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बुधवार, 28 जुलाई 2010

अधूरी वासना—(कहानी) लेखक--ओशो

  
(28 नवंबर 1953 के नव भारत (जबलपुर) में इस संपादकीय टिप्‍पणी के साथ यह कहानी पहली बार प्रकाशित हुई थी)
     ‘’ अधूरी वासना ’’ लेखक की रोमांटिक कहानी है।
     भारत के तत्‍व दर्शन में पुनर्जन्‍म का आधार इस जीवन की अधूरी छूटी वासनायें ही है। कहानी के लेखक नह ऐ अन्‍य जगह लिखा है कि ‘’ शरीर में वासनायें है पर वह शरीर के कारण नहीं है, वरन शरीर ही इन वासनाओं के कारण से है।
     अधूरी वासनायें जीवन के उस पास भी जाती है। और नया शरीर धारण करती है। जन्‍मों–पुनर्जन्‍मों का चक्र इन अधूरी छूटी वासना ओर का ही खेल है, लेखक की इस कहानी का विषय केंन्‍द्र यही है।
     23 अगस्‍त 1984 को पुन: नव भारत ने इस के साथ इस कहानी को प्रकाशित किया: संपादकीय टिप्‍पणी:-
     श्री रजनीश कुमार से आचार्य रजनीश और भगवान रजनीश तक का फासला तय करने वाले आचार्य रजनीश का जबलपुर से गहरा संबंध रहा है। अपनी चिंतन धारा और मान्‍यताओं के कारण भारत ही नहीं समूचे विश्‍व में चर्चित श्री रजनीश ने आज से लगभग 31 वर्ष पूर्व नव भारतको एक रोमांटिक कहानी प्रकाशनार्थ भेजी थी और वह जिस संपादकीय टिप्‍पणी के साथ प्रकाशित की गई थी, 28 नवंबर 1953 के नव भारत से लेकिर अक्षरशः: प्रकाशित कर रहे है।
    
      मैं पथ पर अकेला था, मेरा गीत था और दूर-दूर तक पहाड़ी पगडंडियों में चांदनी बिखरी सोई था। रातें ठंडी हो गई थी। और ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों पर बर्फ गिरने लगी थी एक माह की दे थी कि यहां भी बर्फ के गोले पड़ने लगेंगे, नदिया जमकर चाँदी की धारों में बदल जायेगी और काले पहाड़ों की चोटियों पर शुभ्र हिम ऐसे चमकने लगेगा, जैसे पहाड़ों ने अपने जूड़ों पर जुही के सफेद फूल बाँध लिये हो।
      मैं अपने आप में खोया-खोया आगे बढ़ता गया। कभी-कभी पक्षी रात में मौन को तोड़ता निकल जाता और सूनी वादियाँ उसके परों की फड़फड़ाहट में गूंज जाती। फिर रात का ठंडा मौन वैसे ही वापस घिर आता जैसे नदी की छाती पर गिरे पत्‍थर से कांपती लहरें फिर एक दूसरे में मिलकर मौन जो जाती।

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

विनोद खन्‍ना--2 (एक पहचान परदों के पार)

 
यह तो आपके अहंकार पर सब तरफ से सीधी चोट थी। उससे आपके अंदर क्रोध नहीं उठता होगा?
      मुझे बहुत मजा आ रहा था, विनोद ने उस स्‍थिति का जायका लेते हुए कहा। मैं इतना मस्‍ती में था कि मुझे ओशो के पास रहने का मौका मिल रहा है। मेरे मन की सारी उथल पुथल शांत हो गई थी। शायद इस फकीरी की ही मुझे तलाश थी। मैं खूब काम करता था ओर खूब ध्‍यान करता था। समाधि टैंक मुझे बहुत अच्‍छा लगता था। उसमें मां के गर्भ जैसी स्‍थिति बनाई जाती है। वहां पर मुझे अपने जन्‍म का अनुभव भी हुआ।

