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बुधवार, 19 अप्रैल 2017

अनंत की पुकार—(अहमदाबाद)-प्रवचन-04

अनंत की पुकार(अहमदाबाद)

ओशो
प्रवचन-चौथा-("मैं' की छाया है दुख)
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक धर्मगुरु ने एक रात एक सपना देखा। सपने में उसने देखा कि वह स्वर्ग के द्वार पर पहुंच गया है। जीवन भर स्वर्ग की ही उसने बातें की थीं। और जीवन भर, स्वर्ग का रास्ता क्या है, वह लोगों को बताया था। वह निश्चिंत था कि जब मैं स्वर्ग के द्वार पर पहुंचूंगा तो स्वयं परमात्मा मेरे स्वागत को तैयार रहेंगे।
लेकिन वहां द्वार पर तो कोई भी नहीं था। द्वार खुला भी नहीं था, बंद था। और द्वार इतना बड़ा था कि उसके ओर-छोर को देख पाना संभव नहीं था। उस विशाल द्वार के समक्ष खड़े होकर वह एक छोटी सी चींटी की तरह मालूम होने लगा, इतना छोटा मालूम होने लगा। उसने बहुत द्वार को खटखटाया, लेकिन उस विशाल द्वार पर उस छोटे से आदमी की आवाजें भी पैदा हुईं या नहीं, इसका भी पता लगना कठिन था। वह बहुत डर गया। निरंतर उसने यही कहा था कि परमात्मा ने अपनी ही शक्ल में आदमी को बनाया। और आज इस विराट द्वार के समक्ष खड़े होकर वह इतना छोटा मालूम होने लगा।
बहुत चिल्लाने, बहुत द्वार पीटने पर कोई द्वार से एक छोटी खिड़की खुली और किसी ने झांका। जिस व्यक्ति ने झांका था उसकी हजार आंखें होंगी। और इतनी तेज रोशनी थी उन आंखों की कि वह धर्मगुरु एक छोटे से दीवाल के कोने में सरक गया। इतना डर गया और चिल्लाया कि आप कृपा कर चेहरा भीतर रखें। हे परमात्मा! आप चेहरा भीतर रखें। मैं बहुत डर गया हूं।
उस हजार आंखों वाले व्यक्ति ने कहा कि मैं परमात्मा नहीं हूं, मैं तो केवल यहां का पहरेदार हूं, यहां का द्वारपाल हूं। तुम कहां हो, मुझे दिखाई नहीं पड़ते! तुम कितने छोटे हो और कहां छिप गए हो?
उस धर्मगुरु ने चिल्ला कर कहा कि मैं तो परमात्मा के दर्शन करना चाहता हूं और स्वर्ग में प्रवेश पाना चाहता हूं।
उस द्वारपाल ने पूछा, तुम हो कौन और कहां से आए हो?
उसने कहा, क्या आपको पता नहीं? मैं एक धर्मगुरु हूं और पृथ्वी से आ रहा हूं।
उस हजार आंखों वाले आदमी ने कहा, पृथ्वी! यह पृथ्वी कहां है?
वह धर्मगुरु हैरान हुआ, उसने कहा, तुम्हें पृथ्वी का भी पता नहीं है!
उस हजार आंखों वाले आदमी ने कहा कि किस यूनिवर्स में, किस विश्व की पृथ्वी की तुम बात कर रहे हो? करोड़ों यूनिवर्स हैं। करोड़ों विश्व हैं। प्रत्येक विश्व के करोड़ों सूरज हैं। प्रत्येक सूरज की अपनी पृथ्वियां हैं। तुम किस पृथ्वी की बात करते हो? क्या नंबर है तुम्हारी पृथ्वी का? क्या इंडेक्स नंबर है?
उसे तो कुछ पता नहीं था। उसने कहा कि हम तो एक ही विश्व को जानते हैं और एक ही सूरज को। और हमने इसलिए उनका कोई नाम नहीं रखा, कोई नंबर नहीं रखा।
उस पहरेदार ने कहा, तब बहुत मुश्किल है पता लगाना कि तुम कहां से आते हो। पहली बार ही इस द्वार पर पृथ्वी का नाम सुना गया है। और मनुष्य, यह शब्द भी पहली बार ही मेरे कानों में पड़ा है।
उसके तो प्राण बैठ गए धर्मगुरु के! सोचा था परमात्मा द्वार पर स्वागत को मिलेंगे। यहां तो इसका भी कोई पता नहीं है कि जिस पृथ्वी से वह आता है वहां कहां है। फिर भी उस पहरेदार ने कहा, तुम निश्चिंत रहो, मैं अभी पूछताछ करवाता हूं, थोड़ा समय तो लग जाएगा। उस भवन में खोज करवाता हूं कि तुम किस पृथ्वी की बातें करते हो, जहां सारी दुनिया की पृथ्वियों के संबंध में हमारे पास आंकड़े इकट्ठे हैं, नक्शे इकट्ठे हैं। लेकिन कुछ महीने लग जाएंगे, इसके पहले तो इसका पता लगना कठिन है कि तुम कहां से आते हो और किस जाति के हो और क्या प्रयोजन है तुम्हारा यहां आने का।
उसने कहा, मैं परमात्मा के दर्शन करना चाहता हूं।
उस पहरेदार ने कहा, अनंत वर्ष हो गए मुझे इस द्वार पर, अभी तो मैं भी परमात्मा के दर्शन नहीं कर पाया हूं। और अब तक मैं ऐसे व्यक्ति को भी नहीं मिला हूं इस स्वर्ग के द्वार पर जिसने परमात्मा के दर्शन किए हों। परमात्मा की पूरी सृष्टि को ही जान लेना कठिन है, परमात्मा को जानना तो और भी कठिन है। वह तो समग्रता का ही नाम है।
घबड़ाहट में उस धर्मगुरु की नींद टूट गई। वह पसीने से लथपथ था। घबड़ा गया था। फिर रात भर उसे नींद नहीं आ सकी। वह बार-बार यही सोचता रहा कि कहीं मनुष्य ने अपने अहंकार के ही प्रभाव में तो ये सारी बातें नहीं सोच ली हैं कि परमात्मा ने आदमी को अपनी ही शक्ल में बनाया और परमात्मा आदमी से मिलने को उत्सुक है और पुकार रहा है? और स्वर्ग के द्वार और मोक्ष, ये कहीं मनुष्य ने अपने ही मन की कल्पनाएं तो नहीं खड़ी कर ली हैं?
