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बुधवार, 19 अप्रैल 2017

अनंत की पुकार—(अहमदाबाद)-प्रवचन-01

अनंत की पुकार(अहमदाबाद)

ओशो

प्रवचन-पहला-(ध्यान-केंद्र की भूमिका)

मेरे प्रिय आत्मन्!
कुछ बहुत जरूरी बातों पर विचार करने को हम यहां इकट्ठा हुए हैं। मेरे खयाल में नहीं थी यह बात कि जो मैं कह रहा हूं एक-एक व्यक्ति से, उसके प्रचार की भी कभी कोई जरूरत पड़ेगी। इस संबंध में सोचा भी नहीं था। मुझे जो आनंदपूर्ण प्रतीत होता है और लगता है कि किसी के काम आ सकेगा, वह मैं लोगों से, अब मेरी जितनी सामर्थ्य और शक्ति है उतना कहता हूं। लेकिन जैसे-जैसे मुझे ज्ञात हुआ और सैकड़ों लोगों के संपर्क में आने का मौका मिला, तो मुझे यह दिखाई पड़ना शुरू हुआ कि मेरी सीमाएं हैं; और मैं कितना ही चाहूं तो भी उन सारे लोगों तक अपनी बात नहीं पहुंचा सकता हूं जिनको उसकी जरूरत है। और जरूरत बहुत है, और बहुत लोगों को है। पूरा देश ही, पूरी पृथ्वी ही कुछ बातों के लिए अत्यंत गहरे रूप से प्यासी और पीड़ित है।

पूरी पृथ्वी को छोड़ भी दें तो इस देश में भी एक आध्यात्मिक संकट की, एक स्प्रिचुअल क्राइसिस की स्थिति है। पुराने सारे मूल्य खंडित हो गए हैं। पुराने सारे मूल्यों का आदर और सम्मान विलीन हो गया है। नये किसी मूल्य की कोई स्थापना नहीं हो सकी है। आदमी बिलकुल ऐसे खड़ा है जैसे उसे पता ही न हो--वह कहां जाए और क्या करे? ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि मनुष्य का मन बहुत अशांत, बहुत पीड़ित, बहुत दुखी हो जाए।
एक-एक आदमी के पास इतना दुख है कि काश हम उसे खोल कर देख सकें उसके हृदय को, तो हम घबड़ा जाएंगे। जितने लोगों से मेरा संपर्क बढ़ा उतना ही मैं हैरान हुआ! आदमी जैसा ऊपर से दिखाई पड़ता है, उससे ठीक उलटा उसके भीतर है। उसकी मुस्कुराहटें झूठी हैं, उसकी खुशी झूठी है, उसके मनोरंजन झूठे हैं; और उसके भीतर बहुत गहरा नरक, बहुत अंधेरा, बहुत दुख और पीड़ा भरी है।
इस पीड़ा को, इस दुख को मिटाने के रास्ते हैं; इससे मुक्त हुआ जा सकता है। आदमी का जीवन एक स्वर्ग की शांति का और संगीत का जीवन बन सकता है। और जब से मुझे ऐसा लगना शुरू हुआ, तो ऐसा प्रतीत हुआ कि जो बात मनुष्य के जीवन को शांति की दिशा में ले जा सकती है, अगर उसे हम उन लोगों तक नहीं पहुंचा देते जिन्हें उसकी जरूरत है, तो हम एक तरह के अपराधी हैं, हम भी जाने-अनजाने कोई पाप कर रहे हैं। मुझे लगने लगा कि अधिकतम लोगों तक, कोई बात उनके जीवन को बदल सकती हो, तो उसे पहुंचा देना जरूरी है।
लेकिन मेरी सीमाएं हैं, मेरी सामर्थ्य है, मेरी शक्ति है, उसके बाहर वह नहीं किया जा सकता। मैं अकेला जितना दौड़ सकता हूं, जितने लोगों तक पहुंच सकता हूं, वे चाहे कितने ही अधिक हों, फिर भी इस वृहत जीवन और समाज को और इसके गहरे दुखों को देखते हुए उनका कोई भी परिमाण नहीं है। एक समुद्र के किनारे हम छोटा-मोटा रंग घोल दें, कोई एकाध छोटी-मोटी लहर रंगीन हो जाए, इससे समुद्र के जीवन में कोई फर्क नहीं पड़ सकता है। और बड़ा मजा यह है कि वह एक छोटी सी जो लहर थोड़ी सी रंगीन भी हो जाएगी, वह भी उस बड़े समुद्र में थोड़ी देर में खो जाने को है, उसका रंग भी खो जाने को है।
