसा मधुर रोग है कि जिसे लगे, वही जाने। यह तो स्वाद है। और स्वाद शब्दों में व्यक्त नहीं होते। यह तो अंतर्तम में उठी एक अभीप्सा है, जिसके लिए कोई कारण दिया नहीं जा सकता।
उठे तो उठे; न उठे तो न उठे। इसलिए संतों ने कहा है कि परमात्मा को वे ही खोजते हैं, जिन्हें परमात्मा खोजता है। इसके पहले कि तुम उसकी अभीप्सा करो, वह तुम्हें पुकारे, तो ही अभीप्सा पैदा हो सकती है।
और तुम्हारा प्रश्न सम्यक है, क्योंकि जिसको प्यास न लगी हो, वह प्यास से तड़पते आदमी की मुसीबत क्या समझे! जो मरुस्थल में हो और प्यास से तड़फा जा रहा हो, मछली की तरह तड़फता हो, और जिसका रोआं-रोआं एक ही बात, एक ही चाह करता हो--एक घूंट पानी मिल जाए; उसकी परिस्थिति, उसकी मनःस्थिति--जो मरुस्थल में कभी प्यासा नहीं हुआ है, उसे समझ में भी आए तो कैसे समझ में आए! वह तो हंसेगा। वह तो समझेगा, कोई नाटक है, कोई अभिनय है। वह तो सोचेगा, कोई विक्षिप्तता है।
परमात्मा की खोज मनुष्य के भीतर तब संभव होती है, जब और सब प्रेम-पात्र असफल हो जाते हैं। धन को किया प्रेम, और कुछ न पाया। पद को किया प्रेम, और कुछ न पाया। प्रियजन, मित्र, परिवार, पति-पत्नी, भाई-बंधु--सब को किया प्रेम, और हाथ खाली के खाली रहे। और गागर न भरी सो न भरी। जिसके जीवन में प्रेम के और सारे आयाम असफल हो गए हैं, उसके भीतर परमात्मा की अभीप्सा पैदा होती है। वह प्रेम की अंतिम चुनौती है; वह प्रेम की अंतिम पुकार है।
परमात्मा, प्रेम का अंतिम पात्र है। इसलिए जिनके जीवन में और प्रेम अभी महत्वपूर्ण हैं, अभी जिन्हें आशा बंधी है, जिनकी आंखें अभी इस आश्वासन से भरी हैं कि संसार में कुछ मिल जाएगा--आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों--वे परमात्मा की खोज को नहीं समझ पाएंगे। परमात्मा की खोज तो केवल वे ही समझ सकते हैं, जिनकी और सारी खोजें निष्फल हो गईं, समग्ररूपेण निष्फल हो गईं। जिन्होंने सब जगह टटोल कर देख लिया, रिक्तता पाई। जिनके हाथों में हीरे आए, और पाया कि राख थे। सोना आया, और पाया कि मिट्टी थी। संबंध बने और बिगड़े, और पाया कि पानी के बबूले थे। बहुत राग, बहुत आसक्तियां, बहुत लगाव--लेकिन सब स्वप्न सिद्ध हुए। जैसे पानी पर खींची गई लकीरें, खिंच भी न पाएं और मिट जाएं। जिन्होंने जीवन को सब दिशाओं से जांचा-परखा और व्यर्थ पाया है, वे परमात्मा की खोज पर निकलते हैं।
सुरेंद्रनाथ, तुम परमात्मा की चिंता अभी न करो। और न उनकी चिंता करो, जो परमात्मा की अभीप्सा से भरे हैं। अभी तो तुम यह देखो कि तुम्हारा प्रेम क्या मांग रहा है--धन, पद, प्रतिष्ठा, प्रियजन? अभी तो तुम अपने प्रेम को परखो।
अभी तुम्हारा प्रेम कुछ क्षुद्र मांग रहा होगा। तुम्हारा प्रेम अभी किसी सीमित दिशा में गति कर रहा होगा। तुम्हारा प्रेम अभी संसार से हारा नहीं है। तुम्हारा प्रेम अभी विषादग्रस्त नहीं हुआ है। तुम्हारे भीतर विषादऱ्योग पैदा नहीं हुआ है। तुमने अभी प्रेम की व्यर्थता, आत्यंतिक व्यर्थता से परिचय नहीं बनाया है। अभी आशा का दीया जल रहा है। अभी टिमटिमा रही है ज्योति। कल, आने वाले कल में अभी तुम्हारी आशा टिकी है, सपने टिके हैं।
इसलिए तुम्हें हैरानी होती होगी, तुम चकित होते होओगे। तुम्हारा चकित होना मुझे चकित नहीं करता। तुम्हारा आश्चर्य से भरना मुझे आश्चर्य से नहीं भरता। यह स्वाभाविक है। तुम सोच-विचार वाले व्यक्ति हो। तुम्हारे मन में यह बात समझ में नहीं आती कि लोग क्यों परमात्मा की खोज में लगे हैं? परमात्मा यानी क्या? तुम्हारे लिए कुछ परमात्मा शब्द में अभी अर्थ भी नहीं है। अभी यह शब्द कोरा है, खाली है, शब्द-मात्र है, अर्थशून्य है, अर्थ-रिक्त है।
परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है। न ही परमात्मा तुम से बाहर कोई शक्ति है। परमात्मा है तुम्हारे भीतर प्रेम का वापस लौट आना। समझने की थोड़ी कोशिश करो।
साधारणतः प्रेम बहिर्मुखी है, जैसे गंगा सागर की तरफ बहती है। पहाड़ों से उतरती है, नीचाइयों की तरफ बहती है। इस संदर्भ में उचित होगा कि तुम्हें मैं एक शब्द समझाऊं।
पुराने शास्त्रों में उल्लेख है कि कृष्ण के पास बहुत गोपियां नाचती हैं, गोप नाचते हैं, रास रचता है। कभी किसी पूर्णमासी की रात्रि में वृंदावन के वंसीवटों में बांसुरी बजती है, कृष्ण घूंघर पहनते हैं, मोर-मुकुट बांधते हैं, उनके आस-पास सुंदरियों का मेला लगता है। जैसे चांदत्तारे सजे हों। जैसे तारों की बारात निकली हो। जैसे दीपावली हुई हो। उन्हीं शास्त्रों में उल्लेख है कि एक ऐसी भी प्रेयसी है, जो छाया की तरह कृष्ण के पीछे चलती है। उसके नाम का कोई उल्लेख नहीं है। और गोपियों के नाम का उल्लेख है। लेकिन उस एक के नाम का कोई उल्लेख नहीं है। और वही छाया की भांति चलती हुई जो गोपी है, बाद में, हजारों साल बाद, राधा के नाम से जानी गई। वह नाम संतों ने दिया। राधा नाम की कोई स्त्री का उल्लेख पुराने शास्त्रों में नहीं है। यह तो हजारों साल बाद, कोई तीन हजार साल बाद संतों ने नाम दिया--राधा। और बड़े गहरे अर्थ उस शब्द में हैं।
गंगा बहती है गंगोत्री से, हिमालय से। जाती है सागर की तरफ--अधोमुखी। गंगा की इस अवस्था को कहते हैं--धारा। और अगर गंगा उलटी बहने लगे--गंगासागर से गंगोत्री की तरफ बहने लगे; नीचाइयों से ऊंचाइयों की तरफ बहने लगे; मैदानों से पहाड़ों की तरफ बहने लगे--तो उस उलटी हो गई धारा को कहेंगे राधा। राधा धारा का उलटा है।
जिन संतों ने उस छाया मात्र, अनाम कृष्ण की प्रेयसी को राधा नाम दिया, अदभुत काम किया। बड़ा अर्थपूर्ण, बड़ी गहराइयां लिए हुए यह नाम है--राधा।
प्रेम साधारणतः बहिर्मुखी है। जैसे गंगा। चली सागर की तरफ। प्रेम जब अंतर्मुखी हो जाता है, जब धारा राधा बनती है; जब प्रेम बाहर की तरफ नहीं जाता--न धन, न पद, न प्रतिष्ठा, न पति, न पत्नी--जब प्रेम बाहर की तरफ नहीं जाता वरन अंतर्यात्रा शुरू होती है; सब जगह जहां बाहर प्रेम अटका था, वहां-वहां से मुक्त होता है और वापस लौटने लगता है गंगोत्री में; जब प्रेम राधा बनता है, तो कृष्ण से मिलन होता है। अपने से ही मिल जाना कृष्ण से मिलना है। अपने ही आकर्षण के केंद्र से संयुक्त हो जाना, कृष्ण से मिलना है।
कृष्ण शब्द का अर्थ होता है--जो आकर्षित करे। अंग्रेजी में शब्द है--मैग्नेटिज्म। वह ठीक कृष्ण शब्द का रूपांतर है। चुंबकीय। कृष्ण का अर्थ होता है, जो आकृष्ट करे; खींच ले; चुंबक जैसा खींच ले। जैसे लोहे के छोटे-छोटे टुकड़े चुंबक की तरफ खिंचते हुए चलते हैं, ऐसे ही तुम्हारे भीतर छिपा है कोई रहस्य। जब तुम्हारी प्रेम की सारी किरणें उसी रहस्य की तरफ चुंबक की तरह खिंच चलती हैं; जब तुम्हारे भीतर के कृष्ण की तरफ तुम्हारे प्रेम की अनंत धाराएं जो तुम जन्मों-जन्मों में बाहर बहाते रहे हो--न मालूम कहां-कहां; न मालूम किन-किन दिशाओं में--वे सब धाराएं जब लौटने लगती हैं घर की तरफ, तो तुम्हारे भीतर रास निर्मित होता है। तुम्हारी चेतना का केंद्र--कृष्ण; और तुम्हारे प्रेम की ऊर्जा लौटती हुई--गोपियां, सखियां। तुम्हारे भीतर एक नृत्य का आयोजन होता है, एक उत्सव का आयोजन होता है।
सुरेंद्रनाथ, परमात्मा की खोज अपनी ही खोज है। तुमने जिन लोगों को परमात्मा को खोजते देखा है, वे भी शायद परमात्मा को नहीं खोज रहे हैं। कोई राम को खोज रहा है--मंदिर में। कोई अल्लाह को खोज रहा है--मस्जिद में। यह तो खोज अब भी बाहर चल रही है। यह खोज परमात्मा की खोज नहीं है। यह तो वही पुरानी खोज है, सिर्फ नाम बदल दिया है। पहले धन खोजते थे; अब धन नहीं खोजते, अब राम खोजते हैं। मगर पहले भी बाहर खोजते थे; अब भी बाहर खोजते हैं। धन खोजते थे, तो जाते थे दूर-दूर की यात्राओं पर। अब परमात्मा को खोजते हैं, तो काशी जाते हैं, काबा जाते हैं। वही यात्राएं; जरा भी भेद न पड़ा। रंच मात्र भेद न पड़ा। रत्ती भर क्रांति नहीं हुई है।
जिस दिन तुम खोज पर जाना बंद कर देते हो; सारी खोज सिकुड़ आती है अपने भीतर। जिस क्षण तुम अपने पंखों को समेट लेते हो; अपने भीतर डुबकी मार कर बैठ जाते हो--उस क्षण परमात्मा की खोज शुरू हुई। जब तुम किसी को ध्यान में डूबा देखो, तो जानना कि परमात्मा की खोज है। कि मस्ती में मस्त देखो, अपने में लीन देखो, तो जानना कि परमात्मा की खोज है। कोई चला हज की यात्रा को, इससे मत सोच लेना कि परमात्मा की खोज है।
मुसलमान फकीर बायजीद ने कहा है, जब मैं पहली दफा काबा गया, तो मैंने काबा का पत्थर देखा। और जब मैं दुबारा काबा गया, तो मैंने काबा के मालिक को देखा। और जब मैं तीसरी बार काबा गया, तो न काबा का पत्थर था, न काबा का मालिक था; बस मैं था। मैंने अपने को देखा।
तीसरी बार हज हुआ। अगर तुम मुझसे पूछो, तो मैं कहूंगा, बायजीद की पहली दो यात्राएं काम न आईं। तीसरी यात्रा काम आई। और तीसरी यात्रा के लिए काबा जाने की कोई जरूरत न थी। जहां भी बायजीद ने आंख बंद कर ली होतीं, वहीं अपने को देख लिया होता।
प्रेम की खोज ही परमात्मा की खोज है। और प्रेम का स्रोत तुम्हारे भीतर है।
प्यासा जियरा भर-भर आता, इन नयनों की कोर में
अपने आंसू बांधूं किसके, कोमल अंचल छोर में?

