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शनिवार, 13 मई 2017

नहीं राम बिन ठांव-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-10

नहीं राम बिन ठांव-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रवचन-दसवां    
दिनांक 03 जून सन् 1974
ओशो आश्रम, पूना।

माया मिली न राम
मन डांवाडोल रहे, तो ही जी सकता है; संतुलित हो जाए, मन खो जाता है।
जहां मन खोता है, वहीं समाधि है।

प्रश्न:
भगवान, बच्चों की बुद्धि का प्रशिक्षण आपने अनिवार्य बताया।
लेकिन क्या ध्यान का प्रशिक्षण भी युगपत देना चाहिए?
बहुत से संन्यासी परिवार वाले हैं।
उनको अपने बच्चों के प्रति कौन-सी दृष्टि रखनी चाहिए?
जोर किस बात पर होना चाहिए, इस पर कृपया प्रकाश डालिए।


जीवन में जितना संतुलन हो, उतनी ही संभावना शुभ की बढ़ती जाती है। जितना असंतुलन हो, उतने ही दुख का उपाय हो जाता है। गहरे देखने पर असंतुलन ही दुख है, संतुलन सुख। और संतुलन सबसे बड़ी कला है, इसलिए हमने इस देश में संतुलन को संयम कहा है।
संयम का अर्थ है: ठीक दो विरोधों के बीच में स्थित हो जाना, दो अतियों के बीच में मध्य को खोज लेना। मन की आदत अति की तरफ जाने की है, एक्सट्रीम की तरफ जाने की है। मन हमेशा एक कोने से दूसरे कोने पर जाना चाहता है, बीच में नहीं रुकना चाहता।
अगर आप हिंसक हैं, तो मन आपसे पूरी हिंसा करवाएगा; और जब आप हिंसा से ऊबेंगे, तो आपको विपरीत दिशा में अति पर ले जाएगा। हिंसा की एक अति है, दूसरे को मिटाना। और हिंसा की दूसरी अति होगी, स्वयं को मिटाने में लग जाना। दूसरे को मारते थे, फिर खुद को मारने लगे, लेकिन बीच में न रुकेंगे।
बुद्ध ने कहा है, भोगी जब भी कभी भोग से ऊब जाता है, तो तत्क्षण योगी हो जाता है। पहले अगर शरीर के सुखों के लिए पागल था, तो अब शरीर को दुख देने के लिए आतुर हो जाता है। पहले अगर चलता था, तो रास्तों पर फूल चाहता था, अब अपने हाथ से कांटे बिछा लेता है। पहले अगर स्वाद में रुचि थी, तो अब भोजन को जब तक बेस्वाद न कर ले, तब तक नहीं करता है। पहले अगर वस्तुओं से प्रेम था, तो अब नग्न खड़ा हो जाता है।
मन एक अति से दूसरी अति पर जाता है, जैसे घड़ी का पेंडुलम एक कोने से दूसरे कोने पर जाता है, बीच में नहीं रुकता। बीच में रुक जाए, तो घड़ी रुक जाए। एक कोने से दूसरे कोने पर जाने में ही घड़ी की गति है, घड़ी चलती है। और जब घड़ी का पेंडुलम बाएं तरफ जाता है, तब आपको दिखाई पड़ता है कि बाएं तरफ जा रहा है; लेकिन जो गहरा देख सकते हैं, उनको यह भी दिखाई पड़ता है कि बाएं तरफ जाने में घड़ी का पेंडुलम दाएं तरफ जाने की शक्ति इकट्ठी कर रहा है, मूमेंटम इकट्ठा हो रहा है। जब बाएं जा रहा है पेंडुलम तो दाएं तरफ जाने के लिए तैयार हो रहा है। और जितना बाएं जाएगा, उतनी ही छलांग फिर दाएं की तरफ भर सकेगा। जब दाएं जाएगा तब बाएं तरफ जाने की शक्ति इकट्ठी करेगा।
यह सूत्र बहुत समझ लेने जैसा है, क्योंकि जब भी तुम प्रेम की तरफ जाते हो, तुम घृणा की शक्ति इकट्ठी करते हो। जब तुम भोग की तरफ जाते हो, तब तुम योग की शक्ति इकट्ठी करते हो। और जब तुम्हारा मन चोरी की तरफ जाता है, तब दूसरे कोने पर तुम अचोर होने की तैयारी भी शुरू कर देते हो। जब तुम दान देते हो, तभी तुम शोषण के लिए भी तत्पर हो जाते हो। जो गहरे देखेगा, उसे दिखाई पड़ेगा कि मन चूंकि सदा विपरीत में डोलता है, एक अति से दूसरी अति, यह स्वाभाविक है।
और जब तक मन डोल रहा है, तब तक तुम दुख में रहोगे। तुम्हारे दुख बदल जाएंगे। भोगी का दुख है, त्यागी का भी दुख है। भोगी को नहीं दिखाई पड़ता कि त्यागी का दुख क्या है, क्योंकि भोगी को तो त्यागी में सुख ही सुख दिखाई पड़ता है। त्यागी को दिखाई पड़ता है कि भोगी के क्या सुख हो सकते हैं।
मेरे पास संन्यासी भी आते हैं, संसारी भी आते हैं। संसारी सदा लोलुप नजरों से देखता है संन्यासी की तरफ कि किस आनंद में जी रहा है! संन्यासियों को मैं जानता हूं, जो तीस, चालीस, पचास वर्ष से संन्यास में रहे हैं, जिन्होंने सब छोड़ दिया है। उनके दुख का तुम्हें पता नहीं, उनके मन में तुम्हारे प्रतिर् ईष्या है। वे सोचते हैं, संसारी बड़ा मजा ले रहे हैं, बड़ा भोग कर रहे हैं।
एक वृद्ध संन्यासी ने मुझे कहा--जिनकी उम्र कोई सत्तर वर्ष है--कि पचास साल पहले उन्होंने दीक्षा ली, सब छोड़कर संन्यासी हो गए। अब किसी से कह भी नहीं सकते कि पचास साल से एक ही बात मन में बनी रही है कि कहीं भूल तो नहीं कर दी, कहीं ऐसा तो नहीं है कि संसार को बिना जाने ही मैं छोड़ आया, और वहां सुख हो। और यहां कोई सुख मिला नहीं। निकले थे परमात्मा को खोजने, संसार तो छूट गया हाथ से, परमात्मा की कोई पग-ध्वनि सुनाई नहीं पड़ती है।
इस संन्यासी का दुख तुम न समझ पाओगे। इसने किसी आशा में छोड़ा था, वह आशा पूरी नहीं हुई। इसने कोई सौदा किया था। जो हाथ में था, वह चला गया; और जो आने वाला था, वह अब तक आया नहीं। अब जीवन चुक रहा है, सत्तर वर्ष उम्र हुई। और अब ऐसा लगता है कि दोनों तरफ से गए। न संसार मिला, न संन्यास मिला। माया मिली न राम--वैसी गूंज इस संन्यासी के मन में गूंजना स्वाभाविक है।
यह मन का स्वभाव है कि तुम जहां हो, वहां दुख देखता है; और तुम जहां नहीं हो, वहां सुख देखता है। झोपड़े में रहने वाले को दिखाई पड़ता है महलों में सुख है, लेकिन महलों में रहने वालों ने कहा है कि महल जब तक न छोड़ा तब तक उन्हें सुख न मिला।
बुद्ध और महावीर राजपुत्र हैं। वे महल छोड़ते हैं, त्यागते हैं। निश्चित ही उन्हें झोपड़े में कुछ दिखाई पड़ रहा होगा, जो झोपड़े में रहने वाले को नहीं दिखाई पड़ता है। विपरीत अति निमंत्रण देती है। और विपरीत अति पर जाने का अर्थ है कि मन डोलता रहेगा, मन की घड़ी चलती रहेगी।
बहुत लोगों के पिछले जीवन में झांकने के बाद एक अनूठा सूत्र मुझे समझ में आया और वह यह कि जो लोग पिछले जन्म में संन्यासी रहे हैं, वे इस जन्म में परम भोगी हो जाते हैं। और जो लोग पिछले जन्म में भ्रष्ट भोगी थे, इस जन्म में संन्यासी हो जाते हैं। तब बड़ी हैरानी मालूम पड़ती है। होना तो उलटा चाहिए तार्किक दृष्टि से। अगर पिछले जन्म में आप संन्यासी थे, तो उसी शृंखला में आपको और बड़ा संन्यासी इस जन्म में होना चाहिए। यह तो तर्क सीधा है, गणित है। लेकिन हालत उलटी है। जब भी मैं देखता हूं किसी महाभोगी को और उसके पिछले जन्म में झांकता हूं, तो लगता है, पिछले जन्म में वह त्यागी रह चुका है। उसका मन एक अति को छू चुका, अब इस जन्म में दूसरी अति को छू रहा है।
साधारणतः ऐसा होना चाहिए कि जो आदमी पिछले जन्म में पुरुष था, वह इस जन्म में भी पुरुष हो, जो स्त्री थी, वह स्त्री हो। लेकिन ऐसा होता नहीं। अक्सर ऐसा होता है कि पिछले जन्म में जो पुरुष था, वह इस जन्म में स्त्री हो जाता है। और इस जन्म में जो स्त्री है, वह पिछले जन्म में पुरुष थी।
