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मंगलवार, 9 मई 2017

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06

मृत्युार्मा अमृत गमय-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 06 अगस्त सन् 1979
प्रवचन-छट्ठवां   

* अहोभाव, धन्यवाद--पश्चात्ताप नहीं
* निष्प्र्रश्न चेतना
* सदगुरु का जादू

प्रश्न-सार

*क्या प्रार्थना पश्चात्ताप ही नहीं है?

*जीवन के अर्थ को कहां खोजें? कैसे खोजें?

*आपने क्या कर दिया है? मैं ऐसा आनंदित तो कभी भी न था। शायद इसे ही लोग आपका सम्मोहन कहते हैं!

*पहला प्रश्न: भगवान! क्या प्रार्थना पश्चात्ताप ही नहीं है?

नरेश! प्रार्थना और पश्चात्ताप का कोई भी नाता नहीं; दूर का भी नाता नहीं। पश्चात्ताप अहंकार की ही प्रक्रिया है; अहंकार ही अपने को सजाने-संवारने में लगा है; जो भूलें-चूकें हुई हैं, उन्हें लीपने-पोतने का प्रयास कर रहा है। पश्चात्ताप अतीत-उन्मुख होता है, और प्रार्थना वर्तमान के क्षण में समग्ररूप से डूब जाने का नाम है। प्रार्थना का न तो कोई अतीत है, न कोई भविष्य। न तो पश्चात्ताप है प्रार्थना, और न कोई आयोजन। न तो मांग है प्रार्थना में--यह मिले, वह मिले; और न इस बात की स्वीकृति है कि मुझसे यह भूल हुई, वह भूल हुई। भूलों की याद, भूलों के लिए क्षमा-प्रार्थना--यह भी अहंकार है।

और भूलों की क्षमाऱ्याचना करके कौन भूलों से मुक्त हुआ है? जितनी क्षमाऱ्याचना करते हो, उतनी ही भूलों को दोहराते हो। सच तो यह है कि पश्चात्ताप भूलों को पुनः-पुनः करने की प्रक्रिया है। एक बार यह बात साफ हो गई कि प्रायश्चित्त से क्षमा मिल जाती है, तो फिर तो भूल करने में अड़चन क्या रही! गंगा-स्नान से अगर पाप धुल जाते हों, तो फिर जी भर कर पाप करो। फिर गंगा-स्नान कर आना! और अगर मंदिर में झुकने से, हाथ जोड़ने से, भगवान से प्रार्थना करने से--कि क्षमा करो मुझे; कि तुम पतित-पावन हो और मैं अधम प्राणी हूं--अगर क्षमा मिल जाती हो, तो फिर कल पाप करने की पुनः सुविधा हो गई। फिर डर क्या रहा! जहां क्षमा इतनी सस्ती है, वहां पाप करने में अड़चन कहां! अवरोध कहां!
इसलिए मैं तुमसे कहूंगा, नरेश, प्रार्थना पश्चात्ताप नहीं है और पश्चात्ताप प्रार्थना नहीं है। न ही प्रार्थना मांग है, न ही प्रार्थना में कोई आकांक्षा है।
लेकिन लोग दो ही तरह की प्रार्थनाएं जानते हैं: या तो की गई भूलों के लिए प्रायश्चित्त, क्षमाऱ्याचना, और आशा कि परमात्मा क्षमा करेगा, क्योंकि वह महाकरुणावान है, रहीम है, रहमान है। और या फिर मांग से भरी प्रार्थना, वासना से भरी प्रार्थना--यह मिले, वह मिले। या तो बीता कल महत्वपूर्ण, या आने वाला कल महत्वपूर्ण। और दोनों का कोई अस्तित्व नहीं! बीता--बीत गया; आया--अभी आया नहीं। प्रार्थना का संबंध है, जो है, उससे। इस क्षण से! अभी और यहां!
प्रार्थना तो सदा ही शुद्ध वर्तमान में सचेतन होने का नाम है। प्रार्थना अहोभाव है, पश्चात्ताप नहीं। प्रार्थना शिकायत नहीं है, धन्यवाद है।
लेकिन मंदिरों-मस्जिदों में, गिरजा-गुरुद्वारों में जो प्रार्थना चल रही है, वह ऐसी ही है। वह प्रार्थना नहीं है, प्रार्थना का धोखा है; झूठी वंचना है।
साधना के पथ पर क्यों डगमगाते पांव मेरे?
आज रह-रह कर कसकते क्यों हृदय के घाव मेरे?
आज प्राणों में प्रणय की मधुर-सी मनुहार क्यों है?
                  आज जीवन भार क्यों है?

कौन कहता है नई यह प्रेम की मेरी कहानी
आज की, कल की नहीं, यह बात युगऱ्युग की पुरानी
आज भी मानव-हृदय में एक विफल पुकार क्यों है?
                  आज जीवन भार क्यों है?

