कुल पेज दृश्य

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

अनंत की पुकार—(अहमदाबाद)-प्रवचन-12

अनंत की पुकार(अहमदाबाद)
ओशो

प्रवचन-बारहवां-(काम के नये आयाम)

आप लोग सारी बात कर लें तो थोड़ा मेरे खयाल में आ जाए, तो मैं थोड़ी बात कर लूं।

एक विचार यह है कि जो आर्थिक तकलीफ हमें होती है यहां पर, आप बाहर में जहां-जहां प्रवचन करके आए हैं, वहां सब मित्रों को निवेदन हम करें कि वे सब थोड़ा-थोड़ा, जितना हो सके, सहयोग करें बंबई के केंद्र को।

अभी जो बहनजी ने बताया उसके ऊपर मैं एक सजेशन देना चाहूंगा कि जितने भी हमारे मित्र हैं या हमारे जो शुभेच्छु हैं, मेंबरशिप टाइप में एक फिक्स्ड एमाउंट रख दिया जाए कि एनुअली इतना देना पड़ेगा सबको। मेरे खयाल से यह बहुत कुछ हमको मदद दे सकेगा हमारी आर्थिक व्यवस्था को सुधारने में। अगर ग्यारह रुपये एनुअली भी रख दें हम तो कोई बड़ी चीज नहीं है देने की दृष्टि से। तो जो भी हमारे मेंबर्स हैं, हमारे शुभेच्छु हैं, जो समझते हैं कि कुछ अच्छे मार्ग में हम जा रहे हैं, कुछ अच्छे ध्येय के लिए कुछ कर रहे हैं, उनके लिए एनुअली कुछ बांध देना चाहिए कि वह कलेक्शन होता रहे और उससे मेन्टेनेन्स होता रहे।


एक बात ऐसी है कि अब तक अपना आर्गनाइजेशन जो चल रहा है, जो ट्रस्ट बना है और जो ट्रस्टी हैं, वे ट्रस्टी नॉमिनेट कर रहे हैं मैनेजिंग कमेटी को। और वह मैनेजिंग कमेटी काम कर रही है। लेकिन अभी तक इसमें कोई कांस्टिटयूशन जैसा कुछ है नहीं। यानी कमेटी के जो भी कार्यकर्ता हैं, इनको किसको-किसको क्या-क्या करना है और वे कैसे अपना काम बांटें अंदर आपस में, वह कुछ तय नहीं किया गया है। तो मैं ऐसा सोच रहा हूं कि मैनेजिंग कमेटी का अभी तक का जो भी भंडार हो, वह भंडार एक कमेटी बना कर उसको सौंप दें और जो आजीवन सदस्य हैं अपने, उन आजीवन सदस्य को साथ में लेकर, और भी जो सहयोगी हैं उनको साथ में लेकर एक कांस्टिटयूशन बनाएं और उसके मुताबिक कुछ काम आगे बढ़े। इलेक्शन का कुछ तत्व आना चाहिए इसमें, सिर्फ नॉमिनेशन से यह न चले। और थोड़े-बहुत जो आजीवन सदस्य हैं वे इलेक्ट करें कमेटी को और जिसको भी काम करना है वह आ जाए।

हमको हफ्ते में एक बार आपको मिलने का वक्त मिलना चाहिए। ऐसी कुछ व्यवस्था हो तो बहुत अच्छा होगा।

तीन-चार बातें हैं। एक तो यह बिलकुल ठीक है कि मुझसे जो लोग मिलने आना चाहें उनकी कुछ व्यवस्था करनी चाहिए। इसमें दो तरह से हो सकता है। एक तो सरलतम यह है कि सप्ताह में एक दिन तय कर दें, उस दिन मैं दो घंटे बाहर ही बैठ जाऊंगा, जिनको भी आना हो वे आ जाएं। कोई परमीशन का सवाल ही न रहे। एक दिन तय कर लें, उस दिन जिसको भी आकर मिल जाना है, मिल जाए; बैठना है मेरे पास, बैठ जाए। उसके लिए कोई स्वीकृति किसी से लेने की जरूरत न हो।
दूसरा, आपको एक लिस्ट बना लेनी चाहिए। जिन लोगों से आप किसी तरह का भी काम या सहयोग लेते हैं, एक लिस्ट आपको यहां लक्ष्मी के पास छोड़ देनी चाहिए। उसमें आपको प्रिफरेंस माक्र्स लगा देने चाहिए कि इन व्यक्तियों को तो हर हालत में कभी भी कोई भी स्थिति हो, इनका अगर फोन आता है, तो इन्हें मिलवाना ही है। तो नंबर एक, दो, तीन, आपको ऐसी व्यवस्था कर लेनी चाहिए, ताकि उसको सुविधा हो जाए।
अन्यथा कठिनाई क्या होती है कि अगर दिन में बीस अपाइंटमेंट दे दिए हैं और किसी का फोन आया और समय नहीं है अब मिलने का, तो उसको तो दुख होने वाला है। उसे इन बीस से कोई मतलब नहीं है; यहां समय से कोई मतलब नहीं है; मैं बीमार हूं, इससे कोई मतलब नहीं है; किसी बात से मतलब नहीं है। और उसकी कठिनाई भी ठीक है कि अगर उसने छह महीने में एक दफे मिलने के लिए मांगा है, तो उसकी कठिनाई भी ठीक है कि छह महीने में वह एक दफे मांगे और उसको मिलने को न मिले।
तो एक तो आप यहां एक सूची बना रखें।
और कठिनाई इसलिए खड़ी होती है कि हमारे मन में, अगर जरा सा कोई कुछ काम करता है, तो उसका प्रतिकार लेने की तत्काल तैयारी होती है। अगर किसी के मकान में ध्यान की क्लास चल रही हो, तो इसका बदला भी मिलना चाहिए। यह ध्यान की क्लास कोई आनंद से नहीं चल रही है।
अभी तक आपकी जो कठिनाई है और जिससे आप वर्कर्स खड़े नहीं कर पाते हैं वह केवल एक है। और वह कठिनाई, मेरे साथ अगर आप चलेंगे, तो एक लिहाज से बनी रहेगी। क्योंकि मैं निरंतर समझाता रहता हूं आपको कि अहंकार छोड़ें। वह छूटता तो है नहीं। तो मेरी बात सुन कर आपको लगता है, अहंकार का कोई हिसाब नहीं रखना है। लेकिन आपको अहंकार का हिसाब रखना पड़े, तो आपको ये कठिनाइयां न आएं जो आती हैं। मेरी बात सुन कर आपको जम जाती है कि अहंकार का कोई हिसाब नहीं रखना है, लेकिन जिससे आप हजार रुपया लाते हैं, उसका आपको हजार रुपये का अहंकार पूरा करना चाहिए। नहीं आप करेंगे तो वह परेशानी खड़ी करेगा। यह मिलने-जुलने का उतना सवाल नहीं है बड़ा। वह दूसरे ढंग से करेगा। उसको बैठने के लिए जगह आगे चाहिए। वह मिलने आए तो उसे पहले मिलने का मौका मिलना चाहिए। वह जब चाहे उसको उस वक्त मिलने का मौका मिलना चाहिए।
अगर आप मेरी बात सुन कर हिसाब चलाएंगे तो आपको यह तकलीफ बढ़ती जाएगी। तो आप तो लोगों को देख कर व्यवस्था करें। मेरी बात देख कर व्यवस्था मत करें। आप तो लोगों को देख लें कि जिनसे आपने कुछ लिया है, जिनसे कोई सहायता मांगी है, जिनका कोई आप उपयोग कर रहे हैं, आपको उनके अहंकार को तृप्त करने का इंतजाम करना चाहिए।
मैं किसी के अहंकार को तृप्त करने में सीधा सहयोगी नहीं हो सकता हूं। क्योंकि जिस बीमारी से लड़ने के लिए मैं सारी ताकत लगाऊं, उसको मैं सहयोगी बनूं, यह संभव नहीं है। तो वह आपकी बात है। वह आपको व्यवस्था कर लेनी चाहिए। किन-किन को कष्ट होता है, उनके लिए इंतजाम कर दें। जो-जो आपके लिए सहायता पहुंचाते हैं, उनकी फिकर कर लें। प्रिफरेंस लिस्ट बना लें। वह सारा आप कर लें, वह आपकी बात है। इसमें मुझसे कभी भी भूल कर बात नहीं करनी चाहिए इस संबंध में।
नहीं तो हमारी आकांक्षा यह होती है, हमारी आकांक्षा यह होती है, हमारा रस यह होता है। सब जगह जहां साधु-संतों का कुछ काम चलता है, वह सबका इंतजाम होता है पूरा का पूरा, तो तृप्ति मिलती है। अगर यहां आप आए हैं और यहां बीस लोग बैठे हैं और आपने कोई सहायता की है, तो मुझे कहना चाहिए कि देसाई जी, आप आगे आकर बैठो। वह मैं कभी कहता नहीं। और आप भी नहीं कहते हैं, तो मुसीबत की बात है। मैं कभी कहूंगा नहीं, बल्कि देसाई जी आगे आते होंगे तो उनको रोकूंगा कि आप पीछे ही बैठो, पीछे आए हो तो पीछे ही बैठना चाहिए। पर आपको थोड़ी फिकर करनी चाहिए।