बुधवार, 21 जुलाई 2010

विनोद खन्‍ना--एक पहचान परदों के पार

मेरा आध्‍यात्‍मिक जीवन तब शुरू हुआ जब मैं उस मुकाम पर पहुंच गया था, जहां पर बहार की कोई चीज में मायना नहीं रखती थी। सब कुछ था मेरे पास: पैसा था, अच्‍छा परिवार था, शोहरत थी, इज्जत.....जो भी इच्‍छाएं थीं सब पूरी हो चुकी थी। उस वक्‍त मैंने यह सोचना शुरू कर दिया कि यह जो चेतना है( कांशसनेस) जिसकी सभी गुरु चर्चा करते है। वह क्‍या है। तो मैं पुस्‍तकों की दुकानों में खोजा करता था। किसी पुस्‍तक में मुझे क्‍या मिलेगा....
      यह किस उम्र में आपकी खोज शुरू हुई?
            वैसे तो में आठ साल का था तभी से में साधुओं के पास जाया करता था। किसी को हाथ दिखा था , किसी के पास आंखें बंद करके, ध्‍यान में बैठ जाता था। फिर मेरी पढ़ाई शुरू हुई, कॉलेज गया तो मेरा यह हिस्‍सा पीछे की और चला गया। मेरे अंदर ख्‍वाहिश जाग उठी के मैं अभिनेता बनूं। उस दिशा में मेरे कदम चल पड़े। वह कहानी ताक सबको पता है। फिर जब मेरा कैरियर कामयाब हो गया तो बचपन की वो चीजें फिर वापस आई। मैं एक दुकान में गया और मैंने परमहंस योगानंद की वह मशहूर किताब खरीद ली: आटो बाई ग्राफी आफ एक योगी—एक ही रात में उसे पुरी पुस्‍तक को पढ़ गया। योगानंद जी की फोटो देख कर मुझे लगा मैं इस आदमी को जानता हूं।
      फिर मेरी ध्‍यान की खोज शुरू हुई। डेढ़ दो साल तक मैंने टी. एम. किया। लेकिन उसमें एक जगह जाकर लगा, अब दिवाल आ गई। थोड़ी बहुत शांति आ जाती है लेकिन उसके बाद कुछ नहीं है। उस बीस मिनट के दौरान थोड़े रंग दिखाई देते थे। दृश्‍य तैरते थे लेकिन आगे क्‍याइसे समझाने वाला कोई नहीं था। उन दिनों हमारे क्षेत्र के विजय आनंद ओशो से संन्‍यास ले चुके थे। महेश भट्ट भी ओशो को सुनते बहुत थे। ये दोनों मेरे अच्‍छे दोस्‍त थे। उनके साथ में पूना आया और ओशो की कुछ कैसेट खरीदे। आश्‍चर्य की बात, उन प्रवचनों में मुझे उन सारे प्रश्‍नों के उत्‍तर मिल गए जो मेरे मन में चलते थे।

रविवार, 18 जुलाई 2010

फकीर संत हरिदास—

   अकबर ने एक दिन तानसेन को कहा, तुम्‍हारे संगीत को सुनता हूं, तो मन में ऐसा ख्‍याल उठता है कि तुम जैसा गाने वाला शायद ही इस पृथ्‍वी पर कभी हुआ हो और न हो सकेगा। क्‍योंकि इससे ऊंचाई और क्‍या हो सकेगी। इसकी धारणा भी नहीं बनती। तुम शिखर हो। लेकिन कल रात जब तुम्‍हें विदा किया था, और सोने लगा तब अचानक ख्‍याल आया। हो सकता है, तुमने भी किसी से सीखा है,ुम्‍हारा भी कोई गुरू होगा। तो मैं आज तुमसे पूछता हूं। कि तुम्‍हारा कोई गुरू है? तुमने किसी से सीखा है?

