कुल पेज दृश्य

रविवार, 23 अप्रैल 2017

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-05

ध्यान है अक्रिया—(पाँचवाँ-प्रवचन)

पांचवां प्रवचन
बंबई, दिनांक 10 मार्च, 1970


 मेरे प्रिय आत्मन,
कल मैंने कहा कि ध्यान अक्रिया है, तो एक मित्र ने पूछा है कि वे समझ नहीं सके कि ध्यान अक्रिया कैसे है? क्योंकि जो हम करेंगे, वह तो क्रिया ही होगी, अक्रिया कैसे होगी?
मनुष्य की भाषा के कारण बहुत भूल पैदा होती है। हम बहुत—सी अक्रियाओं को भी भाषा में क्रिया समझे हुए हैं। जैसे हम कहते हैं, 'फलां व्यक्ति ने जन्म लिया। ' सुनकर ऐसे लगता है, जैसे जन्म लेने में उसको भी कुछ करना पडा होगा। जन्मना एक क्रिया है। हम कहते हैं, 'फलां व्यक्ति मर गया', तो ऐसा लगता है कि मरने में उसे कुछ करना पडा होगा। हम कहते हैं कि 'कोई सो गया', तो ऐसा लगता है कि सोने में उसे कुछ करना पडा होगा। नींद क्रिया नहीं है, मृत्यु क्रिया नहीं है, जन्म क्रिया नहीं है, लेकिन भाषा में वे क्रियाएं बन  जाती हैं।

आप भी कहते हैं कि 'मैं कल रात सोया। ' लेकिन अगर कोई आप से पूछे कि 'कैसे सोये? सोने की क्रिया क्या है?' तो आप कठिनाई में पड जायेंगे। सोये आप बहुत बार हैं, लेकिन सोने की क्रिया न बता सकेंगे कि सोये कैसे। हो सकता है कि तुमने तकिये लगाये, बिस्तर लगाया, कमरे में अंधेरा किया, लेकिन इनमें से सोने की क्रिया कोई भी नहीं है। यह भी हो सकता है, तकिया भी हो, बिस्तर भी हो, अंधेरा भी हो और नींद न आये! तकिया, बिस्तर और अंधेरा नींद नहीं है। हां, इनकी उपस्थिति में नींद का आना सरल हो जाता है, लेकिन नींद का आना अलग ही बात है।
और आप कभी नींद नहीं ला सकते, नींद आती है। इसलिए नींद अक्रिया है। आप ला नहीं सकते। पकड नहीं सकते, कोशिश नहीं कर सकते। फिर भी नींद आ सके, इसके लिए तैयारी कर सकते हैं। प्रकाश में नींद आने में कठिनाई पड़ेगी, अंधेरे में आसानी होगी। नीचे काटे बिछे हों, तो नींद आने में कठिनाई पड़ेगी। ठीक बिस्तर हो, तो आसानी होगी, लेकिन फिर नींद आप नहीं लाते हैं, नींद आती है।
जब मैं कहता हूं ध्यान अक्रिया है, तब मेरा मतलब यही है कि आप जो भी कर रहे हैं, वह ध्यान की बाहरी व्यवस्था है। फिर उस व्यवस्था में ध्यान आयेगा, आप ला नहीं सकते हैं। आप सिर्फ ऊपरी इंतजाम कर रहे हैं। ऊपरी इंतजाम का क्या मतलब है, यह भी समझ लेना चाहिए। इसलिए दुनिया में ध्यान की कोई विधि, कोई मैथड नहीं है। न नींद की कोई विधि है, न मैथड है। रिचुअल है, क्रियाकाण्ड है नींद का।
एक छोटा बच्चा है, वह अगूंठा डालकर मुंह में, सो जाता है। अगूंठा बाहर खींचो और उसको नींद आना मुश्किल हो जाये। उसने एक इंतजाम कर रखा है, एसोसिएशन बना रखा है कि जब भी उसका अगूंठा मुंह में गया कि उसका मन नींद के लिए तैयार हो जाता है। अगूठे का मुंह में जाना सिगनल का काम करता है उसके लिए कि अब नींद आ जायेगी और कुछ भी नहीं है। तकिया और बिस्तर भी सब सिगनल का काम करते हैं, और कुछ भी नहीं। इसलिए नये मकान में, नये घर में, नये तकिये पर, नये बिस्तर पर नींद मुश्किल हो जाती है। थोड़ा —सा भेद हो गया है। छोटे कमरे में सोने का आदी बड़े  कमरे में सोने में थोड़ी अड़चन पाता है। मन कहता है, यह वह जगह नहीं जहां रोज नींद आती है! थोड़ी बाधा डालता है।
तो ऊपरी इंतजाम का मतलब है कि मन बाधा न डाले, ऐसी व्यवस्था कर लेंगे। अब जैसे, यहां जो भी हम करेंगे, वह ध्यान नहीं है वस्तुत:। ध्यान तो आयेगा। हम सिर्फ इतना ही करेंगे कि हमारी तरफ से ध्यान में जो बाधाएं उपस्थित होती हैं, वह हम अलग कर देंगे और प्रतीक्षा करेंगे। सुबह सूरज निकला है। आप दरवाजा बंद करके बैठे हैं। सूरज भीतर नहीं आ रहा है। आप मुझसे पूछते हैं, 'हम सूरज को भीतर लाने के लिए क्या करें? टोकरियों में सूरज की रोशनी भर लायें? गठरियों में बांध लें? मजदूर लगायें? क्या करें? सूरज की रोशनी को भीतर लाना है। ' मैं आपसे कहता हूं : आप न ला सकेंगे। सूरज की रोशनी भीतर आ सकती है। लायी नहीं जा सकती, इसको क्रिया नहीं बना सकते। आप कृपा करके इतना ही करें कि सूरज की रोशनी में जो बाधा पड रही है दरवाजा बंद होने की, उतना दरवाजा भर खोल दें। वह क्रिया है, दरवाजा खोलना क्रिया है, फिर सूरज आयेगा। वह क्रिया नहीं है। हालांकि आप लोगों से कह सकते हैं, आज मैं दरवाजा खोलकर सूरज को भीतर ले आया, लेकिन आप गलत कह रहे हैं। आपने सिर्फ दरवाजा खोला। आने का काम सूरज ने किया, आपने नहीं किया। लेकिन दरवाजा न खोलते, तो सूरज को रोकने का काम आप करते।
इसका मतलब यह हुआ कि ध्यान को हम रोक सकते हैं, ला नहीं सकते। और हम सब मिलकर ध्यान को रोक रहे हैं। तो जब मैं कहता हूं कि यह व्यवस्था कर लें, तो उसका मतलब है कि ध्यान को रोकने का जो आपका इंतजाम है, कृपा करके उसको हटा दें— ध्यान आ जायेगा; दरवाजा खोल दें—सूरज आ जायेगा। और इसीलिए जिस दिन ध्यान आयेगा, उस दिन आप जाकर किसी से कह न सकेंगे कि मुझे ध्यान मिल गया। उस दिन आप कहेंगे, प्रभु की कृपा। जिसको मिलेगा, वह यह नहीं कह सकेगा कि मैंने पा लिया। वह कहेगा,  'उसका प्रसाद!' वह कहेगा, 'उसकी ग्रेस!'