देख जड़ जग की विषमता जब निराशा घेर आती
कान में कहता हृदय, सुन व्यर्थ आह कभी न जाती
विजन-वन में फिर प्रकृति का हो रहा शृंगार क्यों है?
                              आज  जीवन  भार  क्यों  है?
आज जीवन भार इसलिए है कि हम कलों को ढो रहे हैं। जो बीत गए कल, उनका पहाड़ हमारी छाती पर सवार है। और जो आए नहीं कल, उनका पहाड़ भी हमारी छाती पर सवार है। इन दो पाटन के बीच आदमी पिसता है, मर जाता है; घसिटता है, रोता है, टूटता है, खंडित होता है। इन दो पाटों के बीच कोई भी साबित नहीं बच पाता। लेकिन इन दो पाटों के बीच भी एक स्थान है, मुक्ति का एक द्वार है। वह है--वर्तमान का छोटा सा क्षण!
यह हो रही वर्षा। यह बूंदाबांदी। यह छप्पर पर बूंदों की आवाज, यह सरगम। ये वृक्ष। ये वृक्षों से गूंजती हवाएं। यह सन्नाटा। इसके साथ तल्लीन हो जाने का नाम प्रार्थना है।
प्रार्थना करने के लिए हिंदू होना जरूरी नहीं है। सच तो यह है कि हिंदू अगर हो, तो प्रार्थना कैसे करोगे? मुसलमान होना जरूरी नहीं है। मुसलमान अगर हो, तो प्रार्थना कैसे करोगे? फिर तो तुम बंधे हुए क्रियाकांड दोहराओगे। हिंदू दोहराएगा गायत्री। मुसलमान पढ़ेगा आयतें। जैन पढ़ेगा नमोकार मंत्र। और प्रार्थना का सीखी-सिखाई बातों से कोई संबंध नहीं।
प्रार्थना तो सहज स्फूर्त है। तुम्हारे भीतर से एक आनंद की पुलक उठे और व्याप्त हो जाए लोक-लोकांत में, दिग-दिगांत में। तुम्हारे भीतर से एक आनंद-भाव उठे और तुम नृत्य कर उठो। परम धन्यता का बोध--कि इस विराट रहस्य में, अस्तित्व में, मैं भी हूं! मैं--जिसके होने की कोई भी जरूरत न थी। मैं--जिसके बिना जगत भलीभांति चलता। शायद ज्यादा भलीभांति चलता। मैं--जिसकी कोई पात्रता नहीं है। मैं भी हूं! इस अपूर्व अस्तित्व में मेरी भी जगह है! मैं धन्यभागी हूं। मैं कृतज्ञ हूं। ऐसी कृतज्ञता में जो झुक गया है, जैसे फलों से लद गई वृक्ष की शाखाएं झुक जाती हैं, ऐसे कृतज्ञता के फलों से जो लद गया है और जिसकी शाखाएं झुक गई हैं, फूलों के भार से जो झुक गया है--किसी बंधी-बंधाई, पिटी-पिटाई प्रार्थना के कारण नहीं, बल्कि अपनी निज की अनुभूति के कारण--तो उस झुकने में रसधार बहेगी। उस झुकने में परमात्मा से मिलन होगा। उस झुकने में प्यास बुझेगी।
प्रार्थना पश्चात्ताप नहीं है, स्वीकार भाव है--जो है, जैसा है, ठीक है। प्रार्थना परम संतोष है। औरों से ही नहीं, अपने से भी।
तुमसे बार-बार कहा गया है: दूसरों को क्षमा करो, अपने को नहीं। जिन्होंने तुमसे यह कहा है, उन्हें प्रार्थना का कुछ भी पता न होगा। क्योंकि जो अपने को क्षमा नहीं कर सकता, वह किसी को भी क्षमा नहीं कर सकता। जो अपने को ही क्षमा नहीं कर सकता, वह किसको क्षमा करेगा!
महात्मा गांधी ने बार-बार कहा है कि दूसरों के प्रति बहुत उदार; अपने प्रति कठोर रहो।
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, जो अपने प्रति कठोर है, वह किसी के प्रति उदार नहीं हो सकता। उसकी उदारता भी बड़ी कठोर होगी। उसकी सहिष्णुता भी बड़ी असहिष्णु होगी। धोखा होगा, दिखावा होगा। और धोखा और दिखावा ऐसा हो सकता है, ऐसा तर्कपूर्ण, ऐसा प्रामाणिक प्रतीत हो कि लगे सच है। लेकिन जो अपने प्रति कठोर है, उसके लिए असंभव है दूसरे के प्रति सदय होना। क्योंकि हम अपने निकटतम हैं, वहीं तो हम पाठ सीखते हैं जीवन के। प्रेम की कला वहीं सीखते हैं। जीवन के पहले राज, बारहखड़ी वहीं सीखी जाती है। क ख ग वहीं पढ़े जाते हैं।
मैं तुमसे कहता हूं, औरों के प्रति तो सदय होना ही, क्योंकि औरों के प्रति कठोर होने का तो तुम्हें कोई हक ही नहीं है। तुम हो कौन? तुम निर्णायक नहीं हो। तुम दूसरों के मालिक नहीं हो। तुम उनके कृत्यों के न्यायाधीश नहीं हो। वे बुरे हैं या भले, वे शुभ कर रहे या अशुभ, वे नैतिक हैं या अनैतिक--तुम कौन हो? तुम्हें किसने कहा कि तौलो? तुम्हें यह हक किसने दिया? यह अधिकार तुम्हारा नहीं।
जीसस ने कहा है: दूसरे की बुराई को भी बुराई मत कहना। दूसरे के पाप को भी पाप मत कहना। क्योंकि तुम दूसरे को जानते कहां हो! जैसे दूसरे के पैर में पहने गए जूते काटते हों अगर, तो वही जानता है कि जूते काटते हैं; तुम नहीं जान सकते।
दूसरों के जूते तक तुम नहीं जान सकते कि काटते हैं, तो दूसरों के प्राण, दूसरों का अस्तित्व, दूसरों का व्यक्तित्व--उसमें तो तुम प्रविष्ट नहीं हो सकते। अपने में ही प्रवेश इतना कठिन है; दूसरे में प्रवेश तो असंभव है! तुम दूसरे को ऊपर-ऊपर से जानते हो। उसके भीतर की कथा, उसके भीतर की व्यथा, उस सबसे तो तुम अपरिचित हो। वह क्यों किसी कृत्य को किया है? कैसे उसके अचेतन से कोई कृत्य उठा है--बवंडर की तरह, तूफान की तरह? क्यों उठा है? किन-किन जन्मों का, कितनी लंबी यात्रा का उसमें हाथ है? तुम्हें कुछ पता है! जैसे कोई किसी कविता की एक पंक्ति को पढ़ कर पूरी कविता का अर्थ समझना चाहे, या जैसे कोई किसी उपन्यास के अधूरे फटे हुए पृष्ठ को पढ़ कर उपन्यास की पूरी कथा को समझना चाहे, वैसे ही तो हम लोगों को समझ रहे हैं। उनका पूरा जीवन हमारे सामने नहीं है। छोटे-छोटे अंश, जरा-जरा सी झलकें, बिजली की कौंध में दिखाई पड़ गईं। उन्हीं के आधार पर तुम निर्णय ले रहे हो? कृत्यों के आधार पर तुम कर्ता का निर्णय ले रहे हो? व्यवहार के आधार पर तुम आत्मा का निर्णय ले रहे हो?
नहीं; प्रार्थनापूर्ण व्यक्ति दूसरों के प्रति परम सदय होता है। और अपने प्रति भी। क्योंकि अपने को भी हम कहां जानते हैं? अपने से भी अभी हमारी मुलाकात कहां हुई? और क्या शुभ है, क्या अशुभ है--इसका भी निर्णय दूसरों ने कर दिया है। किस बात का पश्चात्ताप करोगे नरेश!
अगर जैन रात में पानी पी लेता है, तो पश्चात्ताप करता है। और तो कोई नहीं करता दुनिया में! जैन को लगता है पाप हो गया। क्योंकि संस्कार दिया गया है कि रात्रि पानी पीना पाप है। रात्रि भोजन करना पाप है। संस्कार अगर है, तो रात्रि भोजन करना पाप हो गया--अगर सिखावन दी गई है बचपन से, अगर तुम्हारे मन पर एक संस्कार डाला गया, खोदा गया।
लेकिन दुनिया में और किसी को तो अड़चन नहीं है रात्रि पानी पीने में या भोजन करने में। वे तो पश्चात्ताप नहीं करते। वे तो मंदिर में जाकर प्रार्थना नहीं करते कि हे प्रभु! क्षमा करो। रात मैंने भोजन कर लिया; कि रात मैंने पानी पी लिया। अब कभी ऐसा न होगा!
दुनिया में हजारों तरह के समाज हैं, सब के अलग-अलग संस्कार हैं। प्रत्येक अपने संस्कार को ही अपनी नीति-अनीति का निर्णायक मानता है। कौन सी बात नैतिक है? कौन सी बात अनैतिक है? ईसाइयों में एक संप्रदाय है क्वेकर; वे दूध पीने को पाप मानते हैं। अगर क्वेकर दूध पी ले, तो वह क्षमा मांगता है प्रार्थना में परमात्मा से कि हे प्रभु, हे परवरदिगार, हे परम कृपालु, मुझे क्षमा करना! मैंने दूध पी लिया! कि मैंने दूध मिली चाय पी ली।
और यहां तुम हो कि दूध तो शुद्धतम आहार है! ऋषि-मुनियों का आहार! पश्चात्ताप की तो बात अलग। मैं रायपुर में कुछ दिन था। तो वहां एक आश्रम ही है; उसका नाम है--दूधाधारी आश्रम। उस आश्रम की सबसे बड़ी खूबी है कि लोग सिर्फ दूध ही पीकर रहते हैं। और जो दूध ही पीकर रहता है, वह परम पवित्र है। एक लिहाज से तो बात ठीक लगती है कि दूध पीना पवित्र आहार है। क्योंकि छोटे-छोटे बच्चे दूध पीते ही तो जगत में प्रवेश करते हैं। छोटे बच्चे कैसे निर्दोष! निश्चित ही उनके भोजन का उसमें हाथ होगा। दूध में कुछ सात्विकता मालूम होती है। बच्चे एकदम सात्विक; कोरे कागज जैसे साफ-सुथरे।
लेकिन क्वेकर भी गलत नहीं कहते। उनकी बात में भी सचाई है। सचाइयां बड़ी जटिल हैं। वे कहते हैं, दूध है मांस-मज्जा का हिस्सा। दूध है एनिमल फूड। देह से पैदा होता है; देह का ही अंग है। तो जैसे मांसाहार बुरा है, ऐसे ही दुग्धाहार बुरा है। जैसे अंडा खाना बुरा है, ऐसा ही दूध पीना बुरा है। फिर बच्चों को माफ किया जा सकता है, क्योंकि वे अपनी मां का दूध पीते हैं। वह उन्हीं के लिए निर्मित हुआ प्रकृति से। लेकिन बड़ों को माफ नहीं किया जा सकता। क्योंकि तुम अपनी मां का दूध नहीं पीते--गाय का, भैंस का, बकरी का। यह किसी और की मां है। यह जो गाय का दूध पी रहा है, यह बछड़े का दूध छीन रहा है!
एक तो एनिमल फूड; पहली तो बात कि देह से पैदा होने वाला है दूध, इसलिए खून और मांस-मज्जा के साथ ही जोड़ा जाएगा। दूसरी बात, यह बछड़े के लिए था, तुम्हारे लिए नहीं। बछड़े से छीना गया है। तुम शोषक हो। तुमने गाय के साथ ज्यादती की है। हालांकि तुम कहते हो गऊ-माता! इस देश में गऊ-माता जो लोग कहते हैं, उनको दूध नहीं छीनना चाहिए। गऊ-माता न मारी जाए, इसके लिए आंदोलन चलता है। विनोबा भावे जैसे लोग अनशन कर बैठते हैं! गऊ-माता बचनी चाहिए! पुरी के शंकराचार्य से लेकर छोटे-मोटे साधु-संन्यासी तक, सभी--गऊ-माता बचनी चाहिए! लेकिन किसलिए? ताकि गऊ-माता का खूब शोषण कर सको। गऊ-माता बछड़े के लिए बचनी चाहिए, यह तो शंकराचार्य भी नहीं कहते और विनोबा भावे भी नहीं कहते। गऊ-माता बचनी चाहिए तुम्हारे लिए!
तुमसे गऊ-माता का क्या लेना-देना है? माता होगी गऊ बछड़े की; तुम्हारी नहीं है। बछड़े को तो मिलेगा नहीं दूध। दूध तुम्हें मिलेगा।
और तुम्हें पता है, जो लोग गाय-भैंस का धंधा करते हैं, वे बछड़ों को मार डालते हैं, या बछड़ों को बेच देते हैं। क्योंकि बछड़ा जितना दूध पी जाता है, वह भी महंगा धंधा है। वे बछड़ों को मार कर बछड़ों में भूसा भर कर उनके झूठे पुतले बना कर गऊ को धोखा देते हैं!
गऊशालाओं में झूठे बछड़े होते हैं--भुस भरे, मुर्दा। लाश है सिर्फ। हड्डियां निकाल ली गई हैं, भूसा भर दिया गया है, चमड़ी सी दी गई है। और गऊ-माता के पास उसको खड़ा कर देते हैं। गऊ को धोखा दे रहे हैं! उसको लगता है कि बछड़ा पास है, तो उसके स्तन से दूध बहने लगता है। और दूध पी जाएंगे ये गऊ-माता मानने वाले लोग!
तीसरी बात क्वेकर कहते हैं कि गऊ का जो दूध है, वह बछड़े के लिए पैदा किया गया है, तुम्हारे लिए नहीं। इसलिए तुम में महत कामवासना को पैदा करेगा।
इस बात में भी सत्य मालूम होता है। क्योंकि कहां सांड और कहां तुम! गाय का दूध पीओगे, फिर अगर तुम्हारे चित्त में कामवासना ही कामवासना घूमे, तो कुछ आश्चर्य नहीं। क्योंकि गाय के दूध में सांड के योग्य कामवासना पैदा करने वाले तत्व हैं। वह तुम्हारे लिए दूध बनाया नहीं गया है; वह सांड के लिए ही बना है। तो फिर अगर दुनिया में तुम लोगों को कामविकार से इतना ग्रस्त पाते हो, तो आश्चर्य नहीं है।
मगर इस देश में समझा जाता रहा कि ऋषि-मुनियों का आहार है! और लगता है कि इसी आहार के कारण ऋषि-मुनियों को सपने में अप्सराएं सताती थीं! यही आहार होगा कारण कि बैठे ऋषि-मुनि आंख बंद करके कि आई उर्वशी आकाश से! वह उर्वशी आकाश से नहीं आती, गऊ-माता के दूध से आती होगी। वह कामवासना का विकार कहीं उनके भोजन से ही पैदा हो रहा है।
किसको ठीक कहोगे? नरेश, किस बात का पश्चात्ताप करोगे? निर्णय कौन देगा? अब तक तय नहीं हो सका--क्या पुण्य है, क्या पाप है।
लाओत्सू कुछ दिन के लिए अदालत में न्यायाधीश हो गया था। कुछ ही दिन रहा। क्योंकि राजा ने फिर उसे छुट्टी दे दी। रख तो लिया था न्यायाधीश, क्योंकि खबर थी कि वह बड़ा महाज्ञानी है। तो उसे महा न्यायाधीश का पद दे दिया था। पहला ही मुकदमा गड़बड़ हो गया! एक रईस के घर चोरी हो गई। चोर पकड़ा गया, रंगे हाथों पकड़ा गया। चोर ने स्वीकार भी कर लिया। और लाओत्सू ने छह महीने की सजा दी चोर को, और छह महीने की सजा दी साहूकार को।
साहूकार ने कहा, आप होश में हैं! चोर को सजा मिले--ठीक। मुझे किसलिए सजा मिल रही है? मेरी चोरी हो--और मुझको सजा!
लाओत्सू ने कहा, तुमने इतना धन इकट्ठा कर लिया है कि चोरी न होगी तो और क्या होगा! यह नंबर दो का अपराधी है; तुम नंबर एक के अपराधी हो। पहला अपराध तुम्हारा। न तुम इतना धन इकट्ठा करते, न यह चोरी होती। मैं तो दोनों को सजा दूंगा। और सच तो यह है कि मैं तुम्हारे साथ बहुत विनम्रता का व्यवहार कर रहा हूं, क्योंकि तुम्हें भी सिर्फ छह महीने की सजा दे रहा हूं और इसको भी छह महीने की। तुम्हें छह साल की मिलनी चाहिए, इसे छह महीने की।
सम्राट ने सुना तो घबड़ा गया। सम्राट ने कहा, यह कैसा न्याय! और फिर सम्राट को यह भी समझ में आया कि अगर धनपति भी सजा के योग्य है, तो मेरी क्या हालत होगी! अगर कभी न्यायाधीश के सामने मैं पड़ गया, ऐसे न्यायाधीश के सामने, तो शायद फांसी की ही सजा देगा! तत्क्षण लाओत्सू को बरखास्त किया गया।
लाओत्सू ठीक कह रहा है या गलत--कैसे निर्णय हो?
पश्चात्ताप नहीं। पश्चात्ताप में पड़ोगे, तो बड़ी उलझन में पड़ जाओगे, बड़े ऊहापोह में पड़ जाओगे, जिसके बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा।
फिर प्रार्थना क्या है? प्रार्थना है--स्वीकार, संतोष, परितोष। जगत जैसा है, शुभ है। लोग जैसे हैं, अच्छे हैं। जीवन जैसा है, पूर्ण है। इससे पूर्णतर और कोई जगत नहीं हो सकता। इससे शुभ और लोग नहीं हो सकते।
जीसस ने सूली पर चढ़े हुए कहा कि क्षमा कर देना हे प्रभु, इन सारे लोगों को, जो मुझे फांसी दे रहे हैं। क्योंकि इन्हें पता नहीं कि ये क्या कर रहे हैं।
दंड देने का कोई आग्रह नहीं है। इन पापियों को नरक भेजने की कोई आकांक्षा नहीं है।
जिन शास्त्रों में पापियों को नरक भेजने की आकांक्षा है, तुम पक्का समझ लेना, वे शास्त्र उन लोगों ने लिखे हैं जो महा क्रोधी रहे होंगे। दुर्वासा जैसे लोगों ने लिखे होंगे वे शास्त्र। क्योंकि कोई बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति लोगों को नर्क भेजने का आयोजन करेगा? और नर्क में कड़ाहों में चुड़ाए जाने का आयोजन करेगा? यह वीभत्स आकांक्षा, यह कुत्सित भाव किसी बुद्धपुरुष में उठ सकता है? नर्क की कल्पना ही नहीं उठ सकती। यह असंभव है।
जीसस ने कहा, क्षमा कर देना इन्हें। ये कोई पाप नहीं कर रहे हैं; सिर्फ इन्हें पता नहीं ये क्या कर रहे हैं। ये नींद में चलते हुए लोग हैं, इनका कसूर क्या! नींद में कोई लड़खड़ाए और गिर जाए, नींद में किसी से भूल हो जाए, सपने में कोई चोरी कर ले, कि सपने में कोई हत्या कर दे--तो क्या इसका दंड मिलेगा? प्रार्थनापूर्ण हृदय तो सभी स्वीकार करता है।
जिसके लिए सब कुछ सहा
जो हाय सपना ही रहा
जिसने मुझे अपना कहा
उसका निठुर-व्यवहार भी
स्वीकार है, स्वीकार है।