तो कैसे जीवन के इस बड़े सागर में दूर-दूर तक शांति के रंग फेंके जा सकें, उस संबंध में ही विचार करने को हम यहां इकट्ठे हुए हैं।
इसके साथ ही यह भी मुझे दिखाई पड़ता है कि जो आदमी केवल अपनी ही शांति में उत्सुक हो जाता है, वह आदमी कभी पूरे अर्थों में शांत नहीं हो सकता है। क्योंकि अशांत होने का एक कारण यह भी है--केवल अपने आप में ही उत्सुक होना। मात्र अपने में ही उत्सुक होना, सेल्फ-सेंटर्ड होना भी अशांति के बुनियादी कारणों में से एक है। जो आदमी सिर्फ खुद में ही उत्सुक हो जाता है, सिर्फ स्वयं में ही उत्सुक हो जाता है और चारों तरफ से आंख बंद कर लेना चाहता है, वह आदमी वैसा ही है जैसे कोई एक आदमी एक खूबसूरत सुंदर घर बनाए और इसकी फिकर ही न करे कि उसके घर के चारों तरफ गंदगी के ढेर लगे हुए हैं; वह अपने घर में एक बगिया लगा ले और इसकी फिकर ही न करे कि चारों तरफ दुर्गंध इकट्ठी हो गई है। उसकी बगिया, उसके फूल, उसकी सुगंध बहुत काम नहीं आएंगे, अगर चारों तरफ का सारा पड़ोस गंदा है। तो वह गंदगी उसके घर प्रवेश करेगी, उसके फूलों की सुगंध को भी डुबा देगी।
मनुष्य को न केवल अपने में, बल्कि अपने पड़ोस में भी उत्सुक होना जरूरी है।
धार्मिक व्यक्ति मात्र अपने में ही उत्सुक नहीं होता, बल्कि शेष सारे जीवन के प्रति भी आतुर होता है।
यह भी मुझे प्रतीत होता है कि हम अपनी ही शांति के लिए उत्सुक हों, यह पर्याप्त नहीं है। हमारे चारों तरफ जो जीवन है, जिससे हम अंतर्संबंधित हैं, जिससे हम जुड़े हैं, उस जीवन में भी शांति की कोई हवाएं पहुंच सकें, इसके लिए भी हमारी उत्सुकता जरूरी है। और जो व्यक्ति अपने चारों तरफ के जीवन को भी शांति की दिशा में ले जाने के लिए प्यासा हो जाएगा, वह पाएगा कि चाहे वह दूसरों को शांत कर पाया हो या न कर पाया हो, लेकिन दूसरों को शांत करने के महत्वपूर्ण प्रयास में वह स्वयं जरूर ही शांत हुआ है।
बुद्ध के जीवन में उल्लेख है। शायद काल्पनिक ही कथा होगी, लेकिन बहुत मधुर है। बुद्ध का निर्वाण हुआ, वे मोक्ष के द्वार पर पहुंच गए, द्वारपाल ने द्वार खोल दिए, लेकिन बुद्ध पीठ करके द्वार की तरफ खड़े हो गए। द्वारपाल ने पूछा, आप पीठ करते हैं मोक्ष की तरफ?
बुद्ध ने कहा, मेरे पीछे बहुत लोग हैं, जब तक वे भी मोक्ष में प्रविष्ट नहीं हो जाते, तब तक मैं अकेला मोक्ष में प्रविष्ट हो जाऊं? इतना कठोर, इतना क्रूर, इतना हिंसक मैं नहीं हूं। मैं रुकूंगा, प्रतीक्षा करूंगा, बहुत लोग हैं। मेरा शांत मन तो यही कहता है कि मैं अंतिम आदमी ही होऊंगा मोक्ष में प्रवेश करने वाला, पहले सारे लोग प्रविष्ट हो जाएं।
बड़ी मीठी कथा है। वह कथा कहती है, बुद्ध अब भी मोक्ष के द्वार पर ही रुके हैं, ताकि सारे लोग मोक्ष में प्रविष्ट हो जाएं। वे अंतिम ही प्रविष्ट होना चाहते हैं।
जिस हृदय में ऐसा भाव उठा हो, उसे मोक्ष उपलब्ध ही हो गया, उसे किसी मोक्ष में प्रविष्ट होने की कोई जरूरत नहीं है। उसके लिए सब मोक्ष फीके हो गए, वह मोक्ष में पहुंच ही गया, जिसके हृदय में ऐसा करुणा का भाव उठा हो। शांत केवल वे ही हो पाते हैं, जिनके जीवन में चारों तरफ शांति पहुंचाने की प्रबल प्रेरणा काम करने लगती है।
