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मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)-प्रवचन-04

आनहद में विसराम-(प्रश्नोउत्तर)
ओशो
दिनांक 14, नवम्बर, सन् 1980

चौथा प्रवचन-(वर्तमान क्षण की धन्यता)


 पहला प्रश्न: भगवान,
      भविष्यं नानुसंधत्ते नातीतं चिन्तयत्यसौ।
      वर्तमान   निमेषं   तु   हसन्नेवानुवर्तते।।
भविष्य का अनुसंधान नहीं, न अतीत की चिंता। हंसते हुए वर्तमान में जीना।
लगता है, योगवासिष्ठ का यह श्लोक आपकी देशना का संस्कृत अनुवाद है। इसे हमें फिर एक बार समझाने की कृपा करें।

 सहजानंद!
मन या तो अतीत होता है या भविष्य। वर्तमान में मन की कोई सत्ता नहीं। और मन ही संसार है; इसलिए वर्तमान में संसार की भी कोई सत्ता नहीं। और मन ही समय है; इसलिए वर्तमान में समय की भी कोई सत्ता नहीं।
अतीत का वस्तुतः कोई अस्तित्व तो नहीं है, सिर्फ स्मृतियां हैं। जैसे रेत पर छूटे हुए पगचिह्न। सांप तो जा चुका, धूल पर पड़ी लकीर रह गई। ऐसे ही चित्त पर, जो बीत गया है, व्यतीत हो गया है, उसकी छाप रह जाती है। उसी छाप में अधिकतर लोग जीते हैं।

जो नहीं है उसमें जीएंगे, तो आनंद कैसे पाएंगे? प्यास तो है वास्तविक और पानी पीएंगे स्मृतियों का! बुझेगी प्यास? धूप तो है वास्तविक और छाता लगाएंगे कल्पनाओं का! रुकेगी धूप उससे?
अतीत का कोई अस्तित्व नहीं। अतीत जा चुका, मिट चुका। मगर हम जीते हैं अतीत में। और इसलिए हमारा जीवन व्यर्थ, अर्थहीन, थोथा। इसलिए जीते तो हैं, मगर जी नहीं पाते। जीते तो हैं, लेकिन घिसटते हैं। नृत्य नहीं, संगीत नहीं, उत्सव नहीं।
और अतीत रोज बड़ा होता चला जाता है। चौबीस घंटे फिर बीत गए, अतीत और बड़ा हो गया। चौबीस घंटे और बीत गए, अतीत और बड़ा हो गया। जैसे-जैसे अतीत बड़ा होता है, वैसे-वैसे हमारे सिर पर बोझ बड़ा होता है। इसलिए छोटे बच्चों की आंखों में जो निर्दोषता दिखाई पड़ती है, जो संतत्व दिखाई पड़ता है, वह फिर बूढ़ों की आंखों में खोजना मुश्किल हो जाता है। हजार तरह के झूठ इकट्ठे हो जाते हैं! सारा अतीत ही झूठ है!
जीसस एक सुबह-सुबह झील पर रुके। सूरज अभी ऊगा नहीं। बस, ऊगने को है। और एक मछुए ने जाल फेंका है। जीसस ने उस मछुए के कंधे पर हाथ रखा; मछुए ने लौट कर देखा। सूरज की पहली फूटती हुई किरणें पूरब से जीसस के चेहरे पर पड़ीं, उस मछुए की आंख जीसस की आंख से मिली, और बात हो गई! बिना बात किए बात हो गई। आंख से आंख की मुलाकात हो गई। क्षण भर सन्नाटा रहा और जीसस ने कहा, छोड़ यह जाल! पकड़ लीं तूने मछलियां बहुत! करेगा भी क्या मछलियां पकड़-पकड़ कर? जीवन में कुछ और पकड़ना है या बस मछलियां ही पकड़ना है? इनकी दुर्गंध से अभी ऊबा नहीं? छोड़ जाल! मेरे पीछे आ! मैं तुझे परम धन खोजने का सूत्र दूं। ऐसा जाल फेंकना सिखाऊं कि परमात्मा ही फंसे उस जाल में। उससे कम को क्या फांसना!
मछुआ हिम्मतवर रहा होगा। पंडित होता, चालबाज होता, होशियार होता, ब्राह्मण होता, हजार बातें निकालता--कि अभी कैसे चलूं! अभी तो अड़चनें हैं। पहले मां से तो जाकर आज्ञा ले आऊं! पहले पिता से तो पूछ लूं! पत्नी क्या कहेगी! बच्चों का क्या होगा?
मगर जीसस की आंखों का जादू! जैसे सब भूल गया! छोड़ दिया जाल उसने पानी में ही। खींचा भी नहीं पानी के बाहर! जीसस के पीछे हो लिया।
वे दोनों गांव के बाहर निकलते ही थे कि एक आदमी भागा आया और उस मछुए को कहा, पागल! तू कहां जा रहा है? और इस पागल आदमी के साथ कहां जा रहा है? तेरे पिता की मृत्यु हो गई! मैं तुझे खोजने झील पर गया, वहां इस घटना का पता चला कि एक पागल, जो आस-पास गांव के कई बार देखा गया है, उसने तेरे कंधे पर हाथ रखा और तू उसके पीछे चल पड़ा है। वापस चल! तेरे पिता का अंतिम संस्कार करना है या नहीं?
उस युवक ने जीसस से कहा, मुझे क्षमा करें। मैं जाकर अंतिम संस्कार कर आऊं। तीन दिन बाद लौट आऊंगा।
जीसस ने उससे कुछ बातें कहीं, जो सोचना। पहली तो बात जीसस ने यह कही कि एक पल का तो भरोसा नहीं है, कल का भरोसा कहां! और तू तीन दिन का वायदा करता है! आ सकेगा? तेरे पिता को पक्का था कि आज मर जाएंगे? तुझे ही पक्का होता, तो आज तू झील पर मछली पकड़ने न गया होता। तू कल भी जिंदा होगा? तीन दिन बाद भी तू आ सकेगा? यह भी मान लें कि तू जिंदा होगा, तो तीन दिन बाद यह साहस रह जाएगा जो आज तुझमें जगा है? यह जो किरण तुझमें आज फूटी है? और फिर तीन दिन बाद तू आ भी जाए, यह भाव भी रह जाए, तो मैं बचूंगा? मैं भी बच जाऊं, यह भाव भी रह जाए, तीन दिन बाद तू आ भी जाए, तो हमारा फिर मिलन होगा? अनंत-अनंत काल में पहली बार हम मिले हैं, दुबारा का क्या भरोसा!
उस युवक ने कहा, बात तो आपकी ठीक है। जवाब तो मेरे पास नहीं। मगर मेरे पिता का अंतिम संस्कार भी तो करना है!
जीसस ने कहा, इसकी फिक्र छोड़। क्योंकि गांव में बहुत मुरदे हैं, वे मुरदे को दफना देंगे! गांव में कुछ मुरदों की कमी है? अब यही आदमी आया है, यह खुद ही मुरदा है। यह ही दफना देगा। मुरदे मुरदे को दफना देंगे। मुरदों को दफना लेने दे मुरदों को। फिर जो मर ही चुका, अब दफनाओ न दफनाओ, ऐसा दफनाओ वैसा दफनाओ, जमीन में गड़ाओ कि आग लगाओ, क्या फर्क पड़ता है! पंछी तो उड़ चुका। पिंजड़ा पड़ा रहा गया है। तू मेरे पीछे आ! यह अवसर खोने का नहीं है। पीछे की तरफ लौट कर मत देख, क्योंकि वही आदमी की बुनियादी भूल है।
और हम सब पीछे लौट कर देखते हैं! हम पीछे से ही जीते हैं। हम हिसाब ही लगाते रहते हैं: यह हुआ, वह हुआ। काश ऐसा हो जाता! काश वैसा हो जाता!
फिर इस अतीत के उपद्रव से भविष्य का उपद्रव पैदा होता है। उपद्रव निःसंतान नहीं होते! उपद्रव संतति-नियमन में नहीं मानते! उपद्रव भारतीय होते हैं। एक उपद्रव दस-पंद्रह बच्चे पैदा करता है; इससे कम नहीं।
मैंने सुना, जनगणना करने वाले अधिकारी ने एक द्वार पर दस्तक दी। और थोड़ा चौंका, और थोड़ा हैरान हुआ। आंख पर भरोसा भी न आया, गौर से पुनः देखा। लेकिन बात सच थी, भरोसा आए या न आए। जिस स्त्री ने दरवाजा खोला था, बिलकुल नग्न थी! चौंक गया। पूछा, आप नग्न क्यों हैं?
उस स्त्री ने कहा, चौंको मत। मैं न्यूडिस्ट हूं! मैं दिगंबरत्व में विश्वास करती हूं!