नहीं तो आपको कठिनाई रोज आएगी। क्योंकि जब आप किसी से काम लेने जाते हैं, तब आप इस भूल में मत पड़िए कि वह आपके काम को पसंद करके पैसे दे रहा है या आपकी कोई सहायता कर रहा है या कोई भी तरह की सुविधा जुटा रहा है। ऐसा भी नहीं है कि वह आपके काम को प्रेम नहीं करता, लेकिन वह नंबर दो है सदा, नंबर एक उसका अपना अहंकार है। आपने उसके अहंकार को नंबर दो पर रखा तो आप झंझटें खड़ी कर लेंगे। फिर वह पच्चीस बहाने खोजेगा। तो जो इसकी मूल जड़ में है वह इतना है कि आपको सारी की सारी फिकर करनी चाहिए, अगर आपको लोगों से सहायता लेते जाना है।
मैं नहीं कहता कि आप लेते जाएं। यह भी नहीं कहता मैं कि यह काम चलाना आपके लिए जरूरी है। यह भी नहीं कहता। लेकिन आपको अगर चलाना है, तो आपको, लोगों के मन को थोड़ी तृप्ति मिले, ऐसी फिकर कर लेनी चाहिए।
आपकी मीटिंग हो तो उनको स्पेशल पास भिजवा दें। आपकी बैठक हो तो उनको स्पेशल निमंत्रण भिजवा दें। आपकी नई किताब छपे तो उनको स्पेशल कापी भिजवा दें। वे यहां मिलने आएं तो उनको विशेष सुविधा दें मिलने की। और भी कुछ हो वह आप उनके लिए विशेष कर दें। तो आपकी इस संबंध की जो शिकायतें हैं वे टूट जाएंगी। और कुछ ऐसा नहीं है कि बहुत लोग ऐसी शिकायतें करते हैं, ऐसा भी कुछ नहीं है। लेकिन अगर चार आदमी शिकायत करना शुरू कर दें तो वे बहुत जल्दी चालीस मालूम पड़ने लगते हैं। क्योंकि वे एक को कहते हैं, दूसरे को कहते हैं, तीसरे को कहते हैं, वे कहते चले जाते हैं।
यहां तो जो भी आता है, मुझे पूछ कर ही उसको टाइम देते हैं। अगर मुझे पूछ कर टाइम देना है तो भी आपको दिक्कत आएगी। क्योंकि मैं जानता हूं यह आदमी फिजूल है, भला उसने आपको दस हजार रुपये दिए हों, और वह आधा घंटा मेरा खराब करेगा, तो मैं तो मना कर दूंगा। आप मुझे पूछें ही मत। आप यह सब इंतजाम बाहर ही कर लें। जिसको मिलाना हो, मिला दें; जिसको न मिलाना हो, न मिलाएं। इसमें मेरी सलाह मत मांगें। क्योंकि मेरी सलाह...
अभी मुझसे ही पूछ कर हो रहा है इसलिए आपको तकलीफ हो रही है। इसमें न तो लक्ष्मी का कसूर है और न किसी और का कसूर है। लक्ष्मी मुझसे पूछ कर जाती है कि यह आदमी वक्त मांगता है इतना, इसको देना है कि नहीं? तो मैं कहता हूं, इतना वक्त नहीं देना है। पांच मिनट कहो कि मिल जाए। वह पांच मिनट में उसको तृप्ति नहीं होती। और पांच मिनट के लायक भी उसके पास कोई बात नहीं है। न उसे कुछ पूछना है, न उसे कुछ करना है।
तो अभी मुझसे पूछ कर हो रहा है इसलिए तकलीफ हो रही है। मुझसे पूछना बिलकुल बंद कर दें। वह आप जिम्मा ले लें। लक्ष्मी पूछे आपसे, मुझसे न पूछे, तो आपको बिलकुल तकलीफ नहीं होगी। तब आप व्यवस्थित कर लेंगे: किसको मिलने देना, किसको नहीं मिलने देना। और ऐसा है, जिसने आपके लिए कुछ नहीं किया है वह शिकायत नहीं करता फिरता। इसलिए वह आदमी नहीं मिल पाएगा तो कोई हर्जा, आपको तकलीफ नहीं होगी। चाहे उसको जरूरी रहा हो मिलना। लेकिन अगर वह नहीं मिल पाएगा तो कोई तकलीफ आपके काम में नहीं पड़ेगी। लेकिन एक गैर-जरूरी आदमी, अगर उसने आपके लिए कुछ किया है, वह नहीं मिल पाएगा तो आपको तकलीफ पड़ेगी।
मुझसे पूछ कर चलाइएगा तो तकलीफ जारी रहेगी। इसे बिलकुल ही आपको मैनेजमेंट पूरा अपनी तरफ से कर लेना चाहिए। तो जरा तकलीफ उसमें नहीं होगी। कहीं तकलीफ नहीं होगी। क्योंकि जो लोग परेशान कर सकते हैं, वे लोग, उनको तो मौका मिल जाता है। जो बेचारे कुछ नहीं कर सकते उनका कोई सवाल ही नहीं है। वे शिकायत भी करने नहीं आते हैं। वे शिकायत करने की हैसियत में भी नहीं होते हैं। और आप उनकी शिकायत का कोई मूल्य भी नहीं मानेंगे। आपको भी शिकायत का मूल्य नहीं है। वह शिकायत के पीछे जो आदमी खड़ा है उसका मूल्य है कि उसने यह किया था, अब हम उसके पास दुबारा कैसे जाएंगे! उसने दस हजार रुपए दिए हैं, अब हम दुबारा कैसे उसके पास जाएं! या जब दुबारा आप मांगने जाएंगे, तब वह सब शिकायतें रख देगा। लेकिन जिसने एक रुपया नहीं दिया, जिस पर एक रुपया देने को नहीं है, न वह शिकायत रखने वाला है, न उसकी शिकायत का कोई मूल्य है। न वह आपके पास आने वाला है, न आप उसके पास जाने वाले हैं। अड़चन केवल इतनी है।
तो इसको आप व्यवस्थित कर लें। इसको मुझ पर छोड़ें ही मत। इसको मुझ पर छोड़ने में कठिनाई होगी। क्योंकि मैं देखता हूं, एक आदमी दस दफे मिल गया है, उससे मैं कह रहा हूं कि वह ध्यान करे, वह वह करने को राजी नहीं है, वह ग्यारहवीं दफे फिर हाजिर है फोन करके कि मैं मिलने आना चाहता हूं। तो मैं तो उसको मना करूंगा। यह हिसाब मैं नहीं रख सकता हूं कि उसने आपके लिए क्या इंतजाम किया, क्या नहीं किया है।
यह कठिन जरा भी नहीं है, लेकिन इसकी व्यवस्था आप मेरे साथ कुछ भी जोड़ कर रखेंगे, उसमें आपको अड़चन आएगी। और दो-चार लोग सारी बात को चलाते रहते हैं।
अगर मुझ पर छोड़ना है तो फिर आपको इतनी हिम्मत जुटानी चाहिए कि उनको कह देना चाहिए कि मुझसे पूछा जा रहा है। और अगर कोई भी जिम्मेवार है तो मैं जिम्मेवार हूं। तो उनको आपको कह देना चाहिए कि आप क्या करते हैं, इस वजह से आपको नहीं मिलाते। मिलना न मिलना मेरे ऊपर निर्भर है। मुझे लगता है कि मिलना इस वक्त जरूरी है तो मैं इसी वक्त मिल लूंगा। मुझे लगता है कि गैर-जरूरी है, फॉर्मल है...अधिक तो फॉर्मल है मिलने वालों का काम, जरूरी बिलकुल नहीं है, लेकिन उनको मिलना चाहिए। अगर उनको बिलकुल छूट दे दें, न रोकें, तो शिकायत नहीं आती, लेकिन वे मेरा पूरा समय खराब करेंगे, वह आपके लिए ज्यादा नुकसान की बात है।
जबलपुर में वैसा ही रखा हुआ था कि कोई रुकावट नहीं रखी थी। तो मैं सुबह से रात तक मिलता ही रहता था। जो आदमी आकर बैठ गया वह तीन घंटे भी बैठा हुआ है, तो भी मैं बैठा हुआ हूं कि ठीक है। फिर लोगों की आदतें बन गईं। मतलब वह रोज उनको नियमित आना चाहिए। तो बंध गए लोग कि वह ठीक पांच बजे जो आने वाला है वह पांच बजे रोज आकर बैठेगा ही। उनको रोकने, उनको भी कष्ट होता है, जो रोज मिलते हैं उनको भी रोकने में कष्ट होगा।
तो तकलीफ यह है कि मुझ पर मत छोड़ें जरा भी, आप अपनी व्यवस्था कर लें। और आप अपनी प्रिफरेंस लिस्ट बना लें और जिन-जिन को मिलवाना है, उनको मिलवाएं; जिनको नहीं मिलवाना है, उनको मत मिलवाएं; सबको मिलवाना है, सबको मिलवा दें।

