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बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--150

आधुनिक मनुष्‍य की साधना(प्रवचनगयारहवां)

अध्‍याय—12
सूत्र—

तुल्यनिन्दास्तुतिमौंनी संतुष्‍टो थेन केनचित्।
अनिकेत: स्थिरमतिभक्‍तिमान्मे प्रियो नर:।। 19।।
ये त धर्म्‍यामृतमिदं यथोक्‍तं पर्युयासते।
श्रहधाना मत्यरमा भक्तास्‍तउतीव मे प्रिया:।। 20।।

तथा जो निंदा— स्तुति को समान समझने वाला और मननशील है, एवं जिस—किस प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने मैं सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता से रहित ह्रै वह स्थिर बुद्धि वाला भक्‍तिमान पुरुष मेरे को प्रिय है।
और जो मेरे को परायण हुए श्रद्धायुक्‍त पुरुष इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम भाव से सेवन करते है, वे भक्त मेरे को अतिशय प्रिय हैं।


 पहले कुछ प्रश्न:

एक मित्र ने पूछा है, क्या बंदरों की तरह उछल—कूद से ध्यान उपलब्ध हो सकेगा?

 क्‍यों कि आप बंदर हैं, इसलिए बिना उछल—कूद के आपके भीतर के बंदर से छुटकारा नहीं है। यह ध्यान के कारण उछल—कूद की जरूरत नहीं है, आपके बंदरपन के कारण है।
जो आपके भीतर छिपा है, उसे जन्मों—जन्मों तक दबाए रहें, तो भी उससे छुटकारा नहीं है। उसे झाडू ही देना होगा, उसे बाहर फेंक ही देना होगा। कचरे को दबा लेने से कोई मुक्ति नहीं होती। उसे झाड़—बुहारकर बाहर कर देना जरूरी है।
बंदर को शांत करने के दो रास्ते हैं, एक रास्ता है कि जोर—जबरदस्ती से उसे बिठा दो, डंडे के डर से कि हिलना मत, डुलना मत, नाचना मत, कूदना मत। ऊपर से बंदर अपने को सम्हाल लेगा, लेकिन भीतर के बंदर का क्या होगा? ऊपर से बंदर अपने को रोक लेगा, लेकिन भीतर और शक्ति इकट्ठी हो जाएगी। और अगर इस तरह बंदर को दबाया, तो बंदर पागल हो जाएगा। बहुत लोग इसी तरह पागल हुए हैं। पागलखाने उनसे भरे पड़े हैं। क्योंकि भीतर जो शक्ति थी, उसने उसको जबरदस्ती दबा लिया, वह शक्ति विस्फोटक हो गई है।
एक रास्ता यह है कि बंदर को नचाओ, कुदाओ, दौड़ाओ। बंदर थक जाएगा और शांत होकर बैठ जाएगा। वह शांति अलग होगी; ऊपर से दबाकर आ गई शांति अलग होगी।
आज मनोविज्ञान इस बात को बड़ी गहराई से स्वीकार करता है कि आदमी के भीतर जो भी मनोवेग हैं, उनका रिप्रेशन, उनका दमन खतरनाक है। उनकी अभिव्यक्ति योग्य है।
लेकिन अभिव्यक्ति का मतलब किसी पर क्रोध करना नहीं है, किसी पर हिंसा करना नहीं है। अभिव्यक्ति का अर्थ है, बिना किसी के संदर्भ में मनोवेग को आकाश में समर्पित कर देना। और जब मनोवेग समर्पित हो जाता है और भीतर की दबी हुई शक्ति छूट जाती है, मुक्त हो जाती है, तो एक शांति भीतर फलित होती है। उस शांति में ध्यान की तरफ जाना आसान है।
यह उछल—कूद ध्यान नहीं है। लेकिन उछल—कूद से आपके भीतर की उछल—कूद थोड़ी देर को फिंक जाती है, बाहर हट जाती है। उस मौन के क्षण में, जब बंदर थक गया है, भीतर उतरना आसान है।
जो लोग आधुनिक मनोविज्ञान से परिचित हैं, वे इस बात को बहुत ठीक से समझ सकेंगे। पश्चिम में अभी एक नई थैरेपी, एक नया मनोचिकित्सा का ढंग विकसित हुआ है। उस थैरेपी का नाम है, स्कीम थैरेपी। और पश्चिम के बड़े से बड़े मनोवैज्ञानिक उसके परिणामों से आश्चर्यचकित रह गए हैं। इस थैरेपी, इस चिकित्सा की मूल खोज यह है कि बचपन से ही प्रत्येक व्यक्ति अपने रोने के भाव को दबा रहा है। रोने का उसे मौका नहीं मिला है। पैदा होने के बाद पहला काम बच्चा करता है, रोने का। आपको पता है, अगर आप उसको भी दबा दें, तो बच्चा मर ही जाएगा।
पहला काम बच्चा करता है रोने का, क्योंकि रोने की प्रक्रिया में ही उसकी श्वास चलनी शुरू होती है। अगर हम उसे वहीं रोक दें कि रो मत, तो वह मरा हुआ ही रहेगा, वह जिंदा ही नहीं हो पाएगा। इसलिए बच्चा पैदा हो और अगर न रोए, तो मां—बाप चिंतित हो जाएंगे, डाक्टर परेशान हो जाएगा। रुलाने की कोशिश की जाएगी कि वह रो ले, क्योंकि रोने से उसकी जीवन प्रक्रिया शुरू होगी। लेकिन बच्चे को तो हम रोकते भी नहीं।
लेकिन जैसे—जैसे बच्चा बढ़ने लगता है, हम उसके रोने की प्रक्रिया को रोकने लगते हैं। हमें इस बात का पता नहीं है कि इस जगत में ऐसी कोई भी चीज नहीं है, जिसका जीवन के लिए कोई उपयोग न हो। अगर उपयोग न होता, तो वह होती ही न।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चे के रोने की जो कला है, वह उसके तनाव से मुक्त होने की व्यवस्था है। और बच्चे पर बहुत तनाव हैं। बच्चे को भूख लगी है और मां दूर है या मां काम में उलझी है। बच्चे को भी क्रोध आता है। और अगर बच्चा रो ले, तो उसका क्रोध बह जाता है और बच्चा हलका हो जाता है। लेकिन मां उसे रोने नहीं देगी।
मनसविद कहते हैं कि उसे रोने देना; उसे प्रेम देना, लेकिन उसके रोने को रोकने की कोशिश मत करना। हम क्या करेंगे? बच्चे को खिलौना पकड़ा देंगे कि मत रोओ। बच्चे का मन डाइवर्ट हो जाएगा। वह खिलौना पकड़ लेगा। लेकिन रोने की जो प्रक्रिया भीतर चल रही थी, वह रुक गई। और जो आंसू बहने चाहिए थे, वे अटक गए। और जो हृदय हलका हो जाता बोझ से, वह हलका नहीं हो पाया। वह खिलौने से खेल लेगा, लेकिन यह जो रोना रुक गया, इसका क्या होगा? यह विष इकट्ठा हो रहा है।
मनसविद कहते हैं कि बच्चा इतना विष इकट्ठा कर लेता है, वही उसकी जिंदगी में दुख का कारण है। और वह उदास रहेगा। आप इतने उदास दिख रहे हैं, आपको पता नहीं कि यह उदासी हो सकता था न होती; अगर आप हृदयपूर्वक जीवन में रोए होते, तो ये आंसू आपकी पूरी जिंदगी पर न छाते; ये निकल गए होते। और सब तरह का रोना थैराप्यूटिक है। हृदय हलका हो जाता है। रोने में सिर्फ आंसू ही नहीं बहते, भीतर का शोक, भीतर का क्रोध, भीतर का हर्ष, भीतर के मनोवेग भी आंसुओ के सहारे बाहर निकल जाते हैं। और भीतर कुछ इकट्ठा नहीं होता है।
तो स्कीम थैरेपी के लोग कहते हैं कि जब भी कोई आदमी मानसिक रूप से बीमार हो, तो उसे इतने गहरे में रोने की आवश्यकता है कि उसका रोआं—रोआं, उसके हृदय का कण—कण, श्वास, धड़कन— धड़कन रोने में सम्मिलित हो जाए; एक ऐसे चीत्कार की जरूरत है, जो उसके पूरे प्राणों से निकले, जिसमें वह चीत्कार ही बन जाए।
हजारों मानसिक रोगी ठीक हुए हैं चीत्कार से। और एक चीत्कार भी उनके न मालूम कितने रोगों से उन्हें मुक्त कर जाती है। लेकिन उस चीत्कार को पैदा करवाना बड़ी कठिन बात है। क्योंकि आप इतना दबाए हैं कि आप अगर रोते भी हैं, तो रोना भी आपका झूठा होता है। उसमें आपके पूरे प्राण सम्मिलित नहीं होते। आपका रोना भी बनावटी होता है। ऊपर—ऊपर रो लेते हैं। आंख से ही आंसू बह जाते हैं, हृदय से नहीं आते। लेकिन चीत्कार ऐसी चाहिए, जो आपकी नाभि से उठे और आपका पूरा शरीर उसमें समाविष्ट हो जाए। आप भूल ही जाएं कि आप चीत्कार से अलग हैं, आप एक चीत्कार ही हो जाएं।
तो कोई तीन महीने लगते हैं मनोवैज्ञानिकों को, आपको रुलाना सिखाने के लिए। तीन महीने निरंतर प्रयोग करके आपको गहरा किया जाता है।
करते क्या हैं इस थैरेपी वाले लोग? आपको छाती के बल लिटा देते हैं जमीन पर। और आपसे कहते हैं कि जमीन पर लेटे रहें और जो भी दुख मन में आता हो, उसे रोकें मत, उसे निकालें। रोने का मन हो, रोएं; चिल्लाने का मन हो, चिल्लाएं।
तीन महीने तक ऐसा बच्चे की भांति आदमी लेटा रहता है जमीन पर रोज घंटे, दो घंटे। एक दिन, किसी दिन वह घड़ी आ जाती है कि उसके हाथ—पैर कंपने लगते हैं विद्युत के प्रवाह से। वह आदमी आंख बंद कर लेता है, वह आदमी जैसे होश में नहीं रह जाता, और एक भयंकर चीत्कार उठनी शुरू होती है। कभी—कभी घंटों वह चीत्कार चलती है। आदमी बिलकुल पागल मालूम पड़ता है। लेकिन उस चीत्कार के बाद उसकी जो—जो मानसिक तकलीफें थीं, वे सब तिरोहित हो जाती हैं।
यह जो ध्यान का प्रयोग मैं आपको कहा हूं ये आपके जब तक मनोवेग—रोने के, हंसने के, नाचने के, चिल्लाने के, चीखने के, पागल होने के—इनका निरसन न हो जाए, तब तक आप ध्यान में जा नहीं सकते। यही तो बाधाएं है।
आप शांत होने की कोशिश कर रहे हैं और आपके भीतर वेग भरे हुए हैं, जो बाहर निकलना चाहते हैं। आपकी हालत ऐसी है, जैसे केतली चढ़ी है चाय की। ढक्कन बंद है। ढक्कन पर पत्थर रखे हैं। केतली का मुंह भी बंद किया हुआ है और नीचे से आग भी जल रही है। वह जो भाप इकट्ठी हो रही है, वह फोड़ देगी केतली को। विस्फोट होगा। दस—पांच लोगों की हत्या भी हो सकती है।
इस भाप को निकल जाने दें। इस भाप के निकलते ही आप नए हो जाएंगे और तब ध्यान की तरफ प्रयोग शुरू हो सकता है।

 उन मित्र ने यह भी पूछा है कि बुद्ध ने, महावीर ने और लाओत्से ने भी क्या ऐसी ही बात सिखाई है?

