कुल पेज दृश्य

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

दीपक बार नाम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-01


 महल भया उजियार—(प्रवचन—पहला) 


1 अक्तूबर 1980;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न:

भगवान, "दीपक बारा नाम का', संत पलटू के इस सूत्र से आज एक नयी प्रवचन माला शुरू हो रही है। कृपया समझाएं कि यह नाम का दीपक क्या है और संत पलटू किस नाम का जिक्र कर रहे हैं?

चैतन्य कीर्ति!
पूरा सूत्र इस प्रकार है--
पलटू अंधियारी मिटी, बाती दीन्हीं बार।
दीपक बारा नाम का, महल भया उजियार।।
मनुष्य जन्मता तो है, लेकिन जन्म के साथ जीवन नहीं मिलता। और जो जन्म को ही जीवन समझ लेते हैं, वे जीवन से चूक जाते हैं। जन्म केवल अवसर है जीवन को पाने का। बीज है, फूल नहीं। संभावना है, सत्य नहीं। एक अवसर है, चाहो तो जीवन मिल सकता है; न चाहो, तो खो जाएगा। प्रतिपल खोता ही है। जन्म एक पहलू, मृत्यु दूसरा पहलू। जीवन इन दोनों के पार है। जिसने जीवन को जाना, उसने यह भी जाना कि न तो कोई जन्म है और न कोई मृत्यु है।

साधारणतः लोग सोचते हैं, जीवन जन्म और मृत्यु के बीच जो है उसका नाम है। नहीं जीवन उसका नाम है जिसके मध्य में जन्म और मृत्यु बहुत बार घट चुके हैं, बहुत बार घटते रहेंगे। तब तक घटते रहेंगे जब तक तुम जीवन को पहचान न लो। जिस दिन पहचाना, जिस दिन प्रकाश हुआ, जिस दिन भीतर का दीया जला, जिस दिन अपने से मुलाकात हुई, फिर उसके बाद न कोई लौटना है, न कहीं आना, न कहीं जाना। फिर विराट से सम्मिलन है।
बीज सुबह की धूप में भी पड़ा हो तो भी अंधकार में होता है। क्योंकि बीज तो बंद होता है। उसके भीतर तो सूरज की किरणें पहुंचती नहीं। हां, बीज में फूल छिपे हैं--अनंत फूल छिपे हैं। काश, बीज के फूल पकड़ हो जाएं तो फिर सूरज की रोशनी से संबंध जुड़ जाता है। फिर फूल नाचते हैं धूप में, हवाओं में, वर्षा में; गाते हैं पक्षियों के साथ, गुफ्तगू करते हैं सितारों से। साधारण मनुष्य बीज की तरह है, बंद इसलिए अंधेरा है भीतर। खुलो तो उजियारा हो जाए। यह सूत्र प्यारा है--
पलटू अंधियारी मिटी, बाती दीन्हीं बार।
दीपक बारा नाम का, महल भया उजियार।।
वह महल तुम हो। कहीं और मत तलाशने निकल जाना। जो भी पाना है, भीतर पाना है। जो भी है जानने योग्य, पाने योग्य, वह तुम्हारे भीतर छिपा पड़ा है। उसे तलाशना है। वह उपलब्धि नहीं है, आविष्कार है। तुम्हारे भीतर कुछ पर्तें हैं, जो टूट जाएं तो जलधार बह निकले। जैसे दीये को किसी ने ढांक दिया हो, ऐसे तुम ढंके हो।
उपनिषद के ऋषि प्रार्थना करते हैं: है प्रभु, इस स्वर्णपात्र को उघाड़ दे! यह पात्र है। और यही खतरा है। मिट्टी का होता, तो तुम लात मार देते। मगर यह सोने का है, इसे पकड़ रखने की आकांक्षा होती है। कैदी को अगर सोने की जंजीरें पहना दो, तो वह ही नहीं चाहेगा कि जंजीरें टूटें। वह तो समझेगा, आभूषण हैं। और अगर हीरे-जवाहरात भी जड़ दो जंजीरों पर, तो फिर तो कहना क्या! फिर तो जो उसकी जंजीरें तोड़ने आएगा, उसका दुश्मन हो जाएगा।
जीसस को तुमने सूली लगायी इसीलिए कि तुम्हारी सोने, हीरे-जवाहरातों से जड़ी जंजीरों को तोड़ने के लिए यह आदमी तुम्हारे पीछे पड़ गया। इसे सजा देनी ही होगी। इसे क्षमा नहीं किया जा सकता। तुमने सुकरात को जहर पिलाया, यूं ही नहीं । इसने जिद ही कर ली कि तुम्हें जगा कर रहेगा। तुमने बुद्धों को पत्थर मारे, पागल हाथी छोड़े। तुमने किस तरह सताया है उनको जिनकी एकमात्र अभीप्सा थी कि तुम्हारे जीवन का अंधकार टूट जाए; जो तुम्हारे लिए जी रहे थे, क्योंकि जिनके अपने जीवन का कार्य तो पूरा हो चुका था; जो तुम्हारे लिए, सिर्फ तुम्हारे लिए शरीर में आबद्ध थे--उनका फूल तो खिल चुका था, अब उन्हें यहां यह क्षण भी और होने की जरूरत थी; जो तुम्हारे लिए बोल रहे थे--क्योंकि उनके भीतर तो मौन अवतरित हो गया था, उन्होंने तो शून्य का संगीत सुन लिया था, अब शब्दों से क्या लेना था; जो तुम्हारे लिए हर तरह की तकलीफ उठा रहे थे! तुमने उन्हें खूब पुरस्कार दिया! तुमने उनकी मुहब्बत का खूब सिला दिया!
मुट्ठियों में खाक लेकर दोस्त आए बादफ्न
जिंदगी भर की मुहब्बत का सिला देने लगे
क्या सिला देते हैं हम! जिंदगी भर की मुहब्बत--
और किसी के मुंह से यह भी न निकला
कि इन पे खाक न डालो
और किसी के मुंह से यह भी न निकला मेरे दफ्न के वक्त--
कि इन पे खाक न डालो
इन्होंने आज ही बदले हैं कपड़े
आज ही हैं ये नहाए हुए
आखिरी विदा हम देते हैं, मुट्ठियों में खाक लेकर कब्र पर डाल देते हैं।
जिंदगी भर का सिला देने लगे
क्या सिला दिया! खूब सिला दिया! लेकिन कम से कम मर जाता है कोई तब तुम यह पुरस्कार देते हो, मगर तुम जीसस और सुकरात और मंसूर के लिए इतना भी न ठहर सके! आज नहीं कल मर ही जाएंगे, तुम इतने आतुर हो उठे कि तुमने उन्हें खुद ही मार डाला! जरूर उन्होंने कोई जघन्य अपराध किया होगा। यह था उनका जघन्य अपराध कि तुम अपने अंधेरे में मशगूल हो, तुमने अपने अंधेरे को ही जिंदगी का पर्याय समझ लिया--और वे तुम्हारा अंधेरा तोड़ने लगे, और वे तुम्हारे भीतर का दिया जलाने लगे, वे तुम्हारे खिड़की, द्वार-दरवाजे खोलने लगे! वे कहने लगे, ऊग आया है सूरज, उठो। कि पक्षियों ने गीत गाए, कि फूल खिल गये हैं, बाहर आओ! लेकिन तुम भीतर अपनी अंधेरी गुफाओं में रहने के इतने आदी हो गये हो, जन्मों-जन्मों से, कि बाहर आने में तुम डरते हो, घबड़ाते हो, भयभीत होते हो। ऐसे अंधियारा मिटेगा नहीं।
"पलटू अंधियारी मिटी'। मिट सकती है। पलटू की मिटी, तुम्हारी मिट सकती है। मेरी मिटी, तुम्हारी मिटी सकती है। किसी एक मनुष्य की भी मिटी तो सभी मनुष्यों की भी मिट सकती है। क्योंकि प्रत्येक मनुष्य परमात्मा के संबंध में समान अधिकारी है। जरा भी भेद नहीं। इसलिए भूल जाओ इस धारणा को कि कोई अवतार होते हैं। कोई तीर्थंकर होते हैं; कि कोई ईश्वरपुत्र होते हैं, कि कोई पैगंबर होते हैं। यह तुम्हारी चालबाजी है। बचने का ढंग है यह भी। कह दिया कि कृष्ण तो अवतार, कि बुद्ध तो अवतार, कि महावीर तो तीर्थंकर, कि जीसस तो ईश्वरपुत्र, कि मुहम्मद तो पैगंबर, हम साधारणजन! इनके जीवन में हो गया होगा उजियाला, क्योंकि ये विशिष्ट थे, ये परमात्मा के घर से अलग ही ढंग से बन कर आए थे, हम तो साधारणजन, जो इनके जीवन में हुआ, हमारे जीवन में कैसे हो सकता है। इस बात को सीधा-सीधा न कह कर तुमने बड़ी तरकीब से कहा कि ये हैं अवतारी पुरुष, ये हैं तीर्थंकर, ये हैं पैगंबर, ये ईश्वरपुत्र--और हम साधारण लोग! हम तो पूजा ही करेंगे। तो बीज लाख पूजा करता रहे फूलों की, फूल नहीं हो जाएगा। आरती उतारता रहे फूलों की--"जय जगदीश हरे'! गाता रहे--तो भी फूल नहीं हो जाएगा। फूल होने की प्रक्रिया से गुजरना होगा। बुझा दीया जले हुए दीयों की कितनी ही आरती उतारे, जलेगा नहीं। जले हुए दीये के करीब आना होगा। इतने करीब आना होगा कि ज्योति एक दिये से दूसरे दीये में छलांग लगा जाए। इस करीब होने का नाम ही सत्संग है। सत्संग का अर्थ है: हटा दो बीच की बाधाएं--संदेह, शक-शुबह, शिकायतें--रख दो हटा कर मन को एक तरफ, ताकि कोई दीवार न रहे। मन दीवार है, मौन सेतु बन जाता है। सत्संग का अर्थ: जिसका दीया जला हो, उसके पास चुप हो कर बैठे रहो। और चुप्पी में वह घट जाता है जो तुम शास्त्रों को रटते रहो, रटते रहो, जन्मों तक, नहीं घटेगा।
पलटू अंधियारी मिटी, बाती दीन्हीं बार।
जल गया दीया, अंधियारा मिट गया। और कैसे यह अंधियारा मिटा, कैसे यह दीया जला? दीपक बारा नाम का!
इस शब्द को, " नाम' को ठीक समझ लेना। इससे भ्रांति हो सकती है। सूफियों ने परमात्मा को सौ नाम दिये हैं। लेकिन जब तुम उनकी फेहरिस्त पढ़ोगे तो तुम चकित होओगे, फेहरिस्त में केवल निन्यानबे नाम हैं। कहते हैं कि सौ नाम दिये, मगर जब फेहरिस्त की गिनती करोगे तो हमेशा निन्यानबे पाओगे। क्यों? क्योंकि सौवां "नाम'। असली नाम तो बोला नहीं जा सकता। है वहां मौजूद, मगर उसे पढ़ना हो तो पंक्तियों कि बीच में पढ़ना होगा, शब्दों के बीच में झांकना होगा। कोरे कागज पर पढ़ना होगा; लिखे कागज पर उसे नहीं पढ़ा जा सकता। निन्यानबे नाम उन्होंने दिये, वे कामचलाऊ हैं। मतलब बिना नाम कैसे चले, तो रहीम कहो, रहमान कहो! ये सब परमात्मा के गुण हैं। करुणा, दया, प्रेम, सत्य, आनंद, चैतन्य--जो भी नाम देना चाहो, ये उसके गुण हैं; इससे एक पहलू जाहिर होता है मगर अनंत पहलू छिपे रह जाते हैं। मगर सारे परमात्मा को प्रकट करना हो तो वह सौवां नाम ही काम आता है, वह तो केवल शून्य है, निराकार है, कुछ कहा नहीं गया, कुछ लिखा नहीं गया। उसी को संतों ने "नाम' कहां है। नाम दिया नहीं , सिर्फ "नाम' कहा।
राम कहो तो यह नाम दे दिया, अल्लाह कहो तो यह नाम दे दिया, रहमान कहो तो यह नाम दे दिया, उस सौवें को सिर्फ नाम कहा है, कुछ नाम दिया नहीं। सिर्फ इशारा किया है उस सौवें की तरफ, शून्य की तरफ।
"दीपक बारा नाम का'। इसे यूं पढ़ना: शून्य का दीया जलाया। शब्दातीत, शास्त्रातीत, अनिर्वचनीय, समाधि का दीया जलाया। न वहां कुछ कहने को है, न कुछ समझने को है, न कुछ सुनने को है; वहां गहन मौन है, समग्र मौन है। जरा भी चहल-पहल नहीं। जरा भी शोरगुल नहीं। झेन फकीर उस अवस्था को कहते हैं: एक हाथ से बजायी गयी ताली। दो हाथ से बजाओगे तो आवाज होगी। एक हाथ से ताली बजती है, मगर आवाज नहीं होती। एक हाथ से बजायी ताली।
या जैसा कि इस देश की परंपरा कहती है कि वहां अनाहत नाद सुना जाता है। यह अनाहत शब्द ठीक वही कहता है जो एक हाथ की ताली। अनाहत शब्द बना है आहत के विपरीत। आहत का अर्थ होता है: चोट। जैसे कोई सितार के तार पर चोट करता है, तो नाद पैदा होता है, यह आहत नाद है। जैसे कोई तबले को ठोंकता है, या मृदंग को बजाता है, तो चोट करता है--दो चीजें टकराती हैं; हाथ मृदंग से टकराता है, कि अंगुलियां सितार के तारों को छेड़ देती हैं--यह आहत नाद है। यह द्वंद्व है, इसमें दो हैं, इसमें संघर्ष है। अनाहत नाद का अर्थ है: जहां दो नहीं, जहां एक है; जहां संघर्ष होने का। उपाय ही नहीं; जहां द्वंद्व की कोई संभावना नहीं। जहां एक ही रह गया, वहां कैसा शब्द, कैसा शोरगुल?