फिर आपका कैसे खयाल किया जाए?

उसकी फिकर छोड़ दें, वह उतना बड़ा सवाल नहीं है। वह बड़ा सवाल नहीं है। आपको अड़चन, परेशानी नहीं होनी चाहिए।
दिन में एक-डेढ़ घंटा सबके मिलने का रख दें...

नहीं, मेरी आप बात नहीं समझ रहे, मेरी बात नहीं समझ रहे। आपको अंदाज नहीं है, उस डेढ़ घंटे में आप रोज उन्हीं लोगों को यहां बैठे हुए पाएंगे। मेरा डेढ़ घंटा जरूर खराब करेंगे आप, लेकिन वही लोग रोज यहां डेढ़ घंटे बैठे रहेंगे।

यह बात तो बिलकुल ठीक है, ऐसा ही होता है, मैंने देखा भी है।

वही लोग रोज डेढ़ घंटे बैठे रहेंगे। मुझे अड़चन नहीं है उसमें भी, वह डेढ़ घंटा निकाल सकते हैं। उसका कोई उपयोग नहीं है। और आप यह सोच रहे हों कि जो शिकायतें कर रहे हैं वे उसमें आएंगे, तो आप गलती में हैं। वे जितने शिकायत करने वाले हैं वे स्पेशल और प्राइवेट और अकेले में समय चाहते हैं। इसमें तो बेचारे वे आ जाएंगे जिन्होंने आपसे कभी शिकायत नहीं की, इस डेढ़ घंटे में, यह भी मैं आपको बता दूं। यह मेरे अनुभव से कह रहा हूं। इस डेढ़ घंटे में वे लोग आएंगे जिन्होंने कभी शिकायत नहीं की है। जो वहां मीटिंग में सुन लेते थे वे यहां आकर बैठ जाएंगे। और जिन्होंने शिकायत की है उनको स्पेशल अलग वक्त चाहिए। वह जारी रहेगा। क्योंकि शिकायत का कारण मिलने का मामला नहीं है, वे तो मीटिंग में भी मुझे सुन लेते हैं, कैंप में भी सुन लेते हैं। वह उनको पृथकता मिलनी चाहिए, वह उसकी है। तो डेढ़ घंटे में वह तो नहीं होगा।
अभी मैं देखता हूं न, कैंप में दोपहर मिलने का वक्त देते हैं, फिर भी मैं दिन भर मिलता हूं लोगों से उसके बावजूद भी। क्योंकि वे जो खास जिनको आप आदमी कहते हैं, वे कहते हैं, वह डेढ़ घंटा तो सब लोगों के लिए है, हमारे लिए अलग से दस मिनट तो रखिए। उस सब लोगों की भीड़ में वे नहीं आना चाहते हैं। तो वे सब लोग कौन हैं? बड़ा मजा है! वह डेढ़ घंटा मेरा अलग ही खराब होता है। और जिनको चाहिए था वक्त, जो शिकायत करने वाले हैं, उनको सुबह चाहिए। रात ग्यारह बजे तक मैं रोज बात कर रहा हूं कैंप में, वह आपको खयाल में नहीं है। कि मीटिंग से उठ कर मैं गया, तो साढ़े दस बजे वहां पहुंचता हूं, तो फिर वहां तैयार हैं लोग। सुबह की मीटिंग के बाद गया, लोग वहां तैयार हैं। सुबह आठ बजे से जो शुरू होता है वह रात ग्यारह बजे तक कंटिन्युअस चल रहा है। क्योंकि आपकी तीन मीटिंग चल ही रही हैं, मिलने का वक्त चल ही रहा है, और फिर जिनको स्पेशल चाहिए उनका चल ही रहा है।
अब उसमें कठिनाइयां ऐसी हैं कि जिनके लिए आप वक्त निकालते हैं वे उसमें नहीं आने वाले हैं। और मेरा जरूर वक्त लगवा देंगे आप। उससे कुछ हल नहीं होगा। वह मैं करके देख लिया हूं, उससे कुछ हल नहीं होता। वह तकलीफ तो जो है वह आप नहीं पकड़ते हैं। तकलीफ मिलने-विलने की तकलीफ नहीं है। तकलीफ उनके थोड़े अहंकार को तृप्ति मिलनी चाहिए। उसका आप इंतजाम करें। मिलाने से कुछ नहीं हल होने वाला है। हां, मिलाने में भी उसका इंतजाम कर लें तो उनको तृप्ति होगी, एक।
और ऐसा भी मत सोचें कि इससे मुझे कोई अड़चन होगी। मेरा उतना ही टाइम लगेगा जितना अभी लगता है, उससे ज्यादा नहीं लगेगा। इसलिए ऐसा मत सोचें कि मुझे अड़चन होगी अगर आप व्यवस्था लेते हैं। मुझे अड़चन नहीं होगी। फर्क इतना ही पड़ेगा कि अभी जिनको जरूरी है उनके लिए समय मिलता है, तब जिनके लिए जरूरी नहीं है उनको भी समय मिलेगा, और कोई फर्क नहीं पड़ता, समय तो मेरा उतना ही जाना है। इसलिए, तरु, उसमें दुख की बात नहीं है। समय उतना ही जाना है।
और कष्ट तो ऐसे हैं कि जिसका हिसाब लगाना मुश्किल है। खाना खाने मैं बैठूंगा, अगर नहीं रोकें तो दस-बीस लोग खाते वक्त इकट्ठे हो जाएंगे, मैं खाना भी नहीं खा पाता। अगर रोकें तो कष्ट होता है। डाक्टर मना कर गया है कि खाते वक्त यहां नहीं बैठने देना है। हिम्मत भाई यहां आकर बैठे थे। वे जब भी आते हैं खाते वक्त ही आएंगे, तब सब सुविधा से बातचीत हो जाती है। ये लोग खाना लेकर झबेर वगैरह बाहर से आए, इन लोगों ने देखा कि हिम्मत भाई बैठे हैं, तो ये लोग दरवाजा अटका कर वापस ले गए कि ये चले जाएं तब। हिम्मत भाई लोगों को कहते फिरते हैं कि मैंने हाथ का इशारा कर दिया कि अभी मत लाओ, अभी ये यहां बैठे हुए हैं। अब वे सब जगह फोन करते फिरते हैं कि अब मैं वहां कदम नहीं रख सकता, क्योंकि मुझे निकाला गया वुडलैंड से।
उनसे कोई बात ही नहीं हुई है। मगर हां, ये लोग खाना वापस ले गए, यह उनके लिए भारी कष्ट की बात हो गई। अब इस सबके लिए क्या करना! यानी कष्ट बड़े अजीब हैं! तो खाना भी मुश्किल हो जाता है। बीस लोग यहां बैठे हैं तो कुछ न कुछ बात चलाएंगे। अगर आप भीतर आते हैं और मैं आपसे यह न कहूं कि आइए, तो भी कष्ट होता है। तो मैं खाना खाते अगर बीस लोगों को आइए भी कहता रहूं, तो भी खाना मुश्किल हो जाता है।
तकलीफें मिलने-विलने की नहीं हैं बड़ी, क्योंकि मैं दिन भर मिल ही रहा हूं। और मांग बढ़ती चली जाती है। मैं देखता क्या हूं कि अगर एक व्यक्ति को आज मिलने दिया, तो वह अभी मुझसे कहता है कि मुझे हर सात दिन में वक्त चाहिए। सात दिन में वक्त देने लगिए, वह कहेगा, मुझे तीन दिन में वक्त चाहिए। उसका कोई कसूर भी नहीं है। उसको अच्छा लगता है, आनंदपूर्ण लगता है। लेकिन इसका इंतजाम कैसे करिएगा?
इसलिए हुआ क्या, इस मुल्क में इसका परिणाम यह हुआ था कि एक नई व्यवस्था हमने दर्शन की इस मुल्क में निकाल ली थी, कि उसमें कुछ बातचीत नहीं करनी, सिर्फ दर्शन करना। मगर दर्शन करने वाले साधु से आपको कोई सहायता नहीं मिल सकती, यह आप ध्यान रखें, दर्शन ही मिल सकता है। अगर मुझे सहायता आपकी करनी है तो फिर मुझे आपको समय देना पड़ेगा। और अगर मुझे आपको समय देना और सहायता करनी है तो हमें समय की च्वाइस भी करनी पड़ेगी, लोग भी चुनने पड़ेंगे, वक्त भी बांटना पड़ेगा, वह सब करना पड़ेगा। और नहीं तो फिर दर्शन ही रह जाएगा, आप आ जाइए, दर्शन करके चले जाइए।
तो रमण महर्षि के पास यही हो रहा था। दिन भर खुला रहता था, कोई तकलीफ नहीं थी। लेकिन सहायता क्या होने वाली है? वे बैठे हुए हैं, लेटे हुए हैं अपने तख्त पर और लोग सुबह से शाम तक दर्शन कर रहे हैं। वे सो भी रहे हैं तो भी दर्शन चल रहा है। तो करते रहें आप दर्शन।
मेरी दृष्टि वैज्ञानिक है और मैं सोचता हूं, जिसको सहायता पहुंचानी है, जिसके लिए काम करना है, उसके लिए जरूर वक्त होना चाहिए। लेकिन वक्त भी हमारी आदत और हैबिट नहीं बन जानी चाहिए कि वह कोई हमें रोज उसकी जरूरत है। जब जरूरत हो तब जरूर, उसमें कोई अड़चन नहीं है। मेरे भी खयाल में है कि किसको जरूरत है। कभी तो मैं भी खबर करवाता हूं कि फलां आदमी को बुला लेना कि वह मिल जाए आकर। क्योंकि मेरी नजर में है कि किसको जरूरत है, क्या जरूरत है।
तो दो बातें हैं, अगर मुझ पर छोड़ते हैं तो यह तकलीफ थोड़ी जारी रहेगी।
और लक्ष्मी की जो सख्ती दिखाई पड़ती है वह उसकी सख्ती नहीं है, वह मेरी व्यवस्था ही है। और जिस व्यक्ति को भी मना करना है वह बुरा लगने लगेगा। और ऐसा नहीं है--यह हमें ऐसा लगता है कि वह प्रेम से बोले--वह बिलकुल प्रेम से बोले, तो भी मना करेगा तो प्रेम दिखाई नहीं पड़ेगा। और जिसको दिन भर वही करना है उसके भी प्रेम की सीमा है। हालांकि आपको नहीं लगता, क्योंकि आप तो अकेले कर रहे हैं। वह सुबह से दिन भर इसको मिलना है, उसको मिलना है, वह दिन भर उसको वही काम है। कोई घंटा मांगता है, कोई डेढ़ घंटा मांगता है, कोई कहता है कि मुझे तो आधा घंटा चाहिए। अब वह उसको अगर मना करना है...कोई मद्रास से आया हुआ है, कोई कलकत्ता से आया हुआ है, वह कहता है, मैं कलकत्ते से चला आ रहा हूं और मुझे तो एक घंटा चाहिए ही। उसको सुबह से शाम तक मना करना है। और मना करने वाला आदमी एक तो बुरा लगेगा ही जिसको मना सुनाई पड़ेगी उसको, वह कितना ही मीठा करे। और फिर मेरा मानना यह है कि उसकी मिठास भी जल्दी मर जाएगी, क्योंकि वह रूटीन काम है।
इधर मैं बहुत लोगों को वह काम देकर देख चुका। रमण भाई के पास वह काम था, तो वे सब लोगों को लगने लगे कि वे आदमी कठोर हैं। सरल आदमी चाहिए, प्रेमी आदमी चाहिए। जो शिकायत करते थे--अनूप, उनको वह काम दिया, वह अनूप कठोर हो गए लोगों के लिए। अब अनूप लक्ष्मी की शिकायत आज करते हैं। अब क्या, इसको क्या किया जाए? इसको किसको सौंपा जाए? वह काम ऐसा है। मेरी अपनी समझ यह है कि व्यक्ति उतना बड़ा सवाल नहीं है, कुछ काम ऐसे हैं कि वे काम व्यक्ति को उस तरह का ढाल लेते हैं। काम का भी नेचर होता है। जिसको दिन भर मना करने का, रोकने का काम है, वह कठोर दिखने लगेगा और कठोर हो भी जाएगा। वह सारा काम का ढांचा ऐसा है कि वह करेगा क्या! फिर भी मैं कहता हूं कि जो भी रहे उसको सम्हालना है कि वह जितने प्रेम से बन सके उसको...। लेकिन मैं जानता हूं कि इससे कोई शिकायत में फर्क नहीं पड़ता, शिकायत जारी रहती है वैसी ही।
तो मैं यह मानता हूं कि इसको आप सबको यह कहना शुरू कर दें कि यह लक्ष्मी का कसूर नहीं है, किसी का कसूर नहीं है, मेरी व्यवस्था है। मैं जिस व्यक्ति को समझता हूं उसको मैं तत्काल वक्त देता हूं, जिसको नहीं समझता हूं नहीं देता हूं। अगर मैं नहीं देता हूं वक्त, तो समझना चाहिए कि तुम्हें वक्त की बिलकुल जरूरत नहीं है और तुम कुछ कर नहीं रहे हो। या तो इतनी हिम्मत जुटा लें और या फिर यह मुझ पर छोड़ें ही मत, यह अपना इंतजाम कर लें। लक्ष्मी से बेहतर कोई सम्हाल सकता हो जिसको लगता हो कि यह मीठा सम्हाल लेगा, उसको बिठा दें, उसमें कोई अड़चन नहीं है। एक व्यक्ति को इसी के लिए रख दें कि वह सिर्फ इतना ही काम करेगा--लोगों को टाइम देने का, नहीं देने का। और तब आपको दो महीने में एक अंदाज हो जाएगा कि उस आदमी की शिकायतें आनी शुरू हो गईं।
कठिनाई जो है वह इकोनॉमिकल है। इकोनॉमिकल का मेरा मतलब यह है कि समय कम है, लोग ज्यादा हैं, इसलिए कठिनाई है। सारी कठिनाई यह इकोनॉमिकल है। दिन में कितने लोगों को आप मिला सकते हैं? प्रचार आप बढ़ाते जाएंगे, लोग बढ़ते जाएंगे, मिलने वाले उत्सुक लोग बढ़ते जाएंगे। मैं अकेला बना रहूंगा। समय की सीमा उतनी ही रहेगी। काम बढ़ाते आप चले जाएंगे, तकलीफ बढ़ने वाली है। तकलीफें बढ़ती नहीं, अगर यहां कोई फीस हो तो तकलीफ नहीं बढ़ेगी। जितने लोग बढ़ते जाएं उतनी मिलने की फीस बढ़ाते चले जाएं, तो आपको कभी तकलीफ नहीं आएगी। नहीं तो तकलीफ...
आप समझ नहीं रहे हैं। मुझे दो सौ आदमी सुनते थे, तब भी मेरे पास टाइम इतना ही था। बीस हजार आदमी सुनते हैं, तब भी मेरे पास टाइम उतना ही है। आप चाहते क्या हैं? ये बीस हजार आदमी मिलना चाहेंगे अब। तो मेरा टाइम तो नहीं बढ़ गया कोई बीस गुना, वह तो उतना का उतना है। तो इन सबको कैसे आप तृप्त करिएगा?
तो दो ही रास्ते हैं। या तो आप इसमें चुनाव कर लें कि जो हमारा काम करता है, आर्थिक व्यवस्था...किसी भी तरह चुनाव कर लें, कोई भी चुनाव कर लें, कि भई हम इस कैटेगरी के लोगों को मिलाएंगे, बाकी को नहीं मिलाएंगे। तो वह कैटेगरी आपकी तृप्त हो जाएगी। एक रास्ता यह है।
दूसरा रास्ता यह है कि मुझ पर छोड़ दें कि जिससे मैं मिलना चाहूंगा मिलूंगा, नहीं तो नहीं मिलूंगा। तो भी एक कैटेगरी हो जाएगी। लेकिन मैं मानता हूं कि मेरी कैटेगरी मतलब की होगी, आपकी कैटेगरी मतलब की नहीं हो सकती है। इसको इस तरह प्रचारित करना शुरू करें कि यह आपके ऊपर निर्भर नहीं है कि आपने चाहा कि मिलना है तो मिल लूंगा मैं।

वह तो कहते ही हैं हम लोग।

नहीं, नहीं, तरु।

हम कहते हैं कि जब ठीक लगेगा तो वे हां बोलेंगे। लोग कहते हैं कि दो-दो महीने से हम फोन करते हैं, नहीं मिलते हैं। तो उन लोगों को भी समझना चाहिए, मदद करनी चाहिए।