और अगर परमात्मा को नहीं मानता तो वह कहेगा, मुझे कुछ पता नहीं कि कहां से आ गया! अनजान, अज्ञात से आगमन हुआ—मेरा कोई हाथ नहीं था। जिसको मिलेगा, यह न कह सकेगा कि मैंने पा लिया, क्योंकि उसे साफ दिखायी पड़ेगा कि मैंने तो पाने की बहुत कोशिश की, मैं न पा सका। इसलिए जिन्होंने पाया है, वे इतना ही कहेंगे कि हम बाधा न बने—बस।
जिस दिन बुद्ध को शान मिला, किसी ने पूछा कि ' आपने कैसे पाया?' तो बुद्ध ने कहा, 'जब तक पाने की कोशिश की, तब तक तो नहीं पाया। जिस दिन बाधाएं छोड़ दीं; अपनी तरफ से जो हमने इंतजाम किये थे, दीवाल—परकोटे उठाये थे, वे गिरा दिये, उस दिन पा लिया। वह मिला ही हुआ था, वह द्वार पर ही खड़ा था, लेकिन द्वार बंद थे। ' तो आप द्वार बंद कर सकते हैं, खोल सकते हैं, लेकिन प्रकाश को ला नहीं सकते। प्रकाश आयेगा।
तो जब मैंने कहा, ध्यान अक्रिया है, तो मेरा मतलब है, आपकी क्रिया नहीं है। लेकिन इससे आप यह मत समझ लेना कि आपको कुछ भी नहीं करना है। दरवाजा तो खोलना ही है, बिस्तर तो लगाना ही है, तकिया तो लगाना ही है, अंधेरा तो करना ही है। नींद आयेगी, लेकिन उसकी पूर्व—भूमिका भी बना लेनी जरूरी है। कभी—कभी बिना पूर्व—भूमिका के भी आती है। अगर बहुत थक गये हों, बहुत देर सोना न मिला हो, तो पत्थर पर भी आती है, रोशनी भरी दोपहरी में भी आती है। तकिये की भी जरूरत नहीं पड़ती, रात की भी आवश्यकता नहीं होती, शांति की भी जरूरत नहीं होती, बाजार में भी आ सकती है, सड़क के रास्ते पर भी आ सकती है। कभी आती है, लेकिन उतना थका होना जरूरी है। उतना कोई थका हुआ नहीं है।
परमात्मा की, सत्य की इतनी प्यास हो जाये, इतने थक गये हों, इतने दौड़े हों, इतना चाहा हो, इतना खोजा हो, तो ध्यान बिना किसी इंतजाम के भी आता है। इसलिए जब किन्हीं को बिना इंतजाम के आ जाता है, तो वे दूसरों से कहते हैं कि इंतजाम की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन इतने इंतजाम की जरूरत है, फिर भी यह इंतजाम ध्यान का नहीं है। यह फर्क समझ लेना है। यह सिर्फ पूर्व—भूमिका है, जिसमें आ सके, इसके लिए हम द्वार खोल देते हैं। इस पूर्व—भूमिका के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण जो सूत्र है, वह मैं आपको कह दूं र फिर कोई कहने से ही समझ में नहीं आ सकता; प्रयोग करने से ही समझ में आ सकता है।
पहली बात, जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है ध्यान में प्रवेश के लिए, वह श्वास है। श्वास द्वार है। जीवन की समस्त महत्वपूर्ण चीजों का द्वार श्वास है। श्वास के ही मार्ग से जन्म आता है, श्वास के ही मार्ग से मृत्यु आती है, श्वास के ही मार्ग से ध्यान आता है, श्वास के ही मार्ग से परमात्मा आता है। श्वास जो है, वह मार्ग है। श्वास से ही संबंधित होकर जीवन प्रगट होता है और श्वास से ही विच्छिन्न होकर जीवन अप्रगट होता है।
ये पौधे भी श्वास ले रहे हैं और यह सागर भी श्वास ले रहा है, और ये पक्षी भी श्वास ले रहे हैं। सारा जीवन श्वास का खेल है। ऐसा समझ सकते हैं कि श्वास की अनंत लहरों का नाम जीवन है। जहा—जहा से श्वास विदा हो जाती है, वहा—वहा जीवन क्षीण हो जाता है। श्वास के ही पथ से परमात्मा भी आयेगा। श्वास के पथ से सब कुछ आया है और गया है इसलिए श्वास ध्यान के लिए बड़ी महत्वपूर्ण बात है।
लेकिन श्वास दो तरह से ली जा सकती है। एक, अनजाने, बेहोशी में, मूर्छित, जैसा हम ले रहे हैं। श्वास चल रही है चौबीस घंटे, लेकिन हमने कभी खयाल नहीं दिया श्वास पर। जो जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्रिया है, वह बिलकुल ही अनजान, चुपचाप चल रही है। हमने कभी उस पर ध्यान नहीं दिया है। श्वास पर हम कभी जागे नहीं। यदि हम श्वास के प्रति जाग सकें, तो तत्काल श्वास के साथ ध्यान के आगमन का द्वार खुल जाता है। कुछ और करने की जरूरत नहीं।
