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बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--6) प्रवचन--147

उद्वेगरहित अहंशून्‍य भक्‍ति(प्रवचनआठवां)

अध्‍याय—12
सूत्र—

            यस्माब्रोद्धिजते लोको लोकान्‍नोद्वोजते च य:।
हषीमर्बभयोद्वेगैर्मुक्‍तो यः स च मे प्रिय:।। 15।।
अनयेक्ष: शू्चिर्दर्थ्य उदासीनो ग्लव्यथ:।
सर्वारम्भयश्त्यिगी यो मद्यक्त: स मे प्रिय:।। 16।।

तथा जिससे काई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादिकों से रहित है, वह भक्त मेरे को प्रिय है।
और जो पुरूष आकांक्षा से रहित तथा बहार— भीतर से शुद्ध और दक्ष है अर्थात जिस काम के लिए आया था, उसको पूरा कर चुका है एवं पक्षपात से रहित और दुखों से छूटा हुआ है? वह सर्व आरंभों का त्यागी मेरा भक्त मेरे को प्रिय है।


 पहले कुछ प्रश्न।

एक मित्र ने पूछा है, भगवान को पाने के लिए इतना कठिन, लंबा और कष्टमय मार्ग क्यों है? उसे पाने के लिए सुगम, सरल और आनंदमय मार्ग क्यों नहीं है?

 मार्ग कष्ट मय जरा भी नहीं है। और नहीं कठिन है। मार्ग तो अति सुगम है, सरल है, और आनंदपूर्ण है। लेकिन हम जैसे हैं, उसके कारण कठिनाई पैदा होती है। कठिनाई मार्ग के कारण पैदा नहीं होती। कठिनाई हमारे कारण पैदा होती है। और अगर प्रभु का रास्ता लगता है कि अति कष्टों से भरा है, तो रास्ता कष्टों से भरा है इसलिए नहीं, हेम जिन बीमारियों से भरे हैं, उनको छोड़ने में कष्ट होता है।
अड़चन हमारी है। जटिलता हमारी है। रास्ता तो बिलकुल सुगम है। आप अगर सरल हो जाएं, तो रास्ता बिलकुल सरल है। आप अगर जटिल है, तो रास्ता बिलकुल जटिल है। क्योंकि आप ही हैं रास्ता। आपको अपने से ही गुजरकर पहुंचना है। और आपको पहुंचना है, इसलिए आपको बदलना भी होगा।
अब जैसे एक आदमी चोर है, तो चोरी छोड़े बिना एक इंच भी वह प्रार्थना के मार्ग पर न बढ सकेगा। लेकिन चोरी में रस है। चोरी का अभ्यास है। चोरी का लाभ दिखाई पड़ता है, तो छोड़ना मुश्किल मालूम होता है।
और परमात्मा तो दूर का लाभ है; चोरी का लाभ अभी. और यहीं दिखाई पड़ता है। और परमात्मा है भी या नहीं, यह भी संदेह बना रहता है। चोरी में जो लाभ खो जाएगा, वह प्रत्यक्ष मालूम पड़ता है; और परमात्मा में जो आनंद मिलेगा, वह बहुत दूर की कल्पना मालूम पड़ती है, सपना मालूम पड़ता है।
तो चोरी छोड़नी कठिन हो जाती है, हिंसा छोड़नी कठिन हो जाती है, क्रोध छोड़ना कठिन हो जाता है। परमात्मा के कारण ये कठिनाइयां नहीं हैं। ये कठिनाइयां हमारे कारण हैं।
अगर आप सरल हो जाएं, तो रास्ता ही नहीं बचता। इतनी भी कठिनाई नहीं रह जाती कि रास्ते को पार करना हो। अगर आप सरल हो जाएं, तो आप पाते हैं कि परमात्मा सदा से आपके पास ही मौजूद था, आपकी कठिनाई के कारण दिखाई नहीं पड़ता था। रास्ता होगा, तो थोड़ा तो कठिन होगा ही। चलना पड़ेगा। लेकिन इतना भी फासला नहीं है मनुष्य में और परमात्मा में कि चलने की जरूरत हो। लेकिन हम बड़े जटिल हैं, बड़े उलझे हुए हैं।
मैंने सुना है कि एक आदमी भागा हुआ चला जा रहा था एक राजधानी के पास। राह के किनारे बैठे एक आदमी से उसने पूछा कि मैं राजधानी जाना चाहता हूं कितनी दूर होगी? तो उस आदमी ने कहा, इसके पहले कि मैं जवाब दूं दो सवाल तुमसे पूछने जरूरी हैं। पहला तो यह कि तुम जिस तरफ जा रहे हो, अगर इसी तरफ तुम्हें राजधानी तक पहुंचना है, तो जितनी जमीन की परिधि है, उतनी ही दूर होगी, क्योंकि राजधानी पीछे छूट गई है। अगर तुम इसी तरफ खोजने का इरादा रखते हो, तो पूरी जमीन घूमकर जब तुम लौटोगे, तो राजधानी आ पाएगी। अगर तुम लौटने को तैयार हो, तो राजधानी बिलकुल तुम्हारे पीछे है।
तो एक तो यह पूछना चाहता हूं कि किस तरफ जाकर राजधानी खोजनी है? और दूसरा यह पूछना चाहता हूं कि किस चाल से खोजनी है? क्योंकि दूरी चाल पर निर्भर करेगी। अगर चींटी की चाल चलना हो, तो पीछे की राजधानी भी बहुत दूर है। तो तुम्हारी चाल और तुम्हारी दिशा, इस पर राजधानी की दूरी निर्भर करेगी। परमात्मा कितना दूर है, यह आप पर निर्भर करेगा कि आप किस दिशा में खोज रहे हैं, और इस पर निर्भर करेगा कि आपकी गति क्या है। अगर आप गलत दिशा में खोज रहे हैं, तो बहुत कठिन है। और हम सब गलत दिशा में खोज रहे हैं।
मजा तो यह है कि यहां नास्तिक भी परमात्मा को ही खोज रहा है। परमात्मा का अर्थ है परम आनंद को, अंतिम जीवन के अर्थ को, प्रयोजन को, सार्थकता को, क्या है अभिप्राय जीवन का, इसको नास्तिक भी खोज रहा है। ऐसा आदमी खोजना कठिन है, जो परमात्मा को न खोज रहा हो।
हां, कोई गलत रास्ते पर खोज रहा हो, गलत दिशा में खोज रहा हो, यह हो सकता है। लेकिन परमात्मा को खोज ही न रहा हो, यह नहीं हो सकता। हो सकता है, अपनी खोज को वह परमात्मा का नाम भी न देता हो। लेकिन सभी खोज उसी के लिए है। आनंद की खोज, अभिप्राय की खोज, अर्थ की खोज, उसकी ही खोज है। अपनी खोज उसकी ही खोज है। अस्तित्व की खोज उसकी ही खोज है। नाम हम क्या देते हैं, यह हम पर निर्भर है।
लेकिन आप सूरज को खोजने चल सकते हैं और सूरज की तरफ पीठ करके चल सकते हैं। तो आप हजारों मील चलते रहेंगे और सूरज दिखाई नहीं पड़ेगा। और एक मजे की बात है कि आप हजारों मील चल चुके हों, और आप पीठ फेर लें, उलटे खड़े हो जाएं, तो सूरज अभी आपको दिखाई पड़ जाएगा।
इससे एक बात खयाल में ले लें। अगर सूरज की तरफ पीठ करके आप हजार मील चले गए हैं, तो आप यह मत समझना कि जब सूरज की तरफ मुंह करके आप हजार मील चलेंगे, तब सूरज दिखाई पड़ेगा। सूरज तो इसी वक्त मुंह फेरते ही दिखाई पड़ जाएगा।
तो परमात्मा से आप कितने दूर चले गए हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आप पीठ फेरने को राजी हों, तो इसी वक्त परमात्मा दिखाई पड़ जाएगा। उसके बीच और आपके बीच दूरी वास्तविक नहीं है, केवल आपके पीठ के फेरने की है, सिर्फ दिशा की है। वह आपके साथ ही खड़ा। वह आपके भीतर ही छिपा।
तो पहली तो बात यह समझ लें कि कठिनाई रास्ते की नहीं है। इसलिए सरल रास्ते की खोज मत करें। सरल होने की खोज करें। बहुत—से लोग सरल रास्ते की खोज में होते हैं। वे कहते हैं, कोई शार्टकट? उसमें वे बहुत धोखे में पड़ते हैं, क्योंकि परमात्मा तक पहुंचने का कोई शार्टकट रास्ता नहीं है। क्योंकि पीठ ही फेरनी है, अब इसमें और क्या शार्टकट होगा? अगर सिर्फ पीठ फेरनी है और परमात्मा सामने आ जाएगा, तो इससे संक्षिप्त अब और क्या करिएगा? इससे और संक्षिप्त नहीं हो सकता।
लेकिन हम खोज में रहते हैं संक्षिप्त रास्ते की। वह क्यों? वह हम इसलिए खोज में रहते हैं कि कोई ऐसा रास्ता मिल जाए जो सरल हो। उसका मतलब क्या? उसका मतलब, जो मुझे न बदले। जब हम पूछते हैं सरल रास्ता, तो हम यह पूछते हैं कि कुछ ऐसी



