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शनिवार, 14 मई 2016

कोपलें फिर फूट आईं--(प्रवचन--06)

परम ऐश्वर्य: साक्षीभाव—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक: 4 अगस्त, 1986, 7. 00 संध्या,
सुमिला, जुहू, बंबई।
प्रश्‍नसार:
1— भगवान, अध्ययन, चिंतन और श्रवण से बुद्धिगत समझ तो मिल जाती है, लेकिन मेरा जीवन तो अचेतन तलघरों से उठने वाले आवेगों और धक्कों से पीड़ित और संचालित होता रहता है। मैं असहाय हूं, अचेतन तलघरों तक मेरी पहुंच नहीं। कोई विधि, कोई जीवन—शैली, सूत्र और दिशा देने कि कृपा करें।
2—आपने ईश्‍वर तक पहुंचने के दो मार्ग—प्रेम ओर ध्‍यान बताए है। मेरी स्‍थिति ऐसी है कि प्रेम—भाव मेरे ह्रदय में उमड़ता नहीं। ऐसा नहीं है कि मैं किसी को प्रेम नहीं करना चाहती। वे मेरे व्‍यक्‍तित्‍व का प्रकार नहीं है। चुप रहना और शांत बैठना मुझे अच्‍छा लगाता है। इस लिए मैंने ध्‍यान का मार्ग चुन कर साक्षी की साधना शुरू की। अब कठिनाई यह है कि जैसे ही मैं सजग होकर देख रही हूं कि मैं विचारों को देख रही हूं, तो विचार रूक जाते है। और क्षणिक आनंद का अनुभव होता है। फिर विचारों का तांता शुरू हो जाता है...........
3—ह्रदयको सभी संतो ने अध्‍यात्‍म का द्वार कहा है और मन को विचार और बुद्धि का। ह्रदय और मन में क्‍या फर्क है? ह्रदय और आत्‍मा में क्‍या फर्क है? इस फर्क को कैसे स्‍पष्‍ट करें? कैस पहचानें?

शुक्रवार, 13 मई 2016

कोपलें फिर फूट आईं--(प्रवचन--05)

अपार्थिव तत्व की पहचान—(प्रवचन—पांचवां)


दिनांक: 3 अगस्त, 1986,
3. 30 अपराहन, सुमिला, जुहू, बंबई
प्रश्‍नसार:
1—जब कोई मुझसे छल और दगावाजी करता है या जब कोई मुझे वस्‍तु की तरह उपयोग करता है, ऐसी स्‍थिति में मुझे क्‍या करना चाहिए?
2—विपस्‍सना की साधना में कैथार्सिस कब होती है? मैं विपस्‍सना का अभ्‍यास करता हूं। मेरा संगीता का कार्यक्षेत्र होश की दिशा में मेरे लिए किस प्रकार सहायक हो सकता है?
3—दिन में अधिक समय ध्‍यान में डूबी, खोई रहती हूं। शरीर क्षीण हुआ है। कुछ समय पहले दलाई लामा के डाक्‍टर ने मेरा हाथ पकड़ कर किा कि मुझे अधिक पार्थिव होने की जरूरत है। कृपया बातएं कि मुझे क्‍या करना है?

गुरुवार, 12 मई 2016

कोपलें फिर फूट आईं–(प्रवचन–04)

अपने ज्ञान को ध्यान में बदलो—(प्रवचन—चौथा)

दिनांक 3 अगस्त, 1986,
9. 30 प्रातः सुमिला, जुहू, बंबई
प्रश्‍नसार:
1—परसों ही आपने कहा कि अपने को जाने बिना अर्थी नहीं उठने देना। यह चुनौती तीर की तरह हृदय में चुभ गयी। हम कैसे शुरू करें?
2—रजनीशपुरम कम्‍यून से लौट कर मैं बहुत अकेली, खोई—खोई सी, कन्‍फ्युज्‍ड अनुभव कर रही हूं।
3—क्‍या यह संभव है कि कोई व्‍यक्‍ति आपकी चेतना—दशा को उपलब्‍ध करके शरीररिक रूप से पूर्ण स्‍वस्‍थ रह सके? या कि यह संभव नहीं है, ऐसा ताओ का नियम है?