अगर आप पिछले जन्म में स्त्री थे, तो आपके मन में यह सुख की आशा बनी ही रही है कि सुख तो पुरुष भोग रहे हैं, स्त्रियां तो सिर्फ दुख भोग रही हैं। इसलिए आप पुरुष होने की आकांक्षा को अर्जित कर रहे हैं। लेकिन पुरुष भी गहरे में आपके प्रतिर् ईष्या से भरा है, कहे या न कहे। स्त्रियां कह देती हैं, ज्यादा साफ-सुथरा है उनका हिसाब, कि वे नहीं चाहतीं कि स्त्री हों, परमात्मा करे कि वे पुरुष हो जाएं। पुरुष ऐसा नहीं कह सकता, नहीं तो लोग हंसेंगे। क्योंकि यह पुरुषों का समाज है।
लेकिन पुरुष भी गहरे में स्त्री के प्रतिर् ईष्या से भरा है। न तो वैसा सौंदर्य है उसके पास, न वैसा सुघड़ शरीर है उसके पास, और न वैसे सुख को भोगने की क्षमता उसे मालूम पड़ती है, जैसा स्त्री के पास है। स्त्री कम असंतुष्ट होती है, पुरुष ज्यादा असंतुष्ट होता है। स्त्री को थोड़ा भी मिल जाए, तो राजी होती है; पुरुष को कितना भी मिल जाए, तो राजी नहीं होता। स्त्री की मांग बहुत बड़ी नहीं है, उसका छोटा-सा घर, उसका छोटा-सा आंगन उसका राज्य बन जाता है। पुरुष की मांग इतनी विराट है कि सिकंदर जैसा साम्राज्य भी हो, तो भी आंगन पूरा नहीं होता, छोटा रह जाता है। स्त्रियां कम पागल होती हैं, पुरुष ज्यादा पागल होते हैं। स्त्रियां कम आत्मघात करती हैं, पुरुष ज्यादा आत्मघात करते हैं। स्त्रियां ज्यादा स्वस्थ रहती हैं, पुरुष ज्यादा बीमार पड़ते हैं।
यह सिर्फ पुरुषों का खयाल है कि पुरुष ज्यादा मजबूत हैं स्त्रियों से, सिर्फ खयाल है। अगर आप चिकित्सकों से पूछें, तो वे कहेंगे, स्त्रियां ज्यादा मजबूत हैं। पुरुष की मजबूती कम है, सिर्फ दिखाई पड़ती है। इसलिए दुनिया में विधवाएं ज्यादा दिखाई पड़ती हैं, विधुर कम। क्योंकि पुरुष पहले विदा हो जाते हैं। चार साल औसत उम्र ज्यादा है स्त्रियों की सारी पृथ्वी पर, पुरुषों से। अगर आप सत्तर साल जीएंगे, तो आपकी पत्नी की संभावना चौहत्तर साल जीने की है। वह कम बीमार पड़ेगी, ज्यादा स्वस्थ रहेगी। और उसके पास रेसिस्टेंस की, प्रतिरोध की बड़ी क्षमता है।
आप थोड़ा सोचें, एक पुरुष नौ महीने तक गर्भ को खींच सकता है? असंभव है। वह उसके शरीर की क्षमता नहीं। वह स्त्री की ही क्षमता है, एक नए जीवन के बोझ को नौ महीने तक खींच लेना। और नौ महीने पर भी गर्भ समाप्त कहां होता है! सिर्फ बाहर आता है। फिर बाहर खींचना शुरू होता है।
पुरुष के मन में भीर् ईष्या जगती है, कहीं गहरे अचेतन में वह स्त्री होना चाहता है। और इसलिए अक्सर जन्मों में योनि बदल जाती है। ऐसा ही जीवन के सभी पहलुओं पर है।
मन डांवाडोल रहे, तो ही जी सकता है; संतुलित हो जाए, मन खो जाता है। जहां मन खोता है, वहीं समाधि है। अब मैं आपके प्रश्न को लूं।
बच्चों को निश्चित ही तर्क में प्रशिक्षित करना है, गणित में प्रशिक्षित करना है। उनका मस्तिष्क साफ-सुथरा हो, प्रतिभाशाली हो, सक्षम हो। उनकी प्रतिभा बढ़े। बच्चों को पशुओं की भांति नहीं छोड़ देना है।
पशुओं के जीवन में कुछ है, लेकिन बहुत कुछ नहीं है। पशुओं के जीवन में एक भोलापन है, लेकिन भोलापन मूढ़ता का है, भोलापन संतत्व का नहीं। एक सरलता है, लेकिन सरलता मजबूरी की है, उपलब्धि की नहीं। पशु इसलिए सरल हैं कि चालाक नहीं हो सकते। संत इसलिए सरल नहीं है कि चालाक नहीं हो सकता है, चालाक हो सकता है, नहीं होता है। वह उसका अपना निर्णय है। और जो भी आपका अपना निर्णय है, वही आपके जीवन को आत्मा देता है। पशुओं के पास आत्मा है, लेकिन उस अर्थों में नहीं, जिस अर्थ में मनुष्य के पास आत्मा है। क्योंकि मनुष्य अपना निर्णय लेता है।
अगर आप चोर हो ही न सकें, तो आपके अचौर्य का क्या मूल्य है? अगर आप क्रोध कर ही न सकें, तो आपकी करुणा का क्या अर्थ है? विपरीत आप कर सकते हैं, फिर भी नहीं करते हैं। यह जो आपका अपना न करने का निर्णय है, यही आपकी आत्मा को निखारता है, धार देता है, तेजस्विता लाता है।
तो पशुओं जैसा भोलापन नहीं चाहिए, संतों जैसा भोलापन चाहिए।
बच्चे को प्रशिक्षित करना होगा, ताकि मनुष्य की सारी चालाकी को वह जाने। मनुष्य की सारी उपद्रव की जो दुनिया है, उससे परिचित हो, उस अनुभव से गुजरे। लेकिन अगर इतना ही किया गया, तो एक असंतुलित व्यक्तित्व पैदा होगा। तो बुद्धि तो प्रखर होगी, हृदय बिलकुल सूना होगा। गणित तो साफ होगा, प्रेम बिलकुल धुंधला होगा। मिटा तो सकेगा, लेकिन बना न सकेगा। जीत तो सकेगा, लेकिन हार न सकेगा।
और जो आदमी सिर्फ जीत सकता है, वह आदमी पूरा आदमी नहीं है। क्योंकि जीवन के कुछ आयाम हैं, जो हारे हुए को मिलते हैं। संसार तो, जो जीतता है, उसको मिलता है; परमात्मा उसको मिलता है, जो हारना भी जानता है। धन तो उसे मिलता है, जो जीतता है; प्रेम उसे मिलता है, जो हारता है। हार की भी अपनी विजय है।
लेकिन गणित और तर्क तो सिर्फ जीतना सिखाते हैं, हारना ध्यान सिखाता है। गणित और तर्क तो संसार में कैसे हम परिग्रह को बढ़ा लें, कैसे संपदा ज्यादा हो, साम्राज्य बड़ा हो, इसकी कला देते हैं। ध्यान, कैसे हमारी आत्मा का राज्य बड़ा हो, कैसे चेतना विस्तीर्ण हो जाए, सारे आकाश को छा ले, उसकी कला है।
अगर अकेला गणित और तर्क और बुद्धि ही बच्चों को सिखाई गई, तो वे बच्चे पंगु होंगे, पैरालाइज्ड होंगे, लकवा खाए हुए होंगे। जैसे उनका एक अंग तो चलता हो और दूसरा अंग न चलता हो। उनके जीवन में पूर्णता न होगी, वे समग्र न होंगे, उनका एक पैर सदा बंधा रहेगा, उनकी जिंदगी एक लंगड़ी दौड़ होगी। चूंकि और लोग भी लंगड़े हैं, इसलिए पता नहीं चलता। जैसे बच्चों का एक खेल होता है, लंगड़ी दौड़, जिसमें एक पैर दूसरे के एक पैर से बांध दिया जाता है, तो एक ही पैर से भागना पड़ता है। करीब-करीब हमारी जीवन की व्यवस्था ऐसी लंगड़ी दौड़ ही है, जिसमें हम एक पैर से भाग रहे हैं। फिर हार जाते हैं, टूट जाते हैं, मिट जाते हैं, तो आश्चर्य नहीं है।
ध्यान दूसरा चरण है। तो जैसे ही हम बच्चे को बुद्धि की शिक्षा दें, वैसे ही ध्यान की भी शिक्षा दें। जैसे-जैसे बच्चा विज्ञान को समझे, वैसे-वैसे धर्म को भी समझे। और जैसे-जैसे उसका मस्तिष्क निखरे, वैसे-वैसे उसके हृदय में भी प्रकाश आए। वह जाने ही नहीं, हो भी। उसके पास चीजें ही न बढ़ें, वह भी बढ़े। उसके बाहर का ही फैलाव न हो, भीतर की भी गहराई हो। जैसे वृक्ष उठते हैं आकाश की तरफ, लेकिन जड़ें चली जाती हैं भीतर की तरफ। और जितनी जड़ें गहरी जाती हों, उतना ही वृक्ष ऊपर आकाश की तरफ जाता है।
तुम ऐसे वृक्ष हो, जिसके पास जड़ें नहीं। तुम बस बाहर और ऊपर की तरफ जा रहे हो, भीतर और अंदर की तरफ जाने का तुम्हारे पास कोई उपाय नहीं। इसीलिए तुम प्रतिपल कंप रहे हो। जरा सा हवा का झोंका आता है कि तुम घबड़ा जाते हो; क्योंकि तुम्हारे पास जड़ें नहीं हैं।