झील पर तुमने लहरें देखी हैं। तो तुम शायद सोचते होओगे कि झील पर लहरें हैं। झील पर लहरें नहीं होती, लहरें तो हवाओं के कारण होती हैं। मगर हवाएं दिखायी नहीं। पड़ती, इसलिए तुम झील में सोच लेते हो, तुम झील को जिम्मेवार ठहरा देते हो। यह वहां चोट कर रही है झील पर, इसलिए झील पर लहरें हैं। यह आहत नाद है। अगर सारी हवाएं बंद हो जाएं, या खो जाएं, फिर झील पर अनाहत नाद होगा। फिर कोई लहर न उठेगी। जरा-सी भी लहर न उठेगी। झील फिर दर्पण हो जाएगी। और उस दर्पण में सारा आकाश झलकेगा। जो है, वैसा ही झलकेगा जैसा है। लहरों के कारण खंडित हो जाता है, टूट-फूट जाता है, विकृत हो जाता है।
तुम्हारे भीतर शून्य जब पैदा हो जाए तो दीया जलता है। रोशनी हो उठती है। सब अंधेरा द्वंद्व के कारण है। जब तुम निर्द्वंद्व हो जाओ, तो रोशनी पैदा हो जाती है। और फिर महल में उजियारा ही उजियारा है। और ऐसा उजियारा, जो शुरू तो होता है लेकिन समाप्त नहीं होता।
बुद्ध ने कहा है: संसार का कोई प्रारंभ नहीं, अंत है और निर्वाण का प्रारंभ है, अंत नहीं। अंधेरे का कोई प्रारंभ नहीं, अंत है, प्रकाश का प्रारंभ है, कोई अंत नहीं। एक बार जाना कि सदा कि लिये तुम्हारा हुआ। और उस प्रकाश की घड़ी में तुम झोपड़े के वासी नहीं रह जाते, महल भया उजियार, उस प्रकाश में तुम सम्राट हो जाते हो। उस प्रकाश में तुम्हें दिखायी पड़ती है अपनी भगवत्ता। उससे ऊपर तो कुछ और नहीं। "अहं ब्रह्मास्मि' का उदघोष हो उठता है। "अनलहक' की टेर उठ आती है। उससे बड़ी न कोई संपदा है, न कोई साम्राज्य, न कोई, शक्ति है।
यह कैसे जले दीया?
सत्संग भूमिका है। जैसे बीज को भूमि में डालना होता है। बिना भूमि में डाले यह अंकुरित नहीं होगा। सत्संग भूमिका है, भूमि है। मगर अकेले भूमि में डाल देन से कुछ न होगा। थोड़ी जलधार भी पहुंचानी होगी। थोड़ा रस भी देना होगा। क्योंकि सुखा बीज गीला हो, आर्द्र हो। सत्संग काफी नहीं है, श्रद्धा भी चाहिए, श्रद्धा आर्द्र करती है। सत्संग तो तार्किक भी कर सकता है; मगर दिखायी ही पड़ता है कि सत्संग कर रहा है, होता नहीं। क्योंकि उसके पास हृदय कहां, गीलापन कहां, प्रेम की स्निग्धता कहां? वह रूखा का रूखा रह जाता है।
तर्क बड़ी रूखी चीज है। तर्क ऐसे है जैसे रेत। और रेत से जैसे कोई तेल निचोड़ना चाहे। तब इसमें रेत का क्या कसूर है। तेल तो निचुड़ेगा नहीं, क्योंकि रेत में तेल नहीं। तर्क तो रेत की भांति है, रेगिस्तान की भांति है। तुम लाख निचोड़ते रहो, कुछ भी न निकलेगा। श्रद्धा तुम्हें आर्द्र करती है, गीला करती है। जो बीज जन्मों-जन्मों से सूखा है, उसे गीला करना होगा।
इसलिए भूमिका हो सत्संग की, श्रद्धा की जलधार हो। और, बीज को थोड़ा साहस भी चाहिए। नहीं तो वह डर के मारे अपनी पुरानी खोल को पकड़े रहेगा। लोग अपनी पुरानी खोलों को क्यों पकड़े हुए हैं? भय के कारण कि पता नहीं अज्ञात कैसा हो! माना कि ज्ञात कुछ बहुत सुखपूर्ण नहीं है, मगर कम से कम ज्ञात तो है, परिचित तो है, जाना-माना तो है। अनजान रास्ते पर चल पड़ना...! और इसमें ज्यादा अनजान क्या बात होगी कि बीज में कभी अंकुरण नहीं हुआ है, वह अचानक अंकुरित हो उठे। और अंकुरित होने के लिए छाती चाहिए। क्योंकि बीज को टूटना पड़ेगा, तभी अंकुरित हो सकता है। फूटेगा तो ही अंकुरित होगा। और टूटने की हिम्मत मरने की हिम्मत है। इसलिए समर्पण चाहिए।
शिष्य को मरना होता है सदगुरु के साथ, सदगुरु में। पुराने शास्त्र कहते हैं; आचार्यो मृत्यु। वह जो गुरु है, मृत्यु जैसा है। है भी। बात सच है। गुरु के पास जो मरने को राजी नहीं है, जो फूटने को, टूटने को राजी नहीं है, जो अपनी जरा-जीर्ण परंपरा, मान्यताओं, अंधविश्वासों को तोड़ने को राजी नहीं है; जो कहता है, मैं तो चिपटूंगा अपनी धारणाओं से, कैसे छोड़ दूं, बड़ी पुरानी हैं, बाप-दादों की दी हुई हैं, सदियों से चली हैं, इनको में नहीं छोड़ सकता, मैं तो हिंदू ही रहूंगा, मैं तो मुसलमान ही रहूंगा, मैं तो जैन ही रहूंगा--फिर बहुत कठिनाई है। वह टूटने को राजी नहीं है: वह अपनी खोल को जार से पकड़े हुए है; उसके पास छाती नहीं, साहस नहीं।
श्रद्धा हो, साहस हो। इतना साहस कि अतीत के प्रति मर सके, तो ही भविष्य में अंकुरण होगा। जो अतीत को पकड़ता है, वह भविष्य को त्याग देता है। और भविष्य ही है जो होने वाला है। अतीत तो जा चुका, बह चुका, अब वहां कुछ भी नहीं है--सांप जा चुका, सिर्फ रेत पर सांप के सरकने के चिह्न रह गये हैं। अतीत तो जा चुका, रेत पर चरणचिह्न रह गये हैं। पूजते रहो चरणचिह्नों को जितना पूजना हो! कुछ पाओगे नहीं, हाथ कुछ लगेगा नहीं। जाओ मंदिरों में, जाओ मस्जिदों में, जाओ गुरुद्वारों में, कुछ पाओगे नहीं। किसी जीवित बुद्ध के पास होना होगा। किसी जीवित नानक को तलाशो। गुरुद्वारों में नहीं मिलेगा नानक। किसी जीवित मुहम्मद के पास बैठो। मस्जिदों में नहीं, काबा में भी नहीं मिलेगा। किसी जीवित जीसस के साथ उठो, चलो। यह पोपों और पादरियों का बड़ा जाल, इसमें भटक जाओगे ऐसे जैसे कि कोई जंगलों में भटक जाता है। और शब्दों के जंगल जंगलों से भी बड़े जंगल हैं। इनमें जो खो जाता है, उसे निकलना मुश्किल हो जाता है।
जीवित सदगुरु के पास ही साहस की कसौटी है। क्योंकि जो खुद मर चुके हैं, जो अब नहीं हैं, वे तुम्हें क्या मिटाएंगे। तुम्हें कैसे मिटाएंगे! असंभव। वे तो खुद तुम्हारे हाथ में पड़ गये अब। अब तुम जो चाहो उनके साथ करो। जैसा व्यवहार करना चाहो करो। कुछ कह सकते नहीं, कुछ बोल सकते नहीं, पत्थर की मूर्तियां रह गयी है। या कागजों की मूर्तियां। शास्त्र हैं, वे कागज की मूर्तियां हैं। मगर सब प्रतिमाएं रह गयी। जीवित सदगुरु के पास ही साहस ही कसौटी है। लेकिन कायरों की यह दुनिया है, कायरों से भरी हुई यह पृथ्वी है, इसलिए यहां मुर्दे पूजे जाते हैं और जीवितों का अपमान किया जाता है। उन्हीं जीवितों का, जिनका तुम अपमान कर रहे हो, जब वे मर जाएंगे तो तुम पूजोगे। बड़े अचंभे से यह घटना घटती रही है और अब भी घट रही है।
जीसस जिंदा हों तो सूली! और जीसस मर जाएं तो आधी पृथ्वी ईसाई हो जाती है! मुर्दा जीसस के साथ अड़चन नहीं है। जैसा चाहो वैसा तुम कर सकते हो। जीसस अब तुम्हें रोक नहीं सकते। जिंदा जीसस के साथ बहुत अड़चन है। वे तुम्हारी तो मानेंगे नहीं--जो तुम्हारी मान ले, वह सदगुरु नहीं है। जो तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी करे, वह सदगुरु नहीं है। सदगुरु तो अपनी स्वतंत्रता और स्व-स्फुरणा से जीएगा और तुम्हारी सारी धारणाओं को तोड़ देगा और तुम्हारी सारी मान्यताओं को बिखेर देगा। यह उसे करना ही होगा, बेरहमी से, तो ही उसकी करुणा है। अगर उसने सांत्वना दी, तो वह तुम्हारा दुश्मन है। वह तुम्हें संक्रांति देगा, क्रांति देगा, सांत्वना नहीं। वह तुम्हें आग से गुजरने का बल देगा और धक्का देगा कि गुजर जाओ आग से--क्योंकि डरो मत, कचरा ही जलेगा, सोना तो बच रहेगा। और जिसको बचाना है, वह सोना है। और कचरा जल जाए, यह अच्छा है; ताकि तुम पहचान सको अपनी असलियत को, अपने स्वभाव को।
सत्संग चाहिए भूमिका के लिए, श्रद्धा चाहिए आर्द्रता के लिए साहस चाहिए ताकि बीज टूट सके। बीज के टूटने का अर्थ है: अहंकार का टूटना। तुम बातें अच्छी-अच्छी करते हो, मगर छिपाते तुम अहंकार हो। जब तुम कहते हो, हिंदू धर्म, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, तो तुम असल में यह नहीं कह रहे हो कि तुम्हें जैन धर्म से कुछ लेना-देना है...तुम्हें क्या पड़ी जैन धर्म से! तुम्हारी जिंदगी में तो कोई सबूत नहीं है। महावीर ने कहा: अपरिग्रह, और जितना परिग्रह जैनों के पास होता है उतना किसी के पास नहीं है। यह खूब मजा हुआ। महावीर नग्न रहे और जितनी कपड़े की दुकानें जैनियों की उतनी किसी की नहीं। जैनी अक्सर कपड़े की ही दुकान करते हैं।
मेरे एक परिचित हैं, प्रियजन हैं, उनकी दुकान का नाम है: "दिगंबर क्लॉथ स्टोर'। मैंने उनसे कहा कि थोड़ी अकल भी तो लगाओ! तुम्हें दिगंबर शब्द का मतलब मालूम है? दिगंबर है? दिगंबर यानी नग्न। "नंगों की कपड़ों की दुकान'! कपड़े किसके लिए? या तो दिगंबर अलग करो, और या कपड़े की दुकान की जगह कुछ और दुकान करो!
लेकिन जैनों का सारा धंधा कपड़े की दुकान का है। और महावीर नग्न रहे! और जैनों के पास जितना परिग्रह है, उतना किसी के पास नहीं है। और महावीर ने अपरिग्रह की बात कही।
और यह सारे लोगों के साथ यही घटना घटी है।
इस्लाम का अर्थ है: शांति का धर्म। इस्लाम का ही अर्थ है: शांति। और जितनी अशांति इस्लाम से फैली, किसी और से फैली? जब? देखो तब जेहाद की तैयारी चल रही है! तलवारों पर धार रखी जा रही है। मरने-मारने के लिए आयोजन हो रहा है।
जीसस ने कहा है परमात्मा प्रेम है--और ईसाइयों ने जितनी हत्याएं कीं, किसने कीं? कितने जिंदा लोगों को जला दिया। जिंदा स्त्रियों को जलाया। सारा इतिहास दो हजार वर्ष का ईसाइयों के द्वारा हत्याओं का इतिहास है। और ईश्वर प्रेम है! और प्रेम का परिणाम है।
चकित होकर तुम जरा देखो तो, कि तुम्हारा इन धर्मों से कुछ प्रयोजन है, कुछ लेना-देना है!
