कुल पेज दृश्य

रविवार, 30 अप्रैल 2017

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-02

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
प्रवचन-दूसरा-(जीवंत धर्म)
श्री रजनीश आश्रम, पूरा, प्रातः, दिनांक २२ जुलाई, १९८०

पहला प्रश्न: भगवान, मनुस्मृति में यह श्लोक है:
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतो वधीत।।
(मारा हुआ धर्म मार डालता है; रक्षा किया हुआ धर्म रक्षा करता है। इसलिए धर्म को न मारना चाहिए, जिससे मारा हुआ धर्म हमको न मार सके।)

सहजानंद!
यह श्लोक प्रीतिकर है। ऐसे तो मनुस्मृति बहुत कुछ कचरे से भरी है, लेकिन खोजो तो राख में भी कभी-कभी कोई अंगारा मिल जाता है। कचरे में भी कभी-कभी कोई हीरा हाथ लग जाता है।
मनुस्मृति निन्यानबे प्रतिशत तो कभी की व्यर्थ हो चुकी है। भारत की छाती से उसका बोझ उतर जाए, तो अच्छा। उसमें ही जड़ें हैं भारत के बहुत से रोगों की। भारत की वर्ण-व्यवस्था; अछूतों के साथ अनाचार; स्त्रियों का अपमान, जिसकी अंतिम परिणति स्वभावतः बलात्कार में होती है; ब्राह्मणों की उच्चता का गुणगान--जिसका परिणाम पांडित्य के बढ़ने में तो होता है, लेकिन बुद्धत्व के विकसित होने में नहीं।

लेकिन फिर भी कभी-कभी कोई सूत्र हाथ लग जा सकता है, जो अपूर्व हो। यह उन थोड़े से सूत्रों में से एक है। इस सूत्र को ठीक से समझो, तो मैंने जो अभी कहा कि निन्यानबे प्रतिशत मनुस्मृति कचरा है, वह भी समझ में आ जाएगी बात--इस सूत्र को समझने से।
यह सूत्र निश्चित ही मनु का नहीं हो सकता; मनु से प्राचीन होगा। क्योंकि मनु ने जो भी कहा है, वह इसके बिलकुल विपरीत है। मनु के सारे वक्तव्य धर्म की हत्या करने वाले वक्तव्य हैं। मनु जैसे व्यक्तियों ने ही तो धर्म की हत्या की है।
यह सूत्र किसी बुद्धत्व को उपलब्ध व्यक्ति से आया होगा। लेकिन पुराने समय में एक ही ग्रंथ में सब कुछ समाहित कर लिया जाता था। जैसे अभी भी विश्वकोश निर्मित करते हैं--इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका--तो सभी कुछ, जो भी खोजा गया है, जो भी आज की समझ है, उसका संकलन कर लेते हैं। ऐसे ही पुराने शास्त्र संकलित थे। इसलिए उन्हें संहिताएं कहा जाता है।
वेद को हम संहिता कहते हैं। संहिता का अर्थ होता है--संकलन। वेद में किसी एक व्यक्ति के वचन नहीं हैं। अनेक-अनेक ऋषियों के वचन हैं। और उनके साथ-साथ बहुत से अंधों के वचन भी हैं! इसलिए वेद को पढ़ते समय बहुत होश चाहिए। क्योंकि अंधे हमेशा आंख वालों से ज्यादा होते हैं। हीरे तो मुश्किल से ही मिलते हैं। कंकड़-पत्थर तो गली-कूचे, जगह-जगह मिल जाते हैं। उनकी कोई खदानें थोड़े ही खोजनी पड़ती हैं।
मनुस्मृति का अर्थ भी यही होता है कि जो-जो मनु उस समय स्मरण कर सके, जो-जो चारों तरफ व्याप्त था, जो-जो हवा में रोशनी छूट गई थी, सदियों पुरानी हो सकती है; मनु उसके लेखक नहीं हैं, केवल स्मृतिकार हैं। मनु उसके रचयिता नहीं हैं, सिर्फ संग्राहक हैं। उन्होंने उस सब को स्मृति में बांध दिया है, जो बिखरा पड़ा था।
यह सूत्र मनु का नहीं हो सकता। और अगर यह सूत्र मनु का है, तो फिर पूरी मनुस्मृति मनु की नहीं हो सकती । यह मैं इसलिए कहता हूं--आंतरिक साक्षी के आधार पर। यूं तो मनुस्मृति में यह सूत्र है, इसलिए शोधकर्ता मेरे विरोध में हो सकते हैं। लेकिन मेरे देखने-सोचने-समझने के ढंग और हैं। शोधकर्ता के वे ढंग नहीं हैं।
अंतःसाक्षी का अर्थ होता है: यह वक्तव्य इतना विपरीत है बाकी सारे वक्तव्यों से कि या तो यह ठीक होगा या फिर बाकी सब ठीक हो सकते हैं। इस एक को हटा लो, तो मनुस्मृति में से सार की बात ही निकल जाती है।
और इस सूत्र को समझना जरूरी है। फिर किसी का हो। किसने कहा, यह बात मूल्यवान नहीं है; मगर जो कहा है, अपूर्व है, अद्वितीय है। शायद भूल-चूक से मनु से ही निकल गया हो! कभी-कभी तो विक्षिप्त भी पते की बातें कह जाते हैं! कभी-कभी पागल भी बड़े दूर की खोज लाते हैं। कहावत है: अंधे को अंधेरे में दूर की सूझी!
कभी-कभी टटोलते-टटोलते भी अंधे को भी दरवाजा हाथ लग जाता है। अपवाद है वह, नियम नहीं।
यह भी हो सकता है कि मनु ने ही यह सूत्र कहा हो। लेकिन मनु ने किसी ऐसी अवस्था में कहा होगा, जो साधारण मनु से बिलकुल भिन्न है। कोई झरोखा खुल गया होगा; किसी मस्ती में होंगे। कोई क्षण ध्यान का उतर आया होगा। मगर मनु की प्रकृति के अनुकूल नहीं है यह।
मनु की गिनती बुद्धों में नहीं है। वे भारतीय नीति-नियम के सर्जक हैं। उन्होंने भारत को नैतिक व्यवस्था दी। और नैतिक व्यवस्था अकसर ही राजनीति का अंग होती है। राजनीति में भी जो नीति शब्द है, वह ध्यान रखने योग्य है। व्यक्ति की नीति होती है, तो उसको हम नैतिकता कहते हैं। और राज्य की नीति होती है, तो उसको राजनीति कहते हैं। दोनों में तालमेल है। लेकिन दोनों ऊपर-ऊपर होती हैं, सतही होती हैं। धर्म होता है आंतरिक--भीतर का दीया जले तो। फिर उसके अनुसार जो जीवन में क्रांति होती है, वह क्रांति किन्हीं नियमों के आधार पर नहीं होती, किसी शास्त्र के अनुसार नहीं होती। इसलिए उस क्रांति की कोई भविष्यवाणी नहीं हो सकती। कोई नहीं कह सकता कि उस क्रांति का अंतिम निखार क्या होगा। एक बात सुनिश्चित जरूर कही जा सकती है कि वह क्रांति कभी भी पुनरुक्ति नहीं करती। बुद्ध जैसा व्यक्ति फिर दुबारा उस क्रांति से पैदा नहीं होता। न महावीर जैसा, न कृष्ण जैसा, न कबीर जैसा, न मोहम्मद जैसा। उस क्रांति से हमेशा मौलिक प्रतिभा का जन्म होता है। पुनरुक्ति नहीं होती। इतनी बात भर कही जा सकती है।
नीति हमेशा पुनरुक्ति करती है। नीति तो यूं है, जैसे कार्बन कापी करते हैं हम। किसी के पीछे चलो। किसी की मान कर चलो। अपने ऊपर जैसे वस्त्र ओढ़ते हो, ऐसे ही शास्त्रों को ओढ़ लो, तो तुम नैतिक हो जाओगे, लेकिन धार्मिक नहीं।
नीति ऐसे है, जैसे अंधा आदमी प्रकाश के संबंध में बातें करने लगे। बातें करने में क्या अड़चन है! प्रकाश के संबंध में अंधा आदमी सारी जानकारी इकट्ठी कर सकता है। लेकिन फिर भी उसने प्रकाश देखा नहीं है। और जिसने देखा नहीं, उसकी कितनी ही बड़ी जानकारी हो, हिमालय के पहाड़ जैसा ढेर हो जानकारी का, तो भी दो कौड़ी उसका मूल्य है। और जिसने प्रकाश देखा है, शायद प्रकाश के संबंध में और कुछ भी न जानता हो, तो भी क्या बात है। प्रकाश देख लिया, तो सब जान लिया। न समझे प्रकाश का भौतिकशास्त्र, न समझे प्रकाश का रसायनशास्त्र, न समझे प्रकाश का गणित, पर करना क्या है! फूल देख लिए, रंग देख लिए, इंद्रधनुष देख लिए, तितलियों के पंख देख लिए, हरियाली देख ली, लोगों के चेहरे देख लिए, चांदत्तारे देख लिए, सूर्योदय-सूर्यास्त देख लिए, रोशनी के अनंत-अनंत खेल और लीलाएं देख लीं--अब क्या करना है, कि न समझे प्रकाश का विज्ञान!
लेकिन कुछ मूढ़ प्रेम को समझते रहते हैं, प्रेम नहीं करते! प्रकाश को समझते रहते हैं, आंख नहीं खोलते! उधार, बासी बातों को गुनते रहते हैं, कभी अपने जीवन की किरण को जगाते नहीं। कभी अपने सोए हुए प्राणों को पुकारते नहीं।
यह सूत्र जिससे भी आया हो, आंख वाले से आया होगा। और मनु सबूत नहीं देते--आंख वाले का। आंख वाला आदमी, आदमी आदमी को ब्राह्मण और शूद्र में नहीं बांट सकता। आंख वाले आदमी के लिए सारे विभाजन गिर जाते हैं। न कोई काला रह जाता, न कोई गोरा। न कोई ब्राह्मण, न कोई शूद्र। न कोई स्त्री, न कोई पुरुष।
यूं हुआ कि कुछ शराबी युवक धनाडय थे, एक सुंदर वेश्या को लेकर और खूब शराब लेकर जंगल गए। पूर्णिमा की रात थी; मजा करेंगे। खूब डट कर उन्होंने शराब पी और नशे में ऐसे धुत हो गए कि वेश्या के सारे कपड़े छीन कर उसे नग्न कर दिया। वेश्या तो घबड़ा गई, उनका नशा देखकर, कि इन्होंने कपड़े ही छीने, यही बहुत है। ये चमड़ी तक नोच ले सकते हैं। उनको नशे में धुत्त देखकर वह भाग खड़ी हुई। कपड़े तो उसके पास थे नहीं, तो नंगी ही भाग गई वह। उसने सोचा: जान बची और लाखों पाए। अब किसी तरह पहुंच ही जाऊंगी घर, रात का वक्त है, नंगी भी पहुंचती तो किसको पता चलेगा!
