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शनिवार, 27 मई 2017

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-04

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
जीवन एक अभिनय—(चौथा प्रवचन)
दिनांक १४ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
प्रश्नसार:

1—क्या इस बार फिर मैं आपको चूक जाऊंगा?
2—कल आपने मंगलदास को कहा कि पुराने संन्यास में डर नहीं है, नव-संन्यास में डर है। लेकिन मेरी पत्नी मेरे पुराने संन्यास व्रत-नियम आदि से डरती थी और अब पांच वर्षों से मेरे नव-संन्यास से वह डरती नहीं बल्कि उसे श्रद्धापूर्वक लेती है। वह भी आपकी संन्यासिनी है और मस्त है।
3—कल आपने वह प्यारी लखनवी कहानी कही। उत्सुकता है जानने की कि फिर उन छह-छह इंच ऊंचे और साठ-साठ वर्ष बूढ़े दोनों भाइयों का आगे क्या हुआ!


पहला प्रश्न: भगवान,
क्या इस बार फिर मैं आपको चूक जाऊंगा?
परितोष,

मैं रहा तो चूक जाओगे। मैं के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। मैं की जरा सी भी रेखा रह गई तो चूकने के लिए पर्याप्त है। और आश्चर्यों का आश्चर्य तो यही है कि मैं एक झूठ है। फिर भी इस झूठ के परदे में सत्य छिप जाता है। मैं है नहीं, सिर्फ भासता है। जैसे रस्सी में कोई सांप को देख ले और भाग खड़ा हो। सांप तो झूठ है, मगर भागना सच है। झूठ से सच का जन्म हो गया। और यूं भी हो सकता है कि इतना घबड़ा जाए, ऐसा भागे, गिर पड़े, चोट खा जाए, हाथ-पैर तोड़ ले, हृदय का दौरा पड़ जाए, मौत भी हो सकती है। और सांप था ही नहीं, बस रस्सी थी। अंधेरे में भ्रांति हो गई थी।
मैं है ही नहीं; सिर्फ अंधेरे में भ्रांति हो गई है।
ध्यान का अर्थ है: भीतर रोशनी को जगा लेना। है तो अंगारा, लेकिन राख में दबा पड़ा है। जरा राख फूंक देनी है, जरा राख झाड़ देनी है--और अंगारा प्रज्वलित हो उठेगा, रोशनी हो जाएगी। और रोशनी में मैं नहीं पाया जाता है। जिस दिन पाया कि मैं नहीं है, उसी दिन पा लिया सब। मैं का खोना ही प्रभु का पाना है। और मैं में रमे रहना ही संसार है। मैं मैं उलझे रहना ही भटकाव है। और बड़ी तरकीबें करता है अपने को बचाने की।
झूठ स्वभावतः हर तरह के उपाय करता है। सत्य दिखाई पड़ता रहे, इसके लिए झूठ सब आयोजन करता है। झूठ बड़ा कूटनीतिज्ञ है। प्रमाण जुटाया है, आधार बनाता है। एक धोखा टूटता है तो नये धोखे निर्माण करता है। एक तरफ से दीवाल गिरने लगती है तो नई दीवाल उठाता है, कि गिरती दीवाल में टेके लगाता है। झूठ मर नहीं जाना चाहता, झूठ भी जीना चाहता है। सत्य को चिंता नहीं होती, क्योंकि सत्य मर ही नहीं सकता। झूठ को बड़ी चिंता होती है।
सत्य अपनी सुरक्षा का कोई उपाय नहीं करता, क्योंकि सत्य तो सुरक्षित है ही। आग उसे जला नहीं सकती, शस्त्र उसे छेद नहीं सकते, मृत्यु उसे मिटा नहीं सकती। सत्य तो लापरवाह है। सत्य तो अलमस्त है। न सत्य प्रमाण जुटाता है, न तर्क। झूठ प्रमाण जुटाता है, तर्क जुटाता है। जितना बड़ा झूठ हो, उतना ही बड़ा आयोजन करना होता है।
यह मैं इस संसार में सबसे बड़े झूठों में एक है। यह कैसे-कैसे आयोजन करता है! इसके आयोजन पहचानो। इसकी चालबाजियां पहचानो। यह धन इकट्ठा करेगा, क्योंकि धन न हो तो मैं के लिए सहारा नहीं होता। मैं सहारे मांगता है। मेरे पास इतना है; जितना मेरे पास है उतना मैं हूं। मैं विस्तार मांगता है। इतनी मेरी शक्ति है, इतना मेरा पद है--उतना ही मैं हूं। मैं सीढ़ियां चढ़ता है महत्वाकांक्षा की। जितनी ऊंचाई पर खड़ा हो जाए उतना ही अकड़ जाता है, उतना की आश्वस्त हो जाता है कि मैं हूं। मैं प्रसिद्धि मांगता है, यश मांगता है, सम्मान मांगता है। मैं अपमान से डरता है, लांछना से डरता है। मैं घबड़ाता है। जरा सी गाली, जरा सा अपमान और तिलमिला जाता है। क्यों? क्योंकि मैं का जो गुब्बारा है, वह कोई जरा सी आलपीन भी चुभा दे तो फूट सकता है। खतरा है। गुब्बारा ही है, सिर्फ हवा ही भरी है। पानी का बबूला है, कोई छू भर दे तो नष्ट हो सकता है।
इसलिए मैं बड़ा छुई-मुई होता है, हमेशा बच कर चलता है--कोई छू न दे! सब तरह के आयोजन करता है--प्रतिष्ठा के, सम्मान के। लोग जैसा कहें वैसा ही करने को राजी हो जाता है--बस सम्मान मिले, सत्कार मिले। लोग मूढ़तापूर्ण कृत्य करने को कहें तो वे भी करने को राजी हो जाता है--अगर लोग सत्कार देते हों। क्योंकि सत्कार मैं का भोजन है। सम्मान मैं का भोजन है। पद से मिले तो पद और त्याग से मिले तो त्याग।
और तुम जरा देखना, तुम्हारे तथाकथित महात्मा तुम्हें समझाते हैं कि सच्चा सम्मान तो त्याग में ही है। सच्चा यश तो त्याग में ही है। सच्ची प्रतिष्ठा तो त्याग में ही है। वे तुम्हारे अहंकार को फुसला रहे हैं, वे तुम्हारे अहंकार को आमंत्रण दे रहे हैं कि धन में क्या रखा है! अरे धन तो क्षणभंगुर है! आज है, कल छूट जाए। हम तुम्हें ऐसा धन देते हैं कि कोई न छुड़ा सके।
तुम्हारा धन छीना जा सकता है, तुम्हारा त्याग कोई कैसे छीनेगा? त्याग ज्यादा सुरक्षित है। इसलिए त्यागी का जैसा अहंकार होता है वैसा अहंकार भोगी का नहीं होता। भोगी का बेचारे का अहंकार छोटा होता है। वह खुद ही भीतर पछताता होता है, वह खुद ही जानता है अपनी सीमाएं। त्यागी का अहंकार तो स्वर्णमंडित हो जाता है। वह तो मंदिरों पर चढ़े हुए शिखर जैसे चमकते हैं सूरज की रोशनी में, ऐसा चमकता है। त्यागियों का अहंकार तो बड़ी जोर से उदघोषणा करता है।
इसलिए तुम्हारे त्यागियों ने दुनिया में जितने संघर्ष करवाए, जितने उपद्रव, जितने झगड़े, जितने दंगे-फसाद, उतने भोगियों ने नहीं करवाए। ये मंदिर जलते हैं, ये मस्जिदें जलती हैं। ये मूर्तियां टूटती हैं। ये कौन तुड़वाता है? ये तुम्हारे त्यागियों के अहंकार! ये तुम्हारे महात्माओं के अहंकार। इनकी अकड़ का कोई ठिकाना नहीं है। ये मिलने ही नहीं देते मनुष्य को मनुष्य से। ये मनुष्यता को खंडित किए हुए हैं, क्योंकि मनुष्यता खंडित रहे तो ही संभावना है इनके सम्मान की। अगर मनुष्यता अखंड हो जाए तो बहुत मुश्किल हो जाएगी; सबसे ज्यादा मुश्किल होगी तुम्हारे त्यागियों को।
इसे तुम थोड़ा सोचो। इस गणित को थोड़ा पहचानो। अगर सारी मनुष्यता अखंड हो जाए तो तुम्हारे त्यागियों को कौन सम्मान देगा? क्योंकि सारी मनुष्यता के अखंड होने का एक ही अर्थ होगा कि ये जो अलग-अलग मान्यताएं हैं हजारों तरह की, ये सब खो जाएंगी, इनका कोई मूल्य नहीं रह जाएगा। इन्हीं मान्यताओं के आधार पर तो त्यागी को तुम सम्मान देते हो।
जैसे ईसाइयों का एक संप्रदाय था रूस में, वह अपनी जननेंद्रियां काट लेता था। जो अपनी जननेंद्रिय काट लेता था वह महात्मा समझा जाता था। किसी दूसरे देश में पागल समझा जाएगा। किसी दूसरी जाति में पागल समझा जाएगा। ऐसा कोई करेगा तो हम पुलिस को खबर करेंगे कि इस आदमी को पकड़ो, इसका दिमाग खराब हो गया है।
लेकिन हमारा त्यागी जो करता है, वह हमें नहीं दिखाई पड़ता, वह दूसरों को दिखाई पड़ता है। हमारा त्यागी हमारे लिए त्यागी मालूम होता है; हमारी परंपरा, हमारे पक्षपात के अनुकूल होता है। कुछ भी उलटा-सीधा करता हो। कोई सिर के बल खड़ा है तो हम उसको कहते हैं कि योगीराज! महायोगी! घंटों सिर के बल खड़े रहते हैं! अगर परमात्मा को आदमी को सिर के बल ही खड़ा करना था तो पैर के बल खड़ा उसने किया ही क्यों होता? तुम्हें सिर के बल ही खड़ा किया होता। सिर में ही पैर लगाए होते।
और सिर के बल घंटों खड़े रहने वाले लोगों में तुमने कभी कोई प्रतिभा देखी? कोई बुद्धिमत्ता देखी? इनके जीवन में कोई विवेक की चमक देखी? कोई ध्यान की आभा देखी? हो ही नहीं सकती, क्योंकि ये प्रकृति के विपरीत कार्य कर रहे हैं।
सिर के बल जो खड़ा होगा उसकी बुद्धि नष्ट हो जाएगी, वह जड़ हो जाएगा, क्योंकि मस्तिष्क इतने सूक्ष्म तंतुओं से बना हुआ है। इस छोटे से सिर में सात करोड़ तंतु हैं! तुम इनकी संख्या से ही अंदाज लगा सकते हो, कितने बारीक, कितने सूक्ष्म! अगर एक लाख तंतुओं को एक के ऊपर एक रखें तो एक बाल की मोटाई के होते हैं। खाली आंख से तो देखे ही नहीं जा सकते। और तुम सिर के बल खड़े हो गए, तो खून की जो प्रबल धारा सिर की तरफ बहेगी, जमीन के गुरुत्वाकर्षण के कारण, वह उन सब सूक्ष्म तंतुओं को तोड़ देती है। उनके टूट जाने पर प्रतिभा नष्ट हो जाती है।
इस देश की प्रतिभा को नष्ट करने में तुम्हारे तथाकथित योग ने जितना काम किया है, और किसी बात से नहीं। हां, यह हो सकता है कि योगी के पास देह मजबूत हो, लेकिन देह तो पशुओं के पास भी मजबूत होती है। जरा किसी भैंसे से जूझ कर देखो, तो तुम कितने ही दारासिंह हो, एक भैंसा ही तुम्हें ठिकाने लगा देगा। इससे तुम यह मत समझ लेना कि भैंसा योगीराज है। शरीर का बल--बड़ी कीमत पर। शरीर के बल का करोगे क्या, उसका मूल्य क्या है? मस्तिष्क को गंवा कर शरीर में बल आ ही जाएगा। इसलिए तो पशु इतने मजबूत हैं। मस्तिष्क तो है नहीं, तो शरीर पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि आदमी में मस्तिष्क पैदा हुआ--सिर्फ इसीलिए कि वह दो पैर पर खड़ा हुआ। बंदरों में नहीं पैदा हो सका। वैज्ञानिकों के हिसाब से तो आदमी बंदरों से ही आया है, उसी जाति से आया है। सब आदमी हनुमान जी के वंशज हैं। अगर तुम हनुमान जी की पूजा करते हो तो समझो कि अपने पूर्वजों की पूजा कर रहे हो। किसी और की पूजा करने से हनुमान जी की पूजा ठीक; कम से कम अपने पूर्वजों का स्मरण तो कर हरे हो।