 बात बताओ कि जैसा मैं हूं, वैसा ही परमात्मा से मिलन हो जाए; मुझे कुछ भी न करना पड़े। सरल का मतलब है, परमात्मा मुफ्त में मिल जाए। मुझे कुछ भी छोड़ना, तोड़ना, बदलना न पड़े। मैं जैसा हूं ऐसे को ही मिल जाए, यह आपकी आकांक्षा है भीतरी।
यह कभी भी नहीं होगा। अगर यह होने वाला होता, तो बहुत पहले हो गया होता। आप बहुत जन्मों से यह कर रहे हैं। यह कोई आपकी नई तलाश नहीं है। काफी, लाखों साल की तलाश है। और भूल उसमें वही है कि आप सरल रास्ता खोजते हैं, सरल व्यक्तित्व नहीं खोजते। आप सरल हो जाएं, रास्ता सरल है। और इसकी फिक्र में लगें कि मैं कैसे सरल हो जाऊं।
और जीवन—क्रांति की कोई भी प्रक्रिया शार्टकट नहीं होती। क्योंकि जो हमने अपने को उलटा करने के लिए किया है, उतना तो करना ही पड़ेगा सीधा होने के लिए। इसलिए वह बात ही छोड़ दें सरल की, और ध्यान करें अपनी जटिलता पर।
आपकी जटिलता को समझने की कोशिश करें और आपकी जटिलता कैसे खुलेगी, एक—एक गांठ, उसको खोलने की कोशिश करें। जैसे—जैसे आप खुलते जाएंगे, आप पाएंगे कि परमात्मा आपके लिए खुलता जा रहा है। इधर भीतर आप खुलते हैं, उधर बाहर परमात्मा खुलने लगता है। जिस दिन आप भीतर बिलकुल खुल गए होते हैं, परमात्मा सामने होता है।
बुद्ध ने कहा है.। जब उन्हें ज्ञान हुआ, और किसी ने पूछा कि आपको क्या मिला है? तो बुद्ध ने कहा, मुझे मिला कुछ भी नहीं है। सिर्फ उसको ही जान लिया है, जो सदा से मिला हुआ था। कोई नई चीज मुझे नहीं मिल गई है। मगर जो मेरे पास ही थी और मुझे दिखाई नहीं पड़ती थी, उसका ही दर्शन हो गया है।
तो बुद्ध ने कहा है कि यह मत पूछो कि मुझे क्या मिला। ज्यादा अच्छा हो कि मुझसे पूछो कि क्या खोया। क्योंकि मैंने खोया जरूर है कुछ, पाया कुछ भी नहीं है। खोया है मैंने अपना अशान। खोई है मैंने अपनी नासमझी, खोई है मैंने गलत चलने की दिशा और गलत ढंग। खोया है मैंने गलत जीवन। पाया है, कहना ठीक नहीं, क्योंकि जो पाया है, वह था ही। अब जानकर मैं कहता हूं कि यह तो सदा से मेरे पास था। सिर्फ मैं गलत था, इसलिए इससे मेरी पहचान नहीं हो पाती थी। जो मेरे भीतर ही छिपा था, उस तक भी मैं नहीं पहुंच पाता था, क्योंकि मैं कहीं और उसे खोज रहा था।
सूफी फकीर औरत हुई है, राबिया। एक दिन लोगों ने देखा कि वह रास्ते पर सांझ के अंधेरे में कुछ खोजती है। तो लोगों ने पूछा, क्या खोजती है? तो उसने कहा, मेरी सुई खो गई है। तो दूसरे लोग भी खोजने में लग गए कि बूढ़ी की सुई मिल जाए। तब एक आदमी को खयाल आया कि सूरज ढलता जाता है, अंधेरा होता जाता है। तो उस आदमी ने कहा कि तेरी सुई बड़ी छोटी चीज है और रास्ता बड़ा है। आखिर खोई कहां है? ठीक जगह कहां गिरी है, तो हम खोज भी लें; नहीं तो सूरज ढल रहा है।
तो राबिया ने कहा, यह सवाल ही मत उठाओ, क्योंकि सुई तो मेरे घर में गिरी है, घर के भीतर गिरी है। तो वे सारे लोग खड़े हो गए। उन्होंने कहा, पागल औरत, अगर घर के भीतर सुई गिरी है, तो यहां बाहर क्यों खोजती है? तो उसने कहा, घर में प्रकाश नहीं है, बाहर प्रकाश है। और बिना प्रकाश के खोजूं कैसे? इसलिए यहां खोजती हूं।
आप भी खोज रहे हैं, लेकिन आपको इसका भी खयाल नहीं है कि खोया कहां है। और जब तक इसका ठीक पता न हो कि परमात्मा को खोया कहां है, खोया भी है या नहीं; या खोया है, तो भीतर या बाहर, तब तक खोज आपकी भटकन ही होगी।
लेकिन आप भी राबिया की तरह हैं। राबिया भी उन लोगों से मजाक कर रही थी। और जब वे सब हंसने लगे और कहने लगे, पागल औरत, जब घर के भीतर सुई खोई है, तो वहीं खोज। और अगर प्रकाश नहीं है, तो प्रकाश वहा ले जा, बजाय इसके कि प्रकाश में खोज। क्योंकि जब उसे खोया ही नहीं, तो प्रकाश पैदा तो नहीं कर देगा! प्रकाश तो केवल बता सकता है, जो मौजूद हो। तो तू प्रकाश भीतर ले जा।
तो राबिया ने कहा कि तुम सब मुझ पर हंसते हो, लेकिन मैं तो दुनिया की रीत से चल रही थी। मैंने सभी लोगों को बाहर खोजते देखा है। और बाहर खोया किसी ने भी नहीं है। मैंने सोचा कि यही उचित है, दुनिया की रीत से ही चलना।
आप कहां खोज रहे हैं? आनंद कहां खोज रहे हैं आप? कोई धन में खोज रहा है, कोई मित्र में, कोई प्रेम में, कोई यश में, कोई प्रतिष्ठा में। वह सारी खोज बाहर है। लेकिन आपको पक्का है कि आपने आनंद कभी बाहर खोया है? और आप आनंद क्यों खोज रहे हैं, अगर आपको आनंद का पहले कोई पता ही नहीं है तो?
यह जरा सोचने जैसी बात है। उस चीज की खोज नहीं हो सकती, जिसका हमें कोई पूर्व—अनुभव न हो। खोजेंगे कैसे?
सबको लगता है कि आनंद नहीं है। इससे एक बात तो साफ है, आपको किसी न किसी गहराई के तल पर यह पता है कि आनंद क्या है। नहीं तो आनंद नहीं है, यह कैसे कहते हैं आप? दुख है, यह कैसे कहते हैं? क्योंकि जिसने कभी अंधेरा न देखा हो, वह प्रकाश को भी नहीं जान सकता। और जिसने कभी प्रकाश न देखा हो, वह यह भी नहीं पहचान सकता कि यह अंधेरा है। अंधेरे की पहचान के लिए प्रकाश का अनुभव चाहिए।
अगर आपको लगता है, यह दुख है, तो आपको कुछ न कुछ आनंद की खबर है। तभी तो आप सोच पाते हैं कि यह वैसा नहीं है, जैसा होना चाहिए। आनंद नहीं है, पीड़ा है, दुख है।
सभी को दुख का अनुभव होता है। इससे अध्यात्म की एक मौलिक धारणा पैदा होती है और वह यह कि सभी को जाने—अनजाने आनंद का अनुभव है। शायद आपको भी पता नहीं है, लेकिन आपके प्रायों की गहराई में आनंद की कोई प्रतीति है अभी भी। उसी से आप तोलते हैं, और पाते हैं कि नहीं, अनुकूल नहीं है, और उसी को आप खोज रहे हैं।
जो आपकी गहराइयों में छिपा है, उसको ही आप खोज रहे हैं। लेकिन खोज रहे हैं बाहर। जहां वह छिपा है, वहां नहीं खोज रहे हैं। लेकिन बाहर खोजने का कारण वही है, जो राबिया का था। वह कारण यही है कि आंखें बाहर खुलती हैं। इसलिए रोशनी बाहर है। हाथ बाहर फैलते हैं, कान बाहर सुनते हैं; सारी इंद्रियां बाहर खुलती हैं। इंद्रियों का प्रकाश बाहर पड़ता है, इसलिए हम बाहर खोज रहे हैं।
हम भीतर हैं और इंद्रियां बाहर की तरफ खुलती हैं। इसलिए इंद्रियों के द्वारा जो भी खोज है, वह आपको कहीं भी न ले जाएगी। इंद्रियां बाहर की तरफ जाती हैं और आप भीतर की तरफ हैं। आप इंद्रियों के पीछे छिपे हैं। आपकी संपदा पीछे छिपी है, और इंद्रियां बाहर जाती हैं। इंद्रियों का उपयोग यही है। इंद्रियां संसार से जुड्ने का मार्ग हैं। इसलिए बाहर की तरफ जाती हैं।
भीतर तो आंखों की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि भीतर तो बिना आंखों के देखा जा सकता है। भीतर कान की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि बिना कान के भीतर सुना जा सकता है। भीतर हाथों की कोई भी जरूरत नहीं है, क्योंकि बिना हाथों के भीतर स्पर्श हो जाता है। इसलिए इंद्रियों की भीतर की तरफ कोई जरूरत नहीं है। भीतर का सब अनुभव अतींद्रिय है, इंद्रिय के बिना हो जाता है।
इंद्रियों की जरूरत संसार के लिए है। वे इंस्ट्रमेंट्स हैं, साधन हैं, संसार से जुड्ने के। तो जितना संसार से जुड़ना हो, उतनी सबल इंद्रिय चाहिए।
वैज्ञानिक कहते हैं कि विज्ञान की सारी खोज इंद्रियों को सबल बनाने से ज्यादा नहीं है। आपकी आंख देख सकती है थोड़ी दूर तक। दूरबीन है, वह मीलों तक देख सकती है। फिर और बड़ी दूरबीनें हैं, वे आकाश के तारों को देख सकती हैं। लेकिन आप कर क्या रहे हैं? जो तारा खाली आंख से दिखाई नहीं पड़ता, वह दूरबीन से दिखाई पड़ जाता है। क्योंकि दूरबीन बड़ा सबल यंत्र है। दूर तक उसका सेतु बन जाता है। दूर तक उसका संबंध बन जाता है। खाली आंख से उतना संबंध नहीं बनता।
कान से आप सुनते हैं। रेडियो भी सुनता है, लेकिन वह काफी दूर की बात पकड़ लेता है। आंख से आप देखते हैं। टेलीविजन भी देखता है, लेकिन वह काफी दूर की बात पकड़ लेता है। सारी वैज्ञानिक खोजें इंद्रियों का परिष्कार हैं। विज्ञान का जगत इंद्रियों का जगत है। सारा संसार इंद्रियों से जुड़ा हुआ है।
लेकिन इससे एक उपद्रव पैदा होता है कि आप परमात्मा को भी खोजने इन्हीं इंद्रियों के रास्ते से चले जाते हैं। यह गलती वैसे ही है, जैसे कोई आदमी आंखों से संगीत सुनने की कोशिश करने लगे। आंखें देख सकती हैं, सुन नहीं सकतीं। और कितनी ही सबल आंख हो, तो भी नहीं सुन सकती। सुनने का काम आंख से नहीं हो सकता। सुनने का काम कान से होगा। और कान अगर देखने की कोशिश करने लगे, तो फिर मुसीबत होगी, पागलपन पैदा होगा।
इंद्रिया बाहर का मार्ग हैं, उनसे भीतर की खोज नहीं हो सकती। इंद्रिया पदार्थ से जोड़ देती हैं, उनका परमात्मा से जुड़ना नहीं हो सकता। यह उनकी सीमा है। जैसे आंख देखती है, यह उसकी सीमा है। इसमें कोई कसूर नहीं है।
इंद्रियां बाह्य ज्ञान के साधन हैं। और वह जो छिपा है, वह जो आप हैं, वह भीतर है। उसे खोजना हो, तो इंद्रियों के द्वार बंद करके भीतर डूब जाना होगा। इंद्रियों के सेतु छोड़ देने होंगे। इंद्रियों के रास्तों से लौटकर अपने भीतर ही खड़े हो जाना होगा।
इस भीतर खड़े हो जाने का नाम अध्यात्म है। और भीतर जो खड़ा हो जाता है, वह पाता है कि जिसे मैंने कभी न खोया था, उसे मैं खोज रहा था। जिससे मेरा कभी बिछुड़ना न हुआ था, उसके मिलन के लिए मैं परेशान हो रहा था। जो सदा ही पास था, उसे मैं दूर—दूर तलाश रहा था। और दूर—दूर तलाशने की वजह से उसे नहीं पा रहा था। नहीं पा रहा था, तो और परेशान हो रहा था। और परेशान हो रहा था, तो और दूर खोज रहा था। ऐसे खोज एक विशियस सर्किल, एक दुष्टचक्र बन जाती है।
सरल है बहुत, क्योंकि परमात्मा आपके इतने निकट है कि उसे निकट कहना भी उचित नहीं है। क्योंकि निकटता में भी थोड़ी—सी दूरी होती है। परमात्मा आपकी श्वास—श्वास में है, रोएं—रोएं में है। ठीक से समझें तो आप परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं।

 एक मित्र ने और पूछा है। उन्होंने पूछा है कि अगर हम परमात्मा ही हैं, तो फिर जानने की क्या जरूरत है?

 गर सच में ही पता चल गया है कि आप परमात्मा हैं, तब तो जानने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर खतरनाक है। पूछते हैं कि अगर हम परमात्मा ही हैं..। वह अगर ही मिटाने के लिए खोज की जरूरत है। वह जो यदि लगा हुआ है, वही तो उपद्रव है।

 उन मित्र ने यह भी पूछा है कि परमात्मा को पा लेने से ही क्या होगा, जब वह मिला ही हुआ है?

 कुछ भी नहीं होगा, सिर्फ खोज मिट जाएगी। और खोज मिटते ही पीड़ा मिट जाती है, दौड़ मिट जाती है। और जब तक उसे नहीं पा लिया है, खोज जारी रहेगी।

 एक और मित्र ने पूछा है कि अगर आदमी ही परमात्मा है, अगर उसके भीतर ही वह छिपा है, तो मिल क्यों नहीं जाता? अड़चन क्यों है?

 ड़चन इसलिए है कि यह भी चेतना की सामर्थ्य है कि वह चाहे तो अपने को विस्मरण कर दे। और यह भी चेतना की सामर्थ्य है कि वह चाहे तो अपने को स्मरण कर ले। जरा जटिल है। चेतना का अर्थ ही होता है कि जिसे स्मरण और विस्मरण की शक्ति हो। और दोनों शक्तियां साथ होती हैं।
अगर कोई आदमी कहता है कि मुझे सिर्फ स्मरण की शक्ति है, विस्मरण की नहीं है, तो आप भरोसा मत करना। क्योंकि जो भूल नहीं सकता, वह याद भी नहीं कर सकता। भूलना और याद करना साथ—साथ है। वही याद कर सकता है, जो भूल भी सकता है। जो भूल सकता है, वही याद भी कर सकता है।
तो आप सोचते हैं कि आपके भीतर जो स्मृति की शक्ति है, मेमोरी की, वह विस्मरण पर खड़ी है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अगर कोई आदमी भूलना बंद कर दे, तो फिर याद करना उसी दिन बंद हो जाएगा।
थोड़ा सोचें, दिनभर में जितनी घटनाएं घटती हैं, अगर वे सब आपको याद रह जाएं, कुछ भी आप भूलें न। आपको पता है, कितनी घटती हैं? हिसाब मनोवैज्ञानिक लगाते हैं, तो कम से कम एक आदमी की इंद्रियों पर दस लाख संघात होते हैं चौबीस घंटे में, कम से कम। यह भी उस आदमी के, जो कुछ ज्यादा न कर रहा हो। ज्यादा करने वाले को तो और ज्यादा होंगे।
दस लाख स्मृतियां बनती हैं। अगर वे सब आपको याद रह जाएं, तो दूसरे दिन आपका पता भी न चलेगा कि कहां आप चले गए। आप पागल हो जाएंगे। अगर दस लाख याद रह जाएं, तो आपको यह भी याद न रहेगा कि आप कौन हैं! आपकी पत्नी कौन है! आपका घर कहां है! पता—ठिकाना क्या है! यह सब गड़बड़ हो जाएगा।
उस दस लाख में से दस भी याद नहीं रह जाती हैं। सब भूल जाते हैं। इसलिए आपकी स्मृति काम कर पाती है। इसलिए आपको पता रहता है कि आप कौन हैं। घर—ठिकाना कहां है। सांझ दफ्तर से ठीक अपने ही घर पहुंच जाते हैं। फिर नहीं पहुंच सकेंगे घर, जो भी दिनभर में घटा है, वह सब याद रह जाए तो।
वह जो विस्मरण है, उसके कारण स्मृति काम करती है। यह जो विरोध है अस्तित्व का, इसे समझ लें।
अस्तित्व ध्रुवीयता से, पोलेरिटी से चलता है। यहां अगर धन विद्युत चाहिए, तो ऋण विद्युत के बिना नहीं हो सकती। यहां अगर पुरुष चाहिए, तो स्त्री के बिना नहीं हो सकता। यहां स्त्री चाहिए, तो पुरुष के बिना नहीं हो सकती। यहां दिन चाहिए, तो रात होगी। और जन्म चाहिए, तो मौत होगी। यहां विपरीत मौजूद रहेगा। और विपरीत से ही सारी व्यवस्था है।
चेतना स्मरण कर सकती है, क्योंकि विस्मरण कर सकती है। यह चेतना का गुण है। वह आपकी चेतना चाहे तो स्मरण कर सकती है कि कौन है। जिस दिन स्मरण करेगी, उस दिन परमात्मा हो जाएगी। और चाहे तो विस्मरण कर सकती है। जब विस्मरण कर दे, तो संसार का एक साधारण हिस्सा हो जाएगी। केवल बात इतनी है कि आपको कैसे पुनर्स्मरण आ जाए।

लेकिन, पूछा है एक और मित्र ने कि आखिर इस खेल की परमात्मा को जरूरत क्या है?