प्रश्न: परसों ही आपने कहा कि अपने को जाने बिना अर्थी नहीं उठने देना। यह चुनौती तीर की तरह हृदय में चुभ गयी। हम कैसे शुरू करें?
नुष्य के बहुत से नाम हैं—अरबी में, उर्दू में, पर्शियन में। आदमी मनुष्य का पर्यायवाची है। होना नहीं चाहिए। क्योंकि मनुष्य का अर्थ होता है, जो मनन करे। और आदमी का अर्थ होता है, जो मिट्टी का बना है। अंग्रेजी में भी मनुष्य का पर्यायवाची है, ह्युमैन।

बुधवार, 11 मई 2016

कोपलें फिर फूट आईं--(प्रवचन--03)

शून्‍य शिखर पर सुख की सेज—( प्रवचन—तीसरा)
दिनांक 2 अगस्त, 1986,
3. 30 अपराहन, सुमिला, जुहू, बंबई।
प्रश्‍नसार:
1—भगवान, वह कौन सी ऐसी अज्ञात शक्ति है, जो हमें आपकी तरफ खींच रही है?
2—बीस साल से आपके साथ रहते—रहते मेरा आमूल—परिवर्तन हो गया है। मैं जो पहले थी, वह अब नहीं हूं। शांति और सुख से भर गई हूं। आपकी अनुकंपा अपार है।
3—आज जीवंत फूल की महक, सुंदरता, निजीपन, फिर से जिंदगी खिल गई। प्‍लास्‍टिक के फूल कैसे भी हों, लेकिन सुवास नहीं।
4—अपने आपको कैसे समझूं? कुछ समझ नहीं आता और मृत्‍यु का ताक बहुत भय लगता है।
5—आपको महसूस कर दिल पर एक मीठी चुभन सी महसूस करती हूं। आप द्वारा प्रेम—वर्षा मुझे आप से बाहर कर देती है।

मंगलवार, 10 मई 2016

कोपलें फिर फूट आईं--(प्रवचन--01)

आत्‍मा की अग्‍नि—(प्रवचन—पहला)

दिनांक 31 जुलाई, 1986,
3. 30 अपराहन, सुमिला, जुहू, बंबई।
प्रश्‍नसार:
1— भगवान, आप कैसे हैं?
2—मुझे मार्ग दीजिए!
3—यह पूछना है, आपने अभी कहा कि हम नासमझ है। आप हमें ऐसा क्‍यों नहीं कहते कि तुम नासमझ हो?.....आप कहते है हम नासमझ है.....।
4—आप कहते है कि पूरब में ही धर्म फलित होता है।....
5—इस देश में बहुत से झूठे धर्म पैदा हो रहे है, जिनमें अधर्म फैल रहा है। ऐसे समय में हमारा क्‍या कर्तव्‍य है? कृपया मार्गदर्शन दे।

सोमवार, 9 मई 2016

प्रेम योग–(दि बिलिव्ड-1)–(प्रवचन–10)

वह गाता है, नाचता है और आंसू बहाता है(प्रवचनदसवां)

दिनांक 30 जून सन्1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :
प्यारे ओशो! बाउलों को किसने जन्म दिया? उनकी शुरुआत कब कैसे हुई?
कृपया स्पष्ट करने की अनुकम्पा करें।
बाउल जैसे लोगों को किसी ने जन्म नहीं दिया। बाउलों जैसे धर्म, धर्म से अधिक घटनाएं हैं। गुलाबों को किसने उत्पन्न किया? उन गीतों को किसने रचा, जो पक्षी हर सुबह गुनगुनाते हैं? नहीं, हमें ऐसे प्रश्न कभी पूछने ही नहीं चाहिए। ऐसा यहां हमेशा ही होता है।

कोपलें फिर फूट आईं--(प्रश्‍न--चर्चा्)

कोपलें फिर फूट आईं—(प्रश्‍न—चर्चा)
ओशो
(ओशो द्वारा दिए गए बारह प्रवचनों का अप्रितम संकलन)

प्रवेश के पूर्व:
तुमने पूछा है: मैं कैसे अपने अचेतने, अपने अंधरे को प्रकाश से भर दूं?
एक छोटा सा काम करना पड़ेगा। बहुत छोटा सा काम।
चौबीस घंटे तुम दूसरे को देखने में लगे हो—दिन में भी और रात में भी। कम से कम कुछ समय दूसरे को भूलने में लगो। जिस दिन तुम दूसरे को बिलकुल भूल जाओगे, बुद्धि की उपयोगिता नष्‍टा हो जाएगी।
इसे ज्ञानियों ने ध्‍यान कहा है। ध्‍यान का अर्थ है: एक ऐसी अवस्‍था,जब जानने को कुछ भी नहीं बचा। सिर्फ जानने वाला ही बचा। उससे छुटकारे का कोई उपाय नहीं है। लाख भागो पहाड़ों पर और रेगिस्‍तानों में, चाँद—तारों पर,लेकिन तुम्‍हारा जानने वाला तुम्‍हारे साथ होगा। चूंकि वह तुम हो, वह तुम्‍हारी आस्‍तित्‍व है। रोज घडी भर, कभी भी सुबह या सांझ या दोपहर, इस अनूठे आयाम को देना शुरू कर दो। बस आँख बंद करे बैठ जाओ, .......