वैज्ञानिक कहते हैं, आदमी बंदर से ही आया। लेकिन आदमी के पास कैसी प्रतिभा है। और बंदरों के पास तो कोई प्रतिभा नहीं है, क्योंकि वे अभी भी चारों हाथ-पैर का उपयोग कर रहे हैं। जब तुम चारों हाथ-पैर से चलते हो तो तुम्हारा सिर गुरुत्वाकर्षण के विपरीत नहीं होता, अनुकूल होता है। इसलिए तो रात सोने में लेट जाओ तो नींद जल्दी आ जाती है। क्योंकि लेटते ही तुम्हारा पूरा शरीर गुरुत्वाकर्षण के अनुकूल हो जाता है। खड़े होओ तो पैरों में खून ज्यादा जाता है, मस्तिष्क में खून कम जाता है। स्वभावतः क्योंकि हृदय को खून को ऊपर भेजने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। जमीन नीचे खींचती है। चूंकि मस्तिष्क में खून कम जाता है, इसलिए मस्तिष्क में सूक्ष्मतम तंतु विकसित हो गए हैं। जंगली आदमियों में, आदिवासियों में अल्बर्ट आइंस्टीन, रवींद्रनाथ टैगोर या गौतम बुद्ध जैसे लोग पैदा नहीं होते। होना तो चाहिए, क्योंकि वे बड़े भोले-भाले लोग हैं। लेकिन बहुत से कारणों में एक कारण है कि जंगली आदमी बिना तकिए के सोता है। तुम तकिए पर सोते हो। तकिए पर सोने के कारण रात भी तुम्हारा सिर तुम्हारे शेष शरीर से ऊंचा रहता है। ऊंचा रहता है तो खून कम पहुंचता है। कम पहुंचता है तो सूक्ष्म तंतु टूट नहीं पाते। अगर सूक्ष्म तंतु टूट जाएं तो तुम्हारी प्रतिभा दीन हो जाएगी, हीन हो जाएगी।
ये वैज्ञानिक सत्य हैं। मगर कितना ही कहो, सिर के बल खड़ा होने वाला आदमी योगी समझा जाएगा। कोई इसकी मूढ़ता को न देखेगा। शरीर को इरछा-तिरछा करेगा, तोड़ेगा-मरोड़ेगा और तुम कहोगे, बड़ी साधना कर रहा है! शरीर को सताना और साधना! कांटों पर लेट जाएगा, तो तुम एकदम पूजा में झुक जाओगे। श्रद्धा के फूल तुम्हारे झरने लगेंगे उसके चरणों में। और कांटों पर जो सो रहा है वह केवल अपनी देह को संवेदनशून्य कर लिया है। उसकी संवेदनशीलता क्षीण हो गई है। इसे क्षीण किया जा सकता है। तुम्हारे पैर की चमड़ी तुम देखते हो, तलुवे, वे संवेदनशून्य हो गए हैं, क्योंकि उन पर चलना पड़ता है। चलते रहोगे तो उनको मजबूत हो जाना पड़ा है, खाल मोटी हो गई है। इसलिए बुद्धू आदमी को हम कहते हैं मोटी खाल वाला। जिसकी समझ में कुछ न आए उसको कहते हैं, इसकी चमड़ी बड़ी मोटी है। अर्थ यह है कि इसमें संवेदनशीलता नहीं है। शरीर का जो अंग तुम चाहो, संवेदनशून्य हो सकता है, सिर्फ थोड़े अभ्यास की जरूरत है। मलते रहो राख अपनी पीठ में, लेटते रहो कंकड़ों पर, धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाना। पहले गोल-गोल कंकड़ों पर लेटना, फिर इरछे-तिरछे कंकड़ों पर लेटना, फिर लेटते रहना। फिर धीरे-धीरे मोटे खीलों पर लेटना। फिर कांटों पर लेटना। तुम सिर्फ इतना ही कर रहे हो कि अपनी पीठ को मुरदा कर रहे हो। तुम पीठ को मारे डाल रहे हो। उसमें जो-जो संवेदनशील तंतु हैं उनकी हत्या किए दे रहे हो, उनको समाप्त किए दे रहे हो। तुम पीठ को तलुवे की चमड़ी बना ले रहे हो। और कुछ भी कला नहीं है इसमें। और इस आदमी को तुम सम्मान दे रहे हो! यह आदमी पागल है।
शरीर संवेदनशील होना चाहिए। जितना संवेदनशील हो शरीर उतना सुंदर है, उतना प्रसादयुक्त है। जितना संवेदनशील हो, उतनी ही भीतर भी सूक्ष्म प्रतिभा की संभावना बढ़ती है। अगर तुम शरीर की सारी संवेदना मार दो तो शरीर ही द्वार है जिससे हम अस्तित्व से जुड़ते हैं। अगर शरीर के सब द्वार-दरवाजे बंद कर दिए तो अस्तित्व से हमारा नाता टूट गया, हम अपने में बंद हो गए; जैसे कछुआ। तुम कछुए की पीठ जैसी अगर अपनी पूरी देह को कर लो तो तुम मर ही गए, अपनी कब्र में समा गए, जिंदा ही जिंदा अपनी कब्र में बैठ गए।
लेकिन हम कछुओं को बड़ा सम्मान देते हैं। हम कहते हैं: कछुआ अर्थात महायोगी! सारी दुनिया हंसेगी, क्योंकि उनका यह पक्षपात नहीं है, यह हमारा पक्षपात है।
अगर सारी दुनिया, सारी मनुष्यता एक हो जाए तो ये छोटे-छोटे पक्षपात सब गिर जाएंगे और इनके साथ ही तुम्हारे मुनि, तुम्हारे त्यागी, तुम्हारे व्रती, तुम्हारे महात्मा गिर जाएंगे। उनकी दो कौड़ी कीमत हो जाएगी। इसलिए वे तुम्हें मिलने नहीं दे सकते। राजनीतिज्ञ भी तुम्हें मिलने नहीं देना चाहते और तुम्हारे धर्मगुरु भी तुम्हें मिलने नहीं देना चाहते। उन दोनों का बल ही यही है कि तुम बंटे रहो। तुम बंटे रहो तो वे तुम पर सत्ता करते रहें। तुम इकट्ठे हो जाओ, उनकी सत्ता समाप्त हो जाए।
यह मैं बड़े-बड़े नये-नये रूप लेता है--धन का, पद का, त्याग का, तपश्चर्या का, उपवास का, व्रत का, नियम का। जो आदमी जितने उपवास कर लेता है, वह सोचता है, मैं दूसरों से उतना महान हो गया। जैसे कि भूखा मरना कोई कला हो! जैसे कि परमात्मा तुम्हें भूखा मारना चाहता हो। जैसे कि परमात्मा कोई दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति है, जो तुम्हें सताने में रस लेता है; कि तुम धूप में खड़े रहो तो उसे मजा आता है; कि सर्दी में ठिठुरते रहो नंगे तो उसे मजा आता है; कि तुम भूखे मरते रहो तो उसे मजा आता है; कि तुम्हें प्यास लगी है और तुम पानी न पीयो तो उसे मजा आता है। जरा तुम सोचो कि तुम्हारे परमात्मा की धारणा क्या है? परमात्मा है या कोई अडोल्फ हिटलर? यह परमात्मा है या कोई पागल?
मगर अहंकार ने ये सारी व्यवस्थाएं खोजीं। एक तरफ से व्यवस्था छूटती है तो अहंकार जल्दी दूसरी व्यवस्था खड़ी कर लेता है। धन इकट्ठा करो, नहीं तो ज्ञान इकट्ठा करो। लोग कितना ज्ञान इकट्ठा करने में लगे रहते हैं! शास्त्रों पर शास्त्र इकट्ठे करते चले जाते हैं। अपना कुछ भी नहीं। अपना जाना कुछ भी नहीं। सब उधार, सब बासा, सब कचरा। जो अपना जाना हुआ नहीं है वह कचरा ही है। जो अपनी अनुभूति से जन्मा नहीं है, उस पर विश्वास करना मूढ़ता है। सिर्फ मूढ़ों के अतिरिक्त और कोई विश्वास नहीं करता। बुद्धिमान व्यक्ति खोजता है, मूढ़ विश्वास करते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति पाता है, तब मानता है। मूढ़ पहले ही मान लेते हैं, पाने का सवाल ही नहीं उठाते, पाने की जरूरत ही नहीं रह जाती। मगर तुम जितना मान लेते हो उतनी ही तुम्हारी अकड़ हो जाती है।
आस्तिक को देखो, उसकी बड़ी अकड़ है। वह अकड़ कर चलता है। वह नास्तिक को ऐसे देखता है कि सड़ोगे नरक में। मेरा स्वर्ग निश्चित है! अप्सराएं स्वागत के लिए फूलमालाएं लिए तैयार खड़ी हैं, बस मेरे पहुंचने की देर है कि बजे बैंड-बाजे, देवतागण एकदम नाचेंगे मेरे चारों तरफ, अप्सराएं फूलमालाएं पहनाएंगी, कल्पवृक्ष के नीचे विश्राम करूंगा। स्वर्ग की उसने कल्पनाएं कर रखी हैं। और सब उधार कचरा है उसके पास। आस्तिकता उसकी सच्ची नहीं है; ईश्वर को वह जानता नहीं है, पहचानता नहीं है, कोई आमना-सामना नहीं हुआ। अपने से ही आमना-सामना नहीं हुआ, परमात्मा से क्या खाक होगा? लेकिन वेद उसे कंठस्थ हैं, उपनिषद उसे याद हैं, गीता दोहरा देता है, जैसे तोता दोहरा दे।
इन तोतों की तुमने कितनी कीमत की है! बहुत कीमत कर चुके। और इस कीमत के कारण अहंकार ज्ञान को इकट्ठा करता है। अहंकार इकट्ठा करने में लगा रहता है--कुछ भी हो, ज्ञान हो, धन हो, त्याग हो, मगर इकट्ठा करो। भरते रहो अपने को, क्योंकि अहंकार बिलकुल खाली है; किसी न किसी चीज से भरो तो भरा हुआ मालूम पड़ता है। अपने आप में तो बिलकुल खाली है। अगर बिलकुल न भरो किसी चीज से तो जल्दी ही तुम्हें दिखाई पड़ जाएगा कि यह तो है ही नहीं। इसे भर-भर कर धोखा देते रहो।
तुम पूछते हो परितोष: क्या इस बार मैं फिर आपको चूक जाऊंगा? सब निर्भर है इस बात पर कि मैं को बल दोगे या नहीं! ज्ञान से बेहतर है अज्ञान। यह जानना ज्यादा उचित है कि मैं नहीं जानता हूं। यह जानना ज्यादा उचित है कि मेरा क्या पुण्य! मेरे जीवन में बहुत भूलें हैं, बहुत पाप है। मैं अज्ञानी हूं। यह जानना बहुत उचित है, क्योंकि अगर तुम समझो कि मैं अज्ञानी हूं तो अहंकार मरेगा। क्योंकि अज्ञान की कोई अकड़ तो होती नहीं। अज्ञान में क्या अकड़ोगे? अज्ञान में तो आदमी विनम्र होता है; ज्ञान में अकड़ता है।
अगर तुम देखोगे कि मेरा जीवन तो भूलों से भरा है, चूकों से भरा है, मेरे जीवन में पाप ही पाप हैं, पुण्य कहां, व्रत कहां, नियम कहां, उपवास कहां! तो तुम अहंकार से कैसे भरोगे? लेकिन हो आए मंदिर, कि मस्जिद, कि गुरुद्वारा, कि अकड़ कर लौटते हो घर। न गए होते मंदिर तो बेहतर था, कम से कम यह अकड़ तो न होती। यह रोज मंदिर क्या हो आते हो, तुम परमात्मा पर कृपा कर आते हो! और तुम और अकड़ कर आते हो, रोज अकड़ कर आते हो। तिलक लगा लिया और देखो अकड़! जनेऊ पहन लिया और देखो अकड़! है कुछ भी नहीं--तीन धागे हैं! चुटैया रख ली और अकड़! है कुछ भी नहीं, किन-किन चीजों पर अकड़े फिर रहे हो!
परितोष, जिस-जिस भांति अकड़ गिरती हो, उस-उस भांति अकड़ को गिरने में सहारा दो। जानो कि अज्ञानी हो। हटा दो शास्त्रों को। वे तुम्हारे जाने हुए नहीं हैं, इसलिए उनको जानने से कुछ अर्थ नहीं है। जानो कि मेरी सीमाएं हैं। जानो कि मैं नाकुछ हूं। मत अपने को गौरवान्वित करो, कि मैंने इतने यज्ञ करवाए, इतने हवन करवाए, कि हर सप्ताह सत्यनारायण की कथा करवाता हूं, कि मैंने इतने मंदिर बनवाए, इतनी मस्जिदें बनवाईं। मत इन थोथी बातों में उलझो। जहां से भी मैं पकता हो, जहां से भी मैं भरता हो, जहां से भी मैं को थोड़ा सा पोषण मिलता हो, वहीं सजग हो जाओ। इस सजगता को ही मैं ध्यान कहता हूं। और अगर कोई ठीक से जांच करता रहे, अपने भीतर जाग कर देखता रहे तो जल्दी ही पहचान लेता है अहंकार की सारी कलाबाजियां, फिर अहंकार कहीं से भी नहीं घुस सकता, न सामने के द्वार से, न पीछे के द्वार से। उसके रास्ते बड़े सूक्ष्म हैं। लेकिन तुम अगर होश में हो तो वह तुम्हें धोखा नहीं दे पाएगा। और जो अहंकार के धोखे में नहीं पड़ता, वह निश्चित चूकेगा नहीं। चूकने को कुछ है ही नहीं। अहंकार गया कि तुमने पा ही लिया।
मेरी भूलों से मत उलझो जनम जनम का मैं अज्ञानी!