अगर कोई व्यक्ति चौबीस घंटे में जब भी उसे खयाल आ जाये, श्वास के प्रति होश से भर जाये, माइंड़फुल हो जाये कि यह श्वास जा रही है, यह श्वास आ रही है, यह श्वास जा रही है, तो तत्काल एक दूसरा मार्ग भीतर खुलना शुरू हो जाता है। श्वास की अवेयरनेस, श्वास को होशपूर्वक देखने से तत्काल चेतना में नये दरवाजे खुलने शुरू हो जाते हैं। श्वास मूर्छित और श्वास अमूर्छित—अगर श्वास मूर्छित ले रहे हैं आप, तो आप ध्यान के रास्ते पर प्रवेश न कर सकेंगे। होशपूर्वक ले रहे हैं, जानकर ले रहे हैं, खयाल है कि यह श्वास जा रही है, आ रही है, तो आपके भीतर दो चीजें होंगी, एक श्वास और एक आप। ये दो अलग हो गये तत्काल। अभी श्वास और आप एक हैं। अभी आइडेंटिटी है। अभी ऐसा लगता है कि मैं श्वास हूं। अगर कोई आपकी नाक दबा दे, तो आप चिल्लाकर कहोगे कि 'मुझे मारो मत! मार डालोगे क्या? छोड़ो मुझे!' कोई गर्दन दबाये, श्वास रोके, तो आप कहेंगे, 'मरा!' अभी मैं और श्वास एक हैं।
अज्ञानी और ज्ञानी में एक ही फर्क है, जिसकी 'मैं' और ' श्वास' एक है, वह अज्ञानी है। और जिसकी 'मैं' और 'श्वास' भिन्न हो गये, वह शानी है। जिसे यह साफ दिखायी पड गया कि मैं अलग और श्वास अलग, उसके बाद उसकी मृत्यु नहीं हो सकती। जब तक उसने समझा कि मैं श्वास हूं तब तक मृत्यु होगी, क्योंकि कल श्वास टूटेगी। जिस दिन उसने जाना कि मैं श्वास के पीछे हूं अलग हूं भिन्न हूं उस दिन के बाद मृत्यु असंभव हो गयी। श्वास टूटेगी, फिर भी वह जानेगा, 'मैं हूं। श्वास बंद हो जायेगी, फिर भी वह जानेगा कि 'मैं हूं'
इसलिए श्वास पर पहला सूत्र है कि हम श्वास को देखते हुए कैसे ले सकें, होश से कैसे ले सकें। श्वास को कैसे देख सकें, जान सकें, पहचान सकें। और हमारे भीतर जो क्रिया हो रही है, वह श्वास की ही क्रिया हो रही है। हमारा पूरा शरीर श्वास की क्रिया को करने के लिए इंतजाम है, सिचुएशन है। यह सारा इंतजाम—यह खून का दौडना, यह हड्डियों का होना, इस हृदय की धडकन—यह सारा का सारा यंत्र एक काम के लिए है। इसके केंद्र पर श्वास है। श्वास लेने के लिए सारी की सारी व्यवस्था है। यह पूरा शरीर श्वास लेने का यंत्र है। तो जैसे ही हम श्वास से अलग हुए, हम शरीर से भी अलग हो गये। तत्काल पता चलेगा कि मैं शरीर नहीं हूं। और जिसे यह अनुभव होने लगा कि 'मैं शरीर नहीं हूं, उसे अनुभव होने लगेगा कि 'मैं कौन हूं'
एक मित्र ने पूछा है कि क्या श्वास गहरी और तीव्र दोनों एक साथ होनी चाहिए?
दोनों एक साथ हों, तो ज्यादा परिणाम होगा। गहरी भी हो और तीव्रता से भी हो, गहरी भी हो और तेजी से भी हो।
चाहता मैं यह हूं कि श्वास पर ही सारी शक्ति लग जाए, ताकि मन को करने को और कोई काम शेष न रह जाए। थोड़ा भी मन बाकी न रह जाये, सारा श्वास पर लग जाए। जो थोड़ा —बहुत बाकी रह ही जाता है, इसीलिए बाद में 'मैं कौन हूं', इस पर उसे भी लगा देना है।
दो—तीन मित्रों ने पूछा है कि जब 'मैं कौन हूं तीव्रता से पूछते हैं, तो श्वास की तीव्रता पहले जैसी नहीं रह जाती।
नहीं रह जाएगी, क्योंकि शक्ति फिर 'मैं कौन हूं' के पूछने में चली जाती है। इसकी चिंता न करें। शक्ति पूरी लग जाये—चाहे वह श्वास पर लग जाये, चाहे 'मैं कौन हूं पर लग जाये—ऐसा हो जाये कि आपके भीतर करने के लिए और कोई शक्ति पीछे शेष नहीं रह गई। रिमेनिग कुछ भी न रह जाये, पूरी आपकी तरफ से लग जाए और परिणाम आ जाएगा।
दो तीन मित्रों ने पूछा है : कुण्डलिनी क्या है?
वह तो बडी बात है। अगली बार संभव हुआ तो दो—चार दिन उस पर ही बात करनी पड़ेगी। बहुत संक्षिप्त में इतना समझें कि मनुष्य के शरीर के भीतर अदभुत शक्तियों का निवास है, लेकिन सोयी हुई हैं बहुत—सी शक्तियां—कुण्डलिनी उस शक्ति को कह रहे हैं, जो मनुष्य के पहले केंद्र से उठकर अंतिम केंद्र की तरफ यात्रा करती है। वह आपकी रीड से होकर गुजरेगी, मस्तिष्क के ऊपर तक जाएगी। जैसे कोई विद्युत की धारा भीतर बहती हो और ऊपर उठती हो या जैसे कोई सांप सोया हो और फन उठाता हो, बहुत तरह का अनुभव हो सकता है। जब वैसा अनुभव हो रहा हो, तब भयभीत होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि जहां भयभीत हो गए, वहीं अनुभव रुक जाएगा। जब वैसा अनुभव हो रहा हो, तब अत्यंत प्रफुल्लता से, अत्यंत रिसेप्टिविटी से, निमंत्रण से, इनवाइटिगली उस अनुभव को स्वीकार कर लें, ताकि वह पूरा हो सके।
बहुत से मित्रों ने पूछा है कि पूरे शरीर में विद्युत की धाराएं दौड़ती हुई मालूम पड़ती हैं?