जिसके किए मधुमय अधर
जिससे हुई वाणी मुखर
जिसके मिलन का क्षण अमर
उसका विरह-उपहार भी
स्वीकार है, स्वीकार है।
जिसके सहारे मैं चला
जिससे हुई विकसित कला
जिससे हृदय को सुख मिला
उसका दिया दुख-भार भी
स्वीकार   है,   स्वीकार   है।
और स्वीकार भी साधारण नहीं; स्वीकार भी बेबस, असहाय का स्वीकार नहीं; स्वीकार भी कमजोरी का, हारे हुए का स्वीकार नहीं। स्वीकार भी आनंद का, अभिनंदन का--स्वागत में, द्वार वंदनवार से सजा कर, दीपमाला जला कर, फूल बरसा कर, आरती उतार कर।
स्वीकार भी दो तरह के हैं। एक तो मुर्दा आदमी का, हारे हुए आदमी का स्वीकार। अंगूर खट्टे हैं--ऐसा स्वीकार। चूंकि पा नहीं सका। कौन नहीं चाहता धन पा ले! लेकिन सभी को कहां मिलता! नहीं मिलता, तो फिर अपने अहंकार को समझाने के लिए एक स्वीकार भाव, कि मैं तो संतोषी हूं। मैंने चाहा ही कब था! मिलता भी तो मैं लेता नहीं। ऐसे अपने अहंकार को किसी तरह बचा लेता आदमी। आदमी की मजबूरियां हैं। यहां सभी की महत्वाकांक्षाएं पूरी नहीं हो सकतीं। सभी राष्ट्रपति नहीं हो सकते, सभी प्रधानमंत्री नहीं हो सकते। हालांकि सभी होना चाहते हैं। तो फिर क्या करें? फिर तो जीवन विक्षिप्तता हो जाएगी। तो विक्षिप्तता से बचने के लिए स्वीकार--कि नहीं-नहीं, मुझे चाहिए ही नहीं। मैंने मांगा कब? मिलता भी तो मैं लेने वाला नहीं था। लोग आग्रह भी करते तो मैं इनकार कर देता। मैं तो कम से ही तृप्त हूं।
दरिद्रता का भी कितना आनंद है--ऐसे भाव लोग उठा लेते हैं। दरिद्र को नारायण कहने लगते हैं! सोचने लगते हैं कि संपत्ति में कुछ बुनियादी भूल है। सोचना पड़ता है।
नहीं, ऐसा स्वीकार नहीं। एक और स्वीकार है--विधायक, नाचता हुआ, नर्तन में, गायन में, आह्लादित, उमंग से भरा, उत्सवपूर्ण।
मैं किसी का था, तुम्हारा हो गया हूं।
प्राण! तुम बीती हुई बातें न पूछो,
लोचनों की स्निग्ध बरसातें न पूछो,
मत करो मजबूर कहने को कहानी,
मत जगाओ, सुप्त हैं स्मृतियां पुरानी;
मैं किसी के प्यार का पाहुन बना था,
जिंदगी थी मौन, मैं कुछ अनमना था;
मौन पाहुन एक दिन पाहन गया बन--
पा तुम्हें फिर मधुर धारा हो गया हूं।
मैं किसी का था, तुम्हारा हो गया हूं।
पा सहारा मैं सहारा हो गया हूं।

तुम कहीं आकर न प्यासे लौट जाओ,
स्वयं रोओ और मुझ को भी रुलाओ;
मैं सदा चलता रहा सूनी डगर पर,
लक्ष्य खोकर लक्ष्य के विपरीत होकर;
अब नहीं मैं और रोना चाहता हूं,
अब न अपना आप खोना चाहता हूं;
बन लहर मझधार में रहता रहा हूं--
पा किनारा अब किनारा हो गया हूं।
मैं किसी का था, तुम्हारा हो गया हूं।
बन  तुम्हारा  बहुत  प्यारा  हो  गया  हूं।
एक और स्वीकार है, जो परमात्मा के साथ लयबद्ध होने से अनुभव में आता है; जो जीवन के सौंदर्य को साक्षात करने से प्राणों में उतर जाता है; जो फूलों की सुवास से तुम्हारी तरफ उड़ता है; जो सूरज की किरणों से तुम्हारे पास आकर नाचता है; जो आकाश की बदलियों में मेघ-मल्हार गाता है। एक और स्वीकार है, जो सिर्फ परम धन्यता का है।
जरा ऐसा सोचो, इस जीवन को तुमने कमाया तो नहीं। यह भेंट है परमात्मा की। मुफ्त मिली। तुमने इसे अर्जन नहीं किया। ये आंखें जो चांदत्तारों के सौंदर्य को देखती हैं, तुम्हारा सृजन नहीं हैं। और ये कान जो जीवन के परम संगीत से भर जाते हैं--नदियों के कल-कल नाद से, और समुद्र में उठती हुई लहरों के नृत्य से, वृक्षों से निकलती हवाओं से--जो संगीत को सुनते हैं, ये कान तुमने तो निर्मित किए नहीं। यह कौन अज्ञात हाथ तुम्हारे कान निर्मित कर गया है? यह कौन अज्ञात कलाकार तुम्हारी आंखों को बना गया है?
वैज्ञानिक तो कहते हैं, आंख का होना एक चमत्कार है। क्योंकि आंख बनी है ठीक वैसी ही चमड़ी से, जैसे तुम्हारे हाथ बने हैं, पैर बने हैं; वही चमड़ी! चमड़ी में--और देखने की क्षमता! चमड़ी--और पारदर्शी हो गई! चमड़ी--और सौंदर्य को पहचानती है! रूप को देखती है! रंग से भरती है! आकाश के इंद्रधनुष, वृक्षों की हरियाली, फूलों के अनंत-अनंत रंग! कान भी सिर्फ हड्डी के सिवाय और कुछ भी नहीं है। मगर हड्डी जो सुनती है! फिर चाहे वीणा का नाद हो, चाहे बांसुरी की धुन हो, चाहे दूर से आती हुई कोयल की पुकार हो! हड्डी जो सुनती है--और क्या चमत्कार होगा! चमड़ी जो देखती है!
और वैज्ञानिक से पूछो, तो यह हृदय क्या है, सिर्फ फेफड़ा है--फुफ्फस। सिर्फ खून को शुद्ध करने का यंत्र है। लेकिन कहीं इस हृदय में प्रेम का आविर्भाव होता है। किस अज्ञात लोक से प्रेम का अतिथि आता है और तुम्हारे हृदयगृह में निवास करता है! किस अज्ञात लोक से कौन अज्ञात पाहुन तुम्हारा मेहमान बन जाता है! तुम आंदोलित हो उठते हो!
इतना चमत्कारपूर्ण यह अस्तित्व, और तुम धन्यवाद भी न दोगे! तुम पश्चात्ताप करोगे?
नहीं-नहीं! प्रार्थना को, नरेश, पश्चात्ताप से मत जोड़ना। पश्चात्ताप से जुड़ गई प्रार्थना छोटी हो जाती है, ओछी हो जाती है, दुख भरी हो जाती है, कांटों से छिद जाती है। उसकी आकाश की उड़ान खो जाती है। उसके पंख टूट जाते हैं।
प्रार्थना है अहोभाव, धन्यभाव, कृतज्ञता ज्ञापन, धन्यवाद। अस्तित्व को धन्यवाद का नाम प्रार्थना है।
बन लहर मझधार में रहता रहा हूं--
पा किनारा अब किनारा हो गया हूं।
मैं किसी का था, तुम्हारा हो गया हूं।
बन  तुम्हारा  बहुत  प्यारा  हो  गया  हूं।
प्रार्थना है परमात्मा का हो जाना। और जो उसका हो गया, वह बहुत प्यारा हो जाता है। क्योंकि जो उसका हो गया, वह वही हो गया। परमात्मा को जिसने जाना, वह परमात्मा ही हो जाता है। प्रार्थना परमात्मा होने की कीमिया है।

*दूसरा प्रश्न: भगवान! शून्य हो जाना अर्थात परमसुख को पाना मेरे लिए कोई लक्ष्य नहीं। मैं कौन हूं? मेरे पहले जन्म? मौत के बाद मुझे कहां जाना है? लोग कहां से आते हैं, कहां जाते हैं? क्या है यह सब कुछ? मैं चौदह वर्षों से भटक रहा हूं। जब मैं पंद्रह वर्ष का था, तो एक साधु ने अपने भाषण में एक कहानी सुनाई। उसी का प्रभाव। उसी के साथ चल दिया। फिर एक साधु से दूसरे साधु तक, जिसका भी नाम सुना, उसी के पास गया। व्रत रखे, ध्यान करता रहा। अपने आप को जानने की कोशिश। फिर एक और प्रश्न उठने लगा: कौन किसको जानेगा? कौन किसको देखना चाहता है? कौन करेगा किसकी खोज? कुछ समझ में नहीं आता। सांस चल रही है। दिल धड़कता है। और कुछ भी नहीं! फिर ऐसी धारणा बन गई कि कोई भी इस जीवन के रहस्य को नहीं जानता! सब बेकार। सब झूठ। सब बातें हैं; कुछ नहीं।
आपको भी सात-आठ वर्षों से सुनता आ रहा हूं। आपके मुख से निकला हर शब्द ऐसे जैसे मेरे ही अंदर से निकल रहा है। पहले सिर्फ सुनता था। जब कुछ होने लगा, तो मन में कई बार आता: क्या पता, ये भी बातें ही हों!
दिल तड़प रहा है। हर समय एक धुआं सा उठता है। कितनी तड़प, कुछ कह नहीं सकता! जब रात को नींद खुले, यही प्रश्न। बहुत समझाता हूं अपने आप को: छोड़ो ये सब बेकार की बातें। लेकिन नहीं।
चार जुलाई उन्नीस सौ उनहत्तर को यहां आया। ध्यान शुरू किए। अठारह जुलाई को संन्यास लिया। जिन प्रश्नों को जानने के लिए इतनी तड़प, उसका कोई उत्तर नहीं मिल रहा। लेकिन ये प्रश्न ही खत्म होते मालूम पड़ते हैं। ऐसा क्यों? जो मैं जानना चाहता हूं, क्या कभी इसका उत्तर मिलेगा? मुझे सुख-शांति की कोई इच्छा नहीं। अपने आप को जन्मों-जन्मों में देखना चाहता हूं।