सुबह-सुबह भोर होने के करीब होती होगी, जब ठंडी हवाएं चलीं, उन युवकों को थोड़ा होश आया। वे रात भर उन कपड़ों को ही छाती से लगाए रहे थे! होश आया, तो पता चला: वेश्या तो नदारद है। किसी के हाथ में साड़ी, किसी के हाथ में चोली है, किसी के हाथ में कुछ है। वेश्या तो नदारद है; वेश्या तो किसी के हाथ में नहीं है! वे उसकी तलाश में निकले।
जिस रास्ते से वे आए थे, वह एक ही रास्ता था, उसी रास्ते पर उन्हें याद आया कि जब वे आए थे, तो उन्होंने एक संन्यासी को वृक्ष के नीचे बैठा देखा था। शायद वह अब भी बैठा हो! अगर वह बैठा हो, तो वह पता दे सकता है, क्योंकि इसी रास्ते से भागी होगी। और तो कोई रास्ता नहीं है।
वह संन्यासी कोई साधारण संन्यासी न था; स्वयं गौतम बुद्ध थे। वे बैठे थे अब भी। डोल रहे थे अपनी मस्ती में। सुबह की ताजी हवाएं उठने लगी थीं; फूलों की सुगंध बिखरने लगी थी; पक्षियों के गीत गूंजने लगे थे। सारा वन-प्रांत सूर्योदय की प्रतीक्षा कर रहा था। अभिनंदन कर रहा था। बंदनवार सजाए बैठा था।
उन्होंने जाकर उनको हिलाया। बुद्ध ने आंखें खोलीं। उन्होंने पूछा कि आपने जरूर यहां से एक नग्न स्त्री को भागते देखा होगा। बहुत सुंदर है; युवा है। ऐसा नाक-नक्श है, जैसे अप्सरा हो। क्या उर्वशी होगी! क्या मेनका होगी! सोने जैसी देह है उसकी। नागिन जैसे उसके बाल हैं। मछलियों जैसी उसकी आंखें हैं! कवियों ने जिसका वर्णन किया है, सब उसमें मौजूद है। और नग्न भागी है, जरूर आपने देखा होगा।
बुद्ध ने कहा, तुम अगर मुझे पहले ही कह गए होते, क्योंकि तुम जब गए थे, तब मैंने भीड़-भाड़ देखी थी; शोरगुल सुना था कि तुम जा रहे हो। तुम अगर तभी मुझे कह गए होते, कि जरा ध्यान रखना, खयाल रखना, तो मैं खयाल रखता। कोई निकला जरूर था, कोई गुजरा जरूर था, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि वह स्त्री थी या पुरुष! और यूं भी नहीं कि मैंने न देखा हो। मगर जब से मेरे भीतर की वासना गिर गई, तब से मेरे भीतर यह फासला भी नहीं उठता कि कौन स्त्री है, कौन पुरुष। तुम मुझे क्षमा करो। तुमने कहा होता, तो मैं खयाल करता; ध्यानपूर्वक देखता। और अब तुम मुझसे यह भी मत पूछो कि वह सुंदर थी या असुंदर। जब से वासना गई, तब से कौन सुंदर है--कौन असुंदर है! वह तो हमारे ही भीतर की भूख होती है, जो सौंदर्य-असौंदर्य के मापदंड बनाती है; स्त्री-पुरुष के मापदंड बनाती है। कोई निकला जरूर था। किस दिशा में गया, यह भी मत पूछो, क्योंकि मैं अपने में डूबा बैठा हूं, मैं किस-किस की फिक्र करूं कि कौन किस दिशा में जा रहा है! मैं भीतर की दिशा में जा रहा हूं। और सब दिशाएं बाहर हैं। मैंने बाहर की दिशाएं छोड़ दीं, तो अब बाहर की दिशाओं में जाने वाले लोग...। यूं कान में भनक मेरे पड़ी थी कि कोई गुजरा है, जरूर गुजरा है। मगर यूं तो यहां से हिरण भी गुजरते हैं, हाथी भी गुजरते हैं; कभी सिंह भी गुजर जाता है। यह जंगल है। कोई गुजरा जरूर, मगर मैं तुम्हें ठीक-ठीक न कह सकूंगा--कौन गुजरा!
यह बुद्धत्व की दशा है, जहां स्त्री और पुरुष का भेद भी गिर जाता है। लेकिन मनु के लिए ये भेद गिरे नहीं। स्त्री नरक का द्वार है। यह पुरुष का दंभ!
स्त्रियों की जब चर्चा करते हैं मनु जैसे लोग, तो उसके भीतर की हड्डी, मांस-मज्जा, मवाद, खून, इत्यादि-इत्यादि की बातें करते हैं, जैसे खुद के शरीर में सोना-चांदी भरा हो!
यह बड़े आश्चर्य की बात है कि ये महात्मागण स्त्रियों के शरीर का वर्णन करने में जैसे बेहूदे, भद्दे, अभद्र शब्दों का उपयोग करते हैं, उस समय बिलकुल भूल ही जाते हैं कि खुद भी स्त्री से पैदा हुए हैं! उनकी देह भी उसी मांस-मज्जा से बनी है, स्त्री की ही मांस-मज्जा से बनी है। तुम्हारे पिता का दान तो ना-कुछ के बराबर है। वह तो काम एक इंजेक्शन कर सकता है, जो तुम्हारे पिता ने किया! वह कोई खास काम नहीं है। और भविष्य में इंजेक्शन ही करेगा। जानवरों की दुनिया में तो इंजेक्शन करने ही लगा है।
लेकिन तुम्हारी देह की पूरी की पूरी जीवन ऊर्जा तो स्त्री से आती है, मां से आती है। तुम्हारी देह में वही सब है, जो स्त्री की देह में है। लेकिन स्त्री की देह को गाली देते वक्त, गंदगी का ढेर बताते वक्त पता नहीं महात्मा भूल ही जाते हैं कि उनकी भी देह उसी से बनी है; वैसी ही गंदगी से। फिर गंदगी क्या गंदगी का वर्णन कर रही है! फिर पुरुष की देह में ऐसी क्या खूबी है, ऐसा कौन-सा स्वर्ग है--जो स्त्री की देह नरक का द्वार है!
स्त्री की जैसी अवमानना मनु ने की है, और फिर बाबा तुलसीदास तक मनु के पीछे चलने वालों की जो कतार है, वह सब उन्हीं गालियों को दोहराती रही है। शूद्रों को तो पशुओं से भी गया-बीता माना है। गाय की हत्या करो, तो महापाप है। लेकिन शूद्र की हत्या में कोई पाप नहीं बताया! जैसे गाय से भी ज्यादा गर्हित, गिरा हुआ शूद्र है। यह मनु जैसे ही लोगों की बात मान कर तो राम ने एक शूद्र के कान में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया, क्योंकि उसने वेद के वचन सुन लिए थे! पशु-पक्षी सुनते रहते हैं, तो किसी को एतराज नहीं। कुत्ते-बिल्लियां सुनते रहें, चूहे-मच्छड़ सुनते रहें--किसी को एतराज नहीं। कितने चूहों ने नहीं सुना होगा वेद! सुना क्या--पचा गए! चूहों के हाथ जब भी वेद पड़ गया है, तो पचा ही गए उसको। कितने चूहों के कान में राम ने सीसा पिघलवा कर भरवा दिया! और ऋषि-मुनि जहां वेद का पाठ कर रहे हों, वहां तुम सोचते हो--मच्छड़ भाग जाते हैं! वहीं गुन-गुन मचाते हैं।
महावीर ने तो अपने मुनियों के लिए कहा है कि कैसी जगह में बैठ कर ध्यान करना: ऊंची-नीची जगह न हो; कंकड़-पत्थर वाली न हो; मच्छड़ों इत्यादि से भरी हुई न हो--यह भी उसमें उल्लेख है! निश्चित ही महावीर को मच्छड़ों ने खूब सताया होगा। निश्चित सताया होगा। एक तो नंग-धड़ंग आदमी और फिर भारतीय मच्छड़! और ये क्या फिक्र करें कि कौन महावीर है और कौन कौन है! ऐसा शुभ अवसर ये छोड़ें! ऐसी मीठी देह; ऐसा सुस्वादु भोजन ये छोड़ें! अरे तीर्थंकर मिलता हो भोजन को, तो फिर ये साधारण मनुष्यों की फिक्र करें! महावीर को बहुत सताया होगा। सताया होगा, इसीलिए उल्लेख किया है अपने जैन मुनियों को कि जहां मच्छड़ इत्यादि हों, वहां ध्यान करने मत बैठना। नहीं तो वे ध्यान करने नहीं देंगे।
बुद्ध ने भी उल्लेख किया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि मच्छड़ ध्यानियों के सदा से दुश्मन रहे हैं! राक्षस वगैरह ध्यान में बाधा डालते हैं कि नहीं, यह तो कपोल-कल्पना मालूम पड़ती है, मगर मच्छड़--यह यथार्थ मालूम होता है।
मैं सारनाथ में मेहमान था। मच्छड़ मैंने बहुत देखे, लेकिन जैसे सारनाथ में हैं, वैसे कहीं नहीं हैं। हो भी क्यों न--वह पहला स्थल है जहां बुद्ध ने पहला प्रवचन दिया। उसकी महिमा ही और है। यूं तो जबलपुर जब मैं रहता था, तो जबलपुर में भी बड़े मच्छड़ हैं। तो मैं सोचता था कि जबलपुरी मच्छड़ का कोई मुकाबला नहीं। मगर जब सारनाथ गया, तब मुझे पता चला कि मच्छड़ हैं तो सारनाथ के!
भिक्षु जगदीश काश्यप के घर में मैं मेहमान था। रात हम दोनों ने किस तरह गुजारी--मत पूछो! वे तो अभ्यासी भी थे, क्योंकि वहीं रह रहे थे वर्षों से। मैंने उनसे पूछा कि इतने मच्छड़ों के बीच कैसे गुजार रहे हो? उन्होंने कहा, मत पूछिए। पूछिए ही मत यह बात! खुद भगवान बुद्ध एक ही बार आए; एक ही रात रुके हैं सारनाथ! फिर नहीं आए। हालांकि और सभी स्थानों पर वे कई बार गए। वैशाली, कहते हैं, चालीस बार गए। मगर सारनाथ, बस एक ही बार आए!
तो मैंने कहा, अब मैं भी समझा राज कि क्यों एक ही बार आए! मैं भी दुबारा आने वाला नहीं हूं! और दुबारा गया भी नहीं। उन्होंने बहुत निमंत्रण दिए; मैंने कहा, क्षमा करो। सारनाथ छोड़ कहीं और मिलना हो जाएगा। मगर सारनाथ नहीं आना है! दिन में भी मच्छड़दानी के भीतर बैठे रहो! बाहर निकले कि वे तैयार हैं! तो बुद्ध बेचारे कोई मच्छरदानी वगैरह लेकर चलते भी नहीं थे! उन दिनों शायद मच्छड़दानी थी भी नहीं। और होती भी, तो संन्यासी मच्छड़दानी लेकर चले, तो बदनाम हो जाए! मेरा जैसा कोई संन्यासी हो, उसकी बात और--जो बदनामी से डरता ही नहीं! एक मच्छड़दानी नहीं, कई मच्छड़दानी लेकर चल सकता हूं; पूरी दुकान लेकर चल सकता हूं! कोई हर्जा नहीं।
लेकिन राम ने शूद्र के कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया। यह मनु के ही इशारों पर सारा काम चला। इस देश में जो आज भी अत्याचार हो रहा है शूद्रों पर उसमें मनु महाराज का हाथ है।
अभी भी मनुस्मृति हिंदू-मानस का आधार-स्तंभ है। अभी भी हम उससे छूट नहीं पाए।
मगर यह सूत्र बड़ा प्यारा है। यह सूत्र अकेला ही होता, तो मनुस्मृति अदभुत होती। मगर यह सूत्र तो दबा पड़ा है। यह सहजानंद ने कैसे खोज लिया, यह भी आश्चर्य है! क्योंकि मनुस्मृति--बहुत से सूत्र हैं, बहुत श्लोक हैं। पूरे पढ़े होंगे, तब कभी इस सूत्र पर हाथ लगा होगा। मगर यह सूत्र...जब मैं मनुस्मृति को देख रहा था--उलट-पलट रहा था--तब मेरी आंखों में भी जगमगाते दीए की तरह बैठा रह गया था। मैं इसे भूला नहीं। इस सूत्र का अर्थ तुम समझो। अर्थ बिलकुल मनु के विपरीत जाता है। अर्थ ब्राह्मणों के विपरीत जाता है। अर्थ पंडितों के विपरीत जाता है। पुरोहितों के विपरीत जाता है। क्योंकि धर्म को मारता कौन है!
यह सूत्र कहता है: धर्म एव हतो हन्ति--मारा हुआ धर्म मार डालता है। निश्चित ही इसके प्रमाण ही चारों तरफ दिखाई पड़ेंगे। हिंदू धर्म ने हिंदुओं को मार डाला है। मुसलमान धर्म ने मुसलमानों को मार डाला है। जैन धर्म ने जैनों को मार डाला है। बौद्ध धर्म ने बौद्धों को मार डाला है। ईसाई धर्म ने ईसाइयों को मार डाला है। यह पृथ्वी मरे हुए लोगों से भरी है। इसमें मुरदों के अलग-अलग मरघट हैं। कोई हिंदुओं का, कोई मुसलमानों का, कोई जैनों का--वह बात और--मगर सब मरघट हैं!
मारता कौन है धर्म को! तुम सोचते हो कि अधार्मिक लोग धर्म को मारते हैं, तो गलत। अधार्मिक की क्या हैसियत है कि धर्म को मारे।
तुमने कभी देखा: अंधेरे ने आकर और दीए को बुझा दिया हो! अंधेरे की क्या हैसियत कि दीए को बुझाए! अंधेरा दीए को नहीं बुझा सकता। अंधेरा धोखा भी नहीं दे सकता आलोक होने का। इसलिए इस बात को बहुत गांठ में बांध लेना, भूलना ही मत कभी।
इस दुनिया में धर्म को खतरा अधर्म से नहीं होता; झूठे धर्म से होता है। असली सिक्कों को खतरा कंकड़-पत्थरों से नहीं होता; नकली सिक्कों से होता है। नकली सिक्के चूंकि असली सिक्कों जैसे मालूम पड़ते हैं, इसलिए असली सिक्कों को चलन के बाहर कर देते हैं।
अर्थशास्त्र की यह मान्य धारणा है, और उचित मालूम होती है: कि असली सिक्कों को चलन के बाहर करने की क्षमता केवल नकली सिक्कों में होती है। तुम्हारी जेब में भी अगर सौ-सौ रुपए के दो नोट हों--एक नकली और एक असली--तो तुम पहले किसको चलाओगे? तुम पहले नकली को चलाओगे। क्योंकि असली तो कभी भी चल जाएगा। तुम नकली को किसी भी बहाने चलाओगे। अखबार ही खरीद लोगे, चाहे पढ़ना हो या न पढ़ना हो! कुछ भी खरीद लोगे--रुपए दो रुपए की चीज, चार-छह आने की चीज। सौ रुपए का नकली सिक्का चल जाए! और जिसके हाथ में वह पड़ेगा, जैसे ही वह पहचानेगा कि नकली है, वह भी पहला काम यही करेगा कि इससे निपटारा हो। क्योंकि नकली को रखना खतरे से खाली नहीं है। चले न चले, तो जल्दी चला दो। असली तो कभी चल सकता है। इसलिए जब नकली सिक्के बाजार में होते हैं, तो असली सिक्के तिजोड़ियों में बंद हो जाते हैं, और नकली सिक्के चलने लगते हैं।
यही नियम धर्म के जगत में भी लागू होता है। बुद्धों को चलन के बाहर कर देते हैं--पंडित-पुरोहित। ये नकली सिक्के हैं। ईसा को चलन के बाहर कर दिया--ईसाई पादरियों ने, पोपों ने। महावीर को चलन के बाहर कर दिया जैन मुनियों ने। कृष्ण को चलन के बाहर कर दिया तथाकथित कृष्ण के उपासक, पुजारी, पंडित--इन्होंने चलन के बाहर कर दिया।
नकली सिक्के सस्ते भी मिलते हैं। असली सिक्कों के लिए कीमत चुकानी पड़ती है! और बड़े मजे की बातें हैं कि नकली सिक्के के लिए कोई श्रम ही नहीं उठाना पड़ता। असली सिक्के के लिए बहुत श्रम से गुजरना पड़ता है।
धर्म को मारता कौन है?