वह आदमी समझदार था। सोचा, अपने को क्या लेना-देना! इसकी यह जाने। जिस काम के लिए आया हूं, वह मैं करूं और अपने रास्ते पर लगूं। उसे तो कुछ जानकारियां लेनी थीं जनगणना के लिए, सो उसने जरूरी प्रश्न पूछ कर अपनी बही में लिखे। उन्हीं प्रश्नों में एक प्रश्न था, आपके कितने बच्चे हैं। सो उसने पूछा। उस स्त्री ने कहा, बाईस!
फिर वह आदमी चौंका। उसने कहा, बाई, क्या आप वाकई न्यूडिस्ट हैं या आपको कपड़े पहनने की फुर्सत नहीं मिलती?
ये जो उपद्रव हैं, इनकी बड़ी संतानें होती हैं। कहावत है कि एक मुसीबत अकेली नहीं आती; साथ में भीड़-भड़क्का लाती है! मुसीबत तो यूं समझो कि कुंभ का मेला है! एक क्या आई, और आती होंगी। एक आई, तो तुम यूं समझो कि बस खबर आई। कहते हैं, एक फूल खिल जाए, तो समझो कि वसंत आ गया। फूलों के संबंध में सच हो या न हो, मगर एक मुसीबत आ गई, तो समझ लो कि अब मुसीबतों ही मुसीबतों के जाल फैल जाने वाले हैं।
सबसे बड़ी मुसीबत जो अतीत लाता है, वह है भविष्य। भविष्य तुम्हारे अतीत की ही छाया है। वह तुमने जो जीया है, उसमें से कुछ काट-छांट कर तुम भविष्य की कल्पना करते हो। जो प्रीतिकर नहीं था, उसे छांटते हो। जो प्रीतिकर था, उसे फैलाते हो, बढ़ाते हो, विस्तीर्ण करते हो। भविष्य है क्या? भविष्य का तुम्हें पता तो नहीं। जिसका पता हो, वह भविष्य नहीं। भविष्य तो अज्ञात है। लेकिन अतीत ज्ञात है। ज्ञात से हम अज्ञात के संबंध में अनुमान लगाते हैं। और ज्ञात में से ही चुनाव करते हैं। सुखद को चुनते हैं, दुखद को छोड़ते हैं। ऐसे हम भविष्य के रंगीन सपने संजोते हैं। कांटे-कांटे अलग कर देते हैं, गुलाब-गुलाब बचा लेते हैं।
हालांकि यह हमारी भ्रांति है, क्योंकि कांटे और गुलाब साथ-साथ होते हैं। यह असंभव है कि तुम जो-जो गलत था उसे छोड़ दो और जो-जो ठीक था उसे बचा लो। गलत और ठीक संयुक्त था, जुड़ा था। आएगा, तो साथ आएगा। जाएगा, तो साथ जाएगा। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। तुम एक पहलू को बचा न सकोगे।
तो एक तो अतीत का बोझ; उसकी चट्टानें हमारी छाती पर रखी हैं। और फिर भविष्य का बोझ। अतीत का रोना, कि ऐसा क्यों न हुआ। और फिर जल्दी ही भविष्य के लिए रोओगे, क्योंकि वह भी नहीं होने वाला है। न अतीत तुम्हारे मन के अनुकूल हुआ, न भविष्य तुम्हारे मन के अनुकूल होगा। इन दो पाटों के बीच में आदमी पिसता है। और दोनों ही का कोई अस्तित्व नहीं है।
अतीत वह, जो जा चुका--अब नहीं। और भविष्य वह, जो आया नहीं--अभी नहीं। दोनों के मध्य में छोटा सा बिंदु है अस्तित्व का। बस, बूंद की भांति है। अगर होश न रहा, तो चूक जाओगे।
यह सूत्र प्यारा है। यह संन्यास की परिभाषा है।
"भविष्यं नानुसंधत्ते।'
भविष्य का अनुसंधान न करो। जो नहीं है, उसके पीछे न दौड़ो।
मगर साधारण आदमियों की तो बात छोड़ दो, जिनको तुम असाधारण कहते हो, जिनको तुम पूजते हो, वे भी जो नहीं है उसके पीछे दौड़ते हैं। राम भी स्वर्णमृगों के पीछे दौड़ते हैं! औरों की तो बात छोड़ दो। हाथ की सीता को गंवा बैठते हैं! इसमें कसूर रावण का कम है। रावण को नाहक दोष दिए जाते हो। अगर कहानी को गौर से देखो, तो रावण का कसूर न के बराबर है। अगर कसूर है किसी का, तो राम का। स्वर्णमृग के पीछे जा रहे हैं!
बुद्धू से बुद्धू आदमी को भी पता है कि मृग स्वर्ण के नहीं होते। साधारण से साधारण आदमी कहता है कि सारा जग मृग-मरीचिका है। देखते हो मजा! साधारण आदमी भी कहता है, जग मृग-मरीचिका है। और राम सोने के मृग के पीछे चल पड़े! और क्या मृग-मरीचिका होगी? इससे बड़ा और क्या भ्रमजाल होगा? सीता को गंवा बैठे!
जब भी मैं राम, लक्ष्मण और सीता की तस्वीर देखता हूं, तो मुझे लगता है कि यह भविष्य, वर्तमान और अतीत की तस्वीर है। राम हैं आगे, लक्ष्मण हैं पीछे, मध्य में सीता है। राम हैं अतीत; जो बीत गया, जो जा चुका, उसके पूजक। इसलिए तो दशरथ की मान कर चल पड़े। न सोच किया, न विचार किया। न पूछा, न प्रश्न उठाया।
दशरथ की बात मानने योग्य थी ही नहीं। दशरथ की बात विद्रोह के योग्य थी। और काश, राम ने विद्रोह किया होता, तो भारत की कथा और होती। तो भारत के जीवन का अर्थ और होता, इतिहास और होता। काश, राम ने विद्रोह किया होता, तो भारत इस तरह गुलामी में न जीता, इस तरह की पीड़ा में न जीता। लेकिन राम ने एक ऐसी बात को स्वीकृति दे दी, जो कि बुनियादी रूप से गलत थी। जिसमें कहीं भी कोई न्याय नहीं था। चौदह साल का वनवास! अकारण!
दशरथ बूढ़े थे। बुढ़ापे में जो विवाह किया था, जो चौथी पत्नी थी, वह जवान! अक्सर बूढ़े पति जवान पत्नियों के चक्कर में होते हैं! बूढ़े हैं, चक्कर में होना ही पड़ता है। अरे, जवानों को होना पड़ता है, तो बूढ़ों की तो बात ही क्या! इस बुढ़ापे में जवान स्त्री ने जो कहा, वह मान लिया! यह भी अत्यंत मूर्च्छा की बात थी।
और राम हैं परंपरा के पूजक। रघुकुल रीति सदा चलि आई। वे तो रघुकुल की रीति--रीति और रिवाज, परंपरा--उसके पोषक हैं। तो अन्याय हो तो भी चलेगा। अन्याय के संबंध में भी बगावत नहीं है, विद्रोह नहीं है। और जहां अन्याय को पूजने वालों को पूजा जाता हो, फिर स्वभावतः उस देश का दुर्भाग्य सुनिश्चित है। वे अतीत के प्रतीक हैं राम।
लक्ष्मण भविष्य के लिए आतुर हैं। तुम्हें याद होगा, स्वयंवर जब सीता का रचा गया, तो लक्ष्मण उचक-उचक पड़ते हैं! उनको रोकना पड़ता है बार-बार। वे धनुष तोड़ने को एकदम आतुर हो रहे हैं। वे इसकी फिक्र नहीं करते कि बड़े भैया मौजूद हैं, इनका भी कुछ खयाल करें! ऋषि-मुनि उनको रोकते हैं, कि रुको। यह ऋषि-मुनियों का भी काम खूब है! अरे, तोड़ लेने दो बेचारे को तोड़ना है तो! मगर वे उनको रोकते हैं कि नहीं, तू मत तोड़ना! वे एकदम आगे के लिए आतुर हैं; भविष्योन्मुख हैं, जल्दबाजी में हैं। राम हैं अतीत-उन्मुख। और सीता है दोनों के मध्य में। और वह कोमल सी सीता, वही है वर्तमान।
इस सूत्र में वर्तमान के लिए जो शब्द उपयोग हुआ है: वर्तमान निमेषं! निमिष-मात्र!