है यह कैसी पावन तृष्णा, जोगन के जो वेश में--
डोल रही है व्याकुल मन के, अनदेखे परदेश में
प्राण मचलते बंध जाने को किसकी करुणा डोर में?

युगऱ्युग से तपत्तप कर किसकी, मोहक क्वांरी ज्वाल में
पागल सपने भटक रहे हैं, अंबर में, पाताल में
छबि के घूंघट उठते-गिरते, किसके विरह-झकोर में?

कूक रही हैं आहें, किसके, प्रेरित स्वर-लयत्ताल से
किसकी सुधि से प्राण हृदय के, बज उठते करताल से
जप-माला बन जाती पीड़ा, किसकी नेह हिलोर में?

प्यासा जियरा भर-भर आता, इन नयनों की कोर में
अपने  आंसू  बांधूं  किसकेकोमल  अंचल  छोर  में?
एक प्रेम की अपूर्व ऊर्जा है तुम्हारे भीतर। अनंत स्रोत हैं उसके। न चुकने वाली संपदा है वह। किसके आंचल में उंडेल दो? सब आंचल छोटे पड़ते हैं। किसको दे दो? सब पात्र छोटे हैं। और तुम्हारे भीतर देने को आकाश जैसा प्रेम है। आकाश जैसा ही कोई पात्र भी चाहिए। उस पात्र का नाम ही परमात्मा है।
परमात्मा तो केवल प्रतीक है। इस प्रतीक को, इस काव्य-संकेत को बहुत जोर से मत पकड़ लेना। बस वहीं भूल हो जाती है। फिर परमात्मा मंदिर की मूर्ति बन जाता है। और तुम धार्मिक नहीं रह जाते, तुम काफिर हो जाते हो। फिर परमात्मा का कोई रूप-रंग हो जाता है, आकृति हो जाती है। जैसे ही तुमने परमात्मा को रूप-रंग दिया, आकृति दी--कुफ्र हुआ; पाप हुआ। क्योंकि परमात्मा निराकार है। सब रंग उसके हैं, फिर भी कोई रंग उसका अपना नहीं। और सब ढंग उसके हैं, फिर भी कोई ढंग उसका अपना नहीं। सब स्वर उसके हैं, लेकिन वह किसी एक स्वर में समाप्त नहीं। सारे स्वरों में है, और सारे स्वरों के पार है। सारे रंगों में है, और सारे रंगों के पार है। पास भी वही, दूर भी वही। मृत्तिका में भी वही, चैतन्य में भी वही। परमात्मा की खोज अस्तित्व की खोज है, आत्मा की खोज है। और अस्तित्व की खोज में जो पहला कदम है, वह स्वयं के भीतर ही उठाना होगा। जिसने अपने को नहीं जाना, वह और क्या जान सकेगा!
सुरेंद्रनाथ, चकित न होओ। क्योंकि कहीं ऐसा न हो, तुम्हारा यह चकित होना तुम्हारा दंभ बन जाए, अहंकार बन जाए। कहीं ऐसा न हो कि तुम सोचने लगो कि ये परमात्मा के खोजी बुद्धू हैं; बुद्धिहीन हैं; तर्कशून्य हैं; विचाररहित हैं। कहीं ऐसा न हो जाए दुर्भाग्य से, कि तुम्हारे भीतर ऐसा लगने लगे कि मैं बहुत प्रतिभाशाली हूं, इसलिए ये परमात्मा इत्यादि की बातें मुझे नहीं जंचतीं। कि मेरे भीतर बड़ी प्रखर प्रतिभा है, बुद्धि है धारवाली, कि मेरे भीतर संदेह उठते हैं, ये अंधी श्रद्धाएं मुझे नहीं छू सकतीं। कहीं ऐसा दुर्भाग्य न हो जाए। अन्यथा तुम अपने से वंचित रह जाओगे। जिन पर तुम हंसोगे, जिन पर तुम चकित होओगे, उनकी कोई हानि नहीं है। हानि तुम्हारी अपनी हो जाएगी। आत्मघात होगा यह।
अगर लोग परमात्मा को खोज रहे हैं...और जीसस जैसा व्यक्ति खोज रहा है! बुद्ध जैसा व्यक्ति खोज रहा है! लाओत्सू जैसा व्यक्ति खोज रहा है! जरथुस्त्र, नानक, कबीर, फरीद...ऐसे-ऐसे अदभुत लोग खोज रहे हैं! सुरेंद्रनाथ, थोड़ा झिझको, थोड़ा ठहरो। ऐसा मत सोच लेना कि तुम्हारे भीतर संदेह उठते हैं तो ये तुम्हारी बहुत बुद्धिमत्ता के प्रतीक हैं। नहीं तो तुम एक ऐसी भ्रांति में पड़ जाओगे, जिसके बाहर आना मुश्किल हो जाता है। जन्म-जन्म लग जाते हैं।
तुमने पूछा: "यह परमात्मा की खोज क्या है?'
अपनी खोज! परमात्मा शब्द को छोड़ो, जाने दो। उस शब्द में मत अटको। उस शब्द में अटकाव हो जाता है। और अटकाव के कारण हैं। सदियों-सदियों में परमात्मा शब्द को पंडितों ने, पुरोहितों ने, पुजारियों ने इस तरह लूटा है, उस शब्द को ऐसा निचोड़ा है, उस शब्द का इतना शोषण किया है कि कोई भी सोच-विचार वाला व्यक्ति उस शब्द को सुन कर चौंक जाता है, सम्हल जाता है। उस शब्द को सुनते ही उसे लगता है, खतरा करीब है। सावधान! सावचेत हो जाता है।
परमात्मा शब्द के पीछे पुजारी छिपा है, पंडित छिपे हैं, पुरोहित छिपे हैं, पादरी छिपे हैं। और उन्होंने आदमी के साथ जैसी ज्यादती की है, वैसी किसी और ने नहीं की। परमात्मा के नाम पर आदमी को ऐसे-ऐसे नाच नचाए, परमात्मा के नाम पर आदमी से ऐसे-ऐसे जघन्य कृत्य करवाए! हिंदू ने मस्जिदें जलाईं, मुसलमान काटे। मुसलमान ने मंदिर गिराए, मूर्तियां तोड़ीं, बलात्कार किए, हत्याएं की, आगजनी की। ईसाइयों ने मुसलमान काटे, मुसलमानों ने ईसाई काटे! परमात्मा के नाम पर इतना खून बहा, इतना रक्तपात हुआ, इतने युद्ध हुए। और उन सभी युद्धों को पंडित-पुरोहितों ने आशीर्वाद दिए। उन युद्धों को जिहाद कहा, धर्मयुद्ध कहा! उन युद्धों की प्रशंसा की, गरिमा की। शास्त्र कहते हैं कि जो धर्मयुद्ध में मरता है, वह तत्क्षण स्वर्ग जाता है! खूब प्रलोभन दिए लोगों को!
धर्मयुद्ध में उतरने के लिए और अच्छा प्रलोभन क्या होगा! तत्क्षण! फिर तुम्हारे पापों का हिसाब नहीं रखा जाता। फिर तुमने धर्मयुद्ध के पहले क्या-क्या पाप किए, क्या-क्या अनाचार किए, क्या-क्या अनीति की, उसका कोई लेखा-जोखा नहीं रखा जाता। धर्मयुद्ध में जो मर गया, वह सीधा, तत्क्षण स्वर्ग जाता है! उसे कहीं रुकावट भी नहीं पड़ती। द्वारपाल भी उसका दरवाजा नहीं छेंकते। कोई पूछताछ नहीं होती, कि तेरे जन्मों-जन्मों के पापों का क्या हुआ! वह कर्म का सिद्धांत एकदम पोंछ दिया जाता है; इस आदमी के लिए एक तरफ उठा कर रख दिया जाता है। वह सिद्धांत इस आदमी के लिए नहीं है।
लोगों को धर्मयुद्धों में उतारने के लिए कैसे-कैसे लालच, कैसी-कैसी रिश्वत--स्वर्ग की रिश्वत! बहिश्त की रिश्वत!
और पंडित-पुरोहितों ने कितना शोषण किया है आदमी का! उसका खून पीते रहे हैं--और परमात्मा का नाम! स्वभावतः, समझा जा सकता है। परमात्मा नाम सुनते ही विचारशील व्यक्ति चौकन्ना हो जाता है, सम्हल जाता है। अपनी जेब सम्हाल लेता है, कि पीछे कहीं कोई पंडित-पुरोहित छिपा होगा। खतरा करीब ही है।
तुम परमात्मा शब्द को छोड़ो। यह शब्द गंदा हो गया। यह शब्द प्यारा था, लेकिन गंदे हाथों में पड़ गया। यह शब्द अदभुत था, क्योंकि इस शब्द का अर्थ होता है--परम आत्मा। इस शब्द की महिमा खूब है। यह आत्मा का शुद्धतम रूप। आत्मा की निर्मल अवस्था। आत्मा की परम पुनीत दशा। जैसे आत्मा के फूल से उड़ी सुगंध--ऐसा परमात्मा। कि आत्मा के दीये से झरती रोशनी--ऐसा परमात्मा। परमात्मा शब्द तो प्यारा है, लेकिन गलत लोगों के हाथ में पड़ गया। और गलत लोगों के हाथ में अच्छी चीजें भी पड़ जाएं, तो गलत हो जाती हैं। गंदे हाथों में सुंदर से सुंदर फूल गंदे हो जाते हैं। रुग्ण हाथों में स्वस्थ से स्वस्थ फूल रुग्ण हो जाते हैं, रोग के कीटाणुओं से भर जाते हैं।
लेकिन जाने दो। इस शब्द से क्या लेना-देना है! इस शब्द के बिना भी काम हो सकता है। मैं तुमसे कहता हूं--प्रेम की खोज करो। छोड़ो परमात्मा को। तुम्हारे भीतर प्रेम की तरंग तो उठती है या नहीं? कभी आकाश से इस तरह धुआंधार होती वर्षा को देख कर तुम्हारे हृदय में भी कोई स्वरत्ताल छिड़ता है या नहीं? कभी फूलों की हरियाली, फूलों का रंगीनपन, फूलों की सुर्खी देख कर तुम्हारे भीतर भी कोई लाली फैल जाती है या नहीं? कोई हरियाली फैल जाती है या नहीं? कभी ऊगते सूरज को देख कर तुम विभोर होते हो या नहीं होते हो? कभी सांझ जब सूरज डूबता है और उसकी आखिरी किरणें सफेद बदलियों पर रंग-बिरंगे ताने-बाने बुनने लगती हैं, तब एक क्षण को तुम्हारे भीतर विचार की सतत धारा ठहर जाती है या नहीं?