पहले समझें कि धर्म को जिलाता कौन है? क्योंकि अगर हम जिलाने वाले को पहचान लें, तो मारने वाले को भी पहचान जाएंगे।
धर्म को जिलाते हैं, इस जगत में जीवंत करते हैं वे लोग जो धर्म के अनुभव से गुजरते हैं। बुद्ध, जीसस, कृष्ण, मोहम्मद, जलालुद्दीन, नानक, कबीर--ये धर्म के मृत प्राणों में पुनरुज्जीवन फूंक देने वाले लोग हैं। फिर बांसुरी बज उठती है, जो सदियों से न बजी हो। ठूंठ फिर हरे पत्तों से भर जाते हैं, और फूलों से लद जाते हैं--जिन पर सदियों से पत्ते न आए हों।
बुद्ध के जीवन में कहानी आती है...। कहानी ही कहूंगा, क्योंकि मैं नहीं मानता कि यह कोई तथ्य है; मगर प्रतीकात्मक है। बहुमूल्य है। सत्य है--तथ्य नहीं।
कहानी कहती है कि बुद्ध जब निकलते हैं--अगर किसी ठूंठ के पास से निकल जाएं, तो ठूंठ हरा हो जाता है। और किसी बांझ वृक्ष के पास से निकल जाएं, जिसमें फल न लगते हों, तो फल लग जाते हैं। असमय में फूल खिल जाते हैं।
कथा है कि एक गांव में बुद्ध ठहरे। सुबह-सुबह एक शूद्र चमार--उसका नाम था--सुदास, वह उठा; अपने घर के पीछे गया। काम-धाम में लगने का वक्त हो गया। घर के पीछे उसका पोखर था, छोटी-सी तलैया। चमार था; गांव में उसे कोई पानी भरने न दे, तो अपनी ही तलैया से अपना गुजारा करता था।
देखकर उसकी आंखें ठगी रह गईं! बे-मौसम कमल का फूल खिला। उसने अपनी पत्नी को पुकारा, सुन। यह क्या हुआ! यह कभी नहीं हुआ! मेरी जिंदगी हो गई। यह कोई मौसम है, यह कोई समय है! कली भी न थी रात तक, और सुबह इतना बड़ा फूल खिला! इतना बड़ा फूल कि कभी खिला नहीं देखा! यह कैसे हुआ?
उसकी पत्नी ने कहा, हो न हो बुद्ध पास से गुजरे होंगे। क्योंकि मैंने सुना है--जब बुद्ध गुजरते हैं, तो असमय फूल खिल जाते हैं।
सुदास हंसने लगा। उसने कहा कि पागल! यहां कहां बुद्ध गुजरेंगे! इस चमार के झोपड़े के पास से कहां बुद्ध गुजरेंगे! उसने आसपास खबर की। पता चला कि यह सच है; सांझ ही बुद्ध का आगमन हुआ है। वे इसी रास्ते से गुजरे हैं। और आगे जा कर एक अमराई में रुके हैं।
तो सुदास ने कहा कि फिर क्या करूं इस फूल! यह तो बड़ा शुभ अवसर है। इस फूल को तो तोड़कर मैं सम्राट को बेच दूं। सौ-पचास रुपए जरूर इनाम में मिल जाएंगे। क्योंकि असमय का कमल!
तो वह फूल को तोड़कर राजमहल की तरफ जाता था। चकित हुआ। राजा का रथ ही आ रहा था! अभी सूरज उग रहा था और राजा का रथ--स्वर्ण रथ--सूरज में यूं चमक रहा था, जैसे दूसरा सूरज उग रहा हो। वह ठिठक कर राह पर ही खड़ा हो गया।
माजरा क्या है! रात इस गरीब के झोपड़े के सामने से बुद्ध गुजरे; सुबह सम्राट का स्वर्ण-रथ आ रहा है! इस रास्ते पर कभी आया ही नहीं। यह चमारों की बस्ती, यहां सम्राट आएं किसलिए! ठिठक कर खड़ा रह गया। हिम्मत ही न पड़ी कहने कि कि मैं फूल लेकर राजमहल की तरफ आ रहा था। लेकिन रथ खुद ही रुका। सम्राट ने सारथी को कहा--रुको। इस सुदास को बुलाओ।
सुदास सम्राट के जूते बनाता था। सुदास का नाम सम्राट को मालूम था। सुदास डरते हुए गया और कहा कि फूल लेकर आपकी तरफ ही आ रहा था। असमय का फूल है, मैंने सोचा--किसको भेंट करूं! आपके ही योग्य है।
सम्राट ने कहा, मांग, क्या मांगता है? जो मांगेगा इसके बदले में--दूंगा।
सुदास ने कहा कि जो आप दे देंगे।
नहीं, सम्राट ने कहा, तू मांग। क्योंकि यह फूल मैं बुद्ध को चढ़ाने ले जाऊंगा। तू जो मांगेगा, दूंगा। बुद्ध प्रसन्न होंगे देखकर--ऐसे असमय का फूल! इतना सुंदर--इतना बड़ा फूल कमल का!
सुदास के गरीब मन में भी एक अमीर चाह उठी कि क्यों नहीं मैं ही न चढ़ा दूं जा कर फूल! रोटी-रोजी तो चल ही जाती है। मगर लालच भी मन में उठा कि आज सम्राट कहता है--जो मांगता हो, मांग ले!
लेकिन इसके पहले कि वह कुछ कहे, वह सोच रहा था कि कहूं--एक हजार स्वर्ण अशर्फिया; हिम्मत नहीं बंध रही थी कि एक हजार स्वर्ण अशर्फियां मांग रहा हूं, एक फूल के लिए! तो थोड़ा झिझक रहा था। तभी सम्राट के रथ के पीछे ही उसके वजीर का रथ आ कर रुका। और वजीर ने कहा, सुदास, बेच मत देना; मैं भी खरीददार हूं। मैं चढ़ाऊंगा बुद्ध को। और सम्राट तो औपचारिकतावश जा रहे हैं। इनको बुद्ध से कुछ लेना-देना नहीं है। जाना चाहिए, इसलिए जा रहे हैं। मैं बुद्ध का प्रेमी हूं। इसलिए सम्राट को कहा कि देखें, आप बीच में न आएं। आप प्रतिस्पर्धा में न पड़ें। निश्चित ही मैं कैसे आप से जीतूंगा, अगर प्रतिस्पर्धा हो जाए। मगर आप बीच में न आएं, क्योंकि आपके लिए तो सिर्फ औपचारिक है जाना; मेरे हृदय की बात है। सुदास, तू मांग, जो मांगेगा दे दूंगा।
सुदास ने सोचा, जब बात यूं है, तो अब एक हजार अशर्फियां क्या मांगनी; दो हजार अशर्फियां मांग लूं! मगर उसकी जबान न खुले। दो अशर्फियां मांगने में भी बात ज्यादा होती थी; दो हजार अशर्फियां!
और तभी नगरसेठ का भी रथ आ कर रुका। उसने कहा, सुदास, बेचना मत। मैं भी खरीददार हूं। नगरसेठ तो इतना बड़ा सेठ था कि सम्राट को भी खरीद सकता था। सम्राट को जब जरूरत पड़ती थी, तो उससे ही उधार मांगता था। और इस अकेले सम्राट को ही नहीं, आसपास के और बड़े सम्राट भी इस नगरसेठ से धन उधार लेते थे। कहते थे कि इस नगरसेठ के पास धन तौला जाता था--गिना नहीं जाता था। क्योंकि गिनने की फुर्सत किसको थी! तो फावड़े से भर-भर कर टोकरियों में अशर्फियां गिनी जाती थीं, कि कितनी टोकरियां! कौन गिने एक-एक दो-दो! ऐसे गिनती करने की फुर्सत किसको थी!
उस सेठ ने कहा कि तू जो कहेगा। लाख अशर्फियां मांगना हो, लाख अशर्फियां मांग। लेकिन फूल मैं चढ़ाऊंगा।
सुदास ठिठका खड़ा रह गया। उसने कहा कि फूल बेचना नहीं है।
उन तीनों ने एक साथ पूछा--क्यों!
सुदास ने कहा कि जिस फूल के लिए एक लाख अशर्फियां देने के लिए कोई तैयार हो, गरीब आदमी हूं, मगर मेरे मन में भी गहन भाव उठा कि फिर मैं ही क्यों न इस फूल को बुद्ध के चरणों में चढ़ा दूं। जरूर उन चरणों में चढ़ाने का मजा लाख अशर्फियों से ज्यादा होगा। नहीं तो तुम एक अशर्फी न देते, नगरसेठ से उसने कहा, मुझे। लाख अशर्फियां दे रहे हो! सम्राट राजी है; वजीर राजी है; तुम राजी हो। और मुझे ऐसा लगता है कि अगर गांव में जाऊं, तो और भी लोग राजी हो जाएंगे। मुझे इसके जितने दाम चाहिए, उतने मिल सकते हैं। लेकिन अब बेचना ही नहीं है।
नगरसेठ ने कहा, दो लाख अशर्फियां देता हूं। तू जो मांग--मुंहमांगा।
उसने कहा, अब बेचना ही नहीं है। सुदास गरीब है, मगर इतना गरीब नहीं। चमार है। काम तो चल ही जाता है मुझ गरीब का--जूते सीने से ही। यह मौका मैं नहीं छोडूंगा। यह फूल मैं ही चढ़ाऊंगा।
और सुदास ने जा कर वह फूल बुद्ध के चरणों में स्वयं चढ़ाया। और बुद्ध ने उस सुबह अपने प्रवचन में कहा कि सुदास ने आज इतना कमाया है, जितना कि सदियों में सम्राट नहीं कमा सकते। पूछो इस सम्राट से, पूछो इस वजीर से, पूछो इस नगरसेठ से! आज इन सब को हरा दिया सुदास ने। आज इस शूद्र ने अपने को परम श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया। आज लात मार दी धन पर। आज इसका अपरिग्रही रूप प्रकट हुआ है। यह धन्यभागी है।
और सुदास पर ऐसी वर्षा हुई उस दिन अमृत की कि फिर लौटा नहीं। उसने कहा, अब जाना क्या! जब फूल चढ़ाने से इतना मिला, तो अपने को भी चढ़ाता हूं। सुदास भिक्षु हो गया। फूल ही नहीं चढ़ा; खुद भी चढ़ गया।
यूं कहानियां हैं कि असमय, बुद्ध के पास से गुजरने से फूल खिल जाते हैं। ऐसा होता हो न होता हो...हो नहीं सकता ऐतिहासिक अर्थों में। क्योंकि समय कोई नियम नहीं बदलता। होना चाहिए, मगर होता नहीं है। प्रकृति तो निरपवाद रूप से चलती है। कुछ भेद नहीं करती। लेकिन प्रतीकात्मक हैं ये बातें। बुद्धों की मौजूदगी में सदियों से निष्प्राण पड़े धर्म में पुनः प्राण की प्रतिष्ठा होती है।
जिस व्यक्ति ने स्वयं सत्य को जाना है, वह धर्म को जीवित करता है। सिर्फ वही--केवल वही। उसके छूने से ही धर्म जीवित हो उठता है।
और धर्म को मारने वाले वे लोग हैं, जिन्होंने स्वयं तो अनुभव नहीं किया है, लेकिन जो दूसरों के उधार वचनों को दोहराने में कुशल होते हैं।
पंडित और पुरोहित का व्यवसाय क्या है! उनका व्यवसाय है कि बुद्धों के वचनों को दोहराते रहें; बुद्धों की साख का मजा लूटते रहें। बुद्धों को लगे सूली, बुद्धों को मिले जहर, बुद्धों पर पड़ें पत्थर--और पंडितों पर, पुजारियों पर, पोपों पर फूलों की वर्षा!