कांटों से निज राह सजा कर
मैंने उस पर चलना सीखा,
श्वासों में निःश्वास बसा कर
मैंने उस पर पलना सीखा,
गलना सीखा मैंने निशि दिन
निज आंखों का पानी बन कर,
अपने घर में आग लगा कर
मैंने उस में जलना सीखा।

मुझे नियति ने दे रक्खी है पागलपन से भरी जवानी;
मेरी भूलों से मत उलझो, जनम जनम का मैं अज्ञानी!

लगातार मैं पीता जाता, भरता जाता मेरा प्याला!
मैं क्या जानूं क्या है अमृत?
क्या मधु है? क्या यहां हलाहल?
खारा पानी है सागर का
मीठा-मीठा है गंगाजल।
सुनने को तो सुन लेता हूं
कडुवे मीठे बोल जगत के,
तड़पत्तड़प उठती है बिजली
बरस-बरस पड़ते हैं बादल।

कौन पिलाने वाला बोलो? कौन यहां पर पीने वाला?
लगातार मैं पीता जाता, भरता जाता मेरा प्याला!

सीधा साधा ज्ञान तुम्हारा, बहकी-बहकी मेरी बातें।
एक तड़प उसकी हर धड़कन
जिसको तुम सब कहते हो दिल,
अरे स्वयं मैं एक लहर हूं
मैं क्या जानूं क्या है साहिल?
मेरे मन में नई उमंगें,
मेरे पैरों में चंचलता।
पिछली मंजिल छोड़ चुका हूं
ज्ञात नहीं है अगली मंजिल।

सबके सपने अलग अलग हैं यद्यपि वही हैं सब की रातें,
सीधा-साधा ज्ञान तुम्हारा, बहकी-बहकी मेरी बातें!

मेरी भूलों से मत उलझो जनम-जनम का मैं अज्ञानी!
कांटों से निज राह सजा कर
मैंने उस पर चलना सीखा,
श्वासों में निःश्वास बसा कर,
मैंने उस पर पलना सीखा,
गलना सीखा मैंने निशि दिन,
निज आंखों का पानी बन कर,
अपने घर में आग लगा कर
मैंने उस मैं जलना सीखा।

मुझे नियति ने दे रक्खी है पागलपन से भरी जवानी;
मेरी भूलों से मत उलझो, जनम जनम का मैं अज्ञानी!
अपनी भूलों को देखो। अपने गुणों को मत गिनो, अपने दुर्गुणों को पहचानो। अपनी संपदा की बात न करो, अपनी निर्धनता को गुनो। तुम्हारा ज्ञान दो कौड़ी का है, तुम्हारा अज्ञान बहुमूल्य है। तुम काश देख सको कि मैं अज्ञानी हूं, आस्तिकता मुझे आई कहां, जानता क्या हूं, प्रार्थना पहचानता क्या हूं, पूजा-पाठ का स्वाद मैंने कहां लिया! देखो अपनी भूलें। देखो अपनी सीमाएं। देखो अपनी नग्नता। अपने को निर्वस्त्र पहचानो। और तुम पाओगे कि मैं गलने लगा, मैं की बर्फ पिघलने लगी।
और जिस दिन मैं खो जाएगा परितोष, उसी क्षण, तत्क्षण परमात्मा से मिलन हो जाता है। इधर मैं गया उधर परमात्मा उतरा। यह एक छोटा सा मैं बाधा बना है। प्रश्न उठ सकता है: इतना छोटा सा मैं, इतने विराट परमात्मा को कैसे रोक सकता है? इतना छोटा सा झूठ इतने विराट सत्य को कैसे आवरण में ले सकता है? और प्रश्न तार्किक मालूम होगा। लेकिन कभी तुमने खयाल किया, एक जरा सा धूल का कण आंख में चला जाए तो बस काफी है, सामने हिमालय खड़ा हो, दिखाई नहीं पड़ेगा। एक धूल का कण आंख को इतना बेचैन कर देता है, बंद कर देता है कि सामने खड़ा हुआ विशाल हिमालय, उत्तुंग शिखर उसके सब खो जाते हैं। एक धूल के कण ने हिमालय को छिपा लिया। निकाल दो धूल का कण और हिमालय प्रकट हो जाता है। हिमालय तो अपनी जगह है, कहीं गया नहीं, सिर्फ तुम्हारी आंख धूल के कण में छिप गई, दब गई।
अहंकार ने हमारी आंख को, भीतर की आंख को, ढांक लिया है। परमात्मा तो प्रकट है। परमात्मा तो प्रतिक्षण मौजूद है। वही तो है और तो कुछ भी नहीं है। मगर मैं कहूं, इसलिए मत मानना, नहीं तो वह उधार होगा, बासा होगा। मेरा आग्रह यही है, सतत आग्रह यही है कि तुम अपने भीतर अहंकार की कंकड़ी को अलग कर दो। जरा सा श्रम चाहिए। आंख तुम्हारी अहंकार से खाली हो जाए, भीतर की दृष्टि निर्मल हो जाए, फिर तुम्हें जो दिखाई पड़ेगा वह परमात्मा ही परमात्मा है। उसके अतिरिक्त और कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता है।
परितोष, कोई कारण नहीं है कि तुम इस बार चूको। असल में, कोई कारण नहीं था कि तुम कभी भी चूकते। पहले भी चूकने का कोई कारण नहीं था। चूके तो बस इस मैं के कारण। अब इस मैं को जाने दो। इस मैं को विदा करो, अलविदा! मैं से नमस्कार करो, काफी हो चुका।