 ह कोई परमात्मा आपको खेल खिला रहा है, ऐसा नहीं है। आप ही खेल रहे हैं। यह हमारी धारणा में ऐसा बैठा हुआ है कि कोई ऊपर परमात्मा बैठा है, और वह आपको खिला रहा है। ऐसा अगर कोई परमात्मा हो, जो आपको यह खेल खिला रहा है, तो उसकी हालत शैतान से भी बदतर होगी। आपको नाहक सता रहा है!
यह तो ऐसा हुआ, जैसा कि छोटे बच्चे मेंढक को सता रहे हैं; पत्थर मार रहे हैं। क्योंकि वे खेल खेल रहे हैं और मेंढक की जान जा रही है। आप नाहक परेशान हो रहे हैं, कोई परमात्मा ऊपर बैठा हुआ खेल खेल रहा है! वह भी अब तक ऊब गया होता। इतना खेल हो चुका और सार तो कुछ इस खेल में से दिखाई पड़ता नहीं।
नहीं; यह धारणा ही गलत है कि कोई परमात्मा ऊपर बैठकर आपको खेल खिला रहा है। आप, परमात्मा खेल खेल रहे हैं। यह आपकी मौज है। इसे ठीक से समझ लें और गहरे उतर जाने दें। यह आपका ही निर्णय है कि आप अज्ञानी रहना चाहते हैं। इसे मैं गौर से कहता हूं जोर देकर कहता हूं क्योंकि इसके परिणाम हैं।
अगर यह किसी और का निर्णय है कि आप अज्ञानी हैं, तो फिर आप अपने निर्णय से इतनी न हो सकेंगे। अगर कोई परमात्मा आपको अज्ञानी रखे हुए है, तो फिर उसकी ही मर्जी होगी, तब आप शानी हो जाएंगे। अगर कोई जाल आपको फंसाए चला रहा है, तो फिर आप बस के बाहर हैं। आप क्या करें?
यह आपका ही निर्णय है कि आप यह खेल खेल रहे हैं।
छोटे बच्चों को आपने खेल खेलते देखा है? लुकने—छिपने का खेल खेलते है। खुद की ही आंखें बंद करके बच्चा खड़ा हो जाता है, ताकि दूसरे छिप जाएं और फिर वह उन्हें खोज सके।
आप खुद ही अपने से छिप रहे हैं और खोज रहे हैं। यह आपकी मौज है। और जिस दिन आप इससे ऊब जाएंगे, खेल खतम करना आपके हाथ में है। जब तक आप कहते हैं कि मैं खतम तो करना चाहता हूं लेकिन खतम होता नहीं है, तब तक समझना कि आप बेईमानी की बात कह रहे हैं।
आज तक ऐसा कभी हुआ नहीं कि किसी ने खतम करना चाहा हो और खेल चला हो। जो खतम करना चाहता है, उसी वक्त खतम हो जाता है। क्योंकि आपका ही निर्णय खेल का आधार है।
लेकिन आपकी तरकीब ऐसी है कि आप खेलना भी चाहते हैं, और खतम करने का मजा भी लेना चाहते हैं। खेलने का भी मजा, खतम करने का भी मजा। संसार का भी सुख, और परमात्मा का भी आनंद। संसार का भी धन, और निर्वाण का भी सुख! सब साथ लेना चाहते हैं। इसलिए आप उलझन में हैं।
आप अगर सच में ही समझ गए हैं कि यह जीवन दुख है, पीड़ा है, संताप है, नरक है, तो आप भीतर की तरफ लौटना शुरू हो ही जाएंगे। कोई आपको रोक न सकेगा।
बुद्ध घर से गए। उनका सारथि उन्हें छोड़ने गया था। सारथि बड़ा दुखी हो रहा था कि बुद्ध भी कैसा नासमझ है! कैसा नासमझ लड़का हुआ शुद्धोदन को। लोग जन्मों तक तड़पते हैं, तब कहीं ऐसे सम्राट के घर में जीवन मिलता है। ऐसे सुंदर महल, ऐसी सुंदर पत्नी, ऐसा सारा साज—सामान, सारा वैभव छोड्कर यह नासमझ लड़का भागा जा रहा है!
आखिरी, जब बुद्ध उतरने लगे और उन्होंने कहा कि अब रथ को तू वापस ले जा। तो उस के सारथि ने कहा कि माना कि तुम मालिक हो और मैं नौकर, लेकिन यह क्षण ऐसा है कि चाहे अशिष्टता भले हो जाए, मुझे कुछ कहना चाहिए। तुम यह क्या कर रहे हो? महलों को छोड्कर जा रहे हो? सारी दुनिया महलों की तरफ आ रही है। सब की आकांक्षा यही है कि कैसे महल में पहुंच जाएं। और तुम महल छोड्कर जा रहे हो? क्या नासमझी कर रहे हो? मुझ बूढ़े की बात पर ध्यान दो!
तो बुद्ध ने कहा कि जहां तुझे महल दिखाई पड़ते हैं, वहां मुझे आग की लपटों के सिवाय और कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। तो जिनको महल दिखाई पड़ रहे हैं, वे उस तरफ जा रहे हैं। मैं महलों में रहकर लपटें देखकर उस तरफ से हट रहा हूं। अगर महल होते, तो मैं भी रुक जाता। लेकिन महल वहा हैं नहीं।
वह का छन्ना रोने लगा, वह सारथि रोने लगा। उसकी आंख से आंसू झरने लगे। उसने कहा कि तुम यह क्या कह रहे हो? मेरी समझ में नहीं आता। तुम किसी भूल में तो नहीं पड़ गए हो? तुम किसी भ्रम में तो नहीं हो?
बुद्ध ने कहा कि भ्रम में वे लोग हैं, जो महल की तरफ जा रहे हैं। मैं उस जीवन की खोज के लिए निकला हूं अब, जिसमें आग की लपटें नहीं हैं। मैं उस शीतल जीवन की खोज में जा रहा हूं, जहां कोई लपट नहीं है।
मगर हम भी चाहते हैं कि ऐसा शीतल जीवन हो। मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, शात हो मन! लेकिन उनकी सब आकांक्षाए अशांति की हैं। उनकी सब आकांक्षाए, जिनको वे तृप्त करना चाहते हैं, अशांति की हैं। और शांति भी चाहते हैं! और जिन आकांक्षाओं को परिपोषित करते हैं, उन सब से अशांति पैदा होती है। उनकी मनोदशा ऐसी है कि वे चाहते हैं, अगर शांति मिल जाए, तो शांति से ये सब मनोवासनाए पूरी कर लें।
यह कट्राडिक्यान है। यह नहीं हो सकता।
एक युवक मेरे पास आया। विश्वविद्यालय की किसी बड़ी परीक्षा के लिए तैयारी कर रहा है। उसने मुझे कहा कि मन बड़ा अशात है। और इसीलिए आपके पास आया हूं। धर्म की, ज्ञान की मुझे कोई जरूरत नहीं है। मुझे तो सिर्फ, अभी परीक्षा पास है, और जीवन दांव पर लगा है; मुझे प्रथम आना है। प्रथम श्रेणी में प्रथम आना है। आप कोई ऐसी तरकीब बता दें कि मेरा मन शात हो जाए। मैंने कहा, शांति तू किसलिए चाहता है? उसने कहा कि इसीलिए। अगर शात हो जाऊं, तो यह प्रथम आने का काम पूरा हो जाए। अशांति में तो यह न हो सकेगा।
उसकी बात तर्कयुक्त है। इतना मन अशात है, तो कैसे श्रम करूं प्रथम आने का! यह अशांति ही शक्ति खा रही है। इसलिए शांति की तलाश में है। लेकिन उसे पता नहीं कि अशात क्यों है वह? अशांति इसीलिए है कि प्रथम आना चाहता है। वह जो महत्वाकांक्षा है, वही अशांति ला रही है।

 अब बड़ी उपद्रव की बात है। वह चाहता है शांति, ताकि महत्वाकांक्षा पूरी हो सके। और महत्वाकांक्षा से ही अशांति पैदा हो रही है। अन्यथा अशांति का कोई कारण नहीं है।
क्या किया जाए इस युवक के लिए? कोई भी शांति का रास्ता कारगर नहीं होगा। क्योंकि अशांति के बीज तो भीतर गहरे में हैं, उन्हीं से अशांति पैदा हो रही है।
उससे मैंने कहा कि शांति की तू फिक्र छोड़। तू पहले मुझे यह बता कि अशांति क्यों हो रही है? क्योंकि अशांति का कारण हट जाए, तो तू शात हो जाएगा।
उसने कहा, वह भी मेरी समझ में आता है। आपकी बात भी मेरी समझ में आती है कि अशांति का कारण यही है कि मैं प्रथम आना चाहता हूं। यही उपद्रव है मेरे मन में कि अगर प्रथम न आया, तो क्या होगा! उसी से पीड़ित हो रहा हूं। अगर मैं यही वासना छोड़ दूं प्रथम आने की, तो अशांति का और कोई कारण नहीं है।
तो फिर मैंने कहा, तू ठीक से तय कर ले। अगर महत्वाकांक्षा चाहिए, तो अशात होने की हिम्मत चाहिए। मैं नहीं कहता कि तू महत्वाकांक्षा छोड़। फिर अशांति को स्वीकार कर। वह उसका हिस्सा है। और अगर शांति चाहिए, तो महत्वाकांक्षा को छोड़। फिर वह साहस कर। वह शांति का अनिवार्य हिस्सा है।
हमारी दुविधा यह है कि हम संसार और परमात्मा में दोनों में जो मिलता हो, दोनों चाहते हैं। अज्ञान में जो फायदा हो, वह भी चाहते हैं, और ज्ञान में जो फायदा हो, वह भी चाहते हैं। वे दोनों फायदे विपरीत हैं। एक होगा, तो दूसरा डूब जाएगा। दूसरा होगा, तो पहला डूब जाएगा। दोनों साथ नहीं हो सकते हैं।
हम पूरब—पश्चिम दोनों तरफ साथ—साथ चलने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए हम कहीं भी नहीं चल पाते। हम बीच में फंस गए हैं। एक टांग पूरब चली गई है, एक टांग पश्चिम चली गई है। हम बीच में अटके हैं और परेशान हो रहे हैं। और हम एक टल न पूरब से वापस खींचते हैं, न पश्चिम से वापस खींचते हैं। और हमारा इरादा यह है कि इन दोनों नाव पर सवार होकर हम पहुंच जाएंगे दोनों किनारे पर।
डूबेंगे बुरी तरह। यह दो नावों पर सवार आदमी डूबेगा ही। और इसका डूबना बड़ा नारकीय होगा। मगर आपको दिखाई नहीं पड़ता कि आप कैसे दो नावों पर सवार हैं। इधर धन की दौड़ लगी हुई है, उधर शांति की भी तलाश है।

 एक मित्र ने पूछा है कि आप कहते हैं, धन पर पकड़ छोड़ दो। धन पर पकड़ अगर छोड़ दें, तो फिर क्या होगा? अगर धन की पकड़ छोड दें, तो संसार में कैसे चलेगा?