रविवार, 8 मई 2016

प्रेम योग–(दि बिलिव्ड-1)–(प्रवचन–09)

दो वृक्षों के जोड़े से उत्‍पन्‍न हुआ फल(प्रवचननौवां)

दिनांक 29 जून; सन् 1976
श्री ओशो आश्रम पूना।
बाउलगीत:
जो व्यक्ति प्रेम के अनुभव से अनजाना है
उसके साथ सम्बंध जोड़कर तुम कैसे किसी निष्कर्ष परपहुंच सकते हो?
उल्लू सूर्य की किरणों से अंधा बना
बैठा हुआ आकाश को एकटक देखता रहता है।
नुष्य एक अनवरत खोज है, एक शाश्वत तलाश है, और निरंतर बना रहने वाला एक प्रश्न है। यह खोज है उस ऊर्जा के लिए जो पूरे अस्तित्व को संभाले हुए है चाहे तुम उसे परमात्मा कहो, सत्य कहो, अथवा चाहे जिस नाम से पुकारो। कौन एक साथ इस अनंत अस्तित्व को धारण किए हुए है? इस सभी का केंद्र और इसका सबसे महत्त्वपूर्ण भाग कौन है?

शनिवार, 7 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--20)

हे कमल, पंक से उठो, उठो—(प्रवचन—बीसवां)

दिनांक 10 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1—आपकी हत्या की धमकियां दी जा रही हैं । यह मुझसे न सुना जाता है और न सहा जाता है।

2—मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम
ऐ मेरे ख्वाब की ताबीर मेरी जाने-गज़ल
जिन्दगी मेरी तुझे याद किये जाती है।

3—आपने कहा कि सदगुरु शिष्य को संपूर्ण स्वतंत्रता देता है। इसका तो अर्थ हुआ कि वह शिष्य की जरा भी चिंता नहीं करता!

4—अपनी समझ से मैं संन्यास ग्रहण करने की तैयारी करके आया था। यहां आकर पत्नी ने कड़ा विरोध खड़ा किया। इसलिये मैं तत्काल टाल गया। अब लगता है कि मैं ही इसमें सहयोगी हुआ। प्रवेग क्षीण पड़ गया। शायद इतना उत्साह न जुटा पाया कि मैं डूब सकता। दुखी हूं। समाधान देने की अनुकंपा हो!

प्रेम योग–(दि बिलिव्ड-1)–(प्रवचन–08)

तुम स्‍वयं धुलकर तरल हो जाओ(प्रवचनआठवां)

दिनांक 28 जून सन् 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :
प्यारे ओशो! बाउल अपनी देह में जीते हुए ही उत्सव आनंद मनाते हैं। इस सम्बंध में क्या आप कुछ और अधिक बता सकते हैं?
अमेरिकन भी अपने शरीर को सुस्वाद्व और सुंदर भोजन से, राल्फिंग और मालिश आदि से स्वस्थ रखकर जीवन का आनंद लेते हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचती कि यह बाउलों जैसा ही है। क्या आप इस पर हमें कुछ बोध देने की कृपा करेगे?

शुक्रवार, 6 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--19)

प्रेम प्रार्थना है—(प्रवचन—उन्‍नीसवां) 

दिनांक 9 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1--कुछ लोग आपके आश्रम की तुलना जोन्सटाउन से करते हैं। जिस भांति गुयाना के जंगल में सामूहिक आत्मघात हुआ, वैसा ही कुछ क्या यहां होने की संभावना है?

2—क्या आप समझाने की कृपा करेंगे कि आपकी शिक्षा और प्रयोगों में और संप्रदाय में क्या अंतर है?

3—मैं बिलकुल पत्थर हूं और फिर भी प्रार्थना में डूबना चाहता हूं, पर जानता नहीं कि प्रार्थना क्या है? मुझ अंधे को भी आंखें दें।

4—विवाहित जीवन के संबंध में आपके क्या खयाल हैं?