हिंदू कहते हैं: जगत माया। और जितने जोर से हिंदू जगत से चिपटते हैं, शायद ही दुनिया में कोई चिपटता हो। जितने जोर से हिंदू पैसे, धन को, प्रतिष्ठा को पकड़ते हैं, उतना दुनिया में कोई भी नहीं पकड़ता। यह मेरा रोज का अनुभव है। यहां करीब-करीब दुनिया के सारे देशों से लोग मौजूद हैं। जितनी पकड़ हिंदुओं की है, उतनी किसी की भी नहीं। क्या मामला है यह? जगत को माया कहते हैं, सब माया, मगर पकड़ते हैं जगत को इतनी जोर से कि छूटे नहीं छूटता। कुछ भी नहीं छूटता--
धर्मों से किसी को कोई प्रयोजन नहीं है। फिर प्रयोजन क्या है? प्रयोजन है अहंकार का। हिंदू धर्म श्रेष्ठ है; क्योंकि हिंदू धर्म की आड़ में मैं श्रेष्ठ हूं, क्योंकि मैं हिंदू हूं। जैन धर्म महान है; क्योंकि उसकी आड़ में मैं महान हूं। सीधे-सीधे यह भी साहस नहीं है कहने की कि मैं महान हूं। पाखंड ऐसा गहरा हो गया है। बेईमानी खून मैं, हड्डी-मांस-मज्जा में समा गयी है। सीधे ही कहो न बात कि मैं महान हूं! मगर तुम जानते हो कि ऐसा कहोगे तो लोग हंसेंगे, कि अरे बड़े अहंकारी हो! तो फिर अहंकार को घूंघट में छिपा पड़ता है। फिर अहंकार को परोक्षरूपेण बोलना पड़ता है।
पेरिस के विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र के प्रधान ने एक दिन अपनी कक्षा में कहा कि मुझसे महान व्यक्ति इस संसार में दूसरे नहीं है। विद्यार्थी उसके चौंके।...दर्शनशास्त्र का प्रोफेसर विश्वविद्यालय में बड़ी दयनीय अवस्था में होता है; क्योंकि कौन पढ़ने जाता है दर्शनशास्त्र! दर्शनशास्त्र के विभाग करीब-करीब खाली पड़ गये हैं। या तो लड़कियां पढ़ने जाती हैं, जिनको सिर्फ डिग्री चाहिए, ताकि अच्छे घर में शादी हो सके। और या कुछ सिरफिरे लोग पढ़ने जाते हैं; जिनको जिंदगी में भूखा मरने का शौक है। नहीं तो कौन पढ़ने जाता है। विज्ञान पढ़ते हैं लोग, डाक्टरी पढ़ते हैं लोग, इंजीनियरिंग पढ़ते हैं लोग, दर्शनशास्त्र पढ़ कर क्या करेंगे? मक्खियां मारनी हैं!...विद्यार्थी चौंके, विद्यार्थी ने खड़े को कर कहा कि आप और ऐसा कहते हैं! और आप इतने बड़े तर्कशास्त्री और आप ऐसी भूल कर रहे हैं, अपने को दुनिया का सबसे महान व्यक्ति कह रहे हैं! किस आधार पर? क्या प्रमाण?
उसने कहा, प्रमाण! उसने अपनी डेस्क से दुनिया का नक्शा निकाला, बोर्ड पर टांगा, अपनी छड़ी उठायी और कहा कि मैं तुमसे पूछता हूं कुछ प्रश्न, उससे सिद्ध हो जाएगा। मैं तुमसे पूछता हूं, दुनिया में सबसे श्रेष्ठ देश कौन-सा है? स्वभावतः सभी फ्रांस के रहने वाले थे, उन्होंने कहा, फ्रांस से श्रेष्ठ तो कोई भी नहीं। जैसे भारतीय होते तो वे कहते कि भारत तो पुण्यभूमि है, यहां तो देवता पैदा होने को तरसते हैं।...पता नहीं देवता भी कैसे नालायक हैं! यह किसलिए पैदा होने को तरसते होंगे? यहां आदमी पैदा होने से पीड़ित हो रहा है, देवता और किसलिए तरस रहे हैं? मगर बात शायद ठीक ही होगी, नहीं तो इतनी भीड़-भाड़ भी कैसे हो! तैंतीस करोड़ देवता हिंदुओं के ही पास हैं--और किसी के पास तो नहीं--मगर यहां तो मामला भी बढ़ गया है, देवता ही नहीं आ गये, उनके नौकर-चाकर भी सब आ गये हैं। सत्तर करोड़ तो संख्या हो गयी! देवता अपने मित्रों इत्यादि को भी ले आए हैं; दिखता है दानवों इत्यादि को भी ले आए हैं। अकेले नहीं आए, भीड़-भड़के के साथ आ गये हैं।...अगर भारत फ्रांसीसी ही थे, तो यह उनको अहंकार का हिस्सा है, जैसे भारतीयों के अहंकार का हिस्सा है, जैसे चीनियों का...दुनिया में सबके अपने अहंकार हैं! मगर वही बात, भेद कुछ भी नहीं! उन्होंने कहा, फ्रांस निश्चित ही सर्वश्रेष्ठ है। उस प्रोफेसर ने कहा, तो ठीक है, अब फ्रांस बचा, सारी दुनिया समाप्त करो। फ्रांस में सबसे ज्यादा श्रेष्ठ नगर कौन-सा है?
तब जरा विद्यार्थी चौंके कि यह बात तो कुछ बिगड़ने लगी। मगर करते भी क्या! पेरिस के ही सब निवासी थी, और पेरिस के निवासी तो मानते हैं दुनिया मग पेरिस जैसा कोई नगर ही नहीं है--हो भी नहीं सकता--तो उन्होंने कहा, पेरिस। तब प्रोफेसर ने कहा, और पेरिस में सबसे सबसे ज्यादा पवित्र स्थल कौन-सा है? स्वभावतः विद्या-मंदिर ही तो पवित्र होगा, तो विश्वविद्यालय। और तब उसने कहा, विश्वविद्यालय में सबसे श्रेष्ठ विषय कौन-सा है? निश्चित ही सभी दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी, उन्होंने कहा, दर्शनशास्त्र। उसने कहा, अब मैं तुम्हें कुछ सिद्ध करूं कि हो गया सिद्ध? मैं दर्शनशास्त्र का प्रधान हूं, इसलिए मैं कहता हूं कि मैं दुनिया का सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति हूं। किसी को कोई एतराज है? अब क्या एतराज हो! अब तो बात बड़े तर्क से सिद्ध हो गयी। मगर देखते हैं कितनी चालबाजी से मैं दुनिया का श्रेष्ठतम व्यक्ति हूं, यह सिद्ध किया गया।
सीधे-सीधे कहो, कोई राजी नहीं होगा; तो हमें कान को उलटे पकड़ना होता है। भारत महान है, क्योंकि तुम भारतीय हो। भारत महान राष्ट्र है। और फिर भारत में भी महाराष्ट्र का तो कहना ही क्या। राष्ट्र के भीतर महाराष्ट्र! सिर्फ एक ही है यह देश दुनिया में जहां राष्ट्र के भीतर महाराष्ट्र होते हैं? तुमने चीनी डिब्बों की कहानियां सुनी होंगी डिब्बे भीतर डिब्बा, लेकिन यहां उससे भी गजब की बात है। यहां डिब्बे के भीतर उससे बड़ा डिब्बा! इसको कहते हैं जादू! इसको कहते हैं चमत्कार, आध्यात्मिक चमत्कार! राष्ट्र वगैरह में क्या रखा है, महाराष्ट्र!! बंगाली से पूछो, वह कहेगा कि सोनार बांगला! सोने का बंगाल। यह है पुण्यभूमि धन्यभूमि। यहीं रवींद्रनाथ! किसी से भी पूछ लो, जिससे पूछेंगे, वह अपने दावे करेगा। हालांकि सीधा नहीं कहेगा कि मैं महान हूं, मगर तिरछी चला चलेगा। मेरा धर्म महान, मेरा राष्ट्र महान, मेरा वर्णन महान, मेरा रंग महान, मेरी जाति महान, मगर पुरुष है तो पुरुष महान। और अगर धीरे-धीरे तुम खींचते ही जाओ बात को तो वही आ जाएगा जहां दर्शन-शास्त्रों का यह प्रोफेसर आ गया। आखिर में, तुम अगर उसको कुरेदते ही जाओ, तो आज नहीं कल, कल नहीं परसों उसे कहना ही पड़ेगा, अब सच्ची बात कह देता हूं कि मैं महान।
इस "मैं' की महानता को, अहंकार को सिद्ध करने के लिए तुम न-मालूम किन-किन बातों को पकड़े हुए हो। ये सब छोड़नी होंगी, तो ही बीज टूटेगा। साहस चाहिए। ज्ञात को छोड़ने के लिए और अज्ञात में प्रवेश के लिए साहस चाहिए। और यह हमारा विक्षिप्त मन, यह हमारा पागल मन अतीत को पकड़ता है। इसके पीछे कारण हैं। क्योंकि मन अतीत से ही पोषण पाता है। मन है अतीत का संग्रह। मन के पास अज्ञात में प्रवेश का कोई उपाय नहीं है। यह ज्ञान में ही जीता है। यह परिचित में ही जीता है। और इसलिए मन ही बाधा है। यही तुम्हारा दीया नहीं जलने देता। जिस दिन तुम्हारे और किसी जले हुए दीये के बीच कोई फासला न रह जाएगा--यह मन न खड़ा रह जाएगा। उस क्षण तुम्हारा दीया भी जल जाएगा। तत्क्षण जल जाएगा। मगर कुछ तुम्हें भी करना होगा। तुम्हें पास सरकते आना होगा। श्रद्धा ही पास सरका सकती है। और तुम्हें आर्द्र होना होगा, तुम्हें प्रेमपूर्ण होना होगा। और तुम्हें शून्य होना होगा, मौन होना होगा। मौन को मैं ध्यान कहता हूं। जिस को पलटू ने "नाम' कहा है, उसको मैं "ध्यान' कहता हूं। शब्द का ही भेद है। जब तुम निर्विचार हो जाओगे तो मन गया। और जहां मन गया, वहां ज्योति आयी। तत्क्षण आती है।
मगर यह पागल मन अतीत में भटकता है।
सर छुपाके मेरे दामन में खिजाओं ने कहा...
सर छुपाके मेरे दामन में खिजाओं ने कहा
हमें सताने दे गुलशन में बहार आई है...
हमें सताने दे गुलशन में बहार आई है
सर छुपाके मेरे दामन में खिजाओं ने कहा...
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला...
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
सहने-गुल छोड़ गया दिल मेरा पागल निकला
ये दिल बिलकुल पागल है। ये मन विक्षिप्त है।
विक्षिप्तता में और साधारण जिसको हम स्वस्थ मन का आदमी कहते हैं, जो अंतर होता है, मात्रा का होता है, गुण का नहीं होता। तुम निन्यानबे डिग्री पर विक्षिप्त होओगे, कोई सौ डिग्री पर उबल गया। कोई एक सौ एक डिग्री पर, तो पागलखाने मग चला गया। मगर जो भेद है, वह बस मात्रा का है। और मात्रा का भेद भी कोई भेद है। जरा-सी बात में मात्रा पूरी हो सकती है। जरा-सी तराजू पर और वजन पड़ गया कि बात खतम हो गयी। पत्नी मर जाए, बेटा मर जाए, घर में आग लग जाए, दिवाला निकल जाए--अरे और तो और, लाटरी मिल जाए।
मैंने सुना है, एक स्त्री घबड़ायी हुई अपने पादरी के पास गयी और उसने कहा कि मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गयी हूं; मेरे पति दफ्तर गये हैं, आते ही होंगे, आप जल्दी कुछ करें, उनके नाम लाटरी खुल गयी है! पादरी ने कहा, इसमें इतने घबड़ाने की क्या जरूरत है? अरे, उसने कहा, सात ला, रुपये हैं! मेरे पति ने कभी सात सौ रुपये भी हाथ में लेकर नहीं देखे। सात लाख! मैं जानती हूं, वे पगला जाएंगे। और मुझे डर है कि कहीं कोई हृदय का दौरा न पड़ जाए। इतना बड़ा सुख वे न झेल सकेंगे। यह उनकी सामर्थ्य के बाहर है। आप जल्दी कुछ करें, वे दफ्तर से आते ही होंगे। अभी-अभी चिट्ठी आयी और मुझे खबर मिली कि सात लाख की लाटरी उनके नाम खुल गयी। पादरी ने कहा, चल, मैं तेरे घर आता हूं, मैं निपट लूंगा। कोई बात नहीं, आने दे तेरे पति को, धीरे-धीरे बात को खोलेंगे। आहिस्ता-आहिस्ता। देखते चलेंगे कि कितना सह सकता है, उतना खोलेंगे।
पति आया। पादरी ने कहा, अरे भई सुनते हो, तुम्हारे नाम से लाटरी खुल गयी पचास हजार रुपये मिले हैं तुम्हें। उस आदमी ने सुना और उसने कहा, अगर वह बात सच है तो पच्चीस हजार मैंने तुम्हारे चर्च को दान दिये। और पादरी वहीं गिर पड़ा और उसका हार्ट फेल हो गया। पच्चीस हजार! यह तो सोचा भी न था। यह आदमी तो कम से कम लाटरी की टिकिट खरीदा था तो सोचता भी होगा कि मिल सकते हैं, कभी तो मिलेंगे--न मालूम कब से खरीद रहा होगा; हर महीने खरीदता होगा टिकिट, जन्मों से खरीद रहा होगा, तब तो कभी यह मौका आएगा, मगर यह तो कुछ तैयार भी रहा होगा, पादरी तो बिलकुल ही तैयार नहीं था। इसने तो सोचा भी नहीं था कि पच्चीस हजार एकदम से मिल जाएंगे, वह तो वहीं गिर पड़ा, वहीं ढेर हो गया।
इस मन को पागल होने में कितनी देर लगती है! यह पागल होने के करीब ही है, जरा-सा धक्का। बहाना ही खोज रहा है।
सर छुपाके मेरे दामन में खिजाओं ने कहा
हमें सताने दे गुलशन में बहार आई है
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला...