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

सरहा की गुरु एक तीरंदाज स्‍त्री--(कथा यात्रा-006)

 
सरहा महाराष्‍ट्र के विदर्भ प्रांत में पैदा हुआ। सम्राट महा पाल के दरबार में एक विद्वान ब्राह्मण था। सरहा उस ब्राह्मण का पुत्र था। सम्राट अपनी पुत्री का विवाह सरहा के साथ करने को तैयार था। लेकिन सरहा संन्‍यास लेना चाहता था। वह श्री विमल कीर्ति नामक बौद्ध भिक्षु का शिष्‍य बना।  
      श्री विमल कीर्ति ने सबसे पहली बात जो सरहा से कही वह थी:  सारा पांडित्‍य छोड़ दो। वेदों को भूल जाओ।
      वर्ष बीतते चले गए और सरहा बहुत बड़ा ध्‍यानी बन गया। एक बार ध्‍यान में बैठे-बैठे उसने एक दृश्‍य देखा की बाजार में एक स्‍त्री है जो उसकी असली गुरु बनने वाली हे। श्री विमल कीर्ति ने उसे मार्ग दिखा दिया था लेकिन असली मार्गदर्शन एक स्‍त्री से होने वाला हे।    
      सरहा ने श्री विमल कीर्ति से कहा: आपने मेरी तख्‍ती साफ कर दी, अब मेरे काम का शेष आधा हिस्‍सा करने के लिए में तैयार हूं। विमल कीर्ति हंस पडा और उसने अपने आशीष सरहा को दिए।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

युवक वणिक की सात दिन बाद मृत्‍यु—(कथा यात्रा-005)

 युवक वणिक की सात दिन में मृत्यु-(एस धम्मो सनंतनो)

गवान श्रावस्‍ती नगरी में ठहरे थे। वही जैत बन के पास ही एक नवयुवक वणिक अपनी पाँच से बेल गाड़ियों सहित ठहरा था। जिसमें उसने बहुमूल्य, हीरे जवाहारात, मेवे, वस्‍त्र, आभूषण, और नाना प्रसाधान की वस्तुएँ भरी थी। जिनका वह व्यापार करता था। भगवान सुबह ध्‍यान के बाद ताप्‍ती(अचरवती) के किनारे एक वृक्ष की छाव में बैठे थे। पास ही आनंद टहल रहा था। युवक वणिक का व्यापार इस समय बहुत जोर शोर से चल रहा था। पर भगवान उसके इतने पास थे पर वह धड़ी भर का भी टाईम निकाल कर उन्‍हें सुनने नहीं आया।  वह अपने व्‍यापार की वृद्धि को देख अति प्रसन्‍न हो रहा था।

      वह धन कमाने में इतना तल्‍लीन था उसे भगवान दिखाई ही नहीं दिये। उसके पास से ही हजारों की संख्‍या में रोज श्रावस्‍ती निवासी गूजरें होगें, उससे सामान भी खरीदते होगें। शायद इसी लिए वह वणिक यहां खड़ा हो व्‍यापार कर रहा था। वह जानता था की भगवान को सुनने के लिए यहां से हजारों लोग गुजरते है। जिसमें बहुत धनवान भी होते थे। जिस के मन में वासना जितनी प्रगाढ़ होगी वह ध्यान के विषय में सोचगा भी नहीं। अगर वह किसी को ध्‍यान करते देखेगी तब भी यहीं सोच विचार करेंगे की ये लोग पागल है। इतना समय बैठ कर बरबाद कर रहे है। इतनी देर में तो न जाने कितना धन कमा लेते। वह केवल लाभ हानि की भाष समझता है। और भाषा उसे आती ही नहीं।   