अगर हां, तो तुम भी परमात्मा की खोज में हो। परमात्मा को नाम दो प्रेम का। परमात्मा को नाम दो सौंदर्य का। परमात्मा को नाम दो सत्य का। अगर यह परमात्मा नाम ओछा पड़ गया, तो नाम से क्या लेना-देना है! आम खाने हैं या गुठलियां गिननी हैं?
फूल
दो क्षण झूल कर
मुरझा गया।
किंतु
उसका रूप
नयनों में गया बस,
और उसकी गंध
दिल को डस गई।
जानता हूं
रूप चिरस्थायी नहीं है
और यह जो गंध है,
आई-गई है।
किंतु
उसकी स्मृति,
मादक है, मदिर है
और मन में
इस तरह
कुछ बस गई है
कि
एक युग के बाद भी
जब देखता हूं
मन-मुकुर में
तो यूं लगता है
कि जैसे नित नई है।
तुम्हें सौंदर्य छूता है या नहीं? रात जब आकाश तारों से भर जाती है, तो कोई विस्मय-विभोर तुम्हारे भीतर होता है या नहीं? और जब आकाश में पूर्णिमा का चांद होता है, तो तुम्हारे भीतर भी--जैसे सागर में लहरें उठती हैं, ज्वार आता है--तुम्हारी चेतना में भी ज्वार आता है या नहीं?
अगर तुम्हारे प्राणों में अभी भी तारों को देख कर कोई झंकार होती है; चांद को देख कर तुम्हारा मन भी होता है कि बांसुरी उठा लो और बजाओ; और जब दूर कोयल कूकने लगती है, तो तुम्हारा हृदय भी कूक का उत्तर देने लगता है। और जब पपीहा पुकारता है पी कहां, तो तुम्हारे भीतर कुछ भी नहीं होता! सुरेंद्रनाथ, कुछ तो होता होगा। इतना दीन-दरिद्र आदमी तो कोई भी नहीं कि जिसको जगत में कोई भी चीज आंदोलित न करती हो, तरंगित न करती हो, आह्लादित न करती हो। बच्चे की किलकारी, किसी का हंसना, किन्हीं आंखों में झलक गए दो आंसू--तुम्हें छू जाते हैं या नहीं? तुम्हें कुछ रोमांचित करता है या नहीं? अगर कुछ भी तुम्हें रोमांचित करता है तो मैं कहता हूं, तुम धार्मिक व्यक्ति हो।
और निश्चित रोमांचित करता होगा, अन्यथा तुम यहां कैसे आते! तुम यहां आ गए हो, तुम इस मदिर-मादक क्षण में यहां उपस्थित हो, इस सुंदर प्रभात में, इस वर्षा की भीगी-भीगी प्रभात में, जब कि भूमि नई-नई वर्षा को पाकर अपनी सुगंध बिखेर रही हो, तुम यहां चले आए हो। पता नहीं कितने दूर से तुमने यात्रा की होगी। मैं कहता हूं, तुम भी खोजी हो। सिर्फ तुम्हारी खोज को परमात्मा का नाम देने में तुम्हें अड़चन है। छोड़ो नाम। नाम से क्या लेना-देना है! जो नाम प्रीतिकर लगे, वही दे दो।
बुद्ध ने उसे नाम दिया--निर्वाण। क्योंकि परमात्मा नाम से बुद्ध भी राजी नहीं थे। बहुत हो चुके थे यज्ञ-हवन। सब तरह की हत्याएं यज्ञ और हवन के नाम पर हो रही थीं। जिनको आज तुम देखते हो गौ-हत्या के विरोध में आंदोलन करते, उनसे जरा पूछो कि तुम्हारे ऋषि-मुनि क्या करते रहे? यहां गौमेध यज्ञ होते थे; यहां अश्वमेध यज्ञ होते थे। जब तक कोई अश्वमेध यज्ञ न करे, तब तक चक्रवर्ती सम्राट नहीं होता था। राम ने भी किया था अश्वमेध यज्ञ। और इतना ही नहीं, वेद तो नरमेधऱ्यज्ञ की भी बात करते हैं, जिनमें मनुष्यों की बलि दी जाती थी। आज तो यह बात भी भरोसे की नहीं मालूम होती, संदेह खड़े होते हैं, लेकिन यह सचाई है।
बुद्ध ने इसका विरोध किया है। महावीर ने इसका विरोध किया है। ढाई हजार साल पहले बुद्ध ने इसके लिए इनकार किया है। परमात्मा के नाम पर इतना खून बहाया जा रहा था कि बुद्ध ने कहा कि नहीं, यह नाम अब काम का नहीं। अब हम नया नाम खोजेंगे। उन्होंने नया नाम खोजा--निर्वाण।
तो तुम्हें जो प्रीतिकर लगे--निर्वाण कहो, समाधि कहो, आत्मा कहो। इन सारे शब्दों में भी तुम्हें धर्म की गंध आती हो, क्योंकि इन सब शब्दों के साथ भी अब ढाई हजार साल का इतिहास जुड़ गया, तो सत्य कहो। लेकिन मेरा सुझाव अगर मानो, तो मैं कहूंगा प्रेम कहो। क्योंकि सत्य में कुछ बौद्धिकता की गंध आती है। जैसे कोई तार्किक निष्कर्ष। जैसे गणित। जैसे विचार से पाई गई कोई निष्पत्ति। प्रेम हार्दिक है, अनुभूतिगत है। प्रेम को खोजो, और परमात्मा मिलेगा। तुम प्रेम को खोजो, परमात्मा तुम्हें खोजेगा। तुम परमात्मा को छोड़ ही दो, भूल ही जाओ।
कबीर ने कहा है कि मैं परमात्मा को खोजता-खोजता फिरता था। नहीं मिला। नहीं मिला। नहीं मिला। और फिर एक दिन मैंने सारी खोज छोड़ दी। मैंने फिक्र ही छोड़ दी। और तब से उलटी हालत हो गई है। अब परमात्मा मेरे पीछे-पीछे लगा फिरता है--कहत कबीर-कबीर।
सुरेंद्रनाथ, तुम्हीं जीवन के परम सत्य को नहीं खोज रहे हो, परम सत्य भी अपने हाथ तुम्हारी तरफ बढ़ा रहा है। तुम अगर सिकुड़ न जाओ, तुम अगर अपने में बंद न हो जाओ, तुम अगर खुले हो, राजी हो, आतुर हो, उत्सुक हो, प्यासे हो, अपने द्वार-दरवाजे खोलने के लिए साहस रखते हो--कि आ सके गंध, कि आ सके पवन, कि आ सके सूरज की किरण--तो परमात्मा मिलेगा; निश्चित मिलेगा। नाम, तुम्हारी जो मर्जी हो, दे लेना। मुझे नामों में रस नहीं है।
इसलिए नास्तिक भी मेरे पास आता है और कहता है, क्या मैं संन्यासी हो सकता हूं? मैं कहता हूं, निश्चित! क्योंकि नास्तिक भी सत्य की खोज में लगा है। सत्य की खोज में न लगा होता तो नास्तिक कैसे होता! नास्तिकता इतना ही कह रही है उसकी कि सत्य को मैंने खोजा है, और अभी पाया नहीं। पाया नहीं, तो मानूं कैसे? जब तक नहीं पा लूंगा, मानूंगा भी नहीं। यह तो ईमानदारी है। इसमें नास्तिकता कहां? इसमें बुराई कहां? पाप कहां? अधर्म कहां? यह तो निष्ठा है। यह तो सत्य पर श्रद्धा है। तो मैं तो नास्तिक को भी कहता हूं कि आओ, संन्यास तुम्हारा है। तुम नहीं संन्यास लोगे तो कौन संन्यास लेगा!
जो कहता है कि मुझे धर्म में कोई रस ही नहीं है; क्या मैं भी ध्यान कर सकता हूं? मैं कहता हूं, इतना ही रस काफी है कि तुमने पूछा कि क्या मैं भी ध्यान कर सकता हूं। और रस क्या चाहिए?
तुमने पूछा, तुम पूछने यहां तक आए--काफी प्रमाण है। सिर्फ शब्द से तुम्हें अड़चन है।
तुम कहते हो: "परमात्मा की खोज क्या है?'
प्रेम की खोज--मेरा उत्तर!
सत्य की खोज--मेरा उत्तर!
तुम्हारे अपने स्वरूप की खोज--मेरा उत्तर!
और तुम कहते हो: "लोगों को इस खोज में लगे देखता हूं तो चकित होता हूं।'
चकित तुम इसीलिए होते हो कि अब तक तुमने अपने भीतर झांक कर नहीं देखा कि यही खोज तुम्हारे भीतर भी चल रही है। अभी तक तुमने खोज को पहचाना नहीं। अभी तक खोज अचेतन में चल रही है; उसे चेतन नहीं बनाया। और खोज चेतन बन जाए, तो सुरेंद्रनाथ, तुम एक अपूर्व संन्यासी सिद्ध होओगे।
खोज जब तक अचेतन होती है, अंधेरे-अंधेरे में होती है, तब तक हम टटोलते-टटोलते रहते हैं। जब खोज चेतन बनती है, तो हम दीया जला कर खोज करते हैं। और कुछ मिलेगा, तो दीया जलाने से मिलेगा। उस दीये का नाम ध्यान है। और उस दीये को जलाने की जो पृष्ठभूमि है, वही संन्यास है।
और तुम पूछते हो: "मैं स्वयं तो ऐसी कोई आकांक्षा या अभीप्सा स्वयं के भीतर नहीं पाता हूं।'
तुम्हारे भीतर आकांक्षा भी है, अभीप्सा भी है। अन्यथा तुम यहां न होते। कौन तुम्हें लाता? कैसे तुम आते? यह प्रश्न तुमने न पूछा होता! यह प्रश्न सूचक है। हां, इतना जरूर सच है कि परमात्मा की खोज तुम्हारे भीतर नहीं मालूम हो रही है। लेकिन परमात्मा से क्या लेना-देना है! खोज तो तुम्हारे भीतर जरूर है।
तुम नहीं जानना चाहते यह जीवन क्या है? तुम नहीं जानना चाहते मैं कौन हूं? तुम नहीं जानना चाहते यह विस्तार किसका है? तुम नहीं जानना चाहते प्रथम क्या है, अंत क्या है? तुम नहीं जानना चाहते कि जीवन का गंतव्य क्या है, नियति क्या है?
ऐसा कोई मनुष्य ही नहीं है जिसके भीतर सत्य की खोज न हो। मनुष्य की परिभाषा ही यही है--जिसके भीतर सत्य की खोज है। पशु और मनुष्य में इतना ही भेद है।


*दूसरा प्रश्न: भगवान! परमात्मा को कैसे तृप्त करूं?