दूसरा प्रश्न: भगवान,
कल आपने मंगलदास को कहा कि पुराने संन्यास में डर नहीं है, नव संन्यास में डर है। लेकिन मेरी पत्नी मेरे पुराने संन्यास के व्रत-नियम आदि से डरती थी और अब पांच वर्षों से मेरे नव संन्यास से वह डरती नहीं है, बल्कि उसे श्रद्धापूर्वक लेती है। वह भी आपकी संन्यासिनी है और मस्ती है।
जयपाल,
अगर मंगलदास की जगह किसी मंगला ने प्रश्न पूछा होता तो मेरा उत्तर बिलकुल भिन्न होता। पुराने संन्यास ने स्त्रियों को बहुत सताया है। पुराने संन्यास की सारी पीड़ा ही स्त्रियों ने झेली है। पुराना संन्यास स्त्रियों की छाती में छुरी की तरह था। पुराने संन्यास ने जितना अत्याचार स्त्रियों पर किया है, जितना बलात्कार स्त्रियों पर किया है, उतना किसी और चीज ने नहीं किया।
पहले तो तुम्हारे सारे महात्मा स्त्रियों को गाली देते रहे सदियों से: स्त्री नरक का द्वार है! स्त्री नरक की खान है! स्त्री ही सारे पाप का मूल है! स्त्रियों की जितनी निंदा की जा सकती थी, तुम्हारे महात्माओं ने कुछ कमी नहीं छोड़ी। स्त्रियों का बहुत अपमान किया। और मजा यह था, कि स्त्रियों का कोई कसूर न था। महात्माओं के भीतर स्त्रियों के प्रति जो अभी भी अटकी हुई आसक्ति थी, उससे वे डरे हुए थे। गालियां स्त्रियों को दे रहे थे, डर था स्त्री के आकर्षण का। लेकिन स्त्री के आकर्षण के लिए स्त्री जिम्मेवार नहीं है।
अगर गुलाब के फूल में तुम्हें आकर्षण है तो गुलाब के फूल का कोई उत्तरदायित्व नहीं है। तुम्हारा आकर्षण तुम्हें परेशान कर रहा है, गुलाब का फूल क्या करे? गुलाब के फूल को तो शायद पता भी न हो कि आप आकर्षित हैं।
महात्मागण हमेशा यह भूल करते रहे। धन को गाली देते हैं, जैसे कि धन तुम्हें पकड़ता हो! बड़ी हैरानी की बात है, धन ने कब किसको पकड़ा! तुम धन को पकड़ते हो। गाली देनी हो अपने को दो, कि मैं कैसा पागल हूं कि धन को पकड़ता हूं। लेकिन वे गाली देते हैं धन को--धन मिट्टी है, छूना मत, छूना पाप है। ये सब भीतर के भय हैं। जिस-जिस चीज से वे भयभीत थे...दो चीज से भयभीत रहे--कामिनी और कांचन। स्त्री और धन। दो चीज से बहुत पीड़ित रहे, क्योंकि दोनों ही चीजों को छोड़ कर महात्मा हुए थे। दोनों से भागे थे। और जिसे तुम छोड़ कर भागोगे, उसकी आकांक्षा भीतर रह जाएगी। असल में, दमन से आकांक्षा प्रबल होती है, कम नहीं होती। जितना दबाओगे उतनी आकांक्षा प्रबल होगी। किसी चीज को दबा कर देखो। जिस चीज को दबाओगे, उसी की आकांक्षा प्रबल हो जाएगी। जिस चीज का निषेध किया जाएगा, उसी में उत्सुकता जगेगी। किसी दरवाजे पर लिख दो कि यहां झांकना मना है, फिर वहां से निकल जाए कोई त्यागी-व्रती, बिना झांके! बहुत मुश्किल है। निकल भी जाए अगर कोई लाज-संकोच में कि कोई देख न रहा हो, तो फिर आएगा, रात के अंधेरे में आएगा। ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर आएगा कि अब तो देख लूं, इस वक्त कोई भी नहीं होगा, सड़क भी खाली होगी, पता नहीं मामला क्या है! जहां लिखा है यहां झांकना मना है, वहां जरूर कुछ होना चाहिए, नहीं तो झांकना मना क्यों है? चाहे वहां कुछ भी न हो। और अगर हिम्मत न जुटा सका आने की, तो सपने में आएगा। सपने में देखेगा उसी दरवाजे को, जहां झांकना मना है। सपने में झांकेगा।
जिस चीज का निषेध किया जाता है, उसमें रस बढ़ जाता है, क्योंकि निषेध से जिज्ञासा जगती है, जो कि बिलकुल स्वाभाविक नियम है। अगर किसी अखबार में किसी विज्ञापन के ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा हो कृपया इस विज्ञापन को न पढ़िए फिर तुम सारे विज्ञापन छोड़ कर उसको जरूर पढ़ोगे, पढ़ना ही पड़ेगा।
या कभी तुमने देखा हो, तुम्हारा एक दांत टूट गया। जीभ वहीं-वहीं जाती है। तुम कई बार समझाते भी हो अपनी जीभ को कि अरे मालूम है कि दांत टूट गया, बार-बार वहां जाने की क्या जरूरत है? मगर चौबीस घंटे, जब देखो तब चली जीभ वहीं देखने, कि क्या स्थिति है! वह जो खाली जगह है, वह जिज्ञासा जगाती है। जिंदगी भर दांत था, जीभी कभी न गई; आज दांत नहीं है, जीभ जाती है। और तुम रोको जीभ को, जितना रोकोगे उतना जाएगी; जितना रोकोगे उतनी ही तीव्र उत्तेजना उठेगी, आकर्षण जगेगा, रस पैदा होगा।
महात्मागण भाग गए थे दो चीजों से--कामिनी और कांचन से। दोनों को गाली देते रहे। ये गालियां इस बात का सबूत हैं कि उनके मन में अभी भी आसक्ति गहन थी; साधारण रूप से ही नहीं थी, बहुत गहन थी, बहुत रुग्ण हो गई थी, घाव बन गए थे। और स्वभावतः उनको बेचारों को डर लग रहा था कि यही स्त्री नरक ले जाएगी। यह स्त्रियों के संबंध में नहीं कह रहे हैं वे, अगर उनकी बात ठीक से समझो। उनके भीतर जो स्त्री के प्रति रस उमग रहा है, उसके लिए। वह जो भीतर स्त्री की प्रतिमा को सम्हाले हुए हैं, वह सुंदर से सुंदर तर होती जा रही है; जितनी दूर भागे हैं उतनी सुंदर होती चली गई है। असली स्त्री इतनी सुंदर होती ही नहीं, न असली, पुरुष इतना सुंदर होता है। कल्पना! कल्पना की स्त्री का कहना ही क्या, कल्पना के पुरुष का कहना ही क्या?
तो ये महात्मा गाली देते रहे स्त्रियों को और लोगों को समझाते रहे कि छोड़ो, भागो संसार! और संसार से मतलब क्या था? पत्नी, बच्चे, परिवार। और इन भगोड़ों को सम्मान दिया जाता रहा, आदर दिया जाता रहा। ये अपराधी थे, क्योंकि इनकी पत्नियों पर क्या गुजरी इसकी कोई कथा नहीं कहता; इनके बच्चों पर क्या गुजरी, इसका कोई हिसाब नहीं रखा गया। लाखों लोग संन्यासी हुई हैं सदियों में। अभी भारत में पचास लाख हिंदू संन्यासी हैं। सदियों-सदियों में तो करोड़ों हुए होंगे। करोड़ों परिवार बरबाद हुए होंगे। इनकी स्त्रियों ने भीख मांगी, या इनकी स्त्रियां वेश्याएं हो गईं, या इनकी स्त्रियों को आत्महत्या कर लेनी पड़ी, क्या हुआ इनकी स्त्रियों का, क्या गुजरी इनकी स्त्रियों पर! इनके बच्चों की क्या हालत हुई! पढ़ पाए, लिख पाए, या भिखमंगे हो गए; या चोर डाकू, बदमाश, लुच्चे हो गए?
स्वभावतः स्त्रियों के मन में पुराने संन्यास के प्रति भय है। वे कहें या न कहें, पुराने धर्म के प्रति स्त्री के मन में भय है, जो कि बिलकुल स्वाभाविक है। पुराने धर्म में स्त्री के लिए किया ही क्या है सिवाय अपमान के? पुराने धर्म ने स्त्री के लिए नरक पैदा कर दिया इस पृथ्वी पर।
और बड़े मजे की बात है कि जो लोग स्त्रियों की निंदा किए हैं जिन कारणों से, उन्होंने कभी भी विचार नहीं किया कि वे कारण तुम पर भी लागू हैं। स्त्री मल-मूत्र का ढेर है। और महात्मा जो लिख रहे हैं यह, वे जैसे सोने-चांदी का ढेर हैं! स्त्री के शरीर में है ही क्या--मांस-मज्जा, मल-मूत्र, कफ-चित्त--उसका खूब वर्णन किया है! जैसे ये सज्जन, जो वर्णन कर रहे हैं, इनके शरीर में कुछ और है! और मजा यह है कि स्त्री के शरीर से ही ये भी पैदा हुए हैं। नौ महीने उसी मल-मूत्र, मांस-मज्जा, कफ-पित्त, उसी से बने हैं, उसी से जन्मे हैं। वही इनके रग-रग रेशे-रेशे में है। लेकिन स्त्रियों को गालियां दे रहे हैं। गाली दे रहे हैं भय के कारण। इतने डरे हुए हैं कि गाली दे-दे कर अपने को रोक रहे हैं। ये तुमको नहीं समझा रहे हैं कि स्त्री मल-मूत्र है, ये अपने को ही समझा रहे हैं कि स्त्री मल-मूत्र है! क्या पड़े हो? क्यों स्त्री-स्त्री की सोचते हो? स्त्री में कुछ भी नहीं है! चूंकि सारे धर्मशास्त्र पुरुषों ने लिखे, स्त्रियां तो लिखतीं कैसे! धर्मशास्त्र पढ़ने तक का अधिकार नहीं था, तो लिखने का अधिकार तो सवाल ही नहीं उठता। सारे धर्मशास्त्र पुरुषों ने लिखे, इसलिए एकतरफा हैं। इसलिए पुरुषों का वक्तव्य है और स्त्रियों की तो कोई पूछ ही नहीं थी। उनका कोई हिसाब ही नहीं था, उनकी कोई गणना नहीं थी। स्त्रियों को हमने कभी मनुष्यता का अधिकार भी नहीं दिया था। तथाकथित धार्मिक लोग इतना भी न कर सके कि स्त्रियों को समान मनुष्यता का हक दे देते। स्त्री को कहते थे: स्त्री-धन। उसकी कीमत वस्तुओं से ज्यादा नहीं है। इसलिए स्त्री बाजारों में बिकती थी।
जिस रामराज्य का तुम गुणगान करते हुए नहीं अघाते हो, उस रामराज्य में स्त्रियां बाजारों में बिकती थीं। वह खाक रामराज्य था! जैसे पशु बिकते हैं बाजारों में, वैसी स्त्रियां बिकती थीं। और साधारण लोग ही स्त्रियां खरीदते थे, ऐसा नहीं; ऋषि-मुनि भी खरीदते थे।
उपनिषदों में कथा है, एक ऋषि की...गाड़ीवान रैक्व, वे गाड़ी में ही चलते थे, इसलिए गाड़ीवान रैक्व उनका नाम हो गया। वे गए हैं एक बाजार में एक स्त्री खरीदने। एक सुंदर स्त्री पर उन्होंने दाम लगाया। बोली लगती थी, नीलामी होती थी। लेकिन सम्राट भी लेने आया था। वह स्त्री उसे भी जंच गई। अब सम्राट के साथ बोली लगी है रैक्व की, तो रैक्व माना कि उसके पास भी धन था...। ऋषि-मुनियों के पास काफी धन था, क्योंकि लोग धन चढ़ाते थे। धन को गाली देते थे वे और लोग धन चढ़ाते थे। लेकिन सम्राट से तो नहीं जीत हो सकती थी। सम्राट बाजी मार ले गया। सुंदर स्त्री को अपने रथ में उठा कर वह महल चला गया। लेकिन रैक्व को बहुत क्रोध आया। ऋषि-मुनि क्रोधी भी बहुत थे। कोई दुर्वासा अकेले ही नहीं हैं, वे तो केवल प्रतीक हैं, उन सब में दुर्वासा छाए हुए थे।