बालकृष्ण भारती! जीवन रहस्य है। प्रश्न और उत्तर की बात नहीं। सब प्रश्न व्यर्थ हैं--यह तुम्हारी समझ में नहीं आया। सब उत्तर व्यर्थ हैं--यह समझ में आ गया। क्योंकि उत्तर दूसरों के थे, प्रश्न तुम्हारे। अहंकार बड़ा चालबाज है! उत्तर दूसरों के थे--सब बातें हैं! और प्रश्न? प्रश्न हीरे-जवाहरात हैं, बातें नहीं? लेकिन प्रश्न तुम्हारे हैं, इसलिए हीरे-जवाहरात होने ही चाहिए! उत्तर दूसरों के हैं, होंगे कंकड़-पत्थर! होंगे बकवास!
एक साधु से दूसरे साधु, दूसरे से तीसरे साधु के पास तुम भटकते रहे। उनकी सब की बातें तुम्हें व्यर्थ मालूम पड़ीं, लेकिन तुम्हें अपने भीतर उठते प्रश्न व्यर्थ मालूम नहीं पड़े? अगर सब उत्तर व्यर्थ हैं, तो एक बात तो सोचते कभी कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि प्रश्न ही व्यर्थ हैं! व्यर्थ प्रश्नों के ही व्यर्थ उत्तर हो सकते हैं।
और अब यहां आकर जब तुम्हें प्रश्न मिटते हुए मालूम हो रहे हैं, तो घबड़ाहट पैदा हुई। मैं तो प्रश्न ही मिटाता हूं, उत्तर देता नहीं। उत्तर देना तो सिर्फ प्रश्नों को मिटाने की तरकीब है। ऐसे तो रोज उत्तर देता हूं। लेकिन अगर तुम गौर करोगे, तो मेरे उत्तर तुम्हारे प्रश्नों को तोड़ने की चेष्टाएं हैं। कुल्हाड़ी लेकर तुम्हारे प्रश्नों को तोड़ता हूं। जैसे कोई लकड़हारा लकड़ियां काटता हो, ऐसे तुम्हारे प्रश्नों को चीरता हूं, काटता हूं।
उत्तर जीवन का कोई है ही नहीं। जीवन का उत्तर हो जाए, तो जीवन दो कौड़ी का होगा फिर। फिर जीवन बच्चों की एक पहेली होगा। और जीवन पहेली नहीं है; जीवन रहस्य है। पहेली और रहस्य का भेद समझ लो। पहेली का उत्तर होता है, खोजना पड़ता है। रहस्य का उत्तर होता ही नहीं। लाख खोजो, जितना खोजोगे, उतना पता चलेगा कि उत्तर नहीं है।
अब कुछ ठीक तालमेल बैठ रहा है, तो तुम्हें घबड़ाहट पैदा होना शुरू हुई। अब तुम्हें डर लगा कि कहीं तुम्हारे प्रश्न ही न सरक जाएं! क्योंकि तुमने अपने प्रश्नों में ही अपना पूरा जीवन लगा दिया है। तुमने अपने प्रश्नों में ही अपना पूरा स्वार्थ जोड़ दिया है।
तुम यह तो मान ही नहीं सकते कि तुम्हारे प्रश्न व्यर्थ हो सकते हैं। और यही तुम्हें मानना होगा, जानना होगा, पहचानना होगा। तुम्हारे सब प्रश्न व्यर्थ हैं। इसलिए सारे उत्तर व्यर्थ थे। जिन्होंने दिए, वे तुम जैसे ही नासमझ होंगे। नासमझ पूछते हैं, स्वभावतः जीवन का एक नियम है, अर्थशास्त्र का एक नियम है, कि जहां-जहां मांग होती है वहां-वहां पूर्ति होती है। कुछ भी मांगो, कोई न कोई पूर्ति करने वाला मिल जाएगा। ऊलजलूल चीज भी मांगो, तो भी कोई न कोई फैक्टरी उसको बनाने लगेगी। लोग मांगते हैं, तो बनाना ही पड़ेगा। तुम जो मांगोगे, उसकी ही पूर्ति शुरू हो जाती है। चूंकि तुम ऊलजलूल प्रश्न पूछते हो...।
तुम पूछते हो: "मैं कहां से आया?'
तुमने यह बात मान ही ली कि तुम कहीं से आए हो। तुम्हारे प्रश्न में ही यह बात तुमने मान ली। तुमने एक बात तो मान ही ली है कि तुम कहीं से आए हो।
मैं तुमसे कहता हूं, तुम सदा से यहीं हो! कहीं से आए नहीं; कहीं गए नहीं।
रमण महर्षि की अंतिम घड़ी; श्वास आखिरी; एक शिष्य ने पूछा, भगवान! अब आप जा रहे हैं। आप कहां जाएंगे?
रमण ने आंख खोली। गहन पीड़ा थी उनको, क्योंकि गले का कैंसर था। बोलना भी मुश्किल हो गया था। पानी का घूंट पीना मुश्किल हो गया था। लेकिन इस व्यक्ति को उत्तर देने के लिए बोले और कहा, कहां जाऊंगा? जीवन भर एक ही बात समझाई, तुम्हारी समझ में न आई? कहां जाना, कहां आना! न कहीं से आया हूं, न कहीं जाऊंगा। यहीं था, और यहीं रहूंगा।
देह बनती है, देह मिटती है। तुम न तो आते, न तुम जाते। जैसे घड़ा बनता है और घड़ा मिटता है। घड़े के भीतर का जो आकाश है, वह न तो कहीं आता और न कहीं जाता। एक घड़ा था, तुमने फोड़ दिया। क्या तुम सोचते हो तुमने घड़े के भीतर का आकाश फोड़ दिया? मिट्टी पड़ी थी, तुमने एक घड़ा बना लिया। क्या तुम सोचते हो तुमने घड़े के भीतर का आकाश बना लिया?
आकाश न तो बनाया जाता है, न तोड़ा जाता है। न उसका कोई जन्म है, न कोई मृत्यु है। घड़े बनते-मिटते रहते हैं। तुम्हारी देह तो घड़ा है। आज है, कल नहीं होगी। लेकिन तुम! तुम आकाश हो। तुम सदा से हो, शाश्वत हो, सनातन हो। तुम्हारा न कोई प्रारंभ है और न कोई अंत है।
इसलिए जब तुम पूछते हो: कहां से आया? तो तुमने एक बात मान ही ली, पूछने के पहले ही मान ली, कि तुम कहीं से आए हो। अब कहां से आए हो--यह सवाल उठता है। फिर सवाल उठेगा--कहां जाऊंगा? फिर दोनों सवालों के बीच में सवाल उठेगा कि जो आता है, जो जाता है, वह कौन है?
तुम हो। लेकिन कौन की भाषा में उत्तर नहीं हो सकता। अगर कोई उत्तर दे, बताए कि तुम कौन हो, तो उसका उत्तर प्रथम से ही गलत है। तुम तुम हो। तुम कोई और नहीं हो। अ अ है, ब ब है। अगर उत्तर देना हो, तो कहना पड़ेगा कि अ ब है, तब उत्तर होगा । अगर किसी से कहो कि अ अ है, तो क्या कोई उत्तर हुआ!
एक गांव में चोरी हो गई। बड़ी खोजबीन हुई। चोर का कोई पता न चले। फिर लोगों ने पुलिस इंसपेक्टर को कहा कि हमारे गांव में एक लाल बुझक्कड़ है। बड़ा पहुंचा हुआ दार्शनिक है। अब तक हम तो ऐसा कोई प्रश्न नहीं पूछ पाए जिसका वह उत्तर न दे देता हो। वही सहायता कर सकता है।
लाल बुझक्कड़ नाम सुन कर इंसपेक्टर थोड़ा चौंका। उसने कहा कि जरा नमूने के लिए बताओ, उसने कैसे उत्तर दिए हैं! लोगों ने कहा कि ऐसा कोई प्रश्न ही नहीं। हम तो सब प्रश्न पूछे चुके। एक दफा ऐसा हुआ कि गांव से हाथी निकल गया। इस गांव में कभी हाथी नहीं आया था। इस इलाके में हाथी नहीं होते। रात में निकला, तो किसी ने देखा नहीं। सुबह उसके पैरों के चिह्न रास्ते पर बने थे। बड़ी चिंता पैदा हुई कि ऐसा जानवर! इतने बड़े-बड़े पैर वाला जानवर कितना बड़ा नहीं होगा! लाल बुझक्कड़ से पूछा। लाल बुझक्कड़ ने थोड़ी देर आंख बंद करके ठुड्डी पर हाथ लगा कर विचार किया और कहा कि बात साफ है। पैर में चक्की बांध कर, हिरणा उचका होय! चक्की बांध ली होगी हिरण ने पैर में, और वही कूदा है। इसलिए ये निशान हैं! ऐसा गजब का लाल बुझक्कड़ है। आप घबड़ाएं मत। आप पूछें, उत्तर मिलेगा।
इंसपेक्टर को कोई और रास्ता नहीं दिखाई पड़ा, तो कहा कि चलो, पूछ लें। क्या हर्ज है! क्या बिगड़ जाएगा! लाल बुझक्कड़ ने कहा कि ठीक, जवाब तो दूंगा। लेकिन एकांत में, बिलकुल एकांत में। और बात निजी है, किसी और को बताना मत। मैं सीधा-सादा आदमी हूं। मैं तो तुम्हें चोर का पता दे दूं और कल चोर मेरी जान लेने आ जाए!
इंसपेक्टर तो बहुत उत्सुक हुआ। उसने कहा, तुम बिलकुल बेफिक्र रहो। रक्षा हम तुम्हारी करेंगे। और बात कहीं बाहर जाएगी नहीं। लाल बुझक्कड़ ने कहा, मेरे साथ जंगल की तरफ चलो--एकांत में, बिलकुल एकांत में, जहां पशु-पक्षी भी सुनने वाले न हों।
दूर ले गया एक गुफा में। थका मारा इंसपेक्टर को चला-चला कर। कई दफा इंसपेक्टर ने कहा कि भाई, यहां कोई दिखाई नहीं पड़ता, तू कान में फुसफुसा दे। एक सेकेंड की बात है। नाम भर बोल दे। उसने कहा, एक ही सेकेंड की है। मगर मेरे जीवन का सवाल है।
आखिर एक गुफा में ले गया--दूर--अंधेरे में टटोलते-टटोलते भीतर पहुंचे। इंसपेक्टर ने कहा, भाई, अब तो तू बता दे, कि कहीं पाताल लोक में ले जाएगा, क्या करेगा! उसने कहा, सुनो, कान पास लाओ। कान में फुसफुसाया और कहा कि जहां तक मेरा हिसाब है, चोरी किसी चोर ने की है। मगर किसी को बताना मत।
चोरी किसी चोर ने की है--यह कोई उत्तर हुआ!
तुम जाकर पूछते हो लोगों से--मैं कौन हूं? और बैठे हैं तुम्हारे गांव-गांव में साधु-संन्यासी, वे कहते हैं, तुम आत्मा हो!
यह वही की वही बात है कि किसी चोर ने चोरी की है। आत्मा का अर्थ मैं होता है, और कुछ भी नहीं। वह संस्कृत शब्द है मैं के लिए ही। वे यही कह रहे हैं कि मैं यानी मैं। तुम आत्मा हो। या और जरा कुछ पहुंचे ज्ञानी हुए, तो वे कहेंगे, तुम परम आत्मा हो। मगर वह भी क्या हुआ! परम मैं! बात हल नहीं हुई, और उलझ गई। मैं ही नहीं सुलझ रहा था, अब परम मैं कैसे सुलझेगा!
तुम हो ही नहीं। इसलिए कोई उत्तर काम नहीं आएगा। तुम कोरे आकाश हो--शून्याकाश। जब भीतर खोजोगे ध्यान में, तो अपने को पाओगे नहीं। कुछ पाओगे। "कुछ' कहता हूं। लेकिन मैं को नहीं पाओगे। अत्ता, आत्मा--ऐसी कोई चीज नहीं पाओगे। कुछ पाओगे। जिन्होंने पाया है, उन्होंने कहा है, ज्यादा से ज्यादा इतना ही हम कह सकते हैं--दर्शन की क्षमता पाओगे, द्रष्टा पाओगे, साक्षी पाओगे, एक देखने वाला पाओगे। दृश्य तो कोई भी न मिलेगा। हाथ पकड़ में तो कुछ भी न आएगा। सामने रख कर देख सको, ऐसी तो कोई चीज न मिलेगी। लेकिन इतना अहसास जरूर होगा कि कोई देखने वाला है। मगर यह भी रहस्यपूर्ण होगा अनुभव। यह गणित में बंधेगा नहीं और विज्ञान की तराजू पर तुलेगा नहीं। हिसाब-किताब में आएगा नहीं। तर्कसरणी में मापने-नापने का कोई न तो कभी उपाय था, न हो सकता है।
लेकिन तुम अपने हाथ से अपनी उलझनें खड़ी कर रहे हो, बालकृष्ण! तुम कहते हो: "शून्य हो जाना मेरे लिए कोई लक्ष्य नहीं।'
अब तुमने पहले से ही अड़चन खड़ी कर ली। तुमने पहले से ही तय कर लिया कि तुम्हें क्या होना है, क्या नहीं होना। खोजने की तैयारी कम है, पक्षपात पहले से तय कर लिए। पूछते हो: मुझे तो जानना है, मैं कौन हूं। और शून्य होना मेरा लक्ष्य नहीं।
और शून्य हुए बिना कोई स्वयं को जाना नहीं। अब मैं क्या करूं! तुमने तो शर्त ऐसी बांध दी पहले कि तुम्हारी शर्त पूरी हो, तो तुम्हारी जिज्ञासा पूरी नहीं हो सकती। तुम शर्त छोड़ो, तो जिज्ञासा पूरी हो सकती है। शून्य होने का क्या अर्थ होता है? मौन होना, निर्विचार होना। यह मन की जो आपाधापी है, चली जाए। ये मन में जो निरंतर विचारों की तरंगें हैं, शांत हो जाएं। यह मन निर्विकल्प हो, निर्विचार हो। शून्य का अर्थ होता है समाधि। और समाधि में समाधान है।
लेकिन तुम कहते हो, हमें समाधान तो चाहिए, मगर समाधि पाना हमारा लक्ष्य नहीं! फिर कैसे समाधान मिलेगा? कहते हो, शून्य होना हमारा कोई लक्ष्य नहीं। यह तुमने तय ही कर लिया पहले से? और शून्य होना ही तो प्रक्रिया है स्वयं के बोध की। शून्य की ही तलवार से तो स्वयं का निखार होता है। शून्य ही तो तुम्हें ले जाएगा वहां, जहां द्रष्टा छिपा बैठा है, उस अंतर-गुहा में।
नहीं बालकृष्ण, ऐसे निर्णय लेकर मत चलो। निर्णय लेकर जो पहले से चलता है, वह सच्चा खोजी नहीं है। पंद्रह साल नहीं, तुम पंद्रह जीवन भटकते रहो, कुछ भी न पाओगे।
और तुम बड़े होशियार हो! तुम कहते हो, सब बातचीत! और तुमने कभी लौट कर एक बार भी न सोचा कि कहीं मेरे पूर्व-पक्षपात ही तो बाधा नहीं बन रहे हैं? जैसे एक अंधे ने तय कर लिया कि और सब तो करूंगा, लेकिन आंख का इलाज नहीं करूंगा। और प्रकाश को जान कर रहूंगा! लेकिन आंख का इलाज नहीं। बस आंख के इलाज की बात मत करना। या जैसे किसी आदमी ने तय कर लिया कि आंख नहीं खोलूंगा, और सूरज के दर्शन करने हैं! तो जिन-जिन के पास जाएगा, जो-जो सूरज की स्तुति में गान गाएंगे, सूरज के गीत गाएंगे, उनकी सब बकवास लगेगी उसे। वह कहेगा, किस प्रकाश की बात कर रहे हो? आकाश में छा गई किस लाली की चर्चा कर रहे हो? कैसी प्राची? कैसा पूरब? कैसा सूरज? कैसी सुबह? आंख मैं खोलूंगा नहीं। आंख खोलना मेरा कोई लक्ष्य नहीं। तो ऐसे आदमी को क्या प्रकाश समझाया जा सकता है?