 हीं; लाओत्से, और बुद्ध, और महावीर ने ऐसी बात नहीं सिखाई, क्योंकि वे आपको नहीं सिखा रहे थे; वे दूसरे तरह के लोगों को सिखा रहे थे। आप मौजूद होते, तो उनको भी यही सिखाना पड़ता।
बुद्ध और महावीर जिन लोगों से बात कर रहे थे, वे ग्रामीण लोग थे—सीधे, शांत, सरल, निर्दोष, स्वाभाविक। उन्होंने कुछ दमन नहीं किया हुआ था। उन्होंने कुछ रोका नहीं था। जितना आदमी सभ्य होता है, उतना दमित होता है। सभ्यता दमन का एक प्रयोग है। फ्रायड ने तो यह स्वीकार किया है कि सभ्यता हो ही नहीं सकती, अगर दमन न हो।
इसलिए आप देखें, एक मजे की घटना। आदिवासी सरल हैं, लेकिन सभ्य नहीं हो पाते। दुनिया में छोटे—छोटे कबीले हैं जंगली लोगों के। बड़े अच्छे लोग हैं, प्यारे लोग हैं, सरल हैं, आनंदित हैं, लेकिन सभ्य नहीं हो पाते। आप समझते हैं, क्या कारण है?
आखिर जितनी भी अच्छी कौमें हैं, अच्छी जातियां हैं, जंगलों में छिपी हुई, निर्दोष हैं, वे सभ्य क्यों नहीं हो पातीं? न्यूयार्क और बंबई जैसे नगर वे क्यों नहीं बसा पातीं? आकाश में हवाई जहांज क्यों नहीं उड़ा पातीं? चांद पर क्यों नहीं पहुंच पातीं? एटम और हाइड्रोजन बम क्यों नहीं खोज पातीं? रेडियो और टेलीविजन क्यों नहीं बना पातीं?
ये अच्छे लोग, शांत लोग नाचते तो हैं, लेकिन चांद पर नहीं पहुंच पाते। गीत तो गाते हैं, लेकिन एटम बम नहीं बना पाते। खाने को भी मुश्किल से जुटा पाते हैं; कपड़ा भी न के बराबर, अर्धनग्न। आधे भूखे, लेकिन हैं निर्दोष। चोरी नहीं करते हैं, झूठ नहीं बोलते हैं। वचन दें, तो प्राण भी चले जाएं, तो भी पूरा करते हैं। लेकिन ये लोग सभ्य क्यों नहीं हो पाते? समृद्ध क्यों नहीं हो पाते?
तो फ्रायड का कहना है, और ठीक कहना है, कि ये लोग इतने आनंदित हैं और इतने सरल हैं कि इनके भीतर भाप इकट्ठी नहीं हो पाती, जिससे सभ्यता का इंजन चलता है। इनका क्रोध इकट्ठा नहीं हो पाता, घृणा इकट्ठी नहीं हो पाती, कामवासना इकट्ठी नहीं हो पाती। वही इकट्ठी हो जाए, तो उसी स्टीम, उसी भाप को फिर दूसरी तरफ मोड़ा जा सकता है। तो फिर उससे ही मकान जमीन से उठना शुरू होता है, आकाश तक पहुंच जाता है। वह आपके दमित वेगों की भाप है। नहीं तो झोपड़े से आप आकाश छूने वाले मकान तक नहीं जा सकते।
यह सारी की सारी सभ्यता डाइवर्शन है आपकी शक्तियों का। इसलिए परिणाम साफ है कि कोई आदमी सरल हो, शांत हो, स्वाभाविक हो, तो सभ्यता का यह जाल खड़ा नहीं हो सकता। और सभ्यता का जाल खड़ा करना हो, तो आपके भीतर जितना उपद्रव है, उसके निकलने के सब द्वार बंद करने जरूरी हैं; सब द्वार बंद करके उसे एक ही द्वार से निकलने देना जरूरी है।
इसलिए हमारी शिक्षा की सारी प्रक्रिया आपकी समस्त तरह की वासनाओं को इकट्ठा करके महत्वाकांक्षा में लगाने की प्रक्रिया है, सारी वासनाओं को इकट्ठा करके अहंकार की पूर्ति की दिशा में दौड़ाने की प्रक्रिया है।
इसलिए फ्रायड ने यह भी कहा है कि अगर हम आदमी को सरल बनाने में सफल हो जाएं, तो वह पुन: असभ्य हो जाएगा। अब यह बड़ी कठिनाई है। अगर सभ्यता चाहिए, तो आदमी जटिल होगा, रुग्ण होगा, विक्षिप्त होगा। अगर शांति चाहिए, आनंद चाहिए, स्वाभाविकता चाहिए, तो सभ्यता खो जाएगी। आदमी गरीब होगा, प्रसन्न होगा, समृद्ध नहीं हो सकता।
तो फ्रायड ने तो यह कहा है कि आदमी एक असंभव बीमारी है। या तो यह गरीब होगा, सभ्यता के सुख इसे नहीं मिल सकेंगे, सभ्यता की समृद्धि इसे नहीं मिल सकेगी। और अगर यह समृद्ध होगा, तो यह पागल हो जाएगा, विक्षिप्त हो जाएगा, शांत नहीं रह जाएगा।
बुद्ध और महावीर जिनको समझा रहे थे, वे बड़े सरल लोग थे। उनका कुछ दबा हुआ नहीं था। इसलिए उन्हें ध्यान में सीधे ले जाया जा सकता था। आप सीधे ध्यान में नहीं ले जाए जा सकते। आप बहुत जटिल हैं। आप उलझन हैं एक।
पहले तो आपकी उलझन को सुलझाना पड़े, और आपकी जटिलता कम करनी पड़े, और आपके रोगों से थोड़ा छुटकारा करना पड़े। टेम्परेरी ही सही, चाहे अस्थायी ही हो, लेकिन थोड़ी देर के लिए आपकी भाप को अलग कर देना जरूरी है, जो आपको उलझाए हुए है। तो आप ध्यान की तरफ मुड़ सकते हैं, अन्यथा आप नहीं मुड़ सकते।
इसलिए दुनिया कीं सारी पुरानी पद्धतियां ध्यान की, आपके कारण व्यर्थ हो गई हैं। आज उनसे कोई काम नहीं हो रहा है। आपमें सौ में से कभी एकाध आदमी मुश्किल से होता है, जिस पर पुरानी पद्धति पुराने ही ढंग में काम कर पाए। निन्यानबे आदमियों के लिए कोई पुरानी पद्धति काम नहीं कर पाती।
उसका कारण यह नहीं है कि पुरानी पद्धतियां गलत हैं। उसका कुल कारण इतना है कि आदमी नया है और पद्धतियां जिन आदमियों के लिए विकसित की गई थीं, वे पृथ्वी से खो गए हैं। आदमी दूसरा है। यह जो इलाज है, यह आपके लिए विकसित नहीं हुआ था। आपने इस बीच नई बीमारियां इकट्ठी कर ली हैं।
तीन हजार, चार हजार, पांच हजार साल पहले ध्यान के जो प्रयोग विकसित हुए थे, वे उस आदमी के लिए थे, जो मौजूद था। वह आदमी अब नहीं है। उस आदमी का जमीन पर कहीं कोई निशान नहीं रह गया है। अगर कहीं दूर जंगलों में थोड़े से लोग मिल जाते हैं, तो हम उनको जल्दी से शिक्षित करके सभ्य बनाने की पूरी कोशिश में लगे हैं। और हम सोचते हैं, हम बड़ी कृपा कर रहे हैं, उनकी सेवा कर रहे हैं।
अभी एक महिला मेरे पास आई थी। अपना जीवन लगा दिया है आदिवासियों को शिक्षित करने में। वह मेरे पास आई थी कि कुछ रास्ते बताइए कि हम आदिवासियों को कैसे सभ्य बनाएं! मैंने उससे पूछा कि पहले तू मुझे यह बता कि जो सभ्य हो गए हैं, ज्यादा से ज्यादा आदिवासी भी सभ्य होकर यही हो पाएंगे, और क्या होगा! तो तुझे क्या परेशानी हो रही है? और ये जो सभ्य लोग दिखाई पड़ रहे हैं, क्या इनसे तुझे तृप्ति है कि थोड़े आदिवासियों को इन्हीं जैसा बना देने से कोई दुनिया का गौरव और कोई सुख—शांति बढ़ जाएगी?
तो वह बहुत घबड़ा गई। उसने कहा, मैंने अपने जीवन के तीस साल इसी में लगा दिए, लेकिन मुझे कभी किसी ने यह कहा नहीं। यह मैं सोचती हूं, तब तो घबड़ाहट होती है कि शिक्षित होकर ज्यादा से ज्यादा यही होगा। मगर जो शिक्षित हो गए हैं, उनको क्या लाभ है!
मगर उस महिला की भी अपनी मजबूरी है। अपनी कामवासना को दबा लिया है। विवाह नहीं किया है; किसी से कभी प्रेम नहीं किया; ब्रह्मचर्य को मानने वाली है। क्रोध नहीं करती है; अक्रोध का व्रत लिया है। झूठ नहीं बोलती है, सच बोलने की कसम खाई है। इस तरह सब भांति अपने को रोक रखा है। अब वह जो भाप इकट्ठी हो गई है, उसका क्या करना? वह जो जीवन ऊर्जा इकट्ठी हो गई है, उसका क्या करना?
तो वह पागल की तरह आदिवासियों की सेवा में लगी है, बिना इसकी फिक्र किए कि सेवा का परिणाम क्या होगा! तुम्हारी भाप तो निकली जा रही है, लेकिन जिन पर निकल रही है, उनका परिणाम क्या है? क्या फायदा होगा?
आदमी जैसा आज है, ऐसा आदमी जमीन पर कभी भी नहीं था।
यह बड़ी नई घटना है। और इस नई घटना को सोचकर ध्यान की सारी पद्धतियों में रेचन, कैथार्सिस का प्रयोग जोड़ना अनिवार्य हो गया है। इसके पहले कि आप ध्यान में उतरें, आपका रेचन हो जाना जरूरी है। आपकी धूल हट जानी जरूरी है।

 लेकिन वे मित्र समझदार हैं। और उन्होंने लिखा है कि आप हमें धोखा न दे पाएंगे। इस उछल—कूद से कोई भी लाभ होने वाला नहीं है।