बुधवार, 14 जुलाई 2010

परम संत--सहजो बाई—

 
अब तक मैं मुक्‍त पुरूषों पर ही बोला हूं। पहली बार एक मुक्‍त नारी पर चर्चा शुरू करता हूं। मुक्‍त पुरूषों पर बोलना आसान था। उन्‍हें में समझ सकता हूं-वे सजातीय है। मुक्‍त नारी पर बोलना थोड़ा कठिन है। वह थोड़ा अंजान, अजनबी रस्‍ता है। ऐसे तो पुरूष ओर नारी अंतरतम में एक ही है। लेकिन उनकी अभिव्यक्ति बड़ी भिन्‍न-भिन्‍न है। उनके होने का ढंग उनके दिखाई पड़ने की व्‍यवस्‍था उनका व्‍यक्‍तित्‍व उनके सोचने की प्रक्रिया, न केवल भिन्‍न है बल्‍कि विपरीत भी है।

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

विशाखा--श्‍वसुर की गुरू माता--(कथा यात्रा-004)

विशाखा-श्वसुर की गुरू माता-(एस धम्मो सनंतनो)
विशाखा एक अति धनी परिवार में पैदा हुई थी। उस का पुरा परिवार भगवान बुद्ध से प्रभावित था। उसके पिता धनंजय और माता का नाम सुमना था। उसके पिता भगवान बुद्ध के अटूट भक्तों में से एक थे। वह बचपन से ही अपने माता पिता के साथ धर्म श्रवण को जाती थी। कहते है वह सात साल की थी,तब ही श्रोतापत्ती के फल को उपलब्‍ध हो गई थी। श्रोतापत्‍ती का अर्थ है ध्‍यान की धारा में बह जाना। अपने को छोड़ देना उस आस्तित्व के हाथों। और अपने में डूब जाना। मनुष्‍य जब ही अध्‍यात्‍म की यात्रा पर चल सकता है जब वह श्रोता पन्न को उपल्‍बध हो जाये। ये मनुष्‍य के जीवन के अति महत्‍व पूर्ण पड़ाव है। मनुष्‍य के शरीर को सात चक्रों में विभाजित किया जाये तो यह तीसर मणिपूर चक्र होता है। पहल दो चक्रों तक प्रकृति अपना काम करती है। उत्पत्ति और भय और क्रोध। जो जीवन के अभिन्‍न अंग हे। मणि पुर जिसे हिन्‍दुओं ने उसे सचमुच बहुत ही सुंदर नाम दिया है। वह सच में मणि है। जो मनुष्‍य के अंदर का भाग्‍य खोल देती हे। वह बंध होता है। बिना गुरु के सहयोग के वह कभी नहीं खुलता। पर जिस का खुल गया वह समाज की नजरों में आपको पागल सा लगेंगे। आप कहोगे ये तो उसका दीवाना हो गया। बावरा हो गया।

सोमवार, 12 जुलाई 2010

आर्य रेवत—(ऐतिहासिक कहानी)-कथा यात्रा--003

 
रेवत स्‍थविर सारि पुत्र को छोटा भाई था। राजगृह के पास एक छोटे से गांव का रहने वाला था। सारि पुत्र और मौद्गल्यायन स्‍थविर बचपन से ही संग साथ खेल और बड़े हुए। दोनों ने ही राजनीति ओर धर्म में  तक्ष शिला विश्‍वविद्यालय से शिक्षा प्राप्‍त की । और एक दिन घर परिवार छोड़ कर दोनों ही बुद्ध के अनुयाई हो गये। उस समय घर में बूढ़े माता-पिता, पत्‍नी दो बच्‍चे, दो बहने और छोटा रेवत था। इस बात की परिवार को दु:ख के साथ कही गर्व भी था की उनके सपूत ने बुद्ध को गुरु माना। पर परिवार की हालत बहुत बदतर होती चली गई। कई-कई बार तो खानें तक लाले पड़ जाते। जो परिवार गांव में कभी अमीरों में गिना जाता था। खुशहाल था। अब शरीर के साथ-साथ मकान भी जरजर हो गया था।
     