तुम्हारे पास अगर जड़ें होतीं गहरी पाताल को छूती, तो तुम तूफानों को निमंत्रण देते। और जब तूफान आता, तब तुम्हारे आनंद का कोई ठिकाना न होता। तभी तुम्हारे उत्सव का क्षण होता, तब तुम नाचते। क्योंकि तूफान चुनौती देता है, और चुनौती की पृष्ठभूमि में ही तुम्हें अपने होने का पूरा-पूरा पता चलता है, उसके पहले पता नहीं चलता। तब तुम तूफान को धन्यवाद देते और कहते कि अक्सर आया करो।
अभी छोटा सा हवा का झोंका और तुम घबड़ाते हो कि मौत आ गई। तुम चिल्लाते हो कि हे भगवान, बचाओ। तुम भगवान को धन्यवाद नहीं देते कि तूने तूफान भेजा; तुम भगवान से कहते हो कि बचाओ; इस तूफान से छिपाओ। तुम डरे हो, क्योंकि तुम्हारे पास जड़ें नहीं। जड़ें भीतर की तरफ जाती हैं। जितनी जड़ें भीतर जाएंगी, उतना ही तुम्हारा बाहर का फैलाव सुदृढ़ हो जाएगा।
इसलिए ध्यान एक अर्थ में तो बुद्धि के विपरीत है, जैसे जड़ें एक अर्थ में वृक्ष के विपरीत हैं। वृक्ष ऊपर जाता है, जड़ें नीचे जाती हैं, दोनों की दिशा विपरीत है। इस अर्थ में ध्यान बुद्धि के विपरीत है, लेकिन एक अर्थ में जड़ों के ऊपर ही वृक्ष का सारा फैलाव खड़ा है। विपरीत नहीं हैं। ध्यान के ऊपर ही बुद्धि की सारी गरिमा निर्भर होती है।
इसलिए जो बुद्धि बुद्ध के पास है, वैसी बुद्धि आइंस्टीन के पास नहीं हो सकती। क्योंकि बुद्ध के पास बुद्धि का ऊपरी जाल ही नहीं है, भीतर जलता हुआ ध्यान का दीया भी है। उस भीतर ध्यान के दीए से बुद्धि आलोकित है। इसलिए बुद्धि जो भी कर सकती थी गलत, वह नहीं कर पाएगी। ध्यान का दीया उसे नियोजित रखेगा, ध्यान का दीया सदा मार्ग-दर्शन देगा। इसलिए बुद्धि भटक न पाएगी। ये घोड़े बुद्धि के कहीं भी भागकर किसी गङ्ढे में नहीं गिरेंगे, भीतर सारथि बैठा हुआ है। वह प्रज्ञावान ध्यान भीतर का मालिक है।
बच्चे को बुद्धि भी दो, बच्चे को ध्यान भी दो। उसे जड़ें भी दो, आकाश में फैलाव भी दो। और यह ध्यान रखो कि दोनों के बीच संतुलन बड़ी बात है। कोई भी अंग ज्यादा न हो पाए, कोई भी अंग कम न हो पाए। अगर तुम ऐसा कर सको, तो ही तुमने ठीक अर्थों में माता का या पिता का कृत्य पूरा किया, तो ही तुम सही अर्थों में बच्चे को जन्म दिए। अन्यथा तुमने शरीर को जन्म दिया और आत्मा को तुमसे कोई सहारा न मिला। शरीर का जन्म तो बड़ी साधारण बात है। पशु-पक्षी भी उसे पूरा कर लेते हैं। उसमें तुम्हारी कुछ खूबी नहीं, कोई विशेषता नहीं।
और एक और बात खयाल रख लेना कि जब तुम बच्चे की आत्मा को निखारते हो, तब तुम भी उसके साथ निखरते हो। क्योंकि यह असंभव है, दूसरे को निखारना और खुद निखरने से बच जाना असंभव है। अगर तुमने अपने बच्चे को प्रेम किया, उसे बुद्धि की यात्रा दी, उसे ध्यान की जड़ें दीं, तो तुम अचानक पाओगे कि उसे बनाने में तुम भी बनने लगे हो। जब मूर्तिकार एक मूर्ति को सुंदर बनाता है, तो सिर्फ मूर्ति ही सुंदर नहीं बनती, उसके बनते-बनते मूर्तिकार भी सुंदर होता जाता है। क्योंकि सौंदर्य को जन्म देना असंभव है बिना सुंदर हुए। संतुलन को जन्म देना असंभव है, बिना संतुलित हुए।
अगर तुम सच में पिता हो, तो तुम्हारे घर में एक बेटे का जन्म तुम्हारी पूरी जिंदगी को बदल देगा। क्योंकि अब तुम बेटे को सुंदर, स्वस्थ, शांत बनाने की चेष्टा करोगे, तो तुम कैसे अशांत रह पाओगे? तुम जो बेटे के लिए करोगे, उसके पहले तुम्हें अपने लिए करना होगा।
एक पति और पत्नी तब तक स्वच्छंद रह सकते हैं, जब तक एक बच्चे का जन्म नहीं हुआ। बच्चे के जन्म के साथ एक नई कड़ी पैदा हो गई। अब खिलवाड़ नहीं चल सकता। अब जिंदगी एक गहन दायित्व है। और दायित्व रसपूर्ण है, क्योंकि प्रेम से भरा है। यह बच्चा मां-बाप, दोनों को बदलना शुरू करेगा। अगर सच में तुम इसे प्रेम करते हो, तो तुम बदल जाओगे। अगर तुम इसे प्रेम नहीं करते हो, तो तुम चीख-पुकार मचाते रहोगे कि बच्चा बिगड़ रहा है, समाज खराब है, सब खराब हुआ जा रहा है।
बच्चा कभी भी समाज के कारण नहीं बिगड़ता, तुम्हारे कारण बिगड़ता है और तुम ही समाज हो। और बड़े मजे की बात है कि जिसको तुम समाज कहते हो, वह सभी के बच्चे हैं। लेकिन बाप वैसा ही बना रहता है, जैसा वह बच्चे के पैदा होने के पूर्व था। मां वैसी ही बनी रहती है, जैसे वह बच्चे के पैदा होने के पूर्व थी। तो यह बच्चा पैदा तो जरूर हो गया, लेकिन तुम्हारे हृदय में इसके लिए प्रेम नहीं है। तुम्हारा प्रेम पूरे समाज को बदल देगा।
इसे ठीक से गहरे में बैठ जाने दो कि तुम जो भी निर्माण करते हो, वह तुम्हें भी निर्मित करता है। निर्माता अपनी निर्मिति से मुक्त नहीं हो सकता। एक सुंदर कविता का जब जन्म होता है, तो उसके साथ एक सुंदर कवि का भी जन्म हो जाता है। और अगर ऐसा न हो तो समझना कि कविता उधार है, वह जन्मी नहीं है, बाजार से खरीद लाई गई है। इसलिए जब तुम्हें कोई कवि मिले और तुम पाओ कि उसकी कविता की सुगंध उसमें नहीं, तो समझना वह कविता उसकी रही ही न होगी।
इस देश में हम पुराने समय में कवि को ऋषि कहते थे। अब नहीं कहते, क्योंकि अब कहना उचित भी नहीं है। ऋषि का अर्थ कवि ही होता था। बड़ी अजीब बात है। आज तो ऋषि और कवि में बड़ा फर्क दिखाई पड़ता है। न तो ऋषियों में कविता दिखाई पड़ती है, न कवियों में ऋषित्व दिखाई पड़ता है। दोनों कहीं खो गए हैं।
हमारी प्राचीन धारणा यह थी कि जब भी कोई व्यक्ति कवि होगा, उससे काव्य का जन्म होगा, तब यह काव्य का जन्म उसकी पूरी अंतर्धारा को, उसकी चेतना को बदल जाएगा। क्योंकि सुंदर का जन्म कुरूप से हो कैसे सकता है, अगर वस्तुतः यह जन्म है? तुमने बच्चे को गोद ले लिया हो, तो बात अलग है। अडॉप्ट कर लिया हो, तो बात अलग है। तुमने किसी और की कविता में तुकबंदी जोड़कर थोड़ा ऊपर हेर-फेर कर लिया हो, तो बात अलग है। तुमने किसी और की अनुभूति को रंग-रोगन लगाकर अपना बता दिया हो, तो बात अलग है। लेकिन तब तुम कवि नहीं हो, तुकबंद हो। और तुकबंदी कितनी ही सुंदर हो, छिछली है।
वह सौंदर्य वैसा ही है, जैसे किसी स्त्री ने ऊपर अपने चेहरे पर पावडर वगैरह लगाकर, लिपस्टिक वगैरह लगाकर धोखा दिया हो। नाटक के मंच पर ठीक, लेकिन जीवन में वह रंग-रोगन काम न आएगा। जरा सी वर्षा होगी और पावडर बह जाएगा। और तब स्त्री इतनी कुरूप लगेगी, जितनी कि बिना पावडर के कभी न लगती। क्योंकि जगह-जगह छिद्र हो जाएंगे सौंदर्य में, और जगह-जगह से कुरूपता झांकने लगेगी।