यह भी मेरे खयाल में आता है कि जो मित्र इस दिशा में उत्सुक हुए हैं वे केवल अपने में ही उत्सुक न हों, और सबमें भी उत्सुक हो जाएं। उनकी यह उत्सुकता दूसरों के लिए हितकर होगी ही; न भी हुई तो भी उनके स्वयं के लिए बहुत अर्थपूर्ण होगी, बहुत-बहुत गहरे शांति में और आनंद में उन्हें प्रविष्ट करने में सहयोगी होगी। क्योंकि अशांति का एक कारण है: स्वयं में केंद्रित हो जाना। और जो इस केंद्र को बिखेर देता है वह शांत होने की दिशा में गतिशील हो जाता है।
तो यह बात कहने के लिए, यहां इस बात के संबंध में विचार करने के लिए हम इकट्ठे हुए हैं कि मैं आपसे यह कह सकूं कि किन रास्तों से अधिकतम लोगों तक प्रेम की, शांति की और करुणा की बात पहुंचाई जा सकती है। क्या उपाय खोजें कि वह बात पहुंच सके। क्या रास्ता हो सकता है।
यह कोई प्रोपेगेंडा नहीं है। यह कोई संप्रदाय खड़ा करना नहीं है। यह कोई आर्गनाइजेशन, कोई संगठन खड़ा करना नहीं है। कोई ऐसा केंद्र खड़ा नहीं करना है जो शक्तिशाली हो जाए। बल्कि इस भांति सब तक कोई बात पहुंचा देनी है, बिना संगठन के, बिना संप्रदाय के, बिना आर्गनाइजेशन के, बिना किसी केंद्रित शक्ति को बनाए हुए। और इसलिए बहुत विचार करने की जरूरत है।
अगर एक संप्रदाय बनाना हो तो बहुत विचार करने की जरूरत नहीं रह जाती। अगर एक संगठन खड़ा करना हो तो कोई बहुत विचार करने की जरूरत नहीं रह जाती। दुनिया में संगठन बनाने के नियम सबको पता हैं, संप्रदाय खड़े करने की तरकीबें सबको पता हैं। हजारों संप्रदाय खड़े हो चुके हैं। उन संप्रदायों में एक संप्रदाय खड़ा नहीं कर देना है। इसलिए बहुत विचार करने की जरूरत है कि संप्रदाय भी खड़ा न हो, कोई संगठन भी खड़ा न हो, और जो बात हमें प्रीतिकर लगे, आनंदपूर्ण लगे, उस बात को हम सब तक पहुंचा भी सकें। प्रोपेगेंडिस्ट भी हम न हों और प्रचार भी हम कर सकें। इसलिए बहुत डेलिकेट, बहुत महीन और बहुत सूक्ष्मता से विचार करने की जरूरत है। खाई और कुएं के बीच चलने जैसा है।
एक तो यह है कि हम कोई प्रचार ही न करें, क्योंकि खतरा है कि संप्रदाय न बन जाए। इसका मतलब है कि हम बात ही न पहुंचाएं किसी तक। दूसरा यह है कि हम बात पहुंचाएं, तो संप्रदाय बना लें। वह भी खतरा है। बात तो पहुंचानी है सब तक, लेकिन संप्रदाय न बन पाए, यह ध्यान रखना अत्यंत जरूरी है।
तो कैसे यह बात बिना प्रचार के प्रचार हो सके; बिना संप्रदाय के, बिना संगठन के अधिकतम लोगों तक, जो जरूरी है वह खबर, वह सूचना, वह संदेश उन तक पहुंचाया जा सके, इस संबंध में विचार करने को यहां आपको आमंत्रित किया है।
मुझे कुछ जो बातें दिखाई पड़ती हैं वे इन आने वाली बैठकों में मैं आपसे धीरे-धीरे कहूंगा और आपसे भी आशा करूंगा कि आप सोचेंगे इस दिशा में। कुछ बातें प्राथमिक रूप से मैं आज आपसे कहूं, जिन पर आप विचार कर सकें।
पहली बात, जितना बड़ा संदेश है उतना बड़ा हमारे पास आज मित्रों का कोई समूह नहीं है। संगठन चाहिए भी नहीं; सिर्फ समूह चाहिए। और समूह और संगठन का फर्क खयाल में होना चाहिए। समूह का मतलब होता है, प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है वहां। अपनी आजादी से आया है और अपनी आजादी से अलग हो सकता है। समूह का मतलब है, प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के बराबर है, कोई नीचा और ऊंचा नहीं है, कोई पदाधिकारी नहीं है, कोई अनुयायी नहीं है, कोई नेता नहीं है--समूह का अर्थ है। मित्रों का एक समूह बनाना है, एक संगठन नहीं। क्योंकि संगठन में फिर पदाधिकारी होते हैं, ऊपर-नीचे आदमी होते हैं, और संगठन का अपना एक जाल होता है, एक हायरेरकी होती है, नीचे से ऊपर तक सीढ़ियां और पद होते हैं। और फिर उनके साथ आई हुई पॉलिटिक्स होती है, राजनीति होती है। क्योंकि जहां पद हैं वहां राजनीति आनी अनिवार्य है। जो पदों पर होते हैं वे भयभीत हो जाते हैं कि उन्हें कोई पदों से अलग न कर दे। जो पद पर नहीं होते वे उत्सुक होते हैं कि हम पद पर कैसे पहुंच जाएं। तो एक अपना उपद्रव है संगठन का।
हमें एक मित्रों का समूह बनाना है, कोई संगठन नहीं बनाना है।
समूह में प्रत्येक व्यक्ति बराबर है, समान मूल्य का है। कोई पदाधिकारी नहीं है, कोई आदृत नहीं है, कोई नीचा नहीं है, कोई ऊंचा नहीं है। और प्रत्येक व्यक्ति सिर्फ अपने प्रेम के कारण वहां आया है। प्रेम के अतिरिक्त उसके ऊपर न कोई आदेश हैं जिन्हें उसे मानना है, न कोई प्रतिज्ञाएं हैं जिन्हें उसे पूरी करना है, न कोई व्रत-नियम हैं जिनके अंतर्गत उसे बंधना है। सिर्फ उसके प्रेम और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से सम्मिलित हुआ है वह, और जिस क्षण चाहे उसी क्षण अलग हो जा सकता है। और जब वह सम्मिलित भी है तब भी वह किसी एक डॉग्मा, किसी एक सिद्धांत से बंधा हुआ नहीं है। तब भी वह स्वतंत्र है भिन्न मत रखने को, अपना विचार रखने को, अपने विचार को मानने को, अपनी बुद्धि का अनुसरण करने को। वह किसी का अनुयायी होकर वहां नहीं है।
तो मित्रों का एक समूह जीवन जागृति केंद्र बन सके, इस दिशा में सोचना है।
निश्चित ही, मित्रों के समूह बनाने के नियम अलग होते हैं, संगठन बनाने के नियम अलग होते हैं। मित्रों का समूह एक बिलकुल ही जिसको हम कहें अराजक, अनार्किक संस्था होती है। संगठन एक सुव्यवस्थित, बंधी हुई नियमों से, सिद्धांतों से, कानूनों से बंधी हुई व्यवस्था होती है। मेरी कोई मर्जी कोई कानूनों में बहुत, नियमों में, सिद्धांतों में बांधने की नहीं है। क्योंकि उन्हीं सबके खिलाफ मैं लड़ रहा हूं। उन्हीं सबके तो संगठन सारी दुनिया में खड़े हुए हैं। हम एक और संगठन वैसा खड़ा कर दें!
निश्चित ही संगठन में ज्यादा एफिशिएंसी होती है, ज्यादा कुशलता होती है। उतनी समूह में कुशलता नहीं हो सकती। लेकिन कुशलता के मूल्य पर स्वतंत्रता खोना बहुत कीमती सौदा करना है। लोकतंत्र उतना कुशल नहीं होता जितनी तानाशाही होती है। लेकिन कुशलता को खोया जा सकता है, स्वतंत्रता को नहीं खोया जा सकता है।
मित्रों के समूह का अर्थ है कि यह स्वतंत्र व्यक्तियों का मिलन है उनकी स्वेच्छा से। इसमें यदि कोई छोटे-मोटे कानून और व्यवस्थाएं होंगी, तो वे भी व्यक्तियों से नीचे होंगी, उनके ऊपर नहीं हो सकती हैं। वे कामचलाऊ होंगी, वे हमारा लक्ष्य नहीं हो सकती हैं। हम उन्हें किसी भी क्षण तोड़ने के लिए हमेशा स्वतंत्र हैं। वे किसी भी क्षण हमें तोड़ने में समर्थ नहीं हो सकती हैं। वे कानून भी होंगे तो वे हमारे लिए होंगे, हम कानून के लिए नहीं हो सकते हैं, यह ध्यान में रख लेना जरूरी है।
अब मित्र सोचते हैं कोई विधान हो।