      रेवत जब बड़ा होने लगा तो उसे तक्ष शिला नहीं भेजा गया पढ़ने के लिए। एक तो तंग हाथ दूसरा सारि पुत्र का यूं अचानक घर से छोड़ जाना। घर को बहुत बड़ा सदमा दे गया। सारी आस उसी पर टीकी थी। की घर गृहथी को सम्हाले। और जो मां बाप ने सालों धन उस पर खर्च किया था उसकी भरपाई करेंगे। बहनों का शादी विवाहा करेंगे। छोटे भाई रेवत को पढ़ाते, पर सब बर्बाद हो गया। घर की हालत दीन हीन होई।

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

धनंजाति ब्राह्मणी---नमा तस्‍य.....(कथा यात्रा)

 
बात राज गृह की है। वहां एक धनंजाति नाम की ब्रह्मणी रहती थी। मायके से उसका परिवार भगवान बुद्ध का अनुयायी था। पर विवाह के वाद जिस परिवार में औरत जाती है। वहीं उसका धर्म हो जाता है। इस लिए तो हमारे पंडित पुरोहित भी पत्‍नी के आगे एक शब्‍द लगा देते है, धर्म पत्‍नी। वह जब दीक्षित हुई तब ही वह श्रोतापति को उपलब्‍ध हो गई। श्रोतापति को अर्थ है कि वह कुछ गया नदी की धारा में   अब उसने अपने को छोड़ दिया आस्‍तित्‍व के बहाव में। वह उसी दिन से ही एक पाठ दोहराती थी। सदा नमो तस्‍य भगवतो अरहंतो सम्‍मासंबुद्धस्‍य दोहराती रहती थी।

सोमवार, 5 जुलाई 2010

रोहिणी का छवि रोग--(कथा यात्रा--002)

 रोहिणी का छवि रोग-(एस धम्मो सनंतनो)
एक बार भगवान कपिलवस्‍तु गए। उनके एक शिष्‍य थे अनिरुद्ध, जिनकी बहन थी रोहणी। वह बहुत सुंदर थी पर बहुत अहंकारी भी थी। अहंकार स्‍त्री को होता है रूप का। दो ही अहंकार होते है एक नाम और एक रूप। नाम यानि सूक्ष्‍म मन जिसके पीछे चले आते है। पद, प्रतिष्‍ठा, यश, धन, त्‍याग…….
      और नारी को रूप का, कुरूप से कुरूप स्‍त्री को भी आप जब सुंदर कहोगे तो वह मान जायेगी की वह सच में ही सुन्‍दर है। तो रोहणी सुन्‍दर थी, रूप का दंभ था उसे रूप के दंभ के कारण मनुष्‍य को बहुत चोट पहुँचती है। अगर उसे कोई सुन्‍दर नहीं कहे या उस के सामने आप किसी दूसरे के रूप गुणों की तारीफ करों तो उसके अहं को बहुत ठेस लगती है। अगर हमें क्रोध आता है तो इसका एक सीधा सा लक्षण है की हमारे अंदर अहंकार है। जहां अहंकार होगा वहां प्रेम नहीं हो सकता।

मंगलवार, 29 जून 2010

चमत्‍कार वैज्ञानिक चित का आभाव—3

   
यह हो सकता है, जीसस ने किसी के हाथ पर हाथ रखा हो और आँख ठीक हो गयी हो, लेकिन फिर भी चमत्‍कार नहीं है। क्‍योंकि पूरी बात अब पता चल गयी है। अब पता चल गयी है कि कुछ अंधे तो सिर्फ मानसिक रूप से अंधे होते है। वे अंधे होते है ही नहीं सिर्फ मेंटल बलांइडनेस होती है। उनको सिर्फ ख्‍याल होता है अंधे होने का और यह ख्‍याल इतना मजबूत हो जाता है कि आँख काम करना बंद कर देती है। अगर कोई आदमी उनको भरोसा दिला दे तो उनकी आंखे ठीक हो सकती है। तो उनका मन तत्‍काल वापस लौट आयेगा और आँख ठीक हो गयी, तो वह तत्‍काल उनका मन वापस लौट आयेगा और आँख के तल पर काम करना शुरू कर देगा।