 क बात तो पक्की है कि उन्होंने उछल—कूद नहीं की। और वही उछल—कूद जो बच गई है, उनके इस प्रश्न में निकली है। वे कर लेते, तो हलके हो जाते। और बंदर उनके पास निश्चित है और गहरा है। चैन नहीं पड़ी उनको रात जाकर। वे बेचैन रहे होंगे रातभर; शायद सोए भी न हों, क्योंकि बड़े क्रोध से प्रश्न लिखा है। प्रश्न कम है, गाली—गलौज ज्यादा है। इससे तो बेहतर था कि यहां निकाल ली होती, तो रात हलके सो गए होते और प्रश्न में गाली—गलौज न होती।
और मैं आपको धोखा दे रहा हूं! क्या प्रयोजन हो सकता है? और आपके नाचने से मुझे क्या लाभ होगा? और आप बंदर की तरह उछल—कूद कर लेंगे, तो किसका हित सधने वाला है?
लिखा है कि आप हमें धोखा न दे पाएंगे।
पर तुम्हें धोखा देने की जरूरत भी क्या है? प्रयोजन भी क्या है? पर वे यह कह रहे हैं कि हम धोखे में न आएंगे। वे असल में यह कह रहे हैं कि हम धोखे में न आएंगे। वे यह कह रहे हैं कि हम जैसे हैं, हम ऐसे ही रहेंगे। हम किसी को बदलने का कोई मौका न देंगे। मत दें। आपकी मर्जी है। आप अपने से प्रसन्न हों, तो यहां मुझे सुनने आने की भी क्या जरूरत है! आप जैसे हैं भले हैं। आपको यहां परेशान होने की भी क्या जरूरत है! आपको ध्यान में आने की भी क्या जरूरत है! लेकिन अगर आने की कोई जरूरत है, अगर चिकित्सक के पास आप जाते हैं, तो बीमार हैं, इस बात की खबर देते हैं।
मैं एक चिकित्सक हूं इससे ज्यादा नहीं। अगर आप मेरे पास आते हैं, तो आप बीमार होने की खबर देते हैं। और आपकी बीमारी को अगर अलग करने के लिए मैं कोई दवा बताऊं, तो आप कहते हैं, आप हमें धोखा न दे पाओगे। तो आने की कोई जरूरत नहीं है। आप अपने घर मजे में हैं। किसी दिन मुझे जरूरत होगी, मैं आपके घर आ जाऊंगा।
लेकिन आप मत आएं। आप अपने को बचाएं। आप जितना अपने को बचाएंगे, उतना ही लाभ होगा! क्योंकि उतने ही आप परेशान होंगे, पीड़ित होंगे, पागल होंगे। और जिस दिन बात सीमा के बाहर चली जाए, उस दिन कहीं बिजली के शॉक आपको लगाने पड़ेंगे।
मैं कहता हूं अभी कूद लें, ताकि बिजली के शॉक न लगाने पड़े। और अभी कूद लें, ताकि पागलखाने में न बिठालना पड़े। अपने पागलपन को अपने ही हाथ से बाहर फेंक दें, ताकि किसी और को आपके पागलपन को फेंकने के लिए कोई उपाय और कोई सर्जरी न करनी पड़े। लेकिन आप नहीं सोचते।
इसे हम कई तरह से समझने की कोशिश करें।
सिर्फ इंगलैंड एक मुल्क है, जहां के स्कूल के बच्चे पत्थर नहीं फेंक रहे हैं; सारी दुनिया में फेंके जा रहे हैं। सिर्फ इंगलैंड अकेला मुल्क है, जहां के बच्चे स्कूल में शिक्षकों को पत्थर नहीं मार रहे हैं, गाली नहीं दे रहे हैं, परेशान नहीं कर रहे हैं। तो सारी दुनिया के विचारशील लोग परेशान हैं कि इंगलैंड में यह क्यों नहीं हो रहा है! सारी दुनिया में बड़े पैमाने पर हो रहा है। तो एक बात खोजी गई और वह यह कि इंगलैंड के हर स्कूल में बच्चों को कम से कम दो घंटे खेल खेलना पड़ रहा है। वही कारण है, और कोई कारण नहीं है। जो बच्चा दो घंटे तक हाकी की चोट मार रहा है, वह पत्थर फेंकने में उत्सुक नहीं रह जाता। उसने फेंकने का काम पूरा कर लिया। जो बच्चा फुटबाल को लात मार रहा है दो घंटे तक, उसकी इच्छा नहीं रह जाती अब किसी को लात मारने की। लात मारने की वासना निकल गई।
इंगलैड के मनोवैज्ञानिकों का सुझाव है कि सारी दुनिया में अगर बच्चों के उपद्रव रोकने हैं, तो उनको खेलने की गहन प्रक्रियाएं देनी होंगी, जिनमें उनकी हिंसा निकल जाए। और बच्चों में बड़ी हिंसा है, क्योंकि बच्चों में बड़ी ताकत है।
हमारे स्कूल में बच्चा क्या कर रहा है? पाच—छ: घंटे आप उसको बिठा रखते हैं। कोई बच्चा प्रकृति से पांच—छ: घंटे एक क्लास के रूम में बैठने को पैदा नहीं हुआ है। प्रकृति ने कोई इंतजाम नहीं किया है, कोई बिल्ट—इन व्यवस्था नहीं है भीतर कि छ: घंटे बच्चे को बिठाया जा सके। छ: घंटे बच्चे को बिठाने का मतलब है कि छ: घंटे जो शक्ति प्रकट होनी चाहती थी, वह रुक रही है, वह रुक रही है।
जरा स्कूल से बच्चे जब छूटते हैं, उनको देखें। जैसे ही छुट्टी होती है, लगता है, वे नरक से छूटे। उछाल रहे हैं बस्ते को, फेंक रहे हैं किताबों को, और इतने आनंदित हो रहे हैं कि जैसे जीवन मिल गया! आपने जरूर उनके साथ कोई अपराध किया है पांच—छ: घंटे। नहीं तो इतनी खुशी स्कूल से छूटकर न मिलती।
और यह अपराध जारी रहेगा। यह बीस साल की उम्र, पच्चीस साल की उम्र तक जारी रहेगा। धीरे—धीरे वे इसी दबी हुई व्यवस्था के लिए राजी हो जाएंगे। फिर उनका सारा जीवन गड़बड़ हो जाएगा। क्योंकि ऊर्जा जो दब गई और प्रकट होने का जिसे मार्ग न मिला, वह क्रोध बन जाती है, हिंसा बन जाती है, फिर नए—नए मार्गों से मार्ग खोजती है। फिर वे सब तरह के उपद्रव करेंगे। फिर वे कोई छोटी भी बात का बहाना ले लेंगे और उनकी हिंसा बाहर होने लगेगी।
हम सब हिंसा से भरे हुए लोग हैं। लेकिन अगर समझपूर्वक समझा जाए और जीवन को बदलने की ठीक व्यवस्था का खयाल रखा जाए, तो हिंसा भी सृजनात्मक हो सकती है। हिंसा भी क्रिएटिव हो सकती है। और क्रोध से भी फूल खिल सकते हैं, अगर अकल हो।
यह जो मैं आपसे कह रहा हूं ध्यान का प्रयोग, यह आपकी हिंसा, आपके क्रोध, आपकी कामवासना, आपकी घृणा, इनको सृजनात्मक रूप से रूपांतरित करने का प्रयोग है। यह एक क्रिएटिव ट्रासफामेंशन है। क्योंकि आपका लक्ष्य ध्यान है।
अगर आप चीख भी रहे हैं, तो आपका लक्ष्य ध्यान है। आपके चीखने की ऊर्जा भी ध्यान की तरफ प्रवाहित हो रही है। अगर आप अपने क्रोध को भी फेंक रहे हैं, नाराजगी को भी फेंक रहे हैं, रोने और दुख को भी फेंक रहे हैं, तो भी आपका लक्ष्य ध्यान है। यह ऊर्जा ध्यान की तरफ प्रवाहित हो रही है।
अगर आप थोड़े दिन तैयार हो जाएं मुझसे धोखा खाने को... आप अपने से तो धोखा खा ही रहे हैं बहुत दिन से! यह भी प्रयोग कर लेने जैसा है। तीन महीने में आपसे मैं कुछ छीन न लूंगा, क्योंकि आपके पास कुछ है भी नहीं, जो छीना जा सके।
मेरी दृष्टि में तो आपके पास ऐसी कोई मूल्यवान चीज नहीं है, जो छीनी जा सके। आपके पास हो, तो उसे सम्हालकर आप रखें, मेरे जैसे लोगों के पास न आएं, क्योंकि ऐसे लोग आपको बदलने
की कोशिश में ही लगे हुए हैं।
तीन महीने इस प्रयोग को करके देखें। तीन दिन के बाद आपको फर्क दिखाई पड़ने शुरू हो जाएंगे। और ऐसा नहीं कि इन एक मित्र ने ही पत्र लिखा है। पांच—सात उन मित्रों के भी पत्र हैं, जिनको कल, पहली दफे ही परिणाम दिखाई पड़ना शुरू हुआ।
वे बुद्धिमान लोग हैं। हालांकि इन मित्र ने लिखा है कि हम बुद्धिमानों को आप धोखा न दे पाएंगे। मगर बुद्धिमान वह है, जो प्रयोग करके कुछ कहता है। बुद्धिहीन वह है, जो बिना प्रयोग किए कुछ कहता है। बिना प्रयोग किए आपकी बात का कोई मूल्य ही नहीं है।
पांच—सात मित्रों ने लिखा है। एक मित्र ने लिखा है कि मुझे इतनी शांति कभी अनुभव नहीं हुई। लेकिन बीस मिनट तक मुझसे आवाजें निकलती रहीं, जिनका मुझे ही भरोसा नहीं कि मेरे भीतर कहां से आईं! क्योंकि इस तरह की आवाजें मैंने कभी नहीं की हैं। आपने न की हों, लेकिन. आप करना चाहते हैं। आपके भीतर वे दबी पड़ी हैं। और आप कहीं भी कर नहीं सकते थे। कहीं भी करते, तो आप पागल समझे जाते। यहां आप कर रहे थे, तो आपको खयाल था कि आप ध्यान में जा रहे हैं, तो आपने अपने को खुला छोड़ दिया। इस खुले भाव से जो भीतर दबा था, वह निकल गया। जैसे मवाद निकल गई हो घाव से। और भीतर घाव हलका और भरने के लिए तैयार हो गया हो। तो उन मित्र ने लिखा है कि ऐसी शांति मुझे जीवन में कभी भी नहीं मिली।
एक मित्र ने लिखा है कि आश्चर्यचकित हूं कि इस भांति नाचने—कूदने से आनंद का कैसे भाव आया!
जब आप नाचते—कूदते हैं हृदयपूर्वक—नकली नाचते—कूदते हों तो कोई बहुत फर्क नहीं होगा, कवायद होगी, थोड़ा व्यायाम हो जाएगा—लेकिन अगर हृदयपूर्वक नाचते हों, तो आप पुन: बच्चे हो गए। आप फिर बचपन में लौट गए। आप फिर छोटे बच्चे की तरह सरल हो गए। और बच्चे जिस आनंद की झलक को देख पाते हैं, उसको आप भी देख पा रहे हैं।
संतों ने कहा है कि बुढ़ापे में जो पुन: बच्चों की भांति हो जाएं, वे ही संत हैं। आप छोटे बच्चे की भांति हो गए। इतने लोगों के सामने छोटा बच्चा भी शर्माएगा नाचने में.। और आप नाचे—कूदे। तो आपने भय छोड़ दिया। दूसरों के मंतव्य का भय छोड़ दिया। दूसरे क्या कहेंगे, यह भय छोड़ दिया।
बच्चे में यह भय नहीं होता। दूसरे क्या कहेंगे, उसे प्रयोजन नहीं