अभी तुम देखते हो--पोप किसी देश में जाते हैं, तो इतने लोग देखने को इकट्ठे होते हैं कि अभी ब्राजील में सात आदमी भीड़ में दब कर मर गए; और जीसस को सूली लगी, तब सात आदमी भी जीसस को प्रेम करने वाले भीड़ में इकट्ठे नहीं थे। सात यहां दब कर मर गए--साधारण आदमी को देखने के लिए, जिसमें कुछ भी नहीं है! जिसके पोप होने के पहले कोई एक आदमी देखने न आता। अभी साल भर पहले जब यह आदमी पोप नहीं हुआ था, तो कितने आदमी...! आदमी तो छोड़ो, कितनी चीटियां-चींटे देखकर इसको मरे? कहां भीड़ इकट्ठी हुई! किसी को नाम का भी पता नहीं था! किसी को प्रयोजन भी नहीं था। और ऐसा इस आदमी में कुछ भी नहीं है। लेकिन लाखों लोग इकट्ठे होंगे। इतने लोग इकट्ठे होंगे, कि सात आदमी भीड़ में दब कर मर जाएं! और यह पहली घटना नहीं है। ऐसी और घटनाएं घट चुकी हैं पहले। कहीं तीन आदमी मरे, कहीं दो आदमी मरे भीड़ में दब कर! देखने का ऐसा पागलपन! और जीसस को कितने लोग देखने गए थे!
जब जीसस को सूली लगने का वक्त आया, तो उनके बारह शिष्य भी भाग खड़े हुए थे। सिर्फ एक पीछे चला। जीसस ने उसको इंगित करके कहा; नाम तो लिया नहीं, क्योंकि नाम लेना खतरे से खाली न था। पकड़ लिया जाए बेचारा। जोर से इतना ही कहा कि भाई लौट जा। लौट ही जा!
जो लोग जीसस को पकड़ कर ले जा रहे थे, उन्होंने पूछा, किससे आप कह रहे हैं? क्या कोई जीसस का संगी-साथी यहां भीड़ में है? उन्होंने मशालें घुमा कर देखा। एक आदमी पकड़ा गया, जो आदमी अजनबी लग रहा था। उन्होंने पूछा, क्या तुम जीसस के साथी हो? उसने कहा कि नहीं। और जीसस ने कहा, देख, मैं कहता था लौट जा। मुर्गा सुबह की बांग दे, उसके पहले तीन बार कम से कम तू मुझे इनकार कर चुका होगा।
और यही हुआ। मुरगे की बांग देने के पहले तीन बार वह आदमी पकड़ गया। दुश्मनों ने बार-बार देखा कि कौन है! तो वह हर बार बदल जाए कि मैं! मैं तो अजनबी हूं। बाहर के गांव से आया हूं। गांव का पता मुझे मालूम नहीं। आप सब गांव की तरफ जा रहे हैं, मशालें हैं आपके हाथ में, तो सोचा, मैं भी साथ हो लूं।
उन्होंने पूछा, तू पहचानता है, यह आदमी कौन है, जिसको हम बांधे हैं?
उसने कहा, नहीं। कभी देखा नहीं! मैं बिलकुल पहचानता नहीं। मुझे क्या पता! कौन है यह आदमी? क्यों इसको बांध कर ले जा रहे हो? चोर होगा, बदमाश होगा!
सुबह मुरगे के बांग देने के पहले एक शिष्य साथ गया था, वह भी इनकार कर गया था! हालांकि भीड़ इकट्ठी हुई थी, कोई एक लाख लोग इकट्ठे हुए थे। लेकिन वे एक लाख लोग जीसस को देखने इकट्ठे नहीं हुए थे...गालियां देने, पत्थर फेंकने, सड़े-गले केले-टमाटर फेंकने; जीसस का मखौल उड़ाने, मजाक करने--कि यह देखो ईश्वर का बेटा, सूली पर लटक रहा है! अब पुकारो अपने बाप को। अब कहो अपने बाप से जो आकाश में है, जिसकी तुम बातें करते थे सदा, कि अब बचाए। बड़े चमत्कार तुम दिखाते थे, कहते हैं--मुर्दों को जिलाते थे; कहते हैं--लंगड़ों को चला दिया; कहते हैं--अंधों को दिखा दिया; अब कुछ करो!
लोगों ने भाले-भोंक कर जीसस को कहा, अरे, अब कुछ चमत्कार दिखाओ! अब क्या हो गया! कैसे गुमसुम खड़े हो? अब भूल गई चौकड़ी!
आए थे लाख लोग देखने तमाशा--हंसी-मजाक करने! यह जीसस जैसे व्यक्तियों के साथ हमारा व्यवहार है। और फिर जीसस के पादरी-पुरोहितों के साथ हमारा व्यवहार बिलकुल बदल जाता है। बड़ी अजीब दुनिया है! बड़ा अजीब रिवाज है! यहां झूठे पूजे जाते हैं, यहां सच्चे मारे जाते हैं! सत्य को यहां सूली लगती है--झूठ को सिंहासन मिलता है!
धर्म को कौन मार डालता है?
धर्म एव हतो हन्ति--और निश्चित ही अगर धर्म मरा हुआ होगा, तो वह तुम्हारी क्या खाक रक्षा करेगा! तुम उसके बोझ के नीचे दब कर मर जाओगे। तुम उसकी लाश के नीचे सड़ कर मर जाओगे।
मारा हुआ धर्म मार डालता है। मगर धर्म को कौन मारता है? नास्तिक तो नहीं मार सकते। नास्तिक की क्या बिसात! लेकिन झूठे आस्तिक मार डालते हैं। और झूठे आस्तिकों से पृथ्वी भरी है। झूठे धार्मिक मार डालते हैं। और झूठे धार्मिकों का बड़ा बोल-बाला है। मंदिर उनके, मसजिद उनके, गिरजे उनके, गुरुद्वारे उनके। झूठे धार्मिक की बड़ी सत्ता है! राजनीति पर बल उसका; पद उसका, प्रतिष्ठा उसकी; सम्मान-सत्कार उसका!
किसी जैन मुनि के कानों में तुमने खीले ठोंके जाते देखे! महावीर के कानों में खीले ठोंके गए! और जैन मुनि आते हैं, तो उनके पावों में तुम आंखें बिछा देते हो! कि आओ महाराज! पधारो। धन्यभाग कि पधारे! और महावीर को तुमने ठीक उलटा व्यवहार किया था। तुमने पागल कुत्ते महावीर के पीछे छोड़े, कि लोंच डालो, चीथ डालो इस आदमी को!
तुमने बुद्ध को मारने की हर तरह कोशिश की। पहाड़ से पत्थर की शिलाएं सरकाईं कि दब कर मर जाए। पागल हाथी छोड़ा। जहर पिलाया।
तुमने मीरा को जहर पिलाया! और अब भजन गाते फिरते हो! कि ऐ रे मैं तो प्रेम दिवाणी, मेरो दरद न जाने कोय! और दरद तुमने दिया मीरा को; तुम क्या खाक दरद जानोगे! दरद जाने मीरा। और मीरा जाने कि प्रेम का दीवानापन क्या है।
क्या तुमने व्यवहार किया मीरा के साथ! तुमने सब तरह से दर्ुव्यवहार किया। आज तो तुम मीरा के गुणगान गाते हो, लेकिन वृंदावन में कृष्ण के बड़े मंदिर में मीरा को घुसने नहीं दिया गया। रुकावट डाली गई। क्योंकि उस कृष्ण-मंदिर का जो बड़ा पुजारी था...रहा होगा उन्हीं विक्षिप्तों की जमात में से एक जो स्त्रियों को नहीं देखते, जो स्त्रियों को देखने में डरते हैं। जिनके प्राण स्त्रियों को देखने ही से निकल जाते हैं! जिनका धर्म ही मर जाता है--स्त्री देखी कि धर्म गया उनका! कि एकदम अधर्म हो जाता है उनके जीवन में; पाप ही पाप हो जाता है!
उसने कसम ले रखी थी कि स्त्री को नहीं देखेगा। तो वह मीरा को कैसे घुसने दे! जैसे ही खबर आई वृंदावन में कि मीरा आ रही है, वह घबड़ाया। उसने पहरेदार लगा दिए कि मीरा को अंदर मत आने देना, क्योंकि उसके मंदिर में स्त्रियां आ ही नहीं सकती थीं।
मगर मीरा तो मस्त थी। वह इतनी मस्ती थी कि जब वह नाचने लगी मंदिर के द्वार पर जा कर, तो मंदिर के पहरेदार भी उसकी मस्ती में डोलने लगे। और यूं नाचते-नाचते वह भीतर प्रवेश हो गई! जब वह भीतर प्रवेश हो गई, तब द्वारपालों को पता चला कि यह क्या हो गया! अब तो बड़ी मुश्किल हुई!
ब्रह्मचारी महाराज भीतर अपना पूजा का थाल लिए आरती उतार रहे थे। उनके हाथ से थाली गिर पड़ी। स्त्री सामने आ जाए! कैसे-कैसे लोग इस दुनिया में हुए! और ऐसे लोग अभी भी हैं!
अभी इंग्लैंड में श्री प्रमुख स्वामी स्त्रियों को नहीं देखते! तो बहुत तहलका मचा हुआ है। वे कैंटरबरी के प्रमुख बिशप से मिलने गए, तो उसको बेचारे को पता नहीं था। जब मिलने की घड़ी आई, तब खबर पहुंची कि कोई स्त्री मौजूद नहीं होनी चाहिए। अब बिशप की सेक्रेटरी ही स्त्री! टाइपिस्ट स्त्री! और कई स्त्रियां पत्रकार-फोटोग्राफर--वे सब आई हुई थीं। उन सब को हटाना पड़ा। इंग्लैंड में बहुत चर्चा हुई इस बात की, कि यह स्त्रियों का अपमान है। वे स्त्रियों को नहीं देख सकते!
ऐसा ही वह आदमी रहा होगा--ऐसा ही विक्षिप्त। उसके हाथ से थाली गिर पड़ी। और वह एकदम नाराज हो गया, आगबबूला हो गया। ऐसे लोगों के भीतर आग तो सुलगती रहती है। ये तो ज्वालामुखी पर बैठे हुए लोग हैं। कब भभक उठे इनकी आग--जरा-सा अवसर, बस काफी है।
चिल्लाया-चीखा कि स्त्री! तुझे तमीज नहीं! जब तुझे मालूम है--और बार-बार दरवाजे पर लिखा हुआ है कि स्त्री का प्रवेश निषिद्ध है--तू कैसे प्रवेश की? मेरा पूजा का थाल गिर गया; मेरे तीस वर्ष की साधना भ्रष्ट हो गई!
स्त्री को देखने से इनकी साधना भ्रष्ट हो गई! इनकी पूजा का थाल गिर गया! कृष्ण ने भी अपना माथा ठोंक लिया होगा--यह मेरा भक्त है! और कृष्ण की साधना भ्रष्ट न हुई! और सोलह हजार सखियां नाचती रहीं चारों तरफ। और ये उनके भक्त हैं!
ये कृष्ण--जीवंत धर्म। जिसके पास सोलह हजार स्त्रियां नाचें, तो कुछ नहीं बिगड़ता। और यह मुरदों का धर्म--कि एक स्त्री आ जाए--वह भी मीरा जैसी स्त्री, जिसको देखकर भी इस अंधे को आंखें खुल सकती थीं, इस मुरदे में प्राण पड़ सकते थे--उसके हाथ की थाली गिर गई!
लेकिन मीरा ने जो वचन कहे, प्यारे हैं। मीरा ने कहा कि क्षमा करें। मैं तो सोचती थी कि कृष्ण के भक्त मानते हैं--कृष्ण के अलावा और कोई पुरुष नहीं। तो दो पुरुष हैं: एक कृष्ण और एक आप? मैं तो सोचती थी कि कृष्ण के भक्तों की यह धारणा है कि हम सब स्त्रियां ही हैं; पुरुष तो एक परमात्मा है; हम सब उसकी प्रेमिकाएं हैं। उसकी सखियां हैं, उसकी गोपियां हैं। आज पता चला कि वह धारणा गलत थी। दो पुरुष हैं। एक कृष्ण और एक ब्रह्मचारी महाराज आप! मगर आप क्यों पूजा का थाल उठा कर प्रार्थना कर रहे हैं! आप तो स्वयं परमात्मा हैं! आप तो स्वयं पुरुष हैं! और परमात्मा होकर आपके हाथ से थाली गिर गई--स्त्री को देख कर आप ऐसे विचलित, ऐसे उद्विग्न हो उठे!