सच्चा खोजी तो वह है, जो बिना किसी पूर्व-पक्षपात के यात्रा पर निकलता है। जो कहता है, मेरी कोई धारणा नहीं है। सत्य जैसा होगा, मैं सत्य के साथ वैसा ही हो जाने को राजी हूं। सत्य मुझे जैसे ढालेगा, वैसे ही ढल जाने की मेरी तत्परता है। सत्य कहे पूरब, तो मैं पूरब जाऊंगा। और सत्य कहे पश्चिम, तो मैं पश्चिम जाऊंगा। न मैं हिंदू, न मैं मुसलमान, न मैं ईसाई, न मैं जैन। मैं कोई शास्त्र, कोई सिद्धांत पहले से तय करके नहीं चल रहा हूं। निर्विचार मन! और तभी केवल खोज हो सकती है। जिज्ञासा ही वही कर सकता है, मुमुक्षा ही वही कर सकता है।
लेकिन तुमने यह कैसे तय किया कि शून्य होना तुम्हारा कोई लक्ष्य नहीं? शून्य होकर देखा कभी? अनुभव किया शून्य का? शून्य ने तुम्हें कोई तकलीफ दी? शून्य ने तुम्हें सताया? तुम्हें परेशान किया? शून्य से तुम्हारी दुश्मनी क्या है?
शायद शून्य शब्द से ही घबड़ा रहे हो। शायद शून्य शब्द से तुम्हें मौत की याद आती होगी। शून्य होना यानी मरना, मिटना, बरबाद होना। शून्य होने से तुम घबड़ा रहे हो कि खाली हो जाऊंगा। लेकिन शून्य होना मिटना नहीं है; शून्य होना परम होना है। शून्य होना आकाश होना है, विराट होना है।
और तुम कहते हो: "परमसुख पाना भी मेरे लिए कोई लक्ष्य नहीं।'
तुम तो बड़ी गजब की बातें कर रहे हो बालकृष्ण! तुम्हें होश है तुम क्या कह रहे हो? कोई प्राणी है इस अस्तित्व में, सुख पाना जिसके लिए लक्ष्य न हो? तुम सोचते हो तुम अपवाद हो? आदमियों की तो छोड़ दो, पशु-पक्षी भी सुख पाने के लिए ही खोजबीन में लगे हैं। कितनी ही अंधी खोज हो, मगर खोज तो सुख की ही है। पौधे भी सुख की तलाश कर रहे हैं--अपने-अपने ढंग से।
वैज्ञानिक बहुत चकित हुए हैं यह बात जान कर कि पौधे अपनी जड़ों के द्वारा जल की तलाश करते हैं कि जल कहां है, किस तरफ है। एक वृक्ष है, उससे पचास फीट दूर पूरब की ओर से म्युनिसिपल कारपोरेशन की पाइप लाइन जाती है। पचास फीट दूर! वह और दिशाओं में अपनी जड़ें नहीं फैलाता। वह उसी पाइप की लाइन की तरफ अपनी जड़ें फैलाता है!
अब पचास फीट दूर पाइप की जो लाइन है जमीन में दबी हुई, इस वृक्ष को कैसे पता चलता है? यह न उत्तर जाता, न दक्षिण जाता, न पश्चिम जाता। हां, अगर यह सब तरफ जड़ें फैलाता और फिर अचानक मिल जाता इसे पाइप, तो हम समझते कि चलो, यह तो संयोगवशात है। इसने चारों तरफ जड़ें फैलाईं; जहां पाइप था, वहां मिल गया; जहां पाइप नहीं था, वहां नहीं मिला। लेकिन वैज्ञानिक हैरान हुए हैं यह बात जान कर कि वह वृक्ष अपनी जड़ें फैलाता ही सीधा पूरब की तरफ है। चला! जैसे उसे अंदाज हो गया कि पचास फीट दूर जल-स्रोत है। कोई अचेतन खोज चल रही है।
जो लोग जमीन में दबे हुए जल-स्रोतों की खोज करते हैं, वे भी वृक्ष की डंडी लेकर करते हैं। हरे वृक्ष की ताजी डंडी तोड़े लेते हैं। डंडी को हाथ में रख लेते हैं। हाथ में बिलकुल सम्हाल कर--पकड़ते नहीं डंडी को, नहीं तो बाधा हो जाए--सिर्फ हाथ में रख कर जमीन पर चलते हैं। आहिस्ता-आहिस्ता चलते हैं। देखते हैं कि कहां डंडी डगमगाती है। जहां जल होता है नीचे, कुआं हो सकता है जहां, वहां डंडी डगमगाती है, झुक जाती है। बस उसका डगमगाना हाथ में उनको खबर दे देता है कि यहां पानी होना चाहिए।
वृक्ष की डंडी, हो सकता है सौ फीट नीचे पानी हो, उस पानी की खबर देती है! जरा सी कंप जाती है! जरा सा कंपन--आह्लाद--कि यह रहा जल! यह रहा मेरा सुख का स्रोत!
पशु-पक्षी ही नहीं, पौधे भी! पौधे भी संगीत को सुन कर जल्दी बढ़ते हैं। शास्त्रीय संगीत को सुन कर और भी जल्दी बढ़ते हैं। कैनेडा में बहुत प्रयोग किए गए हैं इस संबंध में। कुछ पौधों को रविशंकर का सितार सुनाया गया, रोज नियम से। वे पौधे दुगुनी गति से बढ़े। उनमें फूल दुगुने बड़े आए। मौसम के पहले आए। और एक मजा, कि जिस टेप रेकार्डर पर रविशंकर का सितार उनको सुनाया जाता था, वे सब पौधे उस टेप रेकार्डर पर झुक आए, जैसे गलबहियां डाल दीं!
उसी बगीचे में दूसरे कोने में, उसी तरह के पौधे, उसी उम्र के पौधे, उनको पॉप म्यूजिक सुनाया गया। पॉप म्यूजिक यानी हुड़दंग। जैसा हिंदी फिल्मों की हुड़दंग होती है! संगीत जैसा कुछ भी नहीं, तांडव नृत्य! उन पौधों ने ठीक उलटा व्यवहार किया। वे दूसरी तरफ झुक गए। वे टेप रेकार्डर की तरफ नहीं झुके; वे दूसरी तरफ झुक गए, भागने की कोशिश में--कि किसी तरह बचाओ! और उनकी गति, विकास की, आधी रही। सामान्यतः जितने बढ़ते, उससे भी आधे बढ़े। और सामान्यतः जब उनमें फूल आने थे, उससे भी देर से फूल आए। और सामान्यतः जितने बड़े फूल आने थे, उससे भी आधे फूल आए, अधमरे फूल आए।
पौधे भी सुख को अनुभव करते हैं; दुख को भी अनुभव करते हैं।
बालकृष्ण, तुम कहते हो: "परमसुख मेरा कोई लक्ष्य नहीं।'
तो मैं को ही जान कर क्या करोगे? यह मैं को जानने की आकांक्षा भी क्या देगी? अगर आदमी मैं को भी जानना चाहता है तो सुख के लिए ही। स्वयं को जानना चाहता है, ताकि सुख की ठीक-ठीक अनुभूति हो सके। स्वयं को न जाने, भूलें होतीं, चूकें होतीं; आदमी जीवन को दुख-जाल से भर लेता है। स्वयं को जान लूंगा, तो रास्ता साफ होगा। दरवाजे से निकलूंगा, दीवाल से न टकराऊंगा। स्वयं को जान लूंगा, तो मुझे पता चलेगा--करने योग्य क्या है; करने योग्य क्या नहीं है।
स्वयं को आदमी किसलिए जानना चाहता है? स्वयं को इसलिए जानना चाहता है, ताकि परमसुख मिल सके, आनंद मिल सके, सच्चिदानंद मिल सके।
लेकिन तुम बड़ी गलत धारणाओं से भरे हो। और ये धारणाएं तुम्हारी राह में बड़ी अड़चनें हो जाएंगी, बड़ी चट्टानें हो जाएंगी। इनकी सीढ़ियां बनाना मुश्किल हो जाएगा।
तुम कहते हो: "शून्य हो जाना या परमसुख को पाना मेरे लिए कोई लक्ष्य नहीं। मैं कौन हूं? मेरे पहले जन्म? मौत के बाद मेरा कहां जाना है?'
यह सारी चेष्टा, अगर गौर से तुम समझो, तो कोई आत्म-अन्वेषण नहीं है। ऐसा लगता है, तुम अहंकार से ग्रसित हो--मैं कौन हूं? कहां से आया हूं? कहां जाऊंगा? यह मैं तुम्हें जोर से पकड़े हुए है। इस मैं को तुम सिर पर ढो रहे हो। और मैं से बड़ा झूठ कुछ भी नहीं।
तुम हो, लेकिन मैं जैसा वहां कुछ भी नहीं है। तुम निश्चित हो। तुम्हारा अस्तित्व है। लेकिन मैं का कोई अस्तित्व नहीं है। तुम्हारा अस्तित्व है सारे अस्तित्व के साथ एक; भिन्न नहीं, पृथक नहीं, अलग नहीं।
मैं का अर्थ होता है: मैं अलग हूं, यह सारा अस्तित्व अलग है। मैं एक छोटा सा द्वीप हूं। यह सारा अस्तित्व है सागर, मैं इससे अलग-थलग।
मैं को तो गंवाना होगा। और तुम इस मैं के पीछे लाठी लेकर पड़े हो। तुम्हें जानना है कि यह मैं कौन हूं! तुम्हें जानने में उतनी उत्सुकता नहीं है, जितनी तुम्हारी उत्सुकता मैं में है। और मैं रोग है।
लेकिन तुम भटकते-भटकते ठीक जगह आ गए हो। यहां तुम्हारे मैं को हम तोड़ ही डालेंगे, छिन्न-भिन्न कर देंगे। होना शुरू भी हो गया है। उसी से तुम्हारा प्रश्न पैदा हुआ है।
तुम कहते हो: "जिन प्रश्नों को जानने के लिए इतनी तड़प, उसका कोई उत्तर नहीं मिल रहा। लेकिन ये प्रश्न ही खत्म होते मालूम होते हैं। ऐसा क्यों?'
ऐसा ही होना चाहिए। ऐसा ही होता है सदगुरु के पास; ऐसा ही होता है सत्संग में। उत्तर नहीं मिलते, प्रश्न मर जाते हैं। चित्त उत्तरों से नहीं भरता, निष्प्रश्न हो जाता है। और जब पूछने को कुछ भी नहीं बचता, तब आंख खुलती है, तब जानने की घटना घटती है।
अब तुम डरो मत। अब तुम घबड़ाओ मत। प्रश्नों को जाने दो। इतने दिन तो पकड़े बैठे रहे प्रश्नों को, उत्तर न पाया। अब मेरी सुनो, प्रश्नों को जाने दो। और जब प्रश्न ही नहीं रहे, तो उत्तर का कोई सवाल नहीं है।
क्या तुम कल्पना नहीं कर सकते एक ऐसे चित्त की, जहां प्रश्न भी नहीं हैं, उत्तर भी नहीं हैं! जहां सन्नाटा है, जहां पूर्ण मौन है। न कोई पूछने वाला, न कुछ पूछे जाने को। न कोई उत्तर देने वाला, न कोई उत्तर। इस दशा को ही पतंजलि ने निर्विकल्प समाधि कहा है। बुद्ध ने शून्यावस्था कहा है। महावीर ने सामायिक कहा है। कबीर ने सुरति कहा है। झेन फकीर इसी को ध्यान कहते हैं। सूफी इसी को जिक्र कहते हैं। नाम के फर्क हैं ये। यह अवस्था, जहां मस्ती है, और सन्नाटा है; जहां तृप्ति है, और कोई जिज्ञासा नहीं; जहां कोई प्रश्नचिह्न नहीं बचा। और आश्चर्यों का आश्चर्य यह है कि जब कोई प्रश्न नहीं बचता, तब सब उत्तर मिल जाते हैं।
बुद्ध से जब पूछा गया उनके परम ज्ञान के बाद कि आपने पाया क्या? तो बुद्ध ने कहा, पाया कुछ भी नहीं, खोया बहुत।
पूछने वाला तो चौंका। क्योंकि लोग बुद्धत्व में पाते हैं। हम तो पाने के ही लिए आतुर हैं। अगर हमको पहले से ही कह दिया जाए कि बुद्धत्व में कुछ मिलता नहीं, उलटे खो जाता है; तो कौन बुद्धत्व में जाना चाहेगा? कौन बुद्धू बनना चाहेगा? यह तो बुद्धत्व न हुआ, बुद्धूपन हो गया। उलटे हाथ का था, वह भी गंवा दिया!
उसने पूछा कि मैं समझा नहीं!
बुद्ध ने कहा कि तुम क्या समझोगे, मैं भी पहली दफा जब हुआ तो नहीं समझा था। सारे प्रश्न खो गए। वही-वही मुझे घेरे थे। उन्हीं के बवंडर में मैं घिरा था। और उत्तर? उत्तर कोई हाथ लगा नहीं। सारी बीमारियां खो गईं। और औषधि? औषधि कुछ हाथ लगी नहीं। मैं खुद ही खो गया। पूछने वाला न बचा। पूछने को कुछ न बचा। सब गंवा चुका हूं।
तो उस आदमी ने पूछा, फिर आप इतने प्रसन्न क्यों मालूम हो रहे हैं? इतने आनंदित क्यों मालूम हो रहे हैं? फिर आपके चेहरे पर यह प्रसाद कैसा? और आपकी आंखों में यह शांति कैसी? और आपके आस-पास की हवा में यह सुवास कैसी? यह आलोक कैसा? यह आभामंडल कैसा?
बुद्ध ने कहा, इसीलिए क्योंकि अब मैं नहीं हूं। सब रोग मैं के कारण थे। मेरे आस-पास की हवा विषाक्त थी मेरे मैं के कारण। जहर की गांठ ही कट गई। जहर की जड़ ही कट गई। अब मैं नहीं हूं; अस्तित्व है। जैसे बूंद सागर में खो जाए, तो मिला क्या बूंद को? खो गया जरूर कुछ--बूंद होना खो गया। मिला क्या? सीमाएं खो गईं। नदी सागर में उतर गई। तट खो गए। मिला क्या?
एक तरफ से देखो तो बुद्ध ठीक कहते हैं कि सब खो गया, मिला कुछ भी नहीं। और दूसरी तरफ से देखो तो यह भी कहा जा सकता है कि पहले कुछ भी नहीं था; सिर्फ कल्पना-जाल थे; झूठी धारणाएं थीं; वे सब चली गईं। मिला सब कुछ, मिला पूरा अस्तित्व। या तो कहो बूंद बूंद न रही, सब खो गया। और या कहो कि बूंद सागर हो गई। दो ही ढंग हैं कहने के। बुद्ध ने शून्य कहना पसंद किया। वह उनकी मौज। कबीर ने पूर्ण कहना पसंद किया। वह कबीर की मौज। मैं दोनों से राजी हूं।
तुमने सुनी होगी न यह बात कि गिलास आधा पानी से भरा हो। कोई कहे, आधा खाली; कोई कहे, आधा भरा। मैं दोनों से राजी हूं। मैं कहता हूं, गिलास आधा खाली है, आधा भरा है। आधा खाली है इसीलिए तो आधा भरा है। आधा भरा है इसीलिए तो आधा खाली है।
जहां शून्य है, वहां पूर्ण है। जहां कुछ भी नहीं बचता, वहां सब कुछ बरस उठता है।


