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गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

अनंत की पुकार—(अहमदाबाद)-प्रवचन-09

अनंत की पुकार(अहमदाबाद)

ओशो

प्रवचन-नौवा-(धर्म की एक सामूहिक दृष्टि)

मेरे प्रिय आत्मन्!
इस देश के दुर्भाग्य की कथा बहुत लंबी है। समाज का जीवन, समाज की चेतना इतनी कुरूप, इतनी विकृत और विक्षिप्त हो गई है जिसका कोई हिसाब बताना भी कठिन है। और ऐसा भी मालूम पड़ता है कि हमारी संवेदनशीलता भी कम हो गई है, यह कुरूपता हमें दिखाई भी नहीं पड़ती। जीवन की यह विकृति भी हमें अनुभव नहीं होती। और आदमी रोज-रोज आदमियत खोता चला जाता है, उसका भी हमें कोई दर्शन नहीं होता।
ऐसा हो जाता है। लंबे समय तक किसी चीज से परिचित रहने पर मन उसके अनुभव करने की क्षमता, सेंसिटिविटी खो देता है। बल्कि उलटा भी हो जाता है; यह भी हो जाता है कि जिस चीज के हम आदी हो जाते हैं वह तो हमें दिखाई नहीं पड़ती, ठीक चीज हमें दिखाई पड़े तो वह भी हमें दिखाई पड़नी मुश्किल हो जाती है।

एक मछली बेचने वाला आदमी एक सुगंधियों के बाजार से गुजरता था। उसे मछलियों की बास की आदत थी, सुगंध का कोई अनुभव न था। जैसे ही उसको सुगंध आनी शुरू हुई, उसने कपड़े से अपनी नाक बंद कर ली; सोचा कि बड़ी तकलीफ है, यहां कैसी दुर्गंध चली आती है! वह बाजार तो सुगंध का था। वह तो उस देश की सबसे कीमती से कीमती सुगंध, परफ्यूम वहां बिकती थीं। जैसे-जैसे बाजार के भीतर चला, उसके प्राण छटपटाने लगे। फिर वह बेहोश होकर गिर पड़ा। दुकानदार दौड़ कर आ गए। उन्होंने सोचा कि शायद थक गया है, गर्मी से पीड़ित है। तो उन्होंने अच्छी सुगंधियां लाकर उसे सुंघानी शुरू कीं कि शायद होश आ जाए। अब उन बेचारों को पता भी नहीं कि वह सुगंध से ही पीड़ित होकर बेहोश हो गया है। जैसे वे उसे सुगंध सुंघाने लगे, वह और हाथ-पैर छटपटाने लगा। वे और सुगंध सुंघाने लगे।
और तभी वहां से एक दूसरा मछुआ गुजरता था। उसने कहा, ठहर जाओ! उस आदमी के हाथ के झोले को देखते हो? उसकी टोकरी देखते हो? वह कोई मछुआ है, मैं भलीभांति जानता हूं। हटो, हटा लो अपनी सुगंधियों को!
उसने उसकी टोकरी पर, जिसमें वह मछलियां बेच कर लौट रहा था, थोड़ा सा पानी छिड़क दिया और टोकरी उसकी नाक के पास रख दी। उसने आंख खोली और कहा, दिस इज़ रियल परफ्यूम! यह है सुगंध असली! पागल न मालूम क्या-क्या सुंघा रहे थे मुझे।
समाज की संवेदनशीलता भी इसी तरह मर जाती है।
इस देश में ऐसा हुआ। इस देश में कोई सैकड़ों वर्षों के चिंतन ने मनुष्य को सामूहिक चेतना, सोशल कांशसनेस से बिलकुल ही तोड़ दिया। हिंदुस्तान की सारी शिक्षाएं व्यक्ति को निपट स्वार्थी बनाती हैं, उसे सामूहिक चेतना का अंग नहीं बनातीं। इस जमीन पर वह आदमी अपने लिए धन कमाता है, अपने लिए मकान बनाता है; परलोक में अपने मोक्ष को खोजता है, अपने स्वर्ग को खोजता है। दूसरे से कोई संबंध नहीं। अगर हिंदुस्तान के शिक्षकों ने यह भी समझाया है कि दूसरों पर दया करो, दूसरों को दुख मत दो, तो उसका भी कारण यह नहीं है कि दूसरों को दुख देना बुरा है। उसका कारण यह है कि दूसरों को तुम दुख दोगे तो नरक चले जाओगे। दूसरों को दुख न दोगे तो स्वर्ग चले जाओगे। बेसिक मोटिव, जो बुनियादी प्रेरणा है वह मैं स्वर्ग कैसे चला जाऊं, मैं मोक्ष कैसे पा लूं, यह है। दूसरे को दुख मत दो, इसमें कोई बुनियादी बुराई नहीं है, बुराई इसमें है कि कहीं मेरा मोक्ष न खो जाए।