 है। उसके लिए जो आनंदपूर्ण होता है, वह करता है। जैसे—जैसे बड़ा होता है, खुद के आनंद की फिक्र छोड़ देता है, दूसरे क्या कहेंगे, इसका चिंतन करने लगता है। बस, यही बच्चे की विकृति है।
आप फिर बच्चे हो गए और आपने सारी फिक्र छोड़ दी। आप पुन: अकेले हो गए समाज से मुक्त हो गए। जैसे ही आपने चिंता छोड़ी कि कोई क्या कहेगा, यह जो हलकापन भीतर आया, इस हलकेपन में आनंद की झलक बिलकुल आसान है। और बच्चे की तरह जो फिर से हो जाए वह परमात्मा को यहीं अनुभव करने लगेगा अपने चारों ओर। लेकिन बुद्धिमान, अतिशय बुद्धिमान..।
मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन को एक लाटरी मिल गई थी। पांच लाख रुपये जीत लिए थे। सारा गांव चकित था। सारे गांव के लोग इकट्ठे हो गए। और लोग मुल्ला से पूछने लगे कि तुमने यही नंबर कैसे चुना! गांव का जो बुद्धिमान था, सबने कहा कि हमारी तरफ से तुम ही पूछ लो। तो गांव का जो बुद्धिमान आदमी था उसने सबकी तरफ से मुल्ला से पूछा कि पूरा गांव एक ही जिज्ञासा से भरा है कि तुमने यह उनहत्तर, सिक्सटी नाइन नंबर तुमने कैसे चुना? किस तरकीब से?
तो मुल्ला ने कहा, अब तुम पूछते हो, तो मैं तुम्हें बता देता हूं। एक स्वप्न में मुझे यह नंबर प्रकट हुआ। एक स्वप्न मैंने देखा रात में कि मैं एक नाटक देख रहा हूं। और वहां मंच पर सात कतारें नर्तकियों की खड़ी हैं और हर कतार में सात नर्तकियां हैं। वे सब नाच रही हैं। तो सात सतैयां उनहत्तर, ऐसा मैंने सोचा और सुबह मैंने उनहत्तर नंबर की टिकट खरीद ली।
पर, उस आदमी ने कहा, अरे, पागल, सात सतैयां उनहत्तर होते ही नहीं। सात सतैयां तो होते हैं उनचास, फोटी नाइन!
तो मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, ओ .के., सो यू बी दि मैथमेटीशियन। तो तुम गणितज्ञ हो जाओ, लेकिन लाटरी मैंने जीती है।
वह जो नाच रहा है, कूद रहा है, वह आपसे कहेगा, सो यू बी दि वाइज मैन, यू बी दि मैथमेटीशियन। वह आपकी फिक्र नहीं करेगा। न मीरा ने आपकी फिक्र की है, न चैतन्य ने आपकी फिक्र की है। वे नाच लिए हैं और वे आपसे कहते हैं, आप हो जाओ बुद्धिमान, हमें रहने दो पागल। क्योंकि हमें पागलपन में जो मिल रहा है, वह हमें नहीं दिखता कि तुम्हारी बुद्धिमानी में भी तुम्हें मिल रहा है।
और एक ही सबूत है बुद्धिमानी का, क्या मिल रहा है? बुद्धिमान कौन है? बुद्धिमानी का एक ही सबूत है कि क्या मिल रहा है जीवन में—कितना आनंद, कितना रस, कितना सौंदर्य, कितना सत्य, कितना परमात्मा। और कोई सबूत बुद्धिमानी का नहीं है। तो मैं तो आपसे कहूंगा, जिनको बुद्धिमान रहना हो, मजे से बुद्धिमान रहें। लेकिन जिनको जीवन का रस जानना हो, उन्हें सस्ती बुद्धिमानी से बचना जरूरी है।
हौ. मैं यह नहीं कहता कि आप मेरी बात मानकर नाचते—कूदते रहें। वह बुद्धिमानी नहीं है। मैं आपसे यह कहता हूं कि मैं जो कह रहा हूं? उसे करके देख लें; और अगर लगता हो कि कुछ है, तो आगे बढ़ जाएं। और लगता हो, कुछ नहीं है, तो छोड़ दें। कौन रोकता है आपको छोड़ने से?
लेकिन छोड़ने के पहले परख लेना जरूरी है। और किसी भी चीज में कुछ नहीं है, ऐसी धारणा बनाने के पहले प्रवेश करना जरूरी है। अनुभव के पहले जो निर्णय लेता है, वह अंधा है।

 एक मित्र ने पूछा है कि प्रभु को पा लेने के बाद मान लिया कि मन को शांति मिल जाएगी और मान लिया कि आनंद भी मिल जाएगा, लेकिन फिर हम करेंगे क्या?

 दमी की भी चिंताएं बड़ी अदभुत हैं! वैसे यह चिंता विचारणीय है। निश्चित ही, करने को आपके लिए कुछ भी न बचेगा। मगर यह तो ऐसे ही है, जैसे कोई बीमार पूछे कि मान लिया कि टी बी ठीक हो जाएगी, कैंसर ठीक हो जाएगा, सब बीमारियां चली जाएंगी, फिर हम करेंगे क्या? क्योंकि बीमारी के लिए कुछ काम में लगे हैं। दवा लाते हैं, चिकित्सक के पास जाते हैं; अस्पताल में भर्ती होते हैं! और सब ठीक हो गया, तो फिर? फिर हम करेंगे क्या?
लेकिन करना क्या जरूरी है? और करने से मिलता क्या है? न करने की अवस्था ही तो परम लक्ष्य है। ऐसी अवस्था पा लेना, जहां करने को कुछ भी न बचे, वही तो परम तृप्ति है। तृप्ति का अर्थ ही है कि उसके बाद करने को कुछ भी न बचे। अतृप्ति में करना बाकी रहता है, क्योंकि अतृप्ति धक्का देती है कि करो, ताकि मैं तृप्त हो सकूं। लेकिन जब कोई सच में ही तृप्त हो जाता है, तो करने को कुछ भी नहीं बचता।
तो अगर आप डरते हों कि करने को कुछ भी न बचेगा और बिना किए रहने वाले आप नहीं हैं, तो परमात्मा को मत खोजें। तब तो परमात्मा से बचें। और कहीं अगर मिल भी जाए अपने आप, तो भाग खड़े हों, लौटकर मत देखें।
लेकिन करने से क्‍या पा रहे है? और इसका यह अर्थ नहीं है कि जब बीमारियां नहीं रह जातीं, तो स्वास्थ्य कोई अभाव है। स्वास्थ्य की अपनी भाव—दशा है। लेकिन करने की प्रक्रिया बदल जाती है। बीमार आदमी कुछ पाने के लिए करता है। स्वस्थ आदमी कुछ है उसके भीतर, उस आनंद, अहोभाव में करता है।
एक बच्चे को कुछ भी पाना नहीं है, लेकिन नाच रहा है सूरज की रोशनी में। यह भी कृत्य है। लेकिन इस कृत्य में और एक नर्तक के जो कि स्टेज पर नाच रहा है, फर्क है। नर्तक नाच रहा है कि कुछ मिलेगा नाचने के बाद, पुरस्कार। बच्चा नाच रहा है, क्योंकि भीतर ऊर्जा है। ऊर्जा प्रकट होना चाहती है। बच्चा नाच रहा है आनंद से, कुछ पाने के लिए नहीं। नाचना अपने आप में पर्याप्त है।
जैसे ही कोई व्यक्ति परमात्मा के निकट पहुंचने लगता है, फल की आकांक्षा से कृत्य समाप्त हो जाते हैं। लेकिन कृत्य समाप्त नहीं हो जाते। क्योंकि बुद्ध भी चलते दिखाई पड़ते हैं, परमात्मा को पाने के बाद। बोलते दिखाई पड़ते हैं, उठते हैं, बैठते हैं। बहुत कुछ करते दिखाई पड़ते हैं। हालांकि करने का बुखार चला गया। फीवरिश नहीं है अब कोई करना। जिस दिन बुद्ध मरते हैं, उस दिन वे छाती नहीं पीटते कि अब मैं मर जाऊंगा, तो मेरा किया हुआ अधूरा रह गया। कुछ अधूरा नहीं है। क्योंकि जो भी आनंद से हो रहा था, वह हो रहा था। नहीं हो रहा, तो नहीं हो रहा।
कोई कृष्ण भी चुप नहीं बैठ जाते। कोई महावीर चुप नहीं बैठ जाते। कोई जीसस चुप नहीं बैठ जाते। परमात्मा को पा लेने के बाद भी कृत्य जारी रहता है। कृत्य आपका नहीं रह जाता; परमात्मा का हो जाता है। इसलिए दुख आपका नहीं रह जाता, चिंता आपकी नहीं रह जाती, जैसे सब उसने सम्हाल लिया।
इसे ऐसा समझें कि हम उस तरह के लोग हैं.। नदी में दो तरह की नाव चल सकती है। एक नाव तो, जिसको हाथ की पतवार से चलाना पड़ता है। तो फिर पतवार हमें हाथ में पकड़कर श्रम उठाना पड़ता है। थकेंगे और लड़ेंगे नदी से।
रामकृष्ण ने कहा है कि एक और तरह की नाव भी है, वह है पाल वाली नाव। उसमें पतवार नहीं चलानी पड़ती, हवा का रुख देखकर नाव छोड़ देनी पड़ती है। फिर हवा उसे ले जाने लगती है। सांसारिक आदमी पतवार वाली नाव जैसा है। आध्यात्मिक व्यक्ति पाल वाली नाव जैसा है। उसने परमात्मा की हवाओं पर छोड़ दिया, अब वह ले जाता है। अब उसको पतवार नहीं चलानी पड़ती। हालाकि पतवार चलाने का जो पागलपन किसी को सवार हो, वह जरूर पूछेगा कि अगर पाल लगा लें नाव में और हवाएं ले जाने लगें, तो हम क्या करेंगे? क्योंकि हम तो यह खेते हैं पतवार से। यही तो हमारा जीवन है।
लेकिन उसे पता ही नहीं कि पाल वाली नाव का नाविक किस शांति से सो रहा है, या बांसुरी बजा रहा है, या खुले आकाश को देख रहा है, या सूरज के साथ एक मौन चर्चा में संलग्न है।
काम का बोझ हट गया, तो अब जीवन का आनंद सरल है। काम के बोझ से ही तो हम मरे जा रहे हैं, लेकिन मित्र पूछते हैं कि फिर हम क्या करेंगे?
एक और बात ध्यान रखनी जरूरी है कि जब परमात्मा मिलेगा, तो आप होंगे ही नहीं। आप उसके पहले ही विदा हो गए होंगे। इसलिए इस चिंता में मत पडे कि आप क्या करेंगे। जब तक आप हैं, तब तक तो वह मिलेगा भी नहीं।
पर इससे भी उनके चित्त को राहत नहीं मिलती। इससे उनको और कष्ट होता है।

आगे उन्होंने पूछा है, और फिर आप कहते हैं कि आदमी मिट जाएगा, तब परमात्मा मिलेगा! तो जब हमें मिलना ही नहीं है वह, तो मेहनत क्यों करें?

