दिनांक
21 जून
1976;
श्री
ओशो आश्रम, पूना।
बाऊलगीत—
प्रेम
की गंध और
स्वाद
और
प्रेमी के
हृदय की भाषा
को
केवल
गुणग्राही
रसिक शिरोमणि
ही
समझ
सकता है
दूसरों
को तो उसका
कोई संकेत तक
नहीं मिलता
नीबू
का स्वाद तो
फल के
केंद्र में
होता है!
और
विशेषज्ञ भी
उस तक पहुंचने
का
कोई
सरल मार्ग नहीं
जानते!
शहद तो
कमल पुष्ट के
अंदर
छिपा
होता है
लेकिन
शहद की माखी
उसे जानती है
गोबर में
बसे गुबरैले
शहद का
पूर्वानुमान
कैसे कर सकते
हैं?
विनम्रता
और समर्पण ही
ज्ञान का
रहस्य है