जो व्यक्ति भी काम का दमन करेगा वह क्रोधी हो जाएगा, क्योंकि दमित ऊर्जा काम की क्रोध बनती है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है। जो व्यक्ति काम का दमन करेगा वह लोभी हो जाएगा, क्योंकि काम की ऊर्जा कहीं से तो प्रकट होती। तुम झरने को एक तरफ से बंद कर दोगे तो वह दूसरी तरफ से रास्ता खोजेगा; कहीं और से बहेगा, लेकिन बहेगा तो। तुम बंद करते जाओगे, वह नई-नई जगह खोजता जाएगा, नये रास्ते खोजता जाएगा। पहले शायद एक धार में बहता था, अब अनेक धाराओं में बहेगा, सहस्र-धारा हो जाएगा।
रैक्व बहुत क्रुद्ध था। अवसर की प्रतीक्षा करता रहा। फिर सम्राट को बुढ़ापा पकड़ा, उस परलोक में भी इंतजाम करने की आकांक्षा जगी। लोगों ने कहा कि ऋषि तो रैक्व है, उसे ही ज्ञान लो। वह बहुत धन ले कर, रथों में सोना-चांदी, जवाहरात भर कर ऋषि रैक्व के चरणों में गया। उसने सोना-चांदी, हीरे जवाहरात रखे। रैक्व बैठा रहा। चरणों में वह झुका, रैक्व नहीं बोला, बैठा रहा। सम्राट ने पूछा कि आप कुछ कहते नहीं, आशीर्वाद दें! आपका आशीर्वाद लेने आया हूं!
रैक्व ने कहा, अरे शूद्र! धन-संपत्ति से आशीर्वाद नहीं मिलेगा। इस घटना को हिंदू महात्मा उल्लेख करते हैं जगह-जगह कि रैक्व ने क्या गजब की बात कही। विनोबा भावे भी इसका उल्लेख करते हैं कि क्या गजब की बात कही! शूद्र कहा सम्राट को--इसीलिए शूद्र कहा कि वह धन लेकर आया था। कहा कि अरे शूद्र, धन इत्यादि से आशीर्वाद नहीं मिलेगा। यहां धन की कोई गति नहीं है।
लेकिन पूरी कहानी इनमें से कोई भी नहीं कहता। पूरी कहानी यह है कि तब वजीरों ने सम्राट को कहा कि महाराज, रैक्व को वह स्त्री चाहिए। इसलिए वह नाराज हैं, वे शूद्र कह रहे हैं। फिर सम्राट स्त्री को लेकर आया, तब रैक्व ने आशीर्वाद दिया और ब्रह्मज्ञान दिया। इतने हिस्से को कोई नहीं कहता। इस हिस्से को मैं कहता हूं तो मुझ हूं पर मुकदमे अदालत में, कि मैंने धार्मिक भावना को चोट पहुंचा दी। मगर मैं क्या करूं, यह कहानी का हिस्सा है। यह तुम्हारे शास्त्रों में लिखा हुआ है कि जब स्त्री को लेकर आया और स्त्री चरणों में रखी और कहा कि मुझे क्षमा करें, मुझसे भूल हो गई, अब तो ब्रह्मज्ञान दें। तब उन्होंने ब्रह्मज्ञान दिया। गजब के ब्रह्मज्ञानी थे! फिर नहीं कहा शूद्र। अब दिल पसंद चीज ही ले आया!
...मगर स्त्रियों को गाली देते रहेंगे। और इन स्त्रियों को, मालूम है तुम्हें, ऋषियों की एक तो पत्नी होती थी वैदिक काल में और अनेक वधुएं होती थीं। आजकल हम वधू का ठीक उपयोग नहीं करते। नवविवाहित स्त्री को हम कहते हैं नववधू। उचित नहीं है वह प्रयोग, क्योंकि पुराने समय में वधू का अर्थ होता था: खरीदी गई स्त्री, नंबर दो की स्त्री। पत्नी की तरह ही उससे तुम व्यवहार कर सकते हो; वह तुम्हारी पत्नी ही है, मगर है गुलाम। तो पत्नी एक होती थी, वधुएं अनेक होती थीं। तो ऋषि के पास एक तो पत्नी होती थी और अनेक वधुएं होती थीं। जितनी ज्यादा वधुएं होती थीं, उतना ही बड़ा ऋषि समझा जाता था।
सम्राट वधुएं भेंट करते थे, धनपति वधुएं भेंट करते थे। और यही ऋषि-मुनि गालियां दिए जा रहे हैं! ये ऋषि-मुनि गालियां दिए जा रहे हैं और जिन देवताओं की ये पूजा करते हैं, वही देवता, कहानियां कहती हैं कि ऋषि-मुनि ब्रह्ममुहूर्त में चले जाते हैं स्नान करने गंगा मैया में और देवतागण आकर उनकी स्त्रियों का संभोग कर जाते हैं। गजब के देवता थे! जब मैं ये कहानियां पढ़ा, तब मैंने समझा कि क्या ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने का इतना महत्व है! नहीं तो ऋषि-मुनि जाएं ही नहीं कहीं, बैठे हैं अड्डा जमाए, धूनी लगाए वहीं, तो देवी-देवताओं को फिर मौका कब मिले! तो ऋषि-मुनियों को भेज दिया गंगा-स्नान करने, तब तक चंद्रमा इंद्र इत्यादि-इत्यादि देवता ऋषि-मुनि का वेश बना कर आ गए, द्वार खटखटाया, पत्नी को धोखा दे दिया कि वे उसके पति हैं, फिर संभोग कर गए।
देवता तुम्हारे, ऋषि-मुनि तुम्हारे, गालियां भी चल रही हैं! यह सब भी चल रहा है। इस सारे पागलपन को गौर से देखो, तो तुम एक बात से निश्चित हो जाओगे कि स्त्रियों के साथ दर्ुव्यवहार हुआ है।
इसलिए जयपाल, तुम्हारी पत्नी अगर मेरे संन्यास को श्रद्धापूर्वक लेती है तो बुद्धिमान है। कोई भी बुद्धिमान स्त्री मेरे संन्यास को श्रद्धापूर्वक लेगी। और पुराने संन्यास के खिलाफ प्रत्येक स्त्री को होना चाहिए। स्त्रियों को पुराने संन्यासियों के चरणों में सिर झुकाना बंद करना चाहिए। यह अपमानजनक है। यह बात ही गलत है। यही साधु समझाते फिर रहे हैं, स्त्रियों को गालियां देते फिर रहे हैं। और मजा यह है कि इन्हीं स्त्रियों के सहारे तुम्हारे साधु जीते हैं! करीब-करीब निन्यानबे प्रतिशत तुम्हारे साधु तुम्हारी स्त्रियों के कारण जीते हैं। वही इनकी सेवा करती हैं, वही भोजन बनाती हैं, वही इनके लिए वस्त्र लाती हैं। मंदिरों में भी स्त्रियों की भीड़...और कुछ गुंडे पहुंच जाते हैं, जो स्त्रियों को धक्का वगैरह देने के लिए जाते हैं। और कुछ पति पहुंच जाते हैं जो अपनी पत्नी की रक्षा के लिए, कि कुछ गड़बड़ न हो। बाकी अगर स्त्रियां न जाए तो पुरुषों का पता ही न चले, स्वामी जी अकेले बैठे रहें।
स्त्रियां अदभुत रूप से सरलता का प्रमाण दी हैं। इतने अपमान, इतने गाली-गलौज के बाद भी इन्हीं मूढ़ों को सम्मान देती चली जाती हैं, इन्हीं के चरणों में सिर झुकाए चली जाती हैं। उनको सिखाया गया है। उन्होंने भी मान लिया है अपने को कि हम गर्हित हैं।
जैन शास्त्र कहते हैं कि स्त्री-पर्याय से मोक्ष नहीं है। कोई स्त्री रह कर मुक्त नहीं हो सकता। पहले तो पुरुष होना ही पड़ेगा। स्त्रियों को तो एक बार जन्म लेना ही पड़ेगा, पुरुष होकर ही मोक्ष हो सकता है। मोक्ष में सिर्फ पुरुषों का ही प्रवेश है।
क्यों? पुरुष के पास ऐसी क्या खूबी है, जिसकी वजह से मोक्ष में पुरुषों को प्रवेश है? दुनिया भर के उपद्रव पुरुषों ने किए हैं। स्त्रियां न कोई युद्ध करती हैं, न कोई युद्ध करवाती हैं, न कोई एटम बम हाइड्रोजन बम बनाती हैं। बहुत गुस्सा आ गया तो बेलन उठा लिया, इससे ज्यादा कुछ...ऐसा कोई भारी नुकसान स्त्रियों ने किया नहीं, कोई महापाप किया नहीं। पुरुषों को मोक्ष मिल सकता है, स्त्रियों को नहीं। स्त्री होने में ही भूल है उनकी। और स्त्रियों ने भी मान लिया है, क्योंकि समझाने वाले पुरुष हैं, पंडित पुरुष हैं, महात्मा पुरुष हैं। साधु-संन्यासी पुरुष हैं, सभी पुरुष हैं समझाने वाले। बचपन से ही यह बात सिखाई जा रही है, समझाई जा रही है। मस्तिष्क में उनके बिठा दी गई है। यह बात तोड़ने जैसी है। यह बात बिलकुल तोड़ देने जैसी है।
अगर स्त्रियों को हम महात्माओं के चक्कर से छुड़ा लें तो महात्माओं का चक्कर ही समाप्त हो जाए, क्योंकि महात्मा जीते ही निन्यानबे प्रतिशत स्त्री के कारण हैं। स्त्री को ही सता रहे हैं, स्त्री के ही आधा पर जी रहे हैं। खूब खेल है!
जयपाल, अगर मेरे संन्यास को तुम्हारी स्त्री ने, तुम्हारी पत्नी ने सहजता से लिया और पुराने संन्यास से डरती थी, पुराने व्रत-नियम इत्यादि से डरती थी--स्वाभाविक है। असल में, पुराने ढंग से कोई आदमी घर में धार्मिक हो जाए, उपद्रव हो जाता है। एक आदमी धार्मिक हो जाए, पूरा घर नरक हो जाता है। जिनके घर में धार्मिक आदमी होंगी, उनको यह बात पता होगी: एक आदमी धार्मिक हो जाए...तो अभी वे पूजा कर रहे हैं, कोई बोले नहीं, आवाज न करे, रेडियो मत चलाओ, बच्चे खेल नहीं सकते। घर में सन्नाटा रहना चाहिए, शांति रहनी चाहिए, उनके ध्यान में बाधा पड़ जाएगी।
यह कोई ध्यान है जिसमें बाधा पड़ जाए? ध्यान का अर्थ ही यह होता है कि सारी बाधाओं के प्रति जागरूकता। क्या सारी दुनिया को बंद करोगे तब तुम्हारा ध्यान होगा? तो राह चलेगी, सड़क चलेगी, ट्रैफिक चलेगा, बसें निकलेंगी, हवाई जहाज उड़ेंगे, इनका क्या करोगे? ट्रेन भी गुजरेगी, इनका क्या करोगे? कुत्ते भौंकेंगे, इनका क्या करोगे? अगर बाधाओं से तुम्हारा ध्यान टूटता है तो ध्यान कभी लगने वाला नहीं है, क्योंकि बाधाएं ही बाधाएं हैं सब तरफ।
और तुम सोचते हो जंगल में जाकर बैठ जाओगे तो वहां बाधा नहीं होगी? इस भ्रांति में मत रहना। कभी जरा एकाध दफा अकेले जंगल में जाकर बैठ कर देखो। घर में इससे ज्यादा शांति थी, कम से कम डर तो नहीं था। बीच-बीच में आंख खोल कर देखोगे कि कोई जंगली जानवर वगैरह तो नहीं है। और कोई सिंह दहाड़ देगा फिर? उससे थोड़े ही कह सकोगे कि चुप रहो! सिंह तुम्हारी कोई पत्नी नहीं है। और एक कौआ तुम्हारे ऊपर बीट कर जाएगा, फिर क्या करोगे? और कौओं को कोई हिसाब थोड़े ही है कि कौन महात्मा है, कौन गैर-महात्मा है। कौए तो कौए ठहरे। नासमझ! अज्ञानी जनम के! न शास्त्र पढ़े, न संस्कृत जाने। वे देखेंगे ही नहीं कि तुम बिलकुल बैठे हो सिर घोंट कर, माला लिए हाथ में। उन्हें फिक्र ही नहीं पड़ी। वे तो घुटा हुआ सिर देख कर और भी प्रसन्न हो जाएंगे, कि वाह रे वाह, कैसा सुंदर स्थान मिला! तुम जंगल में जाकर बैठ कर तो देखो। तब तुम्हें पता चलेगा, इससे घर ही बेहतर था।
तो बाधाएं तो सब जगह रहेंगी। लेकिन धार्मिक आदमी बड़ी दिक्कत खड़ी कर देता है। अभी वे रामायण पढ़ रहे हैं, अभी वे गीता पढ़ रहे हैं! और गीता कम पढ़ रहे हैं, नजर इस पर रखे हैं वे कि दुकान चल रही है कि नहीं चल रही? मैं जानता हूं ऐसे लोगों को कि माला फेर रहे हैं, दुकान पर बैठे, और नजर डाल रहे हैं और इशारा कर देते हैं हाथ से नौकर को कि वह कुत्ता जा रहा है, भगाओ। माला चल रही है! ग्राहक आ गया, इशारा कर देते हैं कि सम्हालो। माला चलती जाती है। लोग थैलियां बना लेते हैं, उसमें माला रखे रहते हैं, ताकि किसी को दिखाई न पड? और उसके अंदर ही अंदर माला सरकाते रहते हैं। अब पता नहीं सरकाते भी हैं कि नहीं, क्योंकि वह थैली की वजह से...! थैली का फायदा है, कभी न भी सरकाई तो किसी को पता नहीं है, चल रहा है, सरक ही रही होगी। लोग राम-राम राम-राम जपते रहते हैं।