 मैंने कहा कि धन की पकड़ छोड़ दो। वे कहते हैं कि धन के बिना कैसे चलेगा? मैंने नहीं कहा कि धन के बिना चलाओ।
धन की जरूरत एक बात है; धन की पकड़ दूसरी बात है। धन की जरूरत तो पूरी हो जाती है, धन की पकड़ कभी पूरी नहीं होती। धन को जितना पकडो, उतनी पकड़ बढ़ती जाती है। धन की जरूरत तो पूरी हो सकती है। जरूरतें सब पूरी हो सकती हैं, पागलपन कोई भी पूरा नहीं हो सकता।
अमेरिका का अरबपति एंड्रयू कारनेगी मरा। उसके पास दस अरब रुपए थे। मरते वक्त भी वह यह कहकर मरा है कि मैं असंतुष्ट मर रहा हूं क्योंकि मेरे इरादे सौ अरब रुपए छोड़ने के थे। दस अरब केवल! जैसे दस नए पैसे, ऐसे दस अरब केवल!
दस अरब रुपए भी पास में हों, तो भी पकड़ पूरी नहीं होती। एंड्रयू कारनेगी करेगा क्या दस अरब रुपए का? कोई उपयोग नहीं है। उपयोग का समय तो बहुत पहले समाप्त हो गया। जो भी मिल सकता था रुपए से, वह बहुत पहले मिल चुका। अब दस अरब रुपए से कुछ भी नहीं पाया जा सकता। लेकिन अभी भी दौड़ पूरी नहीं हुई, पकड़ पूरी नहीं हुई।
धन की जरूरत एक बात है, धन की पकड़ दूसरी बात है। धन की पकड़ है पागलपन।
फिर मैं नहीं कहता कि आप धन की पकड़ छोड़ दें। मैं तो तभी कहता हूं जब आप कहते हैं, शांति चाहिए, आनंद चाहिए, परमात्मा चाहिए—तभी कहता हूं। नहीं तो मैं नहीं कहता। मैं कहता हूं खूब जोर से पकडिए। आपकी मौज है। कौन आपसे छीन रहा है! और आप दुख चाहते हैं, तो मैं कौन हूं कि आपसे कहूं कि दुख मत चाहिए! मजे से चाहिए। आपको वही पसंद है, वही करिए। लेकिन फिर दूसरी बात मत पूछिए।
लेकिन हम बड़े उलटे हैं। यह उलझन ही हमारी जटिलता है। और इसलिए रास्ता सब गड़बड़ हो जाता है।
आप धन में आनंद पाते हैं, मजे से पकड़ते चले जाइए। अगर दुख पाते हैं, तो पकड़ छोड़िए। और ये दोहरी बातें एक साथ पूरी करने की कोशिश मत करिए, कि एक हाथ में धन को भी पकड़े रखेंगे और दूसरे हाथ में परमात्मा को भी पकड़ लेंगे! ये दोनों बातें आपसे नहीं हो सकेगी, क्योंकि ये कभी किसी से नहीं हो सकी हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि आप घर—द्वार छोड्कर भाग जाइए। धन की जरूरत है। लेकिन एक बड़े मजे की बात है कि धन की जरूरत भी वही आदमी पूरा कर पाता है, जिस की धन पर पकड़ नहीं होती। नहीं तो आप सैकड़ों अमीर आदमियों को देखिए, उनसे गरीब आदमी खोजने मुश्किल हैं। धन पर उनकी इतनी पकड़ है कि वे खर्च ही नहीं कर पाते! धन का जो उपयोग है, वह भी नहीं कर पाते। कंजूस आपको दिखाई पड़ते हैं कि नहीं?
मैं एक कंजूस को जानता हूं। वे बीमार थे, मेरे घर के सामने रहते थे; रिटायर्ड डाक्टर थे। अकेले थे, न पत्नी, न बच्चा। शादी उन्होंने कभी की नहीं। कंजूस को शादी करनी नहीं चाहिए! वह महंगा खर्चा है। औरतें खर्चीली हैं। शादी उन्होंने की नहीं, उन्होंने मुझसे कहा कि शादी मैंने इसीलिए नहीं की कि औरतें फिजूलखर्ची हैं।
किराया आता था; दो बड़े बंगले थे। रिटायर हुए थे मिलिटरी से, डाक्टर थे, तो काफी पैसा इकट्ठा था।
एक दिन अचानक उनका पड़ोसी मेरे पास आया और उसने कहा कि डाक्टर बहुत बीमार हैं, आप जरा चलें। मैं गया तो उनका जबड़ा बंद था। वे बेहोश हालत में थे। मैंने पूछा कि क्या गड़बड़ है? फोन करके मैं डाक्टर को बुला लूं?
तो पता है आपको, उस मरते हुए डाक्टर ने मुझे क्या कहा? उसने हाथ से इशारा किया कि रुपए? रुपए मेरे पास नहीं हैं। रुपए कौन देगा? मुंह बंद हो गया था। आंखें खुली थीं। लेकिन हाथ से इशारा किया कि रुपए कौन देगा? मैंने कहा, रुपए का कोई इंतजाम करेंगे। तुम फिक्र न करो।
डाक्टर को बुलाया। डाक्टर ने कहा कि तत्‍क्षण अस्पताल ले जाना पड़ेगा। यह यहां ठीक होने वाला मामला नहीं है। तो उस मरते हुए डाक्टर ने मुझसे कहा कि पहले ताले में चाबी लगाकर मकान की चाबी मुझे दो। जब चाबी उसको दे दी, तब वह एंबुलेंस में सवार हुआ।
एंबुलेंस में बिठाकर अस्पताल पहुंचाया गया। दो घंटे बाद वे मर गए। मरने के बाद उसके कुर्ते के भीतर पाच हजार रुपए निकले। वह अपने पास ही रखे हुए था। और डाक्टर की पांच रुपए फीस देने के लिए उसने कहा कि.।
इसको कहता हूं पकड़। अक्सर अमीर आदमी गरीब मर जाते हैं। अमीर होना जरा कठिन है। अमीर होना धन से संबंधित कम है। धन की पकड़ न हो, तो आदमी अमीर होता है।
दो तरह के गरीब हैं दुनिया में। एक, जिनके पास धन नहीं है। एक, जिनके पास धन की पकड़ है। ये दो तरह के गरीब लोग हैं दुनिया में। अमीर आदमी बहुत मुश्किल है पाना।
धन का उपयोग भी आप तभी कर पाते हैं, जब पकड़ न हो। तो मैं नहीं कहता कि आप धन का उपयोग न करें। पकड़ मत रखें। धन साधन हो, साध्य न बन जाए। और आप धन के नौकर—चाकर न रह जाएं, कि उसी की हिफाजत कर रहे हैं, पहरा दे रहे हैं, इकट्ठा कर रहे हैं और मर जाएं। और मर रहे हैं। इसके सिवा आपका काम क्या है?
लेकिन एक बात खयाल रख लें कि जिस दिशा में चलें, उस दिशा की तकलीफों को भी स्वीकार करें। हर दिशा की तकलीफ है। हर दिशा का आनंद है। दोनों आपको स्वीकार करने होंगे। इनमें से आप चाहें कि एक को बचा लें और दूसरे को छोड़ दें, तो आप जीवन के विज्ञान को नहीं समझते हैं।

 एक और मित्र ने पूछा है कि यदि मनुष्य को अपनी सारी इच्छाएं ही छोड़नी हैं, तो फिर जीवन का लश क्या है?

 शायद उनका खयाल हो कि इच्छाओं को पूरा करना ही जीवन का लक्ष्य है! इच्छाएं तो पूरी होती नहीं। कोई इच्छा पूरी नहीं होती। एक इच्छा पूरी होती है, तो दस को पैदा कर जाती है। अब तक किसी ने भी नहीं कहा है कि कोई इच्छा पूरी हो गई। पूरे होने के पहले ही नई संतति पैदा हो जाती है और श्रृंखला शुरू हो जाती है।
जीवन का लक्ष्य इच्छाओं को पूरा करना नहीं है। जीवन का लक्ष्य इच्छाओं के बीच से इच्छारहितता को उपलब्ध हो जाना है। जीवन का लक्ष्य इच्छाओं से गुजरकर इच्छाओं के पार उठ जाना है। क्योंकि जैसे ही कोई व्यक्ति सभी इच्छाओं के पार उठ जाता है, वैसे ही उसे पता चलता है कि जीवन की परम धन्यता इच्छाओं में नहीं थी। इच्छाओं से तो तनाव पैदा होता था, खिंचाव पैदा होता था। इच्छाओं से तो मन दौड़ता था, थकता था, गिरता था, परेशान होता था।
इच्छाशून्यता से प्राणों का मिलन अस्तित्व से हो जाता है। क्योंकि कोई दौड़ नहीं रह जाती, कोई भाग—दौड़ नहीं रह जाती। जैसे झील शात हो जाए और कोई लहरें न हों। तो उस शांत झील में जैसे चांद का प्रतिबिंब बन जाए, ऐसा ही जब इच्छाओं की कोई लहर नहीं होती और हृदय शात झील हो जाता है, तो जीवन का जो परम रहस्य है, उसका प्रतिबिंब बनने लगता है। आप दर्पण हो जाते हैं। और जीवन का रहस्य आपके सामने खुल जाता है।
इच्छाओं के माध्यम से इच्छाशून्यता को उपलब्ध करना जीवन का लक्ष्य है।
लेकिन मैं कह रहा हूं इच्छाओं के माध्यम से, तो आप जल्दबाजी भी मत करना। परिपक्यता जरूरी है। इच्छाओं को पकने देना। और इच्छाओं से पूरे हृदयपूर्वक गुजरना, ताकि इच्छाओं का रहस्य समझ में आ जाए; उनकी व्यर्थता भी समझ में आ जाए; इच्छाओं की मूढ़ता भी समझ में आ जाए।
लेकिन एक बड़ी कठिनाई हो गई है। हम सब अधकचरे हो गए हैं। अधकचरे हो जाने का कारण यह है कि इसके पहले कि हमें किसी चीज का खुद अनुभव हो, दूसरों के अनुभव और दूसरे के वचन हमें कंठस्थ हो जाते हैं।
सुन लिया हमने कि इच्छाओं से मुक्त होना है। और हमने मान भी लिया कि इच्छाओं से मुक्त होना है। और अभी इच्छाओं की पीड़ा हमने अनुभव नहीं की।
तो हम इच्छाओं में पूरे उतर भी नहीं सकते, क्योंकि यह शिक्षा पीछे से खींचती है कि कहां जा रहे हो पाप में! इच्छाओं से तो बचना है। और यह शिक्षा कारगर भी नहीं होती, क्योंकि इच्छाओं से बचने का अनुभव हमारा अभी पैदा नहीं हुआ। बुद्ध को हुआ होगा। महावीर को हुआ होगा। हमको नहीं हुआ। उनका अनुभव हमारे क्या काम आएगा?
मुझे अनुभव होना चाहिए कि आग जलाती है। आप कहते हैं, आग जलाती है। मुझे कोई अनुभव नहीं है। तो मेरा हाथ खिंचता है आग की तरफ, क्योंकि मुझे लगता है, कितने प्यारे फूल खिल रहे हैं आग में, इन्हें पकड़ लूं। इन फूलों को सम्हाल लूं। इन फूलों को अपनी तिजोड़ी में बंद कर दूं। ये प्यारे फूल मुझे लग रहे हैं। मैंने दूर से इनको देखा है।
लेकिन जब मैं हाथ बढ़ाने लगता हूं तो आपकी शिक्षा याद आती है कि हाथ मत बढ़ाना। जल जाओगे। हाथ जल जाएगा। आग जलाती है। यह शिक्षा मेरे हाथ को वहां तक भी नहीं पहुंचने देती, जहां मैं जल जाऊं। और यह शिक्षा मेरा अनुभव भी नहीं बनती। इसलिए हाथ बढ़ता ही रहता है और आग तक पहुंचता भी नहीं। बढ़ता भी है, पहुंचता भी नहीं है। ऐसे हम बीच में अटक जाते हैं। आपके सब अनुभव झूठे हो जाते हैं।
मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, हमें पता है कि क्रोध बुरा है, फिर भी क्रोध होता है।
यह हो नहीं सकता। अगर पता हो जाए कि क्रोध बुरा है, तो क्रोध हो नहीं सकता। आपको पता ही नहीं। सुना है। लोग कहते हैं, क्रोध बुरा है। लोग कहते हैं, वह आपने सुन लिया है। उनका कहना आपका गान नहीं है।
आपको ही ज्ञान करना पड़ेगा।
तो मैं तो कहता हूं ठीक से क्रोध करो, ताकि जल जाओ। और एक दफा ठीक से जल जाओ, तो दुबारा उस तरफ हाथ नहीं जाएगा। लेकिन आप ठीक से क्रोध भी नहीं करते हैं। और जो आदमी ' ठीक से क्रोध नहीं किया है, वह ठीक से शांत नहीं हो सकता। उसकी शांति में भी क्रोध की वासना छिपी रहेगी।
लोग कहते हैं, ब्रह्मचर्य। और आपका मन खिंचता है कामवासना की तरफ। और जब कामवासना की तरफ जाने लगते हैं, तब सब ब्रह्मचारियों की शिक्षाएं याद आती हैं। तब मन में लगता है, यह क्या पाप कर रहा हूं? इस लगने के कारण कि क्या पाप कर रहा हूं पाप भी ठीक से नहीं कर पाते। पाप का अनुभव भी नहीं हो पाता। अधकचरा रह जाता है सब।
पाप में जाते भी हैं, कर भी नहीं पाते। कोई पीछे खींचता रहता है। पीछे खिंच भी नहीं सकते पूरे, क्योंकि पाप का जब तक परिपक्व अनुभव न हो जाए तब तक आप खिंच भी नहीं सकते, हट भी नहीं सकते। स्वानुभव के अतिरिक्त कोई जीवन—क्रांति नहीं है।
ठीक कहा होगा, जिन्होंने ब्रह्मचर्य को जाना है। ठीक कहा होगा। और जिस दिन आप जानेंगे, आप भी कहेंगे कि ब्रह्मचर्य अमृत है। और आप भी लोगों को समझाएंगे कि कहा उलझ रहे हो!
स्वभावत:, जब बाप अपने बेटे को देखता है आग की तरफ जाते, तो कहता है, ठहर! आग मत छू लेना। जल जाएगा। वह ठीक ही कहता है। गलत तो कहता नहीं। लेकिन इस बेटे को अनुभव होने दे। अगर बाप समझदार हो, तो बेटे को पकड़ेगा, आग के पास ले जाएगा, और कहेगा, थोड़ा हाथ बढ़ा, आग में डाल। फिर इस बेटे को किसी शास्त्र की जरूरत न रहेगी। फिर यह बेटा खुद ही उचककर खड़ा हो जाएगा, और बाप से कहेगा, यह क्या करते हो? हाथ जला दिया! अब यह बेटा कभी आग के पास न जाएगा।
जो होशियार बाप है, वह अपने ज्ञान को बेटे को नहीं देता; अपने ज्ञान के आधार पर बेटे को अनुभव का मौका देता है। इसे ठीक से समझ लें। इसमें फर्क है।
जो सदगुरु है, वह आपको ज्ञान नहीं देता। वह आपको अनुभव की सुविधा जुटाता है, सिर्फ सुविधा जुटाता है। ज्ञान तो आपको अपना ही होगा। वह केवल अनुभव की सुविधा जुटाता है, जहां आपको अनुभव हो जाए।
गुरजिएफ के पास लोग जाते थे—पश्चिम का एक बहुत कीमती गुरु—तो गुरजिएफ उनको कहता था, तुम अभी शांति की फिक्र छोड़ो; तुम ठीक से क्रोध कर लो। अधूरा क्रोध तुम्हें कभी शात न होने देगा। तो वह कहता था, तुम जितना क्रोध कर सकते हो, पहले कर लो। तो वह कहता कि तीन महीने तुम्हें क्रोध की साधना के लिए। इस वक्त तुम्हें जो भी मौका मिले, तुम चूकना मत। और जो भी मौका मिले, तलाश में रहना। और जितना क्रोध कर सको, आग जितनी निकाल सको, जहर जितना फेंक सको, फेंकना।
तीन महीने भी बहुत हो जाते। तीन सप्ताह में भी साधक आकर कहता कि मैं थक गया बुरी तरह। और क्या मूढ़ता आप मुझसे करवा रहे हैं!
क्योंकि आपको पता है, अगर जानकर आप क्रोध करेंगे, तो बहुत जल्दी पता चलने लगेगा कि यह मूढ़ता है। लेकिन गुरजिएफ कहता, अभी जल्दी है। अभी तुम कच्चे हो। अभी तीन ही सप्ताह हुए। लोग जन्मों—जन्मों से क्रोध कर रहे हैं, अभी तक नहीं पके। तुम जरा रुको। तुम तीन महीने चलने ही दो। और गुरजिएफ दिए जाता धक्का। धीरे— धीरे साधक को मौका ही न मिलता।
एक महीने अगर आपने तलाश की, तो आपको मौके मिलने कठिन हो जाएंगे कि अब कहां क्रोध करें। और जब खुद आप कर रहे हों, तो आपको खुद ही लगता है कि फिर अब यह मूर्खता करने जा रहे हैं! और इसमें कुछ सार नहीं है सिवाय दुख के, पीड़ा के, परेशानी के। जहर फैलता है। खुद की हानि होती है, किसी को कोई लाभ होता नहीं।
तो फिर गुरजिएफ इंतजाम करता। किसी को कहता कि इस आदमी का अच्छी तरह अपमान करो। ऐसे मौके पर अपमान करो कि यह भूल ही जाए और आ जाए क्रोध में। वह इस तरह की डिवाइस रचता, इस तरह के उपाय करता, जिनमें आदमियों को परेशान करवाता।
अगर फिर भी वह आदमी न परेशान होता, दो महीने बीत गए, अब उपाय भी काम नहीं कुरते, तो गुरजिएफ शराब पिलाता, कि शायद शराब पीकर नशे में दबा हुआ कुछ निकल आए। शराब पिलाता, रात आधी रात तक शराब पिलाए चला जाता ?उ और फिर उपद्रव खड़े करवाता।
जब तक सब उपाय से क्रोध को पूरा अनुभव न करवा देता, तब तक वह शांति का उपाय न बताता। और फिर शांति का उपाय बड़ा सरल है। क्योंकि जिसका क्रोध से उपद्रव छूट गया, उसके शात होने के लिए उपाय नहीं करना पड़ता, वह शांत हो जाता है।
जीवन के अनुभव से बचिए मत, उतरिए। और जल्दी भी मत करिए; कोई जल्दी है भी नहीं। बहुत समय है जीवन के पास।
एक ही नुकसान है समय का, अधकचरे अनुभव आपको कहीं भी न ले जाएंगे। अगर मोक्ष चाहिए, तो संसार का परिपक्व अनुभव जरूरी है। और जल्दबाजी परमात्मा बिलकुल पसंद नहीं करता। और आधे पके फल उसके राज्य में स्वीकृत नहीं हैं। वहां पूरा पका फल होना चाहिए।