न-न-न। मैं यह समझता हूं। नहीं, इसका अभी तो अपने वर्कर्स और मित्रों के खयाल में नहीं है। जब भी कोई शिकायत करे भविष्य में, तो इसकी दोनों, तीनों, चारों अखबारों में अपने खबर निकाल दें, सारे मित्रों को खबर कर दें--कि आपने मिलना चाहा, इससे जरूरी नहीं है कि मैं मिलूंगा।

यह गुरु की इच्छा पर है।

मेरी इच्छा पर निर्भर है कि मुझे लगेगा कि आपको बिलकुल वक्त है जरूरी और आपको मिलने के बिना नहीं चलेगा और आपके लिए कोई सहायता पहुंचानी जरूरी है, तो मैं मिलूंगा। इसलिए मुझ पर छोड़ दें। आप इनफॉर्म कर दें यहां फोन से और मुझ पर छोड़ दें। यह चुनाव...तकलीफ तो यह होती है कि मैं मिलना चाहता हूं और कोई रोक रहा है। तकलीफ यह है। मुझे चिट्ठियां आती हैं वे ये हैं कि आप मिलने को तैयार हैं, हम मिलना चाहते हैं, बीच में कोई रोक रहा है। बीच में कोई नहीं रोक रहा है, यह उनको साफ कर दें। इसमें अड़चन कम होगी।
दूसरी बात यह ध्यान में रख लें कि जिन कोई भी मित्रों से आप सहायता लेने जाते हैं, उनको सहायता लेते वक्त भी आप कह दें कि यह अनकंडीशनल है। सहायता लेने के बाद भी उनको बता दें कि इससे कोई कंडीशन नहीं है। मुझ पर कोई कंडीशन नहीं है इसकी। यह आप अपने प्रेम से दे रहे हैं।
अगर वह आदमी कहता है, मैं प्रेम से नहीं दे रहा, तो उसको नोट कर लें--कि हम नोट कर लेना चाहते हैं कि आप प्रेम से अनकंडीशनल देते हैं कि आप सशर्त कंडीशनल देते हैं, कि आपकी कोई कंडीशन पीछे होगी, ताकि हम उसको पूरी करें ताकि आपको कोई अतृप्ति न हो। आप नोट कर लें कि इससे हमने दस हजार रुपये लिए हैं, यह आदमी कहता है कि मेरी कंडीशन है कि जब मैं मिलना चाहूंगा तो मुझे मिलवाना। तो कंडीशन पूरी करें। नॉन-कंडीशनल है सहायता, तो नोट कर लें कि नॉन-कंडीशनल है। तब वह शिकायत नहीं कर सकेगा दुबारा आपको। वैसी कोई व्यवस्था करें। क्योंकि वह तो बढ़ती जाएगी। अंदाज तुम्हें नहीं है, वह संख्या बढ़ती जाएगी लोगों की। हिंदुस्तान के बाहर काम पहुंचेगा, वहां से लोग आएंगे। हिंदुस्तान के कोने-कोने में काम पहुंचेगा, वहां से लोग आएंगे। तो तुम्हें च्वाइस तो करनी ही पड़ेगी किसी तरह की--चाहे धन से करो, चाहे साधना के हिसाब से करो, चाहे बुद्धिमत्ता के हिसाब से करो--कोई हिसाब से कोई कैटेगरी बनानी पड़ेगी कि इनको मिलने देना है। नहीं तो असंभव हो जाएगा।
और मेरी मान्यता यह है कि इसके दो ही उपाय हैं, या तो मुझ पर छोड़ दें, तो बीच में किसी पर जिम्मा मत डालें। वह जो भी आदमी बीच में है वह मुझे ही रिप्रेजेंट कर रहा है, बस मेरी खबर दे रहा है आपको, उससे ज्यादा उसका कोई अस्तित्व नहीं है। तो इसमें अड़चन क्या होती है? इसमें अड़चन यह होती है कि मित्रों की भी इच्छा यह होती है कि कोई दोष आए तो वे खुद ले लें, मुझ पर न डालें। उससे भी अड़चन होती है। उससे भी अड़चन होती है।
नहीं, वह दोष मुझ पर ही डाल दें। आपको कम अड़चन होगी लंबे अर्से में। साल दो साल में लोगों को साफ हो जाएगा कि मैं आदमी ऐसा हूं कि मिलना होता है तो मिलता हूं, नहीं मिलना होता नहीं मिलता हूं। आपकी तरफ से निर्णय नहीं होता मिलने का, निर्णय मिलने का मेरी तरफ से होता है।
गुरजिएफ था, तो महीनों क्या, सालों भी नहीं मिले। और ऐसा भी नहीं था कि न मिले, बुला ले टाइम पर, टाइम दे दे, और न मिले। कि आप हजार मील से यात्रा करके आए हैं, उसने टाइम दिया है, खबर दी है कि ठीक पांच बजे फलां जगह आकर मिल जाओ। और पांच बजे आप बैठे हैं और वह खबर भेज दे कि नहीं मिल सकूंगा। जाहिर हो गया दो-चार साल में लोगों को कि अगर आपको जाना है, इतनी लंबी यात्रा अपनी रिस्क पर कर रहे हैं आप, जरूरी नहीं है उसका मिलना फिर भी। ऐसा भी नहीं कि एकाध आदमी का; पब्लिक मीटिंग रखेगा, और पब्लिक मीटिंग में ऐन वक्त पर जाकर कह देगा कि नहीं बोलूंगा। शिकायत खतम हो गई, थोड़े दिन में लोगों को जाहिर हो गया कि भई ठीक है, इस आदमी को सुनना हो तो यह समझ कर जाओ कि शायद बोले न बोले, आए न आए।
तो अभी तकलीफ क्या होती है, आप मुझे बचाने के लिए अपने ऊपर ले लेते हैं। कहीं कह देंगे कि तरु की गलती हो गई होगी, उसने ऐसा कह दिया; देसाई की गलती हो गई होगी, उन्होंने ऐसा कह दिया; वे तो बहुत प्रेमपूर्ण हैं, बीच में किसी ने बाधा डाल दी होगी।
ऐसा मत कहें। कह दें, वे ही ऐसे आदमी हैं, गलत-सही जैसे भी हैं। वे जिसको मिलना है मिल लिए होंगे, नहीं मिलना नहीं मिले होंगे। और जिससे सहायता लेते हैं उससे कंडीशन की बात कर लें कि भई आपकी कोई कंडीशन हो तो हम याद रख सकें, ताकि पीछे शिकायत न हो। अगर कंडीशनल नहीं है, नॉन-कंडीशनल है, तो हम याद कर लें कि आपकी कोई शिकायत नहीं होगी, एक।
दूसरी बात, व्यवस्था का जो सवाल है उसमें दोत्तीन बातें खयाल ले लेनी चाहिए। एक तो मेरा खयाल यह है, इलेक्शन या बहुत ज्यादा कांस्टिटयूशन के मैं पक्ष में नहीं हूं। क्योंकि मेरा मानना नहीं है कि इलेक्शन से कोई काम हो सकता है। हां, इलेक्शन हो सकता है, और बड़ा काम दिखाई पड़े, क्योंकि इलेक्शन कोई छोटा काम नहीं है। मगर काम नहीं हो सकता। हां, मजा आएगा। और वर्कर्स में रस पैदा हो जाएगा, आगे-पीछे ऊपर-नीचे होने की संभावना हो जाएगी। लेकिन उससे काम नहीं होगा। मैं नहीं मानता हूं कि उससे काम होगा। दुनिया में जो सबसे कम काम करना हो किसी भी व्यवस्था को तो उसको इलेक्शन पर खड़ा करना चाहिए। क्योंकि इलेक्शन ही इतना बड़ा काम है कि फिर और कोई काम बचता ही नहीं करने को। तो मैं नहीं मानता।
मैं तो मानता हूं कि ऊपर से नॉमिनेशन हो, अगर काम करना है। हां, लोगों को तृप्त करना है, सबको तृप्त करना है, तो इलेक्शन बिलकुल ठीक है। काम दूसरी बात है। सबको तृप्त करना है तो ठीक है। आपके हजार मेंबर्स हैं, इलेक्शन करिए, तो सबको रस आएगा, सब बैठक में भी आएंगे। क्योंकि हराने-जिताने का, पार्टी बनाने का, गुट बनाने का, सब उपाय शुरू हो जाएगा। लेकिन उससे काम-वाम नहीं होगा। काम करना है, तो उससे काम नहीं होता। और सारी शक्ल पोलिटिकल हो जाती है भीतरी अर्थों में।
तो मैं तो कोई इलेक्शन के पक्ष में नहीं हूं। मैं तो सीधे नॉमिनेशन के पक्ष में हूं। उस झंझट में मैं नहीं डालना चाहूंगा। न कांस्टिटयूशन होने का मैं कोई अर्थ समझता हूं, न कुछ और। यह तो जहां काम नहीं करना है वहां ये सब चीजें बड़ी अच्छी हैं। काम नहीं करना है और काम करते हुए काफी दिखाई पड़ना है--तो लायंस है, रोटरी है--काम-वाम कुछ नहीं करना है, मगर गवर्नर है और डिप्टी गवर्नर है और प्रेसिडेंट है और सेकेंड प्रेसिडेंट है, और चल रहा है। और वे भारी, भारी काम में लगे हुए हैं सब, और काम-वाम कुछ नहीं करना है, काम-वाम से क्या लेना-देना है! तो उसके तो मैं रस में नहीं हूं।
हां, यह मैं जरूर जानता हूं कि कांस्टिटयूशन बनाएं, व्यवस्था बनाएं, व्यवस्था के अनुसार काम हो सके, इसकी चिंता करें। लेकिन इलेक्शन पर खड़ा करने का सोचें ही मत भूल कर भी, भूल कर भी मत सोचें।
दूसरी बात यह है कि काम के बंटवारे की जरूर चिंता करें। लेकिन हम सब यहां कहते हैं कि बंटवारा होना चाहिए, लेकिन बंटवारा किसको कर दिया जाए? कौन व्यक्ति कौन सा काम करने में उत्सुक है, उसको ऑफर करना चाहिए, जहां इलेक्शन न हो वहां ऑफर करना चाहिए। आनंद भाई को लगता है कि यह काम मैं ईश्वर बाबू से बेहतर कर सकूंगा, तो कमेटी के सामने उनको ऑफर कर देना चाहिए कि ईश्वर बाबू यह काम कर रहे हैं, इससे बेहतर मैं कर सकूंगा। तो मैं मानता हूं कि वह काम इनको दे दिया जाना चाहिए। कमेटी उनको दे दे, छह महीने के लिए दे दे--कि भई ठीक है, ईश्वर बाबू से बेहतर तुम छह महीने करके दिखाओ। अगर यह तुम बेहतर करते हो तो बड़ी खुशी से हम छोड़ देंगे। क्योंकि ईश्वर बाबू भी इसीलिए कर रहे हैं कि वह बेहतर हो सके।