तुम्हारी पत्नी अगर, जयपाल, डरती थी तुम्हारे व्रत-नियम से तो स्वाभाविक है।
एक महिला मेरे पास आई। उसने कहा कि मेरे पति को समझाए; वे आपकी ही सुनें तो सुनें, और किसी की वह सुनने वाले नहीं हैं। मैं भी जानता था कि यह बात सच है। पति--सरदार! मुझे भी शक था कि वे मेरी भी सुनेंगे कि नहीं। और धार्मिक! पत्नी ने कहा कि जान लिए ले रहे हैं। दो बजे रात से उठ आते हैं और जपुजी का पाठ! दो बजे रात! बच्चे हैं, सोएं कि न सोएं? और इस जोर से करते हैं! आप तो मानते ही हो--वह कहने लगी--कि मेरे सरदारजी उनकी आवाज बुलंद है! मुहल्ले भर के लोग परेशान हैं, और मेरी जान खाते हैं मुहल्ले के लोग, कि भई इनको रोको! इनको रोको कैसे? वे कहते हैं कि धर्म में बाधा डालोगी ठीक नहीं होगी।
मैंने उनके पति को बुलाया। वे मेरे पास आते थे कभी-कभी। मिलिट्री में मेजर थे, बड़े पद पर थे। मैंने पूछा कि मामला क्या है? कहने लगे, कुछ बात नहीं, ब्रह्ममुहूर्त में उठता हूं।
ब्रह्ममुहूर्त! तुम्हारी पत्नी तो कहती थी, दो बजे। वे कहने लगे कि हां दो बजे। दो ही बजे तो ब्रह्ममुहूर्त होता है।
मैंने कहा कि तुम होश की बातें कर रहे हो--दो बजे ब्रह्ममुहूर्त! उन्होंने कहा, हां, मैं तो अंग्रेजी महीने में मानता हूं, अंग्रेजी दिन में मानता हूं। बारह बजे दिन बदल जाता है। बारह बजे रात सुबह हो गई, दूसरी तारीख शुरू हो गई। सो दो बजे दूसरे दिन की सुबह है।
मैंने कहा, बात तो सरदारजी, बड़े पते की कर रहे हो! मगर मुहल्ले वालों का भी कुछ खयाल रखो।
उन्होंने कहा कि आवाज मेरी बुलंद है और इसमें हर्जा क्या है, उन सबको लाभ मिलता है धर्म का! धर्म-लाभ! धर्म-लाभ तो लोग करवाते ही हैं, लाउडस्पीकर लगवा देते हैं, मुहल्ले भर को धर्म-लाभ करवा देते हैं। चौबीस घंटे अखंड कीर्तन! कीरंतन कहना चाहिए--मगर उसको कहते हैं कीर्तन। अखंड कीर्तन मचा देते हैं। जब चाहे तब लगवा दिया लाउडस्पीकर। न बच्चे पढ़ सकते हैं, न कोई दूसरा काम कर सकता है। और चौबीस घंटे। और कोई रोक भी नहीं सकता, क्योंकि धार्मिक कार्य में रोको...और इस देश में, तो बहुत मुश्किल हो जाए। धर्म में तो किस के बाधा डाल ही नहीं सकते। और अखंड कीर्तन हो रहा है, इसमें तो प्रसन्न होना चाहिए कि घर बैठे-ठाले तुम्हें भगवान का नाम सुनाई पड़ रहा है।
तो उन्होंने कहा कि मैं जपुजी जोर से पढ़ता हूं, बच्चों को भी सुनाई पड़ता है, पत्नी को भी, मुहल्ले वालों को भी लाभ हो जाता है। उनकी धारणा यह है। व्रत-नियम करने वाले लोग इस तरह की बातें करते हैं कि किस-किस को सता रहे हैं उनको पता नहीं है; कौन-कौन परेशान हो रहा है, उनको पता नहीं। उनका व्रत-नियम पूरा हो रहा है। और वे तो इस आशा से भी करते हैं कि दूसरों को भी लाभ हो रहा है, अनायास लाभ मिल रहा है। पुण्य-कार्य में जितना बंटाओ उतना अच्छा।
एक महिला एक दूसरी महिला से कह रही थी कि मेरे पति बड़े असाधारण व्यक्ति थे, बड़े अद्वितीय पुरुष थे, बड़े धार्मिक व्यक्ति थे; लेकिन स्वर्गवासी हो गए। उस महिला ने पूछा कि उनकी क्या खूबी थी, क्या असाधारणता थी? तो पत्नी ने कहा कि सिर्फ दो घंटे सोते थे। निद्रा पर तो उन्होंने विजय पा ली थी और शेष बाईस घंटे सतत रामधुन में लगे रहते थे--बस राम-राम राम-राम राम-राम। ऐसा धार्मिक व्यक्ति मैंने देखा ही नहीं। बड़े पुण्यों से मेरा, उनका मिलना हुआ था।
उस महिला ने पूछा कि ऐसे महापुरुष इतनी जल्दी चल कैसे बसे, उनकी मृत्यु कैसे हो गई? तो पत्नी ने कहा, यह न पूछो तो अच्छा। मैंने उनकी गर्दन दबा दी।
बाईस घंटे कोई राम-राम राम-राम करता रहेगा...
तो जयपाल अच्छा हुआ कि तुम नये संन्यास में प्रविष्ट हो गए, नहीं तो पत्नी तुम्हारी गर्दन दबाती। तुम्हारे व्रत नियम...पता नहीं कौन सा उपद्रव करवा देते हैं?
धार्मिक व्यक्ति चिढ़ पैदा करते हैं लोगों में। धार्मिक व्यक्ति का व्यवहार ही पूरा का पूरा अभद्र हो जाता है। और धर्म की आड़ में कुछ भी अभद्रता करो, चलती है। कितने ही घंटे बजाओ, घंटियां बजाओ, कितना ही शोरगुल मचाओ--धर्म की आड़ में होना चाहिए, तो सब ठीक है। धर्म की आड़ में क्या-क्या नहीं चलता है! सब ठीक है। बस नाम धर्म का होना चाहिए, फिर कोई तुम्हें रोक नहीं सकता। जो रोके सो नास्तिक। जो रोके उसके सब खिलाफ हो जाएं। लोग उसको परेशान करने लगें कि तुमने धर्म में बाधा दी। कौन रोक सकता है किसी को। मुहर्रम हो तो मुसलमान हुल्लड़ मचाएं, वह धर्म के नाम पर ठीक है, रोको तो झगड़ा। होली हो, हिंदू हुल्लड़ मचाएं और देखते हो क्या-क्या हिंदू होली के नाम पर करते हैं! गालियां बकते हैं। नालियों का कीचड़ एक-दूसरे पर उछालते हैं। मगर सब चल रहा है। सब धर्म के नाम पर चलता है।
होलिका-दहन हुआ, उस दिन भक्त प्रहलाद बचे। भक्त प्रहलाद क्या बचे, यह कष्ट दे गए दुनिया को। न बचते तो बेहतर था, कम से कम यह होली का उपद्रव तो न होता। होलिका के साथ जल गए होते तो बेहतर था, बड़ी कृपा होती उनकी! मगर भक्त प्रहलाद बच गए। वे क्या बच गए, अब इन सबको गालियां देने को छोड़ गए, कि तुम बको गालियां। गालियां बकते है और कबीर का नाम लेते हैं! बेचारे कबीर का क्या कसूर? कबीर को क्यों घसीट रहे हो? गालियों में भी कबीर का नाम जोड़ दिया, तो उसमें भी थोड़ी धार्मिकता आ गई। गाली भी धार्मिक हो जाती है। कीचड़ उछाल रहे हैं एक-दूसरे पर। साल भर की दमित इच्छाएं, दमित वासनाएं, सब फूट कर बह पड़ती हैं। और नाम धर्म का है। और कोई कुछ कहे तो कहते हैं: होली है, बुरा न मानो। बुरा माना तो गलती बात है तुम्हारी।
मैं छोटा था तो होली है, बुरा न मानो, इसका तो जितना उपयोग कर सकता था करता था; मैंने इसका उपयोग दीवाली पर भी शुरू कर दिया, कि लोगों के पीछे जाकर पटाखा छोड़ देना और कोई नाराज हो तो उससे कहना: दीवाली है बुरा न मानो। मेरे गांव के एक सेठ थे, उन्होंने कहा, हद हो गई! हमने बहुत देखे जिंदगी हो गई, होली है बुरा न मानो यह सुना था, मगर दीवाली है बुरा न मानो यह नहीं सुना था। तेरी खोपड़ी में भी कहां-कहां की बातें आती हैं!
मैंने कहा, जब होली तक में बुरा नहीं मानते, तो यह तो दीवाली है, यह तो आनंद का उत्सव है, इसमें क्या बुरा मानना!
वे मुझसे परेशान थे ही। राम-भक्त थे, उन्होंने राम-मंदिर बनवाया हुआ है। और मैं जब भी उनके सामने से निकलता और दिन में कम से कम पचास दफे निकलता, कहीं भी जाना तो उनके सामने से निकलना ही पड़ता। तो उनको जयराम जी! एक दफा, दो दफा, तीन दफा...चौथी दफा उन्होंने मुझसे कहा कि देखो, अगर पांचवीं दफा तुमने जयराम जी की तो मुझे बुरा कोई भी नहीं होगा। मैंने कहा कि मैं तो यह सोच कर कि आप राम के भक्त है, राम का मंदिर बनाया, राम के गुणगान से प्रसन्न होंगे, आप तो नाराज हो रहे हैं!
उन्होंने कहा, मैं तुम्हें बताए दे रहा हूं। मैंने कहा, तो मैं भी आपको बताए दे रहा हूं कि मैं अकेला नहीं हूं, दो हजार विद्यार्थी हैं स्कूल के। दो हजार ही कल सुबह से कहेंगे--जयरामजी!
और दूसरे दिन सुबह से विद्यार्थियों ने शुरू कर दिया। मैंने अफवाह उड़ा दी स्कूल में कि वे जयरामजी से बड़े प्रसन्न होते हैं। दूसरे दिन ही उन्होंने मुझे बुलाया कि भैया, तुझे मिठाई लेनी है? बिस्कुट चाहिए? क्या चाहिए, बोल? मगर मेरा पिंड छुड़वा, क्योंकि ये दो हजार लड़के अगर दिन में जितनी दफा निकलें (स्कूल के रास्ते में ही उनका घर था) तो मैं तो मारा गया! तू कहे तो मैं राम को बिलकुल छोड़ने को राजी हूं।
भूल गए वह चौकड़ी, राम-राम जपने की...बहुत मैंने कहा कि आप राम-राम जपते थे। मैंने कहा कि देखूं भी तो कि राम से लगाव कितना है, कि ऐसे ही बकवास मचा रखी है! जब मुझे देखते तो बिलकुल चुप बैठ जाते, फिर वे राम-राम नहीं जपते, बिलकुल चुप ही रहते। जब मैं निकल जाऊं उनके घर के सामने से तब वे फिर अपना राम-राम जपना शुरू करते।
धार्मिक नियम, व्रत, उपवास से तुम्हारी पत्नी घबड़ाती होगी और जानती होगी कि आज नहीं कल इसका अंतिम परिणाम तो यही होना है कि तुम घर छोड़ कर भाग जाओगे। तुम पत्नी को अकेला कर जाओगे। जीते जी, तुम जिंदा रहोगे और उसे विधवा कर जाओ। बच्चों को अनाथ कर जाओगे, तुम जिंदा रहोगे और अनाथ कर जाओगे। इससे भयभीत होती रही होगी। सोच-विचार वाली महिला होगी।
इसलिए मेरा संन्यास तो उसकी समझ में आया। मेरा संन्यास स्त्रियों को सुगमता से समझ में आएगा, बजाय पुरुषों के, क्योंकि मैं कह रहा हूं घर छोड़ना नहीं है, परिवार छोड़ना नहीं है। जीवन को नैसर्गिक बनाना है, स्वाभाविक बनाना है। जीवन को उदासीन नहीं करना है; आनंद-उत्सव बनाना है। जीवन पर जबरदस्ती व्रत-नियम नहीं थोपने हैं; प्रसादयुक्त बनाना है। सौंदर्य देना है जीवन को। जीवन को संवेदनहीन नहीं करना है; सृजनात्मकता देनी है। जीवन में काव्य हो, नृत्य हो, गीत हो। जीवन में प्रीति हो। तो किसी दिन प्रार्थना हो सकती है। जीवन में प्रेम ही अंततः प्रार्थना में परिवर्तित होता है और प्रार्थना एक दिन परमात्मा से जोड़ देती है।
मैं जीवन का सत्कार करता हूं। मेरे मन में जीवन और परमात्मा पर्यायवाची हैं। और कोई परमात्मा नहीं है--जीवन को छोड़कर। जीवन को अहोभाव से स्वीकार करो। और परमात्मा ने तुम्हें जहां, जैसा बनाया है, वहीं जीओ। और वहीं जीते-जीते शांत बनो, मौन बनो, शून्य बनो।