मालूम पड़ेगी। उन विद्युत की बहती हुई धाराओं को पूरी तरह से स्वीकार कर लें और जब वे तेजी से दौड़े, तो रोकने की कोशिश मत करें। वे विद्युत की धाराएं शरीर को सब तरफ से शुद्ध कर जायेंगी, मन को शुद्ध कर जायेंगी। लेकिन अगर उनको रोका, तो नुकसान हो सकता है। इसलिए निरंतर मैं कहता हूं कि जरा भी रोकें न, सब छोड़ दें। एक ओपनिंग रह जायें आप। जो भी हो रहा है—होने दें।
बहुत से मित्रों के मुंह से जोर से चिल्लाहट निकल गई। निकल जायेगी और भी ज्यादा। कुछ तो रोक लेते हैं। तो किन्हीं ने पूछा है कि वह रोकें या न रोकें?
निरंतर मैं कह रहा हूं कुछ भी न रोकें।
पूछा है क्यों आवाज मुंह से निकल जाती है? रोना निकल जाता है, क्यों हंसना आ जाता है इतनी तीव्रता से, ऐसा लगता है कि कहीं हम अपने होश से बाहर तो नहीं हैं?
हमने अपने मन के साथ बहुत दुर्व्यवहार किए हैं। कभी रोना चाहा है जोर से, तो उसे भी रोक लिया है, वह अटका रह गया है। कभी हंसना चाहा है जोर से, उसे भी रोक लिया है वह भी अटका रह गया है। कभी चिल्लाना चाहा है, वह भी नहीं चिल्ला पाये हैं, वह भी अटका रह गया है। सभ्यता ने आदमी को अधूरा कर दिया है सब तरफ से। न पूरा हंसता, न पूरा रोता, न पूरा जीता; न पूरा प्रेम करता; न पूरा क्रोध करता, न मित्रता करता है पूरी, न लड़ सकता है पूरी तरह। सब तरफ अधूरा— अधूरा है। वह सब अटका रह गया है।
ध्यान की गहराई तभी उपलब्ध होगी, जब वह सब अटका हुआ बिखरकर बह जाए। उसे रोकोगे तो ध्यान की गहराई में जाना असंभव है। इसलिए रोको मत। चिल्लाने की स्थिति हो गई है भीतर और फूट रहा है पूरा प्राण चिल्लाने को, तो चिल्ला लेने दें। थोड़ी देर में वे आवाजें निकल जायेंगी और भीतर आप हल्के हो जाएंगे। वर्षों का माल निकल सकता है। लेकिन उसे रोकेंगे, तो वहीं अटक जायेंगे।
और यहां हम इसकी चिंता ही न करें कि कौन क्या सोचेगा! यह 'कौन क्या सोचेगा', यही हमारी मृत्यु बन गई है। चौबीस घंटे हम ऐसे डरे हुए जी रहे हैं कि कौन क्या सोचेगा। जीना हमें है, सोचना दूसरों को है! उनके सोचने की विधि से हम जी ही नहीं पाते। अकेले हैं आप, किसी के सोचने का कोई मूल्य नहीं है। जीना है आपको, होना है आपको। तो बिलकुल छोड़ दें।
कुछ मित्रों ने पूछा है कि ऐसा लगता है कि किसी पशु की आवाज है, हमारी आवाज नहीं है!
कल एक मित्र करीब—करीब ऐसी हालत में थे जैसे कि कोई दहाड़ने के पहले सिंह हों। लेकिन उन्होंने बहुत सम्हाल लिया अपने को। वे दहाड़ लेते तो बहुत शुभ होता। क्या कारण है कि पशु की आवाज हमारे भीतर है? इसके कारण तो लंबे हैं, लेकिन एक संक्षिप्त बात आपसे कह दूं। हम सब किसी न किसी पशु योनियों से यात्रा करके मनुष्य तक आ सके हैं। अगर आपके भीतर किसी पशु की आवाज बहुत जोर से  निकलने लगे, तो वह बहुत सिम्बालिक है। वह इस बात की खबर है कि आप किस योनि से यात्रा करके मनुष्य तक आ रहे हैं। वह आपकी पिछली योनि की खबर देती है। उसे निकल जाने दें, उसकी कोई चिंता न लें। 
किसी के शरीर में इतने जोर से शक्ति का आविर्भाव होगा कि नाचने लगे, खड़ा हो जाये, चिल्लाने लगे। दूसरे की चिंता नहीं करनी है, आप अगर आंख खोलकर भी देख लें, तो आप भटक जाते हैं। आप गए। आपका काम बंद हो गया। किसको क्या हो रहा है, वह उसे होने दें। आपको जो हो रहा है, वह आप होने दें। रोकें न। अगर खड़े होने की शरीर की स्थिति हो, तो खड़े हो जायें, क्योंकि खड़े होने की स्थिति का मतलब ही यह है कि भीतर कोई धारा उठना चाहती है, जो बैठे में नहीं पूरी तरह उठ पायेगी, इसलिए शरीर खड़ा हो रहा है।  
किसी के हाथ मुद्रा बना रहे हैं, किसी का सिर घूम रहा है, कोई चक्कर खा रहा है, कोई गिर पड़ा है, कोई मछली की तरह तड़प रहा है, किसी का एक पैर ही कैप रहा है, किसी का एक हाथ ही ऊंचा—नीचा उठ रहा है, वह जो भी हो रहा है, आप छोड़ दें। शक्ति भीतर काम कर रही है, उसे काम करने दें। वह शक्ति आपको पहले से अदभुत नई स्थितियों में छोड़ जाएगी। कोई बीस—पच्चीस मित्र उस जगह आ गए हैं, जहा एक नया अनुभव भी हो सकता है। उसकी मैं आज बात कर लूं? संभव है वह आज हो सके।
जब आप पूरी तीव्रता में, टोटल इनटेंसिटी में, जब आप समग्रता से समर्पण करते हैं, जब आप पूरी तरह से अपने को छोड़ते हैं और जब आपके भीतर जो भी होता है आप होने देते हैं, रोकने वाले नहीं बनते, जब यह ठीक चरम स्थिति में पहुंचे, तो आपके भीतर कोई बड़ी शक्ति ऊपर से उतर गई हो, जैसे कोई नदी किसी सागर में गिरे, जैसे कोई विद्युत की धारा ऊपर से आपके ऊपर आ जाए और आप में प्रवेश कर जाए—वैसा अनुभव भी शुरू होगा। जब वैसा अनुभव होगा, तब आप बिलकुल ही मुश्किल में पड़ जायेंगे, क्योंकि उतनी बड़ी शक्ति का आवर्तन, उतरना, अवतरण कभी भी आपके खयाल में नहीं है। जब वह आयेगी, तब आप बिलकुल ही यंत्रवत घूमने लगेंगे। गिरेंगे, लौटेंगे, चिल्ला सकते हैं, नाच सकते हैं, कुछ भी हो सकता है। कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। अपनी तरफ से आप चरम स्थिति में पहुंच जायें तो बड़ी शक्ति ऊपर से संबंधित हो सकती है। लेकिन अपनी तरफ से जब तक आप पूरे न पहुंच जायें, तब तक यह नहीं होगा। वह काटैक्ट, वह संपर्क आपकी चरम स्थिति में ही हो पाएगा। इसलिए आज हम फिर कोशिश करें पूरी ताकत से। इन चार दिनों में काफी गति हुई है।