तो मेरा मानना है कि इलेक्शन की जगह ऑफर ज्यादा योग्य और ज्यादा बुद्धिमानी की बात है। इलेक्शन तो बड़ी उलटी चीज है। आप कोशिश करते हैं कि आप चुने जाएं और फिर भी ऐसा दिखाते हैं कि नहीं, आपको पद वगैरह में कोई उत्सुकता नहीं है, वह तो आप काम के लिए उत्सुक हैं। ऑफर बिलकुल उलटा है। ऑफर बिलकुल उलटा है। आप किसी को कहने नहीं जा रहे हैं, आप सिर्फ ऑफर करते हैं अपना कि मैं इस काम को फलां व्यक्ति से बेहतर कर सकता हूं, ज्यादा मेरे पास सुविधा है, ज्यादा इस संबंध का मेरा ज्ञान है, ज्यादा मेरे पास समय है, तो यह काम मुझे छह महीने के लिए, एक्सपेरिमेंटली, कमेटी दे दे। तो आपकी कमेटी उसको नियुक्त कर दे कि ठीक है, यह एक्सपेरिमेंटली छह महीने करो। अगर वह बेहतर करता है तो उससे खींचें काम को, अगर वह बेहतर नहीं करता तो वापस लौटा दें।
ऑफर करने की फिकर करें। इसको मैं ज्यादा योग्य और धार्मिक बात समझता हूं, और ज्यादा विनम्र। दिखती उलटी है। दिखती उलटी है कि एक आदमी खड़ा होकर कहे कि मैं लहरू से ज्यादा बेहतर काम कर सकता हूं। मगर इसको ज्यादा विनम्र मानता हूं कि यह आदमी सीधी-सच्ची बात कह रहा है कि ठीक है। अभी क्या करते हैं आप, उलटा करते हैं। अभी आप यह नहीं कहते कि मैं बेहतर कर सकता हूं। अभी आप यह कहते हैं कि बाबू भाई ठीक नहीं कर रहे हैं। कहना आप यही चाहते हैं कि मैं ज्यादा समझदार आदमी हूं, ज्यादा योग्य आदमी हूं, मैं इसको उससे बेहतर कर सकता हूं। लेकिन अभी कहते आप यह हैं कि बाबू भाई ठीक नहीं कर रहे हैं। इससे कोई हल नहीं होता। इससे कोई हल नहीं होता। ज्यादा ईमानदारी की बात यह है कि आप कहें कि इस काम को मैं बेहतर कर सकता हूं, यह काम मुझे सौंप कर देखा जाए, एक एक्सपेरिमेंट कर लिया जाए।
तो आपको निंदा करने से बचने की सुविधा हो जाए। और आप कर सकते हैं कि नहीं, इसका भी आपको दो दफे सोचना पड़े। क्योंकि कौन नहीं कर रहा है, इसको कहने में किसी को सोचने की जरूरत नहीं है। फलां आदमी ठीक नहीं कर रहा है, इसे कहने में क्या दिक्कत है? लेकिन मैं ठीक करूंगा, तो आपको हजार दफे सोचना पड़े और सोच-विचार कर कदम उठाना पड़े।
तो अगर यह कमेटी में रोज-रोज की आपको एक-दूसरे की चिंता बंद करनी है, तो एक ही उपाय है कि आप ऑफर, अपना निमंत्रण दे दें कि यह काम मैं करके दिखाऊंगा। छह महीने के लिए आपका कमिटमेंट है, आप करके दिखाएं। इसमें कोई अड़चन नहीं है। काम बराबर बांट दिया जाए, जो भी ऑफर दे उसको काम बांट दिया जाए।
और एक बात ध्यान रखें कि जब भी हम काम, कोई भी काम करता है, तो काम के दो हिस्से हैं। एक काम की तकलीफें हैं, वे हमारे खयाल में नहीं होतीं। एक काम की भूलें हैं, वे हमारे खयाल में होती हैं। एक काम का परिणाम है, वह भी हमारे खयाल में नहीं होता। तो जब भी आप सोचने बैठेंगे कि यह मैं कहने जा रहा हूं कि यह काम बाबू भाई से छोड़ कर हर्षद को दे दें, तो मैं सब सोच लूं कि इस काम की तकलीफें कितनी हैं, इस काम की व्यवस्था कैसे होने वाली है, इसके परिणाम कितने हो रहे हैं, जो अभी कर रहा है व्यक्ति वह क्या कर रहा है, पूरी बात समझ लें, तभी आप ऑफर कर पाएंगे, नहीं तो नहीं कर पाएंगे।
तो यह अपने भीतर से यह बात ही छोड़ दें। हमेशा ऑफर लेकर आ जाएं कि यह काम मैं करना चाहता हूं। तो आपको काम मिलना चाहिए। और मैं तैयार हूं इसके लिए, कोई इलेक्शन की जरूरत नहीं है। जो आदमी खुद कह रहा है, अब इससे बड़ी और क्या गवाही हो सकती है कि वह आदमी करेगा, ठीक है। उसमें क्या ऐसी बात है! कोई पच्चीस आदमी वोट करें तब पता चले कि आप योग्य हैं। आप पच्चीस को समझाने जाएं कि मैं योग्य आदमी हूं। इस सबकी क्या जरूरत है? यह तो खड़े होकर आप कह दें कि मेरी यह योग्यता है, यह काम मैं करना चाहता हूं, यह काम मुझे सौंपा जाए। आपको एक्सपेरिमेंटली, पार्ट काम सौंपा जाए, कुछ भी आपको दिया जाए। आप काम करें, डिवीजन कर लें।
तो हम यह बातचीत तो करते हैं कि डिवीजन होना चाहिए, डिवीजन जरूर होना चाहिए, लेकिन किसको काम सौंप दिया जाए? उसके लिए ऑफर करना शुरू करें। एक नया प्रयोग होगा और कीमती होगा। और मैं मानता हूं कि जहां भी मित्र इकट्ठे हों वहां इलेक्शन बुरी बात है। यह इलेक्शन तो दुश्मनी खड़ी करता है, मित्रता तोड़ता है। ऑफर अच्छी बात है। सीधा ऑफर कर दें। और हिम्मत की बात भी है। और आप पर जिम्मा भी पड़ता है, पीछे आपको कमेटी पूछेगी भी कि भई छह महीने में, जो-जो शिकायतें आपने की थीं, कौन सी तोड़ पाए? काम कौन सा कर पाए? काम जरूर बांटें।
इधर दूसरा मेरा खयाल यह है कि जो भी एक व्यक्ति काम करता है कोई, उस काम को बांटना जहां तक बने न करें। नये काम हमारे पास बहुत हैं जो शुरू करें। काम की कोई कमी नहीं है। समझ लें कि अभी ईश्वर बाबू पब्लिकेशन का पूरा काम देख रहे हैं। लश्करी जी ने अपनी तरफ से ऑफर दिया है इसलिए मैं खुश हूं, उन्होंने कहा कि यह पब्लिकेशन का काम मेरा अनुभव है, मेरी प्रेस है, मैं इसको देख सकता हूं। पर मेरा मानना ऐसा है कि लश्करी जी को हम एक अलग डिवीजन, एन.एस.आई. का एक पब्लिकेशन अलग शुरू करवा दें। नव-संन्यास अंतर्राष्ट्रीय का अलग पब्लिकेशन शुरू कर दें, वह लश्करी जी को सौंप दें। किताबें तो इतनी पब्लिश होने को पड़ी हैं कि वह आप दस अलग पब्लिकेशन करें तो भी पूरी नहीं होने वाली हैं। वह ईश्वर बाबू जो सम्हालते हैं वह सम्हालें। लश्करी जी को एक हम काम दे दें कि वे एन.एस.आई. का पब्लिकेशन शुरू कर दें।
तो दो बातें होंगी। नहीं तो एक आदमी ऑफर भी करे और पुराने आदमी का काम भी छूट जाए और यह आदमी न कर पाए, तो कल सब उलझन में पड़ जाएगा। और छह महीने जिस आदमी को आपने काम के बाहर रखा, वह छह महीने के बाद लेना चाहे, न लेना चाहे, वह उसके सोचने की बात है। नये अपने पास काम इतने हैं कि जो है उसको तो डिवीजन करने की तब जरूरत पड़नी चाहिए जब काम न बचें। अभी काम बहुत हैं। नया पब्लिकेशन शुरू करें।
अभी एक संन्यास का विचार ये लोग करते हैं, अंग्रेजी में पत्रिका शुरू करनी है। नई कमेटी बनाएं। ईश्वर बाबू पर क्यों थोपते जाते हैं?
अच्छा बड़ा मजा यह है कि हम कहते भी हैं कि काम बांटना है और सब काम उन्हीं पर थोपते जाते हैं। जो भी दो लोग, चार लोग काम करते हैं, उन पर थोपते चले जाते हैं। संन्यास निकालना है, उसकी नई कमेटी बना लें।
अभी सापुतारा पर परमानेंट कैम्पस बनाना है, उसकी नई कमेटी बनाएं। वह नई कमेटी पूरा सम्हाले, उसको पुराने से कुछ लेना-देना ही नहीं है। आपके बीच से अलग चार लोग कर दें, वे जानें।
बंबई में मैं चाहता हूं कि आज नहीं कल हमें कोई न कोई छोटा-मोटा कैम्पस बनाना चाहिए बस्ती के बाहर, तो वीक एंड में कम से कम दो दिन आप मेरे साथ रह सकें। एक अलग कमेटी फॉर्म कर दें, वह उसको सम्हालेगी, उससे कुछ लेना-देना नहीं। उसके ट्रस्टी अलग बना दें, आपके बीच से ही। उसके सारे सेक्रेटरी, सब बना दें। पर सब अपाइंट करें, कोई इलेक्शन का वहां भी सवाल नहीं है। एक परमानेंट कैम्पस के लिए बंबई के लिए एक कमेटी बनाएं, वह उनको काम सौंप दें। अगर वे कहते हैं कि अभी हिसाब-किताब की व्यवस्था नहीं होती, तो वे अपनी कमेटी में हिसाब-किताब की अगर कल व्यवस्था करके बता दें, तो हम ईश्वर बाबू से कहें कि यह भी इन पर छोड़ दो, ये व्यवस्था ठीक कर लेते हैं।