से कहते हैं नकारात्मक चिंतन की प्रक्रिया। अगर कोई कहे कि ऐसी तृप्ति आपको मिल जाएगी कि कुछ करने को न बचेगा, तो तृप्ति की फिक्र नहीं होती। आपको यह लगता है, फिर करने को नहीं बचेगा, तो हम क्या करेंगे?
अगर कोई कहता है कि आप मिट जाओगे, तब परमात्मा मिलेगा, तो परमात्मा की भी फिक्र छूट गई। फिर तो हमें लगता है, जब हम ही मिट जाएंगे, तो फिर सार भी क्या है ऐसे परमात्मा से मिलने में!
लेकिन आपके होने में क्या सार है? और आपने होकर क्या पाया है? अभी भी, जो कभी भी आपके जीवन में कोई थोड़ी—बहुत आनंद की किरण मिली हो, वह भी तभी मिली है, जब आप मिट
गए हैं। किसी के प्रेम में, किसी की मित्रता में, या सुबह खिलते हुए फूल के सौंदर्य को देखकर, या कभी रात आकाश तारों से भरा हो और उसमें लीन होकर अगर आपको कभी थोड़ी—सी झलक मिली है सुख की, तो वह भी इसीलिए मिली है कि आप उस क्षण में खो गए थे। आप नहीं थे।
जीवन में जो भी उतरता है महान, वह तभी उतरता है, जब आप नहीं होते। पर इसका यह मतलब नहीं है कि आप सच में ही नहीं होंगे। अध्यात्म की भाषा समझने में कई बार तकलीफ होती है, क्योंकि वह भाषा शब्दों का बड़ा मौलिक प्रयोग करती है। जब कहा जाता है कि आप नहीं होंगे, तो उसका मतलब है कि केवल आपका जो मिथ्या व्यक्तित्व है, जो फाल्स सेल्फ है, जो झूठा आवरण है, वह नहीं होगा। आपका जो गहरा केंद्र है, वह तो होगा ही, क्योंकि वह तो परमात्मा ही है।
यह ऐसा ही समझें। मैंने सुना है कि ऐसा हुआ, एक जर्मन जासूस को इंगलैंड भेजा गया दूसरे महायुद्ध के पहले। पांच वर्ष पहले भेज दिया गया, ताकि पांच वर्ष में वह इंगलैंड में रम जाए। ठीक अंग्रेजों जैसा जीने लगे, उठने लगे, बैठने लगे। अंग्रेजी ऐसी बोलने लगे जैसे कि मातृभाषा हो। जर्मन प्रभाव बिलकुल समाप्त हो जाए—आवाज में, ध्वनि में, आंखों में, चलने में। क्योंकि जर्मन और ढंग से चलता है, अंग्रेज और ढंग से चलता है। हर जाति का अपना व्यक्तित्व है।
तो पांच साल पहले उसे भेज दिया गया। और पाच साल उसने सब तरह के प्रयोग किए और अपने को बिलकुल स्वाभाविक अंग्रेज बना लिया। फिर युद्ध समाप्त हो गया और पूरे दस साल इंगलैंड में रहने के बाद वह जर्मनी वापस लौटा।
पैदा जर्मन हुआ था, लेकिन दस साल में अभ्यास से अंग्रेज हो गया। जब घर लौटा, तो बड़ी अड़चन शुरू हुई। क्योंकि यह जो अंग्रेजियत उसने सीख ली थी, अब यह वापस अपने जर्मन परिवार में बाधा बनने लगी। घर के लोग उससे कहते कि नकली को छोड़ क्यों नहीं देता? है तो तू जर्मन। तो फिर से बोल अपनी मातृभाषा, जैसी तू बोलता था। और वैसे ही उठ, वैसे ही बैठ, वैसा ही व्यवहार कर, जैसा तू करता था। जैसा हमने तुझे बचपन में जाना, उसकी मां कहती। उसकी पत्नी कहती कि जैसा मैं तुम्हें जानती थी जाने के पहले, ठीक वैसा।
पर वह आदमी कहता कि जरा ठहरो। दस साल अभ्यास करके यह नकली भी स्वाभाविक हो गया है। इसे हटाऊंगा, मिटाऊंगा, पर थोड़ा वक्त लगेगा।
आप जिसको अपना व्यक्तित्व समझ रहे हैं, आप समझ रहे हैं जिसको मेरा होना, वह आपका होना नहीं है। वह केवल सिखावन है, आपका स्वभाव नहीं है।
आप एक घर में पैदा हुए। जब आप पैदा होते हैं, तो न तो आप हिंदू होते हैं, न मुसलमान होते हैं, न ईसाई होते हैं, न जैन होते हैं। आप सिर्फ होते हैं। अगर आपको मुसलमान घर में बड़ा किया जाए, आप मुसलमान हो जाएंगे। और अगर हिंदू घर में बड़ा किया जाए, हिंदू हो जाएंगे। हिंदू का अलग व्यक्तित्व है, मुसलमान का अलग व्यक्तित्व है। अगर जैन घर में बड़ा किया जाए, तो आप जैन हो जाएंगे। उसका अलग व्यक्तित्व है।
लेकिन जब आप पैदा हुए थे, तो आप बिना व्यक्तित्व के पैदा हुए थे। हिंदू मुसलमान, ईसाइयत, ऊपर से सीखी गई बातें हैं। फिर आप हिंदी सीखें, मराठी सीखें, अंग्रेजी सीखें। जो भाषा आप सीखेंगे, वह आपकी भाषा हो जाएगी। लेकिन जब आप पैदा हुए थे, तो मौन पैदा हुए थे। आपकी कोई भाषा न थी।
फिर आप सीखते चले जाएंगे। और आप जब पचास साल के होंगे, तो आपके चारों तरफ एक ढांचा निर्मित हो जाएगा। भाषा का, व्यवहार का, व्यक्तित्व का, राष्ट्र का, जाति का, आचरण का, धर्म का एक ढांचा खड़ा हो जाएगा। और इसी ढांचे को आप समझेंगे, मैं हूं।
यही ढांचा टूटता है परमात्मा को पाने में, आप नहीं टूटते। वह जो आप लेकर पैदा हुए थे, वह नहीं टूटता। वह तो आप रहेंगे सदा। उसे तो छीनने का कोई उपाय नहीं है। उसे तो परमात्मा भी नहीं छीनेगा।
सच तो यह है कि आप जिसको अभी समझ रहे हैं मेरा होना, इसी ने आपसे आपका असली व्यक्तित्व छीन लिया है। इस नकली को उतारने की प्रक्रिया है धर्म। जब यह उतर जाता है और जो स्वभाव है सहज, जो जन्म के पहले भी आपके पास था और आप मर जाएंगे तब भी आपके पास होगा, वह जब शुद्धतम आपके पास रह जाता है, तो आप परमात्मा से मिलते हैं।
जीसस ने कहा है, जो बचाएगा, वह खो देगा; और जो खोने को राजी है, वही बचाएगा, उसका ही बच रहेगा।
यह जो झूठा है, इसके खोने की बात है। आपके खोने की तो कोई बात ही नहीं है। लेकिन उस आपका आपको ही कोई पता नहीं है, जो नहीं खोएगा। इसलिए घबड़ाहट होती है। इससे डर लगता है। इससे भय होता है।
यह तो हालत हमारी ऐसी है कि जैसे एक अंधा आदमी आए और वह कहे कि मैं अपनी आंखें तो ठीक करवा लूं लेकिन तब जिस लकड़ी को मैं टेककर चलता हूं उसका क्या होगा? और मेरी आंखें ठीक हो जाएंगी, तो चिकित्सक कहता है कि यह टेकने वाली लकड़ी तुझे छोड़ देनी पड़ेगी। तो इसको मैं कैसे छोड़ सकता हूं! यही लकड़ी तो मेरा प्राण है। इसी के सहारे तो मैं चलता हूं जीता हूं उठता हूं रास्ता खोजता हूं!
तो उस अंधे आदमी को पता नहीं कि जब आंखें ही मिल जाएं, तो लकड़ी को टेकने की जरूरत ही नहीं रह जाती, और न लकड़ी से खोजने की जरूरत रह जाती है।
जिस दिन आपको परमात्मा मिल जाए, उस दिन आपके अंधेपन में जो व्यक्तित्व काम देता था, उसकी कोई जरूरत नहीं रह जाती। घबडाएं मत। आपसे वही छीना जा सकता है, जो आपका नहीं है। जो आपका है, उसे छीना ही नहीं जा सकता।
इस सूत्र को, इस महासूत्र को स्मरण रखें सदा, कि आप वही खो सकते हैं, जो आपका है ही नहीं। जो आपका है, उसको छीनने का कोई उपाय नहीं है। स्वभाव का यही अर्थ होता है, जो आपसे छीना न जा सके। जो छीना जा सकता है, उसको आप चाहे पकड़े भी रहें, तो भी वह आपका नहीं है।
एक आदमी धन को पकड़े हुए है, सोचता है, धन छिन जाएगा। लेकिन धन छिनेगा ही, क्योंकि वह आप नहीं हैं। शानी इसीलिए शरीर को भी नहीं पकड़ते, क्योंकि वे कहते हैं, मौत उसे छीन लेगी। ज्ञानी मन को भी नहीं पकड़ते, क्योंकि इतनी कहते हैं, ध्यान उसे भी छीन लेगा। इतनी तो केवल उसको ही पकड़ते हैं, जो छीना नहीं जा सकता। न ध्यान छीन सकता है, न मृत्यु छीन सकती है, न समाधि छीन सकती है। वह कौन है आपके भीतर, जो कभी भी छीना नहीं जा सकता? वही आप हैं।
इसलिए भयभीत न हों। जो व्यर्थ है, ऊपर—ऊपर है, उसे छोड़ने की तैयारी रखें, ताकि भीतर जो है उसे पाया जा सके।

 एक प्रश्न और। एक मित्र बार—बार पूछते हैं — आखिरी दिन के लिए उनका सवाल मैं टालता रहा—पूछते हैं बार —बार कि एक मित्र, श्री सूर्योदय गौड़, आपके खिलाफ पर्चे छापते हैं। आप जवाब क्यों नहीं देते? और उनके खिलाफ कुछ किया क्यों नहीं जाता?

 हली बात, कि वे मेरा ही काम कर रहे हैं, इसलिए उनके खिलाफ कुछ किया नहीं जाना चाहिए। काम के बडे अनूठे ढंग हैं। और कई दफा मैं सोचता था कि अगर कोई मेरा विरोध न करता हो, तो अपने ही किसी मित्र को कहूं कि तू विरोध कर। क्योंकि बहुत—से लोगों को मैं अपने पास नहीं ला सकता हूं। बहुत—से लोग मेरे विरोध के जरिए ही मेरे पास आ सकते हैं।
कुछ लोग हैं, जो विरोध से ही पास आ सकते हैं। विरोध के कारण ही उनको उत्सुकता पैदा होती है। कोई विरोध करता है, तो ही उनको लगता है कि जाकर देखें, मामला क्या है! कई दफा वे देखने आते हैं और रुक जाते हैं और उनका जीवन भी बदल जाता है। तो बहुत बार मैं सोचता था, किसी मित्र को कहूं कि मेरे खिलाफ कुछ लिखो, कुछ चर्चा चलाओ, ताकि वे जो सीधे—सीधे नहीं आते, जिनकी आंखें तिरछी हैं, वे विरोध के जरिए आ जाएं। फिर अचानक सूर्योदय गौड़ ने वह काम करना शुरू कर दिया, तो मैं भीतर बड़ा प्रसन्न हुआ। मैंने कहा कि नाहक मैं किसी को कहता, तो मेरा मित्र कोई कितनी ही कोशिश भी करता, तो भी विरोध में वह जान न रहती। बेजान रहता, भीतर से झूठा—झूठा रहता। अब ठीक आदमी अपने आप हाजिर हो गया है। यह जगत कुछ ऐसा है कि यहां जो भी चाहो, वह हाजिर हो जाता है। चाहने की देर है कि लोग मिल जाते हैं।
अब उन पर नाराज होने का कोई कारण नहीं। मैं प्रसन्न हूं। दिनभर मेहनत करते हैं। गरीब आदमी मालूम पड़ते हैं। अपना धंधा, काम छोड्कर इसी काम में लग गए हैं। उनका जीवन मेरे लिए ही समर्पित हो गया है। तो इसलिए उनका कोई विरोध नहीं करता हूं। और उनके विरोध से कुछ हानि नहीं होती है।
सत्य की कोई हानि नहीं है। विरोध से और निखरता है, साफ होता है। और अगर सत्य को भय हो विरोध का, तो जानना चाहिए कि वह सत्य ही नहीं है।

 एक मित्र और दो—तीन दिन पहले आए थे। उनका भी प्रश्न ऐसा ही है। इसी संदर्भ में उनकी भी बात कर दूं। वह थोड़ा और जटिल है। उन्होंने मुझे आकर पूछा कि श्रीमती निर्मला देवी श्रीवास्तव के पास गया था, तो वह आपके खिलाफ बड़ी बातें कहती हैं। और वे तो आपके पास आती थीं, आपकी शिष्या थीं और आपके खिलाफ इतनी बातें कहती हैं!