सुदास भारती! परमात्मा तो परम तृप्ति है। परमात्मा को तृप्त नहीं करना है; तुम्हें तृप्त होना है। लेकिन तुम्हारे प्रश्न का अर्थ मैं समझा। तुम यह कह रहे हो कि मैं कैसा बनूं कि परमात्मा मुझसे तृप्त हो जाए। लेकिन परमात्मा तो तुमसे तृप्त है, तुम जैसे हो वैसे ही। परमात्मा को तुमसे जरा भी अड़चन नहीं है। तुम उसकी तरफ पीठ किए रहो, वह तृप्त है। तुम उसकी पूजा करो, वह तृप्त है। तुम उसे पत्थर मारो, वह तृप्त है। तुम फूल चढ़ाओ तो, तुम गीत गाओ तो, तुम गालियां बरसाओ तो। तुम उसे मानो तो, तुम उसे न मानो तो। तुम जन्मों-जन्मों में उसकी याद-फिक्र न करो तो; या तुम उसे रोज अहर्निश स्मरण करो तो। परमात्मा तृप्त है; अतृप्त होने का उसका कोई उपाय नहीं है। वह चाहे भी तो अतृप्त नहीं हो सकता।
ऐसा समझो कि परम तृप्ति का नाम ही परमात्मा है। इसलिए तो हमने परम तृप्त व्यक्तियों को भगवान कहा--बुद्ध को, महावीर को, कृष्ण को। ये परम तृप्त लोग हैं। इनके जीवन में कोई भी असंतोष का स्वर नहीं है। इनकी वीणा पर एक ही राग उठता है--परम तृप्ति का, तुष्टि का, परितोष का। ऐसे बजाओ कि वैसे बजाओ--इनकी बांसुरी से तुम असंतोष का स्वर पैदा नहीं कर सकते।
बुद्ध का एक शिष्य पूर्णकाश्यप ज्ञान को उपलब्ध हो गया, परम ज्ञान को उपलब्ध हो गया। उसने बुद्ध के चरणों में सिर रखा और कहा, मुझे आज्ञा दें कि जाऊं और आपने जो मुझे दिया है, वह औरों को बांटूं। बुद्ध ने कहा, मेरा आशीष। मगर मैं जानना चाहता हूं, तू कहां जाएगा--किस दिशा में, किस देश में, किन लोगों के बीच?
पूर्ण ने कहा कि मैं सूखा नाम के प्रांत में जाऊंगा--बिहार का एक हिस्सा था--क्योंकि वहां अब तक कोई भी भिक्षु नहीं गया।
बुद्ध ने कहा, तू यह इरादा छोड़ दे तो अच्छा। इतने से ही तुझे समझ लेना चाहिए कि अब तक वहां क्यों कोई भिक्षु नहीं गया। उस इलाके के लोग बड़े कठोर हैं, पाषाण हृदय हैं; हत्यारे हैं, चोर हैं, बेईमान हैं, लुटेरे हैं, ठग हैं। उस इलाके के लोगों में धर्म का प्रचार असंभव है। वे तेरी सुनेंगे ही नहीं, उलटे तुझे सताएंगे। बहुत दुष्ट प्रकृति के हैं। तू वहां न जा। इतना बड़ा देश पड़ा है; बहुत पात्र हैं, जो प्रतीक्षा कर रहे हैं--वहां जा। उन अपात्रों के बीच क्यों जाना!
लेकिन पूर्ण ने कहा कि नहीं भगवन! मुझे वहीं जाने दें। आखिर उनको भी तो जरूरत है। अगर कोई भी वहां न जाएगा, तो क्या वे आपके संदेश से वंचित ही रह जाएंगे! और सौ को कहूंगा, तो एक तो समझेगा। दस समझेंगे, तो एक तो चलेगा। दस चलेंगे, तो एक तो पहुंचेगा। इतना भी क्या कम है!
नहीं माना पूर्ण, तो बुद्ध ने कहा, इसके पहले कि तू जा, तीन प्रश्नों के उत्तर दे दे। पहला कि वहां के लोग गालियां देंगे तुझे, तो तेरे मन में क्या होगा?
पूर्ण हंसने लगा। उसने कहा, आप भलीभांति जानते हैं। क्योंकि अब मेरा मन और आपका मन कुछ अलग नहीं रहे। जो आपको होगा, सो मुझे होगा। फिर भी आप पूछते हैं, इसलिए निवेदन करता हूं कि अगर लोग मुझे गालियां देंगे, तो मेरे मन में होगा कि कितने भले लोग हैं कि गालियां ही देते हैं, मारते नहीं!
बुद्ध ने कहा, और पूर्ण, दूसरा प्रश्न: अगर लोग मारें-पीटें; फिर तुझे क्या होगा?
पूर्ण ने कहा, यही कि कितने भले लोग हैं; सिर्फ मारते हैं, मार ही नहीं डालते!
और बुद्ध ने कहा, पूर्ण, अंतिम और तीसरा प्रश्न: अगर वे लोग तुझे मार ही डालें, तो जब तू अंतिम सांस ले रहा होगा, तो किस भाव से विदा होगा?
पूर्ण ने कहा, यही भाव श्वास-श्वास में, रोएं-रोएं में गूंजेगा कि कितने भले लोग हैं; मुझे उस जीवन से छुटकारा दिला दिया, जिसमें कोई भूल-चूक हो सकती थी, जिसमें कहीं पैर फिसल सकता था। अब कोई भूल-चूक नहीं होगी। अब पैर फिसलने की संभावना न रही। मैं धन्यवाद देता हुआ, अनुगृहीत, विदा हो जाऊंगा।
बुद्ध ने कहा, तब तू जा सकता है। तब तू जहां जाना चाहे, जा सकता है। अब तेरे ऊपर कोई पाबंदी नहीं। अब मुझसे तू पूछना ही मत। अब पूछने की कोई जरूरत ही नहीं; क्योंकि तू परम तृप्त हो गया। और परम तृप्ति बुद्धत्व का लक्षण है।
तुम पूछते हो सुदास: "परमात्मा को कैसे तृप्त करूं?'
परमात्मा तृप्त है। तृप्ति ही उसकी गंध है। तृप्ति ही उसका रंग है, उसका रूप है।
लेकिन तुम्हारा असली मतलब यह है कि मैं अपने को कैसा बनाऊं, कैसा रचूं, कैसा गढूं कि परमात्मा मुझ पर प्रसन्न हो, उसके आशीष मुझ पर बरसें।
मन  नहीं  लगतालगाए  क्या  करूं?
बेबसी छाई हुई है
नींद सी आई हुई है
तन नहीं जगता, जगाए क्या करूं?
मन  नहीं  लगतालगाए  क्या  करूं?
रात, सो भी स्याहकारी
और सुधि आई तुम्हारी
दिन नहीं उगता, उगाए क्या करूं?
मन  नहीं  लगतालगाए  क्या  करूं?
इन हवाओं से न बोलूं
पीर का घूंघट न खोलूं
प्रण नहीं निभता, निभाए क्या करूं?
मन  नहीं  लगतालगाए  क्या  करूं?
तुमने अपनी बेबसी की बात कही। तुम यह कह रहे हो कि मैं तो स्वयं को अभी स्वीकार नहीं कर पाता, परमात्मा मुझे कैसे स्वीकार करेगा?
लेकिन मैं तुम्हें याद दिलाऊं कि तुम चाहे अपने को स्वीकार करो या न करो, वह तुम्हें स्वीकार किए हुए है। नहीं तो कौन तुम्हारे भीतर श्वास ले? कौन तुम्हारे हृदय में धड़के?
पापी से पापी भी उसे अंगीकार है, उतना ही जितना पुण्यात्मा। रावण के भीतर वह उतना ही मौजूद है, जितना राम के भीतर। उस परम अवस्था में भेद नहीं है। उस परम अवस्था में कोई न ऊपर है, न कोई नीचे है।
लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि मैं कह रहा हूं कि तुम अपने को रूपांतरित न करो। अगर तुम्हें कांटे चुभ रहे हैं, तो कांटे निकालने होंगे। और अगर तुम्हारे जीवन में कुछ विषाद है, तो विषाद झाड़ना होगा। और तुम्हारी चेतना के दर्पण पर अगर धूल जम गई है, तो धूल पोंछनी होगी।
आओ, तुम स्वर साधो, मनतारा छेड़ दूं,
              गुमसुम यह रात तो कटे।

पी-पीकर हालाहल बेसुध सी रात है
झंझा के केंचुल में धरती का गात है
आओ, तुम आंचल दो, दीपक तो बाल दूं,
               तम की कुछ उम्र तो घटे।

बंदी है किरन-किरन, कैदी दिनमान है
सम्मुख ही दृग पथ के तम का व्यवधान है
आओ, तुम बांह गहो, चिलमन यह तोड़ दूं,
             कल्मष का आवरण हटे।

शंकित हैं प्राण-प्राण, कुंठित हर सांस है
सकुचाई आशाएं, सहमा विश्वास है
आओ, तुम भाव भरो, शब्द-बाण छोड़ दूं,
             भय का यह मेघ तो छंटे।