सोमवार, 28 जून 2010

सोने की मछली —(कथा यात्रा-001)

सोने की मच्छली- (एस धम्मों सनंतनो)
बात उस समय की है, जब भगवान बुद्ध श्रावस्‍ती में विहरते थे। श्रावस्‍ती नगर के पास केवट गांव के कुछ मल्‍लाहों ने अचरवती नदी में जाल फेंककर कर एक स्‍वर्ण-वर्ण की अद्भुत मछली को पकड़ा।  कहानी कहती है अचरवती नदी.....जो चिर नहीं है......अचिर यानि क्षणभंगुर है।
      ऐसा ही तो जीवन है, प्रत्‍येक प्राणी क्षण-क्षण बदलते प्रवाह के संग-साथ जाता है और पकडना चाहता है। जाल फेंक कर बैठे है, अचरवती के किनारे, कोई पद का, यश का, धन का, नाम का......की मछली को पकड़-पकड़ को कहां पकड़ पाता है। कास हम समझ जाते ये जीवन क्षण भंगुर है।
      सोने की मछली तो मल्‍लाहों ने पकड़ ली, जिसका शरीर तो सोने का था, परन्‍तु उसके मुख से भयंकर दुर्गंध आ रही थी।

शुक्रवार, 25 जून 2010

चमत्‍कार वैज्ञानिक चित का अभाव है—2


एक हजार साल गुलाम रहे थे, और यहां ऐसे चमत्‍कारी पड़े है कि जिसका कोई हिसाब नहीं, गुलामी की जंजीरें नहीं कटतीं। ऐसा लगता है कि अंग्रेज के सामने चतत्‍कार नहीं चलता। चमत्‍कार होने के लिए हिंदुस्‍तानी होना जरूरी है। क्‍योंकि अगर खोपड़ी में थोड़ी भी विचार चलता हो, तो चमत्‍कार के कटने का डर रहता है। तो जहां विचार है, बिलकुल न चला पाओगे चमत्‍कार को। सब से बड़ा चमत्‍कार यह है कि लोग चमत्‍कार कर रहे है। सबसे बड़ा चमत्‍कार यह है कि हम खुद भी होते हुए चमत्‍कार देख रहे हे। और घरों में बैठकर चर्चा कर रहे है। कि चमत्‍कार हो रहा है। और कोई इन चमत्‍कारियों की जाकर गर्दन नहीं पकड़ लेता कि जो खो गयी है घड़ी उसको बाहर निकलवा ले, कि क्‍या मामला है। क्‍या कर रहे हो? वह नहीं होता है।

चमत्‍कार वैज्ञानिक चित का अभाव— 1

चमत्‍कार शब्‍द का हम प्रयोग करते है, तो साधु-संतों का खयाल आता है। अच्‍छा होता कि पूछा होता कि मदारियों के संबंध में आपका क्‍या ख्‍याल आता है। अच्‍छा तरह के मदारी है—एक जो ठीक ढंग से मदारी हैं, आनेस्‍ट वे सड़क के चौराहों पर चमत्‍कार दिखाते है। दूसरे: ऐसे मदारी है, डिस्‍आनेस्‍ट, बेईमान, वे साधु-संतों के वेश करके, वे ही चमत्‍कार दिखलाते है। जो चौरस्‍तों पर दिखाई जाते है। बेईमान मदारी सिनर है, अपराधी है, क्‍योंकि मदारी पन के अधार पर वह कुछ और मांग कर रहा है।