 आखिरी प्रश्न।

एक मित्र ने पूछा है कि आप कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति अपने को सब भांति परमात्मा में छोड़ दे, लीन कर दे, स्वीकार कर ले उसे, तो उसे परमात्मा मिल जाता है। क्या इसी तरह संसार की चीजें भी मिल सकती हैं?

 भूलकर ऐसा मत करना, कुछ न मिलेगा!
संसार की चीजों को .पाने के लिए उपाय करना जरूरी है, श्रम करना जरूरी है, चेष्टा करनी जरूरी है, अशात होना जरूरी है, पागल होना जरूरी है। तो जो जितना पागल है, संसार में उतना सफल होता है।
अभी एक बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक ने एक वक्तव्य दिया है। और उसने कहा है कि दुनिया के जितने बड़े राजनेता हैं, इन सबका मानसिक अगर परीक्षण किया जाए, तो ये विक्षिप्त पाए जाएंगे, क्योंकि इनकी सफलता हो ही नहीं सकती, अगर ये बिलकुल पागल न हों।
उस मनोवैज्ञानिक ने कहा है कि इंग्लैंड के बड़े राजनीतिज्ञ विंसटन चर्चिल की सफलता का कारण यह था कि विंसटन चर्चिल को किसी ज्योतिषी ने बचपन में बता दिया और फिर उसे यह वहम बैठ गया कि वह पैंतालीस साल से ज्यादा नहीं जीएगा। जिस दिन से उसको यह खयाल आ गया कि पैंतालीस साल में मेरी मौत है, उस दिन से वह पागल की तरह कांपिटीशन में उतर गया, प्रतिस्पर्धा में। दूसरे लोग, जिनको सत्तर— अस्सी साल कम से कम खयाल था जीने का, वे धीरे— धीरे चल रहे थे। विंसटन चर्चिल को तो तीस साल कम थे, उसको जल्दी चलना जरूरी था। वह बिलकुल पागल की तरह चलने लगा।
उस मनोवैज्ञानिक ने कहा है कि विंसटन चर्चिल की सफलता का कुल कारण इतना था कि उसको यह खयाल आ गया था कि मेरे पास तीस साल कम हैं। इसलिए मुझे बिलकुल पूरी ताकत लगाकर पागल हो जाना चाहिए।
अभी हिटलर, विंसटन चर्चिल, स्टैलिन, इनके मनों के अध्ययन जो प्रकाशित हो रहे हैं, उनसे पता चलता है कि ये सब विक्षिप्त थे। लेकिन ये ही विक्षिप्त थे, ऐसा नहीं; दुनिया के सभी राजनीतिज्ञ सफल अगर हो सकते हैं, तो उनको विक्षिप्त होना जरूरी है। विक्षिप्त का मतलब है कि उन्हें, वह जो कर रहे हैं, उसके पीछे बिलकुल पागल होना जरूरी है। उसमें समझदारी की जरूरत नहीं है। उसमें अंधी दौड़ की जरूरत है।
जो लोग बहुत धन इकट्ठा कर लेते हैं, उनको भी पागल होना जरूरी है। वहां रिलैक्सेशन से न चलेगा।
मित्र ने पूछा है कि क्या शांति से उपलब्धि हो जाएगी?
अगर शांति से संसार की उपलब्धि होती, तो फिर कोई अशात होता ही नहीं। यह सारा संसार अशांत है इसलिए कि यहां की सब उपलब्धि अशांति से होती है। अशांति कीमत है, संसार की उपलब्धि करनी हो तो।
इसलिए बुद्धिमान आदमी मैं उसको कहता हूं कि अगर उसको संसार की उपलब्धि करनी है, तो अशात होने के लिए तैयार है। फिर वह यह नहीं कहता कि मुझे शांति चाहिए।
एक मेरे मित्र हैं। कभी—कभी मिनिस्टर हो जाते हैं; कभी—कभी नहीं रह जाते। जब वे नहीं रह जाते, तब वे मेरे पास आते हैं। साधु—संतों के पास जाते ही तब मिनिस्टर हैं, जब वे मिनिस्टर नहीं रह जाते। भूतपूर्व मिनिस्टरों से ही मिलना होता है साधु—संतों का। जो होते हैं, उनसे नहीं होता। और भूतपूर्व इतने हैं मुल्क में कि कोई कमी नहीं है।
वे जब नहीं रह जाते, तो मेरे पास आते हैं। और कहते हैं, कोई शांति का उपाय? मैं उनको कहता हूं लेकिन शांति की तुम्हें जरूरत कहां है? और अगर तुम शांत हो गए, तो फिर तुम दुबारा मिनिस्टर न हो सकोगे!
वे कहते हैं कि नहीं, कुछ ऐसा बताएं कि शात भी हो जाऊं, और अभी तो चीफ मिनिस्टर होने की कोशिश है। अशांति नहीं चाहता; चीफ मिनिस्टरशिप चाहता हूं।
तो मैं उनको कहता हूं आप किसी और के पास जाएं, जो आपको धोखा दे सकता हो। मैं धोखा नहीं दे सकता। मैं तो आपको यही कह सकता हूं अगर चीफ मिनिस्टर होना है, तो कुशलता से अशांत हों, और अशांति को स्वीकार करें। वह हिस्सा है। रास्ते पर चलता है आदमी, धूल पड़ती है। वह पड़ेगी। उतनी धूल जरूरी है। चीफ मिनिस्टर होना है, तो थोड़े ज्यादा अशांत हों, क्योंकि अभी तो आप सिर्फ मिनिस्टर थे।
संसार में तो जो भी पाना हो, उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। स्वयं को बेचना पड़ेगा। स्वयं को नष्ट करना पड़ेगा। एक पैसा भी मुफ्त नहीं मिलता है। उतनी ही आत्मा खोती है, तब मिलता है। एक सफलता भी मुफ्त नहीं मिलती है, उतना ही अस्तित्व नष्ट होता है, तब मिलती है।
इसलिए जो बहुत सफल हो जाते हैं बाहर की दुनिया में, भीतर बिलकुल खाली हो जाते हैं। भीतर उनके कुछ भी नहीं बचता। हिटलर के पास आत्मा जैसी कोई चीज नहीं बचती। बच नहीं सकती। अगर आत्मा बचानी हो, तो हिटलर जो कर रहा है, वह नहीं हो सकता।
धन का ढेर लगा लेना हो, तो फिर भीतर दरिद्र होना जरूरी है। भीतर की दरिद्रता आवश्यक है। क्योंकि उसी की कीमत पर मिलता है यह।
संसार में तो श्रम, विश्राम नहीं। संसार में तो अशांति, शांति नहीं। संसार में तो पुरुषार्थ, भाग्य नहीं।
लेकिन परमात्मा को पाने का रास्ता बिलकुल उलटा है। होगा ही। क्योंकि परमात्मा की दिशा उलटी है। संसार में जाते हैं बाहर की तरफ; परमात्मा में जाते हैं भीतर की तरफ। उलटा हो जाएगा सब। तो जिन—जिन कामों से संसार में सफलता मिलती है, उन्हीं—उन्हीं कामों से परमात्मा में असफलता मिलती है। इसे ठीक गणित की तरह समझ लें। और जिन कामों से परमात्मा में सहायता मिलती है, उन्हीं कामों से संसार में असफलता मिलती है। और दोनों में साथ—साथ सफलता नहीं मिलती है। नहीं मिल सकती है। नहीं मिलनी चाहिए।
अगर आप परमात्मा को पाने के लिए अशात हो रहे हैं, तो फिर आपको परमात्मा न मिलेगा। आप परमात्मा को भी संसार की एक वस्तु की भांति समझ रहे हैं। इसलिए ज्ञानियों ने कहा है, उसे पाना हो, तो प्रयत्न भी छोड़ देना पड़ता है। उसे पाना हो, तो उसके पाने की वासना भी छोड़ देनी पड़ती है। उसे पाना हो, तो उसको भी भूल जाना पड़ता है। क्योंकि फिर उसकी भी खटक बनी रहे कि अभी तक नहीं मिला, अभी तक नहीं मिला, तो उससे भी बेचैनी होती है।
बुद्ध के पास एक युवक आया, सारिपुत्र, फिर बाद में तो महाज्ञानी हुआ। सारिपुत्र जिस दिन आया, उसने बुद्ध से कहा कि मुझे भी तुम जैसा होना है। तो बुद्ध ने कहा, यह खयाल छोड, तो हो सकता है। अगर यह खयाल पकड़ लिया, तो मुसीबत है। क्योंकि जब मैं हुआ मेरे जैसा, तो मुझे यह बिलकुल खयाल नहीं था, इसलिए हो पाया। तू यह खयाल छोड़ दे कि तुझे बुद्ध जैसा होना है।
सारिपुत्र अनेक वर्ष मेहनत किया, लेकिन वह खयाल नहीं छूटता था कि मुझे भी बुद्ध जैसा होना है। तो बुद्ध ने उसे एक दिन बुलाकर कहा कि सारिपुत्र, तू सब कर रहा है, सिर्फ एक चीज बाधा डाल रही है। यह वासना, कि तुझे मुझ जैसा होना है, यही तुझे मुझ जैसा नहीं होने दे रही है। तू यह वासना छोड़ दे।
और जिस दिन सारिपुत्र यह वासना भी छोड़ पाया, उसी दिन बुद्ध जैसा हो गया।
तो परमात्मा को पाने के लिए ज्ञानी कहते हैं, प्रयत्न भी.। शुरू में तो प्रयत्न करना होता है, क्योंकि हमारी आदतें खराब हैं। बिना प्रयत्न के हम कुछ समझ ही नहीं सकते। लेकिन उसे भी छोड़ देना होता है। उसका लक्ष्य भी छोड़ देना होता है। वह न मिले, तो भी इतना ही प्रसन्न होना होता है, जितना कि वह मिल जाए तो। यह महत्वाकांक्षा भी छोड़ देनी होती है कि मैं ईश्वर को खोजकर रहूंगा। और जिस दिन कोई महत्वाकांक्षा नहीं होती, कोई प्रयत्न नहीं होता, और चित्त बिलकुल शात और शिथिल होता है.। महत्वाकांक्षा नहीं है, तो अशांति होगी कैसे? कोई तनाव नहीं होता, कोई दौड़ नहीं होती। कहीं पहुंचना नहीं है, ऐसी स्वीकृति विश्राम है। ऐसी स्वीकृति में वह उपलब्ध हो जाता है।
संसार को पाना है, दौडिए खूब, पागल होकर दौडिए शराब पीकर दौडिए। परमात्मा को पाना है, तो दौडिए ही मत। और सब तरह के नशे, सब तरह की महत्वाकांक्षाएं छोड़ दीजिए।
अगर संसार पाना है, तो जैसे नदी में कोई तैरता है उलटी धारा की तरफ, वैसे तैरिए। बड़ी ताकत लगानी पड़ेगी। तब भी जरूरी नहीं कि पहुंच जाएं, क्योंकि आप अकेले नहीं तैर रहे हैं। और लोग भी तैर रहे हैं। और लोग भी तैर ही नहीं रहे हैं, आप न पहुंच जाएं, इसमें भी बाधा डाल रहे हैं। और खुद पहुंच जाएं, इसका उपाय कर रहे हैं।
आप अकेले नहीं हैं संसार में। और भी उपद्रव आस—पास चल रहा है बड़ा। अगर साढ़े तीन, चार अरब आदमी हैं, तो हर एक आदमी के खिलाफ चार अरब आदमी काम कर रहे हैं। यहां पहुंचना इतना आसान भी नहीं है। इसमें जो बिलकुल पागल होगा, जिद्दी होगा, हठी होगा, जो सुनेगा ही नहीं, देखेगा ही नहीं, अंधे की तरह दौड़ा चला जाएगा, वह ही शायद पहुंच पाए।
लेकिन अगर परमात्मा में जाना है, तो तैरने जैसा नहीं है, बहने जैसा है। नदी की धार में अपने को छोड़ दिया। तैरते भी नहीं; हाथ भी नहीं चलाते; नदी ले चली। श्वास—श्वास शात हो गई, क्योंकि अब कुछ भी करना नहीं है आपको। नदी सब कर रही है, आप अपने को छोड़ दिए हैं।
परमात्मा की उपलब्धि होती है बहने में। संसार की उपलब्धि होती है तैरने में।