इस कहानी से इसलिए मैं शुरू करना चाहता हूं--इस धर्मगुरु के सपने से--कि आदमी एक बहुत बड़े भ्रम-लोक में जीता है। वह स्वयं को न मालूम क्या-क्या समझ लेता है। जब कि इस विराट विश्व के किसी कोने में उसका कोई भी अस्तित्व नहीं है। इस विश्व की विराटता को हम अनुभव करें और फिर उसके सामने अपने को खड़ा करें, तो हम कहां रह जाते हैं? हम कहां हैं? यह पृथ्वी बहुत छोटी है। हमारा सूरज इस पृथ्वी से साठ हजार गुना बड़ा है। और यह सूरज, जितने सूरज को हम जानते हैं, उनमें सबसे छोटा है। और कोई दो अरब सूरज जान लिए गए हैं। और प्रत्येक सूरज का अपना विस्तार है। और ये दो अरब सूरज ही समाप्ति नहीं है, उसके आगे भी विश्व होगा, उसके आगे भी विस्तार होगा, उसके आगे भी फैलाव होगा। इस इतने अनंत विश्व के एक छोटे से पृथ्वी के कोने पर छोटा सा प्राणी है मनुष्य। वह भी कोई बहुत बड़ी संख्या नहीं है उसकी। कोई साढ़े तीन अरब उसकी संख्या है। अगर हम और प्राणियों की संख्या के हिसाब से विचार करेंगे, तो पाएंगे वह कहीं भी नहीं है। और छोटे-छोटे प्राणी हैं, उनकी संख्या अनंत है। उसमें छोटी सी संख्या का यह मनुष्य है।
मनुष्य का यह जो ह्यूमन कार्नर है, यह छोटा सा जो कोना है इस जगत में, उस कोने में हम न मालूम क्या अपने को समझ बैठे हैं! न मालूम क्या अपने को सोच बैठे हैं!
यह मनुष्य भी बहुत थोड़े से दिन जीता है, कोई सत्तर-अस्सी वर्ष, ज्यादा से ज्यादा सौ वर्ष जीता है। इस अनंत विश्व के विस्तार में सौ वर्षों की कोई गणना नहीं, कोई कीमत नहीं, कोई जगह नहीं। पृथ्वी को बने ही कोई दो अरब वर्ष हो गए। और पृथ्वी बहुत नया आगमन है जगत में। अरबों-खरबों वर्ष पीछे हैं, उनकी कोई शृंखला का अंत नहीं; उतना ही समय आगे है, अनंत, इटरनल, उसका कोई अंत नहीं। उसमें एक छोटे से क्षणों में एक आदमी जी लेता है और न मालूम क्या सोच लेता है। स्पेस के खयाल से भी आदमी ना-कुछ है, टाइम के खयाल से भी आदमी ना-कुछ है।
धार्मिक व्यक्ति मैं उसे कहता हूं जो अपने इस ना-कुछ होने के अनुभव को उपलब्ध हो जाता है। लेकिन धार्मिक व्यक्ति की कथा उलटी रही है। धार्मिक व्यक्ति घोषणा करता है: अहं ब्रह्मास्मि! मैं हूं ब्रह्म! मैं हूं ईश्वर! मैं हूं आत्मा! मैं हूं अनंत आत्मा! मैं हूं मोक्ष का अधिकारी! मैं यह हूं! मैं वह हूं! धार्मिक व्यक्ति इन बातों की घोषणा करता है।
ऐसे व्यक्ति को मैं धार्मिक नहीं कहता हूं। धार्मिक व्यक्ति वह है जो अपनी इस नथिंगनेस को, इस ना-कुछ होने को अनुभव कर लेता है। जिस दिन यह ना-कुछ होना अनुभव हो जाता है, उसी दिन जीवन के कोई बंद द्वार खुल जाते हैं और सब कुछ होने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। लेकिन ना-कुछ होने का अनुभव अत्यंत प्राथमिक है। बिलकुल पहली सीढ़ी है कि हम जानें कि हम कुछ भी नहीं हैं। लेकिन यह हमें पता लगना कठिन होता है। क्योंकि हम मनुष्यों के बीच में जीते हैं और हम सबका भ्रम चूंकि समान है, इसलिए उस भ्रम का कभी खंडन नहीं होता। हम सब एक-दूसरे के भ्रम के पोषक बनते चले जाते हैं।
जब पहली बार गैलीलियो और उसके साथियों ने यह कहा कि सूरज पृथ्वी का चक्कर नहीं लगाता है, पृथ्वी ही चक्कर लगाती है सूरज के, तो मनुष्य के अहंकार को बड़ा धक्का पहुंचा। धर्मगुरुओं ने कहा, यह कैसे हो सकता है? परमात्मा ने विशेष रूप से मनुष्य को बनाया है। और सारा जगत मनुष्य के उपभोग के लिए बनाया है। तो जिस पृथ्वी पर मनुष्य रहता है वह पृथ्वी सूरज के चक्कर कैसे लगा सकती है? सूरज ही चक्कर लगाता है पृथ्वी के।
गैलीलियो को बुला कर अदालत में कहा कि माफी मांग लो। ऐसी भूल की बातें मत करो। आदमी जिस पृथ्वी पर रहता है वह कैसे सूरज का चक्कर लगा सकती है! सूरज ही चक्कर लगाता है।
लेकिन धीरे-धीरे जितनी हमारी समझ बढ़ी, पता चला कि पृथ्वी सेंटर नहीं है विश्व का--कि सारा विश्व उसका चक्कर लगाता हो। और पृथ्वी को सेंटर मानने का खयाल हमें क्यों पैदा हुआ था? क्योंकि हम अपने को सेंटर मानने के खयाल में थे। हम सारे जगत के केंद्र हैं, सारा जगत हमारे इर्द-गिर्द चक्कर लगाता है। हम सब कुछ हैं बीच में, यह जो मनुष्य है, मनुष्यता है, यह केंद्र है और बाकी सब कुछ चक्कर लगाता है।
हजारों वर्षों से धार्मिक व्यक्ति यह कहते रहे हैं कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि किन्हीं और प्राणियों से बिना पूछे ही हम यह घोषणा करते रहे हैं कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। न तो हमने चींटियों से पूछा है, न हमने पक्षियों से पूछा है, यह एकतरफा गवाही हमने स्वीकार कर ली है, अपने ही मुंह से हम कहते रहे हैं कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, वह सरताज है सृष्टि का। यह बिना किसी प्राणी से पूछे हुए हमने घोषणा कर दी है। और चूंकि किसी प्राणी को इस घोषणा का पता भी नहीं है इसलिए कोई प्रतिवाद भी नहीं आता, कोई इनकार भी नहीं करता है। हम अपने कोने में बैठे हुए मनुष्य घोषणाएं करते रहते हैं: हम यह हैं, हम वह हैं।
अगर पशु-पक्षियों से पूछा जाए और किसी दिन हम जान सकें कि वे क्या सोचते हैं, तो शायद ही कोई ऐसी प्राणी-जाति मिले, जो अपने मन में यह न सोचती हो कि हम सर्वश्रेष्ठ हैं। चींटियां सोचती होंगी--हम! बंदर सोचते होंगे--हम! डार्विन ने कह दिया कि मनुष्य विकसित हुआ है बंदरों से। अगर बंदरों से पूछा जाए तो बंदर यह कभी मानने को राजी नहीं होंगे कि आदमी उनके ऊपर एक विकास है। वे तो यही मानेंगे कि आदमी जो है हमारा एक पतन है। हम दरख्तों पर कूदते-छलांगते हैं, आदमी जमीन पर सरकता है। यह हमारा पतन है। हमारी जाति से कुछ लोग पतित हो गए हैं नीचे और वे आदमी हो गए हैं। यह एवोल्यूशन नहीं है। अगर बंदरों का कोई डार्विन होगा तो वह इसको एवोल्यूशन या विकास मानने को तैयार नहीं होगा कि आदमी कोई विकसित हो गया है। लेकिन आदमी मानने को राजी हो गए। आदमी के अहंकार को जो चीज भी पुष्ट करती है वह मानने को एकदम राजी हो जाता है। पृथ्वी केंद्र थी, मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी!