 तो मैं अब तक इस संबंध में चुप रहा हूं क्योंकि वह बड़ा काम कर रही हैं। वह दूसरे ढंग का काम है।
जैसा मैंने कहा कि कुछ ऐसे लोग हैं, जो मेरे विरोध के कारण मेरे पास आते हैं। कुछ ऐसे गलत लोग मेरे पास आ जाते हैं, जिनको दूर हटाने की भी जरूरत पड़ती है। कुछ अपात्र भी मेरे पास आ जाते हैं, जो समय खराब करेंगे और बहुत काम के इस जन्म में तो नहीं हो सकते। उनको भी दूर करने की जरूरत पड़ती है। उनको मैं श्रीमती निर्मला देवी श्रीवास्तव के पास भेजता हूं। वह मुझे उनसे छुटकारा दिलाती रहती हैं। उनको पता नहीं है कि वह मेरा काम कर रही हैं। और अगर उनको यह पता चल जाएगा जो मैं कह रहा हूं तो वह और जोर से मेरे विरोध में लग जाएंगी। वह मेरा काम है। उन्हें लग जाना चाहिए।
मेरी प्रक्रिया में दो बातें हैं। जो भी लोग जीवन—क्रांति के लिए उत्सुक हैं, मैं चाहता हूं कि मेरे पास आएं, किसी भी बहाने, किसी भी कारण से। लेकिन जो लोग मेरे पास आ जाते हैं, उनमें अनेक लोग गलत कारणों से मेरे पास आ जाते हैं। उनको भी पता नहीं है। और फिर वे मेरा समय भी व्यर्थ करते हैं, मेरी शक्ति भी खराब करते हैं। उनको मैं अपने से दूर भी करना चाहता हूं। उनको मैं अनेक तरह से दूर करता हूं। कभी किसी तरकीब से, कभी किसी तरकीब से उनको दूर कर देता हूं।
मेरे पास जैनियों का एक जत्था इकट्ठा हो गया था। तो उससे मैं परेशान हो गया। परेशान इसलिए हो गया कि उन्हें कुछ भी करना नहीं है, सिर्फ बातें करनी हैं। तो मैंने कोई एक वक्तव्य दे दिया, उससे वे लोग छटकर गिर गए।
फिर मेरे पास गांधीवादियों का एक जत्था इकट्ठा हो गया। उनको सेवा करनी है, साधना नहीं करनी है। मुझे सेवा में उत्सुकता नहीं है। क्योंकि मैं मानता हूं कि साधना में जो जाए, वही सेवक हो सकता है। और जो साधना में न जाए, उसकी सेवा सब झूठी है और व्यर्थ है। तो मुझे गांधी की आलोचना कर देनी पड़ी। आलोचना करते से ही वे भाग गए। जमीन साफ कर दी; मेरे पास नई जगह बन गई; स्पेस पैदा हो गई। उसमें मैं नए लोगों को बुला 'पाया।
फिर मेरे बोलने का जो ढंग है, उससे बड़ी गड़बड़ हो जाती है। मेरे बोलने के ढंग से लोगों को ऐसा लगता है कि मैं तार्किक हूं। बोलने के ढंग से ऐसा लगता है कि मैं बुद्धिवादी हूं रेशनलिस्ट हूं। इसलिए कुछ तार्किक और बुद्धिवादी मेरे पास आ जाते हैं।
मेरे बोलने का ढंग तार्किक है; लेकिन जो मैं कहना चाह रहा हूं वह तर्क के बिलकुल बाहर है। मेरी पहुंच का ढंग बुद्धिवादी है, लेकिन मुझसे ज्यादा अबुद्धिवादी खोजना मुश्किल है।
तो उन लोगों को हटाने की जरूरत पड़ी, क्योंकि ये सिर्फ समय खराब करते हैं, चर्चा, चर्चा, चर्चा! इन्हें करना कुछ भी नहीं है—शब्द, शब्द, शब्द। तो मैंने कहा, चलो, कीर्तन शुरू कर दो। कीर्तन होते से ही वे भाग गए। वे अब मेरे पास नहीं आते।
ऐसा मुझे गलत लोगों से छुटकारा भी पाना पड़ता है, ठीक लोगों को बुलाना भी पड़ता है।
एक बात तय है कि सत्य जब भी कहीं हो, तो सभी चीजें उसका सहयोग करती हैं। आप कुछ भी करें—विरोध करें, इनकार करें, खिलाफ बोलें—आप कुछ भी करें, आपका हर करना सत्य के पक्ष में ही पड़ता है, तभी वह सत्य है। सत्य हर चीज का उपयोग कर लेता है, विपरीत का भी, विरोधी का भी।
इसलिए इन सब बातों में पड़ने की, इस सबमें समय खराब करवाने की, इन सब का उत्तर देने की कोई भी जरूरत नहीं है। चीजें अपने आप रास्ता बनाती चली जाती हैं।
एक ही बात का ध्यान होना चाहिए कि हम जो कर रहे हैं, अगर वह सत्य है, तो सत्य सभी का उपयोग कर लेगा। और अंतिम क्षण में, मैंने आपको जो लाभ पहुंचाया, वह अकेला मेरा ही लाभ नहीं होगा, उसमें उन विरोधियों का भी उतना ही हाथ होगा, जिन्होंने विरोध किया। और अंतिम क्षण में सभी चीजें संयुक्त हो जाती हैं, अगर सत्य है तो। लक्ष्य पर पहुंचकर सभी चीजें सत्य हो जाती हैं। तब आप मुझे ही धन्यवाद नहीं देंगे, सूर्योदय गौड़ को भी देंगे, निर्मला देवी श्रीवास्तव को भी देंगे।
जिस दिन आपको सत्य का अनुभव होगा, उस दिन आप दोनों को धन्यवाद देंगे। क्योंकि उन्होंने भी काम किया, उन्होंने भी मेहनत ली।
अब हम सूत्र को लें।
तथा जो निंदा—स्तुति को समान समझने वाला और मननशील है एवं जिस—किस प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता से रहित है, वह स्थिर बुद्धि वाला भक्तिमान पुरुष मेरे को प्रिय है। और जो मेरे परायण हुए श्रद्धायुक्त पुरुष इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम भाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मेरे को अतिशय प्रिय हैं।
निंदा—स्तुति को समान समझने वाला और मननशील है। निंदा—स्तुति को समान कब समझा जा सकता है? निंदा दुख क्यों देती है? स्तुति सुख क्यों देती है? जब कोई आपकी प्रशंसा करता है, तो भीतर फूल क्यों खिल जाते हैं? और जब कोई निंदा करता है, तो भीतर सब उदास, मृत्यु जैसा क्यों हो जाता है? कारण खोजना जरूरी है, तो ही हम निंदा—स्तुति के पार हो सकें।
जब कोई स्तुति करता है, तो आपके अहंकार को तृप्ति होती है। जब कोई स्तुति करता है, तो असल में वह यह कह रहा है कि जैसा मैं अपने को समझता था, वैसा ही यह आदमी भी समझता है। आप समझते हैं कि आप बहुत सुंदर हैं। और जब कोई कह देता है कि धन्य हैं; कि आपके दर्शन से हृदय प्रफुल्लित हुआ; ऐसा सौंदर्य कभी देखा नहीं! तो आप प्रसन्न होते हैं। क्यों? क्योंकि दर्पण के सामने खड़े होकर यही आपने अपने से कई बार कहा है। यह पहली दफा कोई दूसरा भी आपसे कह रहा है।
और अपनी बात का भरोसा आपको नहीं होता। अपनी बात का आपको भरोसा आपको क्या होगा, अपने पर ही भरोसा नहीं है। जब कोई दूसरा कहता है, तो भरोसा होता है कि ठीक है, बात सच है। वह जो दर्पण के सामने मुझे लगता था, बिलकुल सही है। यह आदमी भी कह रहा है। और यह क्यों कहेगा! अहंकार को तृप्ति मिलती है। और आपकी सेल्फ इमेज, वह जो प्रतिमा है अपने मन में, वह परिपुष्ट होती है।
जब कोई निंदा करता है और कह देता है कि क्या शक्ल पाई है! भगवान कहीं और देख रहा था, जब आपको बनाया? कि सामान चुक गया था? कि देखकर ही विरक्ति पैदा होती है, संसार से भागने का मन होता है! तब आपको चोट पड़ती है। क्यों चोट पड़ती है? अहंकार को ठेस लगती है।
ऐसा कौन है, जो अपने को सुंदर नहीं मानता? कुरूप से कुरूप व्यक्ति भी अपने को सुंदर मानता है। लेकिन अपनी मान्यता के लिए भी दूसरों का सहारा चाहिए। क्योंकि हमारी अपनी कोई आत्म—स्थिति तो नहीं है। सुंदर भी हम मानते हैं दूसरों के सहारे, और अगर दूसरे कुरूप कहने लगें, तो फिर सुंदर मानना मुश्किल हो जाता है।
इसलिए चोट लगती है। वे ईंटें खिसका रहे हैं। अगर हर कोई कहने लगे कि तुम कुरूप हो, तो फिर हमारी प्रतिमा डगमगाने लगती है और आत्म—विश्वास हिलने लगता है। और फिर हम दर्पण के सामने भी खड़े होकर हिम्मत से नहीं कह सकते कि नहीं, मैं सुंदर हूं। क्योंकि यह भी तो दूसरों के मंतव्य पर निर्भर है। तो जब दूसरे कुछ कहने लगते हैं, जो विपरीत पड़ता है, तो आपको अपनी प्रतिमा डगमगाती मालूम पड़ती है। घबड़ाहट पैदा होती है, बेचैनी पैदा होती है।
प्रशंसा में अच्छा लगता है, क्योंकि आपके अहंकार को फुसलाया जा रहा है। इसलिए प्रशंसा वही करता है, जो आपसे कुछ पाना चाहता है। वह पाने का रूप कुछ भी हो। प्रशंसा वही करता है, जो आपसे कुछ खींचना चाहता है। क्योंकि प्रशंसा पाकर आप बेहोश हो जाते हैं अहंकार में और आपसे कुछ करवाया जा सकता है।
मूढ़ से मूढ़ आदमी को बुद्धिमान कहो, तो वह भी राजी हो जाता है! अपनी प्रशंसा को इनकार करना, बड़ा मुश्किल है। और जब अपनी प्रशंसा को इनकार करना बड़ा मुश्किल है, तो अपनी निंदा को स्वीकार करना बड़ा मुश्किल है।
तो जरूरी नहीं है कि जो निंदक कह रहा हो, वह गलत ही हो, वह सही भी हो सकता है। और सच तो यह है कि जितना सही होता है, उतना ज्यादा खलता है। अगर वह बिलकुल गलत हो, तो ज्यादा परेशानी नहीं होती। अगर कोई आदमी, आपकी आंखें हैं और वह कहता है अंधा है, तो आप ज्यादा परेशान नहीं होते। क्योंकि कौन सुनेगा इसकी! आंखें आपके पास हैं। लेकिन आप अंधे हैं, और वह आदमी कहता है अंधा है, तो फिर ज्यादा चोट पड़ती है। क्योंकि आपको भी लगता तो है कि वह ठीक ही कहता है। और मन भी नहीं होता मानने का कि यह बात ठीक है।
तो जितने सच्चाई के करीब होती है निंदा, उतना दुख देती है। और स्तुति जितनी झूठ के करीब होती है, उतना सुख देती है। जितने असत्य के करीब होती है स्तुति, उतना सुख देती है। और निंदा जितने सत्य के करीब होती है, उतना दुख देती है। पर इन सब दोनों का केंद्र क्या है?
इन दोनों का केंद्र यह है कि दूसरे क्या कहते हैं, वह मूल्यवान है। क्यों मूल्यवान है? क्योंकि आपका जो अहंकार है, वह दूसरों के हाथ से निर्मित हुआ है, आपकी आत्मा नहीं। आपकी आत्मा तो परमात्मा के हाथ से निर्मित हुई है। लेकिन आपका अहंकार दूसरों के हाथों से निर्मित हुआ है। अहंकार समाज का दान है। आत्मा परमात्मा की देन है।
आत्मा को समाज नहीं छीन सकता। लेकिन अहंकार को समाज छीन सकता है। जिसको आज कहता है, तुम महापुरुष हो, कल पापी कह सकता है। और ऐसे महापुरुष हैं, जो कल पूजे जा रहे थे और दूसरे दिन उन पर जूते फेंके जा रहे हैं। वही समाज, वही लोग! जरूरी नहीं है कि समाज पहले सही था, या अब सही है। बात इतनी है केवल कि समाज दोनों काम कर सकता है।