निमिष शब्द को समझना उपयोगी है। निमिष उस हिस्से को कहते हैं समय के, जिसको तौला न जा सके, मापा न जा सके। सेकेंड नहीं, मिनट नहीं। निमिष का अर्थ होता है, जो तुलना के बाहर है, इतना छोटा है! जैसे कि भौतिकशास्त्री कहते हैं कि परमाणु का जब विस्फोट करते हैं और इलेक्ट्रान हमारे हाथ लगते हैं, तो उनमें कोई वजन नहीं; वे तौले नहीं जा सकते। जो तौला नहीं जा सकता उसको तो पदार्थ ही नहीं कहना चाहिए।
अंग्रेजी में शब्द है पदार्थ के लिए मैटर। मैटर बड़ा महत्वपूर्ण शब्द है। पदार्थ से ज्यादा महत्वपूर्ण शब्द है। क्योंकि पदार्थ का तो अर्थ होता है, जिस पद में अर्थ हो। मैटर बनता है मीटर से। मीटर यानी जिससे तौला जाए, जो तुल जाए। मैटर का अर्थ होता है, जो तौला जा सकता है।
लेकिन इलेक्ट्रान तो तौला नहीं जा सकता, मापा नहीं जा सकता--न तराजू पर, न इंच-फिटों में; कोई उपाय नहीं। इतना छोटा है कि हमारे तौलने के साधन सब मोटे हो जाते हैं, सब स्थूल रह जाते हैं। वह हमारी तुलना के बाहर हो जाता है।
ऐसे ही समय के उस अंतिम हिस्से को निमिष कहते हैं, जो तुलना के बाहर है, जो तौल के बाहर है; जिसकी कोई मात्रा नहीं होती; जो आया और गया! जो आया नहीं कि गया नहीं!
दो शिकारी नए-नए शिकार खेलने गए थे। दोनों बड़े तत्पर थे, बिलकुल बंदूक लिए हुए। और तभी एक खरगोश छलांग लगाया; एक झाड़ी से दूसरी झाड़ी में चला गया। दोनों बिलकुल तत्पर थे, लेकिन फिर भी चूक गए। एक ने दूसरे से पूछा कि मामला क्या हुआ? मैं भी तैयार, तुम भी तैयार; बंदूकों के घोड़ों पर हाथ रखे थे; हुआ क्या? बात क्या हुई?
उस दूसरे शिकारी ने कहा, मैं कहूं क्या! जब खरगोश निकल गया, तब मुझे दिखाई पड़ा! इतनी तेजी से निकला कि जब निकल रहा था तब तो मैं चूक ही गया। जब निकल गया, तब मुझे याद आई कि अरे! मगर तब तक तो देर हो चुकी थी। तब तो गोली चलाने का कोई अर्थ न था।
ऐसा निमिष है। तुम्हें जब दिखाई पड़ता है, तब तक जा ही चुका होता है। जैसे ही तुम्हें याद आती है, यह वर्तमान! गया। अतीत हो गया। पहचाना, कि अतीत हो गया। सिर्फ जीया जा सकता है, जाना नहीं जा सकता। या कि यूं कहो कि जीना ही जानने का एकमात्र उपाय है। क्योंकि तुमने अगर जानने की कोशिश की, तो अतीत हो जाएगा। या अगर जल्दबाजी की, तो भविष्य रहेगा। अगर जरा सी देर की, तो अतीत हो जाएगा। और देर करनी ही पड़ेगी, क्योंकि मन में इतनी गति नहीं है। यूं तो तुमने सुना है बहुत कि मन की बहुत गति है, मगर वह जो वर्तमान का क्षण है, मन से भी बहुत तीव्र गति से जाता है। मन उसके सामने कुछ भी नहीं। बहुत पिछड़ जाता है।
यह सूत्र संन्यास की आधारशिला है: "भविष्यं नानुसंधत्ते।'
न तो भविष्य का अनुसंधान करना; दौड़ना मत भविष्य के पीछे। यह भविष्य बस स्वर्णमृग है।
मगर हम सब दौड़ रहे हैं भविष्य के पीछे। अलग-अलग स्वर्णमृग हैं--कोई धन के पीछे, कोई पद के पीछे, कोई मोक्ष के पीछे, कोई परमात्मा के पीछे--मगर भागे हुए हैं लोग! कोई यहां नहीं; सब की आंखें वहां टिकी हैं। और होना है यहां और आंखें हैं वहां! इसलिए तुम्हारे और तुम्हारी आंख में ही तालमेल नहीं हो पाता; उन दोनों में ही टूट हो जाती है। चलते हो कहीं, देखते हो कहीं!
यूनान की बड़ी प्रसिद्ध कथा है। एक बहुत बड़ा ज्योतिषी रात तारों का अध्ययन करता हुआ एक कुएं में गिर पड़ा। कुएं पर कोई घाट न था, कोई पाट न था। और उसकी आंखें अटकी थीं दूर आकाश के तारों पर। तो गिर पड़ा कुएं में। जब गिर पड़ा, तब होश आया। चिल्लाया। रात थी अंधेरी, रास्ता निर्जन, गांव पीछे छूट गया। वह तो खेत में एक झोपड़े में रात, और तो कोई न था, एक बूढ़ी औरत सोई थी। वह भी रखवाली के लिए थी। आवाज सुनी तो आई। बामुश्किल उस वृद्धा ने रस्सी डाल कर इस ज्योतिषी को बाहर निकाला।
ज्योतिषी ने उसे बहुत-बहुत धन्यवाद दिया, बहुत अनुग्रह किया। और कहा कि सुन, तुझे शायद पता भी न हो कि मैं यूनान का सबसे बड़ा ज्योतिषी हूं। तारों के संबंध में और तारों के माध्यम से मनुष्य के भविष्य के संबंध में मेरी घोषणाएं कभी गलत नहीं हुईं। बड़े-बड़े सम्राट दूर-दूर से अपना भविष्य पूछने मेरे पास आते हैं। हजारों रुपए मेरी फीस है। लेकिन तेरा भविष्य मैं मुफ्त बता दूंगा, क्योंकि तूने मेरा जीवन बचाया।
वह बूढ़ी स्त्री हंसने लगी। उसने कहा, बेटा, तू फिक्र न कर। मैं तुझे कष्ट न दूंगी। उसने कहा, नहीं-नहीं। कष्ट की कोई बात नहीं। तू कल आ जाना। यह मेरा पता रहा। यूं तो तू किसी से भी पूछ लेगी एथेंस में, तो कोई भी मेरे घर का पता बता देगा। बच्चा-बच्चा जानता है।
पर, उस बुढ़िया ने कहा, मुझे आना नहीं बेटा। तुझसे क्या अपना भविष्य पूछूंगी! तुझे एक कदम आगे का कुआं तो दिखाई पड़ता नहीं। तू मेरे संबंध में क्या बताएगा! तुझे अपना भविष्य पता नहीं कि आज कुएं में गिरना है; कि आज जरा सम्हल कर चलूं; कि आज चलूं ही नहीं, घर में ही रहूं। तू मुझे क्या भविष्य बताएगा!
कहानी अदभुत है, क्योंकि उस ज्योतिषी को इससे इतनी चोट लगी और बात इतनी साफ हो गई कि उसने ज्योतिषी का धंधा छोड़ दिया। बात तो सच थी।
ऐसा हुआ, जयपुर में मेरे पास एक ज्योतिषी को लोग ले आए। एक हजार एक रुपया उनकी फीस थी। उससे कम में वे हाथ भी नहीं देखते थे। मुझसे बोले कि आपको मेरी फीस पता है? मैंने कहा, जो भी फीस होगी...।
उन्होंने कहा, नहीं। मैं आपको बता दूं। एक हजार एक।
मैंने कहा, तुम फिक्र छोड़ो। मैं एक हजार दो दूंगा! अब तुम आ ही गए हो, इतना कष्ट किए, तो खाली हाथ जाना उचित नहीं। तुम मजे से मेरे हाथ का अध्ययन करो।
कुछ बातें यहां-वहां की उन्होंने कहीं, जो कि बंधी हुई बातें हैं, जो कि ज्योतिषी सभी को कहते हैं, जो कि सभी के संबंध में सही होती हैं। थोड़ा-बहुत हेर-फेर करना पड़ता है। और बातें इस ढंग से कहनी होती हैं कि उनमें हेर-फेर करने की सुविधा होती है; गोल-मोल करनी होती हैं। फिर चलने का वक्त आया, तो वे राह देखें कि उनकी फीस मिले!
मैंने कहा, अब आप जाइए भी। अब मैं कुछ और काम करूं!
उन्होंने कहा, मैं तो जाऊं, लेकिन फीस!
मैंने कहा, यह तो आपको पहले ही सोच लेना था! अपना हाथ देख कर घर से निकलना चाहिए!
उन्होंने कहा, आपका मतलब?
मैंने कहा, मेरा मतलब यह कि मैं तो फीस देने वाला नहीं हूं। तुम्हें मेरा हाथ देखते से समझ लेना था कि इस आदमी से फीस नहीं मिलने वाली! सच तो यह है, तुमने मेरा इतना समय खराब किया, इसकी फीस तुम मुझे दो। और तुम निपट बुद्धू हो, क्योंकि तुमको यह भी पता नहीं कि आज किसका हाथ देखने जा रहे हो; उससे फीस मिलने वाली नहीं!