लेकिन धीरे-धीरे, रोज-रोज ये बातें छिनती चली गईं। विज्ञान ने रोज-रोज चोट की। पहली चोट यह हुई कि पृथ्वी केंद्र न रही। जिस दिन पृथ्वी केंद्र न रही, उसी दिन बहुत बड़ा धक्का मनुष्य के अहंकार को पहुंच गया। फिर हम सोचते थे कि मनुष्य के भीतर जितना हम घुसेंगे उतना ही परमात्मा उपलब्ध होगा, उतने ही आत्मा के दर्शन होंगे। इधर आया फ्रायड और उसने कहा कि मनुष्य के भीतर जितना घुसो, सिवाय सेक्स के कुछ उपलब्ध होता नहीं। बहुत घबड़ाहट सारी दुनिया में फैली। आदमी ने फिर इनकार किया कि कैसी फिजूल बातें हैं! भीतर तो है परमात्मा। और यह एक फ्रायड कहता है कि भीतर है सेक्स। ये तो सब बड़ी गलत बातें हैं। लेकिन जितनी हमारी समझ बढ़ी, पता चला कि आदमी के सामान्य केंद्र पर सेक्स ही है। वह उसी से जन्मता है, उसी में जीता है, उसी के लिए जीता है और उसी में समाप्त हो जाता है। और एक बड़ा धक्का लगा। और एक केंद्र अहंकार का टूट गया। और तीसरा बड़ा धक्का लगा, जब विराट विश्व की खोजबीन शुरू हुई और पाया कि अंतहीन सीमाएं हैं जगत की। कहीं कोई अंत होता नहीं, फैलता जाता है, फैलता जाता है जगत। कहीं कोई जगह नहीं आती जहां हम कहें कि यहां समाप्त हो गया।
सोचते थे हम कि तारे हमारे बहुत निकट हैं, रात को दिखाई पड़ते हैं। लेकिन जैसे-जैसे समझ बढ़ी, पता चला तारे हमसे बहुत दूर हैं। इतने दूर हैं कि उनकी गणना भी करनी बहुत कठिन है। सबसे करीब का जो तारा है हमसे, उसकी रोशनी भी आने में हम तक चार वर्ष लग जाते हैं। और रोशनी की गति साधारण नहीं होती, एक सेकेंड में एक लाख छियासी हजार मील होती है। एक सेकेंड में प्रकाश की किरण चलती है तो एक लाख छियासी हजार मील चलती है, एक सेकेंड में! जो सबसे करीब का तारा है उसकी किरण चले आज तो चार वर्ष बाद लोनावला पहुंचेगी। यह सबसे करीब का तारा है। दूर से दूर के जो तारे हैं, उनकी रोशनी उस दिन चली थी जिस दिन पृथ्वी बनी, दो अरब वर्ष पहले, अभी तक पहुंची नहीं। उनके आगे भी तारे हैं, वे हमें दिखाई नहीं पड़ सकते हैं, क्योंकि उनकी रोशनी हम तक अभी पहुंची ही नहीं है।
रात को जो तारे हम देखते हैं, वे जहां हमें दिखाई पड़ते हैं वहां नहीं होते। कोई तारा वहां नहीं होता। रात बिलकुल झूठी है, कोई तारा वहां नहीं जहां हमें दिखाई पड़ रहा है। वहां कभी था। उसकी रोशनी इतनी देर में आई, इतनी देर में तो वह न मालूम कहां चला गया, कितनी यात्रा कर गया। अब वहां नहीं है। जो तारा सबसे करीब है वह चार वर्ष पहले वहां था, अब वहां नहीं है। चार वर्ष में तो वह अरबों मील चल चुका। और हो सकता है चार वर्ष में टूट कर नष्ट भी हो गया हो। तो भी हमें दिखाई पड़ रहा है, क्योंकि चार वर्ष पहले वह वहां था, उसकी रोशनी वहां से चली थी, वह अब हमारी आंख पर आई है, तो हमें दिखाई पड़ रहा है वहां है। पूरी रात झूठी है, कोई तारा वहां नहीं है जहां हमें दिखाई पड़ रहा है। कोई तारा सात वर्ष पहले वहां था, कोई हजार वर्ष, कोई लाख वर्ष, कोई करोड़ वर्ष, कोई अरब वर्ष। और दो अरब वर्ष पहले जो तारे थे उनकी तो रोशनी पहुंचेगी धीरे-धीरे हम तक।
यह सारी रात झूठी है। ये तारे इतने दूर हैं, इनकी दूरी ने घबड़ाहट पैदा कर दी। इनके विस्तार ने, यह जो इतना एक्सपैंडिंग जगत है, इसने आदमी को एकदम छोटे से छोटा कर दिया। वह कहीं भी नहीं रह गया, उसकी कोई गणना नहीं रह गई, उसका कोई हिसाब नहीं रह गया। धार्मिक आदमी को बड़ी चोटें पहुंची हैं।
मेरी दृष्टि में तो धार्मिक आदमी को चोट पहुंचनी नहीं थी, बल्कि धार्मिक आदमी की गहराई बढ़नी थी इन बातों से। क्योंकि इन बातों से यह पता चलना शुरू हुआ कि हम कुछ भी नहीं हैं। और वह पुराना हमारा भ्रम टूटा, कि हम सब कुछ अपने को मान कर बैठे थे। उस भ्रम को धक्के लगे। उससे सारी दुनिया का धार्मिक जगत एकदम हिल गया, कंप गया, और उसे लगा कि यह तो आदमी कुछ भी नहीं है। तो फिर हमारी घोषणाएं, हमारी अमरता की घोषणाएं, हमारी आत्मा की, ब्रह्म की, ईश्वर की, मोक्ष को पाने की घोषणाएं, उनका क्या होगा?