*तीसरा प्रश्न: भगवान! आपने क्या कर दिया है? मैं ऐसा आनंदित तो कभी भी न था। शायद इसे ही लोग आपका सम्मोहन कहते हैं!

कृष्णदास! मैं कुछ भी नहीं करता हूं। कर्ता तो जा चुका; बहुत देर हो गई। मेरे भीतर कोई कर्ता नहीं है। मैं कुछ करता नहीं। और तुम्हें भी यही सिखाता हूं कि तुम भी कर्ता को जाने दो। मैं अकर्ता हूं, तुम भी अकर्ता हो जाओ। इधर एक शून्य है, उधर तुम भी शून्य हो जाओ। और जहां दो शून्य होते हैं, वहां दो नहीं रह जाते। दो शून्य एक ही शून्य हो जाते हैं। शून्य दो हों, कि तीन हों, कि हजार हों, मिल कर एक ही शून्य बनता है।
कृष्णदास, इधर मैं शून्य हूं, उधर तुम शून्य हो रहे, इससे आनंद घटित हो रहा है। इसलिए जो मुझ में आंदोलित है, उसकी तरंगें तुम्हारे तटों को भी छूने लगी हैं। इसलिए तुम पर भी बूंदाबादी होने लगी है। इसलिए तुम भी राजी हो गए हो कि मेरा शून्य-मेघ तुम पर बरसे।
बुद्ध ने समाधि को एक नाम दिया: मेघ-समाधि। कहा है कि सदगुरु ऐसा है जैसा जल से भरा हुआ मेघ। और शिष्य ऐसा है जैसे प्यासी धरती। धरती की प्यास और भरा हुआ मेघ, और दोनों का मिलन हो जाए। तो न तो मेघ को कुछ करना पड़ता, न पृथ्वी को कुछ करना पड़ता। लेकिन कुछ होता जरूर है। कुछ अनूठा होता है।
वह अनूठा हो रहा है। मगर ऐसा मत सोचना कि मैंने कुछ कर दिया।
हम कर्म की धारणा के ऊपर नहीं उठ पाते। हमारे मन में यह बात बनी ही रहती है कि कुछ होगा, तो बिना किए कैसे हो सकता है! हमारी कर्ता की धारणा इतनी रूढ़ हो गई है कि हम कोई न कोई कारण खोजते हैं कि हुआ है, तो किसी न किसी कारण से हुआ होगा। अकारण तो कोई चीज हम मान ही नहीं सकते कि होती है।
और यह सारा अस्तित्व अकारण है। यह सारा अस्तित्व बस है। चूंकि हम नहीं मान सकते, इसलिए हमको ईश्वर गढ़ना पड़ता है। ईश्वर यानी कर्ता। ईश्वर यानी स्रष्टा। हम यह नहीं मान सकते कि फूल अपने से खिल रहे हैं; कोई खिलाने वाला चाहिए। हम नहीं मान सकते कि वृक्ष अपने से बड़े हो रहे हैं; कोई बड़ा करने वाला चाहिए।
तुम परमात्मा को कितना काम सौंप रहे हो! एक-एक वृक्ष को खींचे और बड़ा करे! एक-एक फूल को रंगे! एक-एक तितली के पंखों पर रंग भरे!
हम मान नहीं सकते कि बिना किए कुछ हो सकता है। हमारा अज्ञान ऐसा गहरा है। करेंगे, तो ही होगा! तो हम हर जगह कर्ता की धारणा को थोप लेते हैं। किसी न किसी ने किया होगा। कोई न कोई जरूर इसके पीछे होगा। अपने आप कैसे हो सकता है?
और मैं तुम्हें यही कह रहा हूं। दुनिया में दो तरह की चीजें हैं। कुछ, जो करने से होती हैं। वे दो कौड़ी की चीजें हैं। धन है, पद है, प्रतिष्ठा है; बाजार है, राजनीति है--वे करने से होती हैं। तुम कोई ऐसे ही बैठे-बैठे, एकदम से जनता आकर तुमको प्रधानमंत्री नहीं बना देगी! हाथ जोड़े-जोड़े जनता के पीछे घूमना पड़ेगा सत्तर-अस्सी साल तक। जनता के पैर दबाओ। मालिश करो। फिर पैर दबाते-दबाते, दबाते-दबाते एक दिन गरदन दबाना। लेकिन शुरू करना पैर से। एकदम गरदन दबाओगे, तो कोई हाथ नहीं रखने देगा। अंगुली पकड़ो, फिर पहुंचा पकड़ लेना। दबाना हमेशा पैर से शुरू करो। इसलिए नेता हमेशा सेवा से शुरू करता है। जिसको भी नेता होना है, पहले सेवक होना पड़ता है। समाज-सेवक!
बस समाज-सेवक को देखो कि सावधान हो जाना--कि झंडा कहीं न कहीं छिपाए होगा आगे-पीछे! थोड़ी देर में झंडा निकाल लेगा। और झंडा बिना डंडा के नहीं होता! और तुमने इतने दिन तक पैर दबवाए, तो फिर तुमसे भी पैर दबवाएगा तो फिर नाराज मत होना। दिल भर कर दबवाएगा।
पद चाहिए, तो ऐसे ही नहीं मिल जाता। आकाश से नहीं उतर आता पद। सिर्फ कहानियों में उतरता है। पुरानी कहानियों में। वह भी आजकल की कहानियों में नहीं। पुरानी कहानियों में ऐसा होता है कि किसी राजा का बेटा नहीं है। तो ज्योतिषी उससे कहते हैं कि कल सुबह गांव में जो पहला आदमी प्रवेश करे, उसको ही राजा बना दिया जाए।
वे दिन गए। न अब ज्योतिषी हैं, न अब राजा हैं, न अब गांव पर कोई द्वार-दरवाजे हैं कि पता लगा सको कि कहां से कौन आदमी पहले प्रवेश किया! और अकेले-दुकेले आदमी तो प्रवेश कर भी नहीं रहे हैं। बसों में आ रहे हैं; ट्रेनों में आ रहे हैं। कैसे तय करोगे--कौन पहले, कौन पीछे! और वे सिर्फ कहानियों की बातें हैं।
अगर तुम्हें पद चाहिए, तो बड़ी दौड़-धूप करनी पड़ेगी। और धन चाहिए, तो वह खयाल छोड़ देना कि जब परमात्मा देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। छप्पर फाड़ देता है; देता-वेता कुछ नहीं। छप्पर तो कई के फटते देखे, बाकी और कुछ गिरता-करता नहीं। खुद अपने ही खपड़े गिर जाएं और सिर तोड़ दें, बात अलग। वे बातें छोड़ो, वैसा कुछ होता नहीं। वे सिर्फ कहानियां हैं, मन लुभावनी। आदमी ऐसा चाहता है कि हो, इसलिए ऐसी कहानियां गढ़ता है। आदमी ऐसा चाहता है कि किसी दिन गांव में प्रवेश करूं और गांव कहे कि आइए महाराज! सिंहासन पर विराजिए! कि एक दिन छप्पर खुले एकदम और आकाश से एकदम अशर्फियां बरसें! ऐसा सभी लोग सोचते हैं कि चले जा रहे हैं रास्ते के किनारे, और मिल गई एक बसनी, भरी हैं सोने की अशर्फियां! ये कल्पना-जाल हैं। ये सारी चीजें तो कुछ करने से मिलती हैं। इनके पीछे कर्ता चाहिए; खूब सघन अहंकार चाहिए।
लेकिन कुछ चीजें जगत में हैं, जो बिना किए घटती हैं। और वही असली मूल्यवान हैं। जो चीजें तुम्हारे करने से घटती हैं, उनकी कीमत होती है, मूल्य नहीं होता। कीमत और मूल्य पर्यायवाची शब्द नहीं हैं। कीमत यानी प्राइस; मूल्य यानी वेल्यू। कीमत होती है उन चीजों की, जिनको हम करते हैं। और मूल्य होता है उन चीजों का, जो हमारे बिना किए घटित होती हैं।
अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।।
वे धन और पद के संबंध में नहीं कह रहे हैं। अगर मलूकदास की बात चरणसिंह मान लें, तो मामला गया! फिर कभी चेयरसिंह नहीं हो सकेंगे! चरणसिंह ही रह जाएंगे। कहां चरण और कहां चेयर, जरा सोचो भी तो! चरण से चले और चेयर पर पहुंचे! दास मलूका की बिलकुल नहीं मानी होगी। दास मलूका कितना ही कहते रहे, ध्यान ही नहीं दिया होगा, कान ही नहीं दिया होगा--कि हे मलूकदास! तुम चुप रहो। अभी न बोलो।
लेकिन दास मलूका कुछ और ही बात कह रहे हैं। वे इस काम-धंधे की दुनिया की बात नहीं कर रहे हैं। वे मूल्यों की बात कर रहे हैं--ध्यान, प्रेम, आनंद। ये सारी की सारी घटनाएं आकाश से उतरती हैं, अज्ञात से उतरती हैं। इन्हें पाने के लिए तुम्हें सक्रिय चेष्टा नहीं करनी पड़ती, तुम्हें निष्क्रिय ग्राहक होना पड़ता है। इनके लिए तुम्हें स्त्रैण होना पड़ता है, पुरुष नहीं। तुम्हें अपने भीतर गर्भ निर्मित करना होता है। उस गर्भ-निर्माण की प्रक्रिया को ही मैं संन्यास कहता हूं।
तुम कहते हो: "आपने क्या कर दिया है?'
मैंने कुछ नहीं किया। और तुम्हारा कहना ठीक है, क्योंकि तुमने भी कुछ नहीं किया है। इसलिए तुम अब और किस पर दोष दो! तुमने कुछ किया नहीं, और जादू हो गया है--तो अब तुम दोष किसको दो!
मेरी पुरानी गाड़ी बिकी; नई गाड़ी आ गई। तो बलजीत, जो मुझे नई-पुरानी गाड़ियां लाता ले जाता है, उसने जिसको वह गाड़ी बेची, वह पंद्रह साल से विवाहित है दंपति, लेकिन बच्चे पैदा नहीं हुए। गाड़ी क्या खरीदी, स्त्री गर्भवती हो गई! फूलमालाएं और मिठाइयां और भेंटें लेकर वे लोग बलजीत के पास पहुंच गए। बलजीत बेचारा घबड़ाया। सीधा-सादा सरदार! उसने कहा, इसमें अपना कोई हाथ नहीं! उसने कहा, होगा भगवान का। उसने कहा, भैया, तुम अगर सच्ची बात जानना चाहो, तो यह गाड़ी उनकी है, यह उस दरवाजे पर रही है। ये भेंट इत्यादि तुम उन्हीं को चढ़ाओ।