हिंदुस्तान ने अहिंसा की इतनी बातें कीं, लेकिन हिंदुस्तान में प्रेम की कोई प्रक्रिया विकसित नहीं हो सकी। इस अहिंसा की शिक्षा में कोई बुनियादी भूल रही होगी। अहिंसा की शिक्षा कहती है: हिंसा मत करो। क्योंकि हिंसा करने से स्वर्ग खोता है, मोक्ष खोता है; हिंसा करने से पाप लगता है; पाप बंधन में ले जाते हैं।
अहिंसा की शिक्षा यह नहीं कहती कि दूसरे को दुख पहुंचता है, इसका विचार करो; कि दूसरे के प्रति प्रेम करो कि उसको दुख न पहुंच सके। दूसरे का चिंतन नहीं है अहिंसा की शिक्षा में, अपना ही चिंतन है, मेरे ही अहंकार का, मेरे ही स्वार्थ का अंतिम चिंतन है। इसलिए हिंदुस्तान ने सबसे पहले दुनिया में अहिंसा की शिक्षा खोज ली, लेकिन हिंदुस्तान में प्रेम का कोई भी पता नहीं है। यह बड़े आश्चर्य की बात है! हम इतनी अहिंसा की बात करते हैं, हम से ज्यादा प्रेम-शून्य लोग पृथ्वी पर कहीं भी नहीं हैं। कुछ बात है।
हमारी अहिंसा की शिक्षा भी बुनियाद में मेरे हित पर खड़ी हुई है, दूसरे का कोई चिंतन उसमें नहीं है। अगर हमें पता चल जाए कि दूसरे को कष्ट देने से स्वर्ग जाने में कोई बाधा नहीं पड़ती, तो हम कष्ट देने में फिर कोई परेशानी अनुभव नहीं करेंगे। और अगर हमें यह पता चल जाए कि दूसरे को कष्ट देने से स्वर्ग जाने में सुविधा मिलती है, तो हम पूरी तरह से कष्ट देने को तैयार हो जाएंगे।
मेरा हित, हमारी सांसारिक शिक्षा का भी आधार है, हमारी धार्मिक शिक्षा का भी आधार है। और मेरी दृष्टि में वह व्यक्ति साधना के रास्ते पर आगे बढ़ता है जो "मेरे' के भाव को खोता है और "सब' के, "हम' के भाव को स्वीकार करता है। ईश्वर की तरफ जाने की विधि "मैं' को छोड़ कर "हम' की तरफ जाने की विधि है।
हम कितने वृहत्तर जीवन के हित और सुख के लिए सोचते हैं...। और यह तो सहज ही घटित हो जाता है कि जो व्यक्ति जितने वृहत्तर जीवन के सुख और हित के लिए सोचता है, उसके अपने दुख तत्क्षण विलीन हो जाते हैं। क्योंकि दुखों की एक बुनियाद सेल्फ कांशसनेस है। दुखों की एक आधारशिला यह है कि मैं अपने प्रति कितना सचेत हूं।
एक सम्राट बीमार पड़ा था। कोई चिकित्सा नहीं हो सकी। मरने के करीब पहुंच गया। सब चिकित्सक हार गए। और तब किसी ने कहा कि दूर इस गांव के बाहर एक संन्यासी है, शायद वह कोई रास्ता बता दे।
उस संन्यासी को लिवा लाया गया। उस संन्यासी ने कहा कि नहीं, मैं रास्ता नहीं बता सकूंगा। रास्ता तो बड़ा सरल है, लेकिन मैं बता नहीं सकूंगा। मुझे क्षमा कर दें।
सम्राट कहने लगा, रास्ता जब सरल है तो बता क्यों नहीं सकेंगे?
उसने कहा, रास्ता तो मैं बता दूंगा, लेकिन...सरल भी है...पर आप कर नहीं पाएंगे, बहुत कठिनाई खड़ी हो जाएगी। लेकिन बच सकते हैं आप, मौत निश्चित नहीं है।
सम्राट ने पैर पकड़ लिए। कहा, रास्ता बता दें।
नहीं!
