दिनांक:
4 अगस्त, 1986, 7. 00 संध्या,
सुमिला, जुहू, बंबई।
प्रश्नसार:
1— भगवान, अध्ययन, चिंतन
और श्रवण से
बुद्धिगत समझ
तो मिल जाती है,
लेकिन मेरा
जीवन तो अचेतन
तलघरों से
उठने वाले
आवेगों और
धक्कों से
पीड़ित और
संचालित होता रहता
है। मैं असहाय
हूं, अचेतन
तलघरों तक
मेरी पहुंच
नहीं। कोई
विधि, कोई
जीवन—शैली, सूत्र और
दिशा देने कि
कृपा करें।
2—आपने
ईश्वर तक पहुंचने
के दो मार्ग—प्रेम
ओर ध्यान बताए
है। मेरी स्थिति
ऐसी है कि प्रेम—भाव
मेरे ह्रदय में
उमड़ता नहीं। ऐसा
नहीं है कि मैं
किसी को प्रेम
नहीं करना चाहती।
वे मेरे व्यक्तित्व
का प्रकार नहीं
है। चुप रहना और
शांत बैठना मुझे
अच्छा लगाता
है। इस लिए मैंने
ध्यान का मार्ग
चुन कर साक्षी
की साधना शुरू
की। अब कठिनाई
यह है कि जैसे ही
मैं सजग होकर देख
रही हूं कि मैं
विचारों को देख
रही हूं,
तो विचार रूक जाते
है। और क्षणिक
आनंद का अनुभव
होता है। फिर विचारों
का तांता शुरू
हो जाता है...........
3—ह्रदयको
सभी संतो ने अध्यात्म
का द्वार कहा है
और मन को विचार
और बुद्धि का।
ह्रदय और मन में
क्या फर्क है?
ह्रदय और आत्मा
में क्या फर्क
है? इस फर्क
को कैसे स्पष्ट
करें? कैस पहचानें?