तो नये काम की दिशाएं खोज लें। और काम बहुत है। काम का कोई कम का सवाल नहीं है। धीरे-धीरे लैंग्वेज के पब्लिकेशन को अलग कर लें। अब जैसे मराठी का लैंग्वेज पब्लिकेशन है, वह अटक गया है। अलग कमेटी कर लें, वह अलग अपना फंड रेज़ करे, वह जाने। उसको ईश्वर बाबू कोई बाधा देने नहीं जाएंगे बीच में। वह अपना फंड रेज़ करे, अपने फंड व्यवस्थित करे। सारा फंड काम में तो आखिर में एक आ जाने वाला है, तो ठीक है वह अपना अलग करता रहे। मराठी का अलग कर दें, धीरे से गुजराती का अलग कर दें, हिंदी का अलग कर दें, अंग्रेजी का अलग कर दें। धीरे-धीरे बांट दें।
लेकिन अभी तक की सारी तकलीफ यह है कि लेने को कोई तैयार नहीं होता है काम। और ये जो शिकायतें आपके पास आती हैं कि कोई कहता है कि हिसाब-किताब ठीक नहीं है, कोई कुछ कहता है, कोई कुछ कहता है। यह मेरा मानना है कि यह आप फैलाते हैं सब जगह। क्योंकि बाजार में एक आदमी कैसे कह देगा कि हिसाब-किताब आपका ठीक नहीं है? और आपसे कह देता है और आप चुपचाप सुन लेते हैं और कह देते हैं कि हां, ठीक नहीं है। बड़ी हैरानी की बात है!
अगर हिसाब-किताब ठीक नहीं है तो उसके लिए ईश्वर बाबू अकेले जिम्मेवार नहीं हैं, आप भी जिम्मेवार हैं। और अगर आपने जोर से कह दिया होता कि नहीं, हिसाब-किताब बिलकुल ठीक है, यह आप कैसी बात कर रहे हैं? तो वह आदमी शांत हो गया होता। लेकिन आप कहते हैं कि हां, यह बात ठीक है कि हिसाब-किताब ठीक नहीं है। और हिसाब-किताब में क्या ठीक नहीं है उसे कुछ कर नहीं लेते हैं कि उसको व्यवस्थित कर लें। उसमें कौन सा बड़ा मामला है! इसमें कोई भी बड़ा मामला नहीं है। वह जो दूसरा आदमी कह देता है कि हिसाब-किताब ठीक नहीं है, वह इसलिए कह रहा है कि उसे आप जो मांगने गए हैं वह आपको नहीं देना चाहता है। और आप भी हां भर देते हैं वह भी इसलिए कि लौट कर आपको भी यह नहीं कहना पड़ता कि मैं नहीं ला पाया हूं पैसा। हिसाब-किताब ही ठीक नहीं है, तो बात शांत हो गई। वह भी सुलझ गया, उसका देने से बचाव हो गया; आपको लाना था, वह जिम्मेवारी भी आपकी खतम हो गई।
तो यह मैं दोत्तीन साल से सुनता हूं कि वह ठीक नहीं है। दोत्तीन साल क्या, जब से--दस साल से वही बात है। और वह क्यों ठीक नहीं हो जाता उसका कोई कारण समझ में नहीं आता। उसमें कोई अड़चन नहीं है। अड़चन कुल इतनी है कि पैसे की आपके पास कमी है, तो अगर आप हिसाब-किताब बिलकुल ठीक रखें तो काम आप बिलकुल नहीं कर पाएंगे।
अब ऐसा मामला है कि अगर आप ठीक व्यवस्थित आदमी को सारा हिसाब-किताब सौंप दें--बसंतजी भाई बिलकुल व्यवस्थित हिसाब कर सकते हैं, उनको आप सौंप दें--तो काम में आपको मुश्किल हो जाएगी। क्योंकि आप काम करेंगे तो अव्यवस्था होगी और अगर बसंतजी भाई को व्यवस्था रखनी है तो फिर काम रुकेगा। आपके पास एक पैसा नहीं है बैंक में और ईश्वर बाबू चालीस हजार रुपये की किताब छपने भेज रहे हैं, तो बसंतजी भाई को रोकना चाहिए कि यह पैसा कहां है? नहीं तो ये चालीस हजार आएंगे कहां से! अब वे किसी से पेपर ले रहे हैं, उसको कह रहे हैं कि महीने भर में पैसा देंगे और तीन महीने तक उसको वे घूम-फिर कर रहे हैं। किसी से छपवा रहे हैं, उसको चार महीने तक घूम-फिर कर रहे हैं। इससे लेकर कहीं उसको दे दिया, कहीं उससे लेकर इसको दे दिया। तो वह हिसाब ठीक हो नहीं सकता है।
अगर आपको हिसाब ठीक करना है तो आपको फंड्स रेज़ करने पड़ेंगे। नहीं तो आप कभी ठीक नहीं कर पाएंगे। आपके पास इतना फंड होना चाहिए कि हिसाब से आप कर सकें। दस हजार रुपये किसी को देना है तो हिसाब से दे सकें। अब वह दस हजार तो हैं ही नहीं आपके पास। तो दो उपाय हैं, या तो गैर-हिसाब से काम चले और या काम बंद हो जाए, हिसाब साफ रहे। क्योंकि अगर आपके पास बैंक में रुपया नहीं है, तो जो हिसाब वाला है वह आदमी कहेगा कि ईश्वर बाबू आप यह चेक कैसा काट रहे हैं? वे चेक काटते रहते हैं, वह लौटता रहता है। हिसाब वाला आदमी कहेगा, यह चेक नहीं काटना चाहिए, क्योंकि पैसा तो है नहीं आपके पास। अब वे कहते हैं, जब तक लौटेगा, आएगा, तब तक पंद्रह दिन का वक्त मिलेगा, तब तक कुछ करेंगे। मगर यह है तो गलत। यह तो मैं भी जानता हूं कि यह गलत है। और जिसके पास से लौटेगा वह कहेगा, भई मामला क्या है? हमसे कह कर जाते हो कि वक्त पर देंगे और यह पैसा तो आता नहीं है।
अगर इसको वक्त पर देना है तो आपके पास है ही नहीं और तब आप अगर हिसाब से चलते हैं तो आप कोई काम नहीं कर पाएंगे। जब पैसा आएगा तब काम होगा, और वह होगा नहीं। अब उन्होंने जो किया हुआ है वह बिलकुल गोलमाल है। गोलमाल इसलिए है कि उसके सिवाय कोई उपाय नहीं है उनके पास। तो हम सब उनकी आलोचना कर लेते हैं कि भई यह व्यवस्थित होना चाहिए हिसाब। वे भी हिम्मत करके नहीं कहते कि यह हो नहीं सकता। वे भी कहते हैं कि होना चाहिए। क्योंकि हम सबका मानना है कि यह हिसाब का ठीक होना बड़ी ऊंची बात है। सबका मानना है ऐसा, वह बिलकुल ठीक होना चाहिए, बड़ी ठीक बात है। तो उसको कोई इनकार भी नहीं करता कि यह सभी वक्त पर जरूरी नहीं है कि ठीक बात हो। हिसाब का ठीक होना बहुत लग्जरी है। आपके पास जरूरत से ज्यादा पैसा हो तो हिसाब ठीक हो सकता है। जरूरत ज्यादा हो और पैसा कम हो तो आपका हिसाब कभी ठीक नहीं हो सकता। उसमें थोड़ी-बहुत भूल-चूक चलेगी।
तो अभी पैसा बिलकुल नहीं है और काम भारी है। उन पर पैसा एक नहीं है, लेकिन वे ईश्वर बाबू कहते हैं कि दो लाख का साहित्य बेचा इस साल। और पैसा एक नहीं है, तो वह दो लाख का साहित्य आता कैसे है?
एक किताब छपवाते हैं, उसको बेचते हैं, उसी में से पैसा निकाल कर दूसरी छपवाने की कोशिश में लगते हैं। कभी मीटिंग का पैसा किताब में डाल देते हैं, कभी कैंप का पैसा किताब में। आप कहते हैं कि सब व्यवस्थित होना चाहिए--किताब का पैसा किताब में जाना चाहिए, कैंप का कैंप में जाना चाहिए, मीटिंग का मीटिंग में जाना चाहिए। वह जा सकता है, लेकिन तब मीटिंग होना भी मुश्किल, कैंप होना भी मुश्किल और किताब छपना भी मुश्किल। जो तकलीफ है वह कुल जमा इतनी है कि आपके पास फंड्स कम हैं और काम रोज बढ़ते जाने वाला है।
अब कोई सौ पब्लिकेशन हो गए हैं। और यह कुछ भी नहीं है, अभी लहरू के पास कोई पांच हजार घंटों के रिकार्ड पड़े हुए हैं, जो कि पब्लिश शायद हो ही नहीं सकेंगे कभी। क्योंकि रोज मैं बोलता जाऊंगा, वह पब्लिश आप करेंगे, तो पीछे के वे पचास हजार पेज वह पब्लिश आप नहीं कर सकते हैं।
तो अगर आपको हिसाब ठीक करना है तो फंड रेज़ करिए। लेकिन आप फंड रेज़ करने से बचने के लिए, हिसाब ठीक नहीं है, यह बातचीत करते हैं। यह कभी होने वाला नहीं है। और यह काम ऐसा नहीं है कि आपका फंड कभी भी काम से ज्यादा हो जाएगा, यह मैं आपसे कहे देता हूं। यह कभी होने वाला नहीं है कि आपका फंड आपके काम से ज्यादा हो जाएगा। इसकी कभी भ्रांति में ही नहीं पड़ना। आप कितना ही फंड करो, वह कम पड़ेगा।