लेकिन यह ज्योतिषी एथेंस के उस ज्योतिषी जैसा बुद्धिमान नहीं था। मैंने सुना, वे अभी भी वही धंधा कर रहे हैं! उस एथेंस के ज्योतिषी ने तो धंधा छोड़ दिया। बात तो साफ हो गई कि मेरी आंखें तारों पर अटकी हैं; मुझे एक कदम आगे का तो पता नहीं चलता; कुएं में गिर जाता हूं; क्या जानूंगा भविष्य!
भविष्य वह है, जो जाना ही नहीं जाता। और अतीत वह है, जो जाना गया। तो तुम भविष्य के संबंध में जो दौड़-धूप करते हो, आपा-धापी करते हो, वह अतीत के ही आधार पर करते हो। अतीत से ही सीढ़ियां बनाते हो। और इन दोनों के बीच में वह निमिष-मात्र छोटा सा पल है, जो भागा जा रहा है, इतनी तेजी से कि अगर तुम अतीत और भविष्य में उलझे रहे, तो उससे चूकते ही जाओगे, चूकते ही जाओगे। और वही है सत्य।
"भविष्यं नानुसंधत्ते नातीतं चिन्तयत्यसौ।'
और न अतीत की चिंता। जो बीत गया, बीत गया। अब उधेड़बुन क्या! अब उसको अन्यथा तो किया नहीं जा सकता। अब तुम लाख उपाय करो, तो भी रत्ती भर उसे बदला नहीं जा सकता। जिसे बदला ही नहीं जा सकता, उसके संबंध में चिंता कैसी! क्यों समय खराब कर रहे हो उसके संबंध में? और जो आया नहीं है अभी, अभी कुछ किया नहीं जा सकता। और हम दोनों में ही उलझे हैं। इन दोनों का नाम संसार है।
संसार बाजार नहीं है, न दुकान है, न परिवार है। अतीत और भविष्य, इनका जो विस्तार है...। अतीत अर्थात स्मृति; भविष्य अर्थात कल्पना। इन दोनों के बीच में तुम मरे जा रहे हो। यही तुम्हारा संसार है।
मैं भी अपने संन्यासी को कहता हूं कि संसार छोड़ो। लेकिन उस संसार को छोड़ने को नहीं कहता, जिसको पुराने संन्यासी छोड़ कर भागते रहे हैं। वे तो भगोड़े हैं। वे तो पलायनवादी हैं। वे तो कायर हैं। उन्होंने तो पीठ दिखा दी। उन्होंने तो जीवन का अवसर खो दिया। मैं कहता हूं, इस संसार को छोड़ो। मन संसार है। अतीत-भविष्य संसार है। इसको छोड़ दो; और वर्तमान में जीओ--अभी! यहीं!
थोड़ा सोचो इस सौंदर्य को, इस अपूर्व प्रसाद को--यहीं और अभी होने के! सब जैसे ठहर जाए। अतीत नहीं, भविष्य नहीं। तो वह जो ठहराव है, वह जो थिरता है, वही ध्यान है, वही संन्यास है। उस थिरता में निर्मलता है, निर्दोषता है। उस थिरता में अहोभाव है, आश्चर्य है, रहस्य है। उस थिरता में परमात्मा का दर्शन है, मुक्ति है, निर्वाण है।
और योगवासिष्ठ का यह सूत्र इसलिए और भी महत्वपूर्ण है, इससे तुम्हें जाहिर होगा कि यह मेरे संन्यास की परिभाषा ही हो सकता है, पुराने संन्यास की परिभाषा नहीं। क्योंकि पुराना संन्यासी तो न केवल भविष्य की सोच रहा है, साधारण संसारी से तुम्हारा संन्यासी तो और भी बड़े भविष्य की सोच रहा है--मृत्यु के बाद क्या होगा? स्वर्ग में क्या होगा? कितने स्वर्ग हैं? मोक्ष मिलेगा कि नहीं मिलेगा? किन पुण्यों के करने से स्वर्ग में प्रवेश मिलेगा? परमात्मा की उपलब्धि कब होगी?
धन की दौड़ तो यहीं है; उसकी तो सीमा है मौत। मगर यह जो मोक्ष की और परमात्मा की और ब्रह्म-अनुभव की खोज में दौड़ रहा है, इसकी तो कोई सीमा ही नहीं। इसका भविष्य तो बड़ा असीम है! यह तो और भी बड़ा संसारी है, मेरे हिसाब से, क्योंकि इसका तो मन और भी बड़ा है। और तुम्हें तो इसी जन्म की फिक्र है। मगर यह तुम्हारा जो संन्यासी है, इसको पिछले-पिछले जन्मों की भी फिक्र पड़ी है। कि पिछले जन्मों में जो पाप किए थे, कर्म किए थे, उनका भी निपटारा करना है, उनका भी हिसाब करना है।
तुम्हारा भविष्य भी सीमित है और अतीत भी। अतीत तुम्हारा जन्म से अब तक; और भविष्य तुम्हारा अब से मृत्यु तक। कोई बहुत ज्यादा नहीं! सत्तर साल जीओगे, तो समझ लो कि आधा भविष्य, आधा अतीत--अगर पैंतीस साल की उम्र है अभी, अगर अभी बीच में खड़े हो तो। मगर तुम्हारा जो संन्यासी है, जिसको तुम धार्मिक कहते हो, उसकी मुसीबत तो सोचो! वह तो कह रहा है, चौरासी करोड़ योनियों में होकर आया हूं! चौरासी करोड़ योनियों में उन्होंने क्या-क्या काम नहीं किए होंगे! उन सब का हिसाब, उन सब का निपटारा करना है। एक-एक रत्ती-रत्ती कृत्य का चुकतारा करना होगा। इसका अतीत तो बहुत बड़ा है! यह तो कभी सुलझ पाएगा, इसकी संभावना न समझो। इतने उलझाव को कैसे सुलझाएगा? और उलझाव आदमी का ही नहीं है; सब तरह के जानवरों का है। यह मछली भी रहा; यह केंचुआ भी रहा। अब इसने क्या-क्या उपद्रव न किए होंगे!
मैंने सुना, एक केंचुए ने एक दूसरे केंचुए को देख कर कहा, अहा! पहली नजर का प्रेम इसको कहते हैं! मुझे तो तुझसे प्रेम हो गया!
उस दूसरे केंचुए ने कहा, अरे मूरख, मैं तेरा ही दूसरा हिस्सा हूं! नाहक की बकवास न कर! क्योंकि केंचुए के दो मुंह होते हैं, वह उन्हीं का दूसरा हिस्सा था। उसने कहा, मूरख, व्यर्थ की बकवास न कर!
केंचुए भी रहे होओगे। न मालूम कैसी-कैसी नजरों के प्रेम हुए होंगे। कभी-कभी खुद से भी प्रेम हुआ होगा। खुद ही से प्रेम के वार्तालाप हो गए होंगे। जंगली जानवर भी रहे होओगे। क्या-क्या नहीं रहे होओगे! चौरासी करोड़ योनियों में सब तो आ गया होगा। पत्थर से लेकर आदमी तक की लंबी यात्रा, इस सब का हिसाब-किताब करना है!