वस्तुतः जो स्त्री सुंदर होती है, वह पावडर से बचती है। क्योंकि पावडर कुरूपता को छिपाने का ढंग हो सकता है, सौंदर्य को पैदा करने का उपाय नहीं। सुंदर स्त्री भी अगर पावडर पोत लेती है तो कुरूप हो जाती है, क्योंकि झूठ कभी सुंदर नहीं हो सकता। साधारण सी घरेलू स्त्री भी, जिसको होमली कहें, जिसको नाटक के मंच पर खड़ा न किया जा सके, अगर अपने को ढांके न, छिपाए न, रंग-रोगन से पोते न, पाखंड न खड़ा करे, तो साधारण घरेलू स्त्री में भी एक सौंदर्य की ज्योति जलती है--सरल, स्वच्छ, ताजी, कम से कम आथेंटिक, प्रामाणिक।
तो भारत की पुरानी धारणा यह थी कि जब किसी व्यक्ति से काव्य का जन्म होगा, जब कोई कवि होगा, तो ऋषि तो हो ही गया। क्योंकि वह सुंदर कविता पीछे उस सुंदर हृदय को छोड़ जाएगी, जहां से आई है। अगर गंगा इतनी प्रीतिकर है, तो गंगोत्री पवित्र हो ही जाएगी।
हम गंगोत्री की पूजा करने जाते हैं, गंगा से भी ज्यादा। क्योंकि जिससे गंगा का जन्म हुआ, वह गंगा से ज्यादा होगी। तो कविता से कवि सदा ज्यादा होगा, अगर है। तो कितनी ही कविताएं निकलती जाएं, कवि ज्यादा होगा, क्योंकि वह मूल उदगम है। कवि ऋषि हो जाएगा।
दूसरी बात भी सच है कि जब भी कोई ऋषित्व को उपलब्ध होगा, तो कवि हो जाएगा। इसलिए कवि और ऋषि संस्कृत में पर्यायवाची शब्द हैं। ऐसा दुनिया की किसी भी भाषा में नहीं है। पोएट और सेंट, संत और कवि, ऋषि और कवि, दुनिया की किसी भाषा में पर्यायवाची नहीं हैं, केवल संस्कृत में पर्यायवाची हैं। बड़ा गहरा अर्थ है।
जब भी कोई व्यक्ति ऋषि होगा--ऋषि का अर्थ है जो सत्य को उपलब्ध हुआ, ऋषि का अर्थ है जो सौंदर्य को उपलब्ध हुआ, ऋषि का अर्थ है जिसने भीतर की गरिमा को पा लिया; जिसकी ज्योति जल गई; जो जाग गया; जिसके फूल खिल गए; जो पहुंच गया वहां, जहां उसकी नियति थी; जिसने अपने अंतिम शिखर को छू लिया, उसे हम ऋषि कहते हैं--जब भी कभी ऐसा कोई व्यक्ति होगा, तो उससे काव्य का जन्म अनिवार्य है। भला छंदों में कविता पैदा न हो, लेकिन वह जो भी करेगा, काव्य होगा।
बुद्ध का चलना अगर आप देखें, तो उसमें कविता है। बुद्ध की आंखों का खुलना आप देखें, तो उसमें कविता है। बुद्ध बोलें, चुप रहें, तो उसमें कविता है। बुद्ध का पूरा जीवन एक काव्य है। जरूरी नहीं है कि बुद्ध छंद लिखें, छंद-बद्ध कविता को लिखें, चित्र बनाएं, एक गीत को जन्म दें या एक मूर्ति बनाएं--जरूरी नहीं है। लेकिन अब बुद्ध का पूरा होना काव्य-पूर्ण है। वे जो भी करेंगे, रेत पर चलते उनके पैर के चिह्न बन जाएंगे, तो उन चिह्नों से सुंदर चित्र खोजना कठिन है।
ऋषि अनिवार्य-रूपेण कवि हो जाएगा, कवि अनिवार्य-रूपेण ऋषि है।
अगर तुमने अपने बच्चे को सच में ही प्रेम किया है...। और प्रेम अपने बच्चे को परमात्मा बनाना चाहेगा, इसके अतिरिक्त प्रेम और क्या चाह सकता है? इससे छोटे पर प्रेम कभी राजी नहीं होता। प्रेम इससे कम पर राजी हो ही नहीं सकता। अगर तुम अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहते हो, तो तुमने अभी प्रेम किया ही नहीं। अगर तुम अपने बेटे को एक बड़ा दुकानदार बनाना चाहते हो, तो तुमने प्रेम अभी जाना ही नहीं।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि बेटे को दुकानदार मत बनाना और डॉक्टर मत बनाना; डॉक्टर भी बनना होगा, दुकानदार भी बनना होगा। लेकिन उतने पर मां की, पिता की आकांक्षा नहीं रुकेगी। वह बीच का पड़ाव हो सकता है, राह हो सकती है। लेकिन जहां भी प्रेम है, वहां परमात्मा से कम पर तृप्ति नहीं है। तुम जिसे प्रेम करोगे, उसे तुम परमात्मा की तरह, अंततः परमात्मा हो जाए, ऐसी आकांक्षा करोगे।
प्रेम परमात्मा को जन्म देने की कीमिया है। उससे कम पर जो राजी हो जाए, वह प्रेम नहीं। उसमें कुछ और होगा, संसार का सौदा होगा, व्यवसाय होगा, धन के प्रति महत्वाकांक्षा, कुछ और रस होंगे, लेकिन प्रेम नहीं है। और जब भी प्रेम होता है, तो परमात्मा को जन्म देने की संभावना पैदा होती है।
तुम बच्चे को ध्यान भी देना, बुद्धि भी देना और दोनों के बीच संतुलन भी देना। और उसको देते-देते ही तुम अनजाने पाओगे कि तुम बदलते गए हो। जिस दिन तुम्हारे बेटे की प्रतिमा पूरी निखरेगी, उसके पहले तुम निखर चुके होओगे। अचानक तुम पाओगे कि बेटे को बनाने में तुम बन गए हो। और अगर बेटा बिगड़ रहा है, तो उसका अर्थ है कि तुम बिगड़े हुए हो और तुम्हारा प्रेम इतना नहीं है कि तुम अपने को बदलने को राजी हो बेटे के लिए।
तो बड़े मजे की घटना घटती है। बाप वही किए चला जाता है, जो वह चाहता है कि बेटा न करे। मां वही किए चली जाती है, जो उसने सदा चाहा है कि उसकी बेटी न करे, उसका बेटा न करे। और बच्चे तुम्हारी शिक्षाओं से नहीं सीखते, तुमसे सीखते हैं। और बच्चों की आंखें बड़ी साफ और पैनी हैं। अभी उन पर धूल नहीं जमी जीवन की। तुम्हारे शब्दों के आर-पार देख लेते हैं। बच्चे तुम्हारे शब्दों के जाल में नहीं पड़ते। तुम क्या कह रहे हो, इसकी उन्हें फिक्र नहीं। वे तुम्हें देख लेते हैं, वे सीधा तुम्हें पहचान लेते हैं। उनकी पकड़ प्रत्यक्ष है।
इसलिए बच्चों से झूठ बोलना बहुत मुश्किल है। क्योंकि वह तुम्हारे...तुम जब झूठ बोलते हो, तब झूठ कोई बोला थोड़े ही जाता है सिर्फ, झूठ बोलते वक्त तुम्हारा पूरा चेहरा कहता है कि झूठ, तुम्हारी आंखें कहती हैं कि झूठ, तुम्हारा हाथ बच्चे को छू रहा है, वह कहता है कि झूठ। अभी बच्चा जिंदगी के बहुत करीब है, तुम न पकड़ पाओ, लेकिन बच्चा फौरन पहचान लेता है। तुम्हारी सारी तरंगें कहती हैं कि तुम झूठ बोल रहे हो। इसलिए बच्चों को धोखा देना मुश्किल है, जब तक कि तुम उनको इतना भ्रष्ट न कर दो।
हम सब कोशिश में लगते हैं उनको भ्रष्ट करने की। और जब तक वे भ्रष्ट न हो जाएं, तब तक हम संदिग्ध रहते हैं, तब तक डर रहता है। मां-बाप बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं, झूठ मत बोलो। और बच्चे प्रतिपल पाते हैं कि मां-बाप झूठ बोल रहे हैं। इससे क्या शिक्षा मिलती है? सिर्फ एक शिक्षा मिलती है और वह यह कि तुम भी अपने बच्चों को समझाना कि झूठ मत बोलो और झूठ बोलना! यह तथ्य पकड़ में आ जाता है।
ये बच्चे भी अपने बच्चों को समझाएंगे कि झूठ मत बोलो और झूठ बोलेंगे। यही तुम्हारे पिता ने तुम्हारे साथ किया, यही तुम अपने बच्चों के साथ कर रहे हो। ये बच्चे देखते हैं कि इनको ब्रह्मचर्य का उपदेश दिया जाता है और मां-बाप अभी कामवासना से पूरी तरह भरपूर हैं। उनको दिखाई पड़ता है। तुम्हारा व्यवहार उनकी समझ में आता है। वे भी अपने बच्चों को ब्रह्मचर्य का उपदेश देंगे। एक बड़ा पाखंड है, जो चलता है।
हमारा समाज एक विराट पाखंड है। हमें दिखाई नहीं पड़ता, क्योंकि हम उसी में पैदा हुए हैं; जैसे मछलियों को सागर नहीं दिखाई पड़ता, क्योंकि वे उसी में पैदा हुई हैं। हमारा पाखंड इतना गहरा है कि अगर हमें दिखाई पड़ना शुरू हो जाए तो हम बहुत बेचैन हो जाएंगे, बहुत घबड़ा जाएंगे कि यह क्या हो रहा है? हम सोचते भी नहीं, हम क्या कह रहे हैं? क्या कर रहे हैं? क्या उसका परिणाम होगा?