बुधवार, 16 जून 2010

महेश भट्ट -विजय आंनद- का संन्यास-ओशो भाग-02

महेश भट्ट-विजय आंनद-का संन्यास-
मरौ हे जोगी मरौ-ओशो
....तो यह तो जब तुम दीक्षा लोगे यह घटना घटेगी। फिर जब तुम दीक्षा छोड़ोगे, इससे उल्‍टी घटना घटेगी। घटनी ही चाहिए, ठीक तर्क है; एक सरणी है उसकी। अब तुम्‍हें बोलना पड़ेगा मेरे खिलाफ। अब तुमने जो-जो संदेह दबा लिए थे, वे सब उभर कर ऊपर आ जायेंगे। और जो-जो श्रद्धा तुमने आरोपित कर ली थी, वह सब तिरोहित हो जायेगी। अब तुम्‍हारे सारे संदेह अतिशयोक्‍ति से प्रकट होंगे। करने ही पड़ेंगे। क्‍योंकि जिसे तुमने छोड़ा वह गलत होना चाहिए, जैसे तुमने जब पकड़ा था तो वह सही था।

      तो विजया नंद पाँच साल मेरे पक्ष में बोलते रहे, अब पचास साल मेरे खिलाफ बोलना पड़ेगा। वे सब जो पाँच साल में दबाये हुए संदेह थे, सब उभरकर आयेंगे। और अब रक्षा करनी होगी, क्‍योंकि वे ही लोग जो कल कहते थे कि क्‍या तुम पागल हो गये हो संन्‍यास लेकर,अब कहेंगे कि हमने पहले ही कहा था कि तुम पागल हो गये हो। अब इनको जवाब देना होगा।  तो अब बड़ी अड़चन खड़ी होगी। उस अड़चन से बचाव करना होगा। बचाव एक ही है कि हम भ्रांति में पड़ गये थे। या बचाव यह है कि कुछ-कुछ बातें ठीक थीं, उन्‍हीं बातों के कारण हम संन्‍यस्‍त हो गये थे। फिर जब संन्‍यस्‍त हुए तब धीरे-धीरे पता चला है कि कुछ-कछ बातें गलत है।

सोमवार, 14 जून 2010

महेश भट्ट -विजय आंनद- का संन्यास-ओशो भाग-01

महेश भट्ट-विजय आंनद-का संन्यास-
मरौ हे जोगी मरौ-ओशो
शिष्‍यों की चार कोटियां है। पहली कोटि—विद्यार्थी की है, जो कुतूहल वश आ जाता है। जिसके आने में न तो साधना की कोई दृष्‍टि है न कोई मुमुक्षा है, न परमात्‍मा को पाने की कोई प्‍यास है। चलें देखें, इतने लोग जाते है, शायद कुछ हो। तुम भी रास्‍ते पर भीड़ खड़ी देखो तो रूक जाते हो, पूछने लगते हो क्‍या मामला है? भीतर प्रवेश करना चाहते हो, भीड़ में। देखना चाहते हो कुछ हुआ होगा.....। नहीं कि तुम्‍हें कोई प्रयोजन है, अपने काम से जाते थे। आकस्‍मिक कुछ लोग आ जाते है। कोई आ रहा है। तुमने उसे आते देखा;उसने कहा: क्‍या करते हो बैठे-बैठ, आओ मेरे साथ चलो, सत्‍संग में ही बैठेंगे। खाली थे कुछ काम भी न था, चले आये। पत्‍नी आयी, पति साथ चला आया; पति आया, पत्‍नी साथ चली आई। बाप आया बेटा साथ चला आया।

      ऐसे बहुत से लोग आकस्‍मिक रूप से आ जाते है। उनकी स्‍थिति विद्यार्थी की है। वे कुछ सूचनाएं इकट्ठी कर लेंगे, सुनेंगे तो कुछ सूचनाएं इकट्ठी हो जायेगी। उनका ज्ञान थोड़ा बढ़ जायेगा। उनकी स्‍मृति थोड़ी सधन होगी। ऐसे आने वालों में से, सौ में से दस ही रूकेंगे; नब्‍बे तो छिटक जायेंगे। दस रूक जाते है यह भी चमत्‍कार है। क्‍योंकि वे आये न थे किसी सजग-सचेत प्रेरण के कारण—ऐसे ही मूर्छित -मूर्छित किसी के धक्‍के में चलें आये थे पानी में बहती हुई लकड़ी की तरह किनारे लग गये थे। किनारे की कोई तलाश नहीं थी।