इस दुनिया में सबसे बड़ी दुश्मनी बुद्धों और पंडितों के बीच है। मगर मजा यह है कि जब तक बुद्ध जिंदा होते हैं, पंडित उनका विरोध करते हैं। और जैसे ही बुद्ध विदा होते हैं, पंडित बुद्धों की जो छाप छूट जाती है, उसका शोषण करने लगते हैं। तत्क्षण चींटों की तरह इकट्ठे हो जाते हैं! क्योंकि बुद्धों का जीवन ऐसी मिठास छोड़ जाता है कि सब तरफ से चींटे भागे चले आते हैं! जैसे शक्कर के ढेर पर चींटे इकट्ठे हो जाएं।
बुद्धों की मौजूदगी में तो उन्हें विरोध करना पड़ता है। क्योंकि बुद्ध का एक-एक वचन, जाग्रत व्यक्ति का एक-एक वचन उनके लिए प्राणघाती तीर जैसा लगता है। लेकिन जैसे ही बुद्ध विदा हुए, वैसे ही वे कब्जा कर लेते हैं। बुद्ध जो अपने आसपास हजारों लोगों को प्रभावित छोड़ जाते हैं, अपनी आभा से मंडित छोड़ जाते हैं--ये पंडित जल्दी से उनकी उस विराट प्रतिभा का शोषण करने में तल्लीन हो जाते हैं। ऐसे धर्म निर्मित होते हैं--तथाकथित धर्म।
ईसा के पीछे ईसाइयत; इसका ईसा से कुछ लेना-देना नहीं है। और बुद्ध के पीछे बौद्ध धर्म--इसका बुद्ध से कुछ लेना-देना नहीं है। और महावीर के पीछे जैन धर्म--इसका महावीर से कुछ लेना-देना नहीं है। मगर इनकी घबड़ाहटें बड़ी अजीब हैं! एक से एक हैरानी की घबड़ाहटें! इनकी बेचैनी!
पंडितों की हमेशा एक बेचैनी रहती है: कहीं फिर कोई बुद्ध न पैदा हो जाए! नहीं तो इनका जमाया हुआ अखाड़ा फिर उखड़ जाए! मगर सौभाग्य से बुद्ध आते रहते हैं। कभी कहीं न कहीं कोई दीया जल जाता है। और बुझे दीयों की छाती कंप जाती है।
धर्म एव हतो हंति--मारा हुआ धर्म मार डालता है।
सहजानंद! बात तो बड़े पते की है। धर्म को पंडित मारते हैं, पुजारी मारते हैं। फिर मारा हुआ धर्म, तुम जो उस मुरदा धर्म के पीछे चलते हो, तुम्हें मार डालता है। मुरदे को ढोओगे, तो मरोगे नहीं तो क्या होगा और!
रक्षा किया हुआ धर्म रक्षा करता है। लेकिन रक्षा धर्म की कौन करेगा? धर्म की रक्षा तो वही करे, जिसे धर्म का अनुभव हुआ हो। जिसने धर्म को जीया हो, पिया हो, पचाया हो; जिसके लिए धर्म उसका रोआं-रोआं हो गया हो; जिसकी धड़कन-धड़कन में धर्म समाया हो--वह व्यक्ति धर्म की रक्षा करेगा। और धर्म की रक्षा अगर की जाए, तो धर्म तुम्हारी रक्षा करता है। स्वभावतः।
तस्माद धर्मो न हंतव्यो--इसलिए धर्म को मत मारो।
इसलिए पंडित-पुजारियों से बचो; धर्म को मत मारो। मंदिर-मसजिद कब्रें हैं धर्म की। इनसे बचो। कभी किसी सदगुरु के मयखाने में बैठो, मयकदे में बैठो--जहां अभी जीवंत शराब ढाली जाती हो, पी जाती हो, पिलाई जाती हो--जहां दीवाने जुड़ते हों, जहां परवाने इकट्ठे होते हों। जहां दीया जलता है, वहां परवाने इकट्ठे होते हैं। मंदिर-मस्जिदों में क्या है अब! हां, दीए की तस्वीरें हैं। मगर दीयों की तस्वीरों को तुम सोचते हो--परवाने आएंगे!
जरा एक दीए की तस्वीर लगा कर तो बैठो घर में और राह देखो कि कोई परवाना आ जाए! परवाने इतने मूरख नहीं--जितना मूरख आदमी होता है! परवाने पर भी न मारेंगे वहां। कितनी ही सुंदर तस्वीर हो दीए की, कितनी ही चमचमाती तस्वीर हो दीए की--सोने की बना लो--तो भी परवानों को धोखा न दे पाओगे।
सोलोमन के जीवन में उल्लेख है। ईथोपिया की रानी उसकी परीक्षा लेने गई। क्योंकि उसने सुन रखा था कि सोलोमन पृथ्वी पर आज सर्वाधिक ज्ञानी व्यक्ति है। ईथोपिया की रानी उसकी परीक्षा लेने गई। उसने एक हाथ में नकली फूल लिए, जो बड़े कलाकारों से बनवाए थे। और दूसरे हाथ में असली फूल लिए। नकली फूल इतने सुंदर बने थे कि असली को मात करते लगते थे! वह दोनों फूलों को लेकर सोलोमन के दरबार में गई। सोलोमन से थोड़ी दूर खड़े होकर उसने कहा कि सोलोमन, मैंने सुना है कि तुम पृथ्वी के सबसे बड़े ज्ञानी हो। जरा-सा मेरे प्रश्न का उत्तर दे दो। मेरे किस हाथ में असली फूल हैं? और किस हाथ में नकली फूल हैं?
सोलोमन भी बहुत हैरान हुआ! देखे दोनों हाथ में फूल; तय करना मुश्किल था। मैं होता तो तय कर लेता। जो असली से भी ज्यादा असली मालूम हो रहे थे, उनको नकली कह देता। क्योंकि असली से कहीं ज्यादा असली कुछ होता है!
मगर सोलोमन ने जल्दी से तय करना ठीक न सोचा। उसने कहा कि जरा अंधेरा है; मैं बूढ़ा भी हो गया; जरा द्वार-खिड़कियां खोल दो सब, ताकि रोशनी आए, ताकि मैं देख तो सकूं ठीक से। सारे द्वार-खिड़कियां खोल दी गईं। और वह थोड़ी देर चुपचाप रहा और उसने कहा, तेरे बाएं हाथ में असली फूल हैं।
ईथोपिया की रानी हैरान हुई। उसके वजीर हैरान हुए। दरबारी हैरान हुए। उन्होंने कहा, आपने कैसे पहचाना! क्योंकि हम भी देख रहे हैं रोशनी में भी। मगर कुछ पहचान में नहीं आता कि कौन असली है!
उसने कहा, मैंने नहीं पहचाना। मैं तो सिर्फ राह देखता रहा कि कोई मधुमक्खी भीतर आ जाए। और एक मधुमक्खी खिड़की से भीतर आ गई। अब मधुमक्खी को तुम धोखा नहीं दे सकते, चाहे कितने ही बड़े चित्रकारों ने फूल बनाए हों। मधुमक्खी जिस फूल पर बैठ गई, वे असली फूल हैं।
परवानों को धोखा न दे सकोगे। मुझे भी धोखा नहीं होता। मैं फौरन पहचान जाता; जो असली से ज्यादा असली मालूम होते।
एक आदमी सेठ चंदूलाल के पास दान मांगने गया था। चंदूलाल यूं किसी को दान देते नहीं। उनके घर के सामने से भिखारी यूं निकल जाते हैं कि यह तो चंदूलालजी का मकान है! मांगते ही नहीं। अगर कोई भिखारी उनके घर के सामने भीख मांगता है, तो दूसरे लोग कहते हैं, मालूम होते हो, अजनबी हो; इस गांव में नए हो। अरे यह चंदूलाल का मकान है! जल्दी करो, निकल जाओ। हाथ में होगा कुछ, छीन लेगा और! चंदूलाल से मिला कभी किसी को नहीं है। जो ले गया--पा गया सो पा गया!
लेकिन गांव में कुछ बहुत जरूरत पड़ गई थी और गांव के कुछ लोगों ने सोचा, एक दफे कोशिश करनी चाहिए। कई सालों से कोशिश की भी नहीं। आदमी बदल भी जाता है! अब कौन जाने बदल गया हो। बुढ़ापा भी करीब आ रहा है; तो मौत के पास आते-आते आदमी के हृदय में भी बदलाहट होने लगती है। आदमी धार्मिक होने लगता है। कौन जाने दया-भाव जगा हो, दान जगा हो! चलो, एक कोशिश करने में हमारा क्या बिगड़ जाएगा! बहुत से बहुत मना ही करेगा न। तो हमारा क्या ले लेगा!
वे गए। चंदूलाल ने बड़े प्रेम से बिठाया। चंदूलाल ने कहा कि जरूर, जरूर दान दूंगा! बड़े हैरान हुए। खुद भी भरोसा न आया कि क्या सुन रहे हैं! फिर सोचा कि ठीक ही हमने सोचा था कि आदमी बूढ़ा होता है, तो बदलाहट होती है।
पर, चंदूलाल ने कहा, एक शर्त है। मेरी दोनों आंखों को देख कर बताओ कि कौन-सी असली--कौन-सी नकली। अगर बता सके सही-सही, तो जो मांगोगे वह दान दूंगा।
बहुत गौर से उन्होंने देखा। आखिर उन्होंने कहा, आपकी बाई आंख नकली है। चंदूलाल ने कहा, गजब कर दिया! मार डाला मुझ गरीब को! कैसे पहचाने कि मेरी बाईं आंख नकली है?
उन्होंने कहा, इसलिए पहचाने कि बाईं आंख में थोड़ा दया-भाव मालूम पड़ता है! दाईं आंख तो असली होनी चाहिए; उसमें तो कोई दया-भाव नहीं!
परवानों को धोखा नहीं दिया जा सकता। लेकिन मंदिरों में, गिरजों में, गुरुद्वारों में, जो लोग इकट्ठे हो रहे हैं, ये परवाने नहीं हैं; नहीं तो इनको धोखा नहीं हो सकता था। परवाने तो मयकदों में इकट्ठे होते हैं। और मयकदा वहां होता है, जहां कोई जीवित सदगुरु होता है।
मगर जीवित सदगुरु के खिलाफ सदा भीड़ होगी। क्योंकि भीड़ तो पंडित-पुरोहितों से ही चलती है। और भीड़ के पास तो झूठा और सस्ता धर्म है। और भीड़ अपने सस्ते धर्म को, और झूठे धर्म को झूठ मानने को राजी नहीं होना चाहती। क्योंकि उसे झूठ मान ले, तो छोड़ना पड़ेगा। और उसे छोड़ना अर्थात फिर सच्चे को खोजना भी पड़ेगा। और फिर बच्चे को खोजना कठिन हो सकता है, दुरूह हो सकता है। साधना करनी होगी; ध्यान करना होगा।
यह झूठा धर्म तो सत्यनारायण की कथा करवाने से मिल जाता है! खुद करनी भी नहीं पड़ती! कोई और कर जाता है! एक दस-पांच रुपए का खर्चा हो जाता है। एक उधार नौकर को ले आते हैं, वह कर देता है!