लेकिन मेरी दृष्टि में, विज्ञान की इन तीन सौ वर्षों की खोजों ने असली आदमी--असली धार्मिक आदमी--को पैदा करने की भूमिका उपस्थित कर दी। असली धार्मिक आदमी का पहला लक्षण है: अपने ना-कुछ होने को जान लेना। और जिस दिन कोई अपनी पूरी नथिंगनेस को परिपूर्णता में जान लेता है, उसी दिन शून्य को उपलब्ध हो जाता है।
तो आज की सुबह इस संबंध में मैं आपसे थोड़ी बात कहना चाहता हूं। हम कुछ भी नहीं हैं, यह बोध हमारा गहरे से गहरा होता जाना चाहिए। यह बोध हमारा निरंतर तीव्र से तीव्र होता जाना चाहिए कि मैं कुछ भी नहीं हूं। और ऐसा सोचने की जरूरत नहीं है कि मैं कुछ भी नहीं हूं। ऐसा तो जिंदगी को हम देखेंगे तो हमको दिखाई पड़ जाएगा कि मैं कुछ भी नहीं हूं। इसे दिखाई पड़ने में कौन सी कठिनाई है? मृत्यु रोज इसकी खबर लाती है कि हम कुछ भी नहीं हैं। लेकिन हम मृत्यु को कभी गौर से देखते नहीं कि वह क्या खबर लाती है। मृत्यु को तो हमने छिपा कर रख दिया है। मरघट गांव के बाहर बना देते हैं ताकि दिखाई न पड़े।
किसी दिन आदमी समझदार होगा, धार्मिक होगा, तो मरघट गांव के बिलकुल चौरस्ते पर बनाना होगा--कि रोज दिन में दस दफा निकलते, आते-जाते दिखाई पड़े, मौत खयाल में आए, कि मौत है। अभी कोई लाश निकलती है, मुर्दा निकलता है, बच्चों को हम घर के भीतर बुला लेते हैं, कि कोई मुर्दा निकल रहा है, भीतर आ जाओ। मुर्दा निकले और हममें समझ हो, तो सब बच्चों को बाहर इकट्ठा कर लेना चाहिए कि देख लो यह आदमी मर गया, और ठीक ऐसे ही हम सब मर जाने को हैं।
हमारे ना-कुछ होने का बोध जिस बात से भी गहरा होता हो, जिस बात से भी तीव्र होता हो, वे सारी प्रक्रियाएं हमारे जीवन में वास्तविक धर्म के जन्म का, सत्य के जन्म का, प्रकाश के जन्म का कारण बनती हैं।
हम ना-कुछ हैं, यह किन-किन बातों से खयाल में गहरा हो सकता है?
इसी बात की पूरी प्रक्रिया को ध्यान समझना चाहिए, जिससे आपके ना-कुछ होने का आपको रोज-रोज पता चलता चला जाए। हमारी हालत उलटी है। हम कुछ हैं, इस बात की कोशिश में जीवन भर प्रयास करते हैं।
एक बोधिधर्म भिक्षु था, वह कोई चौदह सौ वर्ष पहले चीन गया। वहां के सम्राट वू ने उसका स्वागत किया।
वू ने, जो वहां का सम्राट था, बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए थे। हजारों भिक्षुओं को रोज भोजन देता था। हजारों मंदिर बनवाए थे। बुद्ध की लाखों प्रतिमाएं बनवाई थीं। एक ही बौद्ध मंदिर उसने बनवाया था कि जिसमें उसने बुद्ध की दस हजार प्रतिमाएं रखवाई थीं। वह दस हजार बुद्धों वाला मंदिर अब भी शेष है।
तो जब बोधिधर्म चीन पहुंचा, तो वू उससे मिलने आया और उसने कहा, क्या मैं पूछ सकता हूं, मैंने इतने मंदिर बनवाए, इतने भिक्षुओं को मैंने दान दिया, धर्म की मैंने इतनी प्रभावना की, दूर-दूर तक धर्मशास्त्र बंटवाए, धर्म का प्रचार करवाया, इस सबका फल क्या है?
बोधिधर्म ने कहा, कुछ भी नहीं!
सम्राट तो बहुत हैरान हो गया! क्योंकि भिक्षुओं ने उसको यही समझाया था कि इसका फल है। तुम्हें मोक्ष मिल जाएगा, स्वर्ग मिल जाएगा। यह सब समझाया था। और बोधिधर्म ने कहा, कुछ भी नहीं! फल तो कुछ भी नहीं है, लेकिन पाप जरूर तुम्हें लगा।
उस वू ने कहा, क्या कहते हैं आप! इस सबसे मुझे पाप लगा!
बोधिधर्म ने कहा, इससे आपका यह खयाल मजबूत हुआ कि मैं कुछ हूं। मैंने इतना किया। इतने मंदिर बनवाए, इतने धर्मशास्त्र छपवाए, इतना प्रचार करवाया। इससे आपका यह खयाल मजबूत हुआ कि मैं कुछ हूं। और जगत में एक ही पाप है: इस बात का बोध कि मैं कुछ हूं। और एक ही पुण्य है: इस बात का अनुभव कि मैं कुछ भी नहीं हूं।
वू तो नाराज हो गया। क्योंकि जिसने इतना किया हो और भिक्षु उससे कहे कि इसका कोई फल नहीं है, उलटा पाप है। वह तो नाराज होकर चला गया। और उसने आज्ञा दे दी कि बोधिधर्म उसके राज्य में नहीं ठहर सकेगा। बोधिधर्म को आज्ञा आई कि वू ने कहलवाया है कि तुम इस राज्य में नहीं ठहर सकोगे।
बोधिधर्म ने कहा, वह गलती में है। वह अगर चाहता भी कि मैं यहां ठहरूं, तो मैं ठहरने वाला नहीं था। ऐसे पापी राज्य में मैं रुकूंगा ही कैसे! उसको कहना कि वह चाहता भी कि मैं ठहरूं, तो मैं ठहरने वाला नहीं हूं। उसकी आज्ञा की कोई जरूरत नहीं, मैं तो जा ही रहा हूं।
उसके राज्य को छोड़ कर बोधिधर्म दूसरे राज्य में चला गया, नदी के उस पार निकल गया। जब वू की मृत्यु आई, कोई दस वर्ष बाद, रोज-रोज वह सोचता रहा, उस बोधिधर्म की बात उसके प्राणों को छेदती रही रोज-रोज, कि उसने कहा है कि कोई फल नहीं इसका, बल्कि पाप है, क्योंकि यह खयाल पैदा हो गया कि मैं कुछ हूं। रोज-रोज सोचता रहा। फिर जैसे-जैसे मौत करीब आई, उसे लगना शुरू हुआ कि मैं तो ना-कुछ हो जाऊंगा। और जब कल मृत्यु मुझे ना-कुछ कर ही देगी, तो मेरा यह खयाल कि मैं कुछ था, मैंने इतना किया था, मैं यह था, मैं वह था, उसका क्या मूल्य रह जाएगा? क्या अर्थ रह जाएगा?