दरबारी, रानियां, सारी राजधानी हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई कि आप जाएं न, बता दें।
उसने कहा, नहीं आप मानते हैं तो मैं बताए देता हूं। दस हजार बच्चों की गर्दन कटवानी पड़ेंगी और उनके खून से स्नान कराना पड़ेगा, तो सम्राट बच जाएगा। मैं जाता हूं। मैं और कुछ ज्यादा नहीं कह सकता। सम्राट बच सकता है। लेकिन फलां तारीख तक दस हजार बच्चे इकट्ठे कर लें। फलां तारीख को फलां समय उनकी गर्दनें काट दें, ताजे खून से नहला दें, सम्राट बच जाएगा।
छह महीने थे उस तारीख को अभी। सम्राट ने कहा कि नहीं, मैं नहीं बचना चाहता हूं। दस हजार बच्चे काटने पड़ें! और फिर एक अजनबी फकीर, इसकी बात का भरोसा क्या? मैं बचूं या न बचूं, वे दस हजार बच्चे तो कट जाएंगे! फिर मैं बच भी जाऊंगा तो कितने दिन बचूंगा? आखिर मुझे मरना पड़ेगा। फिर मैं तो बूढ़ा हो गया, दस हजार बच्चे, अभी जीवन जिनका शेष है, उन्हें कैसे समाप्त कर दूं? लेकिन परिवार के लोग समझाने लगे, दरबारी समझाने लगे, राजधानी के बुद्धिमान समझाने लगे कि तुम्हारा एक जीवन दस हजार बच्चों के जीवन से ज्यादा कीमती है। तुम हो तो दस हजार बच्चे नहीं, दस करोड़ बच्चे सुरक्षित हैं इस देश में। तुम जिस दिन नहीं हो उस दिन किसी का भी जीवन सुरक्षित नहीं है। वह इतना प्यारा राजा था, वह इतना बुद्धिमान, वह इतना दया से, करुणा से भरा कि सारे देश ने प्रार्थना की कि दस हजार बच्चों की हम फिकर नहीं करते हैं, हम तुम्हें बचाना चाहते हैं।
मजबूरी में राजा को राजी हो जाना पड़ा। बच्चे इकट्ठे किए जाने लगे। महल छोटे-छोटे खूबसूरत बच्चों से भरने लगा। राजा की नींद समाप्त हो गई। राजा दिन-रात सोचने लगा कि यह मैं क्या करवा रहा हूं? यह क्या होगा? रात-दिन बच्चे ही बच्चे दिखाई पड़ने लगे। दस हजार बच्चे गांव-गांव से आने लगे। और गांव-गांव में लोग भगवान से प्रार्थना करने लगे कि राजा पहले ही ठीक हो जाए, तो बच्चे बच जाएं। कोई गाली देने लगा कि यह राजा कैसा है! यह मर जाए उस तारीख के पहले ही, तो बच्चे बच जाएं। सारे देश में एक ही चिंता, और राजा के प्राणों में एक ही चिंता।
छह महीने पूरे हो गए, वह दिन आ गया। दस हजार बच्चे इकट्ठे हो गए। आज सुबह होते ही, भोर होते ही उनकी गर्दनें काट दी जाएंगी। वह महल के बाहर द्वार पर दस हजार बच्चे पंक्तिबद्ध खड़े कर दिए गए। नंगी तलवारें सूरज की रोशनी में चमकने लगीं। वह राजा नीचे आया। उसने उन बच्चों को एक कतार से देखा एक तरफ। वक्त आ गया, तलवारें उठ गईं और बच्चे काट दिए जाएंगे। तभी वह राजा चिल्लाया कि नहीं! कोई बच्चा नहीं काटा जाएगा! मैं मरने को तैयार हूं।
बच्चे रोक दिए गए। और राजा ठीक हो गया। बड़ी हैरानी हुई कि राजा ठीक कैसे हो गया? राजा की बीमारी खतम हो गई! उस फकीर को बुलवाया गया कि बीमारी कैसे ठीक हो गई? बच्चे तो रोक दिए गए।
उस फकीर ने कहा, कुल एक कारण है--छह महीने तक राजा अपनी बीमारी के संबंध में सोच ही नहीं सका। बच्चे मर जाएंगे, इतने बच्चे मर जाएंगे--एक ही चिंतन! अपने से बाहर चला गया चिंतन, सेल्फ से बाहर चला गया, मैं के बाहर चला गया। वह जो चिंतन मैं पर रुका हुआ था, वही पीड़ा थी, वही कष्ट था, वही दुख था।
एक आदमी सो नहीं पाता है, फिर उसकी बीमारी ठीक नहीं हो पाती। चिकित्सक कहते हैं, इसे नींद आ जाए तो ठीक हो जाए। नींद से बीमारी के ठीक होने का क्या संबंध है? कोई भी संबंध नहीं है। सिर्फ एक संबंध है--नींद में भूल जाता है कि मैं बीमार हूं। और कोई भी संबंध नहीं है। नींद में डिसकंटिन्यूटी हो जाती है इस खयाल की कि मैं बीमार हूं। मैं के बाहर नींद में आदमी चला जाता है। इसलिए नींद जरूरी है, नहीं तो आदमी पागल हो जाए। मैं तो पागलपन का केंद्र है, वह तो मैडनेस का सीक्रेट है। पागल होना हो तो मैं, और मैं, और मैं...
मैं के बाहर जाना जरूरी है, नहीं तो आदमी पागल हो जाएगा। इसलिए नींद जरूरी है। और जिस मुल्क में नींद कम हो जाएगी वहां शराब जरूरी हो जाएगी, क्योंकि उतनी देर के लिए आदमी भूल सकता है, और कोई रास्ता नहीं है। लेकिन शराब और नींद और बेहोशी वास्तविक चीजें नहीं हैं जिनसे कोई भूल सके, क्योंकि कंटिन्यूटी फिर शुरू हो जाती है। शराब कितनी देर रहेगी? फिर होश आ जाएगा, फिर शुरू हो जाएगा; नींद खुल जाएगी, फिर शुरू हो जाएगा।
लेकिन एक ऐसी आध्यात्मिक प्रक्रिया भी है, उसको प्रेम कहते हैं, उस प्रक्रिया को, कि प्रेम में जो आदमी प्रविष्ट हो जाता है वह मैं के सतत बाहर हो जाता है।
मैं क्यों यह बात कहना चाहता हूं?
यह मैं इसलिए कहना चाहता हूं कि साधक अकेला अगर साधक है, तो अहंकार के बाहर नहीं हो सकेगा, कभी नहीं हो सकेगा। क्योंकि सारी साधना का केंद्र भी उसका मैं है--कि मैं कैसे शांत हो जाऊं? मैं कैसे मुक्त हो जाऊं? मैं कैसे मोक्ष चला जाऊं?