तो यह सारी स्थिति समझ कर आपको, जो भी काम करने वाला है, उसके डिफेंस में होना चाहिए बाहर। तो डिफेंस में न होकर आप उसके प्रचारक बनते हैं कि हिसाब कुछ ठीक नहीं है। यह मैं मान ही नहीं सकता, क्योंकि यह पता कैसे चलता है किसी को कि हिसाब ठीक नहीं है। और फिर भी, ऐसा नहीं है कि वे हिसाब नहीं देते, साल भर के बाद तो हिसाब दे देते हैं, ऑडिट हो जाता है सारा। नहीं तो आपका ट्रस्ट नहीं चल सकता है। तो वह जो ऑडिट रिपोर्ट है वह आप सबके हाथ में पकड़ा दें, जो भी कहता है कि हिसाब ठीक नहीं है। और आपको सच में ही रत्ती-पाई का हिसाब ठीक रखना है, तो फंड इतने रेज़ कर लें कि रत्ती-पाई का हिसाब ठीक हो सके।
और मैं मानता हूं, जिस दिन आप फंड रेज़ कर लें, ईश्वर बाबू को मैं बिलकुल छुटकारा दे दूं, सारा काम आपको सौंप दूं। और अभी अगर सौंप दूं तो सारा काम बंद हो जाएगा। यह मैं जानता हूं, हिसाब आपका बिलकुल साफ रहेगा। तो मेरे लिए हिसाब से काम बड़ी चीज है। और आपको ऐसा लगता है कभी कि हिसाब बहुत बड़ी चीज है। हिसाब-विसाब का क्या मतलब है? वह हो गया और नहीं हुआ तो भी क्या होने वाला है! आखिरी हिसाब में हिसाब की कोई कीमत नहीं रह जाएगी। काम का सवाल है कि वह काम कैसे बड़ा हो।
तो यह सब जो आपकी बात मैं सुनता हूं उससे मुझे जो हैरानी होती है वह यह होती है कि वह सारी एप्रोच निगेटिव है, पाजिटिव नहीं है। क्या-क्या गलती हो रही है उसकी बहुत चिंता मत करिए, जहां जितना बड़ा काम होता है वहां उतनी बड़ी गलती होती है।
अगर अमरीका में किसी आदमी को सबसे ज्यादा गालियां मिलती हैं तो वह कोई चोर या बदमाश को नहीं मिल रहीं, वह राष्ट्रपति को, निक्सन को मिलेंगी। वह कोई हत्यारे को नहीं मिलने वाली हैं। अगर सबसे ज्यादा बदनामी होती है तो वह राष्ट्रपति की होने वाली है, वह कोई बदमाशों की नहीं होने वाली बदनामी। इस खयाल में मत रहना कि बदनामी बदमाश की होती है। बदमाश को कौन पूछता है! उसकी बदनामी करने की जरूरत किसको है! तो उसका कारण यह होता है कि जो काम करने जाएगा वह झंझटों में तो खड़ा होने ही वाला है। प्रॉब्लम्स खड़े ही हुए हैं, वह किसी की बपौती थोड़े ही है, प्रॉब्लम्स तो चारों तरफ खड़े ही हुए हैं। अब कोई वियतनाम निक्सन थोड़े ही पैदा कर लेता है। वियतनाम तो खड़ा ही हुआ है पहले से। अब वह निक्सन फंसेगा उसमें। वह कुछ भी करेगा, फंसेगा। क्योंकि दुनिया डिवाइडेड है, अगर वह अ करेगा तो ब उसके खिलाफ है, अगर वह ब करेगा तो अ उसके खिलाफ है। इस भ्रांति में पड़ना ही नहीं चाहिए किसी व्यक्ति को कि वह कोई आलोचना से बच जाएगा। काम करना है तो आलोचना होगी। एक ही उपाय है, आलोचना से बचना हो तो कुछ भी नहीं करना चाहिए। फिर आपकी कोई आलोचना नहीं कर सकता। तो इस प्रसन्नता में कभी नहीं रहना चाहिए कि मेरी कोई आलोचना नहीं कर रहा है। उसका मतलब केवल यह है कि आप बिलकुल बेकार आदमी हैं, और कोई मतलब नहीं है। यानी कोई आलोचना योग्य पा ही नहीं रहा, मामला ही कुछ नहीं पकड़ में आ रहा--क्योंकि आप कुछ हिलाएं-डुलाएं तो कुछ गलती हो, कुछ भूल-चूक हो, कुछ हो।
तो पाजिटिव थोड़ी सी फिकर करें। और काम के नये आयाम खोजें।
और यह भी मैं जानता हूं कि आलोचना और उस सबके पीछे एक और बुनियादी साइकोलॉजिकल कारण है। और वह यह है कि जब एक व्यक्ति, दो व्यक्ति काम करते हैं, तो बाकी व्यक्ति फ्रस्ट्रेट होते हैं, उनके पास कोई काम नहीं होता। काम करने की भी सहज आकांक्षा है, स्वाभाविक है और अच्छी है। अब अगर ईश्वर बाबू सारा काम कर रहे हैं तो ठीक है, अब आनंद भाई क्या करें? या बाबू भाई क्या करें? ठीक है, वे कर रहे हैं। तो उनके पास आलोचना बचेगी। वह भी काम है। पर वे करेंगे क्या?
तो मेरा मानना यह है कि उनको भी काम होना चाहिए। अगर उनको भी आलोचना से रोकना है, व्यर्थ के काम से रोकना है, तो कोई सार्थक काम...। सबके पास क्रिएटिव फोर्सेस हैं, वे उपयोग नहीं हों, पड़ी रहेंगी तो बेकार हो जाएंगी।
तो काम को बढ़ाएं नये डायमेंशंस में। एक कमेटी बनाएं जो कि बंबई में...अलग कमेटी बना दें, उसका जिम्मा इस काम करने वाले ग्रुप पर नहीं हो; आपके बीच से बनाएं, बाहर से नये मित्र लाएं...एक कमेटी बनाएं जो कि एक परमानेंट कैम्पस बंबई में, बंबई के बाहर सोचे, कि कम से कम वीक एंड में दो दिन सौ दो सौ लोग मेरे पास रह सकें नियमित रूप से सदा। तो यह आपका मिलने-जुलने का भी भाव कम हो जाए, परेशानी भी कम हो जाए, यह मामला भी हल हो जाए, लोग थोड़ा ध्यान में भी जा सकें। तो एक कमेटी बनाएं और ऑफर कर लें कि कौन उस कमेटी में जाता है। वह जाने, उससे इसका कुछ लेना-देना नहीं, इस फंड से उसका कुछ लेना-देना नहीं। नया फंड उसको खड़ा करना है, नया ट्रस्ट बनाना है, नई उसको फिकर कर लेनी है। और उसकी सारी व्यवस्था उसको करनी है, इसलिए जो-जो कमी इसमें दिख रही हैं, वह उसे उसमें दिखा देनी है कि यह कमी यहां नहीं रहेगी।
एक सापुतारा कैम्पस बनाना है, तो वह अभी लाख रुपये की उन्होंने बातचीत की, लाख रुपये के प्रॉमिस भी हो गए, तो वह मैंने जयंती भाई से कहा कि आप ही सम्हाल लें। जयंती भाई उसमें रहें, लश्करी जी उसमें रहें, मृदुला बैंकर है, उसने ऑफर किया है, वे तीन उसमें रहें। और दो-चार, जो उनको कोआपरेट करवाना हो उनको करवा लें, या जो ऑफर करें वे उसमें सम्मिलित हो जाएं। वे एक अलग कैम्पस अपना खड़ा कर लें।
एक यहां बंबई के बाहर एक कैम्पस खड़ा कर लें जो वीक एंड में काम आ सके।
अब बाहर से बहुत से मित्र आने शुरू हुए हैं। आपके पास जरूरत पड़ेगी कि एक, कम से कम एक गेस्ट-हाउस जैसा, चाहे उसमें पेड रख सकें आप। बाहर से जो लोग आते हैं उनके लिए इंतजाम कर लें एक। दस-बीस लोग यहां रुकेंगे, नियमित रुके रहेंगे। और वे आपको पीछे बहुत काम पड़ जाने वाले हैं। तो एक गेस्ट-हाउस बना लेना पड़ेगा, उसमें कोई दस-पंद्रह-सोलह लोग रुक सकें। सिर्फ गेस्ट-हाउस में रुक सकें, खाना वे अपना कहीं भी खा लेंगे। वहां जो रुकने का, वे आपको किराया दे देंगे। कोई व्यवस्था उसकी करें, एक कमेटी उसके लिए बना दें, वह अलग अपनी व्यवस्था करे।
पब्लिकेशन में एन.एस.आई. का पब्लिकेशन अलग कर दें। एक नया पब्लिकेशन शुरू कर दें। उसका सारा फंड, उसकी सारी व्यवस्था अलग कमेटी करे। केंद्र बेचेगा, केंद्र को कमीशन मिल जाएगा। आप केंद्र का कुछ बेचेंगे, आपको केंद्र कमीशन दे देगा। बेचने का सारा काम चाहें आप केंद्र को दे दें, लेकिन पब्लिकेशन का और सारी व्यवस्था का और सारे फंड का अपना इंतजाम कर लें। उसमें आप व्यवस्थित हिसाब बना लें कि यह इस तरह हो सकेगा।
यहां वुडलैंड के खर्च की व्यवस्था का सारा इंतजाम, उसकी अलग कमेटी बना दें। वह एक आदमी पर क्यों थोपते चले जाएं? उसकी अलग कमेटी बना दें, वे लोग समझें।
और दो-चार-छह महीने में सारी कमेटियां मिल लें, सारे लोग आपस में बातचीत कर लें--कौन क्या कर रहा है, क्या एक-दूसरे को कोआपरेशन दे सकते हैं कि नहीं दे सकते हैं--वह सारी फिकर कर लें।
पुराने काम को बाद में बांटना शुरू करें, नये काम को ले लें। जैसे मराठी का पब्लिकेशन ले डालें, एक कमेटी अलग कर लें। अंग्रेजी का पब्लिकेशन अभी नया है, उसको अलग कर लें, उसमें कोई ऐसी अड़चन नहीं। धीरे-धीरे सब लैंग्वेज का बांट डालें।
अब काम तो इतने हैं, जैसे कि मैं समझता हूं कि आपको टेप-रिकार्ड्स बेचने शुरू करने चाहिए। वे भी इन्हीं पर थोपते जाते हैं। तो उसका परिणाम क्या होता है कि इतना काम हो जाता है, यानी मैं तो कभी यह देख कर कि ईश्वर बाबू उस सबको कैसे करते हैं!