और ध्यान रहे, एक भी आदमी दर्शक की भांति न बैठा रहे, क्योंकि वह पूरे एटमॉसफियर को नुकसान पहुंचा सकता है। वह आदमी जिस जगह बैठा है, उस जगह सब तरफ जो विद्युत की धारायें फैलने लगती हैं, उन्हें उस आदमी की वजह से निरंतर बाधा पड़ती है : वह नान—कंडक्टर की तरह बीच में बैठ जाता है। किसी को देखना भी हो, तो वह बीच से एकदम हट जाए। वह कहीं भी किनारे, दूर दीवालों पर बैठ जाए; बीच में यहां न बैठा हो। और देखने का कोई मूल्य भी नहीं है। देखने से कुछ होने वाला भी नहीं है।
आज मैं आशा करता हूं हम पूरी शक्ति लगायेंगे। हमने कोशिश की है लेकिन फिर भी बहुत शक्ति बाकी रह जाती है। कल मैंने कहा था, मैं ध्यान के पहले कुछ लोगों को जाकर स्पर्श करूंगा, वे ही दोपहर मिलने आ सकेंगे। लेकिन उसमें कम से कम घंटा भर लग जाएगा। इसलिए वह संभव नहीं है और मैं जिस वजह से स्पर्श करना चाहता था, वह आपको भी कह देता हूं आप खुद ही खयाल कर लेंगे।
मैं उन लोगों को स्पर्श करना चाहता था, जिनके भीतर बहुत तीव्रता से शक्ति जग रही है, लेकिन जो कहीं छोटी—मोटी बाधा डाल रहे हैं। तो जिनको भी ऐसा लगता हो कि कुछ हो रहा है, लेकिन मैं बाधा डाल रहा हूं र वे लोग दोपहर मिलने को आ जायें। और फिर जो मुझे करना था आपको स्पर्श करके, वह नारगोल के शिविर में संभव हो सकेगा, क्योंकि चार दिन हम साथ होंगे, ज्यादा समय होगा। और जिन मित्रों को भी खयाल हो और गहरे जाने का, वे नारगोल जरूर ही आ जायें। इस बार बहुत पूर्व लक्षण है कि वहा बहुत कुछ हो सकेगा।
अब हम ध्यान के लिए बैठें। तो पहले तो देख लें कि कोई किसी को स्पर्श न करे और एक दूसरे से दूर हो जायें। जिनको लेटना है या जिन्हें पता है कि बीच में वे गिर जायेंगे, वे पहले से लेट जायें, ताकि उनके लिए जगह बन जाये। चुपचाप।
एक संकल्प लेकर बैठें कि आज अपनी पूरी शक्ति लगा देंगे। दूसरी प्रार्थना लेकर बैठें कि अपनी पूरी शक्ति लग जाये, तो परमात्मा की शक्ति भी उतर सके।
शरीर को ढीला छोड़ दें, आंख बंद कर लें। बीच में भी लेटने का मन हो, तत्काल लेट जायें। इसकी बिलकुल फिक्र मत करें कि किसी के पैर पर भी सिर पड़ जायेगा। पड़ जाये तो चिंता नहीं है। गिरते हों, गिर जायें, रोकें भर नहीं। और आज पूरी ताकत लगानी है।
आंख बंद कर लें, श्वास गहरी लेना शुरू करें। श्वास लें, जितनी गहरी ले सकते हों। जितनी गहरी छोड़े, उतनी ही गहरी लें। गहरी श्वास लेना शुरू कर दें। गहरी श्वास लें, गहरी श्वास छोड़े—गहरी श्वास लें, गहरी श्वास छोड़े। पूरी शक्ति से गहरी श्वास लेना शुरू करें। श्वास ही लेना है, पूरी शक्ति लगा दें। गहरी श्वास भीतर जाये, गहरी श्वास बाहर जाये। गहरी श्वास भीतर जाये, गहरी श्वास बाहर जाये। श्वास भीतर—श्वास बाहर। गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास....।
और श्वास को भीतर देखते रहें। श्वास भीतर गयी, श्वास बाहर गयी, इसके साक्षी बने रहें। इसके द्रष्टा बने रहें। श्वास भीतर जा रही, हम देख रहे हैं। श्वास बाहर जा रही, हम देख रहे हैं। देखते रहें और गहरी श्वास लेते रहें। दो काम। दस मिनट के लिए पूरी शक्ति से करें। गहरी श्वास लें—गहरी श्वास लें। पूरा शरीर कैप जाये। फिक्र न करें, और गहरी श्वास लें।
सारे शरीर में विद्युत की तरंगें दौड़ने लगेंगी। गहरी श्वास लें और गहरी श्वास छोड़े। गहरी श्वास लें, गहरी श्वास छोड़े और देखने वाले बने रहें भीतर—यह श्वास भीतर गयी—यह श्वास बाहर गयी। देखते रहें—देखते रहें—देखते रहें। गहरी श्वास—देखते रहें...।
दस मिनट के लिए मैं चुप हो जाता हूं। आप गहरी श्वास लें और देखते रहें। और पूरी शक्ति लगा दें। दाव पर सब लगा दें। गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास। गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास। यह पूरा वातावरण, सिर्फ श्वास लेने लगे, छोड़ने लगे। गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—और देखते रहें : श्वास भीतर गयी, श्वास बाहर गयी। गहरी श्वास...। यह पूरा वातावरण बस श्वास लेने और छोड़ने लगे। गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—शक्ति पूरी लगा दें, शरीर बिलकुल थक जाये—शक्ति पूरी लगा दें। गहरी श्वास—गहरी श्वास— गहरी श्वास—और मन बिलकुल शांत होने लगेगा। गहरी श्वास—देखते रहें—देखते रहें—मन शांत होता चला जाये।
गहरी श्वास लें—गहरी श्वास लें—गहरी श्वास लें। बस श्वास लेने का एक यंत्र रह जाये सारा शरीर और भीतर देखते रहें। यह श्वास भीतर गयी, यह श्वास बाहर गयी। श्वास भीतर गयी। श्वास बाहर गयी। 
शक्ति पूरी लगा दें—शुरू से ही पूरी लगा दें, ताकि अंत तक पहुंचते—पहुंचते वह चरम बिंदु आ जाये, जिसे चाहता हूं कि आये। छोड़े—पूरी ताकत लगायें। गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास। देखते रहें—गहरी श्वास—गहरी श्वास।