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
सहने-गुल छोड़ गया दिल मेरा पागल निकला जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
जब बहार आई तो
जब उसे ढूंढ़ने निकले तो निशां तक न मिला...
उसे ढूंढ़ने निकले तो निशां तक न मिला
दिल मग मौजूद रहा आंख से ओझल निकला
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
सहने-गुल छोड़ गया दिल मेरा पागल निकला
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
इक मुलाकात भी जो दिल को सदा रही...
इक मुलाकात भी जो दिल को सदा याद रही
हम जिसे उम्र समझते थे वे इक पल निकला
जब बहार आई तो सहरा कि तरफ निकला
सहने-गुल छोड़ गया दिल मेरा पागल निकला
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
वो जो अफसाना-ए-गम सुनके हंसा करते थे...
वो जो अफसाना-ए-गम सुनके हंसा करते थे
इतना रोये हैं कि अब आंख, का काजल निकला
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
सहने-गुल छोड़ गया दिल मेरा पागल निकला
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
हम तो तुम्हें ढूंढ़ने निकले थे परेशान रहे...
हम तो तुम्हें ढूंढ़ने निकले थे परेशान रहे
शहर तो शहर है, जंगल भी न जंगल निकला
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
सहने-गुल छोड़ गया दिल मेरा पागल निकला
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
कौन अप्यूब परेशान नहीं तारीकी में...
कौन अप्यूब परेशान नहीं तारीकी में
चांद अपना चुके फिर भी दिल सीने में बेकल निकला
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
सहने-गुल छोड़ गया दिल मेरा पागल निकला
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
जब बहार आई तो
यह दिल सच में ही पागल है। बहार तो रोज आती है, वसंत तो तुम्हारे द्वार पर रोज दस्तक देता है, परमात्मा तो रोज तुम्हें पुकारता है, मगर तुम रेगिस्तानों की तरफ चल पड़ते हो।
जब बहार आई तो सहरा की तरफ चल निकला
सहने-गुल छोड़ गया दिल मेरा पागल निकला।
कुछ अजीब है आदमी! जहां बाहर है, वहां से तो भाग खड़ा होता है; जहां वसंत को स्रोत है, वहां से तो भाग खड़ा होता है, फिर तड़फता है। जैसे मछली तड़फे, सागर के निकल कर गिर पड़े रेत पर, तट पर, घूप में जले, भुने, तड़फे; ऐसे हम हैं। भीतर सागर है और हम बाहर। भीतर सच्चिदानंद मौजूद है और हम बाहर भागे हुए हैं। इस क्षण ही दीया जल सकता है, लेकिन हम अतीत को इतने जोर से पकड़े हुए हैं कि वर्तमान को हम होने नहीं देते। हम जीते हैं जो बीत गया उसमें, जिसको धूल ही रह गयी, गुबार रह गयी है कारवां तो कब का निकल गया; हम ऐसे पागल हैं कि कार तो चला रहे हैं यहां, देखना चाहिए आगे, मगर देखते हैं आईने में पीछे, जहां से कार गुजर चुकी, जहां सिर्फ धूल उड़ती रही है। दुर्घटना न होगी तो क्या होगा! और अंधेरा न होगा तो क्या होगा। और जिंदगी एक बोझ न बन जाएगी तो क्या होगा।
कैसे तुम्हारे पैरों में नृत्य आए? और कैसे तुम्हारे जीवन में रोशनी हो? मत को छोड़ो, ध्यान को पकड़ो--ध्यान यानी अ-मनी दशा; ध्यान अर्थात मनातीत, विचारातीत चैतन्य--और दीया जला। एक पल की देर नहीं होती। लोग कहते हैं कि परमात्मा के जगत में देर है, अंधेर नहीं, मैं तुमसे कहता हूं यह बात गलत है, यह कहावत गलत है। न देर है, न अंधेर है। क्योंकि देर हो गयी तो अंधेर हो गया। और क्या अंधेर होगा! अभी आग में हाथ डालों, अभी जलता है। कोई अगले जनम में जलेगा! अभी ध्यान करो, अभी परमात्मा उपलब्ध होता है। परमात्मा कोई वायदे थोड़े ही करता है कि आऊंगा कल, कि आऊंगा परसों। परमात्मा तो आया ही हुआ है। तुम जरा आंख खोलो, सूरज तो निकला ही हुआ है।
लेकिन तुम परदों में छिपे बैठे हो। आंखें बंद कर रखी हैं। और रो रहे हो। और इतना रो रहे हो कि सब आंख का काजल निकला। अंधे हो गये हो रोते-रोते। जरा आंख खोलो! जरा पुनर्विचार करो! एक बार फिर से निरीक्षण करो कि अगर तुम्हारी जिंदगी में दुख ही दुख है, तो तुमने कोई बुनियादी भूल की है। तुम वहां खोज रहे हो सुख, जहां सुख नहीं है। और वहां पीठ किये हो, जहां सुख है।
इसके पहले कि कोई संसार में यात्रा करने निकले, अपने भीतर तो खोज लेना चाहिए। हां, भीतर न मिले तो फिर संसार में यात्रा करो, फिर कहीं और खोजो--खोजना ही पड़ेगा। मगर जिसने भी भीतर झांका है, उसने पा ही लिया, उसे खोजने कहीं जाना न पड़ा। दुनिया में अगर कोई सिद्धांत ऐसा है तो निरपवाद रूप से सत्य है तो वह यह सिद्धांत है कि जिसने भी भीतर खोजा, उसने सदा पाया और जिसने बाहर खोजा, उसने कभी नहीं पाया। एक ऐसा उदाहरण नहीं है कि बाहर खोज कर किसी ने आनंद पाया हो, अमृत पाया हो और एक उदाहरण ऐसा नहीं कि किसी ने भीतर खोजा हो और न पाया हो। इससे बड़ा निरपवाद कोई नियम नहीं है। एस धम्मो सनंतनो! यही सनातन धर्म है। यही आधारभूत नियम है।

दूसरा प्रश्न:

भगवान, यह एक प्रचलित प्रार्थना है:
न त्वहं कामये राज्यम न स्वर्ग नापुनर्भवम।
कामये दु:खतप्तानाम प्राणिनाम आर्तिनाशनम।।
अर्थात मैं अपने लिए न राज्य चाहता हूं, न स्वर्ग और न मोक्ष ही। मैं तो यही चाहता हूं कि दुख से तपे हुए प्राणियों की पीड़ा का नाश हो।
भगवान, इस पर कुछ कहने की अनुकंपा करें।

पूर्णानंद! बात ऊपर से देखने पर प्यारी लगती है, मगर बस ऊपर से ही देखने पर! थोड़ी गहरी खुदाई करोगे तो बात को थोथा पाओगे। ऊपर से तो अच्छी लगती है बात कि मैं अपने लिए राज्य चाहता हूं, न स्वर्ग, न मोक्ष। बिलकुल निरहंकारिता की बात है कि मुझे अपने लिए कुछ भी नहीं चाहिए। लेकिन एक बात पक्की है कि मैं अभी हूं। मुझे अपने लिए कुछ भी नहीं चाहिए, मगर मैं हूं। और जहां "मैं' है, वहां तुम लाख कहो कि मुझे कुछ भी नहीं चाहिए, कहीं भीतर चाह बनी ही रहेगी। "मैं' बिना चाह के हो ही नहीं सकता। असंभव। चाह तो "मैं' की सांस है। वह तो अहंकार की श्वास-प्रश्वास।
शायद यह प्रार्थना करने वाले ने होशियारी की है। ऐसी होशियारी की है, सुना होगा, पढ़ा होगा, शास्त्र निरंतर दोहराते हैं कि अपने लिए कुछ न मांगना अपने लिए मांगोगे तो न पाओगे, दूसरों के लिए मांगना, क्योंकि परोपकार ही पुण्य है, इससे ही मोक्ष मिलता है। अपने लिए मोक्ष भी मत मांगना, नहीं तो चूक जाओगे। तो आदमी होशियार है। वह सोचता है, मोक्ष पाना हो तो अपने लिए नहीं मांगना चाहिए, नहीं तो चूक जाएंगे।
मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, हम ध्यान करते हैं मगर लगता नहीं। मैंने कहा, किस लिए ध्यान करते हो? तो वे कहते हैं, इसलिए ध्यान करते हैं कि स्वास्थ्य मिले, आनंद मिले, सफलता मिले; इस लोक में भी, परलोक में भी यश मिले। उनको मैं कहता हूं, जब तक ये आकांक्षाएं हैं तब तक ध्यान नहीं हो सकेगा। क्योंकि आकांक्षाएं ही तो ध्यान में बाधा हैं। तो वे मुझसे पूछते हैं, उसे गौर से सुन लेना; जाग कर सुन लेना। वे कहते हैं, अच्छी बात है, अगर आकांक्षाएं छोड़ दें, फिर तो ध्यान लगेगा। आकांक्षाएं छोड़ दें तो मैं उनसे कहता हूं, निश्चित ध्यान लगेगा। महीने-पंद्रह दिन में वे फिर आ जाते हैं, वे कहते हैं कि आकांक्षाएं भी छोड़ दीं, ध्यान अभी भी नहीं लग रहा है। न ध्यान लग रहा है, न कोई लाभ हो रहा है! आकांक्षाएं छोड़ दीं, फिर भी कुछ लाभ नहीं हो रहा है! अब इनको कौन कहे कि अगर आकांक्षाएं ही छोड़ दीं तो अब लाभ की अपेक्षा क्या कर रहे हो? अब किस लाभ की अपेक्षा कर रहे हो? अब ध्यान हो तो ठीक, न हो तो ठीक, जब आकांक्षाएं ही नहीं हैं, तो हो गया तो ठीक है, नहीं हुआ तो ठीक है। अब अड़चन क्या है? मगर आकांक्षाएं छोड़ी उन्होंने इसलिए हैं ताकि आकांक्षाएं पूरी हो जाएं। ऊपर-ऊपर छोड़ी हैं, भीतर-भीतर बहने लगी हैं। अंतर्गर्भ में छिप गयीं, इससे मिट नहीं गयीं।
यह प्रार्थना जिसने की है, उसने सुना होगा कि अपने लिए मोक्ष चाहना न स्वर्ग। अपने लिए कुछ चाहना ही मत। नहीं तो कुछ भी न मिलेगा। अब पाना तो है, तो चलो, नहीं चाहेंगे। अगर यही शर्त है पाने की, तो यह शर्त भी पूरी करेंगे। तो वह कहता है, मैं अपने लिए न राज्य चाहता हूं, न स्वर्ग और न मोक्ष। फिर भी मैं कैसे बचा? मैं तो बिना चाह के बचता ही नहीं। तो ऊपर-ऊपर से लीपापोती कर ली, लेकिन भीतर मैं मौजूद और चाह भी मौजूद है। और जिन-जिन चीजों की चाह है, उन्हीं को इनकार किया है। यह भी तुम ख्याल रखना।
आदमी इनकार ही क्यों करता है किसी खास चीज को? अब जरा सोचो, यह कहता है, न मैं राज्य चाहता हूं, न स्वर्ग, न मोक्ष। ये तीन चीजें ही यह चाहता होगा--जाहिर है; यह अचेतन ने घोषणा कर दी। नहीं तो दुनिया में और बहुत चीजें हैं, इसने उनको इनकार नहीं किया। इसने नहीं कहा कि न पत्नी चाहता हूं, न बच्चे चाहता हूं, न धन चाहता हूं, न यश चाहता हूं--यह इसने नहीं कहा। ये इसकी आकांक्षाएं नहीं होगी।
मनुष्य की इस बुनियादी दुविधा तो तुम ठीक से समझ लेना--क्योंकि करीब-करीब सबकी भूल यही होती है।
जो आदमी जिस चीज को इनकार कर रहा हो, जरा गौर करना, कहीं भीतर उसी की चाह होगी। चेतन जो बोलता है, अचेतन उसके विपरीत होता है। चेतन एक बात कहता है, अचेतन के अर्थ बड़े और होते हैं।