जार्ज बर्नार्ड शा ने लिखा है कि दुर्भाग्य के वे दिन भी एक दिन आएंगे, जब धनपति अपनी पत्नियों के पास भी नौकरों को भेज दिया करेंगे कि जा मेरी पत्नी को चुंबन दे आ। कहना--पति ने भेजा है; उनको जरा फुर्सत नहीं है काम में। और ये छोटे-मोटे काम तो नौकर ही कर सकते हैं। इसके लिए मेरे आने की क्या जरूरत है! लेकिन तुम धर्म के साथ
 यही कर रहे हो।
तुम एक पुजारी से कहते हो कि आ कर रोज हमारे घर में मंदिर की घंटी बजा जाया कर। पूजा चढ़ा जाया कर। दो फूल चढ़ा जाया कर। तीस रुपए महीने लगा दिए। वह भी दस-पच्चीस घरों में जाकर घंटी बजा आता है। उसको भी घंटी बजाने में कोई मतलब नहीं है। इससे मतलब नहीं है कि भगवान ने घंटी सुनी कि नहीं। वह जो तीस रुपए महीने देता है, उसको सुनाई पड़ जानी चाहिए। बस। जल्दी से सिर पटकता है। कुछ भी बक-बका कर भागता है, क्योंकि उसको और दस-पच्चीस जगह जाना है। कोई एक ही भगवान है! कोई मंदिरों में पूजा करनी है! जगह-जगह जाकर किसी तरह क्रियाकर्म करके भागता है।
उधार! तुम प्रार्थना उधार करवा रहे हो! तो तुम प्रेम भी उधार करवा सकते हो। आखिर प्रार्थना प्रेम ही तो है। परमात्मा से भी तुम सीधी बात नहीं करते; बीच में दलाल रखते हो। परमात्मा के भी आमने-सामने कभी नहीं बैठते! अरे, फूल चढ़ाने हों--खुद चढ़ाओ। अगर दीप जलाने हैं--खुद जलाओ। अगर नाचना-गाना हो, तो खुद नाचो-गाओ। ये किराए के टट्टू, इनको लाकर तुम पूजा करवा रहे हो! यह पूजा झूठी है। इनको पूजा से प्रयोजन नहीं है; इनको पैसे से प्रयोजन है। तुमको इससे प्रयोजन है कि भगवान कभी होगा, कहीं मरने के बाद मिलेगा, तो कहने को रहेगा कि भाई पूजा करवाते थे। तीस रुपया महीना खर्चा किया था। कुछ तो खयाल रखो। आखिर उस सब का कुछ तो बदला दो! बहुत सुनते आए थे कि पुण्य का फल मिलता है, कहां है फल! अब मिल जाए।
लेकिन न तुमने पूजा की; न तुम्हारे पुजारी ने पूजा की। पुजारी को पैसे से मतलब था; तुम कुछ आगे के लोभ का इंतजाम कर रहे हो। तुम आगे के लिए बीमा कर रहे हो! तुम कुशल व्यवसायी हो।
धर्म को मार डाला है, इस तरह के लोगों ने।
और क्या-क्या मजे की बातें फिर निकालते हैं! कल एक व्यक्ति का पत्र पढ़ रहा था अखबार में। उसने लिखा है कि मेरे घर एक साधु बाबा मेहमान हुए। सुबह उठकर उन्होंने ध्यान-स्नान इत्यादि किया। मैंने कहा कि कुछ नाश्ता करें। उन्होंने नाश्ता नहीं लिया। चले गए कुछ काम से बाहर। सांझ को लौटे। फिर स्नान-ध्यान किया। मैंने कहा, कुछ भोजन करें। उन्होंने कहा, नहीं बच्चा। मैंने पूछा कि साधु बाबा, आप न भोजन सुबह किए, न सांझ! कुछ सत्संग ही हो जाए; कुछ दो शब्द मुझे कह दें। तो उन्होंने कहा, जो असली साधु है, वह मुलाकात नहीं देता। जो असली साधु है, वह जमात इकट्ठी नहीं करता। जो असली साधु है, वह करामात नहीं दिखाता। यह तीन उन्होंने व्याख्या की असली साधु की। मुलाकात नहीं देता। जमात नहीं जुटाता। करामात नहीं दिखाता। और उसी रात वे चले गए।
उन सज्जन ने लिखा है कि मुझे तो उनका नाम भी पता नहीं, लेकिन उनकी परिभाषा याद रह गई। इस परिभाषा के अनुसार आजकल का कोई महात्मा, कोई साधु, सच्चा साधु नहीं है, न सच्चा महात्मा है।
कोई सज्जन को कहे, तो फिर कृष्ण भी सच्चे महात्मा नहीं हैं! मुलाकात दी अर्जुन को, नहीं तो गीता कैसे पैदा होती! फिर बुद्ध भी सच्चे महात्मा नहीं हैं--जमात इकट्ठी की, नहीं तो भिक्षुओं का संघ कैसे निर्मित होता! फिर तो महावीर भी सच्चे महात्मा नहीं है; मुलाकात भी दी; जमात भी इकट्ठी की। फिर तो जीसस भी सच्चे महात्मा नहीं हैं--और मोहम्मद भी सच्चे महात्मा नहीं हैं--करामात--मुलाकात--जमात--सभी कुछ किया!
तो इनके हिसाब से कौन सच्चा महात्मा है? न कृष्ण, न लाओत्सू, न जरथुस्त्र, न महावीर, न बुद्ध, न मोहम्मद, न क्राइस्ट, न नानक, न कबीर। इनके हिसाब से वह एक आदमी जो इनके घर में ठहरा था, जिसका इनको नाम भी पता नहीं, उसके सिवाय कोई महात्मा नहीं है!
खूब इनको पकड़ा गया परिभाषा! अब उसी परिभाषा को पकड़े बैठे रहना। मगर इस तरह की बातें लोग पकड़ कर बैठ जाते हैं। और फिर सोचते हैं कि बड़ा ज्ञान हाथ लग गया। अब ये किसी कृष्ण के पास पहुंच जाएंगे, तो अपनी परिभाषा से ये बच जाएंगे। बुद्ध के पास से गुजर जाएंगे--अपनी परिभाषा से बच जाएंगे, कि अरे, इसने जमात इकट्ठी की! अगर जीसस के पास जाएंगे, तो फौरन बच जाएंगे--अरे, यह तो करामात दिखा रहा है! इनके पास बचने के लिए इंतजाम हो गया! और वह कौन आवारा आदमी, जो इनके घर में ठहरा था, जो इनको परिभाषा दे गया...और ठहरा भी कि नहीं ठहरा, कि किसी सपने में इन्होंने देख लिया! मगर इनके पास एक परिभाषा है, जो इनको सब से बचा देगी। नानक मिलेंगे--बचा देगी! कबीर मिलेंगे--बचा देगी। कृष्ण मिलेंगे--बचा देगी।
पंडित भी तुम्हें क्या-क्या चीजें दे जाते हैं, क्या-क्या चीजें पकड़ा जाते हैं; क्या-क्या मूर्खतापूर्ण विवरण तुम्हारे हाथ में थमा देते हैं, कसौटियां थमा देते हैं--और फिर उनके हिसाब से तुम चलने लगते हो।
दिगंबर जैन सोचता है कि तब तक कोई आदमी भगवान को उपलब्ध नहीं होता है, जब तक नग्न न हो। इसलिए वह बुद्ध को भगवान नहीं मानता, कृष्ण को भगवान नहीं मानता, क्राइस्ट को भगवान नहीं मानता, मोहम्मद को भगवान नहीं मानता। उसके पास एक परिभाषा है।
जीसस को मानने वाला मानता है कि जब तक कोई आदमी अंधों को आंख न दे, बहरों को कान न दे, मुरदों को जिलाए न--तब तक वह महात्मा नहीं है! तब तक वह भगवान का असली बेटा नहीं है! तो न तो महावीर ने किसी अंधे को आंख दी; न कृष्ण ने किसी अंधे को आंख दी। न कबीर ने किसी अंधे की आंखें ठीक की, न किसी मुरदे को जिलाया। ये सब कोई महात्मा न रहे! ये सब व्यर्थ हो गए। इनका ईश्वर से कुछ संबंध न रहा!
अपनी-अपनी परिभाषाएं लिए लोग बैठे हैं! और परिभाषाएं तुम्हें कौन पकड़ा देता है? दो कौड़ी के लोग परिभाषाएं पकड़ाने को तैयार हैं! लेकिन उन दो कौड़ी के लोगों की बातें तुम्हारी समझ में आ जाती हैं, क्योंकि उतनी ही तुम्हारे पास समझ भी है। जितनी ओछी बात हो, उतनी जल्दी तुम्हारी समझ में आ जाती है। और कितना शोरगुल तुम मचाने लगते हो फिर!
मारा हुआ धर्म मार डालता है। और पंडित धर्म को मारते हैं। फिर मारा हुआ धर्म तुम्हें मारता है।
रक्षा किया हुआ धर्म रक्षा करता है। बुद्धपुरुष धर्म की रक्षा करते हैं। बुद्धों के साथ होना, स्वयं की रक्षा पा लेना है। बुद्ध में ही शरण है।
इसलिए धर्म को न मारना चाहिए। पंडितों से साथ अलग कर लो अपना। उनके साथ रहना, उनके साथ अपना संबंध जोड़ना धर्म को मारने में भागीदार होना है।...जिससे मारा हुआ धर्म हमको न मार सके।
पृथ्वी को बड़ी जरूरत है आज धर्म के पुनरुज्जीवित होने की, नहीं तो आदमी मर ही चुका; उसकी ऊर्जा खो गई, आनंद खो गया, उत्सव खो गया, नृत्य खो गया। बांसुरी यूं पड़ी है! दर्पण पर धूल जमी है। न कोई गीत उठता है; न सत्य की कोई छवि बनती है।
अब कब तक राह देखोगे! झाड़ो यह धूल। साफ करो इस बांसुरी को, कि फिर गीत उतर सकें। फिर सत्य की छवि बन सके, फिर कोयल तुम्हारे भीतर कूके और पपीहा तुम्हारे भीतर पुकारे।
लेकिन यह तभी संभव है जब किसी सदगुरु के साथ हो जाओ। किसी जलते हुए दीए के पास ही अपने दीए को ले जाओ, तो तुम्हारा दीया जल सकता है। लेकिन जिनके दीए खुद ही बुझे हैं, उनके पास तुम अपना दीया लिए बैठे हो! बैठे रहो जन्मों-जन्मों, तुम्हारे दीए के जलने की कोई संभावना नहीं है। लेकिन सस्ता है यह काम।
पंडितों के पास होने में कुछ हर्ज नहीं, कुछ खर्च नहीं। और तुम्हारे ही जैसे लोग हैं वे, इसलिए उनसे तालमेल बैठ जाता है, उनसे समझौता बैठ जाता है। बुद्धों से तालमेल बिठालने के लिए क्रांति से गुजरना जरूरी है, आग से गुजरना जरूरी है।
अब मेरे साथ जो आज संन्यासी हैं, उन्हें सब तरह की आग से गुजरना पड़ रहा है, गुजरना पड़ेगा। इसी आग से गुजर कर वे कुंदन बनेंगे।
हर छोटी-मोटी बात पर उपद्रव है! हर छोटी-मोटी बात पर बाधा है! और कितना शोर-शराबा मचता है! अब मैं कच्छ के रेगिस्तान में बस जाना चाहता था, ताकि लोगों को मुझसे परेशानी न हो। तो कच्छ के रेगिस्तान में भी बसने देना कठिन है! भारी शोरगुल मचा हुआ है! कच्छियों के प्राण निकले जा रहे हैं! जैसे मैं कच्छ पहुंच जाऊंगा, तो कच्छ डूब ही जाएगा! जैसे मैं कच्छ पहुंच जाऊंगा, तो कच्छ एकदम लुट जाएगा! जैसे मेरे बिना कच्छ में बहुत कुछ है, जो एकदम बरबाद ही हो जाएगा! एकदम प्राणों पर बन आई है!
जैन मुनि इकट्ठे हो रहे हैं! जैनियों से आह्वान किया जा रहा है। भद्रगुप्त मुनि ने--किस तरह की भद्रता है, पता नहीं--और किस तरह का जैन-धर्म है, पता नहीं--आह्वान किया है सारे जैनों को, कि अब सब कुछ बलिदान करना पड़े, तो भी करने की तैयारी रखो। मगर इस व्यक्ति को कच्छ में प्रवेश नहीं करने देना है।
मैं कच्छ का क्या बिगाडूंगा!
कल खबर थी कि बंबई में सारे कच्छियों की सभा होने वाली है। सभा का निमंत्रण छापा गया है, उसमें यह साफ लिखा हुआ है कि जो लोग विरोध करना चाहते हों, केवल वे ही आएं! तो मतलब, जो विरोध नहीं करना चाहता है, उसको तो आने भी नहीं देना है! सभा में भी नहीं आने देना है, ताकि विरोध नहीं करने की तो बात ही न उठे। जो लोग विरोध करना चाहते हैं, केवल उनके लिए निमंत्रण है। और फिर घोषणा मचाएंगे कि देखो, जितने लोग आए, सब ने विरोध किया। एक भी तो पक्ष में होता! एक भी आदमी पक्ष में नहीं है। और निमंत्रण में ही जाहिर है, कि फिर निमंत्रण ही उनके लिए दिया गया है, जो विरोध में हैं।
अब बंबई के कच्छियों के प्राण क्यों संकट में पड़े हैं! मैं कच्छ जा रहा हूं; तुम कच्छ छोड़ कर बंबई बस गए हो! तुम कच्छ कब का छोड़ चुके। कच्छ में है कौन अब? मैं भी एक दीवाना हूं कि कच्छ को चुना हूं, जहां से सब भाग गए! मैं इस लिहाज से चुना कि अब यहां किसी को परेशानी न होगी। यहां है ही कौन! पूरे कच्छ की आबादी सात लाख है। सैकड़ों मील खाली पड़े हैं।
कभी डेढ़ सौ साल पहले कच्छ आबाद हुआ करता था, तब सिंध नदी कच्छ के पास से गुजरती थी। फिर सिंध ने अपना रास्ता बदल लिया। सिंध भी भाग खड़ी हुई! उसने भी कच्छ छोड़ दिया! डेढ़ सौ साल पहले सिंध ने भी कहा कि क्षमा करो। हे कच्छ महाराज, आप ऐसे ही रहो! सिंध ने जब से छोड़ दिया, कच्छ रेगिस्तान है। और जिस दिन से सिंध ने छोड़ा, कच्छ का व्यवसाय मर गया, कच्छ का उत्पादन मर गया। कच्छ के लोगों को हट जाना पड़ा। कच्छ बरबाद हो गया। कच्छ में कुछ भी न बचा।
लेकिन कच्छ पर भारी संकट आ गया है; उससे भी बड़ा संकट जो सिंध के हटने से आया था; उससे भी बड़ा संकट आ रहा है--मेरे वहां जाने से!