शनिवार, 12 जून 2010

ज्‍योतिष अर्थात अध्‍यात्‍म—7

  

बहुत पुराना संघर्ष है आदमी के चिन्‍तन का। अगर आदमी पूरी तरह स्‍वतंत्र है जैसा ज्‍योतिषी साधारणत: कहते हुए मालूम पड़ते है, कि सब सुनिश्‍चित है, जो विधि ने लिखा है वह होकर रहेगा तो फिर सारा धर्म व्‍यर्थ हो जाता है। और या फिर जैसा कि तथाकथित तर्कवादी और बुद्धिवादी गुरु कहते है कि सब स्‍वच्‍छन्‍द है, कुछ बंधा हुआ नहीं है। कुछ होने का निश्‍चित नहीं है, कुछ अनिश्‍चित है—तो जिन्‍दगी एक के ऑफ और एक अराजकता और एक स्‍वच्‍छन्‍दता हो जाती है। फिर तो यह भी हो सकता है कि मैं चोरी करूं और मोक्ष पा जाऊं, हत्‍या करूं और परमात्‍मा मिल जाए। क्‍योंकि जब कुछ भी बन्‍धा हुआ नहीं है। और किसी भी कदम से कोई दूसरा कदम बंधता नहीं है और अब कहीं भी कोई नियम और सीमा नहीं है......।

सोमवार, 7 जून 2010

ज्‍योतिष अर्थात अध्‍यात्‍म—6

  जब बुद्ध को ज्ञान हुआ, तब बुद्ध ने दोनों हाथ जोड़कर पृथ्‍वी पर सिर टेक दिया। कथा है कि आकाश से देवता बुद्ध को नमस्‍कार करने आए थे कि  वह परम ज्ञान को उपलब्‍ध हुए है। बुद्ध को पृथ्‍वी पर हाथ टेके सिर रखे देखकर वे चकित हुए। उन्‍होने पूछा: तुम, और किसको नमस्‍कार कर रहे हो। क्‍योंकि हम तो तुम्‍हें नमस्‍कार करने स्‍वर्ग से आते है। हम तो नहीं जानते कि बुद्ध भी किसी को नमस्‍कार करे, ऐसा कोई है। बुद्धत्‍व तो आखिरी बात है। बुद्ध ने आंखें खोली और बुद्ध ने कहा, जो भी घटित हुआ है उसमें मैं अकेला नहीं हूं, सारा विश्‍व है। तो इस सबको धन्‍यवाद देने के लिए सिर टेक रहा था। यह एसेंशियल एस्‍ट्रोलाजी से बंधी हुई बात है—सार जगत।

शनिवार, 5 जून 2010

ज्‍योतिष अर्थात अध्‍यात्‍म—5

ज्‍योतिष से इसका कोई लेना देना नहीं है। और चुंकी ज्‍योतिष इस तरह की बात चीत में लगे रहते है। इसलिए ज्‍योतिष का भवन गिर गया। ज्‍योतिष के भवन के गिर जाने का कारण यही हुआ। कोई भी बुद्धिमान आदमी इस बात को मानने को राज़ी नहीं हो सकता है,  कि मैं जिस दिन पैदा हुआ उस दिन लिखा था कि मरीन ड्राइव पर फलां-फलां दिन एक छिलके पर मेरा पैर पड़ जाएगा। और फिसल जाऊँगा। न तो मेरे फिसलने का चाँद तारों से प्रयोजन है, न उस छिलके का कोई प्रयोजन है। इन बातों से संबंधित होने के कारण ज्‍योतिष बदनाम हुआ। और हम सबकी उत्‍सुकता यहीं है। कि ऐसा पता चल जाए। इससे कोई संबंध नहीं है।