अब हम सूत्र को लें।

तथा जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है तथा जो हर्ष और अमर्ष, भय व उद्वेगों से रहित है, वह भक्त मेरे को प्रिय है। और जो पुरुष आकांक्षा से रहित है तथा बाहर— भीतर से शुद्ध है, दक्ष है और जिस काम के लिए आया था, उसको पूरा कर चुका है एवं पक्षपात से रहित और दुखों से छूटा हुआ है, वह सर्व आरंभों का त्यागी मेरा भक्त मेरे को प्रिय है।
कृष्ण और भी लक्षण बताते हैं उसके, जो परमात्मा को प्रिय है अर्थात जो परमात्मा के निकट होता चला जाता है, समीप होता चला जाता है। ये गुण समीप लाने वाले गुण हैं। ये गुण परमात्मा की तरफ उन्‍मूख करने वाले गुण हैं।
जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है..।
यह जरा जटिल है। जिसके कारण किसी को कोई अशांति पैदा नहीं होती। पर इसे समझना पड़ेगा। क्योंकि ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो कहेंगे, हमें कृष्ण के कारण अशांति हो रही है। ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो कहेंगे कि हमें बुद्ध के कारण अशांति हो रही है।
ऐसे लोग थे। बुद्ध की हत्या करना चाहते थे। अब जो बुद्ध की हत्या करना चाहता होगा, निश्चित ही उसे अशांति उपलब्ध हो रही है। जिन्होंने जीसस को सूली पर लगाया, उनको परेशानी हो रही थी, तभी। तो क्या जीसस ईश्वर के प्यारे नहीं थे? तब तो कृष्ण भी दिक्कत में पड़ जाएंगे, क्योंकि कृष्ण से भी लोगों को अशांति हो रही है। वे भी कृष्ण को नष्ट करने के लिए पूरी कोशिश में लगे हैं। पर यह सूत्र कहता है, तथा जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है। इसका मतलब समझ लें।
जरूरी नहीं है कि बुद्ध से आप उद्वेग को प्राप्त न हों। बुद्ध के कारण ही जरूरी नहीं है; आपके कारण भी आप उद्वेग को प्राप्त हो सकते हैं। शर्त इतनी है कि बुद्ध अपनी तरफ से आपको उद्विग्न नहीं करते हैं। मगर आप हो सकते हैं। आप अगर अपने ही कारण हो रहे हैं, तो बुद्ध का कोई जिम्मा नहीं है। लेकिन बुद्ध आपको उद्विग्न करने की न तो कोई चेष्टा करते हैं, न उनका कोई रस है। न वे कारण बनते हैं अपनी तरफ से।
आप कारण न बनें किसी के उद्विग्न होने के, यह ध्यान रखना जरूरी है। फिर भी कोई उद्विग्न हो सकता है। क्योंकि उद्विग्न होने में आप अकेले ही भागीदार नहीं होते, होने वाला भी उतना ही भागीदार होता है।
मेरे एक परिचित हैं। अपने बेटे से वे हमेशा परेशान रहते हैं। तो मैंने उनके बेटे को कहा कि तेरे पिता जैसा चाहते हैं, तू वैसा ही कर। और कोई खास बात नहीं चाहते हैं, कर दे। इससे कोई तुझे
नुकसान वाला नहीं। उनको शांति होगी।
उनके बेटे ने मुझे कहा कि आपको पता नहीं है। इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि मैं क्या करता हूं। वे जो कहते हैं, वह भी करूं, उससे भी उद्विग्न होते हैं।
मैंने कहा, उदाहरण। तो उसने कहा कि जैसे अगर मैं काफी साफ—सुथरे कपड़े पहनूं जो मुझे पसंद हैं, तो वे चार लोगों के सामने कहेंगे कि देखो, मैंने तो हड्डी तोड़—तोड़कर पैसा कमाया। शाहजादे को देखो! मुफ्त का है। मजा करो। कर लो मजा। जिस दिन मर जाऊंगा, उस दिन भूखे मरोगे।
अगर ऐसा न करो, साफ—सुथरे कपड़े न पहनो, तो भी वे खड़े होकर लोगों के सामने कहते हैं कि अच्छा! तो क्या मैं मर गया? जब मर जाऊं, तब इस हालत में घूमना। अभी तो मजा कर लो। यह हालत आएगी, ज्यादा देर नहीं है। लेकिन अभी से तो मत यह शक्ल लेकर घूमो। मेरे सामने यह शक्ल लेकर मत आओ।
तो उनके बेटे ने मुझे कहा कि बड़ी मुसीबत यह है कि वे जो कहते हैं, अगर उसको भी मानो, तो भी उद्विग्नता में कोई फर्क नहीं पड़ता। मतलब यह हुआ कि कोई आदमी उद्विग्न होना ही चाहता है, तो कोई भी बहाना खोज सकता है। आप भी खयाल करना कि जब आप उद्विग्न होते हैं, तो जरूरी नहीं है कि दूसरे ने कारण मौजूद ही किया हो, आप अपने से भी हो सकते हैं।
सुना है मैंने, मुल्ला नसरुद्दीन का एक मित्र उससे कह रहा था कि अच्छी मुसीबत में फंस गया मैं। ऐसी औरत मिल गई कि एक शब्द बोलो कि फंसे। कि फिर वह इस तरह की बातें शुरू कर देती है उस शब्द में से कि उनका कोई अंत ही नहीं आता!
मुल्ला ने कहा, यह कुछ भी नहीं है। माइन इज ए सेल्फ स्टार्टर। तुम्हें तो शब्द बोलना भी पड़ता है। एक मेरी औरत है! बोलने की जरूरत ही नही है। और वह शुरू कर देती है। चुप रहना भी खतरनाक है। क्यों चुप हो? जरूर कोई मतलब है!
खयाल करना, जरूरी नहीं है कि दूसरा कारण उपस्थित कर रहा हो। सौ में निन्यानबे मौके पर तो आप कारण की तलाश कर रहे होते हैं। उसके भी कारण हैं।
दफ्तर में हैं; मालिक ने कुछ कह दिया। वही प्रकट नहीं कर सकते। मालिक को जवाब देना मुश्किल है। वहा जरा महंगा सौदा है। नौकरी पर आ सकती है। मगर पी गए। वह पीया हुआ कहां जाएगा? उसको कहीं निकालना पड़ेगा।
आप घर पहुंचकर रास्ता खोज रहे हैं कि पत्नी रोटी जलाकर ले आए; कि चाय थोड़ी ठंडी ले आए। आपको पता भी नहीं है कि आप यह रास्ता देख रहे हैं। ऐसा नहीं कि आप यह सोच रहे हैं। यह अचेतन में है। लेकिन क्रोध की एक मात्रा आपके भीतर खड़ी है। वह रास्ता खोज रही है। मालिक की तरफ न बह सकी, क्योंकि वह जरा पहाड़ी की तरफ चढ़ाई थी। इधर पत्नी की तरफ बह सकती है, यह जरा खाई की तरफ उतार है।
आप किसी की तलाश में हैं, जिसकी तरफ आप बह सकें। आप कोई न कोई बहाना खोज लेंगे। और तब पत्नी चौकेगी। क्योंकि इसी तरह की रोटी उसने कल भी खिलाई थी। और कल आप नाराज न हुए थे। और यही चाय वह सदा जिंदगी से पिला रही है। आज! उसकी समझ के बाहर है।
इसलिए कभी भी कोई किसी का क्रोध नहीं समझ पाता। क्योंकि क्रोध समझ के बाहर है। जरूरी नहीं है कि वह कारण हो। कारण कहीं और हो। न मालूम कहां हो। हजार कारण दूसरे रहे हों। सब का इकट्ठा मिलकर निकल रहा हो।
उसकी समझ के बाहर है। लेकिन पति परमात्मा है, ऐसा पतियों ने समझाया हुआ है। पतियों ने पत्नियों को समझाया है हजारों साल से कि पति परमात्मा है। यह बेचारे की उसकी अपनी सुरक्षा है। क्योंकि दुनियाभर में पिटकर आता है, अगर घर में भी परमात्मा न हो, तो जीवन अकारण जा रहा है। कहीं कोई उपाय होना चाहिए, जहां वह भी अकड़कर खड़ा हो जाए कि मैं परमात्मा हूं। कई लोग उस पर अकड़ते हैं।
तो पत्नी जो है, वह एक रिलीज है, वह एक सुविधा है। मगर औरतें उपद्रव खडा कर रही हैं अब दुनियाभर में। वे कहती हैं, यह। हम न मानेंगे अब। इस मुल्क में तो अभी चलता है।
तो पत्नी भी इकट्ठा कर लेती है। पति पर प्रकट नहीं कर सकती। वह बेटे का रास्ता देखेगी, स्कूल से लौट आए। और बेटे को कुछ पता नहीं है। वे अपने मजे से चले आ रहे हैं, खेलते—कूदते। उन्हें पता नहीं है कि घर में क्या उपद्रव तैयार है।
घर में घुसते ही से मां टूट पड़ेगी। कोई भी बहाना खोज लेगी। बहाना ऐसा नहीं कि कोई जानकर खोज रही है। सब अचेतन है, अनकांशस है। यह कपड़ा कहां फट गया? यह स्लेट कैसे टूट गई? यह किताब कैसे फट गई?
वह लड़के की समझ में ही नहीं आएगा, क्योंकि यह तो रोज ही इसी तरह टूटती है और फटती है। पर उसकी समझ के बाहर है कि यह क्या हो रहा है। और वह बिलकुल अनुभव करता है कि अन्याययुक्त है। लेकिन अन्याय की घोषणा और अन्याय के खिलाफ बगांवत कहां करने जाए? एक ही रास्ता है कि मा उसको डांटे—पीटे, तो वह किताब को और फाड़ डाले, स्लेट को और तोड़ डाले, या कमरे में जाकर अपनी गुड़िया की टांग तोड़ दे और चीर—फाड़कर रख दे।
वह जो दफ्तर में पैदा हुआ था, गुड़िया फंसी उसमें। अब गुड़िया का क्या लेना—देना था आपके दफ्तर में बीस ने क्या कहा था, उससे? लेकिन यह हो रहा है चौबीस घंटे।
इस सूत्र का अर्थ यह नहीं है कि आप शात हो जाएंगे, तो आपके कारण कोई अशांत न होगा। इस सूत्र का अर्थ है कि आप कारण मत बनना। इसका होश रखना कि मैं कारण न बनूं।
और एक बड़े मजे की घटना घटती है। अगर आप कारण न बनें, तो जब दूसरा आपको जबरदस्ती कारण बना लेता हैं, तो आप क्रुद्ध नहीं होते, क्योंकि आप जानते हैं कि बेचारा निकाल रहा है। इस बात को, फर्क को समझ लें।
जब आप कारण नहीं बनते किसी की उद्विग्नता का, आप सचेतन रूप से कारण नहीं हैं उद्विग्नता का, और फिर कोई उद्विग्न होता हौ, तो आप हंस सकते हैं। और अगर आपको उसमें क्रोध आ जाए, तो आप समझना कि आप कहीं न कहीं कारण थे। यही जांच है, और कोई जाच नहीं है।
अगर आप घर लौटें और पत्नी आप पर टूट पड़े; तो सच में ही आप जरा भी उद्विग्नता का कारण नहीं हैं तो आप हंस सकेंगे। आप रिएक्ट नहीं करेंगे; आप प्रतिक्रिया नहीं करेंगे कि आप और जोर से उछलने—कूदने लगें और सामान तोड्ने लगें। अगर आप वह करते हैं, तो आप कितना ही कहें कि मैं कारण नहीं हूं आप कारण हैं।
अगर आप कारण नहीं हैं, तो आप बाहर खड़े रह जाएंगे और हंसेंगे कि यह पत्नी कैसी पागल की तरह काम कर रही है, होश में नहीं है! आपके मन में दया का भाव पैदा होगा, क्रोध का भाव पैदा नहीं होगा; कि बेचारी, कुछ अड़चन है, किसी ने सताया है, या दिनभर का फिजूल काम—बरतन साफ करना, रोटी बनाना—रोज की बोरियत, उससे ऊब गई है। लेकिन आपको क्रोध नहीं आएगा।
जिस व्यक्ति के भीतर से दूसरों को उद्विग्‍न करने के कारण समाप्त हो जाते हैं, वह प्रतिक्रिया से, रिएक्यान से मुक्त हो जाता है। वही लक्षण है।
जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है.।
दूसरी घटना तभी घटेगी, जब पहली घट गई हो। अगर आप किसी के कारण नहीं बनते हैं, तो दूसरा आपका कारण बनना भी चाहे, तो भी बन नहीं सकता है। और अगर दूसरा कारण बनने में समर्थ है अभी, तो आप समझना कि अभी पहली बात घटी नहीं है। दूसरा उसका सहज परिणाम है।
जब आप किसी का कारण नहीं हैं दुख देने का, तो कोई आपको दुख देना भी चाहे तो दे नहीं सकता।