यह प्रश्न संसार को छोड़ने का नहीं है; प्रश्न अहंकार को छोड़ने का है। प्रश्न पत्नी को छोड़ने का नहीं है; प्रश्न पत्नी के प्रति मालकियत छोड़ने का है। इस भेद को समझो। पत्नी को छोड़ने का नहीं है, लेकिन पति होने की अकड़ छोड़ने का है, जरूर छोड़नी है। एक अकड़ छोड़ी है कि मैं पति हूं। पति का मतलब होता है: स्वामी, मालिक। तुम मालिक हो और पत्नी तुम्हारी संपदा है! यह तो अधार्मिक व्यक्ति का लक्षण हुआ। एक आत्मवान स्त्री को संपदा मानना, वस्तु मानना...
अभी भी हम इस तरह के बेहूदे शब्दों का उपयोग करते हैं। बाप जब बेटी का विवाह करता है तो कहता है: कन्यादान। दान वस्तुओं का किया जाता है, व्यक्तियों का नहीं। कन्यादान--यह बात तो अभद्र है! प्रत्येक स्त्री को इसका विरोध करना चाहिए। दान! इसका तो मतलब यह हुआ कि स्त्री में कोई आत्मा नहीं है--वह कोई कुर्सी है, फर्नीचर है, सामान है।
और हम स्त्री-धन शब्द का अभी भी उपयोग करते हैं। चीन में तो सदियों तक अगर पति अपनी पत्नी को मार डालता था तो उस पर अदालत में मुकदमा नहीं चल सकता था, क्योंकि पत्नी में आत्मा मानी ही नहीं जाती थी। कोई अपनी कुर्सी तोड़ डाले, इस पर क्या कोई अदालत में मुकदमा चलाओगे? कुर्सी अपनी, हमने तोड़ दी, इसमें कौन को बाधा हो सकती है, किसको बाधा हो सकती है!
और अब भी ऐसे कबीले हैं हिमालय में, अगर उनके घर कोई मेहमान हो तो वे अपनी पत्नी को रात के लिए दे देते हैं--मेहमान की सेवा के लिए। जैसे तुम घर की अच्छी से अच्छी चीज मेहमान के लिए दोगे, अच्छा भोजन बनाओगे, अच्छा बिस्तर लगाओगे, अच्छे कमरे में ठहराओगे--वैसे ही अपनी पत्नी भी रात भर के लिए मेहमान को दोगे। स्त्री की कोई आत्मा थोड़े ही है!
यह कहानी तो तुम जानते ही हो कि कैसे द्रौपदी के पांच पति थे। कहानी बेहूदी है, मगर शास्त्र बेहूदी कहानियों से भरे हैं। एक स्त्री के पांच पति! स्त्री को बांट लिया था। वस्तुएं बांटी जा सकती हैं। दिन बांट लिए थे कि आज एक पति है, कल दूसरा पति है, तीसरे दिन तीसरा पति है। पांचों में होड़ थी। पांचों भाई उसको चाहते थे; झगड़ा खड़ा न हो, इसलिए बांट लो।
स्त्री के प्रति हमारी धारणा क्या थी!? और इनको हम कहते हैं--ये धार्मिक व्यक्ति थे; इसमें युधिष्ठिर भी सम्मिलित हैं, जिनको हम धर्मराज कहते हैं। कम से कम भैया युधिष्ठिर को तो कह देना था कि मैं नहीं बांटूंगा, क्योंकि यह तो बड़ी अधार्मिक बात हो जाएगी। मगर यह बात ही नहीं थी; यह तो धर्म की बात ही थी। स्त्री में है ही क्या, बांट लो! बांट भी ली स्त्री और फिर युधिष्ठिर ने जुए में दांव पर भी लगा दी। दांव पर हम लगाते ही किस चीज को हैं? धन लगा सकते हैं दांव पर, किसी व्यक्ति को दांव पर लगा सकते हैं? स्त्री को दांव पर भी लगा दिया जुए में! हार भी गए।
तो फिर दुर्योधन का ही ऐसा क्या कसूर है अगर वह इस स्त्री के वस्त्र उतारने लगा। अगर कसूर इन पांच का बांटने में नहीं है, अगर कसूर युधिष्ठिर का दांव पर लगाने में नहीं है, तो दुर्योधन को ही ऐसा क्या कसूर दे रहे हो; अगर वस्तु है स्त्री और बांटी जा सकती है और जुए में दांव पर लगाई जा सकती है, तो जिसने जीती है उसकी मर्जी, जो चाहे करे। ऐसा कौन सा जघन्य पाप हो रहा है कि वस्त्र उतार रहा है। कुर्सी की खोल कोई बदलना चाहे, तो इसमें कोई झगड़ा है? लेकिन दुर्योधन को हम कहते हैं कि बुरा काम किया। और ये अब इसके पहले जो सब काम होते रहे वे शुभ कार्य हो रहे थे!
हम भी विश्लेषण करते नहीं और न कभी बुद्धिमत्तापूर्वक विचार करते हैं, न कभी हम परख से देखते हैं कि हमारी मान्यताएं क्या हैं। इसलिए स्त्री को छोड़ कर चले जाने में कोई अड़चन ही न थी।
मैं स्त्री और पुरुष के बीच क्रांति तो चाहता हूं, निश्चित चाहता हूं; लेकिन वह क्रांति इतनी ऊपरी नहीं होगी कि तुम स्त्री को छोड़ कर चले गए। वह क्रांति गहरी होनी चाहिए। तुम्हारा स्त्री के प्रति पति-भाव नहीं होना चाहिए, मालकियत का भाव नहीं होना चाहिए। वह संपदा नहीं है, आत्मा है। तुम्हारे जैसी ही। न तुम उसकी संपदा हो, न वह तुम्हारी संपदा है।
कोई किसी का मालिक नहीं है। मालिक तो बस एक परमात्मा है, बाकी कोई किसी का मालिक नहीं है। मालकियत की बात ही बेहूदी है, असंगत है, असभ्य है। और मालकियत में ही छोड़ना छिपा है। इस बात को खयाल रखना।
एक पुराने ढब के संन्यासी मुझे मिलने आए थे। उन्होंने कहा, मैंने अपनी स्त्री का त्याग कर दिया। मैंने कहा, वह तुम्हारी थी, जो तुमने त्याग कर दिया? त्याग तो उसका किया जा सकता है जो तुम्हारी हो। तुम कहां से लेकर आए थे उसे? कोई जन्म के साथ लेकर आए थे? तुम्हारा क्या था उसमें? वह अपनी थी, तुम अपने हो। त्याग कैसे कर दोगे? यह भ्रांति छोड़ो।
तीस साल हो गए उनको पत्नी को छोड़े, मगर यह भ्रांति अभी भी है कि मैंने त्याग कर दिया। अभी भी इस भ्रांति के भीतर पहली भ्रांति छिपी है कि वह मेरी थी। तुम हो कौन? पत्नी तुम्हारी नहीं है, न तुम पत्नी के हो।
स्त्री-पुरुष के बीच यह पति-पत्नी की मालकियत का संबंध जाना चाहिए। बच्चे भी तुम्हारे नहीं हैं, सब परमात्मा के हैं। तुम तो केवल उपकरण हो, माध्यम हो। तुम्हारे द्वारा आए हैं, तुम्हारे नहीं हैं। सम्मान करो उनका, सत्कार करो उनका। परमात्मा की भेंट हैं। उनके भीतर भी परमात्मा को देखो। परमात्मा को छोड़ कर तो कोई नहीं भागता। अगर पत्नी में परमात्मा दिखाई पड़ने लगे, अपने बच्चों में परमात्मा दिखाई पड़ने लगे, तो मैं कहूंगा कि तुम संन्यासी हो।
लेकिन बड़े मजे की बात है पुरुषों ने शास्त्र लिखे, जिनमें समझाया है कि स्त्री पति में परमात्मा को देखे। लेकिन इनमें से एक ने भी यह नहीं लिखा कि पुरुष स्त्री में परमात्मा को देखे। यह बेईमानी देखते हो! और इनको तुम महात्मा कहे चले जाते हो! कब तक अंधापन जारी रहेगा? ये दोहरे मापदंड।
अगर पुरुष में कहते हो कि स्त्री परमात्मा को देखे तो दूसरी बात भी कह देनी चाहिए कि पुरुष भी स्त्री में परमात्मा को देखे। या तो दोनों देखें या दोनों न देखें, मगर समता खंडित नहीं होनी चाहिए।
मेरे नये संन्यास की नई ही प्रक्रिया है, नया ही सोचने का आयोजन है, नये ही मूल्य हैं। छोड़ना कुछ भी नहीं है, क्योंकि हमारा कुछ है ही नहीं, सब उसका है। न हम छोड़ने वाले हैं, न हम पकड़ने वाले हैं। तो फिर जहां हम हैं, जहां परमात्मा ने हमें जो भी अभिनय करने को दे दिया है, इस महानाटक में जो भी पात्र हमें बना दिया है, उसे हम पूरा करें, समग्रता से पूरा करें। उसे जी भर कर जीएं और यह जानते हुए जीएं कि नाटक है। इसलिए तादात्म्य न बन जाए।
तुम देखते हो रामलीला में सीता चोरी चली जाती है, तो राम चिल्लाते फिरते हैं जंगल-जंगल कि मेरी सीता कहां है। वृक्षों से पूछते हैं, मेरी सीता कहां है। असली राम को शायद पीड़ा भी हुई होगी, उनका तादात्म्य भी रहा होगा। लेकिन रामलीला में जो राम बनता है, वह भी आंसू बहाता है, वह भी चिल्लाता है: हे सीता, तू कहां है? वृक्षों पूछता है। लेकिन भीतर उसके कुछ नहीं है। सब बाहर-बाहर है। एक अभिनय कर रहा है। अभी परदा गिर जाएगा, बात खतम हो जाएगी। परदा गिरते ही से फिर पीछे बैठ कर वह चिल्लाता नहीं रहेगा कि हे सीता, तू कहां है!
कभी-कभी रामलीला होती हो तो पर्दे के पीछे जाकर भी देखना चाहिए, क्योंकि वहां असली चीज दिखाई पड़ती है। मेरे गांव में तो जब भी रामलीला होती थी, तो मैं बाहर से नहीं देखता था, भीतर से। रामलीला के जो मैनेजर थे वे मुझसे कहते थे कि रामलीला वहां बैठा कर देखो। मैं उनसे कहता कि मुझे तो यहीं बैठा रहने दो, मैं कुछ गड़बड़ नहीं करूंगा, सिर्फ देखता रहूंगा। वहां मैंने गजब की चीजें देखीं। राम-रावण में युद्ध हो रहा है, सीता चोरी चली गई हैं; और जब परदा गिरता है तो सीता मैया राम-रावण दोनों को चाय पिला रही हैं! बात खतम हो गई। पर्दा गिर गया, बात खतम हो गई।
ऐसे ही जीवन का एक दिन पर्दा गिर जाएगा, न कोई दोस्त है न कोई दुश्मन है, न कोई अपना है न कोई पराया है। जब तक पर्दा नहीं गिरा है तब तक इस खेल को खेल समझ कर खेले चलो।
एक अभिनेता ने मुझसे पूछा कि अभिनय की कला के संबंध में आपका क्या कहना है? तो मैंने उससे कहा, अभिनय की कला यही है कि जब अभिनय करो तो समझो कि यही जीवन है। और जीवन की कला यही है कि जब जीओ तो समझो कि यही अभिनय है। वही कुशल अभिनेता है, जो अभिनय करते वक्त ऐसा डूब जाए कि तुम्हें लगे कि यह उसका जीवन है; तुम भूल ही जाओ कि यह अभिनय है, तो ही वह कुशल है। और जीवन की कुशलता यह है कि तुम इस भांति जीओ कि सब अभिनय है।
मेरे देखे अभिनय की कला जो व्यक्ति करता रहा है, उसे मेरे संन्यास को समझने में जरा भी कठिनाई नहीं होगी। इसलिए अगर विनोद को मेरी बात समझ पड़ी है, खूब गहराई में समझ पड़ी है, तो उसका कारण है। मुझसे लोग आकर पूछते हैं कि इतने अभिनेता आप में क्यों उत्सुक होते हैं? तो मैंने कहा कि मेरे संन्यास की परिभाषा यही है: संसार को अभिनय समझो। और जो लोग अभिनय की दुनिया में हैं, उनको यह बात एकदम समझ में आ जाती है। यह बात एकदम समझ में आनी ही चाहिए कि अगर हम अभिनय कर सकते हैं जीवन मान कर, तो जीवन क्यों नहीं जी सकते अभिनय मान कर!
इसलिए जयपाल, तुम्हारी पत्नी को इसमें कोई अड़चन नहीं है, वह मस्त है, आह्लादित है। अच्छा हुआ, तुम पुराने ढंग के संन्यास से बच गए। एक दुर्घटना होतेऱ्होते बच गई। तुम सौभाग्यशाली हो!