इसलिए तो तुम्हारा साधु इतना उदास हो जाता है; इतना चिंतित हो जाता है; इतना व्यथित हो जाता है। न दिन चैन, न रात चैन। कहां विश्राम उसे! और मैं बात कर रहा हूं अनहद में बिसराम की। उसको कहां विश्राम? उसको तो उधेड़बुन ही उधेड़बुन है। और फिर उसका भविष्य यहीं खत्म नहीं होता; मौत पर कोई समाप्ति नहीं होती। फिर आगे चलते ही जाना है।
इन दोनों अनंत यात्राओं के बीच में उसका निमिष पल-मात्र का जो वर्तमान है, वह तो यूं दब कर पिस जाएगा कि जैसे दो चट्टानों के बीच में किसी ने जुही के फूल को दबा दिया हो! पता भी न चलेगा। कभी खबर भी न मिलेगी।
नहीं। यह सूत्र मेरे संन्यास की ही बात कर रहा है। छोड़ो अतीत को; छोड़ो भविष्य को। और दूसरी बात भी मेरे संन्यासी पर ही लागू हो सकती है: "वर्तमान निमेषं तु हसन्नेवानुवर्तते।'
हंसो, आनंदित होओ। प्रफुल्लित होओ। मग्नचित्त होकर जीओ।
यह तो पुराने संन्यासी पर लागू नहीं हो सकता। हंसते हुए वर्तमान में जीना! पुराना संन्यासी तो कहेगा कि यह योगवासिष्ठ भी भ्रष्ट है। मैं तो भ्रष्ट हूं ही।
योगवासिष्ठ को लोग पढ़ते रहते हैं, लेकिन इसके अर्थ को नहीं समझते। न मालूम कितने शास्त्रों को पढ़ते रहते हैं, जिनके अर्थ नहीं समझते। अगर उनको अर्थ समझ में आ जाएं, तो बहुत चौंकें, बहुत हैरानी उन्हें हो। क्योंकि उनकी जीवन-धारणाओं में और उन शास्त्रों के मौलिक अर्थों में भेद होगा। होना ही चाहिए। क्योंकि शास्त्र तो उनसे जन्मे हैं, जिन्होंने जाना।
अब जिसने जाना है, उसने यह बात कही होगी। अज्ञानी तो नहीं कह सकता। वर्तमान के क्षण में मस्त होकर जो जी रहा है, अलमस्त, प्रमुदित, प्रफुल्लित; जिसका रोआं-रोआं नृत्य में लीन है, और जिसके कण-कण में गीत उठ रहा है, वैसा व्यक्ति ही संन्यासी है।
लेकिन तुम्हारे तथाकथित संन्यासियों को तुम देखो। उनकी शक्लों पर बारह बज रहे हैं! हमेशा मातमी! हंसना तो जैसे सदियों से भूल गए हैं। और हंसें भी तो कैसे हंसें? चौरासी करोड़ योनियों का बोझ! कितना हिसाब-किताब निपटाना है! कर्मों के कितने जाल इकट्ठे हो गए हैं, और रोज होते जा रहे हैं। और रोज भूल पर भूल होती जा रही हैं। और अभी आगे भी बहुत यात्रा पड़ी है। धूल यूं ही बहुत जम गई है और अभी यात्रा बहुत शेष है, और धूल जमेगी। उनका संकट तो देखो! उनके प्राण कैसी विडंबना में पड़े न होंगे! कहां हंसें? कैसे हंसें? हंस तो वही सकता है, जिसका कोई अतीत नहीं, कोई भविष्य नहीं; वर्तमान ही जिसके लिए सब कुछ है। उसके लिए क्या चिंता? क्या बोझ? क्या पीड़ा? क्या मातम? उसके लिए जीवन उत्सव है।
निश्चित ही, सहजानंद, योगवासिष्ठ का यह श्लोक, मैं जो कहता हूं, उसकी तरफ ही इशारा है; और बहुत स्पष्ट इशारा है। जिसने भी कहा होगा, वह जानने वाला रहा होगा, वह बुद्धपुरुष रहा होगा।
शास्त्रों के संबंध में एक बात खयाल रखना, क्योंकि पुराने शास्त्र एक व्यक्ति के द्वारा लिखे हुए नहीं हैं, अनेक व्यक्तियों के द्वारा लिखे हुए हैं। उनमें चीजें जुड़ती चली गईं। वे सब संहिताएं हैं। नए-नए लोग होते गए, नई-नई बातें जोड़ते चले गए। तो उनमें कभी-कभी अज्ञानियों ने भी जोड़ दिया है बहुत कुछ। ज्ञानियों के साथ-साथ अज्ञानियों के शब्द भी उनमें मिल गए हैं।
इसलिए तुम्हें मेरी बातों में कई बार विरोधाभास मिलेगा। योगवासिष्ठ के इस सूत्र का मैं समर्थन करूंगा और किसी दूसरे सूत्र का विरोध करूंगा। और तब तुम्हें अड़चन होती है, क्योंकि तुम्हें हैरानी यह होती है कि जब योगवासिष्ठ का एक सूत्र मैंने ठीक कहा, तो सब सूत्र ठीक होने चाहिए!
सब सूत्र ठीक नहीं हो सकते, क्योंकि सब सूत्र एक ही ऊर्जा से पैदा नहीं हुए हैं।
वेद के एक सूत्र का मैं समर्थन कर दूंगा और दूसरे सूत्र का विरोध करूंगा। और उतने ही बलपूर्वक विरोध करूंगा, जितने बलपूर्वक मैंने पहले का समर्थन किया था। और तुम विरोधाभास देखते हो, तो तुम्हारी भूल है। कहीं कोई विरोधाभास नहीं है। संहिताएं हैं ये।
बुद्ध के नाम से इतने शास्त्र हैं कि असंभव है कि एक व्यक्ति ने उतने शास्त्र लिखे हों या कहे हों। व्यास के नाम से इतने शास्त्र हैं कि असंभव है यह कि एक व्यक्ति ने इतने शास्त्र लिखे हों या कहे हों। व्यास का नाम स्वीकृत नाम हो गया; साख हो गई नाम की। तो जिसको भी अपनी किताब चलानी हो, वह व्यास का नाम उस पर लिख देता था!
छपती तो थीं नहीं किताबें; लिखी जाती थीं हाथ से। कोई कापीराइट तो थे नहीं उन दिनों, कोई सरकारी नियंत्रण था नहीं। तुम भी किताब लिख कर अगर उसको लिख दो व्यास-रचित, तो कोई कुछ कर नहीं सकता था। तुमने चला दी व्यास की एक और किताब! लेकिन व्यास के नाम की साख थी; साख का फायदा उठा लेना अच्छा था। तुम अपने नाम से लिखोगे, कौन पढ़ेगा? कौन सुनेगा? कौन मानेगा?
लेकिन व्यास की है, तो फिर तो माननी ही होगी; गलत भी हो, तो भी माननी होगी।
कितनी रामायणें हैं! वाल्मीकि से लेकर तुलसीदास तक कितने लोगों ने रामायणें लिखीं! इनमें बहुत भेद हैं। एक-दूसरे से बहुत ज्यादा अलग-अलग बातें हैं। मगर राम की कथा है; राम की कथा की साख है; तो कोई भी लिख दे राम की कथा, चल पड़ेगी! लोग उसे सिर पर रख लेंगे। लोगों को फिक्र ही नहीं कि उसके भीतर क्या है!
इसलिए मैं जब किसी सूत्र का समर्थन करूं, तो खयाल रखना, उस सूत्र का समर्थन कर रहा हूं, कोई योगवासिष्ठ के पूरे जीवन-दर्शन का समर्थन नहीं कर रहा हूं। बहुत से सूत्र हैं जिनसे मेरा इतना ही विरोध है, जितना मेरा समर्थन इस सूत्र के लिए है। क्योंकि मेरे पास अपनी कसौटी है। मुझे किसी शास्त्र से न कुछ लेना है, न देना है। मेरी कसौटी पर जो ठीक उतरेगा, वह ठीक। जो ठीक नहीं उतरेगा, वह नहीं ठीक। सोने को सोना कहूंगा; मिट्टी को मिट्टी कहूंगा। फिर वह चाहे योगवासिष्ठ में ही रखी हुई मिट्टी क्यों न हो! और सोना अगर कचरे में भी पड़ा हो, तो भी उसे सोना कहूंगा।
इसलिए तुम्हें मेरी बातों में बहुत बार विरोधाभास दिखाई पड़ें, तो जल्दी मत कर लेना, सोचना, कारण होगा कुछ।
जैसे इस सूत्र में तो मैं कोई शर्त न लगाऊंगा, बेशर्त स्वीकार करूंगा। यह तो मेरी ही बात है; यही तो मैं रोज कह रहा हूं तुमसे, कि क्षण में जीना सीखो, पल में जीना सीखो। अगर चाहते हो कि तुम्हारे जीवन में आनंद के फूल खिलें, सुवास उड़े महोत्सव की, और परमात्मा तुम्हें घेर कर तुम्हारे साथ मदमस्त हो उठे, तो इतना ही करना जरूरी है। यही ध्यान की पूरी प्रक्रिया है। अतीत से अपने को छुड़ा लो। और अतीत ने तुमको नहीं पकड़ा है; तुमने ही अतीत को पकड़ा है। इसलिए जब चाहो तब छोड़ दे सकते हो। और वर्तमान मौजूद है, कहीं खोजने जाना नहीं है। और भविष्य है ही नहीं; छोड़ने में क्या अड़चन है!
लेकिन बड़े अजीब लोग हैं। जो नहीं है, उसको भी छोड़ने में मुश्किल होती है! मुट्ठी खाली है, मगर उसको खोलने में डर लगता है कि कहीं खाली दिखाई न पड़ जाए! बांधे रहो, तो कम से कम भरोसा तो बना रहता है कि कुछ होगा, तभी तो बांधे हुए हैं! लोग अपनी मुट्ठी भी खोलने में डरते हैं कि कहीं खाली दिखाई न पड़ जाए! मगर तुम्हारी मुट्ठी है, तुम्हें पता ही है कि खाली है; खोलो या न खोलो।
भविष्य है नहीं; छोड़ने का सवाल नहीं। अतीत जा चुका है; छोड़ने का सवाल नहीं, छूट ही चुका है। जो है, उसे तुम छोड़ना भी चाहो तो छोड़ नहीं सकते हो। मगर कैसा उपद्रव है कि नहीं के साथ उलझे हो और है से चूक रहे हो। और जो है, वह परमात्मा का ही दूसरा नाम है।


 दूसरा प्रश्न: भगवान, शतपथ ब्राह्मण में यह सूत्र आता है: सत्यं वै चक्षुः सत्यं हि प्रजापतिः। अर्थात चक्षु सत्य है और सत्य ही प्रजापति है।
हमें इस सूत्र का अभिप्रेत समझाने की कृपा करें।
 आनंद!