आओ, तुम स्वर साधो, मनतारा छेड़ दूं,
                   गुमसुम  यह  रात  तो  कटे।
अगर तुम्हारे जीवन में रात है, तो सुबह लानी है। इसलिए नहीं कि परमात्मा को तृप्त करना है, बल्कि इसलिए कि सुबह का आनंद, सुबह का उत्सव क्यों चूकें! अगर तुम्हारे जीवन में दुर्गंध है, तो क्यों दुर्गंध भोगो! परमात्मा को तो दुर्गंध और सुगंध समान हैं। वहां तो समत्व है। लेकिन तुम जब सुगंध से भर सकते हो--बेलाओं की, गुलाबों की, जुही की, और चंपा की--तो क्यों दुर्गंध में जीओ! दुर्गंध काटी जा सकती है। मगर इसे काटो अपने लिए--परमात्मा के खयाल से नहीं। क्योंकि जब तुम परमात्मा के खयाल से काटते हो, तो बात थोड़ी उथली हो जाती है, ओछी हो जाती है। जैसे कोई किसी और के लिए सज कर जा रहा है, लेकिन सौंदर्य का कोई आत्मबोध नहीं है।
मंदिर चले। स्नान कर लिया। फूलमाला पहन ली। तिलक-चंदन लगा लिया। और घर बैठे थे भूत-प्रेत बने। न नहाए, न धोए। जिस दिन मंदिर नहीं जाना, उस दिन स्नान की जरूरत ही नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि स्नान का आनंद तुम्हारे अनुभव में नहीं आया है। स्नान अभी तुम्हारी जीवन-चर्या नहीं बना है। उधार है। दिखावा है। प्रदर्शन है। नुमाइश है। सौंदर्य का तुम्हें अभी सहज-बोध नहीं है।
स्त्रियां घर के बाहर निकलती हैं, तो सज-धज कर। बाल संवार लिए। मांग भर ली। इत्र-फुलेल लगा लिया। सुंदर साड़ी पहन ली। आभूषण। बाहर स्त्रियां ऐसी सज कर निकलती हैं कि खुद का पति मिल जाए, तो वह भी उनके प्रेम में पड़ जाए। लेकिन घर इन्हीं देवियों को बैठे देखो! रणचंडी बनी बैठी रहती हैं--कि अपना पति क्या, दूसरे का पति भी देख ले, तो भाग खड़ा हो!
सौंदर्य का एक अंतर्बोध अलग बात है। फिर कोई देखता है कि नहीं, यह सवाल नहीं है। सौंदर्य का अपना रस है। स्वास्थ्य का अपना आनंद है। स्वच्छता की अपनी गरिमा है।
मैं तुमसे कहूंगा, सुदास, परमात्मा को तृप्त करने के लिए कुछ मत मरना--कि सत्य बोलूंगा, क्योंकि परमात्मा सत्य से प्रसन्न होगा। तो इसका अर्थ हुआ कि अभी तक सत्य से तुम्हारा कोई नाता नहीं जुड़ा है। अगर परमात्मा असत्य से प्रसन्न होता हो, तो फिर तुम क्या करोगे? फिर तुम असत्य बोलोगे! लेकिन जिसका सत्य से नाता जुड़ गया है, वह परमात्मा के लिए भी असत्य नहीं बोलेगा। वह कहेगा कि परमात्मा अपनी जाने। अगर उसे सत्य नहीं रुचता, तो वह अपनी रुचि बदले। लेकिन मुझे सत्य प्रीतिकर है। सत्य मेरा आनंद है। मैं सत्य ही बोलूंगा। अगर सत्य के कारण मुझे नर्क भी जाना पड़े, तो मैं जाने को राजी हूं। लेकिन झूठ बोल कर स्वर्ग नहीं जा सकूंगा।
तुम अगर सिर्फ स्वर्ग जाने में उत्सुक हो, तो क्या फर्क पड़ता है कि कैसे स्वर्ग गए। जिसको साध्य का बहुत ध्यान हो जाता है, उसके जीवन में साधन की कीमत कम हो जाती है। वह साधन की फिक्र ही नहीं करता। अगर द्वारपाल को स्वर्ग के, रिश्वत देकर प्रवेश मिलता हो, तो कौन पंचायत करे! दे देंगे रिश्वत। अगर द्वारपाल के पैर दबाने से, चमचागिरी करने से स्वर्ग में प्रवेश मिलता हो, तो वह भी कर लेंगे!
तुम्हारी प्रार्थनाएं अक्सर चमचागिरी हैं। तुम्हारी स्तुतियां क्या हैं--खुशामदें हैं। जैसे तुम किसी राजा-महाराजा की स्तुति कर रहे हो, ऐसे तुम परमात्मा की स्तुति करते हो। तुम खूब बढ़ा-चढ़ा कर, जितना झूठ बोल सकते हो...जानते हो कि तुम झूठ बोल रहे हो। क्योंकि तुम्हारा जीवन-व्यवहार तुम्हारी प्रार्थना की गवाही नहीं होता। तुम्हारी जीवन-शैली तुम्हारी प्रार्थना का समर्थन नहीं करती।
नहीं; परमात्मा की फिक्र न करो सुदास। वह तो तृप्त है। और तुम जैसे हो, ऐसे भी रहे, तो भी तृप्त है। उसे रंचमात्र बेचैनी नहीं है। लेकिन तुम जैसे हो, अगर बेचैन हो, तो अपनी बेचैनी बदलो। तुम अगर अशांत हो, तो अपनी अशांति बदलो।
बदलाहट--बदलाहट के लिए। क्रांति--क्रांति के लिए। क्रांति स्वयं साध्य है; साधन नहीं। और जब तुम क्रांति का साध्य की तरह उपयोग करते हो--साधन की तरह नहीं--तो क्रांति में एक महिमा समाविष्ट हो जाती है; एक गौरव समाविष्ट हो जाता है; एक गरिमा। तब साधन और साध्य का भेद मिट जाता है। और उस व्यक्ति को मैं धार्मिक व्यक्ति कहता हूं, जिसके जीवन में साधन और साध्य का भेद नहीं है। जिसके लिए साधन साध्य है। साधन जैसे साध्य है, वैसे ही साध्य साधन है। साधन और साध्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
कैसे छोडूं यह जीर्ण जगत, रह गए अधूरे गान सखी!
पगध्वनि सुनती हूं, आएंगे मन के रथ पर मेहमान सखी!
जन-स्तुति के स्वर्णिम मंदिर में
वे प्रतिमा, प्रस्तर, देव बने--
लाचार, मनुजता खो न सकी
हैं    मुझमें    उनमें    भेद    घने
वे मनुज बनें तो बनें भले, मैं बन न सकूं पाषाण सखी!
पगध्वनि सुनती हूं, आएंगे मन के रथ पर मेहमान सखी!
मैंने कब माना, बहुत कहा--
जग ने, प्रिय आते सपने में,
मैं जगती हूं, मैं तो देखूंगी
जाग्रत    को    ही    अपने    में,
आंखें मूंदूं, यदि परस करें मेरे जी को वे प्राण सखी!
पगध्वनि सुनती हूं, आएंगे मन के रथ पर मेहमान सखी!
वे मनुज बनें तो बनें भले! जिन्होंने प्रेम को पहचाना है, वे तो परमात्मा से कहेंगे कि तुम्हें अगर मनुष्य बनना हो, तो बन जाओ।
वे मनुज बनें तो बनें भले, मैं बन न सकूं पाषाण सखी!
लेकिन मैं पत्थर नहीं बनूंगा।
पत्थर की प्रतिमाएं हैं मंदिरों में। उनकी पूजा करते-करते तथाकथित भक्त भी पत्थर हो गए हैं, पाषाण हो गए हैं। हृदय उनके पत्थरों से भी गए-बीते हो गए हैं। उनके हृदय पर कोई संवेदना पैदा नहीं होती। यह ठीक है:
वे मनुज बनें तो बनें भले, मैं बन न सकूं पाषाण सखी!
पगध्वनि सुनती हूं, आएंगे मन के रथ पर मेहमान सखी!
तुम्हें पत्थर नहीं बनना है। तुम्हें कुछ भी नहीं बनना है तथाकथित पंडित-पुरोहितों की बात मान कर। तुम्हें जबरदस्ती अपने आचरण को शुद्ध नहीं करना है। तुम्हें जबरदस्ती संत नहीं बनना है। तुम्हें सरल बनना है--आनंदित, प्रफुल्लित, मुग्ध, जीवन के प्रेम में ऐसे लिप्त कि नाच सको, गा सको। फिर कठिनाई नहीं है। फिर निश्चित तुम्हें पगध्वनि सुनाई पड़ेगी।
पगध्वनि सुनती हूं, आएंगे मन के रथ पर मेहमान सखी!
और कोई रथ नहीं है स्वर्ण का, जिस पर परमात्मा आएगा। वह अतिथि तुम्हारी ही चेतना के रथ पर सवार होकर आता है।
कैसे छोडूं यह जीर्ण जगत, रह गए अधूरे गान सखी!
पगध्वनि सुनती हूं, आएंगे मन के रथ पर मेहमान सखी!
आंखें मूंदूं, यदि परस करें मेरे जी को वे प्राण सखी!
पगध्वनि सुनती हूं, आएंगे मन के रथ पर मेहमान सखी!
तुम्हारी चेतना ही स्वर्ग है, स्वर्ग का द्वार है। तुम्हारी चेतना की परम शुद्धि ही परमात्मा है। इसलिए किस परमात्मा को तृप्त करने की बात कर रहे हो सुदास! तुम तृप्त हो जाओ, तो परमात्मा तृप्त है।
तुम अतृप्त हो--अड़चन है। तुम्हारी अतृप्ति का सवाल है। तुम रुग्ण हो। सारा अस्तित्व तो स्वस्थ है। तुम ताल के बाहर पड़ गए हो। तुम बेताल हो गए हो। तुमने स्वर खो दिया है। तुम बेसुरे हो गए हो। अन्यथा सारा अस्तित्व स्वर में बद्ध है। सारा अस्तित्व संगीत में लीन है। तुम भी स्वरबद्ध हो जाओ। इस स्वरबद्धता को मैं प्रार्थना कहता हूं, पूजा कहता हूं, ध्यान कहता हूं।
कैसे कोई स्वरबद्ध होता है सुदास? अतीत में रहोगे--स्वर छिन्न-भिन्न रहेंगे। भविष्य में रहोगे--स्वर छिन्न-भिन्न रहेंगे। वर्तमान में जीओ--स्वर सध जाएंगे।
बस यही एक क्षण वर्तमान का सब कुछ हो। एक-एक क्षण जीओ। और परिपूर्णता से जीओ, समग्रता से जीओ। ऐसी डुबकी मारो कि पूरे-पूरे डूब जाओ। और प्रतिपल तुम पाओगे: मेहमान करीब आ रहा है--और करीब आ रहा है--और करीब आ रहा है। और एक दिन वह अपूर्व घटना घटती है, जिस दिन अतिथि में और आतिथेय में कोई भेद नहीं रह जाता है। मेहमान मेजबान की तरह आता है। अचानक एक दिन तुम पाते हो कि तुम ही हो वह। तत्वमसि श्वेतकेतु!