निश्चित ही कोई विधान होना चाहिए। लेकिन जैसे विधान होते हैं संगठनों के वैसे नहीं। यह ध्यान में रख कर ही विधान होना चाहिए कि वह मित्रों के एक समूह का विधान है जो अत्यंत कामचलाऊ है। उसका उपयोग है इसलिए उसको बना लिया है, लेकिन उससे बंधने का कोई हमारा आग्रह नहीं है। उसे हम किसी भी क्षण फेंक सकते हैं और जला सकते हैं। और विधान चाहे कितना भी कीमती हो, उस विधान से हमारा एक-एक मित्र ज्यादा कीमती है, यह ध्यान में होना जरूरी है। क्योंकि इन्हीं मित्रों के लिए वह विधान बनाया गया है, उस विधान के लिए ये मित्र इकट्ठे नहीं किए गए हैं। इसलिए एक-एक व्यक्ति का मूल्य और एक-एक व्यक्ति की गरिमा शेष रह सके, ऐसा एक समूह खड़ा करना है।
निश्चित ही जितने अधिक व्यक्ति होंगे उतने भिन्न चित्त, उतने भिन्न विचार, उतने भिन्न उनके सोचने-समझने के ढंग होंगे। जितना बड़ा समूह होगा मित्रों का उतनी ही विभिन्नता स्वाभाविक है। इसलिए एकरूपता पैदा करने की बहुत चेष्टा हमें नहीं करनी चाहिए, अन्यथा फिर संगठन खड़ा होना शुरू हो जाता है। और एकरूपता की जितनी हम कोशिश करते हैं उतना ही व्यक्तित्व, उसकी गरिमा, उसकी स्वतंत्रता, सब नष्ट होनी शुरू हो जाती है।
एकरूपता की बहुत चिंता नहीं, बल्कि सब मित्रों के प्रति सम्मान, उनके भिन्न विचारों के प्रति भी। क्योंकि मेरी सारी दृष्टि यही है कि सारे मुल्क में स्वतंत्र चिंतन पैदा हो सके। तो स्वतंत्र चिंतन जो लोग पैदा करना चाहते हैं, अगर वे भीतर ही परतंत्र चिंतन से बंध जाएंगे, तो खतरा होगा।
इसलिए मेरे प्रति भी इस मित्रों के समूह की कोई श्रद्धा नहीं होनी चाहिए। मेरे प्रति भी कोई श्रद्धा का भाव नहीं होना चाहिए। मेरे प्रति भी विचार का और विवेक का भाव होना चाहिए। मैं जो कहता हूं, वह ठीक लगता हो, प्रीतिकर मालूम होता हो, उपयोगी मालूम होता हो, तो उसे लोगों तक पहुंचा देना है। मैं कहता हूं इसलिए पहुंचा देना है, ऐसी भूल में नहीं पड़ जाना चाहिए। व्यक्ति के केंद्र पर भी मित्रों का समूह निर्भर नहीं होना चाहिए कि एक व्यक्ति पूजा का केंद्र बन जाए--मैं या कोई भी दूसरा। न हमारी कोई पूजा है, न हम किसी के अनुयायी हैं, न हमारा कोई नेता है। हमें तो सामूहिक रूप से एक विचार, एक संदेश प्रीतिकर लगता है, ऐसा लगता है कि अधिकतम लोगों तक पहुंच जाए तो उनका मंगल होगा, इसलिए हम मित्र इकट्ठे हुए हैं और उसको पहुंचा देना चाहते हैं।
तो पहली बात यह है कि संगठन के संबंध में थोड़ा विचार करेंगे। संगठन हमें नहीं बनाना है, एक मित्रों का समूह भर बनाना है। और इन दोनों के बीच जो बारीक भेद है, वह समझने की कोशिश करेंगे। और हरेक मित्र का यह कर्तव्य होगा कि वह संगठन बनने से बचा सके इस संस्था को। यह मेरे अकेले के हाथ में नहीं है। मैं कह सकता हूं, लेकिन यह मेरे अकेले के हाथ में नहीं है। और बहुत सजग हम न रहे तो यह खतरा है कि यह संगठन बन जाए! बहुत सजग रहने की जरूरत है और बहुत होश से प्रयोग करने की जरूरत है कि यह संगठन न बन जाए! संप्रदाय बनने के कुछ अनजाने रास्ते होते हैं, पता भी नहीं चलता और वह बनना शुरू हो जाता है। तो उस पर ध्यान रखने की जरूरत है। और पूर्व से हम सचेत रहे तो शायद हम वैसी व्यवस्था कर सकें कि वह न बन पाए। एक तो यह विकल्प है।