तुम बच्चों को बुद्धि की शिक्षा देते हो, ध्यान की नहीं, क्योंकि बुद्धि के लिए उधार शिक्षक मिल जाते हैं, किराए के आदमी मिल जाते हैं। इसलिए आसान है। स्कूल है, विश्वविद्यालय है, वहां तुम भेज देते हो। अगर अधिक मां-बाप की आकांक्षा को ठीक से समझा जाए, तो शायद वे शिक्षा लेने नहीं भेजते, सिर्फ झंझट से बचने भेजते हैं। यह घर का उपद्रव टल जाता है। रविवार को घर में उपद्रव वापस लौट आता है।
स्कूल जो हैं, मां-बाप को बच्चों से बचाने के उपाय हैं, वहां तुम उन्हें ढकेल आते हो। वहां तुमने किराए के नौकर रख छोड़े हैं, जो उन बच्चों को उलझाए रखते हैं ऐसी बातों में, जिनमें निन्यानबे प्रतिशत बिलकुल कचरा हैं, जिनको सिखाने की कोई जरूरत नहीं है, जिनको सीखकर सिवाय भूलने के बच्चे कुछ भी न करेंगे, जिनमें सार न के बराबर है। शिक्षक जो है, वह एक तरह का पहरेदार है, जो मां-बाप और बच्चों के बीच में डंडा लिए खड़ा रहता है। कम से कम पांच-सात घंटे के लिए तुम्हें शांति दे देता है।
कैसा यह प्रेम है, जो बच्चों के कारण अशांत होता हो? यह प्रेम नहीं है। ये बच्चे आकस्मिक घटनाएं हैं, जो तुम्हारे ऊपर पड़ गए हैं, दुर्घटनाएं हैं। इनको किसी तरह ढोना है।
और तुम उन्हें स्कूल क्यों भेज रहे हो? इसलिए नहीं कि इनकी आत्माएं निखर आएं। तुम इन्हें स्कूल भेज रहे हो, ताकि ये समाज का सारा पाखंड, यह व्यवस्था सीख जाएं। समाज का सारा जाल, गणित, चालाकी ये सीखकर वापस लौट आएं। ये निष्णात हो जाएं, ये समाज के सदस्य हो जाएं। तुम इनको तैयार कर रहे हो। तुम्हारी महत्वाकांक्षाएं अधूरी रह गई हैं। तुम करोड़ कमाना चाहते थे, नहीं कमा पाए, तुम्हारा बेटा इसे पूरी करेगा। तुम बेटे को तैयार कर रहे हो। और अगर बेटा परीक्षाओं में असफल होता है, तो तुम दुखी होते हो--इसलिए नहीं कि बेटा असफल हुआ; इसलिए कि तुम्हारी महत्वाकांक्षा डांवाडोल होती है। यह बेटा कैसे तुम्हारी महत्वाकांक्षा पूरी करेगा?
ये बच्चे तुम्हारी महत्वाकांक्षाओं का फैलाव हैं। ये तुम्हारी वासनाएं हैं। तुम इनके कंधे पर सवार होकर यात्रा करना चाहते हो। इसलिए बेटा अगर धन कमाकर घर लाए, तो बाप खुश होता है, छाती से लगाता है; बेटा अगर धन गंवाकर घर आए, तो कोई उसका स्वागत नहीं करता।
जीसस की एक बड़ी प्यारी कथा है, वह तुम समझो। जीसस निरंतर कहते थे। और चूंकि जीसस का सारा जोर प्रेम पर था, वह कहानी सूचक है। जीसस कहते थे, एक बाप के दो बेटे थे। बाप बड़ा धनी था। एक बेटा बाप का आज्ञाकारी था और एक बड़ा विद्रोही था। एक कमाई को बढ़ाता और एक कमाई को तोड़ता और घटाता।
अंततः इन दोनों बेटों को अलग कर देने के सिवाय कोई उपाय न रहा। आधा-आधा धन बांट दिया गया। बड़ा बेटा बाप के पास रुका, धन को उसने व्यवसाय में लगाया, खेत खरीदे, बगीचे बनाए। छोटा बेटा धन मिलते ही नदारद हो गया गांव से। थोड़े दिनों बाद खबरें आने लगीं कि जुए में उसने सब बरबाद कर दिया, शराब पी डाली, वेश्याओं के नाच-गान में वह जो मिला था, सब मिट्टी हो गया।
बाप ने खबर भेजी कि घर वापस लौट आओ। छोटा बेटा जो घर छोड़कर चला गया था, जुआरी था, शराबी था, उसे भरोसा न आया कि मेरे सब बरबाद कर देने पर भी बाप मुझे वापस बुला सकता है।
प्रेम भरोसे योग्य है भी नहीं। और जब कभी प्रेम घटता है, तुम्हें भी भरोसा न आएगा। चोरी घटे, भरोसा आता है। घृणा हो, भरोसा आता है। प्रेम ऐसा अनहोना है कि कहां दिखाई पड़ता है!
लड़के को भी भरोसा नहीं आया। लेकिन जार-जार था, दीन हो गया था, भीख मांगता था। सोचा, लौट चलूं! इस भीख से तो घर के एक कोने में पड़ा रहूंगा, वही ठीक है।
बेटे के आगमन की खबर आई तो बाप ने बड़ा उत्सव-समारोह मनाया। मिष्ठान्न और भोजन तैयार करवाए। सारे गांव को भोजन पर आमंत्रित किया।
बड़ा बेटा खेत से लौट रहा था, तब गांव के कुछ लोगों ने कहा कि हद्द हो गई, तुम्हारा दुर्भाग्य! तुम यहां घर में हो, बाप की सेवा करते हो, कमाते हो, मेहनत करते हो, लेकिन तुम्हारे स्वागत में कभी इस तरह कालीन नहीं बिछाए गए, और न तुम्हारे स्वागत में कभी बैंड-बाजे बजे, और न तुम्हारे स्वागत में कभी भोज-उत्सव हुआ। और वह आवारा लड़का, तुम्हारा छोटा भाई, वापस लौट रहा है सब बरबाद करके, और उसके स्वागत का इंतजाम हो रहा है। जाओ, तुम भी स्वागत में सम्मिलित हो जाओ। दीए जलाए गए हैं घी के, बैंड-बाजे बजते हैं, मेहमान इकट्ठे हैं। बाप गांव के द्वार पर आवारा बेटे की प्रतीक्षा कर रहा है। बड़े बेटे को भी दुख हुआ, चोट लगी। वह घर जाकर उदास बैठ गया।
और जब बाप बेटे को लेकर लौटा, नए छोटे बेटे को, जो भाग गया था, वापस लौटा, तो बड़े बेटे को उदास पाकर उसने पूछा कि तू उदास क्यों है? उस बड़े बेटे ने कहा, उदासी स्वाभाविक है। मेरा कभी कोई स्वागत नहीं होता और मैं तुम्हारी सेवा कर रहा हूं। मैं तुम्हारे लिए धन कमा रहा हूं। तुमने जितना धन दिया है, उससे चार गुना मैंने कर दिया है। और यह आवारा सब बरबाद करके लौट रहा है, इसका स्वागत हो रहा है! तो बाप ने कुछ बातें कहीं, जो समझने जैसी हैं।
बाप ने कहा, प्रेम कमाने वाले में और गैर कमाने वाले में फर्क नहीं करता। और प्रेम, जो निकट है, उसके प्रति तो आश्वस्त है; जो दूर चला गया है, उसे पास लाने की कोशिश करता है। और तुम तो ठीक ही हो, इसलिए तुम्हारे लिए किसी विशेष उत्सव की जरूरत नहीं, तुम्हारे लिए तो मेरे आशीर्वाद प्रतिपल चल रहे हैं; लेकिन जो भटक गया है, उसके लिए विशेष आयोजन की जरूरत है, तभी वह आश्वस्त हो सकेगा।
और जीसस कहते थे कि ठीक वैसे ही जैसे कोई गडरिया घर लौटता हो सांझ अपनी भेड़ों को लेकर, और अचानक पाता है कि एक भेड़ खो गई, तो हजार भेड़ों को वहीं जंगल के अंधेरे में छोड़कर वह एक भेड़ को खोजने निकल जाता है। हजार की चिंता नहीं करता कि क्या होगा, लेकिन एक जो भटक गई है, उसे लेने निकल जाता है। और जब वह एक भेड़ मिल जाती है जो भटक गई, तो उसे कंधे पर रखकर वापस लौटता है।
जीसस कहते थे कि प्रेम महत्वाकांक्षा नहीं है। यही मैं तुमसे कहता हूं। प्रेम की कोई मांग नहीं है। प्रेम बच्चे के द्वारा कुछ पाना नहीं चाहता। प्रेम तो बच्चे को ही परमात्मा की तरह पाना चाहता है, बच्चे के द्वारा कुछ नहीं पाना चाहता। बच्चे के कृत्यों का बड़ा सवाल नहीं है, बच्चे की आत्मा का सवाल है।
लेकिन शिक्षा दी जा सकती है विद्यालय में, धर्म कौन देगा?