सत्यं वै चक्षुः। सत्य कोई वस्तु नहीं है; सत्य दृष्टि है; देखने का एक ढंग है--एक निर्मल ढंग, निर्दोष ढंग। एक ऐसी आंख जिस पर कोई पर्दा न हो; एक ऐसी आंख जिस पर कोई धुआं न हो; एक ऐसी आंख जो निर्विचार हो।
कोई हिंदू है, तो फिर उसकी आंख सत्य नहीं हो सकती। कोई मुसलमान है, तो उसकी आंख सत्य नहीं हो सकती। कोई ईसाई है, तो उसकी आंख सत्य नहीं हो सकती। अगर आंख को सत्य करना हो, तो ईसाई होना, हिंदू होना, मुसलमान होना हटा कर रख देना होगा। आंख निर्मल होनी चाहिए, पक्षपातशून्य होनी चाहिए, पूर्वाग्रहों से मुक्त होनी चाहिए।
लेकिन लोग अपने विश्वासों से भरे हैं। और उन्हीं विश्वासों के माध्यम से देखने की कोशिश करते हैं। और जब तुम अपने विश्वास के माध्यम से देखने की कोशिश करते हो, तभी सब असत्य हो जाता है। तब तुम वही देख लेते हो, जो तुम देखना चाहते हो; वह नहीं, जो है। और देखना है उसे, जो है। सबसे बड़ी कठिनाई जीवन की, सबसे बड़ी मुसीबत, कि हम पैदा होने के साथ ही विकृत होने की प्रक्रिया में सम्मिलित कर दिए जाते हैं। हमारी आंखों पर पर्दे पर पर्दे, पर्तों पर पर्तें चढ़ा दी जाती हैं।
अब अगर जैन कृष्ण के मंदिर में जाता है, तो झुकने का सवाल ही नहीं उठता, प्रश्न ही नहीं उठता। कृष्ण में उसे कोई भी महिमा दिखाई नहीं पड़ती। उसकी अपनी धारणाएं इतनी मजबूत हैं कि कृष्ण में तो उसको निपट भोगी दिखाई पड़ता है।
कृष्ण खड़े हैं, बांसुरी बजा रहे हैं। मोर-मुकुट बांधे हुए हैं। पीतांबर वस्त्र पहने हुए हैं। आभूषण पहने हुए हैं। रुक्मिणी की प्रतिमा भी साथ में है, कि राधा की। यह देख कर ही जैन के मन में तत्क्षण सवाल उठता है, ये कैसे भगवान? भगवान तो वीतराग होना चाहिए! वह उसकी धारणा है, वीतराग। उसे तो राग के बाहर, पार होना चाहिए। यह तो रागी का रूप हुआ। यह बांसुरी, यह मोर-मुकुट, ये सुंदर वस्त्र, यह स्त्री का पास खड़े होना, यह तो राग का लक्षण है!
हां, महावीर को देखता है, तो वह गदगद हो जाता है। नग्न खड़े हैं। न कोई स्त्री पास है; न वस्त्र पास हैं। मोर-मुकुट तो दूर, बांसुरी तो दूर, भिक्षापात्र भी साथ में नहीं है। महावीर तो करपात्री थे; हाथ से ही भोजन लेते थे। हाथ की अंजुली बना कर जो बन जाता हाथ में, बस वही उनका भोजन था, वही भोजन-पात्र था! भिक्षापात्र भी नहीं है। ऐसे वीतरागी को नमस्कार उठता है।
लेकिन किसी और को, हिंदू को महावीर को देख कर थोड़ी हैरानी होती है कि ये कैसे भगवान? ये कैसे ईश्वर? ईश्वर शब्द का अर्थ ही होता है, ऐश्वर्यवान। ईश्वर शब्द बनता ही ऐश्वर्य से है। सारा ऐश्वर्य जिसका है, वही तो ईश्वर! ये नंग-धड़ंग खड़े हैं, ये कैसे ईश्वर? इनके पास कुछ भी नहीं है। और यह नंगा खड़ा होना उसे अशोभन लगता है। उसे वीतरागता नहीं दिखाई पड़ती। उसे दिखाई पड़ता है, यह क्या मामला है! अरे, कम से कम लोक-लाज तो रखो! स्त्री-बच्चे भी आते हैं। नंग-धड़ंग खड़े हो! एक लंगोटी तो कम से कम लगा लेते! लंगोटी लगा लेते तो क्या बिगड़ जाता!
दिगंबर जैन मुनि बैठता इस ढंग से...। तुमने दिगंबर जैन मुनियों के चित्र देखे? चित्र भी इस ढंग के बनाए जाते हैं। महावीर तक के चित्र जैनियों के घर में ऐसे होते हैं।
मैं एक जैन घर में मेहमान था। बड़ा सुंदर चित्र महावीर का लगा था। मैंने उनसे कहा, चित्र तो सुंदर है, मगर चालबाजी से भरा है!
उन्होंने कहा, क्या चालबाजी? इस चित्र को जो भी कहता है, वही सुंदर कहता है! आप पहले आदमी हैं कि सुंदर भी कह रहे हैं और चालबाजी से भरा भी!
मैंने कहा, चालबाजी इसलिए कि महावीर को तो सुंदर बनाया है, मगर एक झाड़ की आड़ में खड़ा किया है। और झाड़ की शाखा इस तरह से उनके पास से गुजारी है कि उनका नग्नपन न दिखाई पड़े। तो, मैंने कहा, लंगोटी ही लगा देते! इतना बड़ा झाड़ लिए फिरो! तो लंगोटी में क्या बुरा है? और हमेशा ऐसे झाड़ की आड़ में ही खड़े रहो, यह भी एक झंझट है! और कहीं झाड़ मिले न मिले! और इसके पहले कि झाड़ मिले, कोई दूसरा मिल जाए! और ऐसा झाड़ लेकर चलना हो, तो फिर तो ट्रक पर समझो कि एक झाड़ खड़ा किए हुए हैं, जैसे ट्रक पर झांकियां निकलती हैं, ऐसे महावीर स्वामी खड़े हैं और झाड़ की आड़ में! मगर इतना उपद्रव!
उन्होंने कहा, यह बात मुझे कभी खयाल न आई। बात तो सच है कि झाड़ इस ढंग से बनाया है कि बस उनका नग्नपन भर छिप गया है!
जैन मुनि को इस तरह से बिठालते हैं, फोटो लेते वक्त, पालथी मार कर! और शास्त्र रख देते हैं उसकी पालथी में! वे शास्त्र पढ़ रहे हैं! जैसे ये चौबीस घंटे कोई और दूसरा काम करते हैं कि नहीं, पता नहीं! नहाते-धोते भी हैं कि शास्त्र ही पढ़ते रहते हैं! मगर जब भी तस्वीर देखो, तो शास्त्र ही पढ़ रहे हैं! वह शास्त्र पढ़वाना पड़ता है। और शास्त्र भी छोटा नहीं, काफी बड़ा शास्त्र पढ़वाना पड़ता है, जिसमें उनका सब ढंक जाए!
अब इतना ही ढांकना है, तो लंगोटी में क्या बुराई है?
जैन मुनि चलता भी है रास्ते पर--दिगंबर जैन मुनि--तो उनके भक्त चारों तरफ से उनको घेर कर चलते हैं। अंग्रेजों के जमाने में तो कुछ नगरों में उनके चलने पर निषेध था, पहले पुलिस से स्वीकृति लेनी पड़ती थी। और जब वे चलते भी, तो उनके आस-पास जैनियों को मंडल बना कर चलना पड़ता था कि उनकी नग्नता किसी को दिखाई न पड़े। और जैन मुनि भी जब चलता है, तो वह पिच्छी रखता है। वह पिच्छी इस ढंग से रखता है...।
क्या मतलब? क्या प्रयोजन? छोटी सी बात के लिए इतनी बड़ी पिच्छी! जो काम तिग्गी से हो जाए, उसके लिए पिच्छी की क्या जरूरत? मगर खुद के पास भी तो वही बुद्धि है और चारों तरफ औरों के पास भी वही बुद्धि है। वह नजर उनकी वहीं अटकती है कि अरे, यह नंगा घूम रहा है आदमी! यह बात ठीक नहीं! किसी को यह भाव पैदा नहीं होता कि ये वीतराग हैं, इनको सम्मान दो! इनके चरणों में गिरो!
तुम्हारी धारणा तुम्हारी आंख को आरोपित कर लेती है, आच्छादित कर लेती है।
पत्नी चंदूलाल से कह रही थी, तुम मर्द लोग कितने लाचार होते हो जी! हम औरतें न रहें, तो तुम्हारे बटन कौन टांकेगा?
चंदूलाल बोले, बंटन टांकने की फिर जरूरत ही कहां रह जाएगी! देवियो, तुम्हारे ही कारण तो ये बटनों को टंकवाना पड़ रहा है, नहीं तो बिना ही बटन टांके हुए घूमेंगे न!