मैं कभी-कभी चकित होता हूं कि कैसे मूढ़ों की जमात है! कैसे अजीब लोग हैं! इनको क्या इतनी बेचैनी हो रही है! आखिर जैन-धर्म को क्या खतरा आ गया होगा, कि सातों जैन धर्मों के अलग-अलग पंथ इकट्ठे हो गए और सातों ने मिल कर निर्णय किया। इनको क्या खतरा आ गया होगा! इनको क्या बेचैनी हो रही है!
बंबई के सारे उद्योगपति इकट्ठे हो गए, जैसे इनके उद्योग को मैं कोई खतरा पहुंचा रहा हूं! कि कच्छ मैं चला जाऊंगा, तो इनके उद्योग खतम हो जाएंगे, या इनके कारखाने बंद हो जाएंगे। कच्छ में तो कोई कारखाने हैं नहीं। इनको क्या बेचैनी आ रही है!
एक से एक घबड़ाहटें! अब उन्होंने एक नया शिगुफा खड़ा किया कि मेरे कच्छ में पहुंचने से देश की सुरक्षा को खतरा हो जाएगा! उस रेगिस्तान में मैं अपने मित्रों को लेकर बैठ जाऊंगा--देश को खतरा--देश की सुरक्षा को खतरा हो जाएगा! देश फिर बच नहीं सकता! फिर देश का बचना मुश्किल है!
अजीब बातें लोग उठाते हैं! लेकिन ये सारे बहाने हैं। ये सब बहाने ऊपर-ऊपर--भीतरी बात कुछ और। भीतरी डर! डर एक बात का कि तुम जिस धर्म को पकड़े बैठे हो, मेरी मौजूदगी में तुम उसे पकड़े न रह सकोगे।
तो इस आश्रम के खिलाफ कितनी अफवाहें उड़ाई जाती हैं! और जब अफवाहें चलती हैं, छपती हैं अखबारों में, तो लोग तो छपे हुए अखबार को मानते हैं। छपी हुई बात तो सच होनी ही चाहिए! लिखे पर हमारा ऐसा भरोसा है! और छापाखाने का छपा हो, फिर तो कहना ही क्या! फिर तो सत्य होना ही चाहिए। फिर उन्हें कोई फिक्र नहीं है यहां आने की। यहां आकर देखने की, यहां आकर परिचित होने की। यहां तो आने में भी डर होता है।
मेरे पास पत्र आते हैं कि हम आना तो चाहते हैं, लेकिन हमने सुना है, जो भी आता है--सम्मोहित हो जाता है! तो यह भी आने में एक डर है, कि वहां जो जाता है; वह सम्मोहित हो जाता है!
एक व्यक्ति ने विरोध में पत्र लिखा है। अखबार में छपा है, कि मेरे पक्ष में सिवाय मेरे अनुयायियों के और कोई भी नहीं है। बाकी सब लोग मेरे विरोध में हैं।
बात बड़ी पते की है! तो तुम सोचते हो, कृष्ण के पक्ष में कृष्ण के अनुयायियों के सिवा कोई और है! कि बुद्ध के पक्ष में बुद्ध के अनुयायियों के सिवा कोई और है? कि क्राइस्ट के पक्ष में क्राइस्ट के अनुयायियों के सिवा कोई और है? मेरे ऊपर ही सिर्फ यह नियम लागू होगा!
और बड़े मजे का तर्क है: जो मेरे पक्ष में है, वह मेरा अनुयायी। और अनुयायी तो पक्ष में होगा ही! इसलिए जो मेरे पक्ष में है, उसकी तो बात सुननी ही मत, क्योंकि वह अनुयायी है। और जो मेरे विपक्ष में है, वह सच कह रहा होगा, क्योंकि वह अनुयायी नहीं है! अब यह तो बड़ा मुश्किल हो गया मामला। मेरे पक्ष में कहना चाहिए--और मेरे अनुयायी होना नहीं चाहिए, तब उसकी बात में कुछ बल होगा। मगर यह कैसे होगा? जिसे मेरी बात सही लगेगी, वह मेरा अनुयायी हो गया। सही लगी, और फिर अनुयायी न हुआ, तो क्या खाक सही लगी! सही भी लगी, और अनुयायी भी न हुआ, तो सही कैसे लगी?
तो जो मेरे पक्ष में बोले, वह मेरा अनुयायी है, इसलिए इसकी बात का तो कोई मूल्य नहीं है। और जो मेरे विपक्ष में बोले, उसकी बात का मूल्य है, क्योंकि वह मेरा अनुयायी नहीं है! अगर यह मापदंड एक-सा ही लागू करना है, तो अगर मेरे पक्ष वाला मेरे पक्ष में बोले, उसकी बात का कोई मूल्य नहीं; तो जो मेरे विपक्ष में है, उसकी बात का भी कोई मूल्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह विपक्ष में है, इसलिए विपक्ष में बोलेगा। तब उस तीसरे आदमी को खोजो जो न पक्ष में है, न विपक्ष में है। मगर ऐसा आदमी तुम्हें मिलना मुश्किल है, जो न पक्ष में है--न विपक्ष में। जो पक्ष में, विपक्ष में नहीं है, उसका मतलब हुआ कि वह उदासीन है; उसे प्रयोजन ही नहीं है। वह क्यों बोलेगा? किसलिए बोलेगा? और बोलने के पहले उसको विचार करना पड़ेगा कि ठीक है या गलत! और उसी में तो गड़बड़ हो जाएगी। या तो पक्ष में हो जाएगा, या विपक्ष में हो जाएगा।
लोग अजीब-अजीब तर्क ईजाद करते हैं! लेकिन असली बात तो छिपाने के लिए। और ये वही पुराने तर्क हैं, जो सदा से वे ईजाद करते रहे।
बौद्धों को भारत में टिकने नहीं दिया। आखिर भारत में एक समय था, कि बुद्ध की छाया में और प्रभाव में और फिर अशोक की गर्जना में पूरा का पूरा भारत बौद्ध हो गया था। फिर सारे बौद्ध गए कहां! फिर उनका हुआ क्या? लाखों संन्यासी थे बौद्धों के भारत में, उनको कड़ाहों में जलाया गया; उनको मारा गया, काटा गया। उनको खदेड़ा गया मुल्क के बाहर। उनको भारत छोड़ देना पड़ा। तिब्बत में बसे। लंका में बसे। बर्मा से बसे। जापान गए। चीन गए। कोरिया गए। पूरा एशिया बौद्ध हो गया। सिर्फ भारत को छोड़ना पड़ा उन्हें। इतनी उनको मजबूरियां कर दीं खड़ी!
उनकी सारी चेष्टा यही है कि वे इतनी मजबूरियां मेरे लिए खड़ी कर दें कि मुझे भारत छोड़ना पड़े। उनकी आकांक्षा यही है। लेकिन मैं भारत छोड़ने वाला नहीं हूं। मैं तो यहीं शराब ढालूंगा। यहीं पीऊंगा, यहीं पिलाऊंगा। यहीं दीवानगी फैलाऊंगा। क्योंकि मेरे हिसाब में भारत के पास ठीक-ठीक भूमि है। बुद्धों ने इस भूमि को निर्मित किया है। महावीरों ने इस भूमि को सींचा है। कृष्णों ने इस भूमि पर बीज बोए हैं। इस भूमि को यूं छोड़ देने वाला मैं नहीं हूं।
इस भूमि का पूरा-पूरा उपयोग कर लेना है, क्योंकि इसी भूमि से सारी मनुष्यता को बचाने वाले धर्म का अभ्युदय हो सकता है, पुनरोदय हो सकता है। अभागे होंगे भारतवासी, अगर वे न लाभाविंत हों। वे जानें।
और यह तुम्हें दिखाई पड़ना शुरू हो गया है कि सारी दुनिया से लोग आ रहे हैं। लेकिन भारतीयों को क्या हो रहा है! मुझे पत्र लिख कर पूछते हैं कि क्या बात है--सारी दुनिया से लोग आ रहे हैं, फिर भारतीय क्यों नहीं आ रहे हैं?
अभागे हैं। किस्मत खराब है। दो हजार साल से गुलाम रहे हैं। भूमि तो बुद्धों की है, लेकिन बुद्धुओं के हाथ में पड़ गई है। तो जिनमें भी थोड़ी बुद्धि है, वे आ रहे हैं। बुद्धू तो इकट्ठे हो कर किस तरह से, जो सूर्य उदय हो सकता है उसको न उदय होने दिया जाए, उसकी चेष्टा में संलग्न हैं!
मगर यह सूरज उगेगा। यह उग ही चुका है। ये गैरिक वस्त्र पूरब में फैल गई लाली के प्रतीक हैं। सूरज को आने में देर नहीं है। पूरब लाल हो रहा है; उठ रहा है।
यह काम जारी रहेगा। ये बाधाएं बिलकुल स्वाभाविक हैं। ये बाधाएं किसी और के लिए नहीं हैं भारत में। न सत्य साईं बाबा के लिए ये बाधाएं हैं; न बाबा मुक्तानंद के लिए बाधाएं हैं; न स्वामी अखंडानंद के लिए ये बाधाएं हैं। तुम जरा सोचते हो कि ये बाधाएं सिर्फ एक आदमी के लिए हैं! मेरे लिए हैं। और किसी के लिए ये बाधाएं नहीं हैं। इससे कुछ सोचो, इससे कुछ विचारो, कि मामला क्या है? जरूर कुछ राज है इस बाधा में।
मरे हुए धर्म को जो भी पोषण देने वाले लोग हैं, और उसको मुरदा ही रखने वाले लोग हैं, मरी लाश को ही जो सम्हालने वाले लोग हैं, उनको कोई बाधा नहीं है। मैं कहता हूं--आग लगाओ इस लाश को। जो मर गया है, उसे जलाओ, ताकि हम नए के लिए जगह बना सकें। इसलिए बाधा है।
यह श्लोक प्रीतिकर है। धर्म एव हतो हंति, धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद धर्मो न हंतव्यो मा नो धर्मो हतो वधीत।

दूसरा प्रश्न: भगवान, थों तो म्हारा सगला मारवाड़ी समाज री नाक काट कर धर दी! कोई अच्छो भी करो; म्हारी लाज रखो!

चंपालाल समाज सेवक!
बात तो तूने भी बड़ी गजब की कही! मारवाड़ी समाज की कोई नाक है? जिसको मैं काट कर रख दूं। अरे, वह तो कब की कट गई भैया! किस नाक की बात कर रहे हो?
यही तो खूबी है मारवाड़ी समाज की: कोई लाख नाक काटे, नहीं काट सकता। नाक हो तो काटे!
मारवाड़ी की नाक तुम काट ही नहीं सकते। किसी और की काट सकते हो, काट लेना। मारवाड़ी की नाक कोई नहीं काट सकता। यह तो तुम बिलकुल गलत बात कह रहे हो। तुम कह रहे हो: थों तो म्हारा सगला मारवाड़ी समाज री नाक काट कर धर दी! कोई अच्छो भी करो। म्हारी लाज रखो!
लाज--और मारवाड़ी की? बड़ा कठिन काम दे रहे हो। चंपालाल समाज सेवक! सवाल तो बड़े कठिन-कठिन लोग पूछते हैं, मगर तुमने सबसे कठिन सवाल पूछा! चलो, कुछ कोशिश करें!
एक बार एक अमरीकी, एक रूसी एवं एक मारवाड़ी एक सज्जन के यहां चाय पर आमंत्रित थे। मारवाड़ी कोई और नहीं, पुराने परिचित तुम्हारे सेठ चंदूलाल ही थे। अमरीकी ने चाय पीकर अपना कप प्लेट में उलटा करके रख दिया। रूसी ने चाय पी कर अपना कप वैसा ही प्लेट में सीधा रखा। सेठ चंदूलाल जो अब तक उनके टेबल मैनर्स की नकल कर रहा था, उसने कुछ सोच कर अपना कप प्लेट में आड़ा लिटा कर रख दिया। उसकी इस क्रिया को देखकर अमरीकी ने चंदूलाल से प्रश्न किया, भाई, आपने अपना कप प्लेट में आड़ा क्यों लिटा दिया?
चंदूलाल बोले, पहले आप बताइए कि आपने अपना कप उलटा क्यों रख दिया?
अमरीकी ने कहा, क्योंकि मुझे चाय और नहीं चाहिए थी।
अब चंदूलाल ने रूसी से पूछा, आपने अपना कप सीधा क्यों रखा?
रूसी बोला, क्योंकि मुझे और चाय चाहिए।
रूसी और अमरीकी ने पूछा, लेकिन आपने अपना कप आड़ा क्यों लिटा रखा है? अब आप जवाब दें!
चंदूलाल ने कहा, यदि चाय और होगी तो मिल जाएगी, वरना कोई बात नहीं!
मारवाड़ी ऐसे सोच-विचार के लोग होते हैं! उन्हें तुम साधारण मत समझना। बड़े अपरिग्रही होते हैं।
चंदूलाल का नौकर घबड़ाया हुआ अंदर आया और बोला, मालकिन, मालकिन! बाहर सेठ साहब बेहोश पड़े हैं। उनके एक हाथ में कुछ कागज हैं और दूसरे हाथ में एक बड़ा-सा पैकेट है।
चंदूलाल की पत्नी चहक कर बोली, अरे, तो मेरी नई साड़ियां आ गईं!