मरते वक्त उसने खबर भिजवाई, एक संदेशवाहक दौड़ाया, कि जाओ और बोधिधर्म को बुला लाओ! मुझे अनुभव हो रहा है कि शायद वही ठीक कहता था। मैं तो डूबता जा रहा हूं, सब विलीन होता चला जा रहा है।
बोधिधर्म के पास खबर पहुंची, बोधिधर्म ने कहा, मैं चलता तो हूं, लेकिन जिसकी खबर तुम लेकर आए हो, वह समाप्त हो गया है। और बहुत देर हो गई। जब मैंने कहा था, अगर वह तभी जान लेता कि मैं कुछ भी नहीं हूं, तो परम जीवन का उसे अनुभव हो जाता।
मृत्यु के क्षण में तो सभी जानते हैं कि हम कुछ भी नहीं हैं। लेकिन जीवन में जो जान लेते हैं वे धन्यभागी हैं। जीवन में ही जो इस सत्य को जान लेता है कि मैं कुछ भी नहीं हूं... मृत्यु में तो इस सत्य को सभी को जान ही लेना पड़ता है, लेकिन तब बहुत देर हो गई, तब कोई क्रांति का समय न रहा...लेकिन जीवन में ही जो जान लेता है, जीते जी जो जान लेता है कि मैं कुछ भी नहीं हूं।
च्वांगत्सु का शायद आपने नाम सुना हो। एक अदभुत फकीर था। एक गांव से निकलता था। गांव के बाहर, सांझ का समय था, अंधेरा था, एक आदमी की खोपड़ी से उसका पैर टकरा गया। मरघट था। उसने खोपड़ी को उठा कर सिर से लगा लिया और खोपड़ी को घर ले आया, अपने झोपड़े पर रख लिया। तो उसके मित्रों ने, उसके शिष्यों ने पूछा, इस खोपड़ी को यहां किसलिए ले आए हो?
उस च्वांगत्सु ने कहा कि मुझसे बड़ी भूल हो गई है। मरघट से मैं निकलता था, और वह छोटे लोगों का मरघट न था, बड़े लोगों का मरघट था। मरघट भी अलग-अलग होते हैं; छोटे आदमियों के अलग, बड़े आदमियों के अलग। जिंदगी में तो छोटे और बड़े अलग होते ही हैं, मृत्यु में भी हम फर्क कर लेते हैं: यह सम्राटों का मरघट है, यह दरिद्रों का मरघट है। तो उसने कहा, वह बड़े लोगों का मरघट था। यह किसी बड़े आदमी की खोपड़ी होनी चाहिए। हो सकता है किसी सम्राट की खोपड़ी हो। अगर यह आदमी जिंदा होता तो आज मेरी मुश्किल हो जाती। इसकी खोपड़ी में मेरा पैर लग गया था। कुछ भी हो, मर गया, फिर भी माफी तो मांग ही लेनी चाहिए, बड़े आदमी की खोपड़ी है। इसलिए इसको मैं ले आया, सम्मान से घर में रखूंगा, रोज माफी मांग लूंगा।
और फिर उस च्वांगत्सु ने कहा, यह खोपड़ी यहां पास रखी रहेगी तो मुझे यह खयाल बना रहेगा कि आज नहीं कल मेरी खोपड़ी की भी यही गति हो जाने को है। आज नहीं कल किसी मरघट पर मेरी खोपड़ी पड़ी रहेगी और लोगों के जूते और लातें उसको लगती रहेंगी। जिस खोपड़ी के लिए मैं इतने सम्मान की अपेक्षा करता हूं, कल वह मिट्टी में मिल जाने को है, यह सत्य मुझे खयाल में बना रहेगा इसलिए इस खोपड़ी को मैं पास ही रखने लगा हूं। और जिस दिन से इस खोपड़ी को मैंने अपने पास रखा है, अगर अब कोई जिंदा भी मेरी खोपड़ी में आकर लात मार दे, तो मैं ही उससे माफी मांग लूंगा कि आपके पैर को चोट तो नहीं लग गई है? क्योंकि यह लात तो लगनी है कल। मैं कब तक बचाऊंगा? यह खोपड़ी कल लातों में चली जाने को है।
यह जो सीधा सत्य है जीवन के ना-कुछ में बिखर जाने का, जीते जी जो इस सत्य को जानने में समर्थ हो जाता है, उसके जीवन में एक क्रांति हो जाती है। उसी क्रांति को मैं धर्म कहता हूं। उसके जीवन में दुख का अंत हो जाता है। क्योंकि दुख की जड़ इस खयाल में है कि मैं कुछ हूं। और जिस आदमी को यह खयाल जितना ज्यादा है कि मैं कुछ हूं, वह आदमी उतने ही गहरे दुख में उतरता चला जाता है। दुख का और कोई आध्यात्मिक अर्थ नहीं है सिवाय इसके कि मैं कुछ हूं। यह जितनी तीव्रता से यह गांठ मेरे मन में होती है कि मैं कुछ हूं, उतनी ही यह गांठ दुख देती है। जिस आदमी का यह खयाल मिट जाता है कि मैं कुछ हूं, उसे दुख देना कठिन हो जाता है, उसे दुख नहीं दिया जा सकता। और जिस दिन दुख की सारी संभावना विलीन हो जाती है भीतर से, उसी दिन आनंद की वर्षा शुरू हो जाती है।
आनंद को कोई खोज नहीं सकता। न ही आनंद कहीं मिलता है कि कोई चला जाए और भर लाए। न ही आनंद कोई दे सकता है किसी को। लेकिन दुख को हम खोजते हैं, दुख को हम इकट्ठा करते हैं, दुख की हम गांठ बांध लेते हैं और दुखी होते रहते हैं। दुख को हम चाहें तो विसर्जित कर दें, दुख को हम चाहें तो विदा कर दें। और दुख विदा हो जाए, तब जो शेष रह जाता है वही आनंद है।
और दुख किस गांठ पर इकट्ठा होता है?