लोग मेरे पास आते हैं, वे कहते हैं, मैं कैसे शांत हो जाऊं?
मैं उनसे कहता हूं, तुम्हें इतनी दुनिया अशांत है इसके बीच तुम्हें एक ही खयाल आ रहा है कि मैं कैसे शांत हो जाऊं? और तुम्हें पूछते शर्म भी नहीं आती?
यह बंबई पूरी की पूरी बीमार पड़ी हो, लोग खाटों पर पड़े हों, एक आदमी स्वस्थ न हो और मैं कहूं कि मैं स्वस्थ कैसे हो जाऊं, तो मुझे आप क्या कहेंगे? पत्थर या आदमी! ये सारे लोग भूखे हों और मैं कहूं कि मुझे अच्छा भोजन कैसे मिल जाए, तो मुझे आप क्या कहेंगे?
इतने अशांत जीवन के तलों में, इतने रुग्ण समाज में जब एक आदमी पूछने लगता है--मैं कैसे शांत हो जाऊं? मैं कैसे सत्य को पा लूं? मैं कैसे मोक्ष चला जाऊं? निश्चित समझ लेना, न तो यह कभी सत्य पा सकेगा, न कभी शांत हो सकेगा, न इसके लिए कोई मोक्ष हो सकता है कहीं। और अगर ऐसे लोगों के लिए मोक्ष होता हो, तो महावीर, बुद्ध, और कृष्ण, और क्राइस्ट जैसे लोग उस मोक्ष में जाने से पहले ही इनकार कर चुके होंगे। वह उसके भीतर कदम नहीं रखा होगा उन्होंने। ऐसे आदमी जिस मोक्ष में जा सकते हों उस मोक्ष में भले आदमियों के लिए कोई जगह नहीं हो सकती।
एडमंड बर्क से किसी ने पूछा कि तुम तो ईश्वर को नहीं मानते हो, मंदिर में प्रार्थना नहीं करते हो, पूजा नहीं करते हो, तुम्हें कभी धर्मशास्त्र की बात करते नहीं सुना, क्या तुम स्वर्ग जा सकोगे?
एडमंड बर्क ने कहा कि अगर अच्छे लोगों को स्वर्ग में जगह मिलती होगी तो मुझे मिल जाएगी और अगर बुरे लोगों को स्वर्ग में जगह मिलती हो तो मैं वहां जाना भी नहीं चाहूंगा। और उस आदमी ने यह कहा कि मैं तो समझता यह हूं कि जहां दस अच्छे लोग इकट्ठे हो जाएंगे वहां नरक भी होगा तो बहुत दिन तक नरक नहीं रह सकता, वह स्वर्ग बन जाएगा। और जहां दस बुरे लोग इकट्ठे हो जाएंगे वह उसका नाम अगर स्वर्ग भी हो तो तख्ती भर स्वर्ग की रह जाएगी, दस दिन बाद वहां नरक खड़ा हो जाएगा। तो उसने कहा, मैं नहीं कहता कि मैं स्वर्ग जाना चाहता हूं। मैं वहां जाना चाहता हूं जहां अच्छे लोग हैं, जहां प्रेम करने वाले लोग हैं, मैं वहां जाना चाहता हूं। वहां स्वर्ग होगा।
लेकिन प्रेम करने वाले लोग इस मुल्क में नहीं हैं, इसलिए हमने एक नरक बना लिया है।
मैं जो बातें कह रहा हूं वे साधना के नाम पर, मोक्ष के नाम पर, धर्म के नाम पर जो भी चलता रहा है, उस पूरे को तोड़ने और बदल देने की बातें हैं। एक बड़ी क्रांति लाने का विचार और खयाल उनमें है--कि हम, मुल्क की चेतना अब तक जिन केंद्रों पर घूमती रही है, उन सारे केंद्रों को बदल दें। क्योंकि उन केंद्रों पर घूमने के कारण यह परिणाम हुआ है जो हमें दिखाई पड़ रहा है। यह परिणाम आकस्मिक नहीं है। एक-एक चीज जुड़ी हुई है।
हिंदुस्तान एक हजार साल तक गुलाम रहा, यह आकस्मिक नहीं है। हिंदुस्तान में सामूहिक चेतना ही नहीं है। गुलाम नहीं रहेगा तो क्या होगा! आजाद हो गया, यह मिरेकल है, यह चमत्कार है! यह आजादी बड़ी बेबूझ है। यह किसी की कृपा होगी, यह कोई अंतर्राष्ट्रीय स्थितियों का कारण होगा। हमारी कोई पात्रता नहीं है, हमारे पास समूह का कोई भाव नहीं है।
सामूहिक आत्मा, हमारे पास ऐसी कोई चीज नहीं है। मैं मैं, आप आप, वह वह। मुझे अपने रास्ते जाना, आपको आपके रास्ते जाना, उसको उसके रास्ते जाना है। और हमें पता ही नहीं है कि हमारे रास्ते एक-दूसरे को काटते हैं। मैं अपने रास्ते जाता हूं तो आपको रोकता हूं, आप अपने रास्ते जाते हैं तो मुझे रोकते हैं।