फिर अब तो बच्चे भी हो गए। और एक झंझट हो गई। एक नहीं बच्चा--दो बच्चे पैदा हुए! तब तो बात बिलकुल पक्की ही है कि हाथ कुछ बड़ा है पीछे! चौदह-पंद्रह साल से एक नहीं हो रहा था, अब छप्पर फाड़ कर एकदम दो हो गए! अब बलजीत मुझे खबर किया है कि वे आते ही हैं आज नहीं कल में यहां!
मेरा भी कोई हाथ नहीं है। यह दोष मैं भी नहीं ले सकता। और बेचारी गाड़ी का तो क्या कसूर होगा! इसमें कोई दोषी नहीं है। यह घटना जरूर घटी है। और हमारा तर्क यह कहता है कि जरूर कोई न कोई जिम्मेवार होना चाहिए। कहीं न कहीं जब तक हम जिम्मेवार आदमी को न पा लें, तब तक हमारे मन में खुजलाहट रहेगी, खुजली चलती रहेगी, कि हुआ कैसे? आखिर पंद्रह साल से क्यों नहीं हुआ? अचानक कैसे हुआ?
ठीक ऐसी ही हालत तुम्हारी है कृष्णदास। तुम कहते हो: "आपने क्या कर दिया?'
भैया, मुझे माफ करो! मैंने कुछ किया नहीं। एक बेटा पैदा हो कि दो बेटे पैदा हों--मेरा कोई हाथ नहीं।
और तुम कहते हो: "मैं ऐसा आनंदित तो कभी भी न था!'
सो तुम ठीक ही कहते होओगे। लेकिन मैं जानता हूं कि प्रश्न उठने शुरू होते हैं कि फिर यह हुआ कैसे? अभी तक तो नहीं हुआ था। आज अचानक हुआ, यहां आकर हुआ। तो जरूर किसी ने किया होगा!
करने की धारणा को छोड़ो। हुआ जरूर है, यह बात पक्की है। अगर करने की धारणा रखोगे, तो वही भ्रांति पैदा होगी जो तुम कहते हो: शायद इसीलिए लोग कहते हैं कि आप सम्मोहित करते हैं। करने की धारणा अगर रही, तो फिर जरूर--सम्मोहित कर लिए गए, वशीकरण कर लिया गया; मैंने कोई जादू-टोना कर दिया; कि तुम्हें कुछ मूर्च्छित कर दिया; कि तुम्हें कुछ भ्रांतियां पकड़ा दीं; कि तुम्हें पागल बना दिया!
लोगों को तो यह भी डर है...। किसी ने मुझे कहा कि वे यहां आते नहीं। खबर भेजी है कि उन्हें कहा गया है कि आश्रम में तो जाना ही मत। और अगर कभी जाओ भी, तो वहां कोई चीज खाना-पीना मत। क्योंकि वहां खाने-पीने की चीजों में मादक द्रव्य मिले हुए हैं। जो लोग खा-पी लेते हैं, बस वे गए काम से! पानी मत पीना वहां का। क्योंकि उसमें एल एस डी, कि मारिजुआना, कि हशीश, कि अफीम, पता नहीं क्या मिला हो! क्योंकि वहां जो भी जाता है, मस्त होकर लौटता है। ऐसी मस्ती तो अफीमचियों में देखी जाती है--कि भंगेड़ी, कि गंजेड़ी! इस तरह की मस्ती भले आदमियों में कहीं देखी जाती है! कि रखते हैं पैर कहीं और पड़ता है पैर कहीं!
लोगों का भी तर्क वही है, कृष्णदास। वे भी यह सोचते हैं कि कुछ न कुछ किया जा रहा होगा। नहीं तो इतने लोग कैसे बंधे चले जाते हैं! जब कि सारी दुनिया विरोध कर रही हो, जब कि जगह-जगह मुझे गालियां पड़ रही हों, तब भी कुछ दीवाने हैं कि फिक्र ही नहीं करते। लाज-संकोच भी होता है आदमी को। फिर भी चले आते हैं! तो जरूर कुछ रस लग गया है। कुछ बात ऐसी है कि तलफ सताती है। कुछ लत पकड़ गई है।
नहीं कृष्णदास, न कोई सम्मोहन है, न कोई अफीम है, न कोई गांजा है, न कोई भांग है। इधर मैं आनंदित हूं। काश तुम इतना ही कर सको कि तुम भी शांत मेरे पास बैठ सको, तो निश्चित आनंदित हो जाओगे। आनंद बहुत संक्रामक है। आनंद से ज्यादा संक्रामक तत्व इस जगत में दूसरा नहीं है। और तुमने कई बार अनुभव किया होगा। किसी नर्तक को नाचते देखा है, और बैठे-बैठे तुम्हारे पैरों में पुलक नहीं हो आती! तुम बैठे-बैठे ही कुर्सी पर पैरों से ताल नहीं देने लगते! तब तुमने देखा क्या हो रहा है? नर्तक ने तुमसे कहा नहीं कि नाचो। नर्तक नाच रहा है, तुम्हारे पैर क्यों ताल देने लगे? गायक गा रहा है, कि मृदंग कोई बजा रहा है, कि सितार किसी ने छेड़ी है, कि तबले पर कोई ताल दे रहा है--और तुम भी हाथ से ताल देने लगे कुर्सी पर। तुम्हें क्या हो गया है?
पश्चिम के बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव जुंग ने एक नये सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उस सिद्धांत को वह कहता था सिंक्रानिसिटी। विज्ञान का एक सिद्धांत है: कार्य-कारण, कॉजेलिटी। कि हर चीज का कारण होता है, बिना कारण के कोई चीज नहीं होती। जुंग ने कहा कि कुछ चीजें बिना कारण के होती हैं, उनके लिए हमें एक नया सिद्धांत खोजना चाहिए। उसको उसने सिंक्रानिसिटी कहा--एक लयबद्धता।
अब जैसे कोई नाच रहा है, तो सभी देखने वालों के पैर थाप नहीं देते। अगर सभी के पैर थाप दें, तो यह कार्य-कारण का सिद्धांत हुआ। कोई बच ही नहीं सकता; पैर में थाप देनी ही पड़ती। जैसे सौ डिग्री तक पानी गरम किया, भाप बनेगा ही बनेगा। फिर तिब्बत में गरम करो, कि चीन में, कि भारत में, कि पाकिस्तान में। फिर पानी यह नहीं कह सकता कि यह पाकिस्तान है, यह पवित्र भूमि है। पाकिस्तान यानी पवित्र भूमि।
तुमको बहुत दिन से भ्रम था कि भारत है पवित्र भूमि। जिन्ना ने तोड़ दिया। उसने कहा, क्या तुम बकवास लगा रखे हो! पाकिस्तान पवित्र भूमि! नाम ही रख दिया देश का पवित्र-भूमि, अब और क्या करोगे! छोड़ो बकवास--पुण्य पावन भूमि भारत देश! पाकिस्तान में कुछ जल्दी पानी गरम नहीं हो जाएगा, कि अट्ठानबे डिग्री पर हो जाए। कायदे-आजम जिन्ना की इतनी भी फिक्र नहीं करेगा पानी। और न ही भारत में--कि इतने ऋषि-मुनि हो गए; कि कुछ तो खयाल करो, कुछ तो लाज रखो! बुद्ध, महावीर, कृष्ण, कबीर, नानक--हजारों ज्योतिर्मय पुरुषों की परंपरा है। जरा कुछ तो खयाल रखो! जब तिब्बत में भी सौ डिग्री पर गरम होते हो, तो यहां तो पंचानबे डिग्री पर हो जाओ। कुछ तो दया-भाव रखो! लेकिन नहीं, पानी सौ डिग्री पर ही गरम होता है, कहीं भी गरम करो। सौ डिग्री पर ही भाप बनता है। यह कार्य-कारण का सिद्धांत है। इसमें कोई अपवाद नहीं होता।
लेकिन नर्तक नाचे, कत्थक चलता हो, तो सभी के पैर नहीं थाप देते। किसी का देता है पैर थाप, किसी का नहीं देता। कोई तो ऊबा सा दिखाई पड़ता है कि कब निकल भागें! कोई सोचता है: यह भी क्या बकवास हो रही है! तात्ता थई-थई, तात्ता थई-थई--यह क्या मचा रखा है!
इसको जुंग ने कहा सिंक्रानिसिटी। जो व्यक्ति भी तालमेल में आबद्ध हो जाता है, तो कुछ, किसी अज्ञात मार्ग से संक्रमित होता है। नर्तक से नर्तन दर्शक तक पहुंच जाता है। दर्शक के हृदय को आंदोलित कर देता है। गायक का गीत तुम्हें रोमांचित कर देता है।
ठीक ऐसी ही घटना सत्संग में घटती है। वह परम गीत है, परम नृत्य है, परम संगीत है।
अगर तुम कृष्णदास, मौन होकर यहां बैठ सको, तो बस काफी है। न मुझे कुछ करना पड़ेगा, न तुम्हें कुछ करना पड़ेगा--और कुछ होगा। और जब कोई चीज होती है बिना किसी के किए, तो उसमें मूल्य होता है। उसकी कीमत नहीं होती। उसको खरीदा नहीं जा सकता, बेचा नहीं जा सकता। उसका कोई बाजार-भाव नहीं। वह बाजार की वस्तु नहीं। और जहां कोई ऐसी चीज घटती हो, जो न तुमने की, न मैंने की--जिसको किसी ने भी नहीं किया; जो घटी अपने से, स्वस्फूर्त--वहीं समझना मंदिर है। जहां मूल्य बरसते हैं, वहीं मंदिर है।
फागुन को है खुद अब तक हैरानी
जाने तुमको क्या सूझी शैतानी
यह भी कोई वर्षा का मौसम था--
तुमने पलकों में सावन घोल दिया।