मैं के अतिरिक्त, अहंकार के अतिरिक्त, दुख किसी और गांठ पर इकट्ठा नहीं होता। लेकिन हमारा सारा जीवन का उपक्रम इस दुख को ही इकट्ठा करने में है, इस दुख को ही बांध लेने में लगा रहता है। हम मंदिर भी बनाते हैं तो वह भी हमारे अहंकार की पूजा होती है कि मैंने बनाया यह मंदिर। हम सेवा भी करते हैं तो वह भी अहंकार की ही पूजा होती है कि मैंने की यह सेवा। हम प्रेम भी करते हैं तो भी वह घोषणा अहंकार की होती है कि मैं कर रहा हूं प्रेम। और तब प्रेम भी दुख लाता है, सेवा भी दुख लाती है, धर्म भी दुख लाता है। मंदिर और मस्जिद भी दुख लाते हैं। जहां "मैं' है, वहां दुख अनिवार्य है। "मैं' की छाया है दुख।
हम सब मुक्त होना चाहते हैं दुख से, लेकिन मैं से जो मुक्त नहीं होना चाहता वह दुख से मुक्त नहीं हो सकता है। हम दुख से तो बचना चाहते हैं और "मैं' को भरना चाहते हैं। ये इतनी कंट्राडिक्ट्री, ये इतनी विरोधी बातें हैं कि इन दोनों का कोई मेल कभी नहीं हो सकता। क्या यह संभव नहीं है कि हम यह जानने में समर्थ हो जाएं, सफल हो जाएं कि मैं कुछ भी नहीं हूं? इसे बहुत रूपों में विचार करें तो आदमी सफल हो सकता है।
पहला तो मैंने यह कहा कि स्थान, स्पेस के विस्तार को निरंतर खयाल में लेना चाहिए।
लेकिन स्पेस का जो विस्तार है उससे हमारे सब संबंध छूट गए हैं। आदमी की बनाई हुई बस्तियों में स्पेस का कोई पता नहीं चलता। बंबई जैसी बस्ती में, कब चांद निकलता है, कब डूबता है, कोई पता नहीं चलता। आदमी के मकान इतने बड़े हैं कि आकाश उसमें छिप गया।
अगर कोई घड़ी, आधा घड़ी को जमीन पर चुपचाप लेट गया हो और आकाश के विस्तार को देखता रहे, तो उसे पता चलेगा कि मैं कुछ भी नहीं हूं, मैं कहां हूं! अनंत के विस्तार की प्रतीति, चारों तरफ जो दूर तक असीम फैला है उसका अनुभव, उसका बोध, उसके प्रति जागना--मैं कुछ भी नहीं हूं, इसका खयाल लाएगा।
एक विस्तार स्पेस का है, दूसरा विस्तार टाइम का है। समय की भी, काल की भी कोई सीमा नहीं, पीछे अनंत है, आगे अनंत है, उसमें मैं कहां हूं? इस काल की अनंत धारा में मैं कहां हूं? इस काल की अनंत गंगा में मेरी बूंद कहां है? एक सपने से भी ज्यादा नहीं।
तो ये दो विस्तार--समय का और स्थान का; आकाश का और काल का। इन दोनों विस्तारों को उनकी पूरी गहराई में देखने से, मैं कुछ भी नहीं हूं, इसका अनुभव होना शुरू होता है। तो इन दोनों पर मेडिटेशन, इन दोनों पर ध्यान रोज-रोज गहरा करने की जरूरत है। उठते, बैठते, चलते, सोते, इस बात का पूरा खयाल रखना जरूरी है, इसकी रिमेंबरिंग, इसका स्मरण कि मैं कहां हूं? मेरे होने के दो ही बिंदु हैं जहां मैं होता हूं। टाइम और स्पेस जहां कटते हैं वहीं मैं हूं। और अगर ये दोनों अनंत हैं, तो मेरे होने का क्या? थोड़े से समय का क्या मूल्य है जब मैं जीता हूं? और थोड़े से स्थान का क्या मूल्य है जिसको मैं घेरता हूं? कल मौत आएगी; न तो मैं स्थान घेरूंगा फिर और न समय घेरूंगा, वे दोनों बातें समाप्त हो जाएंगी।
इन दोनों के ऊपर निरंतर ध्यान, इन दोनों का निरंतर स्मरण, इन दोनों की निरंतर प्रतीति, बहुत अदभुत, बहुत अदभुत गहराई में, शांति में, मौन में ले जाती है। लेकिन करें तो ही खयाल में आ सकता है, नहीं तो नहीं आ सकता है।
तो एक तो इन दो बातों पर ध्यान के लिए आपसे कहूंगा। इनको किसी भी क्षण भूलना उचित नहीं है। यह दोनों तरफ का अनंत विस्तार हमारे खयाल में बना रहना चाहिए। और अगर यह दो बातों का बोध स्पष्ट हो जाए, तो आप एक क्रांति अपने भीतर होती हुई पाएंगे। आपको पता भी नहीं चलेगा कि भीतर कोई व्यक्ति बदलने लगा और एक दूसरे व्यक्ति का जन्म शुरू हो गया। गहरे अर्थों में तो ये दो बोध, लेकिन इसके आस-पास और बहुत से बोध सहयोगी हो सकते हैं।
बुद्ध अपने भिक्षुओं को कहते थे कि जाकर कभी-कभी मरघट पर बैठा करो।
एक भिक्षु ने उनसे पूछा कि मरघट पर किसलिए?
तो बुद्ध कहते कि वहां जीवन अपनी पूर्णता को उपलब्ध होता है, तुम भी उसी तरफ रोज चले जा रहे हो, इसका शायद तुम्हें वहां खयाल आए। जब वहां चिता जलती हो, तो बैठ कर देखा करो। शायद किसी दिन तुम्हें दिखाई पड़ जाए कि चिता पर कोई और नहीं, तुम्हीं चढ़े हुए हो। देरी थोड़ी सी होगी, आज कोई और चढ़ा है, कल मैं चढूंगा, परसों कोई और चढ़ेगा। तो शायद किसी दिन चिता को देख कर तुम्हें खयाल आ जाए कि कोई और नहीं, तुम्हीं चढ़े हुए हो। तो भिक्षुओं को अनिवार्य रूप से वे कहते थे कि मृत्यु के संबंध में वे ध्यान करें।
दूसरी बात, जीवन के सतत परिवर्तन--कल मैं कुछ और था, आज मैं कुछ और हूं; परसों मैं बच्चा था, आज जवान हूं, कल बूढ़ा हो जाऊंगा; एक दिन मैं नहीं था और एक दिन मैं फिर नहीं हो जाऊंगा--यह जो फ्लक्स, यह जो धारा है निरंतर परिवर्तन की...
हेराक्लाइटस कहता था: एक ही नदी में दुबारा नहीं उतर सकते हैं। जब तक हम दुबारा उतरने जाते हैं, नदी बह गई; जब तक हम दुबारा उतरने जाते हैं, तब तक हम बदल गए। एक ही नदी में दुबारा नहीं उतर सकते हैं।
हेराक्लाइटस से कोई मिलने आता और जब जाने लगता, तो हेराक्लाइटस उससे कहता कि मेरे मित्र, खयाल रखना, तुम जो आए थे वही वापस नहीं लौट रहे हो! और तुम जिससे मिले थे आकर, अब उसी से विदा नहीं ले रहे हो। तुम भी बदल गए, मैं भी बदल गया।
चौबीस घंटे सब बदला जाता है। वहां कुछ भी थिर नहीं है, वहां कोई भी चीज...