हम यहां सारे लोग अभी निकलना शुरू कर दें इस दरवाजे से, हम सब निकलना चाहेंगे, और हम सबके निकलने की आकांक्षा सबको रोकने का कारण बन जाएगी। लेकिन नहीं, हम एक-एक होकर निकल जाते हैं, हम ठहरते हैं, रास्ता देते हैं दूसरे को, और हम सब निकल जाते हैं।
जब मैं किसी दूसरे को निकलने का रास्ता देता हूं, तो मैं अपना रास्ता भी निश्चित ही बना लेता हूं। लेकिन जब मैं अपना ही रास्ता खोजता हूं, तो मैं अपना रास्ता भी तोड़ता हूं, दूसरे का रास्ता भी तोड़ता हूं।
जीवन एक सामूहिक उपक्रम है।
तो भारत को धर्म की एक सामूहिक दृष्टि पैदा करनी है। साधना को समाज से जोड़ देना है। व्यक्ति को समूह-चेतना के विरोध में खड़ा नहीं करना है; उसे, व्यक्ति को समूह-चेतना के संयोग में, संयुक्तता में खड़ा करना है।
यह कौन करेगा? यह कैसे होगा? ये पांच हजार साल के केंद्र, गलत और भ्रांत, कैसे तोड़े जाएंगे? यह कोई मेरे बस की बात नहीं है। यह किसी एक आदमी के बस की बात नहीं हो सकती। यह कोई एक दिन का काम भी नहीं हो सकता। लेकिन कमजोर से कमजोर दस लोग भी संयुक्त हो जाएं और किसी दिशा में काम शुरू कर दें, तो आज जो छोटा सा बीज है वह कल बड़ा वृक्ष बन जाए तो बहुत आश्चर्य नहीं।
और यह तो हमें खयाल नहीं करना चाहिए। मौसमी पौधे लगाए जाते हैं तो दो महीने के भीतर फूलों से लद जाते हैं। लेकिन दो महीने बाद जमीन साफ होती है; न वहां फूल होते हैं, न पौधे होते हैं। जिन्हें बड़े वृक्ष लगाने हैं जिनके नीचे हजारों लोग छाया ले सकें, उन्हें यह खयाल छोड़ देना चाहिए कि वे वृक्ष मैं ही लगा लूंगा, मेरी ही जिंदगी में लगा लूंगा, मेरे ही सामने हजारों लोग छाया ले लेंगे, यह पागलपन की बात छोड़ देनी चाहिए। यह भी अहंकार का ही हिस्सा है। लेकिन उन्हें काम शुरू कर देना चाहिए, छोटा सा सही।
और स्मरण रखें, इस जगत में छोटी से छोटी चीज का मूल्य है। इतना मूल्य है जिसका कोई हिसाब नहीं। क्योंकि अंतिम निर्णय में, वह जो अल्टीमेट कनक्लूजन होगा जिंदगी का, उसमें छोटी और बड़ी चीज में फर्क नहीं रह जाएगा। उसमें छोटी चीज ने अपने फर्ज अदा किए हैं। एक इतनी छोटी सी घटना का मूल्य होता है जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते हैं।
नेपोलियन छह महीने का था और एक बिस्तर पर लेटा हुआ है। एक जंगली बिल्ली आ गई और उसकी छाती पर चढ़ गई। आप सोच सकते हैं कि एक जंगली बिल्ली का दुनिया के इतिहास के बनाने में कोई हाथ हो सकता है? या एक छोटे से बच्चे की छाती पर एक बिल्ली का चढ़ जाना हिस्टॉरिकल इम्पॉरटेंस ले सकता है, कोई ऐतिहासिक मूल्य हो सकता है इस बात का? कोई भी मूल्य नहीं है। नौकर ने आकर बिल्ली को भगा दिया।
लेकिन छह महीने के नेपोलियन के मन में बिल्ली का भय हमेशा के लिए समा गया। फिर वह नंगी तलवार से जूझते आदमी से नहीं डरता था, शेर के सामने नहीं डरता था, लेकिन बिल्ली के सामने उसके प्राण कंप जाते! जिस लड़ाई में नेपोलियन हारा, नेल्सन, उसका दुश्मन सत्तर बिल्लियां अपनी फौज के सामने बांध कर ले गया था। बिल्लियों को नेपोलियन ने देखा और उसके प्राण कंप गए! और उसने अपने साथी से कहा, आज जीत बहुत मुश्किल है, बिल्लियां देखते से ही मैं बस में नहीं रह जाता!