अपने को थका डालें और दूसरे की चिंता न करें। यह बीच में कोई भी आंख खोल—खोलकर न देखे। अपनी फिक्र करें। गहरी श्वास—पूरी शक्ति लगा दें, पूरी शक्ति लगा दें। गहरी श्वास—गहरी श्वास— गहरी श्वास—गहरी श्वास। गहरी श्वास—गहरी श्वास—और गहरी— और गहरी— और गहरी।
पूरी शक्ति दाव पर लगा दें। और गहरी— और गहरी श्वास— और गहरी श्वास।... देखते रहें, बस श्वास लेने की एक धौंकनी हो जायें। श्वास, श्वास, श्वास ही रह जाये, और सब मिट जाये। श्वास ही रह जाये, और सब मिट जाये।
गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास। पूरी शक्ति लगायें—पूरी शक्ति लगायें। गहरी श्वास—और गहरी—और गहरी— और गहरी। दाव पर सब लगा दें। और गहरी—और गहरी—पीछे कुछ बाकी न बचे। और गहरी— और गहरी— और गहरी— और गहरी...।
और गहरी— दूसरे सूत्र में प्रवेश के पहले पूरी शक्ति लगायें। एक दो मिनट के लिए अब पूरी शक्ति लगायें, ताकि दूसरे सूत्र में प्रवेश हो सके। पूरी शक्ति पर ही दूसरे में प्रवेश करना है। और गहरी— और गहरी—देखते रहें : गहरी श्वास भीतर गयी— श्वास बाहर गयी। श्वास भीतर गयी—श्वास बाहर गयी। लगायें पूरी शक्ति। और गहरा—और गहरा—और गहरा—और गहरा—और गहरा। और गहरा—और गहरा—और गहरा। और लगायें, और गहरी ताकत लगायें—एक मिनट के लिए पूरी शक्ति लगायें। दूसरे में प्रवेश के पहले पूरी शक्ति लगायें। गहरी श्वास गहरी श्वास गहरी श्वास गहरी श्वास गहरी सूत्र———— श्वास...।
मैं दूसरे की सूचना दूर तैयारी करें—और गहरी श्वास—और गहरी श्वास—और गहरी श्वास—और गहरी श्वास—और गहरी श्वास—और गहरी श्वास—और गहरी श्वास—और गहरी श्वास, और गहरी श्वास— और गहरी श्वास— और गहरी श्वास—और गहरी श्वास— और गहरी। श्वास ही रह जाये—सिर्फ श्वास ही रह जाये—श्वास ही रह जाये—श्वास ही रह जाये—सिर्फ श्वास ही रह गयी, देखने वाले रह गये हैं—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास।
अब दूसरे सूत्र में प्रवेश कर जायें—गहरी श्वास लेते रहें, गहरी श्वास लेते रहें और शरीर को बिलकुल छोड़ दें। शरीर को छोड़ दें। शरीर को बिलकुल छोड़ दें। शरीर को जो हो—हो। शरीर घूमे, चक्कर खाये, गिरे, चिल्लाये, रोये, चिंता छोड़ दें। शरीर को ढीला छोड़ दें। गहरी श्वास लें और शरीर को छोड़ दें। गहरी श्वास लें और शरीर को छोड़ दें। शरीर को जो होना है, होने दें। शरीर को बिलकुल छोड़ दें, ताकि साफ दिखायी पड़े कि शरीर अलग है। शरीर अलग यंत्र की भांति घूमने लगे, गिरने लगे, वह शरीर को जैसा चलाये, कोआपरेट करें। हाथ हिलते हों, पैर हिलते हों, सिर घूमता हो, शरीर गिरता हो, आवाज निकलती हो, चिल्लाहट आती हो, रोना आता हो, मुद्रा बदलती हो। छोड़ दें बिलकुल।
दूसरा सूत्र है :
शरीर को छोड़ दें। श्वास गहरी जारी रहे, शरीर को छोड़ दें। शरीर इतना थक जाये, जितना थक सके—छोड़ दें बिलकुल और दस मिनट के लिए शरीर में होने दें जो होता है। श्वास गहरी जारी रखें, श्वास गहरी रहे, श्वास गहरी रहे। शरीर को छोड़ दें—बिलकुल छोड़ दें—जरा भी रोकें न। संकोच न करें—छोड़ दें शरीर को, जैसा होना है, होने दें।
शरीर के भीतर शक्ति जो करती है, उसे करने दें। जो भी होता है, होने दें। न मालूम कितनी बीमारियां समाप्त हो जायेंगी। शरीर को बिलकुल छोड़ दें। न मालूम कितने दबे वेग सदा के लिए निकल जायेंगे। शरीर को बिलकुल छोड़ दें। शरीर को बिलकुल छोड़ दें—जो भी होता है होने दें। श्वास गहरी जारी रहे—और भीतर श्वास को देखते रहें—और शरीर को छोड़ दें। जो भी होता है, जो भी होता है—होने दें। शरीर को ढीला छोड़ दें। 
शरीर घूमता है—घूमने दें। हाथ पैर कंपते हैं, हिलते हैं—हिलने दें। सारा शरीर एक यंत्र की भांति चक्कर खाता है, खाने दें; गिरता है गिरने दें। खड़ा हो जाये शरीर, खड़ा हो जाने दें। आवाज निकले, निकल जाने दें। चिल्लाहट निकले, निकल जाने दें। रोना निकले, निकल जाने दें।.... छोड़ दें.... छोड़ दें।
बढ़ाते जायें श्वास, बढ़ाते जायें—शरीर को छोड़ते जायें—बढ़ाते जायें। श्वास को गहरा लेते जायें और शरीर को छोड़े। छोड़ दें, शरीर को बिलकुल छोड़ दें। श्वास गहरी—श्वास गहरी—श्वास गहरी। रोकें न जरा भी। कुछ भी न रोकें। जो होता है, होने दें। श्वास गहरी, श्वास गहरी, श्वास गहरी। श्वास गहरी—श्वास गहरी—श्वास गहरी—श्वास गहरी। और बिलकुल छोड़ दें।
पांच मिनट बचते हैं। पांच मिनट में पूरे शरीर को जो होना है, होने दें—छोड़ दें। शरीर जो होता है होने दें, ताकि साफ दिखायी पड़े कि शरीर अलग—मैं अलग। शरीर को छोड़ दें। रोता है, रोये। हंसता है, हैंसे। चिल्लाता है, चिल्लाये। नाचता है, नाचे। जो होता है होने दें। छोड़ दें, बिलकुल छोड़ दें। भीतर कोई पकड़, कोई रेसिस्टेंस न रहे। जरा भी रोकें नहीं। गहरी श्वास जारी रहे—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास।
छोड़ दें... छोड़ दें। शरीर को करने दें, आप न रोकें, संकोच न करें, नियंत्रण न करें। आप श्वास गहरी जारी रखें और शरीर को छोड़ दें। शक्ति भीतर जो करे, होने दें। छोड़ दें। शक्ति जो करवाये होने दें। चेहरे की मुद्रा बदले, बदलने दें। आवाज निकले, निकलने दें। कोई पशु भीतर से चिल्लाने लगे, चिल्लाने दें। जो भी होता है, होने दें। गहरी श्वास—गहरी श्वास। पूरी शक्ति लगा दें—पूरी शक्ति लगा दें। गहरी श्वास—गहरी श्वास। थका ही डालना है सारे यंत्र को। कंजूसी न करें। बिलकुल ही थका डालें—छोड़ दें।