जीसस को सूली पर लटकाया गया, तो भी जीसस ने प्रार्थना की परमात्मा से कि इन सबको क्षमा कर देना, क्योंकि ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं। ये होश में नहीं हैं। ये बेहोश हैं। इसलिए इनको पापी मत समझना और इन्हें क्षमा कर देना।
यह वही आदमी ऐसी प्रार्थना कर सकता है, जिसको अबू कोई फासी भी दे, तो भी क्रोध का कारण नहीं पैदा कर सकता। ऐसी घटना घट जाए, तो आप प्रभु के समीप होने लगते हैं।
कृष्ण कहते हैं, यह मुझे प्रिय है। और जो हर्ष और अमर्ष, भय व उद्वेगों से रहित है, वह भक्त मुझे प्रिय है।
हर्ष और अमर्ष, भय और उद्वेग से रहित है।
इसे थोड़ा समझें। थोड़ा बारीक, थोड़ा सूक्ष्म है।
कोई दुखी होता है, तो आप दुखी होते हैं। किसी के घर कोई मर गया, तो आपको भी आंसू आ जाते हैं। किसी का घर जल गया, तो आप सांत्वना, संवेदना प्रकट करने जाते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा कि यह दुख सच्चा है या झूठा है?
अगर यह सच्चा है, तो इसकी कसौटी एक ही है कि जब किसी का मकान बड़ा हो रहा हो, तब आप खुश हों। तो ही जलने पर आपको दुख हो सकता है। और जब कोई जीत रहा हो, तो आप प्रसन्न हों। तो ही उसकी हार से आपको पीड़ा हो सकती है।
कोई गरीब सें धनी हो रहा हो, तो आपको हर्ष होता है? पीड़ा होती है। तो फिर दूसरी बात संदिग्ध है कि कोई अमीर से गरीब हो गया हो, तो आपको दुख हो। वह संदिग्ध है, वह नहीं हो सकता। क्योंकि जीवन का तो गणित है। और उसकी सीधी साफ लकीरें हैं। उस हिसाब में कहीं भूल—चूक नहीं है।
इसलिए मनसविद कहते हैं कि आप जब दूसरे के दुख में दुख बताते हैं, तो भीतर आपको सुख होता है। यह बड़ी जटिल है बात और हमें लगता है कि उलटी मालूम पड़ती है। हमको लगता है, यह बात ठीक नहीं है। क्योंकि जब किसी का घर जल जाता है, तो हम सच में ही दुखी होते हैं, ऐसा हमें लगता है।
लेकिन मनोवैज्ञानिक कहते हैं, आपके गहरे में थोड़ा—सा सुख होता है। और वह सुख कि अपना घर नहीं जला, एक। इसका जल गया। और जलना ही था, पाप की कमाई थी। यह सब भीतर है। और काफी इतरा रहे थे, रास्ते पर आ गए। देर है उसके न्याय में, अंधेर नहीं है। यह सब भीतर चल रहा है। और ऊपर से सहानुभूति बता रहे हैं। और उस सहानुभूति में भी एक तरह का सुख है कि आज इस हालत में आ गए कि सहानुभूति हम दिखा रहे हैं। भगवान न करे कि कभी हम इस हालत में हों कि कोई हमें सहानुभूति दिखाए। आपको पता है, जब कोई आपको सहानुभूति दिखाने आता है, तो अच्छा नहीं लगता। खटकता है कि अच्छा, कोई बात नहीं। किस्मत की बात है! कभी मौका आएगा, तो हम भी सहानुभूति बताने आएंगे। ऐसा सदा हमारे यहां थोड़ा ही होता रहेगा! सब के घर होगा।
लेकिन जब आपको कोई सहानुभूति बताता है, तो सच में आपको अच्छा लगता है? अगर आपको अच्छा नहीं लगता, तो निश्चित ही जो बता रहा है, उसको अच्छा लग रहा होगा। उसके अच्छे लगने की वजह से ही आपको भी अच्छा नहीं लग रहा है। और आपको अच्छा न लगने की वजह से उसको भी अच्छा लग रहा है। सब जुड़ा है।
दूसरे की खुशी में आप खुश नहीं होते। दूसरे के दुख में भी आपका दुख झूठा है। तभी आपका दुख सच्चा हो सकता है दूसरे के दुख में, जब दूसरे की खुशी में आपकी खुशी सच्ची हो। और दूसरे की खुशी में आपको खुशी तभी हो सकती है, जब आप इतने मिट गए हों कि दूसरा दूसरा मालूम न पड़े। नहीं तो नहीं मालूम हो सकती। जब तक मैं हूं तब तक दूसरे की खुशी में मुझे कैसे खुशी मालूम होगी? उसको मिल गई और मुझे नहीं मिली!
राजनीति में भी दो आदमी चुनाव लड़ते हैं, तो हारा हुआ जाता है जीते वाले को धन्यवाद देने, शुभकामना करने। लेकिन उस शुभकामना में कितना अर्थ होगा! और शुभकामना में कितनी पीड़ा होगी! लेकिन खेल के नियम हैं, वे भी पूरे करने पड़ते हैं। इससे ऊपर—ऊपर सब व्यवस्था बनी रहती है। भीतर— भीतर जहर चलता रहता है, ऊपर—ऊपर व्यवस्था बनी रहती है। ऊपर—ऊपर मुस्कुराहटें लगी रहती हैं, भीतर— भीतर काटे सरकते रहते हैं और छुरी चलती रहती है।
दूसरा जब तक दूसरा है, तब तुक आप उसके दुख में दुखी नहीं हो सकते। दूसरा जब तक दूसरा है, उसके सुख में सुखी नहीं हो सकते। और दूसरा जब दूसरा ही नहीं होगा...। कब नहीं होगा? जब आप नहीं होंगे भीतर, वह भीतर की अस्मिता, अहंकार नहीं होगा।
लेकिन बड़ी जटिलता है। जब अहंकार ही नहीं होता, तो अपने सुख में भी सुख नहीं होता, अपने दुख में भी दुख नहीं होता। और जो व्यक्ति अहंकारशून्य हो जाता है, वह हर्ष—विषाद के परे हो जाता है—न अपना, न दूसरे का।
लेकिन यह थोड़ा सोचने जैसा है कि बुद्ध जैसा व्यक्ति भी तो दूसरों का दुख दूर करने की कोशिश करता है!
जापान में एक फकीर हुआ नान—इन। उससे किसी ने पूछा कि बुद्ध सब दुखों के पार हो गए, लेकिन क्या उन्हें दूसरे का दुख अभी भी छूता है? यह बड़ा विचारणीय है। क्योंकि वे दूसरे के दुख को दूर करने की कोशिश में तो लगे हैं।
तो नान—इन ने कहा है, दूसरे का दुख नहीं छूता। दूसरे का दुखस्वप्न दिखाई पड़ता है, नाइटमेयर।
जैसे कि मैं जाग जाऊं रात। अपना सपना समाप्त हो गया, मैं जाग गया। और आपको मैं देखता हूं पड़ोस में ही, आपके मुंह से फसूकर गिर रहा है, और छाती जोर से धड़क रही है, और आप कंप रहे हैं, और आंख से आंसू बह रहे हैं, और लगता है कि कोई आपकी छाती पर चढ़ा है, कोई आपको सता रहा है। इससे मैं दुखी नहीं होता। मैं हंस सकता हूं क्योंकि यह सपना है। लेकिन यह सपना मुझे है। आपको असलियत है अभी। और आप पूरी तकलीफ पा रहे हैं। और मैं आपको जगाने की कोशिश भी कर सकता हूं।
इस जगाने का मतलब यह नहीं है कि मैं आपके दुख से दुखी हो रहा हूं। इस जगाने का कुल मतलब इतना ही है कि मैं जानता हूं कि तुम नाहक ही परेशान हो रहे हो, और तुम्हारी परेशानी झूठी है। लेकिन तुम्हारे लिए अभी सच्ची है। क्योंकि तुम सो रहे हो। और तुम जाग जाओ, तो तुम्हारे लिए भी झूठी हो जाएगी।
तो बुद्ध कीं जो चेष्टा है, या कृष्ण की जो चेष्टा है, वह आपका दुख दूर करने की नहीं है। दुखी तो आप हैं नहीं। .लेकिन दुखस्वप्न दूर करने का है।
आप सपना देख रहे हैं बड़े दुख का, और बड़े परेशान हो रहे हैं, और बड़ी करवटें ले रहे हैं। यह जो आपकी दशा है, इससे बुद्ध दुखी नहीं हो रहे हैं। इससे बुद्ध सिर्फ इतना अनुभव कर रहे हैं कि अकारण तुम दुखी हो रहे हो और इस दुख के बाहर आ सकते हो। और जिस भांति वे बाहर आ गए हैं, वह रास्ता कह रहे हैं कि इस भांति तुम भी बाहर आ जाओगे।
कृष्ण का सूत्र कहता है, तथा जो हर्ष और अमर्ष, भय और उद्वेगों से रहित है..।
जिसे न अब कोई हर्ष होता, न जिसे अब कोई अमर्ष होता। न जिसे अब कोई चीज भयभीत करती है। मौत भी नहीं। क्योंकि मौत भी स्वप्न है। कोई कभी मरता नहीं है, प्रतीत होता है कि हम मरते हैं। जिसकी अंतर—दशा में ऐसा अनुभव होने लगे कि मौत भी घटित नहीं होती मुझे, मौत भी मेरे आस—पास आती है और गुजर जाती है, और मैं अछूता, अस्पर्शित रह जाता हूं ऐसा व्यक्ति मुझे प्रिय है।
महावीर ने तो अभय को पहला लक्षण कहा है, कि वही आत्मा को उपलब्ध हो सकेगा, जो अभय को उपलब्ध हो जाए।
कृष्ण कहते हैं, जिसका भय नहीं रहा कोई, वह प्रभु को प्रिय है। लेकिन भय क्या है? एक ही भय है, सब भय की जड़ में एक ही भय है कि मैं मिट न जाऊं, कहीं मैं मिट न जाऊं, मौत कहीं मुझे समाप्त न कर दे। बस, यही भय है सारे भय के पीछे। फिर बीमारी का हो, दुख का हो, सब के गहरे में मौत है।
और जब तक कोई व्यक्ति अहंकार के पार नहीं झांकता, और इंद्रियों के पीछे नहीं देखता, तब तक मौत दिखाई पड़ती ही रहेगी। क्योंकि इंद्रियों के बाहर जो जगत है, वहां मौत है। जिस संसार को आप आंख से देख रहे हैं, वहा मौत है। वहां वास्तविकता है मौत की। वहां मौत ही ज्यादा वास्तविक है; जीवन तो वहां क्षणभंगुर है।
फूल खिला नहीं कि मुरझाना शुरू हो जाता है। बच्चा पैदा नहीं हुआ कि मरना शुरू हो जाता है। वहा सब परिवर्तित हो रहा है। परिवर्तन का अर्थ है कि प्रतिपल मौत घटित हो रही है। इंद्रियों का जहां अनुभव है, उस अनुभव के जगत में मृत्यु प्रतिपल घटित हो रही है। वहा जीवन आश्चर्य है। मृत्यु तथ्य है। वहा जीवन संदिग्ध है।
इसीलिए तो नास्तिक कहते हैं कि जीवन है ही नहीं; सभी पदार्थ है। क्योंकि मौत इतनी घटित हो रही है कि तुम कहां जीवन की बातें लगा रहे हो! यहां जीवन सिर्फ सपना है तुम्हारा। यहां सब मौत है। एक लिहाज से उनके कहने में सचाई है। बाहर के जगत में जीवन का पता भी नहीं चलता। झलक भी मिलती है, तो वह झलक भी ऐसी लगती है कि शायद सिर्फ मौत को प्रकट करने के लिए आती है। सिर्फ मौत का पता चल जाए, इसलिए जीवन की लकीर कहीं—कहीं झलक में आती है। बाकी चारों तरफ मौत है।
पदार्थ का अर्थ है, मृत्यु। और इंद्रियों से पदार्थ के अतिरिक्त किसी चीज का पता नहीं चलता। इसलिए भय पकड़ता है। वह जो भीतर अमृत है, जो कभी नहीं मरता, वह भी भयभीत होता है मौत को चारों तरफ देखकर। चारों तरफ घटती मौत, आपको भी वहम पैदा होता है कि मैं भी मरूंगा।
जो व्यक्ति इंद्रियों के पार भीतर उतरता है और देखता है, उसे पता चलता है कि यहां जो बैठा है, वह मरता ही नहीं। वह कभी मरा नहीं, वह मर नहीं सकता। यह जो अमृत का बोध न होना शुरू हो जाए, तो आदमी भयभीत रहेगा। फर्क को समझ लें।
जिनको आप कहते हैं निर्भय, उनसे प्रयोजन नहीं है यहां हम दो तरह के लोगों को जानते हैं। भयभीत, भीरु, कायर, निर्भय, बहादुर। अभय तीसरी बात है। जिसको हम निर्भय कहते हैं, वह भी भयभीत तो होता है, लेकिन भागता नहीं। भयभीत तो वह भी होता है, लेकिन भागता नहीं। जिसको हम कायर कहते हैं, वह भी. भयभीत होता है, लेकिन भागता है। कायर और बहादुर में इतना ही फर्क है कि कायर भी भयभीत होता है, बहादुर भी भयभीत होता है; लेकिन कायर भयभीत होकर भाग खड़ा होता है, बहादुर डटा रहता है। बाकी भयभीत दोनों होते हैं।