मोटर की कतार का तथा सिपाही के खड़े हाथ की ओर ध्यान न देकर एक व्यक्ति ने बड़ी शांति से चौराहा पार करना आरंभ किया था। ब्रेकों की आवाज गूंज उठी। ट्रैफिक पुलिस का व्यक्ति क्रोध से भरा हुआ उस व्यक्ति के पास आया और बोला, क्या आपको मेरा खड़ा हाथ दिखाई नहीं देता था?
खड़े हाथ का मतलब मैं नहीं जानूंगा? वह व्यक्ति चिल्ला कर बोला। पचास साल से ज्यादा हो गए मुझे बच्चों को पढ़ाते हुए। अरे, लघुशंका करने जाना है, जाओ!
अपनी-अपनी दृष्टि है! अब वह बेचारा पचास साल से स्कूल में पढ़ा रहा है; बच्चे हाथ खड़ा करते हैं; मतलब लघुशंका! अब पुलिस वाला हाथ खड़ा किए हुए है। तुमको करना है लघुशंका, करो! इसमें मुझे क्या लेना-देना है!
उस बेचारे ने ठीक कहा, कि पचास साल स्कूल में पढ़ाने के बाद मुझे पता नहीं होगा कि खड़े हाथ का क्या मतलब होता है! जरूरत क्या है खड़ा हाथ करने की? तुमको लघुशंका करनी है, करो! मैं कोई रोक रहा हूं!
एक दृष्टि तय हो जाती है, फिर वही दिखाई पड़ती है।
लड़की का बाप अपने होने वाले दामाद को अपने परिवार का अलबम दिखा रहा था। उस खानदान के पचासों चित्र देखने के बाद एक मजबूत काठी के बूढ़े का चित्र सामने आया। लड़की के बाप ने बड़े गर्व से कहा, ये हमारे हैं आदिपुरुष, इन्होंने ही हमारे खानदान की स्थापना की।
ये क्या थे?
बताया न! इन्होंने ही हमारे खानदान की बुनियाद डाली!
दामाद ने पूछा, जी, वह तो मैं समझा। मेरा मतलब है कि दिन के वक्त में ये क्या करते थे? खानदान की स्थापना तो रात में करते होंगे, मगर दिन में? सिर्फ खानदान की स्थापना ही करते थे! कोई धंधा वगैरह नहीं करते थे!
लोगों के प्रश्न भी उनकी दृष्टियों से उठते हैं!
ढब्बूजी पहली बार दिल्ली जा रहे थे। उनके मित्र चंदूलाल ने उन्हें कहा कि मित्र खयाल रखना कि दिल्ली के लोग बड़े चालबाज होते हैं। वहां के दुकानदार ग्राहकों की आंखों में धूल झोंकने में बड़े माहिर होते हैं। हर चीज की कीमत दोगुनी बताते हैं। तो कोई भी चीज खरीदने के पहले मोल-भाव करना न भूलना।
ढब्बूजी एक छाते की दुकान पर छाता खरीदने के लिए पहुंचे। छाते के दाम पूछे, तो दुकानदार ने कहा कि बीस रुपए होंगे श्रीमानजी।
ढब्बूजी को फौरन चंदूलाल की सीख याद आई। वे बोले कि मैं तो अधिक से अधिक बस दस रुपए इस छाते के दे सकता हूं। इससे एक पाई ज्यादा नहीं।
दुकानदार बोला, अच्छा ऐसा करिए, आप पंद्रह रुपए दे दीजिए।
ढब्बूजी बोले, अब तो मैं साढ़े सात रुपए ही दूंगा!
दुकानदार बोला, देखो, अभी तुमने दस रुपए कहा था। चलो, दस रुपए ही निकालो।
ढब्बूजी को लगा कि दुकानदार तो बड़ा चालबाज है! वे बोले, अब तो मैं पांच रुपए में ही खरीदूंगा। इससे एक पैसा भी ज्यादा नहीं!
दुकानदार इस मोल-भाव से झल्ला गया और बोला कि ऐसा करो कि मुफ्त में ही ले जाओ!
ढब्बूजी बोले, अगर मुफ्त में दे रहे हो, तो मैं दो छाते लूंगा, एक नहीं! तुमने मुझे समझा क्या है! अरे, मैं भी तैयार होकर आया हूं। बिलकुल आंखों में धूल झोंक रहे हो! एक छाता मुफ्त में पकड़ा रहे हो! दो लूंगा, दो। इससे एक कम नहीं लूंगा।
यह शतपथ ब्राह्मण का सूत्र: "सत्यं वै चक्षुः।'
तुम्हारे देखने के ढंग में सत्य है--या असत्य। सब तुम्हारे देखने के ढंग पर निर्भर है। अगर आंखें पक्षपात से भरी हैं, तो तुम जो देखोगे वह असत्य।
फिर तुम्हें याद दिला दूं, सत्य या असत्य कोई बाहर निर्णीत नहीं होते हैं; तुम्हारे भीतर निर्णय होता है। बाहर तो वही है जो है। लेकिन तुम्हें सत्य मालूम होगा, अगर आंख निर्मल है। और अगर आंख दूषित है, जैसे पीलिया के मरीज को सब पीला दिखाई पड़ने लगे, ऐसे ही अगर तुम्हारी आंख ने कुछ पहले ही तय कर रखा है...। और जिस आंख ने कुछ तय कर रखा है, वह अंधी है।
अंधा मैं उस आदमी को कहता हूं, जिसकी आंख पक्षपातों से भरी है। और आंख वाला उस आदमी को, जिसकी आंख पक्षपातमुक्त है।
"सत्यं वै चक्षुः।'
चक्षु सत्य है। असली बात आंख की है, दृष्टि की है--सृष्टि की नहीं। सृष्टि तो जैसी है वैसी है। मगर देखने वाले अलग-अलग ढंग से देखते हैं। और जब तक तुम्हारा कोई भी देखने का ढंग है, तब तक तुम जो भी देखोगे वह सत्य नहीं हो सकता। तुम्हारा ढंग आरोपित हो जाएगा।
ध्यान का अर्थ होता है, आंख को सब ढंगों से मुक्त कर लेना; आंख को निर्विचार, निर्विकल्प, निर्बीज कर लेना। आंख के पास अपनी कोई भावना न रह जाए। आंख के पास अपनी कोई छिपी हुई आकांक्षा भी न रह जाए। फिर तुम जो देखोगे, वह सत्य है।
"और सत्य ही प्रजापति है।'
सत्य ही परमात्मा है। सत्य से ही सारे जगत का आविर्भाव हुआ है, सत्य में ही सारा जगत जी रहा है, और सत्य में ही सारा जगत लीन होता है; उठता है, जीता है, लीन होता है।
और यह सत्य अभी तुम देख सकते हो। योगवासिष्ठ के सूत्र को और शतपथ ब्राह्मण के इस सूत्र को तुम जोड़ दो, तो तुम्हारा ध्यान का पूरा शास्त्र निर्मित हो जाएगा।
"सत्यं वै चक्षुः।'
सत्य है आंख में। आंख ही सत्य है। आंख होनी चाहिए।
"सत्यं हि प्रजापतिः।'
और जिसने सत्य को जान लिया, उसने परमात्मा को जान लिया।
और यह आंख कैसे निर्मल होगी?