धर्म के भी विद्यालय हमने बना रखे हैं, वे नकली हैं। क्योंकि धर्म का कोई विद्यालय नहीं हो सकता। एक पंडित के पास भेज देते हैं, जिसे खुद भी धर्म का कुछ भी पता नहीं है। जो खुद वैसा ही जी रहा है, जैसे तुम जी रहे हो। तुम दुकान कुछ और करते हो, वह धर्म की दुकान करता है। तुम दोनों ही दुकानदार हो। उसके पास हम बच्चों को भेज देते हैं धर्म सीखने। वह सिखा देता है; जैसे धर्म कोई ज्यॉग्रफी हो, कि इतिहास हो, पाठ पढ़ा देता है, बच्चे को कंठस्थ करवा देता है। और धर्म की भी परीक्षाएं हैं। बच्चे परीक्षा पास करके, सर्टिफिकेट लेकर लौट आते हैं।
यह धोखा है। धर्म की कोई परीक्षा नहीं, जीवन ही पूरी उसकी परीक्षा है। और धर्म का कोई सर्टिफिकेट नहीं दे सकता, मौत ही देगी। मरते क्षण ही मौत सर्टिफिकेट देगी कि तुम धार्मिक थे या नहीं। उसके पहले कोई सर्टिफिकेट नहीं दे सकता। मौत के क्षण में अगर तुम आनंदित रहे, तो तुम उत्तीर्ण हुए। मौत के क्षण में अगर तुम दुखी हुए, तो तुम अनुत्तीर्ण हुए। जीवन, पूरा जीवन, धर्म की शिक्षा है। और मृत्यु उसकी परीक्षा है।
कौन पंडित इसे पूरा करेगा? कौन सा शास्त्र इसे पूरा करेगा? कोई शास्त्र, कोई पंडित काम नहीं आ सकता। और तुम्हें धर्म की कोई खबर नहीं है, इसलिए कैसे तुम बच्चे को धर्म दो? कैसे तुम उसे ध्यान दो? तुमने खुद ही ध्यान कभी नहीं जाना, तुम खुद ही कभी उस रस में नहीं बहे। बच्चे को तुम्हें जो देना हो, वह तुम्हारे पास होना चाहिए। धनी बाप होगा, तो बेटे को धन देगा। ध्यानी बाप होगा, तो बेटे को ध्यान देगा। जो तुम्हारे पास नहीं है, वह तुम दोगे कैसे? प्रेमी बाप होगा, तो प्रेम देगा। हम वही दे सकते हैं, जो हमारे पास है।
मुझसे लोग पूछते हैं--कभी कोई युवक, कोई युवती--कि क्या यह उचित होगा कि वे एक बच्चे को जन्म दें! तो मैं उनको कहता हूं, पहले तुम ध्यान में गहरे हो जाओ। क्योंकि जब बच्चा सामने खड़ा होगा, तब तुम उसे दोगे क्या? और ध्यान अगर तुम्हारे पास नहीं, तो बच्चे की मौजूदगी तुम्हें बड़ा निर्बल और दुर्बल और दीन सिद्ध करेगी। तुम्हारे पास देने को कुछ भी नहीं है। तुम पहले ध्यान में गहरे उतर जाओ, तब तुम मां बनना या पिता बनना। क्योंकि तब मां और पिता बनने का जो महत दायित्व है, उसे तुम पूरा कर सकोगे। और दायित्व की भांति नहीं, एक आनंद की भांति पूरा कर सकोगे।
ध्यान भी दो बच्चे को, विचार भी दो। विचार से वह संसार में सफल होगा, ध्यान से वह परमात्मा में सफल होगा। विचार उसे दो ताकि उसकी बुद्धि निखरे, ध्यान उसे दो ताकि उसका हृदय पवित्र होता चला जाए।
और जहां हृदय की पवित्रता और बुद्धि की सक्रियता का मिलन होता है, वहां इस जगत में जो महत्वपूर्ण से महत्वपूर्ण घटना है, वह घटती है। वहां सक्रियता और निष्क्रियता दोनों संतुलित हो जाते हैं। वहां रात और दिन दोनों ठहर जाते हैं। वहां मृत्यु और जीवन, दोनों के पार जो है, उसका दर्शन शुरू हो जाता है।


प्रश्न:
भगवान श्री, पुराणों में कथा है कि प्रलयकाल में सारी सृष्टि पानी के नीचे डूब जाती है,
और जमीन का एक टुकड़ा बचा रहता है।
वहां पर वट-पत्र के ऊपर, अपने पैर का अंगूठा चूसते हुए नन्हें बाल-मुकुंद पाए जाते हैं।
और उनसे फिर सारी सृष्टि निर्मित होती है।
सदगुरु के पास जाकर भी साधक के भीतर ऐसा ही प्रलय घटित होता है,
और उसके बाद उसका आध्यात्मिक पुनर्जन्म होता है।
क्या यह कथा इसी घटना का प्रतीक है? इसका वर्णन करिए।

प्रतिपल है मरण और प्रतिपल है तुम्हारा जन्म भी। एक दिन तुम्हारा जन्म हुआ और सौ वर्ष बाद तुम मरोगे, ऐसा नहीं है। प्रतिपल तुम मरते हो और प्रतिपल तुम्हारा नया जन्म होता है। हर क्षण पुराना समाप्त होता है, नए की शुरुआत होती है। सृष्टि कभी हुई थी और प्रलय कभी होगा, यह तो सिर्फ कथा है। सृष्टि अभी हो रही है और प्रलय अभी हो रहा है, यह तथ्य है। परमात्मा ने कभी बनाया जगत और फिर आराम करने लगा, ऐसा नहीं है। जैसा ईसाई सोचते हैं कि छह दिन उसने बनाया, फिर सातवें दिन विश्राम किया--इसलिए सातवां दिन छुट्टी का दिन है--छह दिन में सृष्टि पूरी हो गई, फिर वह सातवें दिन आराम करने लगा। फिर वह आराम कर ही रहा है।
नहीं, ऐसा नहीं है। और परमात्मा के लिए आराम हो भी नहीं सकता। तुम्हारे लिए आराम जरूरी है, क्योंकि तुम थकते हो। अगर परमात्मा भी थकता है, तो विराट नहीं है, तो उसकी ऊर्जा का स्रोत अनंत नहीं, चुक जाता है। अगर परमात्मा भी थक जाए, तो सृष्टि उसी क्षण समाप्त हो जाएगी।
, परमात्मा ने किसी दिन बनाया, ऐसा नहीं है, बल्कि परमात्मा प्रतिपल बना रहा है। सृजन शाश्वत है। सृष्टि कोई ऐतिहासिक घटना नहीं, शाश्वतता है। प्रतिपल निर्माण चल रहा है। ये पौधे बड़े हो रहे हैं, कलियां फूल बन रही हैं, अंडे फूट रहे हैं, पक्षी उड़ने की तैयारी कर रहे हैं। प्रतिपल कुछ भी रुका नहीं है। विराट में कहीं भी कोई विश्राम नहीं है। वहां कोई छुट्टी का दिन नहीं है। वहां सृजन एक शाश्वत उत्सव है।
और जो विराट के संबंध में सही है, वही तुम्हारे संबंध में, क्योंकि तुम भी विराट के ही एक छोटे से प्रतिबिंब हो। बूंद सही सागर की, पर तुम भी विराट की ही बूंद हो। तुम भी प्रतिपल बन रहे हो, मिट रहे हो। जो भी बीत गया, वह मिट गया। जो आने को है, वह बन रहा है। इन दोनों के बीच में तुम्हारा होना है।
यह कथा मीठी है पुराण की कि प्रलय के क्षण में सब नष्ट हो जाता है, सिर्फ एक छोटा सा बालक--बालकृष्ण या जो भी हम नाम दे दें--एक छोटा सा अबोध बालक बच रहता है। फिर उसी से सारी सृष्टि शुरू होती है। इसके अर्थ बहुआयामी हैं। सब समझने की कोशिश करें।
पहला, बड़े-बूढ़े सब मर जाते हैं, एक छोटा बच्चा बचता है। सब चालाक, अनुभवी नष्ट हो जाते हैं। सब होशियार, ज्ञानी मिट जाते हैं। एक अबोध बालक बच रहता है। अबोधता में कोई सुरक्षा है, जो होशियारी में नहीं है। एक निर्बोध, जिसे कुछ भी पता नहीं है, उसे प्रलय भी नहीं मिटा पाता। और सब ज्ञानी, सब पंडित, सब शास्त्रधर, सब खो जाते हैं। साधु, संत, सब खो जाते हैं, एक बालक बचता है। क्या इसका अर्थ होगा?
लाओत्से कहता है कि ऐसा उसने एक बार देखा कि एक बैलगाड़ी में कुछ लोग बैठे चल रहे थे। बैलगाड़ी उलट गई। दो आदमी मरे, खड्डे में गिरे। एक आदमी जो बचा, वह भी अधमरा, हाथ-पैर टूट गए। लेकिन एक आदमी को जरा भी चोट न आई। गाड़ी उलट गई, वह सड़क के किनारे गिरा, उलटा पड़ा, उलटा ही पड़ा रहा। लाओत्से बड़ा चकित हुआ। वह पास गया, उसने कहा, मामला क्या है! पाया कि वह एक आदमी शराबी था, शराब पीए हुए था। जो होश में थे, वे खतम हो गए। जो बेहोशी में था, उसको पता ही नहीं चला कि यह गाड़ी उलट गई। वे जैसे गाड़ी में थे, वैसे बाहर रहे।
थोड़ा समझने जैसा है, अक्सर यह होता है। शराबी को आप रास्ते में पड़ा हुआ अक्सर पाएंगे। आप भी जरा गिरकर देखें! उतने अगर आप गिरें, तो अक्सर आप अस्पताल में ही रहें। शराबी रोज गिरता-पड़ता घर वापस लौट आता है। न हड्डी टूटती है, न फ्रेक्चर होता है। कुछ कला है, जो शराबी जानता है। वह कला इतनी ही है कि उसे होश नहीं है। और जब होश होता है, तो आप अपना बचाव करते हैं; जब होश नहीं होता, तो बचाव क्या करना है?