वह पहली बार हारा! इतिहासज्ञ कहते हैं कि नेपोलियन को नेल्सन ने हरा दिया। मनोवैज्ञानिक कहते हैं: बिल्लियों ने हरा दिया। और मैं मनोवैज्ञानिकों से सहमत हूं, इतिहासज्ञ कुछ भी नहीं जानते हैं।
इतनी छोटी सी, फिजूल की घटना, मीनिंगलेस, इतना बड़ा परिणाम ला सकती है क्या? और नेपोलियन के हारने से क्या फिर हुआ, इसके लिए तो बहुत...। अगर नेपोलियन नहीं हारता तो क्या होता? दुनिया बिलकुल दूसरी होती। अगर हिटलर नहीं हारता तो दुनिया दूसरी होती। नेपोलियन नहीं हारता, दुनिया दूसरी होती। नेपोलियन नहीं हारता अगर बिल्ली उसकी छाती पर न चढ़ती। एक बाहर बैठा हुआ नौकर बिल्ली को भगा सकता था, दुनिया का इतिहास दूसरा होता। कोई कभी सोचता नहीं कि एक नौकर के द्वारा एक बिल्ली का भगा दिया जाना इतना मूल्यवान हो सकता है।
जीवन के इस वृहत्तर संबंध में, यह जो इनर कॉरेस्पांडेंस ऑफ थिंग्स है, यह जो जीवन की सारी चीजों का अंतर्संबंध है, इसमें छोटी सी चीज का उतना ही मूल्य है जितना बड़ी से बड़ी चीज का। इसमें एक सूरज के और एक दीये के मूल्य में कोई फर्क नहीं है। कई बार दीया सूरज से ज्यादा मूल्यवान साबित हो सकता है और कई बार सूरज दीया से छोटा साबित हो सकता है। जिंदगी का गणित बहुत बेबूझ है। छोटे से काम के बड़े परिणाम हो सकते हैं। और काम अगर ठीक दिशाओं में चले...
इतने ही हम, इतना ही आश्वासन ले सकते हैं अपने मन में कि कोई ठीक दिशा में काम को हमें ले जाना है। अगर हिम्मत से कुछ थोड़े से मित्र इकट्ठे होकर किसी काम में लगते हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं कि दस-पंद्रह वर्ष के भीतर सारे मुल्क की नैतिक-चेतना में एक आंदोलन उपस्थित किया जा सके। चेतना तैयार है आंदोलन के लिए। जैसे कोई घर बिलकुल तैयार हो जल जाने के लिए, सिर्फ एक चिनगारी डालने की जरूरत हो। कोई भी यह चिनगारी डालेगा तो यह आग लग जाएगी। और अगर यह आग लग जाए तो मुल्क के प्राण नये हो सकते हैं, निखर सकते हैं।
गांव-गांव मैं घूम रहा हूं, लाखों लोगों से मिल रहा हूं। उनकी आंखों से, उनके प्राणों से, उनकी बातों से मुझे लगता है कि वे तैयार हैं--कोई पुकारे, कोई चिनगारी फेंके, कोई कहे। चीजें अपने आप मर जाती हैं, कभी धक्का देने भर की जरूरत होती है।
क्या बचा है? पुरानी परंपरा की कोई भी चीज जीवित नहीं है, सिर्फ मुर्दे खड़े हैं। कोई धक्का दे दे और वे गिर जाएंगे। वे मुर्दे इनकार भी करने की हैसियत में नहीं रह गए हैं कि वे यह कह दें कि हम नहीं गिरते हैं या हमको मत गिराओ। जो उनको पकड़े खड़े हैं वे भी सोचते हैं कि कोई गिरा दे तो हमारे पकड़ने की झंझट से छुटकारा हो जाए। लेकिन वे भी बल नहीं जुटा पा रहे हैं कि खुद छोड़ दें सहारा। प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कोई करे, कोई करे, कोई करे। और इस प्रतीक्षा में जीवन रोज नीचे से नीचे गिरता जाता है और सड़ता चला जाता है।
इस दिशा में थोड़ा सोचें। कोई बंधे हुए फार्मूले नहीं हैं जिनके आधार पर कोई काम करना है। कोई संप्रदाय नहीं, कोई संगठन नहीं, कोई पंथ नहीं। लेकिन कुछ सूत्र--कि मुल्क में विश्वास की जगह विचार पैदा करना है। कौन सा विचार, वह मैं नहीं कहता। कौन सा विचार तो संप्रदाय बनना शुरू होगा--कि जैनियों का विचार, कि हिंदुओं का, कि मुसलमानों का। नहीं, मैं कहता हूं--विश्वास की जगह विचार।
संप्रदाय का कोई सवाल नहीं है। संप्रदाय का कोई सवाल नहीं है, क्योंकि संप्रदाय का तब सवाल होता है जब हम कहें कि यह विचार। नहीं, यह तो सवाल ही दूसरा है। यह सवाल है कि श्रद्धा नहीं, विचार पैदा करना है; अंधविश्वास नहीं, आंखें पैदा करनी हैं। अतीत की तरफ देखना नहीं है, वर्तमान के प्रति और भविष्य के प्रति उन्मुख होना है। यह कि व्यक्ति को अहंकार पर केंद्रित नहीं, बल्कि सर्व के प्रति समर्पित होना है। कि साधक को सिर्फ साधक नहीं, बल्कि समग्र की चेतना का भी ध्यान रखना है। क्योंकि अंततः मैं अकेला नहीं हूं, आप अकेले नहीं हैं, हम किसी वृहत्तर इकाई में जुड़े हैं। आपकी अशांति अंततः मेरी अशांति होगी और मेरी अशांति अंततः आपकी अशांति होगी।
यह सारी दृष्टि, पंथ नहीं, यह केवल विचार की तीव्र उत्तेजना, एक हवा, कि मुल्क में एक हवा बह जाए विचार की। फिर तो विचार करने वाले बच्चे रास्ता खोज लेंगे, बना लेंगे। यह नहीं कहना है कि तुम कहां जाओ। इतना ही अगर हम कर सकें कि कह सकें कि जहां तुम जाते रहे हो वहां तुम कहीं पहुंचे नहीं। रुक जाओ, एक क्षण खड़े होकर देख लो कि पांच हजार साल में जो यात्रा तय की है उसने तुम्हें कहां पहुंचाया है? बस इतना हम काम कर सकें कि रुक जाओ एक क्षण और देख लो! तो दिखाई उन्हें स्वयं पड़ने लगेगा। लेकिन रुक ही नहीं रहा है कोई, रोक नहीं रहा है कोई। तो मुल्क में एक आंदोलन!