इसलिए जो आदमी अहंकार के साथ जीता है, आत्मा के साथ नहीं, वह हमेशा चिंतित रहेगा, कौन क्या कह रहा है! निंदा कौन कर रहा है? स्तुति कौन कर रहा है? क्योंकि उसका सारा व्यक्तित्व इसी पर निर्भर है, दूसरों पर। दूसरे क्या कह रहे हैं?
लेकिन जो व्यक्ति भक्त है, साधक है, प्रभु की खोज में लगा है, आत्मा की तरफ चल रहा है, उसके तो पहले कदम पर ही वह इसकी फिक्र छोड़ देता है कि दूसरे क्या कह रहे हैं। वह इसकी फिक्र करता है कि मैं क्या हूं वह इसकी फिक्र नहीं करता कि लोग क्या कह रहे हैं।
लोग कुछ भी कह रहे हों, मैं क्या हूं? यह उसकी चिंता है। यह उसकी खोज है कि मैं खोज लूं आविष्कृत कर लूं कि मैं कौन हूं। दूसरों के कहने से क्या होगा? क्या मूल्य है दूसरों के कहने का? कृष्ण कहते हैं, निंदा—स्तुति को समान जो समझता है...।
वही समान समझ सकता है, जो दूसरों के मंतव्य से अपने को दूर हटा रहा है। और जो इस बात की खोज में लगा है कि मैं कौन हूं। लोगों की धारणा नहीं, मेरा अस्तित्व क्या है। वह सम हो जाएगा। वह अपने आप सम हो जाएगा। उसके लिए लोगों की स्तुति भी व्यर्थ है, उसके लिए उनकी निंदा भी व्यर्थ है। वह तो बल्कि चकित होगा कि लोग मुझमें इतने क्यों उत्सुक हैं! इतनी उत्सुकता वे अपने में लें, तो उनके जीवन में कुछ घटित हो जाए, जितनी उत्सुकता वे मुझमें ले रहे हैं!
आपको खयाल है कि आप दूसरों में कितनी उत्सुकता लेते हैं! इतनी उत्सुकता काश आपने अपने में ली होती, तो आज आप कहीं होते। आप कुछ होते। आपके जीवन में कोई नया द्वार खुल गया होता। इतनी ही उत्सुकता से तो आप प्रभु को पा सकते थे।
लेकिन आपकी उत्सुकता दूसरों में लगी है! सुबह उठकर गीता पर पहले ध्यान नहीं जाता; पहला ध्यान अखबार पर जाता है। दूसरों की फिक्र है। वे क्या कर रहे हैं, क्या सोच रहे हैं! पड़ोसी आपके बाबत क्या कह रहे हैं!
कौन क्या कह रहा है आपके बाबत, इसको इकट्ठा करके क्या होगा? मरते वक्त सब हिसाब भी कर लिया और किताब में सब लिख भी डाला कि कौन ने क्या कहा, फिर क्या होगा? मौत आपको जांचेगी, आपके हिसाब—किताब को नहीं।
सुना है मैंने, एक यहूदी फकीर हिलेल मर रहा था। तो किसी ने हिलेल से कहा कि हिलेल, क्या सोच रहे हो मरते क्षण में? तो हिलेल ने एक बड़ी कीमती बात कही। क्योंकि यहूदी मूसा को मानते हैं, हिलेल ने कहा कि जिंदगीभर मैं मूसा की फिक्र करता रहा कि मूसा ने क्या कहा है, क्या समझाया है; उसके वचन का क्या अर्थ है, और मैं मूसा जैसा कैसे हो जाऊं—यही मेरी चिंता, यही मेरी जीवनभर की धारा थी। मरते वक्त मुझे यह खयाल आ रहा है कि हिलेल, परमात्मा मुझसे यह नहीं पूछेगा कि तू मूसा क्यों नहीं हुआ। परमात्मा मुझसे पूछेगा, तू हिलेल होने से क्यों चूक गया? मूसा के संबंध में मुझसे पूछेगा ही नहीं वह। वह पूछेगा मेरे संबंध में, और मैं नाहक मूसा के संबंध में परेशान रहा।
और परमात्मा यह भी नहीं पूछेगा कि लोग मेरे संबंध में क्या मानते थे। परमात्मा तो सीधा ही देख लेगा मेरी आत्मा में। वह कोई सर्टिफिकेट तो नहीं मांगेगा, कि प्रमाणपत्र लाए हो चरित्र के? अच्छा आदमी मानते थे लोग कि बुरा आदमी मानते थे तुम्हें? कुछ प्रमाणपत्र ले आए हो जमीन से, वह नहीं पूछेगा। क्योंकि प्रमाणपत्र तो अंधों के काम आते हैं। उसकी आंखें तो मेरी आत्मा में सीधा प्रवेश कर जाएंगी, और वे जान ही लेंगी कि मैं कौन हूं।
तो मैंने नाहक ही अपना जीवन गंवाया। अब जितने भी थोड़े क्षण मेरे पास बचे हैं, अब तुम हट जाओ यहां से, हिलेल ने लोगों से कहा, तुम जिंदगीभर मुझे घेरे रहे। हट जाओ। और मैं शांत होकर उसको देख लेना चाहता हूं जो मैं हूं और मौन होकर उसमें उतर जाना चाहता हूं जो मेरा अस्तित्व है, जो मेरा व्यक्तित्व है। परमात्मा के सामने जब मैं खड़ा होऊं और वह मुझे सीधा देखे, तो मैं खड़ा हो सकूं शांति से। तुम हट जाओ, हिलेल ने कहा, मेरे पास से भीड़ हट जाए; अब मुझे अकेला हो जाने दो। जिंदगीभर मैं भीड़ से घिरा रहा, दूसरों से।
निंदा और स्तुति से वह व्यक्ति मुक्त हो सकेगा, जो दूसरों की चिंता छोड़ देता है। इसका यह मतलब नहीं है कि दूसरों के प्रति लापरवाह हो जाता है। इसका यह भी मतलब नहीं है कि स्वार्थी हो जाता है। सच तो यह है कि जो दूसरों के विचार की बहुत चिंता करता है, वह दूसरों की चिंता जरा भी नहीं करता। वह तो उनके विचार की चिंता करता है कि वे मेरे बाबत क्या कह रहे हैं। वह अहंकारी है। उसका दूसरों से कोई लेना—देना नहीं। वह दूसरों के विचार की अपने अहंकार के लिए फिक्र करता है।
लेकिन जो आदमी दूसरों की चिंता छोड़ देता है, उसका अहंकार गिर जाता है। अहंकार दूसरों के सहारे के बिना खड़ा नहीं हो सकता, उसके लिए दूसरों का सहारा चाहिए। वह एक झूठ है, जो दूसरों के सहारे खड़ा होता है। सब झूठ दूसरों के सहारे खड़े होते हैं; सत्य अपने सहारे खड़े होते हैं।
इसलिए धर्म अकेले भी हो सकता है, राजनीति अकेले नहीं हो सकती। राजनीति बड़ा से बड़ा झूठ है। उसको दूसरों के सहारे की जरूरत है। दूसरे का वोट, दूसरे का मत, दूसरे पर सारा खेल खड़ा है। राजनीति का बड़ा से बड़ा नेता भी दूसरों के सहारे खड़ा है। दूसरों की अंगुलियां उसको बड़ा किए हुए हैं। वे हाथ हटा लें, वह नीचे जमीन पर गिर जाएगा और उठने का उसे कोई मौका नहीं रहेगा। लेकिन धार्मिक व्यक्तित्व किसी के सहारे खड़ा नहीं होता, अपने ही कारण खडा होता है। उसे कोई गिरा नहीं सकता, क्योंकि किसी ने उसे सम्हाला ही नहीं है।
कृष्ण कहते हैं कि जो निंदा स्तुति को समान समझने लगा है, मननशील है एवं जिस—किस प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा संतुष्ट है। और परमात्मा जैसा रखे, वैसा ही होने को राजी है। और परमात्मा जैसा रखे, उसमें भी विधायक खोज लेता है। मननशील का अर्थ है, विधायक को खोज लेने वाला।
हम नकारात्मक को खोज लेने वाले लोग हैं। हमें कांटा दिखाई पड़ता है, फूल दिखाई नहीं पड़ता। अगर एक आदमी के बाबत मैं कहूं कि वह गजब का कलाकार है, उसकी बांसुरी जैसी बांसुरी कोई नहीं बजा सकता। तो आप फौरन कहेंगे, छोड़िए भी, वह क्या बांसुरी बजाएगा! चरित्रहीन है।
यह नकारात्मक चिंतन की प्रक्रिया है। विधायक चिंतन की प्रक्रिया होगी कि मैं आपसे कहूं कि फलां आदमी चरित्रहीन है, उससे बचना। और आप कहें कि क्या! वह चरित्रहीन कैसे हो सकता है? उसकी बांसुरी में ऐसे प्राण हैं, वह बांसुरी इतनी अदभुत बजाता है; चरित्रहीन होगा कैसे? नहीं; मैं नहीं मान सकता हूं कि वह चरित्रहीन है।
तो आप देख रहे हैं उसको, जो फूल है। और जो फूलों को देखता है, उसे और ज्यादा फूल दिखाई पड़ने लगते हैं। और जो कांटो को देखता है, उसे और ज्यादा काटे दिखाई पड़ने लगते हैं। जो आप खोजते हैं, वह आपको मिल जाता है। हर आदमी की योग्यता के अनुकूल उसे सब कुछ मिल जाता है। जो आदमी नकारात्मक को खोज रहा है, चारों तरफ उसके नरक खड़ा हो जाता है। सब जगह उसे गलत दिखाई पड़ने लगता है।
कृष्ण कहते हैं, जिस—किस प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा संतुष्ट है। कैसा भी परमात्मा रखे, वह उसमें भी।
सुना है मैंने कि बायजीद एक कोठरी में सोता था। उसमें बड़ी चींटियां थीं। सूफी फकीर हुआ बायजीद। तो उसके शिष्यों ने कहा कि तुम परमात्मा के इतने प्यारे हो और वह इतना भी नहीं कर सकता कि इन चींटियों को हटा ले। और तुम्हें हमेशा काटती हैं और परेशान करती हैं और तुम उघाड़े यहां पड़े रहते हो!
तो बायजीद ने कहा कि तुम्हें मेरे परमात्मा का कुछ पता नहीं। वह चींटियों से मुझे कटवाता है, ताकि मैं उसकी याद रख सकूं अं न। और जब भी चींटी मुझे काटती है, मैं कहता हूं हे परमात्मा! याद है, मत कटवा, याद है। चींटी से कटवाता है, ताकि मैं उसकी याद कर सकु विस्मरण न हो जाए। और कभी—कभी मैं भूल जाता हूं तो ठीक ऐन वक्त पर चींटी काट देती है! उसकी बड़ी कृपा है। उसकी बड़ी कृपा है। इन चींटियों को हटा मत देना।
यह जो भाव—दृष्टि है कि वह जैसा रखे! जरूर उसका कोई प्रयोजन होगा। अगर वह आग में डालता है, तो तपाता होगा। अगर वह कीटों में चलाता है, तो परखता होगा। कोई परीक्षा होगी। कोई बात होगी उसकी। उस पर छोड्कर जीने वाला जो संतुष्ट व्यक्ति है, वही मननशील भी है।
और रहने के स्थान में ममता से रहित है..।
और जहां रखे, लेकिन कोई ममता खड़ी नहीं करता। जिस स्थिति में, जिस स्थान में, फिर यह नहीं कहता कि यहीं रहूंगा। वह जहां हटा दे। वह जहां पहुंचा दे। वह जैसा करे। सभी स्थान उसी के हैं। और सभी स्थितियां उसकी हैं। और सभी द्वारों से वह आदमी पर काम कर रहा है। इस भाव दशा में जो व्यक्ति है, वह ममता नहीं बांधेगा। वह ममता नहीं बांधेगा।
च्चागत्सु की पत्नी मर गई, तो वह गीत गा रहा था अपनी खंजड़ी बजाकर। सम्राट संवेदना प्रकट करने आया था, क्योंकि च्चांगत्सु जाहिर संत था। तो खुद सम्राट आया कि पत्नी मर गई है, तो मैं जाऊं। लेकिन सम्राट ने देखा कि वह गीत गा रहा है खंजड़ी बजाकर! तो सम्राट बड़ा मुश्किल में पड़ा। क्योंकि वह बेचारा तैयार करके लाया था। जैसे आप किसी के घर कोई मर जाता है, सब तैयार करके जाते हैं कि क्या कहेंगे। बड़ा मुश्किल का मामला होता है! किसी के घर अगर कोई मर जाए, तो क्या कहना, कैसे कहना, बड़ा परेशानी का काम होता है।