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

हां, वह जरा हैरानी का काम है! क्योंकि वे अपनी डायरी में कहीं भी नोट कर लेते हैं और सब घोलमेल रहता है और उसमें वे करते रहते हैं। और उसमें तो पच्चीस चीजें हैं।

और पत्र-व्यवहार भी लिखते हैं!

हां, पत्र-व्यवहार! रात एक बजे तक वे अपना पत्र-व्यवहार लिखेंगे, जब तक कि गुणा उन पर बिलकुल सवार नहीं हो जाती कि...
तो कठिनाई होने वाली है। और दयनीय मामला है वह, क्योंकि इतना ज्यादा सिर पर बोझ हो जाता है और फिर आलोचना के सिवाय कुछ मिलता नहीं किसी को।
टेप की एक अलग व्यवस्था कर लें, अलग कमेटी बना दें, जो टेप...क्योंकि टेप धीरे-धीरे आपकी किताबों जैसे ही बिकने लगेंगे। एक अलग पूरा डिपार्टमेंट चाहिए जो टेप ही बनाए और प्रोफेशनल ढंग से बना कर बेचे। तैयार रहने चाहिए। अगर पचास रुपये में बाजार में टेप मिलता है, आप साठ रुपये में दें। दस रुपये आपका प्रोफेशनल टेप करने का और सारी व्यवस्था का खर्च है। बिलकुल तैयार होने चाहिए। ठीक अपनी किताब की दुकान, जहां किताब बिकती है, वहीं अपना टेप भी बिकना चाहिए। हर लेक्चर की सीरीज के इकट्ठे टेप। क्योंकि मैं अगर कम जाऊंगा बाहर, और मैं कम जाऊंगा, तो आपका टेप का सेल जोर से बढ़ जाएगा। जगह-जगह टेपरिकार्डर पर लोग सुन रहे हैं। और हैरानी की बात है, अभी मुझे अमृतसर में खबर दी कि बराबर तीन सौ, साढ़े तीन सौ लोग नियमित हर रविवार को इकट्ठा होकर सुनते हैं। अभी आपकी महावीर वाणी को पांच-पांच सौ, छह-छह सौ लोगों ने पूरे हॉल में पैक होकर सुना। तो सुनने लगेंगे।
टेप का एक अलग डिपार्टमेंट कर दें, वह वे जानें। उसमें कोई रिकार्ड्स बनाने चाहिए। अब तो लांग-प्ले रिकार्ड है, कोई चालीस मिनट की स्पीच उसमें आ सकती है। जो लोग टेप नहीं भी खरीद सकते हैं वे भी डेढ़ सौ रुपये का ग्रामोफोन तो खरीद ही सकते हैं, किसी भी गांव में। लांग-प्ले रिकार्ड्स बना लेने चाहिए, उसका एक अलग इंतजाम कर लेना चाहिए। इस सबको बांटना चाहिए। अब संन्यासी आपके पास हैं, उनको अलग काम बांट देना चाहिए, वे अपना अलग काम कर लें। इसको अगर बांटें तो यह लाखों लोगों तक पहुंच जाएगा और बांटें तो जितने लोग कर सकते हैं उनकी सबकी कैपेसिटी का उपयोग हो जाएगा।
और हजार ढंग सोच सकते हैं। अब यहां तो सारे मित्र हैं, वे जो भी करते हैं अपना काम, उस काम से इस काम के लिए क्या लाभ पहुंच सकता है उसके लिए विचार कर सकते हैं। क्योंकि मेरा मानना ऐसा है कि अगर हमें कोई बड़ा काम करना हो तो उसके परमानेंट सोर्सेज होने चाहिए। रोज-रोज मांगने वाले काम बहुत देर तक नहीं चल पाते। अब सारे लोग इतने समझदार हैं, सोच-विचार वाले हैं, धंधे हैं, व्यवसाय है, इंडस्ट्री है। तो इसको थोड़ा सोचना चाहिए, कि चाहें तो एक गवर्नमेंट से लोन लेकर एक कोई स्माल इंडस्ट्री डाल दें। संन्यासी मैं आपको दे दूंगा, जो सिर्फ खाने और कपड़े पर पूरा का पूरा काम कर लेंगे। आपके लिए दस-बीस-पच्चीस हजार रुपये महीने की स्थायी व्यवस्था हो जाए। कोई एक्सपोर्ट का काम हो, वह आप सोच लें। बंबई से न हो सके, कहीं देहात में बीस संन्यासियों को बिठा कर वह काम करवा दें। आपके पास स्थायी सोर्सेज हो जाने चाहिए।
किताब का सोर्स इतना बड़ा है कि मैं नहीं मानता कि आप अगर सिर्फ उसका ही पूरा उपयोग कर पाएं तो आपको कोई किसी से मांगने की जरूरत रह जाए। किसी से मांगने की जरूरत नहीं रह जाए। कोई कठिनाई नहीं है कि हिंदुस्तान में हम पांच हजार ऐसे ग्राहक, नाम नोट कर लें रजिस्टर्ड, जिनको किताब निकलते से ही प्रेस से चली जानी चाहिए सीधी वी.पी.। पांच हजार का कोई प्रॉब्लम नहीं है। यह कोई प्रॉब्लम ही नहीं है, सिर्फ एप्रोच की बात है कि हम पांच हजार ग्राहक पूरे मुल्क में ऐसे तय कर लें कि जिनका नाम रजिस्टर्ड है, सीधा प्रेस से किताब छपेगी और वी.पी. से उनको चली जाएगी। और वे बहुत खुश होंगे, क्योंकि इतने परेशान हैं कि लिखते हैं: किताब नहीं मिलती; पूछते हैं, महीनों लग जाते हैं। उनको खुशी होगी कि सीधा प्रेस से उनको किताब मिल जाए। नई किताब छपे, आप दस हजार से कोई किताब कम मत छापें, पांच हजार किताबें सीधी प्रेस से चली जाएं, आपका सारा पैसा लौट आता है। अब पांच हजार आप चुपचाप बेचते रहें, कोई प्रॉब्लम नहीं है।
चौगुने आप दाम रखते हैं किताब के। अगर पांच हजार की किताब आप छापते हैं, तो सारा चालीस परसेंट कमीशन दें तो भी आपको उसमें पांच हजार बचने ही हैं, सारा खर्च-वर्च मिटा कर। अगर आप साल में बीस किताब छापते हैं तो आपको लाख रुपया तो ऐसे सहज आ जाता है। इसमें कोई सवाल नहीं है। ये बीस किताबें धीरे-धीरे सब लैंग्वेजेज में छाप लेनी हैं। और इसका, जो मैं मानता हूं बाबू भाई, इसको ठीक प्रोफेशनल ढंग से किताब को व्यवस्था देनी है। इसका ठीक एडवरटाइजमेंट पर खर्च करें, जैसा आप अपनी और कोई चीज के पैदावार पर खर्च करते हैं।
और आपके खयाल में नहीं है, क्योंकि हिंदुस्तान में कोई किताब आप छाप कर तीन हजार किताब पांच साल में भी नहीं बेच सकते हैं। कोई बड़े से बड़ा पब्लिशर नहीं बेच पाता है। और आप तीन हजार किताब दो महीने में बेच लेते हैं। और अव्यवस्थित है सब। मैं बड़े से बड़े पब्लिशर से बात किया, वे कहते हैं, यह मुश्किल मामला है। क्योंकि तीन हजार किताब बिक जाए पांच साल में एक एडीशन, तो बड़ी बात है। हिंदुस्तान में पढ़ता कौन है! आप दो महीने में बेच लेते हैं। आपकी किताब छप कर प्रेस से आती है और आपको महीने भर में लिखना शुरू करना पड़ता है कि वह किताब खतम हो गई। पांच-सात किताबें हमेशा आउट ऑफ प्रिंट आपकी पड़ी रहती हैं। और उनके ग्राहक रोज लिख रहे हैं आपको कि वह हमें किताब चाहिए।
इसको तो बिलकुल प्रोफेशनल कर देना चाहिए, जैसा कि पब्लिशर करता है। इसको बिलकुल प्रोफेशनल ढंग से व्यवस्थित कर दें। आपको हर हालत में पांच लाख रुपये साल किताब से मिल सकते हैं, अगर आप उसको प्रोफेशनल ढंग से व्यवस्थित करें।
फिर उसका ठीक एडवरटाइजमेंट करें, उसके एडवरटाइजमेंट पर खर्च करें। क्योंकि आज की जो सारी की सारी व्यवस्था है, आप अपने धंधे में जैसा सोच कर चलते हैं, ठीक वैसा उसके लिए सोचें। अगर आप पांच हजार किताब पर खर्च करते हैं, तो आपको हजार रुपये किताब के विज्ञापन पर खर्च करना चाहिए। और सारे मुल्क में विज्ञापन चलते ही रहने चाहिए। कोई भी कारण नहीं है कि दस लाख रुपये की किताब आप हर साल में न बेचें, कोई कारण ही नहीं है, बिना किसी दिक्कत के।
और जल्दी ही बाहर की लैंग्वेजेज में किताबें पब्लिश हो जाएंगी। तो आपको खयाल में नहीं है कि हिंदुस्तान से अगर कोई भी चीज ज्यादा से ज्यादा पैसे पश्चिम से ला सकती है तो वह किताब है। क्योंकि पश्चिम में कोई भी किताब पचास रुपये से कम में तो मुश्किल हो जाती है। दो सौ, ढाई सौ पन्ने की किताब है, तो चालीस-पचास रुपये दाम हो जाएंगे। आप उसको यहां इतने सस्ते में छाप लेते हैं, क्योंकि लेबर का तो कोई चार्जेज ही नहीं है। अगर एक दफा पश्चिम में आप किताब के लिए मार्केट खोज लेते हैं, तो आप फिकर छोड़ दें कि कौन आपसे क्या कह रहा है, आपको जाने की जरूरत नहीं है। वह आपके पास देने आए तो भी आप सोचें कि लेना इससे कि नहीं लेना। और पश्चिम में मार्केट खोजने में कोई कठिनाई नहीं है। क्योंकि बिलकुल सड़ी और व्यर्थ की किताबें योग और धर्म के नाम पर पश्चिम में खप रही हैं, जिनका कोई भी मूल्य नहीं है, जिनका कोई मतलब नहीं है।
इसको थोड़ा व्यवस्थित करें और इस सबकी कमेटी बांटें। जैसे समझ लें कि बाहर का मामला है, एक अलग कमेटी बना दें कि हिंदुस्तान से बाहर के लिए जो भी पब्लिकेशन का इंतजाम करना हो वह कमेटी करेगी। इसको क्यों थोपना इनके ऊपर? वह कांटेक्ट बनाए, वहां पब्लिशर्स को लिखे। अब हमारे संन्यासी भी बाहर हैं, वे आपके सहयोगी हो जाएंगे। किताब छापें यहां, पश्चिम में बेचें। पांच रुपये में यहां वह किताब बनती है, पश्चिम में वह पचास रुपये में बिकती है। और मैं तो मानता हूं कि न केवल यह, बल्कि आपका अगर ठीक से व्यवस्थित हो जाए तो कुछ किताबें ऐसी, जो मेरी भी नहीं हैं, लेकिन मैं मानता हूं कि साधक के लिए उपयोगी हो जाएंगी, उनको भी हम छापें और पश्चिम में बेचें। वह भी आपके लिए काफी उपयोग की बात हो जाएगी। पश्चिम में तो टेप मजे से बिक सकते हैं, कोई अड़चन नहीं है।
इसके लिए अलग कमेटी बना लें, हिंदुस्तान के बाहर के काम के लिए अलग कमेटी बना लें, जो उसकी ही फिकर में लगे और उसका लिखना-पढ़ना, कॉरेस्पांडेंस, वह सारा उपयोग करे। इस सबके लिए ऑफर कर दें, एक दफा मीटिंग बुला लें सारे मित्रों की और ऑफर कर लें कि कौन इस काम को लेना चाहता है, वह ले ले और उसको सम्हाले।
एक दफा जब आप अपनी प्रतिभा दिखा पाएं किसी नये काम में तो मैं किसी पुराने काम को भी ईश्वर बाबू को कहूं कि भई यह काम फलां व्यक्ति को सौंप दें, तो कोई अड़चन तो किसी को है नहीं सौंपने में। लेकिन अभी अड़चन यह है कि किसको सौंप देना है? और जिसको सौंप देंगे वह कर पाएगा कि नहीं कर पाएगा? जहां तक मेरा मानना है कि करने वाला कुछ न कुछ करने में लग जाता है बहुत जल्दी। तो कुछ भी करने के लिए चुन लें और उसमें लग जाएं।
अब कैंप का मामला है, वह अलग कमेटी रख दें। कैंप की कोई बात ही नहीं उठाएं फिर। वह कमेटी सम्हालेगी, कहीं भी कैंप हो, कुछ भी हो। और चूंकि अब तो मैं ज्यादा देर यहां रुकूंगा, तो बंबई के पास ही ज्यादा से ज्यादा कैंप लेने का है। पीछे तो मेरा खयाल है कि अपने को साल में तीन या चार कैंप फिक्स्ड कर देने चाहिए, तारीख भी, स्थान भी, सदा के लिए। तो लोगों को पता ही है कि उस तारीख में फलां जगह कैंप होगा ही। लोग बिना पूछताछ किए भी सीधे आ जाएंगे तो अड़चन नहीं होगी। वह एक कमेटी अलग कर दें। मीटिंग्स आपको अब रखनी पड़ती हैं साल में चार-छह, उसकी अलग कमेटी कर दें। और फिर इसमें दखलंदाजी बिलकुल नहीं। और हर कमेटी अपने फंड की फिकर करे।
कठिनाई वहां से शुरू होती है कि आप काम भी चाहते हैं, साथ में उसका फंड भी ले लेना चाहते हैं। तब आप अड़चन में डाल देते हैं और अड़चन में पड़ जाते हैं। और इसीलिए वह काम नहीं छूट रहा है। जो कठिनाई मुझे समझ में आती है, ईश्वर बाबू को आप सब कहते हैं कि काम बांट दें, उनकी तकलीफ यह है कि काम तो बांट देने में कौन सी तकलीफ है, लेकिन काम के पीछे आप फौरन कहते हैं कि इसके लिए फंड! वह तो है नहीं देने को। तो फंड नहीं बांटते इसलिए काम भी नहीं बंटता फिर, वह काम भी अटक जाता है। जैसे अगर आपको कहें कि आप मराठी के पब्लिकेशन को आप सम्हाल लें, तो आप कहते हैं कि इसका फंड दो! फंड उन पर ही नहीं है, तो वे फंड कहां से दे दें! इसलिए वह बात वहीं अटक कर रह जाती है।
काम ले लें, फंड की बात न करें, फंड अपना व्यवस्थित करना शुरू करें। और फिर जिनके पास आप जाते हैं उनको कहें कि अब यह काम मैं कर रहा हूं और फंड मैं ले रहा हूं और आपको सारा हिसाब मैं पूरा बना कर दूंगा। इसलिए अब यह हम शर्त से लेते हैं आपसे कि हिसाब आपको पूरा दिया जाएगा, इसका कोई हिसाब गड़बड़ नहीं होगा।
और मैं भी मानता हूं कि आप हिम्मत से कह भी सकते हैं जब काम आपके हाथ में है। काम ही आपके हाथ में नहीं है, हिसाब कोई रखता है, काम कोई रखता है, पैसा लेने आप जाते हैं, तो आप क्या जवाब दें! आपको कुछ पता भी नहीं होता।
तो उसको ऐसा कर लें। इसमें मुझे कोई बहुत अड़चन नहीं दिखाई पड़ती है। और बढ़ते काम में अड़चनें बिलकुल स्वाभाविक हैं। और काम इतना बड़ा हो जाएगा कि दो साल में आपकी कल्पना में नहीं हो सकता, उतना बड़ा हो जाएगा। तो छोटी-छोटी बातों में मत पड़े रहें उसके बड़े होने में लग जाएं। मुझे कोई पाजिटिव ऐसी कोई झंझट नहीं दिखाई पड़ती है कि कोई उलझाव है या कोई बड़ी तकलीफ है।

तो इस भांति थोड़ा सा सोचें।
बस।
(समाप्त)