*तीसरा प्रश्न: भगवान! प्रतिभा किसे कहते हैं? आपने यह नाम मुझे दिया है, इसीलिए पूछती हूं।

प्रतिभा! प्रतिभा कहते हैं विचार-मुक्त चैतन्य की अवस्था को। जब तुम्हारे भीतर आभा ही आभा रह जाती है। उस आभा में कहीं कोई छाया, कहीं कोई अंधेरा नहीं रह जाता। मन के किसी कोने-कातर में छिपा हुआ कहीं भी कोई अंधेरा नहीं रह जाता। जब भीतर सब आलोकित होता है, उस अवस्था का नाम प्रतिभा है। जब तुम्हारे भीतर प्रज्ञा का आविर्भाव होता है, तो प्रतिभा का जन्म हुआ।
प्रतिभा का अर्थ साधारणतः जैसा किया जाता है, उतना ही नहीं है। साधारणतः तो किया जाता है--बहुत बुद्धिमान व्यक्ति, सोच-विचार वाला व्यक्ति, तर्क-निष्ठ। प्रतिभा वस्तुतः इससे बिलकुल उलटी बात है। वहां कहां सोच-विचार! वहां कहां तर्क! वहां कहां बुद्धिमानी! प्रतिभा बुद्धिमानी नहीं है--सरलता है, निर्दोषता है। प्रतिभा तर्क नहीं है, तर्कातीत अवस्था है। प्रतिभा सोच-विचार नहीं है, निर्विचार अवस्था है।
लेकिन भाषा-कोश में तो प्रतिभा का यही अर्थ लिखा है: सोचने-विचारने वाला, चालाक आदमी, चतुर। उसी को हम कहते हैं कि देखो, कैसी प्रतिभा है! तर्क में कुशल, विवाद में प्रवीण, हर स्थिति में रास्ता निकाल ले; कैसी ही उलझन हो, कैसी ही पहेली हो, हल कर ले।
भाषा-कोश कुछ कहता है, लेकिन अस्तित्व की परिभाषा कुछ और है। भाषा-कोश अस्तित्व के संबंध में जरूरी रूप से सही सूचनाएं नहीं देता, क्योंकि भाषा अस्तित्व को जानती ही कहां है!
मैंने सुना है, एक बार मुल्ला नसरुद्दीन ट्रेन में यात्रा कर रहा था। रात्रि का समय था। टे्रन के उस डब्बे में उसके अतिरिक्त सिर्फ एक दंपति और था। शेष डब्बा खाली था। मुल्ला ऊपर की बर्थ पर लेटा हुआ था। दंपति नीचे सामने वाली बर्थ पर बैठे हुए थे। थोड़ी देर बाद पति पत्नी से बोला, लल्लू की अम्मा, आज तो मेरी इच्छा हो रही है कि खतरे की जंजीर खींची जाए। और देख ही रही हो कि डब्बे में भी कोई और नहीं है।
पत्नी उसे समझाते हुए बोली कि क्या आपको पता नहीं, बगैर कारण के जंजीर खींचने पर दो सौ पचास रुपये जुर्माना या छह महीने की सजा का प्रावधान है? फिर भी आप ऐसी जिद क्यों कर रहे हैं! पति बोला, क्या करूं लल्लू की मां, इच्छा को दबाने की बहुत कोशिश कर रहा हूं, मगर इच्छा बलवती होती जा रही है! और रही चिंता जुर्माना हो जाने की, सो डेढ़ सौ रुपये तुम्हारे पास हैं और सौ रुपये मेरी जेब में; पूरे ढाई सौ हो गए। ज्यादा हुआ तो जुर्माना दे देंगे। मगर जंजीर तो आज जरूर खींचूंगा। असल में जीवन भर की इच्छा है यह मेरी, और कब तक टालूं!
पत्नी ने देखा कि अब कोई और रास्ता नहीं, तो बोली, ठीक है। जब आप नहीं मानते, तो खींचिए। मगर वह देखिए, सामने की बर्थ पर एक आदमी सो रहा है, हम उसी का नाम लगा देंगे कि जंजीर उसी व्यक्ति ने खींची है। और हम दो हैं; उसके लिए कोई गवाही भी नहीं मिल सकती।
पति ने आगे बढ़ कर जंजीर खींच दी। ट्रेन रुक गई। गार्ड हाथ में अपनी लालटेन लिए आ गया और आकर बोला, क्या बात है? जंजीर किसने खींची? दंपति ने फौरन मुल्ला की ओर इशारा कर दिया। गार्ड मुल्ला नसरुद्दीन के पास पहुंचा, उसे हिलाया, और बोला, क्या बात है बड़े मियां, जंजीर क्यों खींची?
मुल्ला जोर से चिल्लाने लगा और बोला, अरे गार्ड साहब, इन दोनों धूर्तों ने मिल कर मेरे रुपये चुरा लिए। पूरे ढाई सौ रुपये थे। विश्वास न हो तो इन दोनों की तलाशी ले लें। पत्नी ने डेढ़ सौ रखे हैं और पति ने सौ।
तलाशी ली गई। मुल्ला की बात सच निकली। गार्ड ने पैसे मुल्ला को लौटा दिए और उन दोनों को पुलिस के हवाले कर दिया।
संसार में इस तरह की स्थिति को प्रतिभा कहते हैं। लेकिन प्रतिभा, मैंने तुझे इस तरह का नाम नहीं दिया है। ऐसी प्रतिभा सस्ती प्रतिभा है; थोड़ी ही सोच-समझ की क्षमता हो, तो आ जाती है। और ऐसी प्रतिभा अक्सर घातक सिद्ध होती है। पृथ्वी इसी तरह की तथाकथित प्रतिभा से भर गई है। हमारे विद्यालय, विश्वविद्यालय इसी तरह के प्रतिभावान व्यक्ति पैदा कर रहे हैं। अगर ठीक-ठीक कहो, तो सिर्फ चालबाज और चालाक आदमी पैदा किए जा रहे हैं। दुनिया से सरलता, निर्दोषता खोती चली जा रही है। लोग बेईमान होते जा रहे हैं। पढ़ा-लिखा आदमी हो और बेईमान न हो, यह जरा मुश्किल हो गया है। बेपढ़ा-लिखा आदमी, गांव का गंवार आदमी शायद ईमानदार भी है। अभी भी ईमानदार है! लेकिन जैसे ही कोई पढ़-लिख जाता है, जैसे ही कोई विश्वविद्यालय से उपाधियां लेकर लौट आता है, वैसे ही चालबाज हो जाता है, बेईमान हो जाता है। वैसे ही लोगों की जेब काटना और लोगों की गर्दन काटना, वही उसके जीवन का धंधा हो जाता है।
जिन लोगों ने दुनिया में सार्वभौम शिक्षा का प्रचार किया, उन्होंने सोचा था कि जब दुनिया में सभी लोग शिक्षित हो जाएंगे, तो बड़ी ईमानदारी होगी, बड़ी सच्चाई होगी। मगर हुआ उलटा। जितने लोग शिक्षित होते गए, उतनी सचाई खोती गई, उतनी बेईमानी बढ़ती चली गई। सीधा-सादा आदमी तो बेईमानी कर भी नहीं सकता, क्योंकि डरता है--पकड़ा जाए! पढ़ा-लिखा आदमी बेईमानी की हजार तरकीबें खोज सकता है।
मैंने सुना है कि एक कब्र के पास से मुल्ला नसरुद्दीन अपने एक मित्र के साथ गुजर रहा था। कब्र बड़ी प्यारी थी, संगमरमर की थी। सोने के अक्षरों में उस पर कुछ लिखा था। मुल्ला ने कहा, जरा रुको। पढ़ें, किसकी कब्र है! कब्र पर लिखा था: यहां एक राजनेता और एक संत पुरुष की समाधि है। मुल्ला ने कहा, यह बात बड़ी मुश्किल है! इतनी छोटी कब्र में दो आदमी कैसे समाए होंगे? राजनेता और संत?
मुल्ला यह तो सोच ही नहीं सका कि ये एक ही आदमी के संबंध में दोनों वक्तव्य हैं। कोई भी नहीं सोच सकता। राजनेता और संत? या तो संत हो सकता है, या राजनेता हो सकता है। या राजनेता हो सकता है, या संत हो सकता है। ये दोनों बातें एक साथ असंभव हो गईं! या तो आदमी वकील हो सकता है, या ईमानदार हो सकता है। या ईमानदार हो सकता है, या वकील हो सकता है। या तो पढ़ा-लिखा हो, तो फिर ईमानदारी की फिक्र नहीं की जा सकती। और या फिर ईमानदार हो, तो पढ़ाई-लिखाई को एक तरफ रखना होगा।
हमने कुछ बड़ी उलटी दुनिया पैदा कर ली है। यहां प्रतिभा सिर के बल खड़ी हो गई है, शीर्षासन कर रही है। और जिनको हम प्रतिभाशाली कहते हैं, उनकी कुल कुशलता क्या है? अनुमान! वे अनुमान करने में कुशल हैं। हम जिसको तर्क कहते हैं, वह भी अनुमान का शास्त्र है। उससे सत्य का कोई साक्षात्कार नहीं होता; केवल अनुमान लोग लगाते रहते हैं! और अनुमान सत्य नहीं है। अनुमान तो सिर्फ अनुमान है।
मुल्ला नसरुद्दीन, चंदूलाल और ढब्बूजी, तीनों मिल कर एक दिन आपस में गपशप कर रहे थे। ढब्बूजी बोले, आप लोग विश्वास करें या न करें, लेकिन गर्भवती महिलाओं पर फिल्मों का असर जरूर पड़ता है। अब मेरी ही पत्नी को लो। पिछले सप्ताह ही फिल्म राम और श्याम देख कर आई और दूसरे ही दिन अस्पताल में उसने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया!
चंदूलाल ने ढब्बूजी की हां में हां मिलाते हुए कहा कि जी हां, भाई साहब! आपकी बात बिलकुल सच है। अरे मेरी पत्नी परसों फिल्म त्रिमूर्ति देख कर आई और कल ही सांझ उसने एक साथ तीन बच्चों को जन्म दिया!
यह सुन कर मुल्ला नसरुद्दीन एकदम घबड़ा गया और रोने लगा। चंदूलाल और ढब्बूजी यह देख कर चिंतित स्वर में बोले, क्या बात है नसरुद्दीन, तुम अचानक हम लोगों की बात से क्या इतने घबड़ा गए? तुम्हें घबड़ाने की क्या जरूरत! अरे रोएं तो हम रोएं। रोएं तो ढब्बूजी रोएं। तुम क्यों रो रहे हो? क्यों रोने लगे? तुम्हें क्या हो गया!
नसरुद्दीन रोते हुए बोला, भाइयो, मैं तो सोच रहा था कि यदि तुम लोगों की बात सही है, तो मेरी गर्भवती पत्नी गुलजान का क्या हाल होगा जो आज ही अलीबाबा और चालीस चोर फिल्म देख कर लौटी है!
अनुमान! लेकिन जिसको तुम तथाकथित प्रतिभाशाली आदमी कहते हो, वह अनुमान ही लगाता रहता है। हां, अंधेरे में तीर चलाता है, लग जाए तो तीर, न लगे तो तुक्का!
मैं प्रतिभा का ऐसा अर्थ नहीं करता हूं। प्रतिभा ध्यान की विशुद्ध अवस्था है। अनुमान नहीं, तर्क नहीं, विचार नहीं; चित्त की सारी कल्पनाएं गईं, ऊहापोह गया; चित्त की सारी तरंगें सो गईं। चेतना की झील बिलकुल शांत हो गई। एक भी लहर नहीं। जरा सी भी लहर नहीं। झील कंपती ही नहीं; दर्पण हो गई। जब चेतना की झील बिलकुल दर्पण की तरह शांत होती है--निष्कंप, अडोल, अचंचल--तो सारे चांदत्तारे उसमें उतर आते हैं। सारे चांदत्तारों की प्रतिछवि उसमें बन जाती है।
ऐसे ही ध्यान जब तुम्हारे भीतर से चित्त की सारी तरंगों को छीन लेता है और तुम्हारी चित्त की झील शून्य हो जाती है, तो उसमें उतर आते हैं जीवन के सारे सौंदर्य, सारे सत्य। उतर आता है जीवन का प्रेम; उतर आता है परमात्मा। तुम्हारे भीतर प्रतिफलन बनते हैं। तुम दर्पण हो जाते हो। दर्पण हो जाने की वह कला, जिसमें कि अस्तित्व वैसा ही दिखाई पड़ने लगे जैसा है, उसे मैं प्रतिभा कहता हूं।
प्रतिभा, मैंने इसी अर्थ में तुझे प्रतिभा नाम दिया है। ध्यान की तरफ इशारा है। नाम मैं ऐसे ही नहीं दे रहा हूं। नाम में इंगित है। नाम में संदेश है। नाम इसलिए दे रहा हूं, ताकि तुम्हें याद बनी रहे कि क्या तुम्हें करना है। नाम तुम्हें याद दिलाता रहे। जब भी कोई तुझे पुकारेगा और कहेगा--प्रतिभा! तो खयाल रखना, स्मरण करना, सुरति लाना कि चित्त से मुक्त होना है; चित्त की तरंगों से मुक्त होना है। यह स्मृति बनी रहे, बनी रहे, बनी रहे, तो आज नहीं कल, कल नहीं परसों, एक दिन वह अपूर्व क्षण भी आ जाता है, जब चित्त बिलकुल शांत हो जाता है, तब प्रतिभा का अनुभव होगा।
और जहां प्रतिभा है, वहां परमात्मा है। क्योंकि प्रतिभा में जो प्रतिछवि बनती है अस्तित्व की, उसका नाम ही परमात्मा है।