सम्राट बिलकुल तैयार करके लाया था कि ये —ये बातें कहूंगा; इस तरह संवेदना प्रकट करूंगा। आंख में आंसू भर लूंगा। संत को सांत्वना देकर लौट आऊंगा। लेकिन वह संत बड़ा उलटा निकला। वह खंजड़ी बजा रहा था और गीत गा रहा था। तो अब शोक—संवेदना प्रकट करने का उपाय न रहा। लेकिन राजा को लगा बुरा। क्योंकि वह जिस काम से आया था, वह असफल हुआ। कहने यही आया था कि दुखी मत होओ, ऐसा तो होता ही रहता है। लेकिन इस आदमी से क्या कहो! यह दुखी हो ही नहीं रहा है, बल्कि प्रसन्न हो रहा है!
अपेक्षा पूरी न हो.। आपको पता है, दुखद अपेक्षाएं भी पूरी न हों, तो भी दुख होता है। अगर आप सोच रहे हों कि बड़ी बीमारी है और डाक्टर के पास जाएं। और वह कहे, कुछ नहीं, तो मन में बड़ी उदासी होती है कि बेकार आना हुआ! कुछ नहीं? आपको शक होता है, कहीं डाक्टर की ऐसा तो नहीं कि भूल हो रही है। जरा और बड़े डाक्टर को दिखा लें।
इसलिए जो चालाक डाक्टर हैं, वे बड़े गंभीर हो जाते हैं आपको देखकर। और आपकी बीमारी को इस तरह से लेते हैं जैसे कि बस, ऐसी बड़ी बीमारी किसी को भी कभी नहीं हुई। तब आपका दिल राजी होता है कि ठीक है। आप जैसे बड़े आदमी को छोटी बीमारी हो सकती है! बड़ी ही होनी चाहिए। यह आदमी समझा। अब जरा बात काम की है।
वह सम्राट दुखी हो गया। उसने कहा कि यह क्या कर रहे हो! मुझे कहना नहीं चाहिए। और मैं उपदेश देने वाला कौन हूं! लेकिन झूठ छिपाया भी नहीं जाता। सच कहना ही चाहिए। यह देखकर मुझे दुख होता है। इतना ही काफी था कि तुम दुख न मनाते। लेकिन गीत गाना, खंजड़ी बजाना, यह जरा जरूरत से ज्यादा है।
लेकिन च्चांगत्सु ने कहा, क्या कह रहे हो! मेरी पत्नी मर गई और मैं सुख भी न मनाऊं! राजा ने कहा, मतलब? तुम बडा उलटा वचन बोल रहे हो! तो च्चांगत्सु ने कहा कि परमात्मा ने उसे मेरे पास भेजा, संसार को जानने को। और परमात्मा ने उसे मुझसे छीन लिया, मोक्ष पहचानने को। वह मेरा संसार थी, उसके साथ मेरा संसार भी खो गया। परमात्मा की बड़ी कृपा है। उसने संसार दिखाया भी, उसने संसार छीन भी लिया। हम हर हालत में राजी हैं। अनेक मुझसे कहते थे, पत्नी को छोड्कर भाग जाओ। छोड़ दो संसार। मैंने कहा, वह परमात्मा जब छुड़ाना चाहेगा, छुड़ा लेगा। हम राजी हैं। हम ऐसे ही राजी हैं। आखिर मेरी बात सही निकली। परमात्मा ने उसे उठा लिया।
और फिर जिस पत्नी ने मुझे जीवनभर अनेक— अनेक तरह के अनुभव दिए सुख के और दुख के, उसके लिए क्या इतना भी अनुग्रह न मानूं कि विदाई के क्षण में गीत गाकर विदा न दे सकूं! जिसने अपना पूरा जीवन मेरे सुख—दुख में लगाया, उसके लिए इतना धन्यवाद तो मन में होना ही चाहिए।
तो मैं उसके धन्यवाद के लिए गा रहा हूं और परमात्मा के धन्यवाद के लिए गा रहा हूं कि मैं थोड़ा रुक गया, तेरी राह देखी, तो तूने खुद ही पत्नी छीन ली। हम छोड्कर भागते, तो यह मजा न होता—उसने बड़ी अदभुत बात कही—कि हम छोड्कर भागते, तो यह मजा न होता! अधूरी रहती, कच्ची रहती। हमारा ही छोड़ना होता न। हमारी समझ कितनी है? लेकिन तूने उठा लिया। अब सब कोरा आकाश हो गया। पत्नी के साथ पूरी गृहस्थी विलीन हो गई है। यह तेरी अनुकंपा है।
कृष्ण कहते हैं, जिस हालत में, जिस स्थान में, जिस स्थिति में कोई ममता नहीं; विपरीत हो जाए, तो भी विपरीत में प्रवेश करने का उतना ही सहज भाव बिना किसी आसक्ति के पीछे, ऐसा स्थिर बुद्धि वाला भक्तिमान पुरुष मुझे प्रिय है। और जो मेरे परायण हुए श्रद्धायुक्त पुरुष इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम भाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मेरे को अतिशय प्रिय हैं।
आखिरी बात बहुत समझने जैसी है कि यह जो आनंद की प्रक्रिया है, यह जो प्रभु—प्रेम का मार्ग है, इसको भी कृष्ण कहते हैं, इस अमृत को भी जो निष्काम भाव से सेवन करते हैं।
ऐसा मत करना कि आप सोचें कि अच्छा! यह—यह करने से परमात्मा के प्रिय हो जाएंगे, तो हम भी यह—यह करें। तो आपसे भूल हो जाएगी। तब तो 'आप परमात्मा पाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। तो यह जो करना है, कामवासना से भरा है। इसमें वासना है, इसमें फल की इच्छा है। इसमें आप परमात्मा को पाने के लिए उत्सुक हैं, इसलिए ऐसा कर रहे हैं। आप परमात्मा को पाने के लिए कारण निर्मित कर रहे हैं।
इसका यह मतलब हुआ कि आप परमात्मा को पाने के लिए ठीक सौदा करने की स्थिति में आ रहे हैं कि कह सकें कि ही, अब मुझ में ये—ये गुण हैं, अब मिल जाओ!
तो कृष्ण आखिरी शर्त बड़ी गहरी जोड़ देते हैं। और वह यह कि ये सारे लक्षण निष्काम भाव से हों। यह परमात्मा को पाने की दृष्टि से नहीं, बल्कि इन प्रत्येक लक्षण का अपना ही आनंद है, इसी दृष्टि से। इनसे परमात्मा मिलेगा जरूर, लेकिन मिलने की वासना अगर रही, तो बाधा पड़ जाएगी।
एक मित्र मेरे पास आए। उन्होंने मुझसे कहा कि ब्रह्मचर्य मुझे उपलब्ध करना है। कामवासना से छूटना है। इससे छुटकारा दिलाइए। इस शत्रु का कैसे नाश हो? इस जहर से कैसे बचूं? तो मैंने उनसे कहा, आप गलत आदमी के पास आ गए। जिन्होंने जहर कहा है, आप उन्हीं के पास जाइए। मैं इसको जहर कहता नहीं। मैं तो इसे एक शक्ति कहता हूं। तो मैं आपको कहता हूं कि इसे ठीक से जानिए पहचानिए, इसके अनुभव में उतरिए, आप मुक्त हो जाएंगे। लेकिन मुक्त होना परिणाम होगा, फल नहीं। उन्होंने कहा, अच्छी बात है।
वे तीन महीने बाद मेरे पास आए और कहने लगे, अभी तक मुक्त नहीं हुआ!
तो मैंने उनसे कहा, मुक्ति का खयाल अगर साथ में रखकर ही चल' रहे हैं, तो अनुभव पूरा नहीं हो पाएगा। क्योंकि आप पूरे वक्त सोच रहे हैं, कैसे मुक्त हो जाऊं, कैसे भाग जाऊं, कैसे अलग हो जाऊं, कैसे ऊपर उठ जाऊं। तो आप गहरे कैसे उतरिका? अगर छूटने की बात पहले ही तय कर रखी है और छूटने के लिए ही गहरे उतरने का प्रयोग कर रहे हैं, तो गहरा उतरना ही नहीं हो पाएगा। और गहरा उतरना नहीं होगा, तो छूटना भी नहीं होगा।
तो मैंने कहा, छूटने की बात तो आप भूल जाइए। आप तो सिर्फ गहरे उतरिए, छूटना घटित होगा। आपको उसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है।
परमात्मा पाया जाता है, लेकिन परमात्मा कोई सौदा नहीं है, कि हम कहें कि ये—ये लक्षण मेरे पास हैं, अभी तक नहीं मिले! अब मिलो। मैं सब तरह से तैयार हूं।
तो आप कभी भी न पा सकेंगे, क्योंकि यह तो अहंकार का ही आधार हुआ। परमात्मा पाया जाता है तब, जब आप अपने को इतना भूल गए होते हैं इन लक्षणों में, इतने लीन हो गए होते हैं कि आपको खयाल ही नहीं होता कि अभी परमात्मा भी पाने को शेष है। जिस क्षण आप इतने शांत और निष्काम होते हैं, सिर्फ होते हैं, इतनी भी वासना मन में नहीं रहती, इतनी भी लहर नहीं होती कि परमात्मा को पाना है, उसी क्षण अचानक आप पाते हैं कि परमात्मा पा लिया गया है।
इसलिए कृष्ण कहते हैं, ये सब बातें भी निष्काम! इनमें पीछे कोई कामवासना न हो। धर्ममय अमृत को निष्काम भाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मेरे को अतिशय प्रिय हैं।
भक्ति—योग नामक बारहवां अध्याय समाप्त। भक्ति—योग की चर्चा समाप्त। उससे आप यह मत समझना कि आपका अध्याय समाप्त। किताब का अध्याय समाप्त। आपका सिर्फ शुरू भी हो जाए तो बहुत। प्रारंभ भी हो जाए, तो बहुत। यह किताब का अध्याय समाप्त हुआ। आपके जीवन में भक्ति का अध्याय शुरू हो, तो काफी।
तीन बातें अंत में आपको स्मरण करने को कह दूं।
एक, भक्ति का अर्थ है, सत्य को बुद्धि से नहीं, हृदय से पाया जा सकता है। विचार से नहीं, भाव से पाया जा सकता है। चिंतन से नहीं, प्रेम से पोया जा सकता है। पहली बात।
दूसरी बात, भक्ति को पाना हो, तो आक्रामक चित्त बाधा है। ग्राहक चित्त! पुरुष का चित्त बाधा है। स्त्रैण चित्त! एक प्रेयसी की तरह प्रभु को पाया जा सकता है।
तीसरी बात, प्रभु को पाना हो, तो प्रभु को पाने की त्वरा, ज्वर, फीवर, बुखार नहीं चाहिए। प्रभु को पाना हो तो अत्यंत शांत, निष्काम भाव दशा चाहिए। उसको पाने के लिए उसको भी भूल जाना जरूरी है। खूब याद करें उसे, लेकिन अंतिम क्षण में उसे भी भूल जाना जरूरी है, ताकि वह आ जाए। और जब हम बिलकुल विस्मृत हो गए होते हैं; यह भी न अपना पता रहता, न उसका पता रहता; न यह खयाल रहता कि कौन खोज रहा है, और न यह खयाल रहता कि किसको खोज रहा है, बस उसी क्षण, उसी क्षण घटना घट जाती है, और उस अमृत की उपलब्धि हो जाती है।

पांच मिनट रुकेंगे। संन्यासी कीर्तन करेंगे। आपसे आशा है, आप भी अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर ताली बजाए, ताकि मैं खयाल ले सकूं कि किन—किन के मन भक्ति के मार्ग पर जाने के लिए तैयार हैं। झूठा कोई हाथ न उठाए। हाथ ऊपर उठा लें, साथ में तालियां बजाए। कीर्तन में सम्मिलित हों।
बैठे रहें। उठें न, एक पांच मिनट बीच से कोई उठे न! कीर्तन में सम्मिलित हों। अभी कीर्तन शुरू होगा, आप भी ताली बजाए और कीर्तन में साथ दें।