एडिंग्टन ने एक बार मजाक में यह कहा कि भाषा के कुछ शब्द बिलकुल ही झूठे हैं। तो ऑक्सफर्ड में वह बोलता था, तो किसी ने पूछा कि जैसे? तो उसने कहा, रेस्ट! रेस्ट बिलकुल झूठा शब्द है। कोई चीज ठहरी हुई है ही नहीं। सारी चीज बदलती जा रही है। कोई चीज थिर नहीं है। कोई चीज ठहरी हुई नहीं है, कोई चीज खड़ी हुई नहीं है। जिसको आप खड़ा हुआ भी देख रहे हैं वह भी खड़ा हुआ नहीं है, उसके भीतर भी सब भागा जा रहा है। ये दीवालें मकानों की आपको खड़ी दिखाई पड़ रही हैं, ये दरख्त आपको ठहरे हुए मालूम पड़ रहे हैं। यह बिलकुल झूठी बात है। यह दरख्त ठहरा हुआ नहीं है। नहीं तो यह दरख्त कभी बूढ़ा नहीं हो पाएगा। यह भागा जा रहा है भीतर, यह बूढ़ा होता चला जा रहा है। यह दीवाल ठहरी हुई नहीं है, यह भीतर बदलती जा रही है। नहीं तो यह मकान कभी गिर नहीं पाएगा। सब बदल रहा है।
इस बदलाहट का पूरा बोध अगर आपको है तो आपको यह पता नहीं चलेगा कि मैं हूं। क्योंकि जहां सब बदल रहा है वहां मैं के खड़े होने के लिए जगह कहां है? जहां कोई चीज खड़ी नहीं है, जहां सब फ्लक्स है, जहां सब प्रवाह है, वहां मैं कहां हूं?
इसलिए बुद्ध ने तो एक बड़ी अदभुत बात कहनी शुरू की थी। उन्होंने कहा था: आत्मा है ही नहीं। क्योंकि आत्मा के लिए खड़े होने की जगह कहां है? लोग नहीं समझ पाए कि यह क्या बात उन्होंने कही। पर बुद्ध आत्मा और अहंकार का एक ही अर्थ करते थे। वे कहते थे कि इस बात का भाव कि मैं हूं, यही अहंकार है, यही आत्मा है।
अगर सब कुछ बदल रहा है, तो मैं खड़े होने के लिए कहां जगह पाऊंगा? मेरे थिर होने की कहां गुंजाइश है?
सांझ हम एक दीया जला देते हैं, सुबह हम कहते हैं कि वही दीया अब तक जल रहा है, उसे बुझा दें। झूठी हम बात कहते हैं। सांझ जो दीया जलाया था वह तो कभी का बुझ गया। लौ हर क्षण बदलती जाती है, दूसरी लौ आ जाती है, पहली लौ बुझ जाती है, तीसरी आ जाती है, चौथी आ जाती है। इतनी तीव्रता से ज्योति बुझती जा रही है, धुआं होती जा रही है, दूसरी ज्योति जलती आ रही है। सांझ जो ज्योति हमने जलाई थी, सुबह हम उसी को नहीं बुझाते हैं। रात भर ज्योति बदलती रही, बदलती रही, बदलती रही, रात भर ज्योति बदलती रही, वही ज्योति सुबह नहीं है।
जो आप पैदा हुए थे वही थोड़े ही आप मर जाते हैं, सब बदलता रहा, सब बदलता रहा, ज्योति की तरह जन्म से लेकर मृत्यु तक सब बदलता रहा। इस पूरी बदलाहट का बोध, तो आपको पता नहीं चलेगा कि मैं हूं।
तो ये चार बोध--एक तो समय का विस्तार, एक आकाश का विस्तार, क्षण-क्षण परिवर्तन और अंततः मृत्यु--इन चार पर जो मेडिटेट करता है, जो ध्यान करता है, वह उस परम अवस्था को उपलब्ध हो जाता है, जहां उसका पता चल जाता है जो काल से भी अनंत है और जो आकाश से भी विस्तीर्ण है, और जिसकी कोई मृत्यु नहीं, और जिसमें कोई परिवर्तन नहीं। लेकिन इन चार के बोध से उसका पता चलता है जो इन चारों से भिन्न और पृथक है।
इन चारों के बोध से उसका क्यों पता चलता है? असल में पता चलने के लिए, किसी भी चीज के ठीक-ठीक बोध के लिए विपरीत की पृष्ठभूमि चाहिए।
स्कूल में हम बच्चों के लिए काले तख्ते, ब्लैक बोर्ड बना देते हैं। सफेद दीवाल पर भी सफेद खड़िया से लिख सकते हैं, लेकिन तब बच्चों को कुछ दिखाई नहीं पड़ेगा। और अगर सफेद खड़िया से सफेद दीवाल पर कोई शिक्षक लिखता होगा तो हम कहेंगे पागल है! ब्लैक बोर्ड हम बना देते हैं और सफेद खड़िया से उस पर लिखते हैं, क्योंकि काले की पृष्ठभूमि में सफेद की रेखाएं उभर कर स्पष्ट हो आती हैं।
अगर हमें उसे खोजना हो जो अनंत है और असीम है, उसे खोजना हो जिसमें कोई परिवर्तन कभी नहीं होता, उसे खोजना हो जिसकी कभी मृत्यु नहीं होती, उसे खोजना हो जो शाश्वत है, उसे खोजना हो जो परमात्मा है, उसे खोजना हो जो सत्य है, तो हमें उसका बोध, उसकी पृष्ठभूमि खड़ी करनी होगी, जो कि निरंतर परिवर्तन में है, जो कि निरंतर मर रहा है। उसका बोध, उसके काले तख्ते पर, वह जो बिलकुल भिन्न है और विपरीत है, उसकी सफेद रेखाएं उभर आएंगी और दिखाई पड़ जाएंगी। जितनी अंधेरी रात होती है, तारे उतने ही चमकदार दिखाई पड़ते हैं। तारे तो दिन में भी रहते हैं, लेकिन वे दिखाई नहीं पड़ते। तारों को देखने के लिए रात की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, क्योंकि दिन की रोशनी में तारों के दिखाई पड़ने की कोई जगह नहीं रह जाती। लेकिन रात के अंधकार में वे चमक आते हैं, वे अलग दिखाई पड़ने लगते हैं।
तो ये चार स्मरण जितने प्रगाढ़ हो जाएंगे, उतना ही इन चारों से जो भिन्न है, जो नॉन-टेम्पोरल है, जो नॉन-स्पेसियल है, जो न समय के भीतर है और न स्थान के भीतर है, जो अनचेंजिंग है, अनमूविंग है, जो न बदलता है और न परिवर्तित होता है, जो अनडाइंग है, जिसकी कभी कोई मृत्यु नहीं होती, उसका अनुभव, उसकी प्रतीति, उसका साक्षात हो सकता है। उसके लिए यह तैयारी करनी अत्यंत आवश्यक है। और जिस दिन उसका अनुभव होता है उसी दिन जीवन वस्तुतः जीवन बनता है। उसी दिन जीवन आलोक से मंडित होता है। उसी दिन जीवन समस्त बंधनों से शून्य और रिक्त हो जाता है। उसी दिन हम उसे जान पाते हैं जिसको जान लेने के बाद फिर कुछ जानना और पाना शेष नहीं रह जाता है। वही है उपलब्धि। उसी की दिशा में, उसी सागर की खोज में हम सबके जीवन की नदियां बही जाती हैं। लेकिन जो इन नदियों को ही सब कुछ समझ लेता है वह फिर सागर तक पहुंचने से वंचित रह जाता है।