न राज्य चाहता हूं। क्यों? राज्य को इनकार क्यों कर रहे हो, अगर चाहते ही नहीं? अगर कहीं कोई चाह ही नहीं है राज्य की, तो राज्य की बात ही क्यों उठी? न स्वर्ग चाहता हूं। जरूर चाह होगी। कहीं छुपी भीतर धारा बह रही होगी। कहीं दिल में यह भाव छुपा होगा कि कब स्वर्ग का मजा मिले! कब कल्पवृक्ष के नीचे बैठें। कब अप्सराएं मिलें भोगने को! कहीं कोई चाह जरूरत होगी। और मोक्ष भी नहीं चाहता, मुक्ति भी नहीं चाहता। बात तो इतनी बड़ी है कि अगर सच हो तो "मैं' बचता ही नहीं । जहां "मैं' नहीं बचता वहां न चाह बचती है, न चाह का विरोध बचता है।
और जहां "मैं' नहीं बचता, वहां यह जो प्रार्थना का दूसरा हिस्सा है--"मैं तो यही चाहता हूं कि दुख से तपे हुए प्राणियों की पीड़ा का नाश हो,' जिसका "मैं' मिट गया हो, उसे यह साफ दिखाई पड़ने लगता है कि लोग दुखी हैं अपने 'मैं' के कारण। और तो कोई दुख नहीं है जगत में। 'मैं' ही दुख है। "मैं' ही पीड़ा है। "मैं' ही है जो छाती में छुरी की तरह चुभा हुआ है। तो जिस व्यक्ति। को यह दिखाई पड़ गया कि मेरा "मैं' गया और जाते ही आनंदित हो गया, अब वह यह प्रार्थना नहीं कर सकता कि लोगों कि पीड़ा का अंत हो। अब तो यह लोगों को यह समझाएगा कि तुम अपनी पीड़ा का अंत हो। अब तो वह लोगों को यह समझाएगा कि तुम अपनी पीड़ा के लिए खुद जिम्मेवार हो, कोई इसका अंत नहीं कर सकता जब तक तुम इस "मैं' को न छोड़ दो। इसलिए बुद्ध ऐसी बा नहीं कहेंगे कि प्रार्थना करो। बुद्ध कहेंगे, तुम्हें समझ में आ गया, औरों को समझाओ, प्रार्थना का सवाल नहीं उठता। कौन मिटाएगा? कोई है कहीं बैठा आकाश मैं जो इनके दुख मिटा दे? और अगर बैठा होता तो कितनी सदियों से तो तुम प्रार्थना कर रहे हो, हवन कर रहे हो, यज्ञ कर रहे हो--क्या-क्या मूढ़ताएं नहीं कर रहे हो--अभी तक उसने सुना नहीं? बहरा है तुम्हारा परमात्मा बिलकुल? तुम्हारे ऋषि-मुनि थक गये चिल्ला-चिल्ला कर, पंडित-पुरोहित मंदिरों के घंटे बजा-बजा कर मर गये, उसके कानों तक कोई खबर नहीं पहुंची, जूं भी नहीं रेंगी, दुनिया का दुख बढ़ता ही चला गया। जितनी प्रार्थना का नहीं है, बोध का है। और बोध तो प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं का होना होगा।
तुम उत्तरदायी हो अगर दुखी हो। कोई दूसरा जिम्मेवार नहीं है। इसमें तो यह भ्रांति छिपी हुई है कि जैसे परमात्मा लोगों को दुख दे रहा है। इसलिए प्रार्थना कर रहे हैं कि भैया, अब दुख मत दो! अब बहुत हो गया! अब दुख देना बंद करो!  जैसे परमात्मा जिम्मेवार है। जिम्मेवार तुम हो, प्रार्थना किससे हो रही है? कि मैं तो यही चाहता हूं कि दुख से तपे हुए प्राणियों की पीड़ा का नाश हो। जैसे कोई और इनकी पीड़ा का नाश कर सकता है। इस भ्रांति को छोड़ो। तुम्हारी पीड़ा के जनक तुम हो, निर्माता तुम हो, सर्जक तुम हो, मिटा भी तुम्हें सकते हो, कोई और नहीं मिटा सकता है। यह तुम्हारी काल्पनिक पीड़ा है। तुम सड़ रहे हो, गल रहे हो, तुम नर्क में पड़े हो, लेकिन नर्क तुम्हारा ही निर्माण है। नर्क कहीं और नहीं है, कोई भौगोलिक अवस्था नहीं है--न स्वर्ग कोई भौगोलिक अवस्था है--नर्क अहंकार से भरे हुए मन का नाम है। और स्वर्ग अहंकार से शून्य मन का नाम है। जहां अहंकार नहीं, वहां सुख का की वर्षा हो जाती है। और जहां अहंकार है, वहां दुखों के अंबार लग जाते हैं। कौन इसको दूर करेगा? प्रत्येक व्यक्ति को ही अपना मुक्ता होना है। प्रत्येक व्यक्ति को ही अपने को मुक्ति देनी है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति ने ही अपने हाथ से अपनी जंजीरें ढाली हैं। कोई दूसरा तुम्हारी जंजीरें तोड़ भी दे, तुम फिर ढाल लोगे तब तक कि तुम्हें ही इस बात का बोध न हो जाए।
मैं संन्यासी उस व्यक्ति को कहता हूं, जिससे यह स्वीकार किया कि मैं उत्तर दाय हूं अपने सारे दुखों के लिए। और जब यह कोई स्वीकार कर लेता है कि मैं उत्तरदायी हूं, तो आधी समस्या तो हल हो ही गयी। कुछ न किया और आधी मंजिल आ गयी। जैसे ही तुमने यह स्वीकार कर लिया मैं जिम्मेवार हूं अपने दुखों को तुम्हें दूसरी बात भी साफ हो गयी कि चाहूं तो अभी छोड़ दूं ये सारे दुख। और चाहूं तो जो ऊर्जा मैंने दुखों में नियोजित की है, वही ऊर्जा सुखों में नियोजित कर दूं। मेरे हाथ का खेल है।
एक सूफी फकीर जब मरा तो उसके शिष्यों ने पूछा कि हम वर्षों से आपको देख रहे हैं--कुछ तो ऐसे शिष्य थे जो पचास साल से उसके साथ थे--उन्होंने कहा कि एक बात हमें चकित करती रही है, बार-बार हम पूछते भी रहे, आप हंसते हैं और टाल जाते हैं, आपको हैं, आपको हमने कभी दुखी नहीं देखा, कभी उदास भी नहीं देखा। जब देखा तब ताजा। जब देखा तब फूला की तरह खिले हुए। जब देखा तब आनंदित क्या रज है इसका? उस फकीर ने कहा, अब तो मैं मर ही रहा हूं, तुम्हें राज बता देता हूं। आज से पचास साल पहले में बहुत दुखी आदमी था। तुम कुछ भी नहीं हो। तुम क्या खाक! मेरे दुख का कोई अंत नहीं था। मैं चौबीस घंटे दुख में सड़ रहा था। मेरा ढंग ही ऐसा था कि उसमें से दुख ही निकल सकता था। अगर मैं गुलाब के पास भी खड़ा होता तो कांटे गिनता था, फूल नहीं देखता था, और जो आदमी कांटे गिनेगा, उसके हाथ कांटों से बिंध जाएंगे; लहूलुहान हो जाएगा। और जिसके हाथ लहूलुहान हो जाएंगे, आंखें आंसुओं से भर जाएंगी; उसको क्या खाक फूल दिखाई पड़ेंगे! उसे फूल दिखाई भी पड़ जाएं तो भरोसा न आएगा। क्योंकि सवाल यह उठेगा कि हजारों, कांटों में फूल खिल कैसे सकता है? जरूर मुझे कुछ भ्रम हो रहा है।
उसे फकीर ने कहा कि मैं, लोग तो कहते हैं कि हर काली बदली में भी एक रजत-रेखा होती है, "एवरी क्लाउड हैज ए सिलवर लाईन', मगर मेरी अपनी और ही धारणा थी। मेरी धारणा यह थी कि जहां भी रजत-रेखा होती है, उसके आसपास एक महान काली बदली होती है। वह मेरे देखने का ढंग था। लोग कहते हैं कि दो दिनों के बीच एक रात होती है, अरे गुजर जाएगी! और मैं सोचता था कि यह किस मूर्ख ने दुनिया बनायी, कि दो रातों के बीच एक छोटा-सा दिन, जो आया और गया--और फिर अंधेरी रात है! मैं दुखों को ही खोजता था। मैं दुख ही चुनता था। इसलिए दुखी था।
फिर एक दिन सुबह मैं उठा और मैंने कहा, कब तक मैं दुखी रहूंगा? कब तक दुखी रहना है? और उस सुबह मुझे यह साफ हो गया कि यह मेरे हाथ मैं है। मेरा गणित गलत है। मेरा हिसाब गलत है। मैं नकारात्मक को ही सोचता हूं। मैं निराशा को ही चुनता हूं। निषेध ही मेरे चिंतन का आधार है, विधेय नहीं। उस सुबह मुझे यह साफ हो गया कि अगर मुझे दुखी रहना है तो मैं दुखी रह सकता हूं और अगर मुझे सुखी रहना है तो मैं सुखी रह सकता हूं। तो मैंने सोचा, आज प्रयोग करके देखूं, आज सुखी ही रहूंगा, जीवन को सुख के ढंग से देखूंगा। और वह आखिरी दिन था मेरे दुख का। उस दिन मैं पूरे चौबीस घंटे सुखी रहा। मैं हैरान हो गया। तब से हर रोज सुबह उठता हूं और अपने से कहता हूं कि बोल, क्या इरादा है? आज सुखी होना है कि दुखी? और हमेशा मैं सुख के पक्ष में ही निर्णय लेता हूं। किसको दुखी होना है! पचास साल हो गये उस बात को गये, अब तो दुख मुझे यूं लगता है जैसे कभी था ही नहीं। कोई दुखस्वप्न देखा हो, जो कब का खो गया। या जैसे किसी कहानी में बात पढ़ी हो, जिससे मेरा कुछ लेना-देना नहीं।
मैं तुमसे यही कहना चाहता हूं। कोई तुम्हारा दुख मिटाएगा नहीं। तू इस भ्रांति को छोड़ दो। इसी भ्रांति के कारण तुम दुख में सड़ रहे हो। जा कर मंदिर में प्रार्थना करते हो कि प्रभु, हे तारणकर्ता, हरो मेरे दुख! तुम जरा गौर से तो सोचो, इसका मतलब यह हुआ कि उसने दिया होगा--तो ही हर सकता है। उसने बनाया होगा--तो ही मिटा सकता है। अगर बनाने वाला वह नहीं तो मिटाने वाला वह कैसे हो सकेगा? और अगर तुम बनाने वाले हो तो वह लाख मिटाये, तुम फिर वही कर लोगे। क्या भेद पड़ेगा? तो लोग कह रहे हैं कि हम तो पापी हैं, हम तो दुखी हैं और तुम तो महान हो और तुम्हारी करुणा महान है, दया करो, अब दुख से छुटकारा दिलाओ। मगर ये प्रार्थनाएं चलती रहती हैं और दुख भी बनता रहता है; कहां कोई प्रार्थना का परिणाम नहीं होता।
यह सवाल प्रार्थना का नहीं धंधा का है।
जो लोग दुखी हैं, वे स्वयं जिम्मेवार हैं। लेकिन आदमी ने हजार-हजार तरकीबों से अपनी जिम्मेवारी टालने की कोशिश की है। तरकीबें बदलती रही, आदमी वही का वही, दुख वही का वही। पहले आदमी कहता था, विधि का विधान है, क्या करें, किस्मत में लिखा है। यह तरकीब हुई। करते तुम हो और कहते हो, विधाता ने लिख दिया, अब हम करें क्या? खोपड़ी में लिख दिया! खोपड़ी में कुछ भी नहीं लिखा हुआ है। खोपड़ी बिलकुल खाली है। कोई लिखावट नहीं है। मैंने लाखों खोपड़ियां पढ़ी हैं, कोई लिखावट नहीं है। मगर तरकीब थी पुरानी कि विधि का विधान है, विधाता ने लिख दिया। विधाता क्यों लिखेगा? विधाता कोई पागल है, विक्षिप्त है कि तुम्हारा दुख लिख देगा कि प्रभु की मर्जी! प्रभु है यह? कि तुम्हें सताने में रस लेने वाला कोई पागल है? कि उसके कारण इतना सारा दुख हां रहा है।