*चौथा प्रश्न: भगवान! मैं जिसे चाहता हूं, उसे ही पाना असंभव हो जाता है। जीवन में भी जिन्हें चाहा, प्राणपण से चाहा, मगर न पा सका। कहीं यही स्थिति परमात्मा के संबंध में भी तो नहीं होगी कि परमात्मा को चाहूं और न पा सकूं?
धर्मेंद्र! चाह में खतरा है। चाह बाधा है पाने में। जितने जोर से तुम चाहोगे, उतना ही पाना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि चाहने वाला चित्त शांत नहीं हो सकता। और शांत होना, पाने की पहली शर्त है। चाहने वाला चित्त तनावग्रस्त होता है। चाहनेवाला चित्त वर्तमान में नहीं होता, भविष्य में होता है। चाह का अर्थ है: आज नहीं है मूल्यवान; कल है मूल्यवान! चाह का अर्थ है: नजरें मेरी कल पर टिकी हैं। आज तो चूका जा रहा है, और आंखें मेरी कल पर टिकी हैं। और कल कभी आया है? कल कभी आता ही नहीं। जो नहीं आता, उसी का नाम कल है।
मुल्ला नसरुद्दीन ने एक फकीर से कहा कि मैं बड़ी परेशानी में पड़ गया हूं। पान की मेरी दुकान है और लोग उधारी पर उधारी किए जाते हैं। लोग उधारी चुकाते भी नहीं। और अगर उनको आगे उधार न दो, तो पुरानी उधारी गई! उस डर से मुझे उन्हें उधार भी देना पड़ता है। मैं करूं तो क्या करूं?
उस फकीर ने कहा, तू एक काम कर। एक तख्ती टांग दे--आज नगद कल उधार!
मुल्ला ने कहा, इससे कुछ भी नहीं होगा। मैं अपने ग्राहकों को जानता हूं। अरे वे बड़े काइयां हैं, बड़े चालबाज हैं। वे कहेंगे, ठीक नसरुद्दीन! तो आज नहीं खरीदते, कल ही आ जाएंगे।
उस फकीर ने कहा, तू फिक्र मत कर। जब कल आएंगे, फिर तख्ती बता देना--आज नगद कल उधार। आने दे उनको कल बार-बार; जब भी आएं, तख्ती बता देना। क्योंकि कल कभी आया है पागल! कितने ही काइयां हों तेरे ग्राहक, लेकिन कल कभी आता ही नहीं।
कल आ ही नहीं सकता। और चाह तुम्हें कल में उलझाए रखती है। फिर तुमने किसको चाहा--धन, पद, पत्नी--इससे फर्क नहीं पड़ता। चाहत का रूप ही है--भविष्य। और ध्यान होता--अभी, यहीं।
अब तुम कहते हो: कहीं परमात्मा के संबंध में भी तो यही उपद्रव न हो जाएगा?
होगा। परमात्मा से ही क्या फर्क पड़ता है। सिर्फ तुमने चाह का विषय बदल दिया। धन की जगह ध्यान, काम की जगह राम। लेकिन तुम वही के वही। तुम्हारी चाहत का ढंग वही का वही। तुम्हारी चाल वही; वही बेढंगी चाल! कुछ फर्क न पड़ेगा।
इससे क्या फर्क पड़ता है कि तुम किस दिशा में जा रहे हो। तुम्हारे पैरों की गलती है। तुम्हारे चलने में भूल है। दिशा कोई भी हो, तुमसे भूल होने ही वाली है।
इतनी बार चाह कर जब यह देखा कि जिसको चाहा वही नहीं मिला, जो चाहा वही असंभव हो गया, तो कुछ तो सीखो! इतना तो सीखो कि अब जिसे पाना है उसे चाहेंगे नहीं! यह तो सीधा सा गणित है कि अब जिसे पाना है उसे चाहेंगे नहीं। अब चाह को बीच में खड़ा न करेंगे।
इसलिए बुद्ध ने कहा है कि परमात्मा को भी जो चाहता है, वह उसे नहीं पा सकेगा। इसलिए बुद्ध ने कहा, परमात्मा है ही नहीं। फिक्र ही छोड़ो। तुम ध्यान करो।
ध्यान का क्या अर्थ है? अचाह। चाहमुक्त हो जाओ। तुम शून्य हो जाओ। तुम्हारे भीतर कोई वासना न हो। फिर आना होगा परमात्मा को तो आ जाएगा। खोजता चला आएगा। तुम शून्य हुए कि सत्य तुम्हारी तरफ बहा।
तुम कहते हो: "मैं जिसे चाहता हूं, उसे ही पाना असंभव हो जाता है!'
इसमें तुम्हारा कोई कसूर नहीं धर्मेंद्र। यह जीवन का शाश्वत नियम है। एस धम्मो सनंतनो। यही शाश्वत नियम है: चाहोगे--पा न सकोगे। दौड़ोगे--चूकोगे। रुकोगे--पा लोगे। ठहर जाओ।
चाह दौड़ाती है। और दौड़ने में कोई नहीं पा सकता। क्योंकि जिसे पाना है, वह दूर नहीं है। जिसे पाना है, वह मिला ही हुआ है।
मुझे ऐसा कहने दो: तो यह तो हो भी सकता है कि चाहने वाला धन पा ले। हालांकि धनी कभी नहीं हो पाएगा। यह हो सकता है कि तुम जिस स्त्री को चाहते हो, उसे पा लो। हालांकि पाते ही वह स्त्री वही नहीं रह जाएगी जो पाने के पहले थी। अगर ठीक से समझो, तो तुमने जिसे पाया, यह वही स्त्री नहीं है; यह कोई और है। जब तक नहीं पाया था, तब तक जो रूप था; जब तक नहीं पाया था, तब तक जो लावण्य था; जब तक नहीं पाया था, तब तक यह स्त्री स्वर्ग की अप्सरा थी। पा लिया--सब मिट्टी हो गया!
मजनू बड़ा सौभाग्यशाली था; लैला नहीं मिली। लैला मिल जाती तो मजनू को संन्यासी होना पड़ता। मियां मजनू को स्वामी होना पड़ता! और मेरे सिवा तो उनको कोई संन्यास दे नहीं सकता था। सो स्वामी मजनू भारती! और लैला भी बेचारी क्या करती! जब मजनू हो जाते स्वामी, तो लैला भी क्या करती! वे तो बड़े सौभाग्यशाली थे, मिलना नहीं हो पाया। पुकारते रहे, चिल्लाते रहे, खोजते रहे। दूर के ढोल सुहावने मालूम होते हैं। दूरी में ही सारा सुहावनापन है। जैसे-जैसे चीजों के पास आते हो, वैसे-वैसे उनकी व्यर्थता सिद्ध होने लगती है।
तुम्हीं न समझीं जब मेरे गीतों की भाषा,
दुनिया सौ-सौ अर्थ लगाए, क्या होता है।

यह मेरे मन की कमजोरी या मजबूरी
कुछ भी कह लो, सिर्फ तुम्हें ही अपनाया है।
तुम्हें समर्पित किया सहज ही इस जीवन में
जो कुछ भी खोया-पाया, रोया-गाया है।
तुम्हीं न दुहरा पाईं मेरे गीत प्राण! जब,
सारे-का-सारा जग गाए, क्या होता है!