जब गाड़ी उलटी होगी, तो जो जगे थे, होश में थे, वे डर गए होंगे, उनकी हड्डियां तन गई होंगी, उनके स्नायु खिंच गए होंगे। उन्होंने अपने को बचाया होगा। गाड़ी उलटी होगी और जब वे जमीन पर गिर रहे थे, तब वे जमीन से लड़ रहे थे, बच जाएं किसी तरह, वे तने थे। वह तनाव ही चोट खाता है, वह तनाव में ही मांस-पेशियां टूट जाती हैं, हड्डियां उखड़ जाती हैं। शराबी गिरा, उनको पता ही न था कि कोई लड़ाई है, कि गाड़ी उलट गई, कि अपने को बचाना है। शराबी ऐसे गिरा होगा, जैसे शराबी वहां है ही नहीं; एक बोरा गिर रहा है, एक बंडल गिर गया, जिसमें भीतर कोई है ही नहीं। तो बंडल की कोई न हड्डी टूटती, न कुछ होता। शराबी ऐसा गिरा, जैसे भीतर नहीं था।
जब भीतर कोई बचाने वाला नहीं होता, सुरक्षा करने वाला नहीं होता, तब कोई अकड़ पैदा नहीं होती। अहंकार नहीं होता, तो प्रतिरोध पैदा नहीं होता। बिना प्रतिरोध के शराबी गिर गया। वे सो गए। उन्होंने इसको परमात्मा का आशीर्वाद समझा होगा, वे विश्राम करने लगे। लाओत्से कहता है, शराबी बच जाता है, होश वाला टूट जाता है। शराबी के बचने का कारण यही है कि उसे अपना पता नहीं है।
यह कथा कहती है कि एक छोटा बच्चा बच जाता है, सब मर जाते हैं। जो-जो बचना चाहते थे, वे सब मर जाते हैं, एक छोटा बच्चा बच जाता है। अक्सर ऐसा होता है कि कोई मकान गिरता है, बड़े-बूढ़े सब मर जाते हैं, एक छोटा बच्चा बच जाता है। आग लग जाती है, बड़े-बूढ़े भाग-दौड़ में आग पकड़ लेते हैं, छोटा बच्चा अपने झूले पर पड़ा हुआ मुस्कुराता रहता है और बच जाता है। अक्सर ऐसा हो जाता है।
इसके हो जाने का रहस्य है। और वह रहस्य यह है कि छोटा बच्चा अपनी रक्षा नहीं कर रहा है। जो खुद को नहीं बचा रहा है, परमात्मा उसे बचाता है। जो खुद को बचा रहा है, वह परमात्मा से लड़ रहा है। उसका अर्थ है, उसने कह दिया, तुम पर हमें भरोसा नहीं, हम खुद अपना आयोजन करेंगे। और अपना आयोजन प्रलय में काम नहीं पड़ेगा। अभी भी काम नहीं पड़ रहा है, तुम्हें खयाल ही है, तुम अपने को बचा रहे हो। इस जीवन के संघर्ष में, जहां प्रतिपल प्रलय हो रहा है, तुम मिट रहे हो, क्योंकि तुम छोटे बच्चे की भांति नहीं हो, अन्यथा तुम बच जाओगे।
यह कथा और भी गहरा अर्थ रखती है और वह यह है कि जैसे ही अतीत नष्ट होता है, जो भी बीत गया, वह नष्ट हो गया; और जो भविष्य है, वह अभी आया नहीं है, आएगा; तो वर्तमान के क्षण में, तुम सदा ही एक छोटे बच्चे की भांति होते हो।
लेकिन तुम अतीत को स्मृति में लेकर चलते हो। तुम जानते हो हिसाब-किताब, बैंक-बैलेंस, खाता-बही, जो किया नहीं किया, जो हुआ नहीं हुआ, वह सब तुम स्मृति में ढोते हो। वह है नहीं कहीं अस्तित्व में, सिर्फ तुम्हारी बुद्धि में समाया हुआ है। तुम भविष्य को भी अपने मन में लेकर चलते हो, क्या करना, नहीं करना, योजनाएं होंगी कि नहीं होंगी, कैसे होंगी, कैसे नहीं होंगी, वह सब जाल भी तुम लेकर चलते हो, वह भी कहीं नहीं है। अस्तित्व में तो शुद्ध वर्तमान का क्षण है, वहां सब अतीत जा चुका है; केवल वर्तमान है, सारा भविष्य अभी आया नहीं। उस वर्तमान के क्षण में तुम कौन हो! तुम्हारा क्या अनुभव है! क्या ज्ञान है!
उस वर्तमान के क्षण में तुम्हारा कोई भी हिसाब-किताब नहीं। उस वर्तमान के क्षण में तुम एक छोटे बालक की भांति हो, नवजात शिशु, जो अभी-अभी गर्भ से जन्मा है। जिसको तुम यह भी पूछो कि तू कौन है, तो जवाब नहीं दे सकता। जो कुछ भी नहीं जानता है, जिसके हृदय की स्लेट बिलकुल कोरी है, जिस पर अभी कुछ भी लिखा नहीं गया है। यह जो अनलिखा हृदय है, यही शुद्ध बाल-हृदय है।
ध्यानी प्रतिपल ऐसा ही बाल-हृदय होता रहता है। ध्यान का अर्थ है, जो-जो कचरा अतीत में छोड़ा, उसे पोंछ डालो; जो-जो तुम सीखे, उसे मिटा दो, अनलघनग; जो-जो जाना, उसे फिर से अनजाना कर दो; जो-जो इकट्ठा कर लिया, उसे विसर्जित कर दो। तुम फिर ताजे, हल्के, नए हो जाओ। जैसे नई कोंपल फूटती है वृक्ष पर। सब पुराने पत्ते गिरा दो, पतझड़ प्रतिपल होने दो, ताकि हर पतझड़ के पीछे वसंत हो, नई कोंपल आ जाए। तुम बिलकुल ताजे, तुम बिलकुल नए, जिस पर कुछ भी लिखा हुआ नहीं है, जिस पर अतीत के कोई चरण-चिह्न नहीं हैं, जिस पर एक भी रेखा नहीं है, ऐसे निर्मल तुम प्रतिपल हो जाओ, यही ध्यानी का प्रयोग है। ध्यानी प्रतिपल अतीत से अपने को मुक्त करता रहता है, अतीत के प्रति मरता जाता है। और भविष्य को पैदा नहीं होने देता, उसकी जरूरत नहीं है, वह अपने आप पैदा होगा, तुम उसके लिए व्यर्थ परेशान मत होओ, वह तुम्हारे बिना चलता रहेगा।
न आकाश तुमसे पूछकर है, न चांदत्तारे तुमसे पूछकर घूम रहे हैं, न नदियां तुमसे पूछकर बह रही हैं। समय भी तुमसे बिना पूछे चल रहा है, तुम उसके पीछे परेशान मत होओ। अतीत को पोंछ दो, वह धूल तुम पर न बचे। भविष्य को तुम जन्माओ मत, वह अपने से जन्मेगा। तब तुम एक नवजात शिशु की भांति इनोसेंट--और यह इनोसेंस, यह निर्दोषता ही ध्यान है।
और तब तुम्हारे भीतर से विराट सृजन होगा, तब तुम्हारी सारी जीवन-ऊर्जा स्रष्टा की ऊर्जा हो जाएगी। तब तुम परमात्मा हो। जो शुद्ध, सरल बालक की भांति है, वह परमात्मा है। जहां तुम चालाक हुए, वहीं तुम संसारी हो।
यह हो सकता है, यह हुआ है। बुद्ध ऐसे ही नवजात शिशु की भांति हो गए, कृष्ण ऐसे ही नवजात शिशु की भांति हो गए। यह जानकर तुम्हें शायद विस्मय हो कि हमने कृष्ण, बुद्ध, महावीर, राम, इनको दाढ़ी-मूंछ वाला नहीं चित्रित किया है। तो दो ही बातें हो सकती हैं: एक तो कि इनके शरीर में हार्मोन की कुछ कमी रही हो। उस हालत में इनका पुरुषत्व संदिग्ध होगा। ये थोड़े-से स्त्रैण साबित होंगे। और एकाध के लिए हो भी सकता था, क्योंकि स्त्रैण व्यक्तित्व वाला पुरुष भी ज्ञान को उपलब्ध हो सकता है, कोई अड़चन नहीं है। लेकिन सभी को? जैनियों के चौबीस तीर्थंकर बिना दाढ़ी-मूंछ, सारे बुद्धों की कल्पना बिना दाढ़ी-मूंछ, अतीत के ही नहीं, भविष्य में जो बुद्ध होने वाले हैं, मैत्रेय, उनका चित्र भी दाढ़ी-मूंछ के बिना; राम, कृष्ण सब दाढ़ी-मूंछ के बिना। कुछ कारण और है।
इनको दाढ़ी-मूंछ सबको उगी होगी, क्योंकि बुद्धत्व दाढ़ी-मूंछ के कुछ विरोध में नहीं है, लेकिन हमने इन्हें चित्रित किया है बिना दाढ़ी-मूंछ के। इसमें हमारा कोई अर्थ है। और वह अर्थ यह है कि हम इन्हें बूढ़ा नहीं होने देना चाहते। और हम जानते हैं कि ये कभी बूढ़े नहीं हुए। ये बूढ़े हुए हैं, इनकी कमर झुकी होगी। लेकिन हम जानते हैं कि इनकी चेतना कभी बूढ़ी न हुई, कभी पुरानी न हुई। वह सदा नवजात शिशु की भांति बनी रही, वह सदा ताजी रही। उस ताजेपन की खबर देने को हमने इनके शरीर को भी ताजा और नया और युवा रखना चाहा। यह जो इनका युवापन हमने चित्रित किया है, यह शारीरिक नहीं है, यह चेतनागत है।
निश्चित ही जब सृष्टि का अंत हो जाता है, प्रलय घट जाता है--अतीत मिटता है और नया अभी पैदा नहीं हुआ--तो दोनों के बीच में कौन होगा सेतु? अगर हमसे कोई कथा लिखवाता, तो हम किसी बूढ़े समझदार को, किसी पंडित को, वेद के ज्ञाता को बचाते, कि यह आदमी ठीक रहेगा नई सृष्टि शुरू करने को। लेकिन यह कथा एक छोटे बच्चे को बचाती है।