जैसेत्तैसे पथ की बाधाओं से
बच कर आया मंदिर के द्वारे पर,
लेकिन आंगन ने ठुकराया मुझको
दुश्मन दुनिया के एक इशारे पर,
जीवन कोलाहल से भर डाला है
तुमने बिन सोचे क्या कर डाला है
दुख के पग में बेड़ी पहनानी थी--
उलटे हाथों का बंधन खोल दिया।

जी में आता सूरज की आंखों में
भोले-भोले से दो आंसू भर दूं,
मन करता है चंदा के पांव लगूं
माथे पर मन का राज-मुकुट धर दूं,
जाने बुन कैसा जाल दिया तुमने
मुझको मुश्किल में डाल दिया तुमने
तुमको दुनिया का कर्ज चुकाना था
बदले में मेरा जीवन तौल दिया!

सुख तो कोई दुर्लभ-सी वस्तु नहीं
जब चाहो आदर के बदले ले लो,
दुनिया को अपनी पावनता दे दो
फिर चाहो जिस सिंहासन से खेलो,
जीवन आंधी बन कर झकझोर दिया
मुझको तुमने काजल में बोर दिया
मैंने तुमको बेमौसम फूल दिए--
तुमने जाकर पतझर को बोल दिया।
मेरी आंखों में सावन घोल दिया।

फागुन को है खुद अब तक हैरानी
जाने तुमको क्या सूझी शैतानी
यह भी कोई वर्षा का मौसम था--
तुमने  पलकों  में  सावन  घोल  दिया।
कृष्णदास, तुम्हारी पलकों में सावन उतर रहा है; तुम्हारी पलकों में फूल उतर रहे हैं। तुम्हारे जाम में फूल ही फूल तैर जाएंगे। लेकिन कृत्य की भाषा भूल जाओ। न तुम कुछ कर रहे, न मैं कुछ कर रहा हूं। हां, कुछ हो रहा है जरूर। हो रहा है खूब। हो रहा है भरपूर। यही तो रहस्य है सत्संग का। यही तो राज है। नहीं कोई कुछ करता, और जो होने योग्य है, हो जाता है। जीवन बदलते हैं, रूपांतरित होते हैं, क्रांतियां घट जाती हैं। और ऐसी ही क्रांतियों का मूल्य है। जो करने से होती है क्रांति--दो कौड़ी की। जो बिन किए हो जाती है!
अगर मैं कुछ करूं, तो तुम पर मुझे जबरदस्ती करनी पड़ेगी। फिर मुझे तुम्हें आचरण देना पड़ेगा; अनुशासन देना पड़ेगा; जीवन को जीने की एक शैली देनी पड़ेगी। फिर मैं तुम्हारा मालिक हो जाऊंगा, तुम मेरे गुलाम हो जाओगे। फिर तुम कारागृह के कैदी हो जाओगे। मुझे तुम्हारे हाथों में जंजीरें डालनी पड़ेंगी, तुम्हारे गले में बंधन डालने पड़ेंगे। मुझे तुम्हारी मुक्ति छीन लेनी होगी।
शायद तुम थोड़े ज्यादा शांत हो जाओ। शायद तुम थोड़े कम चिंतित रहो। शायद तुम ज्यादा थिर हो जाओ। मगर वह थिरता बड़ी महंगी होगी। स्वतंत्रता के मूल्य पर जो मिले, उस थिरता की कोई कीमत नहीं। और बेड़ियां पहन कर अगर थोड़ी शांति भी मिल जाए, तो वह शांति वरणीय नहीं है।
मैं तुम्हें आचरण नहीं देता, क्योंकि सब दिए गए आचरण बंधन बन जाते हैं। मैं तुम्हें अनुशासन नहीं देता, क्योंकि सब दिए गए अनुशासन, सदियों-सदियों में, कैदी पैदा किए हैं; मनुष्य को मार डाला है। मैं तुम्हें स्वतंत्रता देता हूं। मैं तुम्हें सत्संग देता हूं, बस। मैं तुम्हें अपने साथ होने का आमंत्रण देता हूं, बस। मेरे साथ डोलो। मेरी आंखों में झांको। मेरे सामीप्य में डूबो। मुझे पीयो। और तुम्हारी स्वतंत्रता अछूती रहे--अस्पर्शित। मैं तुम्हें कोई शैली कभी न दूं। तुम्हारी जीवन-शैली तुम्हारी ही चेतना से जन्मे; और तुम्हारा आचरण तुम्हारे अंतःकरण से प्रकट हो। तुम्हारा बोध ही तुम्हारे जीवन में दिशा-सूचक बने, मैं तुम्हें कोई दिशा न दूं। तो ही यह क्षेत्र बुद्ध-क्षेत्र होगा। अन्यथा यह भी एक नया कारागृह होगा।
कारागृह तो बहुत हैं दुनिया में; और एक नया कारागृह बनाने की क्या जरूरत है! आचरण देने वाले, चरित्र देने वाले, व्रत-नियम-उपवास देने वाले तो बहुत हैं दुनिया में। उस भीड़ में मैं खड़ा नहीं हो जाना चाहता। मैं उस भीड़ से पृथक हूं। और मैं भी तुम्हें किसी भीड़ का हिस्सा नहीं बनाना चाहता। मैं तुम्हें व्यक्तित्व देना चाहता हूं--ऐसा व्यक्तित्व, जो अपने भीतर से जीता है, जो अपने प्रकाश से चलता है, जो अपने बोध के अतिरिक्त और किसी बोध को स्वीकार नहीं करता।
और मैं जानता हूं, आश्वस्त हूं, कि तुम्हारा बोध जगेगा, तो वह वही होगा जो कृष्ण का था, वही होगा जो बुद्ध का था, वही होगा जो जीसस का था, वही होगा जो मेरा है। क्योंकि बोध और बोध में भिन्नता नहीं होती। प्रकाश और प्रकाश में भेद नहीं होता। दीयों में भेद हो सकता है, ज्योति में क्या भेद हो सकता है!
यह कोई सम्मोहन नहीं है; कोई जादू नहीं है। और फिर भी जादू है। जादू है इस अर्थों में कि मैं कुछ कर नहीं रहा, तुम कुछ कर नहीं रहे--और कुछ हो रहा है। तुम किसी को समझाओगे, समझा न पाओगे। व्याख्या देना चाहोगे, दे न पाओगे। कुछ अव्याख्य घटित हो रहा है। जहां यह अव्याख्य घटित होता है, संक्रमित होता है, वहीं तीर्थ निर्मित होते हैं। वहीं है काबा; वहीं है काशी; वहीं है कैलाश।
तुम धन्यभागी हो कि एक नये बनते काबा में तुम्हारा सहयोग है! एक नई बनती काशी में तुम्हारे भी हाथ के चिह्न होंगे! इस उठते कैलाश में एक शिलाखंड तुम्हारा भी है! अपने को बड़भागी जानना। अपने को धन्यभागी जानना। और परमात्मा को जितना धन्यवाद दे सको इसके लिए, मानना कि थोड़ा है।

आज इतना ही।