दूसरा विकल्प यह है कि इस बात से अगर हम डर जाएं कि संगठन न बन जाए, संप्रदाय न बन जाए, इसलिए कुछ करना ही नहीं है, तो दूसरा खतरा शुरू हो जाता है। फिर कुछ करना नहीं है, तो जो बात पहुंचानी है उसे पहुंचाना असंभव है। तब फिर वह मेरे अकेले कंधों पर रह जाती है बात कि मैं जितना दौड़ सकूं उतना लोगों तक पहुंचा दूं। वह मैं करता रहूंगा, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।
लेकिन वही बात बहुत लोगों तक पहुंच सकती है, जितने अधिक मित्रों का सहयोग होगा उतने दूर तक पहुंच सकती है, उतनी सरलता से पहुंच सकती है। और आज इतनी सुविधाएं उपलब्ध की हैं विज्ञान ने, समाज की प्रगति ने कि हम नासमझ होंगे कि उनका उपयोग न कर सकें। हम गलती में होंगे अगर उनका उपयोग न कर सकें। अब जैसे मैं यहां बोल रहा हूं। माइक हम न लगाएं तो भी काम चलेगा, मैं बोलूंगा तो भी शायद आप तक बात पहुंचेगी, लेकिन शायद इतने ठीक से नहीं पहुंच पाएगी। अभी थोड़े हैं तो पहुंच भी जाए, ज्यादा भीड़ होगी तो नहीं पहुंच पाएगी। माइक का हम उपयोग कर रहे हैं तो वह दूर तक पहुंच रही है।
आज तो इतने साधन उपलब्ध हुए हैं कि उन सबका उपयोग किया जाए तो एक व्यक्ति जीवन में उतना काम कर सकता है जितना बुद्ध या महावीर पच्चीस जीवन में भी करना चाहते तो नहीं कर सकते थे। बुद्ध और महावीर की मजबूरी थी, जो उनके पास उपलब्ध थे साधन उनका उपयोग करके जितना उन्होंने श्रम किया वह बहुत है। लेकिन अगर वैसा ही श्रम आज के जमाने में किसी से करवाया जाए तो निपट नासमझी होगी। आज तो बहुत साधन सुलभ हैं, उन सबका उपयोग हो सकता है। और एक आदमी जीवन में इतना काम कर सकता है जिसके लिए अगर वह चार सौ साल जीए और बिना साधन के मेहनत करे तो भी नहीं कर पाएगा।
तो उन सारे साधनों का हम उपयोग कर सकें, इसके लिए विचार करना जरूरी है। यह मेरे अकेले के वश की बात नहीं है, उसके लिए बहुत मित्रों की जरूरत है, बहुत प्रकार के मित्रों की जरूरत है। कोई श्रम कर सकता है, कोई बुद्धि से विचार कर सकता है, कोई धन की व्यवस्था कर सकता है, कोई और तरह के...जो जिसकी सूझ, जो जिसका व्यक्तित्व हो उस तरह से सहयोगी हो सकता है।
यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि यह मित्रों का वर्ग जितना बड़ा हो उतना अच्छा है। क्योंकि उतने ही अधिक तरह के, भिन्न तरह के लोग आएंगे और भिन्न तरह का अनुदान, दान कर सकेंगे। भिन्न तरह की सेवाएं, भिन्न तरह का उनका सहयोग, और काम को ज्यादा समृद्ध बना सकेंगे।
अक्सर यह होता है कि मित्रों की सीमाएं तय हो जाती हैं। अपरिचित लोगों से एक भय होता है मन में, स्ट्रेंजर से थोड़ा भय होता है--कि पता नहीं यह क्या गड़बड़ करेगा भीतर आने पर! तो आमतौर से यह हो जाता है कि दस-पच्चीस मित्र जब कहीं इकट्ठे हो जाते हैं तो वे एक घेरा बना लेते हैं। और फिर नये लोगों को भीतर आने में उनको थोड़ा डर होने लगता है। यह डर होता है कि कहीं यह नया आदमी कोई गड़बड़ न कर दे।
यह डर तो स्वाभाविक है। यह कामना और भावना भी अच्छी है कि नया आदमी कोई गड़बड़ न कर दे। लेकिन एक नये आदमी से पच्चीस पुराने आदमियों का डरना बड़ी कमजोरी की बात है। सोचना यह चाहिए कि एक नये आदमी को हम पच्चीस बदलने की कोशिश करेंगे या एक नया आदमी हम पच्चीस को बदल देगा? और अगर हम पच्चीस इतने कमजोर हैं कि एक नया आदमी बदल देगा, तो बदल ही देना चाहिए, इसमें हर्ज भी क्या है! इसमें बुराई भी क्या है!