फिर यह बात पुरानी पड़ गयी। तो कार्ल माक्र्स ने कहा कि समाज की व्यवस्था! क्या कर सकता है आदमी? आर्थिक व्यवस्था! राजनैतिक व्यवस्था! यह समाज है जो दुख पैदा कर रहा है। लोगों को यह बात जंची। लोगों को हमेशा यह बात जंचती है कि कोई और जिम्मेवार हो। यह बात अखरती है कि कोई कहे कि तुम जिम्मेवार हो। बुद्ध पसंद नहीं पड़े, जीसस पसंद नहीं पड़े, सुकरात पसंद नहीं पड़ा, लेकिन कार्ल माक्र्स पसंद पड़े। आधी दुनिया कम्युनिस्ट हो गयी। और बाकी दुनिया भी कम्युनिस्ट होने के रास्ते पर है। देर-अबेर की बात है। आज नहीं कल, कल खतम हो गया, पुराना हिसाब कि कर्मों के कारण हम फल भोग रहे हैं, पिछले जन्मों में बुरे कर्म किये थे, इसलिए अब फल भोग रहे हैं। तो पिछले जन्मों में कर्म किये थे? वह उसके पिछले जन्म में, उसके कारण। और उस जन्म में क्यों किये थे? वह उसके पिछले जन्म में। तो जरा यह भी तो सोचो कि पहला जन्म कभी हुआ था, उसमें क्यों बुरे काम किये थे? उसके पहले तो कोई जन्म न था। मगर ये तरकीबें टालने की अपने कंधे से किसी तरह बात दूसरे पर चली जाए। यह दुख को बचाने का उपाय है, यह सुरक्षा है, यह कवच है।
माक्र्स ने समझा दी नयी तरकीब। माक्र्स समझता है कि उसने कोई क्रांति ला दी! कुछ क्रांति नहीं लायी, सिर्फ शब्द बदल दिये। विधि-विधान न रहा, कर्म का सिद्धांत न रहा, समाज की आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था जिम्मेवार रहो गयी। आदमी फिर वहीं के वहीं। तो रूस में सोचते हो लोग सुखी हो गये हैं? चीन में सुखी हो गये हैं? जरा भी सुखी नहीं हो गये हैं। हां, इतना जरूर हो गया है कि अब अपने दुख की बात भी नहीं कर सकते हैं--इतने दुखी कर दिये गये हैं। कि अब दुख है, यह कहने की भी हिम्मत नहीं। अब दीवालों को कान हैं। अब जिसने कहा दुख है, उसका फैसला कर दिया जाएगा। उसका खात्मा कर दिया जाएगा। अब तो कितने ही दुखी रहो, कहना तो यही कि अब सुख ही सुख है। अपनी पत्नी से भी पति डरता है कहने में, क्योंकि पत्नी भी स्त्रियों के कम्युनिस्ट दल की सदस्या है। अपने बच्चों से बाप डरते हैं कहने में, क्योंकि बच्चे बच्चों की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं। वे जाकर खबर दे देंगे। और हर एक को समझाया जाता है, बच्चों को समझाया जाता है कि साम्यवाद सबसे ऊपर है, तुम्हारे माता-पिता अगर कोई खिलाफ बात करते हों, फौरन खबर करो। पत्नियों को समझाया जाता है कि पति तो सांयोगिक बात है, असली चीज साम्यवाद है, समाजवाद है; सर्वोपरि बात वही है। अगर पति कुछ खिलाफ बात करते हों, खबर करो। हर एक घर में जासूस बैठ गये। दुख भारी है। लेकिन कोई कुछ कह नहीं सकता, कोई कुछ बोल नहीं सकता।
मैंने सुना कि कुत्तों की एक प्रदर्शनी थी पेरिस में। रूसी कुत्ते भी भाग लेने आए थे। फ्रेंच कुत्तों ने पूछा कि भई, रूस के कुछ हालचाल कहो! बड़ी मुश्किल से रूसियों से मिलना होता है! तो कुत्तों ने कहा, आनंद ही आनंद है। सुख ही सुख है। स्वर्ग है। लेकिन जब प्रदर्शनी खत्म होने लगी तो रूसी कुत्तों ने फ्रेंच कुत्तों से कहा कि कोई तरकीब बताओ कि अब हमें रूस न जाना पड़े। उन्होंने कहा, अरे, स्वर्ग ही स्वर्ग है, सुख ही सुख है, रूस क्यों नहीं जाना चाहते? उन्होंने कहा, और सब तो ठीक है, भौंकने की आजादी बिलकुल नहीं। अब क्या खाक करें सुख का! जहां भौंक ही न सकते हों! और कुत्ते कस सबसे बड़ा सुख कि भौंकने की आजादी होनी चाहिए। विचार-स्वतंत्रता! उसने कहा, और सब तो ठीक है--अरे मक्खन खिलाओ, मगर खा कर भी क्या करेंगे जब भौंक ही नहीं सकते! आत्मा को ही मार डाल रहे हो। अब जाने की इच्छा नहीं है। यहां कम से कम भौंकने की आजादी तो है। वहां गले में सुरसुरी चलती रहती है, मगर दबाए बैठे रहो! संयम साधना पड़ता है। भौंक नहीं सकते।
रूस से लोग बाहर क्या निकल जाते हैं, फिर लौटना नहीं चाहते। कैसे सुख है यह? जो बाहर निकल गया, वह फिर पीछे नहीं लौटता
इस तरह सुख हो नहीं सकता। यह बात फिर टाल दी गयी। सुख के लिए एक आधारभूत नियम ख्याल में लो, मैं जिम्मेवार हूं अपने दुख का, मैं निर्माता हूं, मैं स्रष्टा हूं। न कोई पिछला जन्म, न कोई भाग्य, न कोई भगवान, न कोई समाज, न कोई व्यवस्था। मैं, मेरा अहंकार, मेरी मूढ़ता, मेरा अज्ञान, मेरी मूर्च्छा! कष्ट होता है इस बात को स्वीकार करने में-- पीड़ा होती है इस बात को स्वीकार करने में। मगर इस पीड़ा को जो स्वीकार कर लेता है उसके जीवन में क्रांति की शुरुआत है। क्योंकि यह आधा पहले। जैसे यह समझ में आ गया, तब तुम्हारे हाथ में है; बदल दो! बदल दो जिंदगी का ढंग फिर। मोड़ दो नाव। कोई तुम्हें रोकने वाला नहीं है।
ऐसे ही मैंने आनंद जाना है।
जिंदगी के सब पहलू तुम्हारे हाथ में हैं, तुम मालिक हो। यह मैं अपने अनुभव से कहता हूं। यह मैं किसी शास्त्र की बात नहीं दोहरा रहा हूं, यह मेरे स्वयं का अनुभव है। और इसलिए मैं जरा भी स्वीकार नहीं कर सकता, कोई लाख, कहे कि कोई और जिम्मेवार है। मैं भी दुखी था, जैसे तुम दुखी हो, जैसे कोई भी दुखी है, लेकिन जिस दिन यह समझ में आ गयी कि मैं ही जिम्मेवार हूं, उसी दिन से क्रांति हो गयी। उसी दिन से महल में उजाला हो गया। उसी दिन से दीया जल गया।
यह प्रार्थना ऊपर-ऊपर से तो अच्छी लगती है, पूर्णानंद--
न त्वहं कामये राज्यम न स्वर्ग न स्वर्ग पूर्णानंद
कामये दुख:तप्तानाम प्राणिनाम आर्तिनाशम।।
मैं अपने लिए राज्य नहीं चाहता, न स्वर्ग, न मोक्ष, मैं तो यह चाहता हूं कि दुख से तपे हुए प्राणियों की पीड़ा का नाश हो। यह किसी अज्ञानी की प्रार्थना है। किसी ने भी कही हो, जो जानता नहीं, उसने कही है। नहीं तो प्रार्थना करने का सवाल नहीं है।
और दूसरी बात ख्याल रखो कि तुम अगर स्वयं अभी मुक्त नहीं हुए हो, तुमने अगर स्वयं अभी अपने भीतर का स्वर्ग नहीं जाना है, अगर तुमने अभी तक स्वयं के भीतर का राज्य नहीं पाया है, तो तुम खाक किसी और को बोध दे सकोगे! जिसके पास आनंद है, वही आनंदित होने का सूत्र दे सकता है। और जिसके पास प्रकाश है, वही तुम्हें भी प्रकाशित होने का मार्ग सुझा सकता है। क्योंकि उसके जीवन में कैसे अंधकार प्रकाश बना, वह राज को जानता है; वह उस कीमिया को पहचानता है; वह तुम्हें भी कीमिया दे सकता है। प्रार्थनाएं सिर्फ अज्ञानी करते हैं। प्रार्थनाओं से कुछ भी नहीं होता।
मेरे जीवन-दर्शन में प्रार्थना का दूसरा ही अर्थ है। मेरे जीवन-दर्शन में प्रार्थना का अर्थ है, वह व्यक्ति प्रार्थना करने में समर्थ है जो परम आनंद को उपलब्ध हो गया है। उसकी प्रार्थना क्या होगी? उसकी प्रार्थना होगी: धन्यवाद, अनुग्रह का भाव; इस समस्त अस्तित्व के प्रति एक परम अनुग्रह। वह झुक जाएगा। इतना दिया है! चांदत्तारों के उसकी झोली भर दी। सारा आकाश उसका हो गया। सब उसका है। प्रतिपल स्वर्णमय हो उठा है। हर घड़ी रहस्य के नये द्वार खुलते चले जाते हैं। उसकी प्रार्थना मांग नहीं होगी। हमारी प्रार्थनाएं तो मांग होती हैं।
प्रार्थना शब्द का मतलब ही मांगना हो गया। मांगने वाले को हम प्रार्थी कहते हैं। और ठीक ही, क्योंकि प्रार्थना लोग करते ही इसलिए हैं कि कुछ मांगना है। अब यह आदमी भी यूं तो कह रहा है कि न मुझे राज्य चाहिए, न स्वर्ग, न मोक्ष लेकिन दूसरों को दुखों से मुक्त करो। मांग तो जारी है। और इस भांति में मांग कर रहा है दूसरों के लिए कि इस बहाने अपना मोक्ष तय हो जाएगा। न हुआ मोक्ष तय तो कम से कम स्वर्ग तो हो ही जाएगा। न हुआ स्वर्ग तो कम से कम राज्य तो पक्का ही है। क्योंकि कहा है कि परोपकार पुण्य है। परोपकार कर नहीं रहा, सिर्फ प्रार्थना कर रहा है परमात्मा से कि तुम परोपकार करो। परमात्मा को थोड़ी सलाह दे रहा! जैसे परमात्मा को खुद बोध न हो। जैसे इन सज्जन को परमात्मा को बोध देना आवश्यक हो। ये जरा परमात्मा को जगा रहे हैं कि कुछ करो! क्या सोए पड़े हो! उठो, लोग दुख से भरे हैं, इनको मुक्त करो! इनको दुख से छुटकारा दिलाओ! और फिर स्वभावतः जब मैंने तुम्हें इतने कीमती सलाह दी, तो अब कहना क्या है, मतलब तुम खुद ही समझ लो! कि स्वर्ग, राज्य, मोक्ष...जो मर्जी हो! भीतर छिपी हुई वासना है। तुम्हारी प्रार्थना वासना ही हो सकती है। सिर्फ बुद्धों की प्रार्थना वासना नहीं होती, वह धन्यवाद होती है। और जब प्रार्थना धन्यवाद होती है, तब उसमें सौंदर्य और, उसकी महिमा और!

तीसरा प्रश्न:

भगवान, मैं एक पच्चीस वर्षीय अविवाहित युवक हूं। बचपन से मेरे मन में जीवन को महानता के शिखरों पर ले चलने के आदर्श उथल-पुथल मचाते रहे हैं। बाहु बांधे, सीना ताने, गेरुवा वस्त्रों में लिपटे स्वामी विवेकानंद की जगमगाती मूर्ति मेरे मानस-पटल पर सदा अंकित रहती है और उन जैसा बनने की तथा सम्पूर्ण जगत में धर्म-पताका फहराने की भावनाएं मेरे हृदय में हिलोरें लेती हैं। लेकिन जब मैं अपनी वस्तुस्थिति को देखता हूं तो निराश हो जाता हूं कि ऐसा कुछ भी संभव नहीं है। वे जन्मजात महान पुरुष थे, मैं उनके समकक्ष कभी खड़ा नहीं हो सकता।
अब मैं आपके यहां आया हूं। क्या मेरी मनोकामना पूरी होगी? मेरे जैसे अनेकों और भी मेरे मित्र हैं, जिनको यह भाव हैं और जो जीवन में कुछ सार्थक करना चाहते हैं। भगवान, आपकी क्या देशना है?