आखिरी सवाल: भगवान,
कल आपने वह प्यारी लखनवी कहानी कही। उत्सुकता है जानने की कि फिर उन छह-छह इंच ऊंचे और साठ-साठ वर्ष बूढ़े दोनों भाइयों का आगे क्या हुआ?

दिनेश,
भैया, ऐसे कठिन सवाल नहीं पूछते। कहानी तो कहानी है। आगे जरूर कुछ हुआ, मगर तुम मुझे झंझट में डालोगे।
दोनों भाइयों का नाम रखा गया--चंगू-मंगू। चंगू-मंगू थे ही। साठ वर्ष तक जो इसी बात में उलझे रहे कि पहले आप, पहले आप। चंगू-मंगू ही थे। पहुंचे हुए उल्लू के पट्ठे थे! वैसे उनके बाप का नाम लल्लू था, सो अच्छा होगा कहें: लल्लू के पट्ठे थे!
फिर चंगू-मंगू दोनों ही जो साठ वर्ष तक सभ्यता का ऐसा पाठ सीखे हों, तो जरूर संसार में अपनी छाप तो छोड़ ही जाएंगे। दोनों भारत के प्रधानमंत्री हुए। चंगू बने चरणसिंह, मंगू बने मोरारजी देसाई। कहानी का अंत बड़ा दुखांत हुआ।
मगर ऐसे कठिन सवाल न पूछा करो। इसी तरह के सवालों से मैं झंझट में पड़ जाता हूं। मुझे उत्तर देना पड़ता है। अब चरणसिंह नाराज होंगे और मोरारजी नाराज होंगे। हालांकि उनकी नाराजगी से कुछ फर्क नहीं पड़ता; वे सत्ता में भी थे और नाराज थे तो क्या फर्क पड़ गया! अब तो बेचारे कहीं भी नहीं हैं। अब तो दया के पात्र हैं। अब तो फिर चंगू-मंगू हो गए। वह तो सत्ता में पहुंच जाएं चंगू, तो चौधरी चरणसिंह; सत्ता में पहुंच जाएं मंगू, तो मोरारजी भाई देसाई। सत्ता गई तो फिर चंगू के चंगू, मंगू के मंगू!

आज इतना ही।