वेद का ज्ञाता निर्दोष नहीं हो सकता। निर्दोष व्यक्ति स्वयं वेद है, वह वेद का ज्ञाता नहीं है। और यह पूरी प्रकृति की धारा पुराने और जराजीर्ण को मिटाती है, नए को पैदा करती है। भगवान का हिसाब कुछ अनूठा मालूम पड़ता है। अभी वैज्ञानिक सोचते हैं, तो उलटा सोचते हैं।
वैज्ञानिक कहते हैं कि यह बिलकुल ही अनइकोनॉमिकल है कि बूढ़े मरें और बच्चे पैदा हों। है भी अनइकोनॉमिकल, आर्थिक दृष्टि से बिलकुल खतरा है। क्योंकि बूढ़ा आदमी सब तरह से तैयार, पढ़ा-लिखा, अनुभवी, सत्तर साल हमने उस पर खराब किए, सब मिला-जुलाकर किसी तरह उनमें थोड़ी बुद्धि आई, वे मरने के करीब पहुंच गए। जो मकान बनकर तैयार हो गया, वह गिरने के करीब है। और एक छोटा बच्चा उसकी जगह ले लेगा, जिनके साथ फिर वही मेहनत। यह बिलकुल अनइकोनॉमिकल है। कोई भी राज्य इसको चलने नहीं दे सकता। मजबूरी है, कुछ कर नहीं सकते, इसलिए चलता है। नहीं तो बूढ़ों को हम बचाएंगे और बच्चों को हम रोकेंगे। क्योंकि बच्चा! यह बिलकुल फिजूल खर्च है। इसके साथ फिर वही करना होगा, यह फिर वही नासमझियां करेगा, फिर वही गलतियां करेगा, फिर वही स्कूल, फिर पढ़ाओ-लिखाओ और फिर...और आखिर में, जब बनकर तैयार हो जाएगा, जब हमारे कुछ काम का होता, तब इनकी मौत आ जाएगी।
तो वैज्ञानिक कहते हैं कि यह कोशिश चलती है कि कैसे हम बूढ़ों को बचाएं। एक काम में तो वे सफल हो गए कि बच्चों को हम कैसे रोकें, बर्थ-कंट्रोल, उसमें वे सफल हो गए। वह आधी प्रक्रिया पूरी हो गई कि बच्चे अब रोके जा सकते हैं। अब दूसरा काम शुरू है कि बूढ़े कैसे रोके जाएं, उनको जाने न दिया जाए। और कई बूढ़े हमें बड़े काम के लगते हैं।
वह आइंस्टीन है, रोक लें तो बड़े काम का लगता है। सदियां बीत जाएंगी, तब शायद ऐसा आदमी फिर पैदा होगा। और अगर आइंस्टीन को हम सौ साल रोक लें, तो वह क्या नहीं करेगा, कहना मुश्किल है। क्योंकि अब, जब उसकी बुद्धि बिलकुल परिपक्व हो रही थी, तब उसके विदा का वक्त आ गया। इसको अगर हम सौ साल और बचा लें, तो इस बुद्धि के ऊपर नए भवन खड़े होते जाएंगे। और आइंस्टीन कुछ दे सकेगा, जो बच्चे कैसे देंगे? तो इस बात की कोशिश चलती है।
आपको शायद पता न हो कि हजारों लोगों ने अपने बीमा करवाए हैं कि मर जाने के बाद उनकी लाश बचा ली जाए। क्योंकि ऐसा शक है कि इस सदी के पूरे होतेऱ्होते व्यक्तियों को पुनरुज्जीवित करने की कला हमारे हाथ में आ जाएगी। तो अमरीका में कई स्थानों पर डीप फ्रीजिंग का उपाय किया गया है, जहां कुछ लाशें सुरक्षित कर दी गई हैं। खर्चीला है, सिर्फ करोड़पति करवा सकते हैं। कोई दस हजार रुपए रोज का खर्च है एक आदमी की लाश को बचाने के लिए। कुछ लाशें तो सुरक्षित हो गई हैं। वे लोग मरने के पहले अपना सारा पैसा जमा कर गए हैं, ट्रस्ट बना गए हैं। वह ट्रस्ट उनकी लाश को बचाएगा तब तक, जब तक कि विज्ञान कला न खोज ले पुनरुज्जीवित करने की। बीस साल, पच्चीस साल में कला हाथ आ जाएगी, तो उनको पुनरुज्जीवित किया जा सकेगा। इस आशा में वे सारा इंतजाम करके गए हैं। एक बड़ा आंदोलन चलता है कि कैसे हम बूढ़े लोगों को बचाएं।
आज नहीं कल, विज्ञान शायद कोई तरकीब खोज ले। जब बच्चे पैदा होने से रोके जा सकते हैं, तो बूढ़े मरने से भी रोके जा सकते हैं। अगर बर्थ-कंट्रोल संभव है, तो डेथ-कंट्रोल भी संभव है। वह उसका ही दूसरा हिस्सा है। और जिस दिन हम बूढ़े को रोक लेंगे, उस दिन तो बर्थ-कंट्रोल हम बिलकुल ही कर लेंगे पूरा, क्योंकि फिर दोनों के लिए जगह नहीं हो सकती। इसमें जगह का यहां हिसाब ऐसा है कि बूढ़ा सरकता है, तो बच्चे के लिए जगह खाली होती है। जब भी आपके घर में एक बच्चा पैदा होता है, तभी सचेत हो जाना चाहिए, अब कोई बूढ़ा मरने के करीब हुआ। क्योंकि जगह कहां है? हर सांस जगह मांगेगी, बूढ़े को हटना होगा।
लेकिन यह बड़ा सोचने जैसा है कि परमात्मा की प्रक्रिया यह है कि वह बूढ़ों को हटाता है, तैयार को मिटाता है, गैरत्तैयार को लाता है। पुराने पत्ते को गिराता है, नई कोंपल को जन्माता है। परमात्मा नए के पक्ष में और पुराने के विपक्ष में है। हम पुराने के पक्ष में और नए के विपक्ष में हैं। इसलिए जो भी पुराना है, उसको हम श्रेष्ठ कहते हैं। और जो भी नया है, हम कहते हैं, नया है, इसका क्या भरोसा?
इसलिए जो शास्त्र जितना पुराना है, हम कहते हैं, उतना ही महान है। जो धर्म जितना पुराना है, हम कहते हैं, उतना ही कीमती है। इसलिए सभी धर्म कोशिश करते हैं--झूठ-सही--कि उनका धर्म बहुत पुराना है, उनकी किताब बहुत पुरानी है।
पुराने का हमको रस है। लेकिन परमात्मा को बिलकुल पुराने में रस नहीं है, परमात्मा का रस नए में है। परमात्मा तो कहता है, पुराना अगर है, तो उसे मरना चाहिए। नया है, तो उसे जीवन में आना चाहिए। नए में कुछ खूबी परमात्मा को दिखाई पड़ती है, जो हमको नहीं दिखाई पड़ती। हमें पुराने में कुछ खूबी दिखाई पड़ती है।
पुराने का हमारा मोह क्या है? क्योंकि पुराना अनुभवी है, जानता है, जी चुका, परिपक्व हो गया है। नया गैर-अनुभवी है, जानता नहीं है, अपरिपक्व है, भटकने का उपाय है। लेकिन परमात्मा की तरफ से अगर हम समझें तो जो जितना ज्यादा अनुभवी है, उतना ही चालाक है, उतना ही कुशल है, उतना ही होशियार है। और जो जितना चालाक है, उतना ही कम निर्दोष, उतना ही भोलापन उसमें संभव नहीं है। और इस जगत के द्वार भोले हृदय के लिए खुले हैं। और यह अस्तित्व केवल उन्हीं पर वर्षा करता है आनंद की, जो इतने सरल हैं कि जिनकी श्रद्धा में रत्तीभर भी अश्रद्धा नहीं है।
एक बालक जैसी श्रद्धा ही संतत्व को जन्म देती है। एक छोटा बच्चा है, वह आपमें पूरी श्रद्धा रखता है। उसे खयाल भी नहीं आता कि मैं श्रद्धा रखता हूं, क्योंकि यह खयाल भी अश्रद्धालु को आता है। जिसके मन में शक हो गया, उसको लगता है कि मैं श्रद्धा करता हूं। बच्चे की श्रद्धा इतनी परिपूर्ण है कि उसे यह भी पता नहीं कि मैं श्रद्धा करता हूं। बस श्रद्धा उसका स्वभाव है।
यह कथा मीठी है। सृष्टि के अंत पर, जब प्रलय घट जाता है, तो एक छोटा बच्चा बचता है। क्योंकि परमात्मा बचा रहा है, वैज्ञानिक नहीं बचा रहे। और परमात्मा सदा नए के पक्ष में है।
इसलिए मैं कहता हूं, परमात्मा से बड़ा क्रांतिकारी तत्व जगत में दूसरा नहीं है। परमात्मा से बड़ा क्रांतिकारी जगत में दूसरा नहीं है। क्रांति का यही मौलिक स्वर है कि पुराने को जाने दो, नए को आने दो। पुराना मर ही चुका, इसीलिए पुराना है। नया पूरा जीवंत है, इसलिए नया है।
और अगर तुम इस कला को सीख लो--और इसी कला को मैं ध्यान कह रहा हूं--कि तुम कभी पुराने न हो पाओ, तो परमात्मा तुम्हें सदा बचाएगा। जिस दिन सृष्टि नष्ट होगी, उस दिन भी तुम बचोगे; जिस दिन महाप्रलय होगा, उस दिन भी तुम बचोगे। तुम्हारे लायक जमीन बचाई ही जाएगी।
लेकिन उसकी कला यह है कि तुम एक नवजात शिशु बने रहना, तुम बूढ़े मत हो जाना। शरीर तो बूढ़ा होगा, शरीर जाएगा भी, लेकिन तुम बूढ़े मत होना। तुम्हारी आत्मा नई बनी रहे, नई कोंपल की तरह, सुबह गिरी नई ओस की बूंद की तरह तुम्हारी आत्मा ताजी बनी रहे, तो तुम्हें परमात्मा सदा सुरक्षा देगा। तुम जहां बूढ़े हुए, वहीं तुम परमात्मा के विपरीत गए, वहीं तुमने अपनी मृत्यु को बुलाया।
तुम अमृत हो, अगर तुम सदा नए हो। नयापन अमरत्व है।

आज इतना ही।