खिलेश! एक उम्र होती तब आदमी का मन सपने देखने में बड़ा रस लेता है। तुम भी सपने देख रहे हो। विवाहित हो जाओ! सब चौकड़ी भूल जाओगे! विवाह अदभुत औषधि है। इस औषधि ने किस-किस के छक्के नहीं छुड़ा दिये! सब भूल-भाल जाओगे।
प्रेमिका ने अपने प्रेमी के सीने पर सिर रखते हुए बड़े प्रेम से कहा, "डाघलग, मैं शादी के बाद तुम्हारे सारे दुख अपना लूंगी।'
"पर मुझे तो कोई दुख है नहीं' प्रेमी ने कहा।
"मैं अब की नहीं बल्कि शादी के बाद की बात कर रही हूं', प्रेमिका ने उत्तर दिया
एक बार शादी तो हो जाए।
अविवाहित हो, इसलिए इस तरह की व्यर्थ की बातें मन में उठ रही हैं। और ये सब बातें व्यर्थ की हैं, बुनियादी रूप से गलत हैं। एक-एक बात गलत है।
तुम कहते हो, "बचपन से मेरे मन में जीवन को महानता के शिखरों पर ले चलने के आदर्श उथल-पुथल मचाते रहे हैं।' यह सब अहंकार की भाषा है। यह महानता और यह आदर्श और शिखरों पर चढ़ना, यह सब अहंकार है! लेकिन जवानी में अहंकार बड़ी प्रगाढ़ता से पकड़ता है। और बचपन तो सपनों में बीतता ही है। बचकानेपन का नाम सपने देखने के सिवाय और कुछ भी नहीं जवान होते-होते वे ही सपने तुम्हारे भीतर जो उथल-पुथल मचाने लगते हैं। अच्छे-अच्छे शब्द तुम उन्हें पहना देते हो: आदर्श! मगर शिखरों पर पहुंचने की इतनी आकांक्षा क्यों? घाटियों में क्या खराबी है? घाटियों का अपना सौंदर्य है।
महान बनने की इतनी आकांक्षा क्या है? दूसरों से श्रेष्ठ अपने को सिद्ध करना है। और जो दूसरों से अपने को श्रेष्ठ करना चाहता, वह सिर्फ अभिमान से पीड़ित है और कुछ भी नहीं। लेकिन इसे स्मरण रखना कि हमारा सारा जीवन का जो-जो गलत है, वह बड़े-बड़े अच्छे सुंदर वस्त्रों में आता है, ताकि पहचान में न आ सके। मुखौटे लगा लेना है। हर युवक अहंकार की महत्वाकांक्षा से पीड़ित होता है। और उसको अच्छे वस्त्र पहना देता है।
तुम कहते हो, "बाहु बांधे, सीना ताने, गेरुवा वस्त्रों में लिपटे स्वामी विवेकानंद की जगमगाती हुई मूर्ति मेरे मानस-पटल पर सदा अंकित रहती है और उन जैसा बनने की तथा सम्पूर्ण जगत में धर्म-पताका फहराने की भावनाएं मेरे हृदय में हिलोरें लेती हैं।' तुम्हें धर्म का कुछ पता है? कि तुम धर्म की पताका ही फहरा दोगे! तुम्हें यह भी मालूम है कि विवेकानंद को भी धर्म का कुछ पता था? कि पताका फहराते रहे! तुम्हें धर्म का पता नहीं, तुम कैसे पहचानोगे कि विवेकानंद को भी धर्म का पता था या नहीं? हां, सीना ताने, बाहुएं फैलाए, अकड़ कर खड़े हुए विवेकानंद की तस्वीर तुमने देखी होगी, वह प्रभावित की होगी। तो वैसा ही करना हो तो दंड-बैठक लगाओ, भैया! धर्म से क्यों धर्म ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा? अंडा-मांस-मछली खाओ...विवेकानंद मांसाहारी थे; और दंड-बैठक में भरोसा था।
और यह भी ख्याल रखना, तैंतीस साल की उम्र में मर गया। ज्यादा दंड-बैठक लगा ली, सो जल्दी खतम हो गये! पहलवान अक्सर गलत वक्त पर मरते हैं और बुरी बीमारियों से मरते हैं। तुमने गामा का नाम सुना? मरे क्षय रोग से। भयंकर सड़ कर मरे। दुनिया के सारे पहलवानों की दुर्गति होती है। होनी ही है। क्योंकि मारो जबरदस्ती! भुजाओं को जबरदस्ती किसी भी तरह खींचतान करो। तस्वीरें तुम देखते हो? पंजाब-केसरी और मिस्टर यूनिवर्स, जरा उनकी तस्वीरें देखते हो? ये तुम्हें स्वाभाविक आदमी की तस्वीरें मालूम पड़ती है? ये आदमी की तस्वीरें मालूम पड़ती हैं कि जंगली जानवरों की? और इनकी बुद्धि' का कभी तुम हिसाब रखते हो? अब जैसे मुहम्मद अली जैसे आदमी के पास बुद्धि जैसी भी कोई चीज होती है? अरे, बुद्धि ही हो तो घूंसेबाजी में जिंदगी कोई गंवाए! मारे और मार खाए! सार क्या है? मगर तुम्हें विवेकानंद की तस्वीर बहुत जंची। भारत के सारे युवकों को विवेकानंद की तस्वीर बहुत जंचती है। क्योंकि विवेकानंद ने भारत के अहंकार को खूब पोषित किया। बड़ी घोषणा कर दी सारे जगत में कि भारत महान है, भारत का धर्म महान है। और धर्म का विवेकानंद को कोई पता नहीं था! धर्म का पता रामकृष्ण को जरूर था। रामकृष्ण वहीं हैं जहां बुद्ध, जहां महावीर, जहां कृष्ण, जहां पतंजलि। विवेकानंद की कोई हैसियत नहीं है। मगर तुम रामकृष्ण से प्रभावित नहीं। क्योंकि यह बिचारा न तो पहलवान जैसा लगता; सीधा-सादा आदमी,ग्रामीण, इससे प्रभावित होने वाला है! यह विवेकानंद लट्ठ लिये खड़े हैं! धर्म की पताका फहरा रहे हैं! ये हिंदू अहंकार के प्रतीक हो गये। ये हिंदू दंभ के समर्थक हो गये। और इन्होंने जो कहा है, उसमें कुछ भी मूल्यवान नहीं है। उसमें कुछ भी अनुभव की बात नहीं है। हां, शास्त्रों की तोतारटंत बातें हैं। और शास्त्रों के लिए आधुनिक तर्क देने की कोशिश है। शास्त्रों को नया तार्किक लिबास पहनाने की चेष्टा है। मगर बचकानी। क्योंकि खुद का कोई अनुभव नहीं है।
विवेकानंद को मरने तक कोई परम अवस्था का बोध नहीं हो गया था लेकिन अच्छे संगठन थे। और तुम जैसे युवकों की ही कतार इकट्ठी कर ली थी। न उन्हें पता था धर्म का, न उन युवकों को कोई पता था धर्म का। इसलिए रामकृष्ण की जो महिमापूर्ण देशना थी, वह विवेकानंद के कारण नष्ट हो गयी। रामकृष्ण को बहुत गलत आदमी मिल गया। इस दुनिया में बहुत बार ऐसा हुआ है--जीसस के साथ। ऐसा हुआ, गलत आदमी मिल गये; कोई और उपलब्ध न थे; जो मिले, उन्हीं से बात करनी पड़ी। और उन लोगों ने ईसाइयत को जन्म दिया। जो कि जीसस से बिलकुल विपरीत है। जिसका जीसस से कोई संबंध नहीं है।
महावीर को गलत लोग मिल गये। महावीर थे क्षत्रिय--जैनों के चौबीस तीर्थंकर क्षत्रिय हैं। जैन धर्म मूलतः: ब्राह्मणों की अकड़ और दंभ के खिलाफ क्षत्रियों की बगावत थी। लेकिन महावीर के जो ग्यारह गणधर हैं, उनके प्रमुख शिष्य, वे ग्यारह के ग्यारह ब्राह्मण पंडित हैं। उन्होंने महावीर की सब स्थिति पर पानी फर दिया। महावीर ने क्रांति की, उन्होंने अंगारा बुझा दिया। वह वापिस पुराना ब्राह्मणवाद लौट आया। कुछ फर्क न पड़ा; महावीर को उन्होंने मटियामेट कर दिया।
कभी-कभी संयोग से ऐसा हुआ है कि ठीक व्यक्ति मिले। जैसे, लाओत्सू को च्वांगत्सु जैसा शिष्य मिला; जो उसी कोटि का है जिस कोटि के लाओत्सु। और च्वांगत्सु को लीहत्सू जैसा शिष्य मिला, जो उसी कोटि का है जैसा च्वांगत्सु। तो तीन पीढ़ियों तक ज्योति यूं जली जैसी जलनी चाहिए। बुद्ध को बड़े प्यारे शिष्य मिले। मंजुश्री, सारिपुत्त मौदगलान, महाकाश्यप, अदभुत शिष्य मिले! और इसके कारण कुछ सदियों तक--कम से कम पांच सौ वर्षों तक बुद्ध-धर्म एक जीवित धर्म बना रहा। बुद्ध के जाने के बाद भी कोई न कोई बुद्ध होता रहा। लेकिन उस बात को भी अब बहुत समय हो गया, दो हजार साल बीत गये--वह पांच सौ वर्ष को भी दो हजार साल बीत गये--अब तो सड़े-गले लोगों के हाथ में बुद्ध-धर्म भी पड़ा हुआ है। मगर रामकृष्ण को बिलकुल ही गलत लोग मिले। विवेकानंद उनके प्रधान बन गये। विवेकानंद मूलतः एक राजनैतिक व्यक्ति हो सकते थे। उनके पास राजनैतिक होने की क्षमता की। कायस्थ थे।
कायस्थ शब्द बड़ा प्यारा है। काया में स्थित। सो निश्चित ही सीना ताने, मुट्ठियां बांधे, गेरुवा वस्त्रों में लिपटे, डंडा पकड़े--कायस्थ का यह लक्षण ही होने वाला है। यह कोई स्वस्थ आदमी नहीं थे, कायस्थ थे। शरीर में स्थित थे। मगर तुम शरीर से ही प्रभावित होते हो, क्योंकि तुम भी शरीर में स्थित हो। अखिलेश, तुम कायस्थ तो नहीं?
लेकिन ध्यान रखना, कायस्थ ही शूद्र का दूसरा नाम है। जो भी शूद्र है, वह कायस्थ। और जो भी कायस्थ है, वह शूद्र। वह किसी जाति में पैदा हो, किसी वर्ग में पैदा हो, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। काया में स्थित आदमी का नाम शूद्र है। शूद्र का मतलब ही यह होता है कि जिसको अभी अपने भीतर के ब्रह्म का बोध नहीं हुआ।
विवेकानंद को कोई बोध नहीं है। रामकृष्ण को बोध है। मगर मजा ऐसा है कि लोग रामकृष्ण से प्रभावित नहीं हैं। रामकृष्ण ने प्रभावित होने के लिए तुम्हें ध्यानस्थ होना होगा, तब तुम्हें रामकृष्ण समझ में आएंगे। विवेकानंद से प्रभावित होने के लिए तुम्हें ध्यान में जाने की कोई जरूरत नहीं है; बस, तुम्हारे अहंकार में लपटें उठनी चाहिए, तुम विवेकानंद से प्रभावित हो जाओगे। और विवेकानंद की बातें दो कौड़ी की हैं, रामकृष्ण की बातें हीरों जैसी है--हीरों से भी तौलो तो हीरों से ज्यादा वजनी है।
रामकृष्ण के जीवन का बड़ा दुर्भाग्य यह है कि विवेकानंद के हाथ में उनकी परंपरा पड़ गयी। और जो सत्य एक बार फिर उतरा था, वह खो गया। इसलिए अब रामकृष्ण के पीछे चलने वाले जो संन्यासी हैं, उनका रामकृष्ण से कुछ लेना-देना नहीं है, वह सब विवेकानंद से प्रभावित हैं। विवेकानंद का कोई भी मूल्य नहीं है। तर्कशास्त्री हैं। कहां रामकृष्ण--तर्कातीत, और कहां विवेकानंद--तर्कशास्त्री! कहां रामकृष्ण--सारे धर्मों को अनुभव किये हुए!
रामकृष्ण ने बड़ा अनूठा प्रयोग किया इस पृथ्वी पर। सारे धर्मों का अनुभव किया। हिंदू की तरह साधना, की, मुसलमान की तरह साधना की, बौद्ध की तरह साधना की। ऐसा कभी किसी ने भी नहीं किया था। क्योंकि एक मार्ग से जो पहुंच गया, अब वह क्यों दूसरे मार्गों पर जाए? लेकिन रामकृष्ण ने बड़ी अनुकंपा की। पहुंच कर भी वह फिर लौट-लौट कर घाटी में आए और दूसरे मार्गों से चढ़े, ताकि यह दुनिया से कह सकें अनुभव के आधार पर कि सभी रास्ते एक ही शिखर पर पहुंचा देते हैं। ऐसा बात महात्मा गांधी अधिकारी नहीं हैं कहने के, क्योंकि महात्मा गांधी किसी रास्ते से भी शिखर पर नहीं पहुंचे हैं अभी। रामकृष्ण अधिकारी हैं कहने के। और यह कोई सिर्फ बौद्धिक समन्वय की बात नहीं थी कि बैठ कर और सोच लिया कि सभी धर्म समान हैं। अच्छी बात लगती है कि सभी धर्म समान हैं, सभी धर्मों में सत्य है; उदारता होती है, सहिष्णुता मालूम होती है। रामकृष्ण का यह निजी अनुभव था कि सभी धर्मों से व्यक्ति वहीं पहुंच जाता है। यह पहुंच कर, प्रयोग करके।...कैसे-कैसे अनूठे प्रयोग किये!