तो गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास लें। पूरी ताकत लगायें। दो ही मिनट हैं तीसरे सूत्र में जाने के लिए, पूरी ताकत लगायें। गहरी श्वास लें और शरीर को बिलकुल छोड़ दें। गहरी श्वास लें, शरीर को बिलकुल छोड़ दें। जो होता है, होने दें। गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—छोड़ दें शरीर को बिलकुल।
आखिरी मिनट है।
तीसरे सूत्र के पहले शरीर को जो करना है करने दें। रोना है, चिल्लाना है, गिरना है, हिलना है, डुलना है.. छोड़ दें। पूरी ताकत से छोड़े—गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास.. शरीर को छोड़ दें। छोड़ दें—रोकें नहीं, छोड़ दें—छोड़ दें। पूरा वातावरण—एक साथ रोने—चिल्लाने लगे। छोड़ दें, सब छोड़ दें। आखिरी मिनट है, तीसरे सूत्र में जाने के पहले पूरी शक्ति लगायें। गहरी श्वास—गहरी श्वास—और गहरी—और गहरी—और गहरी—और गहरी और शरीर को छोड़े आखिरी बार। बिलकुल छोड़ दें। जो भी होता है, होने दें।
पूरी ताकत लगायें, पूरी ताकत लगायें, पूरी ताकत लगायें—तीसरे सूत्र में जाने के पहले पूरी ताकत लगायें—पूरी ताकत लगायें। और तीव्रता—और तीव्रता—और तीव्रता—और तीव्रता। पूरी ताकत लगा दें। पूरी ताकत—पूरी ताकत। जरा भी रोकें न। पीछे कुछ बचे भी न—बिलकुल छोड़ दें। पीछे कहने को न रहे कि मैंने कुछ रोक लिया। छोड़ें—छोड़ दें। एक मिनट के लिए बिलकुल छोड़ दें। जो होता है, होने दें। जो होता है, होने दें। छोड़े—छोड़े—छोड़े—तीसरे सूत्र में जाने के लिए छोड़े—बिलकुल छोड़ दें। गहरी श्वास, गहरी श्वास, गहरी श्वास। गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास। और गहरी—और गहरी—और गहरी—और गहरी...।
और तीसरे सूत्र में प्रवेश करें। श्वास गहरी रहेगी, शरीर को जो करना है, करता रहेगा। आप भीतर ताकत से पूछना शुरू करें—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं। भीतर अपने मन में जोर से  पूछें—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं। शरीर को हिलने दें, श्वास को गहरा चलने दें—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं...। पूरे प्राण पूछने लगें—मैं कौन हूं—मैं कौन—हूं—मैं कौन हूं। शरीर का रोआ—रोआ पूछने लगे—हृदय की धड़कन—धड़कन पूछने लगे—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं। पूरी ताकत भीतर लगायें—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—दस मिनट के लिए पूरी शक्ति लगा दें। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं।
पूरी शक्ति लगायें भीतर—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—एक तूफान उठ जाये। दस मिनट के बाद फिर विश्राम करेंगे। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—सारे प्राण कैप जायें—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं...। दो 'मैं कौन हूं के बीच जगह न बचे—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं पूरी शक्ति लगा दें। अपने को तूफान में डाल दें, तभी हम ध्यान में जा सकेंगे। जो जितनी तीव्रता से पूछेगा, उतने ही गहरे ध्यान में जा सकेगा। जो जितनी तीव्रता से पूछेगा उतने ही गहरे ध्यान में जा सकेगा। चौथा सूत्र ध्यान का होगा। अपनी ताकत पूरी लगायें कि मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं...।
पूरी शक्ति लगायें। आखिरी विश्राम से पहले शक्ति पूरी लगा दें, ताकि विश्राम गहरा हो सके। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं। शरीर घूमता रहे, शरीर को घूमने दें। शरीर में शक्ति को पूरा घूमने दें। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं। पूरी शक्ति से घूमने दें—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं। पांच मिनट बचे हैं, पूरी शक्ति लगायें—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं।
इस पांच मिनट के लिए पूरी शक्ति लगा दें—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं...। गहरी श्वास... थका डालें अपने को। गहरी श्वास—गहरी श्वास, शरीर को जो होता है, होने दें। शरीर को पूरा छोड दें। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं। गहरी श्वास—गहरी श्वास—गहरी श्वास—शक्ति पूरी लगायें, ताकि ऊपर की शक्ति से संबंध हो सके। जैसे ही संबंध होगा, शरीर एकदम नाचने लगे, तो फिक्र न करें। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं।
शक्ति पूरी लगायें। सिर्फ तीन मिनट बचे हैं, पूरी शक्ति लगा दें। पूरी शक्ति लगा दें। गहरी श्वास, गहरी श्वास। और गहरी—और गहरी—और भीतर पूछें तूफान की तरह—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं।