अभय का अर्थ है, जो भयभीत नहीं होता। उसको बहादुर नहीं कह सकते आप, क्योंकि बहादुरी का भी कोई सवाल न्हीं खा। जब भय ही नहीं, तो बहादुरी क्या? जिसको भय ही नहीं लगता, उसकी बहादुरी का क्या मूल्य है? इसलिए महावीर को बहादुर नहीं कह सकते हैं।
अभय! अभय का अर्थ है, अब न बहादुरी रही, न कायरता रही। वे दोनों खो गईं। अब इस आदमी को यह पता है कि मृत्यु घटती ही नहीं।
तो कृष्ण कहते हैं, वह भक्त मुझे प्रिय है, जिसे अमृत की थोड़ी झलक मिलने लगी, जो भय के पार होने लगा।
और जो पुरुष आकांक्षा से रहित है तथा बाहर— भीतर से शुद्ध है, दक्ष है अर्थात जिस काम के लिए आया था, उसको पूरा कर चुका है एवं पक्षपात से रहित और दुखों से छूटा हुआ है, वह सर्व आरंभों का त्यागी भक्त मुझे प्रिय है।
जिसने वासनाओं की व्यर्थता को समझ लिया और अब जो मांग नहीं करता कि मुझे यह चाहिए। जो मिल जाता है, कहता है, बस यही मेरी चाह है। जो नहीं मिलता, उसकी चिंता नहीं है, आकांक्षा भी नहीं है।
हमें तो जो नहीं मिलता, उसका ही खयाल है। जो मिल जाता है, उसको हम भूल जाते हैं। आपको खयाल है! जो मिल जाता है, उसको आप भूल जाते हैं। जो नहीं मिलता है, उसका खयाल बना रहता है। और जब तक नहीं मिलता है, तभी तक खयाल बना रहता है।
जिस कार को आप खरीदना चाहते हैं और जब तक नहीं खरीदा है, तभी तक वह आपके पास है। जिस दिन आप खरीद लेंगे, उसमें बैठ जाएंगे, वह आपके पास नहीं रही; भूल गई। अब दूसरी कारें आपको दिखाई पड़ने लगेंगी, जो दूसरों के पास हैं।
जिस मकान में आप हैं, वह आपको नहीं दिखाई पड़ता। वह भी दूसरों को दिखाई पड़ता है, जो फुटपाथ पर बैठे हैं। उनको दिखाई पड़ता है कि गजब का मकान है। काश! इसके भीतर होते, तो पता नहीं कैसा आनंद मिलता! और वे भी कभी नहीं देखते कि भीतर जो रह रहा है, उसकी गति भी तो देखो। उसे कोई आंनद—वांनद नहीं मिल रहा है। वह अलग परेशान है। इस मकान में वह रहना ही नहीं चाहता। वह किसी और मकान की खोज कर रहा है।
जो नहीं है, उसका हमें खयाल है। जो है, उसे हम भूल जाते हैं। जो नहीं है, उससे दुख पाते हैं। जो है, उससे कोई सुख नहीं मिलता।
मैंने सुना है, एक आदमी शाक—सब्जी वाले की दुकान पर केले खरीद रहा था। और केले वाले से उसने पूछा कि कितनी कीमत है? तो उसने कहा, एक रुपया दर्जन। तो उस आदमी ने कहा, गजब की लूट कर रहे हो! सामने की दुकान पर आठ आने दर्जन मिल रहे हैं ये ही केले। तो उस दुकानदार ने कहा, बड़ी खुशी से वहीं से खरीद लें। तो उस आदमी ने कहा, लेकिन आज उसके केले खतम हो गए हैं। तो उस दुकानदार ने कहा कि जब मेरे खतम हो जाते हैं, तब तो मैं चार आने दर्जन बेचता हूं! जब मेरे भी खतम हो जाते हैं, तो मैं भी चार आने दर्जन, मैं तो चार ही आने दर्जन पर बेच देता हूं फिर। वह लूट रहा है। आठ आने दर्जन बता रहा है; लूट रहा है।
मगर इस दुनिया में जो नहीं है, उसका भी काफी मोल— भाव चल रहा है। जो नहीं है, उस पर भी हिसाब लग रहा है। जो नहीं है, उस पर जानें लोग अटकाए हुए हैं, अपनी जानें लगाए हुए हैं। और जो है, वह विस्मृत हो जाता है।
आकांक्षा का अर्थ है, जो नहीं है, उसकी खोज। आकांक्षा—मुक्ति का अर्थ है, जो है, उसमें तृप्ति।
बाहर— भीतर से जो शुद्ध है।
शुद्ध कौन है बाहर— भीतर से? शुद्ध वही है, जो बाहर— भीतर एक—सा है। भीतर कुछ और है, बाहर कुछ और है, वह अशुद्ध है। शुद्ध का क्या अर्थ होता है? आप कब कहते हैं, पानी शुद्ध है? जब पानी में पानी के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता है, तब आप उसे कहते हैं, पानी शुद्ध है। कब आप कहते हैं, दूध शुद्ध है? जब। दूध में सिर्फ दूध होता है और कुछ नहीं होता। शुद्ध पानी और —शुद्ध। दूध को भी मिलाएं, तो दोनों अशुद्ध हो जाते हैं।
यह बड़े मजे की बात है। दोनों शुद्ध थे, तो डबल शुद्ध हो जाने चाहिए। लेकिन शुद्ध पानी शुद्ध दूध में मिलाओ, दोनों अशुद्ध हो गए। न पानी शुद्ध रहा, न दूध शुद्ध रहा। बात क्या हो गई? फारेन एलिमेंट, जो विजातीय है, वह अशुद्धि पैदा करता है। जब दूध दूध था, सिर्फ दूध था एकरस; सिर्फ दूध ही दूध था, बाहर— भीतर एक—सा ही था, तब शुद्ध था। जब पानी एक—सा ही था, तब वह भी शुद्ध था। अब न पानी पानी रह गया, न दूध दूध रह गया। दो पैदा हो गए, द्वंद्व खड़ा हो गया।
जब आप भीतर—बाहर एक—से होते हैं, पानी—पानी, दूध—दूध। जो भी हैं, जैसे भी हैं—बुरे हैं, भले हैं, यह सवाल नहीं है—जैसे भी हैं, बाहर— भीतर एक—से होते हैं, तो आप शुद्ध होते हैं। और जब बाहर— भीतर आप दो तरह के होते हैं, जब आपके भीतर दो आदमी होते हैं, तब वे दोनों ही अशुद्ध हो जाते हैं। बाहर— भीतर की समरसता, एक—सा पन शुद्धि है।
कृष्ण कहते हैं, जो बाहर— भीतर शुद्ध है, एक जैसा है, वह मुझे प्रिय है।
क्योंकि जो बाहर— भीतर एक—सा हो जाता है, उसके भीतर द्वंद्व मिट गया। और जिसके भीतर द्वंद्व मिट गया, वह तैयार हो गया निर्द्वंद्व, अद्वंद्व को अपने भीतर पहुंचाने के लिए। क्यौंकि जैसे हम हैं, उससे ही हमारा मिलन हो सकता है। अगर हम द्वंद्व में हैं, तो अद्वैत से हमारा मिलन नहीं हो सकता है। समान से मिलता है समान। इसलिए भीतर और बाहर एक—सा पन!
अगर चोर हैं, तो कोई फिक्र न करें। चोर भी परमात्मा को पा सकता है, लेकिन बाहर— भीतर एक—सा! यही कठिनाई है कि चोर बाहर— भीतर एक—सा नहीं हो सकता। नहीं तो चोरी नहीं चलेगी। अगर वह घोषणा कर दे कि मैं चोर हूं, तो चोरी तत्‍क्षण समाप्त हो जाएगी।
मैंने सुना है, एक सम्राट अपने कारागृह में गया। उसका जन्मदिन था, और कैदियों को कुछ मिठाई बांटने गया था। और हर कैदी ने कहा कि मै बिलकुल निर्दोष हूं महाराज! जालसाजी है, मुझे फंसा दिया गया। यह अपराध झूठा था, गवाह झूठे थे। यह सब अन्याय हो गया है। मुझे मुक्त करो। हर कैदी ने यही कहा।
आखिरी कैदी के पास सम्राट पहुंचा और कहा कि तेरा क्या खयाल है? तू भी शुद्ध है? तू भी निर्दोष है क्या?
उस आदमी ने कहा कि नहीं महाराज, मैं चोर हूं और मैंने चोरी की थी। और ठीक न्याययुक्त ढंग से मेरा मुकदमा चला। और जिन्होंने गवाही दी, उन्होंने ठीक ही गवाही दी। और अदालत ने जो फैसला किया, वह उचित है। जितना मेरा पाप था, उसके अनुकूल मुझे दंड मिला है।
सम्राट ने अपने आदमियों को कहा कि इस शैतान को फौरन जेलखाने के बाहर करो। थो दिस क्रुक आउट आफ दि जेल।
सारे कैदी चिल्लाने लगे कि यह क्या अन्याय हो रहा है? यह आदमी अपने मुंह से कह रहा है कि मैं चोर हूं और मुझे ठीक ही हुआ कि दंड मिला, और हम चिल्ला—चिल्लाकर कह रहे हैं कि हम निर्दोष हैं, और इस दोषी को जिसने खुद स्वीकार किया, उसको आप बाहर करते हैं!
तो उस सम्राट नै कहा, उसका कारण है। अगर इस शैतान को हम बाहर नहीं करते, तो तुम सब निर्दोष आत्माओं को यह खराब कर देगा।
जब कोई चोर भी इतना खुला हो जाता है, और सहज कह देता है भीतर—बाहर एक, तो परमात्मा आप निर्दोष आत्माओं को बचाने के लिए उसको तत्काल अलग कर देता है। नहीं तो वह आपको खराब कर दे। ऐसे शैतान को यहां नहीं बचने दिया जाता।
आप क्या हैं, यह सवाल नहीं है। अगर आप एकरस अभिव्यक्त हो जाते हैं, जैसे हैं, तो इस जगत में आपके लिए फिर कोई जगह नहीं है। फिर परमात्मा के हृदय में ही आपके लिए जगह है।
दक्ष, जिस काम के लिए आया था, उसे पूरा कर चुका.।
वह जो मैं कह रहा था, उसी काम के लिए प्रत्येक व्यक्ति आया है कि वासनाओं में उतरकर जान ले कि व्यर्थ हैं। आकांक्षा करके देख ले कि जहर है। संसार में उतरकर देख ले कि आग है। इसी काम के लिए प्रत्येक व्यक्ति आया है। और अगर यही काम आप नहीं कर पा रहे हैं, यह अनुभव नहीं कर पा रहे हैं, तो आप दक्ष नहीं हैं। और जो भी दक्ष हो जाता है, वह परमात्मा के लिए प्रिय है।
पक्षपात से रहित, सब दुखों से छूटा हुआ, सर्व आरंभों का त्यागी मेरा भक्त मुझे प्रिय है।
आरंभ का अर्थ है, जहां से वासना शुरू होती है। अगर वासना छोड़नी है, तो बीच में नहीं छोड़ी जा सकती, अंत में नहीं छोड़ी जा सकती, प्रारंभ में ही छोड़ी जा सकती है।
आप रास्ते से गुजरे और एक मकान आपको लगा, बहुत सुंदर है। अभी आपको खयाल भी नहीं है कि वासना का कोई जन्म हो रहा है। आप शायद सोच रहे हों कि आप बड़े सौंदर्य के पारखी हैं, बड़ा एस्थेटिक आपका बोध है, इसलिए मकान आपको सुंदर लग !? रहा है। लेकिन यह आरंभ है। जो मकान सुंदर लगा, उसके पीछे थोड़ी ही देर में दूसरी बात भी लगेगी कि कब मेरा हो जाए।
आरंभ हमेशा छिपा हुआ है, पता नहीं चलता। आप कहते हैं, एक स्त्री जा रही है, कितनी सुंदर है! और आप सोचते होंगे कि चूंइक आप बड़े चित्रकार हैं, बडे कलाकार हैं, इसलिए। लेकिन। जैसे ही आपने कहा, कितनी सुंदर है, थोड़ी खोज करना, भीतर ! छिपी है दूसरा वासना, कैसे मुझे उपलब्ध हो जाए!
यह आरंभ है। अगर इस आरंभ में ही नहीं चेत गए, तो वासना पकड़ लेगी। इसलिए सर्व आरंभ का त्यागी। जहां—जहां से उपद्रव शुरू होता हो, उस उपद्रव को ही पहचान लेने वाला, और वहीं त्याग कर देने वाला। अगर वहां त्याग नहीं हुआ, तो मध्य में त्याग नहीं हो सकता। मध्य से नहीं लौटा जा सकता।
कुछ चीजें हैं, हाथ से तीर की तरह छूट जाती हैं, फिर उनको लौटाना मुश्किल है। जब तक तीर नहीं छूटा है और प्रत्यंचा पर सवार है, तब तक चाहें तो आप लौटा ले सकते हैं।

 आरंभ का अर्थ है, जहां से तीर छूटता है।
सब आरंभ का त्यागी परमात्मा को प्रिय है।

आज इतना ही।
पांच मिनट रुकेंगे। कोई बीच से उठे न। कीर्तन करें और फिर