प्रेम योग–(दि बिलिव्ड-1)–(प्रवचन–07)

उसके चरणों में भावों के पुष्प अर्पित हैं—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 27 जून 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
बाऊलगीत:

जब तक तुम पृथ्वी पर हो
तुम पृथ्वी अर्थात् अपनी माटी की देह के प्रति स्वयं ही वचनबद्ध हो।
ओ मेरे हृदय!
यदि तू उस अप्राप्य पुरुष को प्राप्त करना चाहता है—
तो उसके चरणों में
अपने भावों के पुष्पों को अर्पित कर दे;
और अपनी प्रार्थना के आंसुओ से
जो तेरी आंखों से बाढ़ की तरह उमड़ रहे हैं
उन चरणों को भिगो दे।
जिस मानुष की तू खोज कर रहा है।
वह तेरी इस माटी के तन में ही है।
मृत्यु से नवजीवन का प्रारंभ होता है।

गुरुवार, 5 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--18)

हो गया हृदय का मौन मुखर—(प्रवचन—अट्ठहरवां) 

दिनांक 8 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :


1—यह विश्वास ही नहीं आता कि ऋषि-मुनियों के इस देश में और आप जैसे मनीषी के साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया जा रहा है!

2—इस बार कुछ अजीब-सी परिस्थिति में आपके पास पहुंचा। यहां पहुंचने पर घर से तार मिला: जल्दी आओ। परंतु आपकी निकटता के अत्यंत प्रसादपूर्ण, शीतल आनंद को छोड़ पाना इतना सरल नहीं था।

3—राजनैतिक लुच्चे-लफंगों से देश का छुटकारा कब होगा?

4—मैं कैसे भवसागर पार करूं, नौका है टूटी-टूटी!

5—क्या लोग कभी आपको समझ पाएंगे या नहीं?

बुधवार, 4 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--17)

भाई, आज बजी शहनाई—(प्रवचन—सत्रहवां)

दिनांक 7 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1—"नयी दिल्ली' नामक अंग्रेजी पत्रिका में आश्रम में चलने वाली समूह-मनोचिकित्सा संबंधी कई चित्र प्रकाशित हुए हैं, जिसके संबंध में, मेरे दिल्ली प्रवास के समय, वहां के संपादक मुझसे पूछते थे कि आप इस संबंध में क्या कहते हैं?

2—भारतीयों को सामूहिक मनोचिकित्सा में क्यों नहीं सम्मिलित किया जाता है?

3—आप ही मेरे सब कुछ हो। आपके पहले मेरा न किसी संत से मिलना हुआ, न आगे किसी से मिलने की इच्छा है। फिर भी शायद आगे किसी तथाकथित साधु से मिलना हो जाए, तो क्या उसके सम्मोहन का मुझ पर असर हो जाएगा?

मंगलवार, 3 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--16)

भोग में योग, योग में भोग—(प्रवचन—सोलहवां)

दिनांक 6 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सारसूत्र :


जिम विस भक्खइ विसहि पलुत्ता।
तिम भव भुज्जइ भवहि ण जुत्ता।।7।।

परम आणन्द भेउ जो जाणइ ।
खणहि सोवि सहज बुजाइ ।। 8।।

गुण दोस रहिअ एहु परमत्थ ।
सह संवेअण केवि णस्थ ।।9।।

चित्ताचित्त विवज्जहु ण णित्त ।
सहज सरूएं करहु रे थित्त ।। 10।।


आवइ जाइ कहवि ण णइ ।
गुरु उपएसें हिअहि समाइ ।।11।।

हउ सुण जुग सुण तिहुअण सुण।
णिम्मल सहजे ण पाप ण पुण ।।12।।

प्रेम योग–(दि बिलिव्ड-1)–(प्रवचन–06)

नृत्‍य करने योग्‍य बनो—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 26 जून 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
प्रश्‍न सार:

पहला प्रश्न :
प्यारे ओशो! कल आपने कहा था कि अंतर्यात्री के पास केवल दिशा होती है? और लक्ष्य नहीं। इन दोनों के मध्य क्या अंतर है? क्या आप इसे स्पष्ट करने की कृपा करेने?

 ह उत्तर बहुत सूक्ष्म है, लेकिन यह वैसा ही अंतर है। जैसे वहां मन और हृदय के मध्य होता है, जैसा तर्क और प्रेम के मध्य होता है या यह कहना अधिक उचित होगा, जैसे वहां गद्य और कविता के मध्य होता है।

सोमवार, 2 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--15)

प्रेम--समर्पण—स्वतंत्रता—(प्रवचन—पंद्रहवां)

दिनांक 5 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1—आपने कहा कि तुझसे पहले भी मैं ऐसे दो जोड़े बना चुका हूं, तेरा तीसरा जोड़ा है। पर मेरी तो कोई पात्रता भी नहीं, फिर आपने मुझे कैसे चुना?

2—आप कहते हैं कि जीवन को उसके सभी आयामों में जीयो। इससे आपका क्या प्रयोजन है?