चौथे सूत्र में जाने के पहले शक्ति पूरी लगा दें कि मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—पूरी ताकत लगायें। अपनी शक्ति को पूरा लगा दें। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—शक्ति पूरी लगायें और ऊपर से शक्ति आती मालूम पड़े, तो जो भी शरीर को हो, होने दें। नाचने लगें, फिक्र न करें। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं।
एक दो मिनट और बचते हैं, पूरी शक्ति लगायें फिर विश्राम करना है। विश्राम उतना ही गहरा होगा, जितनी शक्ति हम लगायेंगे। अपने को पागल कर दें, पूरी ताकत लगा दें। अपने को पागल कर दें, पूरी ताकत लगा दें। और इस बीच ऊपर से किसी को भी शक्ति आती मालूम पड़े, तो अपने को छोड़ दें। जो भी हो, हो।  मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—बिलकुल पागल हो जायें। छोड़ दें अपने को। मैं कौन हूं मैं कौन हूं मैं कौन हूं मैं कौन हूं। चौथे सूत्र में प्रवेश का क्षण करीब आता है। जोर लगायें—मैं कौन हूं—छोड़ दें—और शक्ति ऊपर से उतरे, तो फिक्र न करें। ऐसा लगे और नाच आ जाये, तो नाचे; घबडायें न। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—पूरी ताकत लगायें—गहरी श्वास—अवसर को  चूके न। पूरी ताकत लगायें।
 एक ही मिनट की बात है—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं... तूफान पूरा उठा दें... मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं। बड़े —तीव्रता से बड़े —मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं। थका दें—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं...।
किसी का भी शरीर खड़ा होना चाहे, रोकें नहीं, छोड़ दें—छोड़ दें। शरीर खड़ा होता हो, हो जाने दें। छोड़ दें—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—रोकें नहीं। किसी का भी शरीर खड़ा होता हो, हो जाने दें। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—शरीर खड़ा होता है—रोकें मत—छोड़ दें,





खड़े हो जायें। नाचता है, नाच लें। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—छोड़ दें। जिनका भी शरीर खड़ा हो रहा है, उठ जाने दें—छोड़ दें—खड़े हो जायें। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—एक सेकेंड और। छोड़ दें बिलकुल। शरीर खड़ा होता है, हो जाने दें—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं। छोड़ दें। जिनके शरीर भी खड़े होना चाहते हैं, छोड़ दें। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—रोकें नहीं, छोड़ दें... मैं कौन हूं—मैं कौन हूं। पूरी ताकत लगा दें। मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं—मैं कौन हूं।
अब सब छोड़ दें—सब छोड़ दें। श्वास की गहराई भी छोड़ दें, पूछना भी छोड़ दें। चौथे सूत्र में प्रवेश कर जायें।
मैं कौन हूं यह भी छोड़ दें। जहां जो जैसा है, वैसा ही रह जाये। बैठना हो, बैठ जायें, लेटना हो, लेट जायें। सब छोड़ दें। अब दस मिनट के लिए परम विश्राम में चले जायें। द्वार खुला है, प्रभु को आना हो आ जाये। अब दस मिनट कुछ भी न करें। रह जायें। बस मात्र रह जायें। पक्षी बोलेंगे, सुनते रहें। सागर की लहरें चिल्लायेंगी, सुनते रहें। रास्ते पर आवाज होगी, सुनते रहें। बस, पड़े रह जायें प्रतीक्षा में—जस्ट अवेटिंग। द्वार खोल दिया—मेहमान आना हो आ जाये। द्वार खोल दें। द्वार पर प्रतीक्षा में बैठ जायें। कुछ करना नहीं है, दस मिनट बस पड़े रह जाना है।
इस दस मिनट में ही ध्यान की झलक आयेगी। दस मिनट में ही उसका पता चल सकता है, जो है। अब मैं चुप हो जाता हूं। दस मिनट रह गये हैं, कुछ करना नहीं है।
(दस मिनट का परम विश्राम )
अब धीरे—धीरे आंख खोल लें। जिनकी आंख न खुले, वे दोनों हाथ आंख पर रख लें। फिर आहिस्ता से आंख खोलें। जो लेट गये हैं, गिर गये हैं, वे धीरे—धीरे उठ आयें। उठते न बने तो पहले दो चार गहरी श्वास लें, फिर उठें। फिर भी उठते न बने, तो लेटे रहें और गहरी श्वास लेते रहें। लेकिन उठने में कोई जल्दी न करें। आहिस्ता उठें। जो खड़े हैं, वे धीरे— धीरे आंख खोलें। थोड़ी गहरी श्वास लें। फिर आहिस्ता से बैठें। एकदम से न बैठें। धीरे—धीरे आंख खोलें। गहरी श्वास लें, फिर आहिस्ता से बैठ जायें।
इस प्रयोग को रोज रात्रि में करते रहें। प्रयोग करें और सो जायें, ताकि रात्रि की पूरी नींद में प्रयोग का परिणाम गूंजता रहे।
इन पांच दिनों में बहुत सा काम हुआ। कुछ मित्र बहुत ही निकट पहुंचे। कुछ का उस विराट शक्ति से  संपर्क भी हुआ। कुछ कदम दो कदम, सीडी दो सीडी पहले रुक गये। लेकिन सभी की गति हुई है। और मैं चाहूंगा कि नारगोल आ जायें, ताकि उन चार दिनों में सच में ही सबकी छलांग लग जाये। नारगोल बहुत कुछ होने की संभावना है, इसलिए अवसर को मत चूके। और जो भी, किसी भी भांति आ सके, आ ही जाये।
हमारी आज की बैठक पूरी हुई। जो लोग दोपहर, जिन्हें लगता हो कि कहीं शक्ति का उठाव रुक गया या ऊपर से किसी शक्ति का प्रवेश हुआ, लेकिन कहीं रुक गया—जिन्हें कहीं भी कोई कठिनाई, अड़चन मालूम पड़ती हो, वे दोपहर तीन से चार मिलने आ जायें। लेकिन बौद्धिक जिज्ञासाओं को लेकर नहीं, जिनकी

व्यक्तिगत साधना से ही कोई सवाल उठा हो, केवल वे ही दोपहर आयें।
हमारी सुबह की बैठक पूरी हुई।