मात्र बहाना था गीतों का सृजन मुझे तो--
अपना दर्द तुम्हारे दिल तक पहुंचाना था।
जो न अन्यथा कह पाता मैं--सुन पातीं तुम
कुछ ऐसा था राज तुम्हें जो समझाना था।
मेरा दर्द न छू पाया जब हृदय तुम्हारा
पत्थर का भी दिल पिघलाए, क्या होता है।

और सभी मिल जाते केवल वही न मिलता--
चाह करो जिसकी, दुनिया का यही नियम है,
सारे स्वर सध जाते केवल वही न सधता--
जो प्रिय हो मन को, जीवन ऐसी सरगम है।
तुम्हीं न अर्पण मेरा जब स्वीकार कर सकीं,
यह  सारी  दुनिया  अपनाएक्या  होता  है।
लेकिन ऐसे काव्य, ऐसे गीत जनमते हैं उन कवियों के हृदय में, जो तड़पते रहे हैं और जिनको अपना प्रेम-पात्र नहीं मिल पाया। प्रेम-पात्र मिल जाए, तो अचानक आंख खुल जाती है। क्योंकि तुमने जो सोचा था, वह तुम्हारी कल्पना थी। वह तुम्हारा प्रक्षेपण था। वह तुमने आरोपित कर लिया था।
मजनू लैला में जो देखता है, वह लैला में नहीं है, मजनू की आंख में है। वह मजनू की आंख से ही लैला पर आरोपित होता है। या तो लैला न मिले, तो ठीक। रोता रहेगा मजनू। मगर रोने में भी एक मजा है। रोने में भी एक रस है। मजनू के रोने में भी एक माधुर्य है। विषाद तो है, लेकिन हताशा नहीं है। चिंता तो है, पीड़ा तो है, लेकिन उदासी नहीं है, वैराग्य नहीं है।
लेकिन एक बुद्ध--गौतम बुद्ध--जिनको सुंदरतम स्त्री मिली; जो उन्होंने चाही, वह स्त्री मिली। लेकिन उनतीस वर्ष के थे, तभी घर-द्वार छोड़ दिया।
एरनाल्ड ने बुद्ध पर जो अदभुत किताब लिखी है: लाइट ऑफ एशिया। उसमें जो वर्णन है, रात्रि में बुद्ध का घर छोड़ने का, बहुत प्यारा है। देर तक पीना-पिलाना चलता रहा। देर तक नाच-गान चलता रहा। देर तक संगीत चला। फिर बुद्ध सो गए। लेकिन आधी रात अचानक नींद खुल गई। जो नर्तकियां नाचती रही थीं, वे भी थक कर अपने वाद्यों को वहीं पड़ा छोड़ कर फर्श पर ही सो गई हैं। पूरी चांद की रात है। खिड़कियों, द्वार-दरवाजों से चांद भीतर आ गया है। बुद्ध चांद की रोशनी में ठीक से उन स्त्रियों को देख रहे हैं, जिनको वे बहुत सुंदर मानते रहे हैं। किसी के मुंह से लार टपक रही है, क्योंकि नींद लगी है। किसी की आंख में कीचड़ भरा है। किसी का चेहरा कुरूप हो गया है। कोई नींद में बड़बड़ा रही है। जिसके सुमधुर स्वर सुने थे सांझ, वह इस तरह बड़बड़ा रही है जैसे पागल हो! बुद्ध ने उन सारी सुंदर स्त्रियों की यह कुरूपता देखी और एक बोध हुआ कि जो मैं सोचता हूं, वह मेरी कल्पना है। यथार्थ यह है। आज नहीं कल देह मिट्टी हो जाएगी। आज नहीं कल देह चिता पर चढ़ेगी। इस देह के पीछे मैं कब तक दौड़ता रहूंगा? इन देहों में मैं कब तक उलझा रहूंगा?
यह आघात इतना गहरा था कि वे उसी रात घर छोड़ दिए। उनतीस वर्ष की उम्र कोई उम्र होती है! अभी युवा थे। मगर जीवन का यथार्थ दिखाई पड़ गया। जीवन बड़ा थोथा है। जीवन बिलकुल अस्थिपंजर है। हड्डी-मांस-मज्जा ऊपर से है, भीतर अस्थिपंजर है।
भाग निकले, जितने दूर जा सकते थे। जो सारथी उन्हें ले गया है छोड़ने स्वर्णरथ पर बिठा कर, वह बूढ़ा सारथी उन्हें समझाता है कि आप यह क्या कर रहे हैं? कहां जा रहे हैं? महल की याद करें! इतना सुंदर महल और कहां मिलेगा? यशोधरा की स्मृति करें! इतनी सुंदर स्त्री और कहां मिलेगी? इतना प्यारा राज्य, इतनी सुख-सुविधा, इतना वैभव-विलास--इस सब स्वर्ग को छोड़ कर कहां जाते हो?
बुद्ध ने लौट कर पीछे की तरफ देखा। पूर्णिमा की रात में उनका संगमरमर का महल स्वप्न जैसा जगमगा रहा है। उस पर जले हुए दीये, जैसे आकाश में तारे टिमटिमाते हों। लेकिन उन्होंने सारथी को कहा, जाना होगा। मुझे जाना ही होगा। क्योंकि तुम जिसे कहते हो महल, मैं वहां सिवाय लपटों के और कुछ भी नहीं देखता हूं। मैं वहां चिंताएं जलती देख रहा हूं। आज नहीं कल, देर नहीं होगी, जल्दी ही सब राख हो जाएगा। इसके पहले कि सब राख हो जाए, इसके पहले कि मेरी देह गिरे, मुझे जान लेना है उसको, जो शाश्वत है। यदि कुछ शाश्वत है, तो उससे पहचान कर लेनी है। मुझे सत्य से परिचय कर लेना है; सत्य का साक्षात्कार कर लेना है।
धर्मेंद्र, तुम कहते हो: जो भी मैंने चाहा, उसे पा न सका।
कौन पा सका है? कुछ पा सके, उन्होंने पाकर पाया कि व्यर्थ। कुछ नहीं पा सके, वे भरमते रहे, भटकते रहे। अच्छा ही है कि तुम्हें यह बात समझ में आ गई कि चाह में ही कुछ बुनियादी भूल है; कि चाहो, और पाना मुश्किल हो जाता है! और यह डर सार्थक है कि कहीं परमात्मा को चाहने लगूं, और ऐसा तो न होगा कि उसे भी न पा सकूं!
तुम चौंकोगे। तुमने अगर किसी और से पूछा होता, किन्हीं और तथाकथित संत-महात्माओं से पूछा होता, तो तुम्हें यह उत्तर न मिलता जो उत्तर तुम मुझसे पाओगे। तुम्हारे संत-महात्मा तो कहते, चाहो--परमात्मा को चाहो--जी भर कर चाहो; एकाग्र-चित्त होकर चाहो; जरूर पाओगे।
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, अगर परमात्मा को भी चाहा, तो बस, चूकोगे। चाह चुकाती है। चाह को छोड़ो। चाह को जाने दो। परमात्मा को पाने की विधि है: चाह से मुक्त हो जाना।
थोड़ी देर को, चौबीस घंटे में कम से कम इतना समय निकाल लो, जब कुछ भी न चाहो। उसी को मैं ध्यान कहता हूं। घंटे भर को, दो घंटे को, दिन में या रात, सुबह या सांझ, कभी वक्त निकाल लो। बंद करके द्वार-दरवाजे शांत बैठ जाओ। कुछ भी न चाहो। न कोई मांग, न कोई चाह। शून्यवत! जैसे हो ही नहीं। जैसे मर गए। जैसे मृत्यु घट गई।
ध्यान मृत्यु है--स्वेच्छा से बुलाई गई मृत्यु। ठीक है, श्वास चलती रहेगी, सो देखते रहना। और छाती धड़कती रहेगी, सो सुनते रहना। मगर और कुछ भी नहीं। श्वास चलती है, छाती धड़कती है, और तुम चुपचाप बैठे हो।
शुरू-शुरू में कठिन होगा। जन्मों-जन्मों से विचारों का तांता लगा रहा है, वह एकदम से बंद नहीं हो जाएगा। उसकी कतार बंधी है। क्यू बांधे खड़े हैं विचार। सच तो यह है, ऐसा मौका देख कर कि तुम अकेले बैठे हो, कोई भी नहीं, टूट पड़ेंगे तुम पर सारे विचार। ऐसा शुभ अवसर मुश्किल से ही मिलता है। तुम उलझे रहते हो--काम है, धाम है, हजार दुनिया के व्यवसाय हैं--विचार खड़े रहते हैं मौके की तलाश में कि कब मौका मिले, कब तुम पर झपटें!
लेकिन जब तुम शांत बैठोगे, ध्यान में बैठोगे, तो मिल जाएगा अवसर विचारों को। सारे विचार टूट पड़ेंगे, जैसे दुश्मनों ने हमला बोल दिया हो। कुरुक्षेत्र शुरू हो जाएगा। तरहत्तरह के विचार, संगत-असंगत विचार, मूढ़तापूर्ण विचार, सब एकदम तुम पर दौड़ पड़ेंगे। चारों तरफ से हमला हो जाएगा। उसको भी देखते रहना। लड़ना मत, झगड़ना मत, विचारों को हटाने की चेष्टा मत करना। बैठे रहना चुपचाप। जैसे अपना कुछ लेना-देना नहीं--निष्पक्ष, निरपेक्ष, असंग। जैसे राह के किनारे कोई राहगीर थक कर बैठ गया हो वृक्ष की छाया में, और रास्ते पर चलते लोगों को देखता हो। कभी कार गुजरती, कभी बस गुजरती, कभी ट्रक गुजरता, कभी लोग गुजरते, उसे क्या लेना-देना! कोई इस तरफ जा रहा, कोई उस तरफ जा रहा। जिसको जहां जाना है, जा रहा है। जिसको जो करना है, कर रहा है। राह के किनारे सुस्ताते हुए राहगीर को क्या प्रयोजन है! पापी जाए कि पुण्यात्मा; सफेद कपड़े पहने कोई जाए कि काले कपड़े पहने; स्त्री जाए कि पुरुष; जाने दो जो जा रहा है। रास्ता चलता ही रहता है। चलते रास्ते से राहगीर जो थक कर बैठ गया है, उसे क्या लेना है!
ऐसे ही तुम अपने चित्त के चलते हुए रास्ते के किनारे बैठ जाना, देखते रहना। कोई निर्णय नहीं। कोई पक्ष-विपक्ष नहीं। कोई चुनाव न करना। इस विचार को पकड़ लूं, उसको छोड़ दूं; यह आ जाए, यह मेरा हो जाए; यह न आए, यह कभी न आए--ऐसी कोई भावनाएं न उठने देना। और धीरे-धीरे, आहिस्ता-आहिस्ता एक दिन ऐसी घड़ी आएगी, जब रास्ता सूना होने लगेगा। कभी-कभी कोई भी न होगा रास्ते पर। सन्नाटा होगा। अंतराल आ जाएंगे। उन्हीं अंतरालों में पहली बार तुम्हें परमात्मा की झलक मिलेगी। क्योंकि न कोई चाह है, न कोई कल्पना, न कोई विचार।
परमात्मा की झलक मिलेगी--कहीं बाहर से नहीं; तुम्हारे भीतर ही बैठा है। विचारों की धुंध हट जाती है, तो दिखाई पड़ने लगता है।
जो तुमने प्रेम के अनुभव से जाना है, उस अनुभव को उपयोग कर लेना। जो तुमने अब तक संसार की प्रीति में सीखा है, उस पाठ को भूल मत जाना। चाहत करके तुमने जो देखा है, कि सदा हारे, वह एक बड़ी संपदा है। उस पाठ का अगर उपयोग कर लिया, तो परमात्मा के संबंध में असफल न होना पड़ेगा।
चाहो न--और परमात्मा पाया जा सकता है। लाओत्सू का प्रसिद्ध वचन है: खोजो मत--पा लो। मांगो मत--पा लो। न कहीं जाना है, न खोजना है। वह परम धन तुम्हारे भीतर है। वह तुम्हारा स्वरूप है

आज इतना ही।