3—पाखंड का इतना बल और आकर्षण क्या है?


4—यहूदी संत मुरजुत्रा का विचार था कि "चेले ऐसे पात्र हैं कि उनमें गुरु का रंग झलकना चाहिए। यदि गुरु की गुरुता के बावजूद शिष्य में अपेक्षित गुण नहीं आए तो उसमें दोष गुरु का है।'...कृपया इस कथन पर प्रकाश डालें।

रविवार, 1 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--14)

धरती बरसे अंबर भीजे—(प्रवचन—चौदहवां)


दिनांक 4 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1—मैं वर्षों तक एक विरागी संन्यासी रहा हूं, लेकिन आपने मुझे प्रभु-राग में डुबो दिया है। अब आगे क्या आदेश है?

2—हजारों वर्ष धरती तपश्चर्या करके गर्भ धारण करती है तो कहीं एक बुद्ध का अवतरण होता है। और इस देश में अनंत बुद्ध हो गये। फिर भी जब आप जैसे बुद्धपुरुष वर्तमान हैं, तो भी इस देश के लोगों को, तथाकथित धर्मगुरुओं को तथा शासन में पहुंचे हुए लोगों को आपकी बात समझ में क्यों नहीं आती?


3—आप प्रभु की परम अनुभूति के लिये कभी-कभी शराब जैसा प्रतीक क्यों प्रयोग करते हैं? क्या कोई अच्छा प्रतीक नहीं मिल सकता है?

सहज योग--(प्रवचन--13)

प्रार्थना अर्थात संवेदना—(प्रवचन—तैरहवां)

दिनांक 2 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

1—सिद्ध सरहपा और तिलोपा यह तो बता गए कि क्रियाकांड और अनुष्ठान धर्म नहीं है। कृपया बताएं कि उनके अनुसार धर्म क्या है? उनका संदेश क्या है?

2—मैं नाच रहा हूं यहां। मैं अपने पर चकित हूं। पूछता हूं कि यह क्या हो गया है मुझे?

3—जीवन में दुख-ही-दुख क्यों है? परमात्मा ने यह कैसा जीवन रचा है?

4—प्रश्न का कोई अस्तित्व नहीं, यह जानते हुए विनम्रतापूर्वक मैं जानना चाहूंगा--मा दर्शन ने गुरुकुल कांगड़ी के वेदज्ञाता को आपके भगवान होने के संबंध में उत्तर दिया। मेरी मंद बुद्धि के अनुसार यह उत्तर वही दे सकता है जिसे स्वयं स्मरण है। और जिसे स्वयं स्मरण है, वह स्वयं को भी तो भगवान कह सकता है। लेकिन तब इस उदघोषणा से बचा क्यों जाए?

प्रेम योग–(दि बिलिव्ड-1)–(प्रवचन–05)

मेरी त्वचा और अरिथयां स्वर्णमय हो गईं(प्रवचन—पांचवां)

दिनांक 25 जून 1976;
श्री ओशो आश्रम, पूना।
बउलगीत:

आओ! मेरे पास आओ
यदि तुम किसी अलग तरह के नूतन और स्वाभाविक मनुष्य से भेंट
करना चाहते हो
तो मेरे पास आओ।
उसने उस झोली के लिए
जो भिखारी अपने कंधे पर लटकाये रहते हैं
अपनी सारी सांसारिक सम्पत्ति को व्यर्थ जान कर छोड़ दिया है।
जब भी वह गंगा में नहाने उतरता है
वह काल की देवी शाश्वत मां काली का नाम लेता है।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--12)

प्रेम: कितना मधुर, कितना मंदिर—(प्रवचन—बारहवां)

दिनांक 2 दिसंबर ,1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

1—मैंने मांगा कुछ, और मिला कुछ और। मांगी मन की मृत्यु--मिली मन की मगनता। मेरे मन में ज्ञानऱ्योग का महत्व ज्यादा है, परंतु अब प्रेम-भक्ति के भाव भी सघन हो रहे हैं। मन और शरीर जैसे रस के सरोवर में डूब गये हों! यह सब क्या है?

2—जहां सिद्ध सरहपा और तिलोपा के नाम सुदूर तिब्बत, चीन और जापान में उजागर नाम हैं, वहां अपने ही जन्म के देश में वे उजागर न हुए--इसका क्या कारण हो सकता है?

3—आप कहते हैं कि बुद्ध जहां रहते हैं उनके आस-पास के सूखे हुए वृक्ष भी हरे-भरे हो जाते हैं, मगर ये पूनावासी क्यों सूखते जा रहे हैं?