आंदोलन दुनिया में चलते हैं, क्रांतियां चलती हैं, लेकिन बुनियादी क्रांति और बुनियादी आंदोलन नहीं चलते हैं। एक पंथ से कोई छुड़ाता है तो दूसरे पंथ में बांधने की कोशिश करता है। छुड़ाता इसीलिए है कि दूसरे में बांध सके। लेकिन, मेरी दृष्टि में, हमें ऐसा मनुष्य पैदा करना है जो किसी पंथ से बंधने में असमर्थ हो जाए। ऐसी फ्रीडम, ऐसी स्वतंत्रता पैदा करनी है। यह सामर्थ्य अगर हम पैदा नहीं करेंगे तो स्वच्छंदता पैदा होगी ही।
स्वतंत्रता तो एक डिसिप्लिन है, एक अनुशासन है, चेतना का एक ढंग से विकास है। और स्वच्छंदता परतंत्रता के प्रति पागल विद्रोह है।
तो अगर हम स्वच्छंदता पैदा न करना चाहते हों, तो हमें स्वतंत्रता की दिशा में जीवन की चेतना को विकसित करना है। और अगर हम चुप बैठे रहे, तो स्वतंत्रता तो नहीं आएगी--परतंत्रता तो जाएगी--उसकी जगह आएगी स्वच्छंदता, और जीवन के सब सूत्र बिखर जाएंगे, सब गड़बड़ हो जाएगा। उसके पहले होश से भर जाना जरूरी है।
तो मैं तो इतना ही कर सकता हूं कि गांव-गांव जाकर लोगों को कहूं कि घर में आग लगी है, तुम जाग जाओ। लेकिन मैं कितनी दूर तक लोगों को चिल्ला कर खबर पहुंचा सकता हूं? यह तो बात ऐसी है कि एक-एक घर के छप्पर पर खड़े होकर पूरे गांव में कहने की है, पूरे मुल्क में कहने की है, पूरी दुनिया में कहने की है। तो उसके लिए, मित्रों के लिए आमंत्रण दिया जाना जरूरी है कि जिनको भी प्रीतिकर लगता हो, और जिस ढंग से प्रीतिकर लगता हो, कोई बंधा हुआ ढांचा नहीं है कि वह कैसे। जिस ढंग से उन्हें प्रीतिकर लगता हो, जिस दिशा में उन्हें लगता हो कि मैं कुछ कर सकता हूं, कोई चिनगारी पहुंचा सकता हूं, वे पहुंचाएं।
अगर उन्हें लगता हो कि जीवन जागृति केंद्र के साथ, तो साथ; अगर उन्हें लगता है कि अलग, तो अलग। अगर उन्हें लगता हो कि ये जो मित्र इकट्ठे हैं इनके साथ कुछ काम हो सकता है, तो इनके साथ। इनके साथ लगता हो कि नहीं हो सकता, और कोई दस मित्र अलग खड़े होते हों अलग, तो अलग। सवाल यह है ही नहीं कि कौन के साथ और कैसे। सवाल यह है कि काम। न कोई नाम का सवाल है, न कोई व्यवस्था का, न कोई एफिलिएशन का। जिनको जैसा लगता हो वैसा। अगर उन्हें लगता हो कि ये दस-पचास मित्र जीवन जागृति केंद्र के नाम से जो इकट्ठे हैं इनके साथ काम को गति दी जाए, तो दें। अगर उन्हें कल लगे कि नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, तो काम मूल्यवान है, क्रांति मूल्यवान है। न जीवन जागृति केंद्र का कोई मूल्य है, न मेरा कोई मूल्य है। अगर लगता हो कि मेरे साथ यह काम हो सकता है तो ठीक। लगता हो कि मैं खतरनाक हूं, काम को रोकूंगा, तो मुझे तत्क्षण छोड़ देना चाहिए। क्रांति मूल्यवान है; न व्यक्तियों का कोई मूल्य है, न पंथों का कोई मूल्य है, न संगठनों का कोई मूल्य है।
लेकिन एक क्रांति जरूर मुल्क में आनी चाहिए, इसकी प्यास अगर आपको लगती हो, प्रतीत होता हो कि आनी चाहिए, तो कुछ करें। वह किस रूप में आप करेंगे, वह आपको निर्णय कर लेने का है। और किसी भी रूप में आप करेंगे, अगर उससे मुल्क के मूल्य में, वैल्यूज में फर्क आता है, अगर बंधी हुई दृष्टियां खुलती हैं, अगर परतंत्र भाव स्वतंत्र होते हैं, तो वह काम चल पड़ा, वह क्रांति चल पड़ी, वह क्रांति ने कदम भरने शुरू कर दिए। इस दिशा में थोड़ा सोचें, मिलें, और क्या हो सकता है, क्या कर सकते हैं।