हमेशा यह होता है कि जब भी कोई वर्ग इकट्ठे होने शुरू होते हैं तो एक दायरा बन जाता है। फिर उस दायरे के बाहर के आदमी और उनके बीच में एक फासला हो जाता है। अनजाने होता है, कोई जान कर यह नहीं करता है। ये मन के स्वाभाविक नियम हैं। अगर आप किसी अजनबी गांव में चले जाएं और आपके साथ दो-चार मित्र वहां हों, तो शायद आप उस अजनबी गांव में मित्र ही नहीं बनाएंगे। वह दो-चार मित्र के घेरे में ही आप घिरे रह जाएंगे और उससे बाहर नहीं निकलेंगे। मजबूरी आ जाए कि आप अकेले पड़ जाएं तो बात दूसरी है, शायद आपको मित्र बनाना पड़ें, नहीं तो आप मित्र नहीं बनाएंगे।
तो हर समूह सीमित होने की प्रवृत्ति से भरा रहता है। एक टेंडेंसी होती है कि वह सीमित हो जाता है। और सीमा में एक तरह की सुरक्षा, सिक्योरिटी मालूम होती है--सब परिचित हैं, सब ठीक है; जो हमें पसंद है वह सबको पसंद है। कोई अजनबी आदमी भीतर आए, नई बातें कहे, कोई उपद्रव करे।
इसका भय छोड़ देना चाहिए। अगर काम को व्यापक और विराट बनाना हो तो इस बात का भय छोड़ देना चाहिए। फिकर इस बात की करनी चाहिए कि हम इतने एकोमोडेटिव हों, हमारा हृदय इतना विस्तीर्ण हो और बांहें हमारी इतनी दूर तक फैलती हों कि विपरीत से विपरीत व्यक्ति को भी हम धीरे-धीरे समायुक्त कर लेंगे। छोड़ेंगे हम एक को भी नहीं। जो हमसे बिलकुल भिन्न है, उसको भी हम अपने भीतर जगह बना लेंगे, और उसकी उपयोगिता भी खोज लेंगे कि वह हमारे किस काम में आ सके।
गांधीजी ने एक प्रयोग इस संबंध का, पीछे इस मुल्क में एक बड़ा प्रयोग किया। हिंदुस्तान के कितने विरोधी और भिन्न लोगों को उन्होंने एक साथ इकट्ठा कर लिया। एकदम भिन्न लोगों को, जिनके बीच आपस में कोई मतैक्य नहीं हो सकता था; वे लोग भी एक घेरे के भीतर आ गए और किसी विराट कार्य के लिए सहयोगी बन गए।
अगर कोई यह सोचे कि भिन्न मत के, भिन्न दृष्टि के, भिन्न व्यक्तित्व के लोग भीतर न आएं, तो फिर काम बड़ा नहीं हो सकता, बहुत छोटा रह जाएगा। कोई छोटी सी नदी रह जाएगी फिर, अगर वह यह सोचे कि हर दूर से आने वाला नाला और नदी मुझसे न मिले। पता नहीं किन कीचड़ को ले आए! कौन से द्रव्य ले आए! कौन से खनिज ले आए! अच्छा पानी हो कि बुरा हो! अगर ऐसा कोई नदी सोचने लगे तो फिर वह नाला ही रह जाएगी, फिर वह महानद नहीं बन सकती, फिर वह गंगा नहीं बन सकती। और गंगा बनना हो तो उसे सबको समाविष्ट कर ही लेना होगा। और यह सामर्थ्य होनी चाहिए कि सब समाविष्ट हो जाएं। इस संबंध में विचार करना जरूरी है कि हम अधिकतम लोगों को कैसे समाविष्ट कर सकें। हमें जगह बनानी पड़ेगी। भिन्न-भिन्न लोगों को कैसे हम भीतर प्रवेश दे सकें, कैसे उनके लिए काम खोज सकें, कैसे वे भी सहयोगी बन जाएं।
अब मुझे मुल्क में न मालूम कितने लोग आकर कहते हैं कि हम काम में सहयोगी बनना चाहते हैं। न मालूम कितने लोग पत्र लिखते हैं कि हमें कोई काम बताइए, हम काम में सहयोगी बनना चाहते हैं।
वह आपका जिम्मा है कि आप इन सारे मित्रों का उपयोग ले लें। और यह तो भूलें, भूल ही जाएं यह खयाल कि कोई आदमी ऐसा हो सकता है जो किसी काम में ही न आ सके। ऐसा आदमी जमीन पर होता ही नहीं। आदमी तो बहुत दूर हैं, पशु-पक्षी भी सहारे बन जाते हैं, उनका सहारा भी काम बन सकता है। ऐसा तो कोई आदमी है ही नहीं जो किसी न किसी काम का न हो। निकम्मा कोई भी आदमी पृथ्वी पर नहीं है जिससे कुछ काम न लिया जा सके!