चंदूलाल की उसी में जान गई! इतनी साड़ियां खरीद कर लाते-लाते हार्ट-अटैक न हो जाए, तो क्या हो! मगर मालकिन को देखा! क्या लाज बचाई मारवाड़ियों की! अरे, जीवन का क्या है! आना-जाना लगा रहता है। यह जिंदगी तो खेल है, इसमें कोई चिंता की बात नहीं। जनम-मरण, आवागमन होता ही रहता है। मगर साड़ियां आ गईं--यह बात पते की है।
एक जेबकतरा सेठ चंदूलाल से कह रहा था, यार आज एक पैसा भी नहीं मिला, उलटे एक जगह बहुत बेइज्जती हुई मेरी।
चंदूलाल बोले, बेइज्जती! क्या बात कर रहा है भाई! इसी काम को मैं बीस वर्ष से कर रहा हूं। कई बार मेरी पिटाई हुई है, दुत्कार मिला, गालियां भी मिलीं, मगर आज तक मेरी बेइज्जती--कभी नहीं! मेरी बेइज्जती आज तक नहीं हुई।
बेइज्जती, मानो तो बेइज्जत है। अरे ज्ञानियों की कहीं कोई बेइज्जती कर सकता है!
एक निहायत मोटी, भद्दी और बदसूरत महिला ने पुलिस के सिपाही से शिकायत की कि वह मूर्ख और पागल आदमी कई घंटे से मेरा पीछा कर रहा है।
पुलिस वाले ने महिला को कनखियों से देख कर कहा? जी नहीं, आप गलत फरमा रही हैं। वह आदमी न तो मूर्ख है और न पागल है। यह सेठ चंदूलाल है। उसका दिमाग खराब नहीं है। और न ही वह मूर्ख है। वह परमहंस है। भेद-भाव ही नहीं करता! क्या सुंदर, क्या असुंदर! इसलिए आपका पीछा कर रहा है। नहीं तो आप का पीछा कौन करे!
महिला ऐसी भद्दी, मोटी और बदसूरत थी, कि पीछा ही करे, तो वह करे किसी का! मगर परमहंस चंदूलाल उसका पीछा कर रहे हैं। परमहंस वृत्ति का तो लाभ देना ही पड़ेगा उनको। भाव नहीं, भेद नहीं; सब सम-भाव रखते हैं।
तुम कह रहे हो, किसी तरह लाज बचाने की कोशिश करो, तो मैंने कहा, चलो, किसी तरह लाज बचानी चाहिए!
चंदूलाल ने अपनी नवविवाहित पत्नी को समझाते हुए कहा:
और यह है मेरी धाय मां का चित्र!
बचपन में इन्हीं ने मुझे दूध पिलाया था।
मर ही गया होता
इन्होंने मुझे जिलाया था।
आह, इनका हृदय बाहर भीतर से
कितना साफ, स्वच्छ, पारदर्शक और पवित्र था।
वधू ने दोनों हाथ जोड़ दिए,
सामने निपल लगी दूध की बोतल का चित्र था!
इसको कहते हैं भक्ति-भाव! अरे जिसने जीवन बचाया, वही मां है। और फिर स्वच्छ बोतल, पवित्र, पारदर्शक! और जिसने जीवन बचाया, आज तक उसकी याद कर रहे हैं; उसकी तस्वीर लगाए हुए हैं। यूं भूलते नहीं किसी के उपकार को।
सेठ चंदूलाल संतोषीमैया के दर्शन को रोज जाते थे। माताराम के दर्शन का बे बड़ा लाभ लेते थे। गदगद होते थे। एकदम उनकी गोदी में सिर रख कर उलटने-पलटने लगते थे। जो-जोर से जै सीतामैया की, जै सीतामैया की--उदघोष करते। उनके भक्ति-भाव से माताराम भी अति प्रसन्न थीं। और उनकी कुंडलिनी जगाने का अतिरिक्त उपाय भी करती थीं। मगर चंदूलाल ठहरे मारवाड़ी, कुंडलिनी बस खुस-पुस होकर रह जाती थी! जगाए-जगाए न जगे! अब मारवाड़ी-कुंडलिनी कभी सुना कि जगी है! ऐसी सरसराहट हो और बस खतम--खेल खतम! पैसा हजम!
एक दिन संतोषीमैया ने कहा चंदूलाल से कि रातभर तुम्हारे लिए दुआएं करती रही। चंदूलाल बोले, आपने बेकार इतना कष्ट किया। अरे, मुझे फोन कर देतीं, मैं तुरंत आपके पास पहुंच जाता। बड़े शर्माते हुए उन्होंने कहा कि मैं तो रात-रात बैठा ही रहता हूं कि मैया कब बुलाएं! और मैं हाजिर हो जाऊं! आपको मेरे लिए दुआ करने की जरूरत क्या है! बस फोन करने की जरूरत थी!
मारवाड़ी के लक्ष्य बड़े परोक्ष होते हैं--प्रत्यक्ष नहीं। सीधा-साधा वह कोई काम नहीं करता। तीर भी चलाता है, तो तिरछे-तिरछे चलाता है। मगर निशाने पर बैठा देता है।
मारवाड़ी से कई बातें सीखने जैसी हैं।
चंपालाल समाज सेवक! जैसे मारवाड़ी बदलता नहीं--सारा जगत बदलता है, मगर मारवाड़ी नहीं बदलता।
बूढ़े हो गए थे चंदूलाल। अस्सी साल की उमर। एक दिन पत्नी ने कहा कि अब तुम मुझे पहले जैसा प्रेम नहीं करते। तुम्हारा हृदय बदल गया! पहले तो तुम मुझे चूमते थे, तो काट भी लेते थे।
चंदूलाल ने कहा, कभी नहीं, मेरा हृदय कभी नहीं बदलेगा। अरे मारवाड़ी कभी बदलता ही नहीं। अभी भी काट सकता हूं। जरा जा तू बाथरूम में से मेरे दांत उठा ला!
चंदूलाल--आखिरी कहानी उनके बाबत। इससे अगर लाज बच जाए, तो बच जाए। और न बचे, तो भाई, फिर मैं भी नहीं बचा सकता! फिर मैं भी क्या कर सकता हूं! जहां तक मेरा बस है, वहां तक खींचता हूं।
चंदूलाल एक दिन शराबघर में पहुंचे। दुकान के मालिक से कहा कि अगर मैं अपने बाएं आंख को दांत से काट कर बता दूं, तो शराब मुफ्त पीऊंगा!
दुकानदार ने भी सोचा कि कैसे काटेगा दांत से आंख को! उसने कहा, अच्छा। यह रही शराब। उसने बोतल भर कर रख दी।
चंदूलाल ने अपनी आंख निकाली। एक आंख तो उनकी नकली है ही। और दांत से काट कर बता दिया। सिर पीट लिया दुकानदार ने। पूरी बोतल पा गए। बोले कि अगर एक बोतल और पिलाओ, तो दूसरी आंख भी दांत से काट कर बात दूं!
दुकानदार ने सोचा कि दोनों आंखें तो अंधी हो नहीं सकतीं। यह चलता-फिरता है; कभी कुर्सी से नहीं टकराया। अरे शराब भी पी ले, तब नहीं टकराता। मारवाड़ी बेहोश होता ही नहीं। कितनी ही शराब पी ले, अपनी जेब पकड़े रहता है! एक पैसा कभी ज्यादा नहीं देता। यह दूसरी आंख कैसे काटेगा!
उसने कहा, अच्छा ठीक। एक बोतल नहीं, दो बोतल पिलाऊंगा। ये दो बोतल रहीं।
चंदूलाल के दांत नकली। उन्होंने दांत निकाल कर आंख काट कर बात दी!
उस दुकानदार ने सिर पीट लिया। उसने कहा, हद्द हो गई! मारवाड़ी से कौन जीते!
चंदूलाल ने कहा, और है हिम्मत!
उसने कहा, भैया, अब तू और क्या करेगा!
चंदूलाल ने कहा, वह देखते हो, उस कोने में कम से कम तीस फीट दूर टेबल पर जो गिलास रखा है खाली?
कहा, हां, देखता हूं।
यहीं से पेशाब करके उसको भर सकता हूं!
अब तो, दुकानदार ने कहा कि यह बेटा, नहीं कर पाओगे। हजार रुपए का दांव लगाता हूं।
कहा, लगा ले। निकाल हजार, यहां रख। ये मेरे हजार रखे हैं।
दुकानदार ने सोचा: अब सब वसूल कर लेना ठीक है, क्योंकि...। यह क्या, इसके बाप-दादे भी इकट्ठे हो जाएं सब, तो तीस फीट दूर गिलास को भर दे जीवन-जल से--बहुत मुश्किल है।
और चंदूलाल ने पेशाब करनी शुरू की। तीस फीट दूर जाना क्या--तीन फीट मुश्किल से गई! इधर टेबल पर गिरी, इधर नीचे फर्श पर गिरी। वह दुकानदार बेचारा उठा और जल्दी से गमछा ले कर पोंछने लगा, सफाई करने लगा। और हंसने भी लगा।
चंदूलाल ने कहा, अरे, हंस मत रे! मारवाड़ी से कोई कभी जीता!
कहा, अब क्या! भद्द हो गई तेरी। तीन फीट तो जाती नहीं, तीस फीट पहुंचा रहा था!
अरे, उसने कहा, तू बाहर देखता है, वह आदमी खड़ा है। उससे मैंने शर्त लगाई है कि पांच हजार रुपए लूंगा: अगर पेशाब करूं और न यह गमछा उठा कर पोंछे; न केवल पोंछे, बल्कि हंसे भी। देख ले। वह आदमी रो रहा है खड़ा। तू हजार की बातों में पड़ा है, पांच हजार की शर्त है!
मारवाड़ी बच्चा से कोई कभी जीता नहीं। चंपालाल, तुम फिक्र न करो। कोई नाक है ही नहीं; कट सकती नहीं! नाक वगैरह तो बेच चुके पहले ही। झंझट ही खतम कर ली है।
और तुम चिंता न करो। लाज मारवाड़ी की क्या बचानी! अरे वह खुद अपनी लाज बचाने में समर्थ है। उस जैसी होशियारी, उस जैसी कला, उस जैसा कौशल किसका!
योरोप में कहावत है कि अंग्रेज की जेब फ्रेंच काट मार ले जाता है। फ्रेंच की जेब इटैलियन झटक लेता है। इटैलियन की जेब जर्मन झटक लेता है। जर्मन की जेब यूनानी नहीं छोड़ता। और यूनानी की जेब सिर्फ शैतान काट सकता है। उनको मारवाड़ियों का पता नहीं। मारवाड़ी शैतान की जेब काट लाते हैं!
तुम्हें पता हो या न पता हो, शैतान नरक के द्वार पर पहले पूछ लेता है, भैया, मारवाड़ी तो नहीं हो! मारवाड़ी हो तो स्वर्ग जाओ। यहां जगह नहीं। यहां जगह बिलकुल है ही नहीं। क्योंकि एक मारवाड़ी को भीतर लेना खेतरे से खाली नहीं। तुम अभी उपद्रव शुरू कर दोगे। अभी झंझट खड़ी हो जाएगी। एक दफे लिया था एक मारवाड़ी को, सो बस। उसके बाद जब से उससे छुटकारा हुआ है, तब से नर्क में भी जगह नहीं है।
एक जहाज पर एक व्हेल मछली हमला कर रही है--बार-बार हमला कर रही है। आखिर घबड़ा कर सामान लोग फेंक रहे हैं मछली के मुंह में। थोड़ी देर वह चबाचुबू कर फिर आ जाती। बक्से चले गए, कुर्सियां चली गईं, संतरे के बोरे थे वे चले गए। आखिर जब कुछ न बचा तो एक मोटे मारवाड़ी को लोगों ने उठा कर फेंक दिया! मगर उससे भी हल न हुआ। थोड़ी देर में फिर व्हेल आ गई! धीरे-धीरे करके सब जहाज के यात्री भी अंदर चले गए। जब जहाज का कप्तान पहुंचा, तो देख कर दंग रह गया। मारवाड़ी कुर्सी पर बैठा था। टेबल सामने रखी थी। टेबल पर संतरे सजाए हुए था और चार-चार आने में बेच रहा था! और बाकी यात्री खरीद रहे थे!
मत चिंता करो--चंपालाल समाज सेवक! तुम मारवाड़ियों की सेवा करने का इरादा रखते हो क्या? जरा अपनी जेब सम्हाल कर चलना। और अगर खुद ही मारवाड़ी हो, तो फिर मुझे कोई चिंता नहीं। क्योंकि समाज सेवा के नाम से तुम सिर्फ जेब काटोगे--और कुछ भी नहीं कर सकते हो।
आज इतना ही।
श्री रजनीश आश्रम, पूरा, प्रातः, दिनांक २२ जुलाई, १९८०