बंगाल में सखी-संप्रदाय है, जिसके मानने वाले मानते हैं के हम सखियां हैं और परमात्मा कृष्ण। तो वे रात को जब सोते हैं, तो स्त्रियों के कपड़े पहन लेते हैं और पास में कृष्ण की मूर्ति रख कर सोते हैं, जैसे कोई पत्नी अपने पति को छाती से लगा कर सोए। रामकृष्ण ने उस पंथ की भी साधना की। और जब एक अनूठी घटना घटी, अकल्पनीय घटना घटी। क्योंकि रामकृष्ण जैसा व्यक्ति,...वे तो सब सखियां बनउव्वल थीं; वे जो सखी-संप्रदाय के मानने वाले थे, वे तो रात में अपना कपड़ा बदल कर--कोई देखे भी नहीं और धर्म की क्रिया भी पूरी हो गयी--और कृष्ण की मूर्ति लगा कर सो गये। मगर जानते तो वे भलीभांति हैं कि वे पुरुष हैं और यह मूर्ति ही है, मगर एक परंपरा है, बाप-दादे भी करते रहे तो वे भी कर रहे हैं। लेकिन रामकृष्ण ने ने तो जो भी किया, समग्रता से किया। वे तो दिन में भी फिर स्त्रियों के ही कपड़े पहनते थे। फिर क्या रात और दिन का फर्क! फिर तो दिन में भी कृष्ण की मूर्ति को अपनी छाती से लगाए रखते थे।
और एक अनूठा चमत्कार हुआ, जिसका चिकित्सकों ने भी अध्ययन किया।...अभी रामकृष्ण को हुए बहुत दिन नहीं हुए अंग्रेज चिकित्सकों ने भी जाकर अध्ययन किया।...रामकृष्ण के स्तन बढ़ गये। स्त्रियों जैसे हो गये। तुमने कुछ तस्वीरें देखी होंगी रामकृष्ण की, जिनमें स्तन बिलकुल स्त्रियों जैसे हैं। ऐसी भाव की दशा थी कि जो सोचा वह होने लगा। इतना ही नहीं, रामकृष्ण को मासिक धर्म शुरू हो गया। जो कि बड़ी अपूर्व घटना है! और रामकृष्ण चलते भी तो स्त्रियों जैसे चलने लगे। आसान नहीं है स्त्रियों जैसा चलना। बड़ा अभ्यास करना पड़े, तब भी मुश्किल है, क्योंकि शरीर की रचना अलग-अलग है। स्त्री के पेट में बच्चे के लिए गर्भ का एक विशेष स्थान है, उसके कारण उसकी हड्डियां, मांस-मज्जा पेट की अलग ढंग की हैं। पुरुष की अलग ढंग की हैं। इसलिए। स्त्री जब चलती है तो वह पुरुष जैसा नहीं चल सकती। न पुरुष स्त्री जैसा चल सकता है। लाख स्त्री को पुरुष जैसे कपड़े पहना दो, मगर वह चलेगी तो स्त्री जैसी ही। और पुरुष को तुम स्त्रियों जैसे कपड़े पहना दो, वह चलेगा तो पुरुष जैसा ही। क्योंकि उसकी हड्डी, मांस-मज्जा की व्यवस्था तो नहीं बदल जाती। उसकी अस्थि-पंजर अलग ढंग का है। दोनों को दौड़ा दो, फौरन पता चल जाएगा कौन स्त्री है, कौन पुरुष। स्त्री की दौड़ा से ही पता चल जाएगा कि यह स्त्री है।
लेकिन रामकृष्ण ऐसे चलने लगे, ऐसे दौड़ने लगे, जैसे स्त्रियां दौड़ती हैं। चाल से पहचाना मुश्किल हो गया। उनकी आवाज भी बदल गयी। वह पुरुष की आवाज है, उसमें भेद पड़ गया। स्त्रियों जैसी हो गयी। बारी हो गयी। नाजुक हो गयी। छह महीने उन्होंने साधना की और छह महीने बाद उन्होंने घोषणा की कि यह मार्ग भी सत्य है।
मार्ग छोड़ देने के बाद भी छह महीने तक उनके स्तन बड़े रहे, धीरे-धीरे-धीरे छोटे हुए; और धीरे-धीरे उनकी चाल बदली और धीरे-धीरे उनकी वाणी वापस आयी और धीरे-धीरे उनका मासिक धर्म बंद हुआ।
विवेकानंद के जीवन में कोई अनुभव नहीं है। हां, विवेकानंद ने सुंदर वक्तव्य दिये। मगर सुंदर वक्तव्य देने में क्या रखा है! कोई मूल्य नहीं। जरा-सी भी जिसके पास बुद्धि है, दे सकता है। असली सवाल है अनुभव का।
छोटा-सा अनुभव विवेकानंद को समाधि का हुआ था, इसका उल्लेख है। मगर उसका भी उन्होंने गलत उपयोग किया तत्क्षण।
रामकृष्ण के आश्रम में, दक्षिणेश्वर में कालू नाम का एक भक्त था। गरीब आदमी, देहाती आदमी। और भक्ति उसकी ऐसी थी कि बेचारे को दिन भर लग जाता था। क्योंकि उसने अपने कमरे में सब देवी-देवताओं की मूर्तियां रख छोड़ी थीं। जो मिल गयी मूर्ति, जिसने कह दिया कि यह देवता की मूर्ति है, वही ले आए और रखता जाए! उसके कमरे में खुद को सोने को जगह नहीं रही थी--बाहर सोता था। क्योंकि कमरे में तो देवी-देवताओं ने अड्डा जमा लिया था। और वह सबकी पूजा करता और भाव से पूजा करता। ऐसा नहीं था कि जल्दी-जल्दी ली थाली और इधर से उधर घुमा कर दो मिनिट में बाहर आ गये। नहीं तो तैंतीस करोड़ देवताओं की भी पूजा करनी होती तो पांच मिनिट में निपट जाती है। सबके सामने जरा-जरा सी थाली घुमायी--कोई रोक तो सकता नहीं कि ऐ, अब कहां जा रहे हो, पूरी करो! राम-राम कहते या मंत्र गुनगुनाते हुए सबके सामने थाली घुमा दी, जरा-सा, सबको सुगंध दे दी,सबके सामने जल्दी से प्रसाद लगा दिया, एक-एक फूल सबकी खोपड़ी पर रख दिया, निपटारा हो गया। मगर वह बड़े भाव से पूजा करता--एक-एक मूर्ति की। कभी-कभी शाम हो जाती दिन भर पूजा में निकल जाता। और जब पूजा पूरी हो तभी तो भोजन करे बेचारा! और कभी-कभी ऐसा होता, क्योंकि कभी दिन छोटे होते हैं, कभी दिन बड़े होते; जब दिन छोटे होते तो पूजा में ही दिन निकल जाता, तो रात को वह भोजन न करता। विवेकानंद को बड़ी हंसी आती थी इस पर यह कैसा मूर्ख है! कई दफा उसको समझाया कि तू किस पागलपन में पड़ा है। अरे, इन पत्थरों में कुछ भी नहीं है। मगर उसकी आंखों से आंसुओं की धार बहने लगती। वह कहता, तुम्हें न होगा मगर मुझे तो बड़ा आनंद आता है। विवेकानंद कहते फेंक इनको गंगा में। अरे, बचाना ही है तो एक बचा ले! मगर वे कहता कि सबसे मेरा प्रेम है और सभी तो उसके रूप हैं, किसको फेंकूं, किसको बचाऊं? मैं निर्णय न कर पाऊंगा।
विवेकानंद को रामकृष्ण ने ध्यान की विधि दी थी कि साक्षीभाव से अपने विचारों को देखते रहो। वह उस ध्यान की विधि को कर रहे थे, एक दिन ऐसा घटा कि साक्षीभाव की थोड़ी-सी झलक आयी, विचार समाप्त हो गये। जरा-सी देर को पर्दा जैसा हटा। जैसे झरोखा खुला। एक किरण आयी। मगर देखते हो, उस किरण के आते ही उनको क्या ख्याल आया? उनको तत्क्षण ऐसा लगा कि इस समय अगर मैं कालू को विचार संप्रेषित कर दूं कि उठा अपनी सारी मूर्तियों को और बांध और फेंक दे गंगा में, तो जरूरत वह फेंक देगा, क्योंकि यह समाधिस्थ व्यक्ति का विचार बड़ा बलशाली हो जाता है। सो उन्होंने तत्क्षण यह किया...समाधि का यह उपयोग किया! शायद इससे ज्यादा मूढ़तापूर्ण उपयोग कभी किसी व्यक्ति ने ध्यान का नहीं किया है। होना तो यह चाहिए था कि इस किरण के देखने के क्षण में उनको कालू का अर्थ समझ में आ जाता।...कालू भक्त था! परम भक्त था! और उसके अनुभव की दुनिया थी! वह गदगद था और आनंदित था! क्यों दूसरा उसमें बाधा दे? उसके जीवन में रसधार बह रही थी! मगर उनको बड़ी अड़चन थी। रामकृष्ण को कोई अड़चन न थी, उन्होंने कभी कालू को नहीं कहा था, बल्कि विवेकानंद को बहुत बार समझाया था कि कभी कालू को छेड़ना मत। वह सीधी-सादा आदमी है, वह अपनी मस्ती में मस्त है, उसके लिए यही रास्ता है। तुम उसके साथ तर्क-वितर्क मत करना। उसका नुकसान मत कर देना! मगर उनको जैसे ही यह पहला अनुभव हुआ, जरा-सा द्वार खुला समाधि का, कि उन्होंने तत्क्षण विचार-प्रेषण किया--यह उपयोग किया!--कहा कि ऐ काल, बांध पोटली अपने सब देवी-देवताओं की और फेंक गंगा में!
रामकृष्ण बाहर पंचवटी में बैठे थे। उन्होंने देखा यह सब हो रहा है, कि विवेकानंद के कमरे से यह विचार प्रेषित किया गया है। वह भागे! कालू ने सब पोटली बांध कर, जा ही रहा था गंगा की तरफ, रोका कि कहां जाता है? उसने कहा, सब बेकार है! कोई सार नहीं। आज बात समझ में आ गयी कि गंगा में फेंक आऊं। विवेकानंद ठीक कहते थे। आपने मुझे कभी नहीं कहा। रामकृष्ण ने कहा, तू जरा ठहर! यह तेरा विचार नहीं है। यह तू नहीं बोल रहा है। तू रुक, मैं अभी तुझे बताता हूं।
जा कर विवेकानंद के द्वार पर दस्तक दी, दरवाजा खुला और विवेकानंद को कहा कि यह तूने क्या किया? तूने क्यों कालू को यह विचार भेजा? यह विचार संप्रेषित क्यों किया? यह समाधि का उपयोग है! यह दुरुपयोग हो गया। तो बस, अब इससे आगे समाधि तेरी बढ़ेगी नहीं! मैं तेरी चाबी रखे लेता हूं।
तब कालू को समझा में आया कि यह उसका विचार नहीं था। वह बेचारा अपनी पूजा कर रहा था, सरलचित्त आदमी, वह विचार प्रेषित हो गया, संप्रेषित हो गया। उसके भीतर पहुंच गया। और चूंकि इसमें थोड़ा-सा समाधि का बल था, ध्यान का बल था, वह एकदम आच्छादित हो गया। उससे कहा रामकृष्ण ने, जा, रख अपनी मूर्तियां, सजा! यह देख विवेकानंद का विचार था। और विवेकानंद से कहा, क्षमा मांग कालू से। क्षमा मंगवायी। और विवेकानंद से कहा कि बस, यही तेरा ध्यान रुका रहेगा। अब आगे नहीं बढ़ेगा।
और वही विवेकानंद का ध्यान रुका रहा।
मरने के तीन दिन पहले अपने एक पत्र में उन्होंने लिखा है अपने भक्त को, कि मैं समाधि को अनुभव नहीं कर पाया हूं, अब तक अनुभव नहीं कर पाया, हूं, उस दिन जो रामकृष्ण ने चाबी रख ली थी, वह फिर मुझे नहीं मिली। फिर कहां खो गयी है वह चाबी, मुझे पता नहीं चलता। लेकिन मैंने दुरुपयोग किया था, मुझे सजा उसकी मिलनी ही चाहिए!
तुम विवेकानंद से नहीं प्रभावित हो, तुम अपने अहंकार के लिए आभूषण चाहते हो, इसलिए विवेकानंद से प्रभावित हो। और तुम कहते हो, "उन जैसा बनने की तथा सम्पूर्ण जगत में धर्म-पताका फहराने की भावनाएं हृदय में हिलोरें लेती हैं।' कृपा करो, इन हिलोरों को शांत करो! कुछ वे पताका फहरा गये, कुछ तुम पताका फहरा देना! उनके पताका फहराने से क्या होगा? और तुम्हारे पताका फहराने से क्या हो जाएगा? ये सब राजनैतिक आकांक्षाएं हैं। ये नेता बनने की आकांक्षाएं हैं। इनका धर्म से कोई संबंध नहीं--तुम्हें धर्म का क्या पता? बड़ा मजा यह है कि पताका फहराने का सुख है, मगर धर्म का पताका नहीं है। पहले धर्म तो जानो! फिर पताका अपने से फहर जाएगी फहरनी होगी। नहीं फहरनी होगी नहीं फहरेगी, तुम्हें क्या लेना-देना! तुम्हारा धर्म तुम्हें अनुभव हो जो।
अपने को पहचानो, इन व्यर्थ की बकवासों में न पड़ो। और अच्छा ही है कि तुम विवेकानंद नहीं बन सकते, नहीं तो नकली...असली भी कुछ कीमत के न थे, तो नकली तो किस कीमत के होंगे! वह ही कार्बन कापी थे, तुम कार्बन कापी की कार्बन कापी होओगे। मौलिक होने चाहिए व्यक्ति को। अपने को खोजो कि मैं कौन हूं। किसी और जैसे बनने की कोशिश न करो। और फिर इससे अपराधभाव पैदा होता है। तुम कहते हो कि वे जन्मजात महान पुरुष थे। कोई दुनिया में जन्मजात महापुरुष नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति समान क्षमता लेकर पैदा होता है। परमात्मा में जगत में कोई अन्याय नहीं है। कोई असमानता नहीं है। तुम उतनी ही क्षमता लेकर पैदा होते हो, जितना बुद्ध, जितने महावीर, जितने कृष्ण। जरा भी कम नहीं, रत्ती भर कम नहीं। लेकिन अपनी संभावनाओं को खोजना होता है। ध्यान में लगो, धर्म की पताका वगैरह फहराने का उपद्रव न करो! नहीं तो झंडा ऊंचा रहे हमारा, बस उसी तरह के आदमी हो जाओगे।
अब तुम कहते हो, "अब आपके यहां आया हूं, क्या मेरी मनोकामना पूरी होगी?' कभी नहीं! तुम तो गलत जगह आ गये। यहां मैं किसी के अहंकार को भरने के लिए किसी तरह का सहारा नहीं देता। यहां तो तुम्हारा अहंकार टूटेगा, यहां तो तुम्हारा झंडा बिलकुल गिरा दिया जाएगा--डंडे सहित। यह पागलपन छोड़ो! नेता बनने का आग्रह छोड़ो।
नेता समझाने लगे, सुनो बुलाकी दास,
सुख और अकाल से, मत हो कभी उदास।
मत हो कभी उदास, धैर्य रक्खो सुख-दुख में,
कुछ भी नहीं असंभव, इस वैज्ञानिक युग में।
ले लो ऐनक हरे रंग के शीशे वाली,
जिधर देखिए उधर दिखाई दे हरियाली।
अब तुम्हें पताका ही फहरानी हो तो बात अलग। तो फिर नेता हो जाओगे। और नेता की क्या स्थिति बेचारों की! यहां देखते हो झंडा उठाए कितने लोग घूमते फिरते थे, सब नेता हो गये और क्या परिणाम मुल्क को भोगना पड़ रहा है।
बंदर एक बता रहा, रख कर मुंह पर हाथ,
चुप्पी से बनते चतुर, औंधू-भौंधू नाथ।
औंधू-भौंधू नाथ, सुनो साहब-सरदारो,
एक चुप से हार जाएं वाचाल हजारों।
"काका' करो इशारों से "स्मग्लिंग' का धंधा,
गूंगा बनकर छूट, तोड़ कानूनी फंदा।
दूजे बंदर ने कहा--जो अब तक था शांत,
हमने भी अपना रखे, बदल दिया सिद्धांत।
बदल दिया सिद्धांत, कान पर रखो हथेली,
करने दो निंदा करते हैं चेला-चेली।
अवसरवादी बनो, परिस्थिति देखो जैसी
मंत्री-पद के आगे दल की ऐसीत्तैसी।
बंदर बोला तीसरा--करके आंखें बंद,
रिश्वत खाओ प्रेम से, भज राधे गोविंद।
भज राधे गोविंद, माल उनका सो अपना,
वेद-शास्त्र कह रहे, जगत को जानो सपना।
डूब गया परमार्थ, स्वार्थ से भरा समंदर,
समय देख कर बदल गये, "बापू' के बंदर।

आज इतना ही।