मैं तो बहुत अव्यावहारिक आदमी हूं, मुझे कुछ पता नहीं कि चीजें कैसे चलती हैं, मकान कैसे बनते हैं, दुकानें कैसे चलती हैं, आदमी कैसे कमाता है, क्या करता है, मुझे कुछ पता नहीं है। लेकिन मुझे कुछ और बात पता है कि आदमी आकाश की तरफ कैसे देखता है; सूरज की तरफ कैसे देखता है; सौंदर्य की तरफ कैसे देखता है। लेकिन अकेला आकाश की तरफ देखने वाला आदमी बहुत काम का नहीं होता, क्योंकि चलना जमीन पर पड़ता है। और मुझे जमीन का कोई भी ठीक-ठीक पता नहीं है। आपको पता होगा जमीन का। अगर आपके हाथ मेरे हाथ को मजबूत करते हैं, तो वैसी बात बन जाएगी जैसी एक गांव में एक बार बनी। वह मैं बता दूं और अपनी बात पूरी कर दूं।
एक सम्राट ने सारे देश के लोगों को भोजन पर निमंत्रण दिया। सारा देश चला जा रहा है भोजन के निमंत्रण के लिए। गांव-गांव से लोग टोलियां बांध कर चले जा रहे हैं, गांव खाली होते जा रहे हैं। एक सराय में एक अंधा और एक लंगड़ा, बहुत दुखी और परेशान बैठे हैं। वे कैसे जाएं? अंधे को दिखाई नहीं पड़ता, लंगड़ा चल नहीं सकता है।
और तब एक वृद्ध आदमी ने कहा कि पागलो, तुम दोनों साथ हो जाओ! अन्यथा तुम यहीं बैठे रह जाओगे, तुम राजा के भोज में सम्मिलित नहीं हो सकोगे।
उन्होंने कहा, हम कैसे साथ हो जाएं?
अंधा देख नहीं सकता, लेकिन चल सकता है। लंगड़ा चल नहीं सकता, लेकिन देख सकता है। बस, फिर वे दोनों साथ हो गए। वह अंधा चलने लगा और लंगड़ा उसके कंधों पर बैठ गया। और वे दोनों पहुंच गए और भोज में सम्मिलित हो गए।
लेकिन एक दूसरी सराय में एक और मुश्किल हो गई, उसका पता ही नहीं कि उसका कोई हल हुआ कि नहीं। वहां एक बहरा और एक गूंगा बैठे हुए थे। बहरा बोल सकता था, सुन नहीं सकता था। गूंगा सुन सकता था, बोल नहीं सकता था। गूंगे ने सुन लिया था कि निमंत्रण आया है राजा का और जाना चाहिए। लेकिन वह अपने मित्र को कह नहीं सकता था कि चलना है। बहरा बोल सकता था, वह कह सकता था कि चलना है राजमहल, लेकिन उसने सुना नहीं था कि निमंत्रण आया है। वे दोनों बैठे रहे, एक-दूसरे को खींचते रहे, एक-दूसरे को पकड़ते रहे। क्योंकि वह गूंगा खींचता था कि चलो! वह बहरा कहता था, कहां खींचता है? चुपचाप बैठ! कहां जाना है? वे दोनों राजमहल के भोज में सम्मिलित नहीं हो सके।
अब पता नहीं मेरे साथ क्या होगा! हम अंधे और लंगड़े की तरह साथी बनेंगे कि गूंगे और बहरे की तरह। कुछ पता नहीं। अभी तो गूंगे-बहरे वाला मामला चल रहा है। देखें यह कैसे चलता है! अगर यह अंधे और लंगड़े वाला मामला बन सकता है, तो यात्रा हो सकती है, यह क्रांति राजमहल तक पहुंच सकती है।
ज्यादा तो मुझे कुछ कहना नहीं, बाकी तो आपको सोचना है। बस, अभी तो इतना। सोचें, और यहां जो मित्र हैं उनसे मिलें। दुर्लभ जी भाई के हाथ थोड़े मजबूत करें। क्योंकि मैं देख सकता हूं, पैर मेरे पास बिलकुल नहीं हैं। अगर मेरे देखने का कोई उपयोग करना है, तो आपको अपने पैर दे देने होंगे। अगर आप देते हैं, तो क्रांति राजमहल तक पहुंच सकती है, इसमें कोई शक-शुबहा नहीं है।
मुझे राजमहल तक दिखाई पड़ रहा है रास्ता, लेकिन पैर बिलकुल नहीं हैं मेरे पास। वह आपको सोच लेना है कि आपके पैरों का कोई उपयोग हो सकता है क्या? हो सकता हो, तो मैं किसी भी पैर पर सवारी करने को तैयार हूं--उसमें कोई कमजोर का, स्त्री का, पुरुष का, गरीब का, अमीर का कोई सवाल नहीं; हिंदू-मुसलमान का कोई सवाल नहीं। वह किसी का पैर हो, पैर होना चाहिए, वह चल सकता हो--बस उतना काफी है।

इतना ही कहना है, और तो कुछ अभी कहना नहीं है।