ये चार चीजों का बोध आपके भीतर नथिंगनेस को, नो-बीइंग को, नहीं हूं मैं कुछ, इस भाव को गहरा करेगा। और जिस दिन यह भाव पूर्ण हो जाएगा कि मैं कुछ नहीं हूं, उसी दिन एक विस्फोट हो जाएगा और उसका पता चलेगा जो मैं हूं, जो सब कुछ है। नथिंगनेस से ही टोटेलिटी का, शून्य से ही पूर्ण के अनुभव का द्वार खुलता है। शून्य में जो प्रतिष्ठित है वह धन्य है। शून्य में प्रतिष्ठा पाने की जो अभीप्सा और प्यास है, वही साधना है।
कल रात मैंने आपसे कहा कि हम, साधक हमारे जीवन के केंद्र पर हो। और साधक का अर्थ है: ना-कुछ होने का भाव।
कबीर कहते थे: मैं एक बांस की पोंगरी हूं। जो संगीत है, वह मुझसे बहता है, लेकिन मैं ही वह संगीत नहीं हूं। मैं संगीत को रोकने में बाधा तो बन सकता हूं, लेकिन संगीत को पैदा करने वाला मैं नहीं हूं। बांसुरी अगर गड़बड़ हो तो संगीत पैदा नहीं होगा, लेकिन बांसुरी संगीत की जन्मदात्री नहीं है।
जिस दिन हमें पता चलता है कि मैं ना-कुछ हूं, उस दिन हम बांस की एक पोंगरी रह जाते हैं। और फिर परमात्मा का संगीत उस बांस की पोंगरी से सहज प्रवाहित होता चला जाता है। फिर कोई बाधा नहीं रह जाती हमारी तरफ से, फिर हम पोली बांस की पोंगरी हो जाते हैं। वह पोलापन जो है, वह जो नथिंगनेस है वह पोलापन है। वह जो ना-कुछ हो जाना है, वह सारी चीज पोली हो गई, जगह दे दी गई। अब परमात्मा बह सकता है।
रवींद्रनाथ मरते थे, उसके दो दिन पहले किसी मित्र ने उनसे कहा कि आपने इतने गीत गाए, कि आप तो धन्यभागी हैं और आप तो आप्तकाम हैं, आप तो पा लिए उसे जो पाने जैसा था। रवींद्रनाथ ने कहा, मेरे मित्र, जो गीत मैंने गाए उनका कोई भी मूल्य नहीं है। लेकिन जिन गीतों को गाते वक्त मैं मौजूद ही नहीं था, बस उनका ही थोड़ा सा मूल्य है। और मैंने दो तरह के गीत गाए। एक जो मैंने गाए, उनका कोई मूल्य नहीं है। एक जिनको मैंने गाया ही नहीं--मैं केवल बांसुरी बन गया--किसी और ने गाया, और मुझसे वे बह गए और प्रवाहित हो गए, उनका मूल्य है। जिन गीतों के लिए लोगों ने मुझे धन्यवाद दिया है, वे मैंने गाए ही नहीं थे। जो मैंने गाए थे, उनमें तो भूल हो गई है। उनमें वह बात नहीं है, वह अमृत स्वर नहीं है।
साधक का अर्थ है: इतना खाली हो जाना कि वह समष्टि का माध्यम बन जाए, बांसुरी बन जाए, उससे सारा संगीत बह जाए।
साधक का अर्थ है: इतना शून्य, इतना पोला हो जाना कि परमात्मा उससे प्रवाहित हो सके। मार्ग बन जाए।
साधक का अर्थ है: मार्ग बन जाना, माध्यम बन जाना, केवल बीच का सेतु बन जाना, ताकि परमात्मा उससे प्रकट हो सके। वह जो समष्टि है, वह जो सबके भीतर छिपा हुआ प्राणों का संगीत है, वह उसके लिए एक बांसुरी बन जाए।
यह बांसुरी आप बन सकें, इसकी मैं परमात्मा से प्रार्थना करता हूं। और आपसे भी... क्योंकि जो मैंने चार बातें कहीं, वह जो चार स्मरण और ध्यान करने को कहा, अगर उन पर थोड़ा सा भी प्रयास किया, तो कोई भी कारण नहीं है कि हम क्यों न बन जाएं। क्योंकि हम वस्तुतः वही हैं जो हम बनना चाहते हैं। सिर्फ हमें स्मरण नहीं है, सिर्फ हमें खयाल नहीं है, सिर्फ हमें पता नहीं है।
हम उस बंद आंखें किए हुए आदमी की तरह हैं जो सूरज के सामने खड़ा है और आंखें बंद किए है और चिल्ला रहा है कि बहुत अंधकार है, मैं क्या करूं? दीया जलाऊं? लेकिन बंद आंख आदमी को दीया जलाने से भी क्या होगा! जो चिल्ला रहा है कि मैं क्या करूं? मैं क्या न करूं? मैं अंधकार में खड़ा हूं। उससे अगर कोई कहे कि तुम सिर्फ आंख खोल लो। तो उसे बड़ी हैरानी होगी कि इतना बड़ा अंधकार मेरे सिर्फ आंख खोलने से कैसे मिट जाएगा? आंख जैसी छोटी सी चीज, पलक जैसा छोटा सा परदा, इतने बड़े अंधकार को कैसे मिटा देगा जिससे मैं घिरा हूं? वह कहेगा, मुझे विश्वास आता नहीं आपकी बात पर कि आंख खोलने से इतना बड़ा अंधकार मिट जाएगा। आंख खोलने से अंधकार के मिटने का संबंध ही क्या है?
शायद हम समझाने भी बैठें तो उसके खयाल में भी न आए। क्योंकि बात उसकी ठीक है, लॉजिकल है। इतनी छोटी सी आंख, इतनी छोटी सी पलक, इससे इतने बड़े अंधकार का क्या संबंध है? और इतनी सी पलक खोलने से इतना बड़ा अंधकार मिट जाएगा क्या? लेकिन काश वह आंख खोल कर देखे तो वह पाएगा, निश्चित ही मिट जाता है। यह छोटी सी पलक का परदा बहुत बड़ा अंधकार पैदा कर देता है।
अहंकार का छोटा सा बोध सारे अंधकार को पैदा करता है। वह अहंकार का परदा हट जाए, वह आंख खुल जाए, तो रोशनी है, प्रकाश है। सूरज हमेशा मौजूद है, हम आंख बंद किए हुए खड़े हैं। इसके अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है।
परमात्मा करे हमारी यह आंख खुल सके।

मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उसके लिए बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं, मेरे प्रणाम स्वीकार करें।