"भविष्यं नानुसंधत्ते।'
भविष्य का अनुसंधान न करो।
"नातीतं चिन्तयत्यसौ।'
और न अतीत की चिंता करो।
"वर्तमान निमेषं तु।'
यह जो वर्तमान का निमिष मात्र है, पल मात्र है, बस इसमें ठहर जाओ, अडिग हो जाओ।
"हसन्नेवानुवर्तते।'
प्रमुदित हो जाओ, आह्लादित हो जाओ। नाचो! गाओ! इस वर्तमान के क्षण को मधुशाला बना लो। यह वर्तमान का क्षण तुम्हारे लिए शराब हो जाए। पीओ, बेझिझक, बिना किसी शर्त के। और तब तुम जीवन का एक नया ही रूप अनुभव करोगे। वैसा रूप जैसा कि ऋषियों ने जाना; वैसा रूप जैसा कि बुद्धों ने पहचाना; वैसा रूप जैसा कि जिनों ने जीया। क्राइस्ट और जरथुस्त्र और बुद्ध और लाओत्सु और महावीर और कृष्ण, सब एक साथ तुम्हारे लिए सही हो जाएंगे। योगवासिष्ठ और शतपथ ब्राह्मण और ईशावास्य और धम्मपद और कुरान और बाइबिल और जेन्दावेस्ता, सब एक साथ तुम्हारे भीतर लयबद्ध हो जाएंगे। तब तुम ऐसा न देखोगे कि ये अलग-अलग हैं; तब तुम्हारे लिए धर्म नहीं होंगे, सिर्फ धार्मिकता रह जाएगी।
सत्य एक है, तो धार्मिकता भी एक ही हो सकती है।
मैं संन्यास के इस प्रयोग से इन्हीं दो बातों को पूरा कर लेना चाह रहा हूं: तुम्हारी आंख निर्मल हो और तुम वर्तमान में ठहर जाओ। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू समझो। आंख निर्मल होगी, तो ही वर्तमान में ठहरोगे। वर्तमान में ठहरोगे, तो ही आंख निर्मल होगी। ये एक-दूसरे पर निर्भर हैं, परस्पर-निर्भर हैं।
जब तक यह न हो जाए, जब तक जीवन में दुख होगा, तब तक जीवन नर्क है। जैसे ही यह हुआ कि जीवन स्वर्ग है, मोक्ष है। तब परमात्मा कहीं बाहर नहीं, तुम्हारी श्वास-श्वास में है, तुम्हारे हृदय की धड़कन-धड़कन में है।


 अंतिम प्रश्न: भगवान, आपसे संन्यास लेने के बाद मेरे अंग-अंग से नृत्य फूट रहा है। किसी अज्ञात कवि का यह गीत आपको देख कर रोम-रोम में गूंजने लगता है--
      मोहे आई न जग से लाज
      मैं इतने जोर से नाची आज
      कि घुंघरू टूट गए।
      कुछ मुझमें नया जोबन भी है
      कुछ प्यार का पागलपन भी है
      जब लिया तुम्हारा नाम
      कुछ ऐसा लचका पांव
      कि घुंघरू टूट गए।
      कहती है मेरी हर अंगड़ाई
      मैं पिया की नींद चुरा लाई
      मुझे अंग मिले परवानों के
      मुझे पंख मिले अरमानों के
      मैं बन के गई थी चोर
      कि मेरी पायल थी कमजोर
      कि घुंघरू टूट गए।
यह नृत्य सदा-सदा बना रहे, ऐसा आशीष चाहती हूं भगवान!

 चंद्रकांता भारती!
यह घटना शुरू हो जाए, तो फिर मिटता नहीं। यह बीज फूटना शुरू हो जाए, तो फिर रुकता नहीं। असली कठिनाई बीज के टूटने की है। एक दफा बीज टूटा कि फिर विराट वृक्ष होगा।
इसी घटना की तो चर्चा शतपथ ब्राह्मण का सूत्र, योगवासिष्ठ का श्लोक, इस नृत्य के लिए ही तो इशारे हैं।
"मोहे आई न जग से लाज
मैं इतने जोर से नाची आज
कि घुंघरू टूट गए।'
टूट ही जाएंगे घुंघरू, क्योंकि यह नाच सीमा नहीं जानता, अवरोध नहीं जानता। यह कोई कंजूस का नृत्य नहीं है। यह कोई सम्हल-सम्हल कर नाचने की बात नहीं है। यह न आंगन देखे कि टेढ़ा है, कि तिरछा है; न यह ढंग देखे; न यह कोई नृत्य के शास्त्र का हिसाब रखे कि भरतनाटयम है, कि कथकली है। यहां सब शास्त्र टूट जाते हैं। यहां सब नियम टूट जाते हैं।
"मोहे आई न जग से लाज
मैं इतने जोर से नाची आज
कि घुंघरू टूट गए।'
टूट ही जाने चाहिए घुंघरू। घुंघरुओं को बचा-बचा कर जो नाचेगा, वह क्या खाक नाचेगा! वह तो घुंघरुओं को बचाने में ही लगा रहेगा। जो जग की लाज का हिसाब रखेगा, वह क्या खाक नाचेगा! उसके नाच में तो अहंकार बना ही रहेगा। और नाच भी क्या कोई छोटी-मोटी घटना है! बाढ़ है। जब आती है, तो सब बहा ले जाती है।
"मोहे आई न जग से लाज
मैं इतने जोर से नाची आज
कि घुंघरू टूट गए।
कुछ मुझमें नया जोबन भी है...'
होना ही चाहिए। आंख नई होती है, तो सब नया हो जाता है।
"कुछ मुझमें नया जोबन भी है
कुछ प्यार का पागलपन भी है...'
होना ही चाहिए। प्रेम हो और पागलपन न हो, असंभव! हां, पागलपन हो सकता है और प्रेम न हो, यह बात बनती है। लेकिन प्रेम हो और पागलपन न हो, यह बात नहीं बनती। बहुत हैं पागल, जिनके जीवन में प्रेम नहीं। लेकिन ऐसा एक भी प्रेमी नहीं हुआ, जिसके जीवन में पागलपन न हो।
"कुछ मुझमें नया जोबन भी है
कुछ प्यार का पागलपन भी है
जब लिया तुम्हारा नाम
कुछ ऐसा लचका पांव
कि घुंघरू टूट गए।'
टूट ही जाने चाहिए। चंद्रकांता, बिलकुल ठीक हो रहा है। रास्ते पर आ गई! यूं तो लोग कहेंगे, भटक गई; पांव लचक गया! मगर मैं कहूंगा कि पांव क्या लचका, पंख लग गए।
"कहती है मेरी हर अंगड़ाई
मैं पिया की नींद चुरा लाई
मुझे अंग मिले परवानों के
मुझे पंख मिले अरमानों के
मैं बन के गई थी चोर
कि मेरी पायल थी कमजोर...'
यह काम ही चोरी का है! इसलिए तो हमने भगवान को एक नाम दिया, हरि! भगवान के बहुत से नाम हमने दिए। इस देश में जितने नाम हमने भगवान के दिए, दुनिया के किसी देश ने नहीं दिए। पूरा एक शास्त्र ही है, विष्णुसहस्रनाम। उसमें सिर्फ नामों का ही उल्लेख है। भगवान के हजार नाम। और हजार तो केवल प्रतीक है। हजार प्रतीक है अनंत का। इसलिए तो कहते हैं, जब समाधि लगती है, तो सहस्रदल कमल, हजार पंखुड़ियों वाला कमल खिलता है। हजार प्रतीक है अनंत का। उसमें सभी नाम प्यारे हैं।
एक नाम तो बहुत अदभुत है। नाम है: ॐ संन्यासकृते नमः। भगवान का एक नाम, वह जिसने संन्यास को पैदा किया। क्या गजब का नाम है! तुमने सुना, संसार को पैदा किया। मगर उसने संन्यास को भी पैदा किया।
उससे भी गजब का नाम है, हरि! हरि का अर्थ होता है चोर, हरण कर ले जो। चोर है भगवान! माखनचोर ही नहीं; कैसे आहिस्ते से हृदय को चुरा ले जाता है, पता ही नहीं चलता!
अभी कुछ दिन पहले एक जर्मन सुंदर युवती ने संन्यास लिया। उसे मैंने नाम दिया, हरिदासी। उसको नाम समझा रहा था। बहुत भोली-भाली लड़की थी। उसे मैं नाम समझा रहा था, और जब मैंने उसे कहा कि भगवान चुपचाप हृदय चुरा लेता है, यह मतलब है हरि का। सो उसने कहा, हाय! और अपने हृदय पर हाथ रखा। मैंने कहा, अब बेकार रख रही है तू, गया! अब कहां! वहां कभी था।
उससे मैंने पूछा, अब कितने दिन रहेगी?
उसने कहा, अब क्या कहूं! अब मुझे खुद ही पता नहीं। अब सवाल यह है कि जाऊंगी कैसे! अगर हृदय गया, तो सब गया।
तू ठीक ही आई चंद्रकांता! यही आने का ढंग है।
"मैं बन के गई थी चोर
कि मेरी पायल थी कमजोर
कि घुंघरू टूट गए।'
चोर तो बन कर जाना पड़ता है। परमात्मा को भी तुम्हारे भीतर चोर बन कर जाना पड़ता है और तुमको भी परमात्मा के भीतर चोर बन कर जाना पड़ता है। मगर कितने ही सम्हल कर जाओ, घुंघरू बज जाते हैं; बज ही नहीं जाते, टूट भी जाते हैं! शोरगुल हो जाता है। बात जग-जाहिर हो जाती है। कितने ही आहिस्ता जाओ, कितने ही चुपचाप जाओ, कितना ही छुपाओ, छुपाए भी यह बात छुपती नहीं।
चंद्रकांता! ठीक हो रहा है। पैर लचक गया, घुंघरू टूट गए, पंख लग गए अरमानों को--तू चल पड़ी मार्ग पर। आंख निर्मल होती जाएगी। अतीत खो जाएगा, भविष्य खो जाएगा, यह वर्तमान का अपूर्व क्षण ही रह जाएगा। और उसी क्षण--अतीत जहां नहीं, भविष्य जहां नहीं--तू भी गई! अभी पायल के घुंघरू टूटे हैं, जल्दी ही तू भी टूट जाएगी। यह मैं-भाव भी टूट जाएगा। और जहां मैं गया, वहां परमात्मा है।
जब तक मैं है, तब तक परमात्मा नहीं; और जब मैं नहीं है, तब परमात्मा है।

आज इतना ही।