तो कोई भी आदमी उत्सुक होता हो, हम उससे क्या काम ले सकते हैं, इसकी हम फिकर करें। अगर हम इस बात की फिकर करें कि वह आदमी ऐसा है, वह आदमी वैसा है, तो फिर बहुत मुश्किल है। फिर अगर हम जांच-जांच कर आदमियों का निर्णय करने बैठेंगे...एक तो हम निर्णायक हो नहीं सकते किसी के; और अगर हम निर्णय करने बैठेंगे तो इसमें काम को कितना धक्का पहुंचेगा, इसकी हम कल्पना ही नहीं कर सकते।
गांधीजी के आश्रम में एक आदमी आता था। और लोगों ने शिकायत की कि यह आदमी बहुत बुरा है, शराब पीता है, फलां करता है, ढिकां करता है। गांधी सुनते रहे। मित्र बहुत परेशान हो गए कि ये गांधी उसको मना नहीं करते हैं, उसको निकट लेते चले जा रहे हैं। और वह आदमी धीरे-धीरे अकड़ कर आश्रम में प्रविष्ट होता है, अब उसका भय भी विलीन हो गया है। एक दिन आखिर लोगों ने आकर कहा--गांधी के बहुत निकट के लोगों ने--कि बहुत हद्द हो गई यह बात, आज हमने उस आदमी को शराबखाने में अपनी आंखों से बैठे देखा है। और आपके खादी के कपड़े पहने हुए वह वहां शराब पीए, यह बहुत बदनामी की बात है। ऐसे आदमी का आश्रम में आना बहुत बुरा है, इससे आश्रम बदनाम होगा।
गांधी ने कहा, हमने आश्रम खोला किसके लिए है? अच्छे लोगों के लिए? तो बुरे लोग कहां जाएंगे? और जो अच्छे ही हैं उनके लिए आश्रम में आने की जरूरत क्या है! मैं हूं किसलिए यहां? किनके लिए हूं? और फिर दूसरी बात यह कि तुम कहते हो कि वह खादी पहने वहां बैठा हुआ है इसलिए लोग क्या सोचेंगे। अगर मैं उसे वहां देखता तो अपने हृदय से लगा लेता। क्योंकि मेरे मन में पहला खयाल यही उठता कि आश्चर्य की बात है, दिखता है मेरी बात लोगों तक पहुंचने लगी, जो आदमी शराब पीता है वह भी खादी पहनना शुरू कर दिया है! तुम यह देख रहे हो कि जो खादी पहने हुए है वह शराब पी रहा है। मैं देखता कि जो शराब पी रहा है उसने भी खादी पहननी शुरू कर दी। तो बहुत देर नहीं है कि यह आदमी शराब भी छोड़ दे। इसमें फर्क होना शुरू हो गया है। इसने हिम्मत तो की है, खादी तो पहनी! इसके मन में प्रेम का तो जन्म हो गया, बदलाहट की शुरुआत हो गई।
अब यह आदमी दोनों तरह से देखा जा सकता है। ऐसे भी देखा जा सकता है कि खादी पहन कर शराब पी रहा है। तब मन होगा कि आश्रम से निकाल कर इसको बाहर करो। और ऐसा भी देखा जा सकता है कि शराब पीने वाला खादी पहने हुए है। तब ऐसा होगा, आश्रम में इसका स्वागत करो।
अगर इस आश्रम को बड़ा बनना है और वृहतजन तक पहुंचना है, तो फिर दूसरी तरह से ही देखना होगा, पहली तरह से नहीं देखना होगा। तब जो भी आदमी हमारे निकट आता है, उसमें क्या अच्छा है, वह किस तरह सहयोगी होता है, इसी भाव से देखना होगा। और मैं आपसे यह भी कह दूं कि जिस आदमी को हम अच्छे भाव से देखना शुरू कर देते हैं, हम उस आदमी को अच्छे होने की तरफ इतना बल देते हैं जिसकी कोई कीमत, कोई हिसाब नहीं लगाया जा सकता।
अगर बीस अच्छे आदमी एक बुरे आदमी को अच्छा मानने की तरफ ध्यान देना शुरू करते हैं, उस आदमी का बुरा होना कठिन और मुश्किल हो जाता है। लेकिन जब सारी दुनिया किसी आदमी को बुरा कहने लगती है, तो बुरे होने की उसे सुविधा हो जाती है। एक आदमी चोर हो और अगर एक आदमी विश्वास कर ले उस पर कि वह चोर नहीं है, उसकी चोरी करने की क्षमता क्षीण हो जाती है। क्योंकि ऐसा कोई भी आदमी नहीं है जो किसी हृदय के अच्छे भाव का आदर न करता हो। अगर एक चोर हमारे बीच आ जाए और हम इतने सारे लोग यह विश्वास कर लें कि वह भला आदमी है, वह आदमी यहां चोरी नहीं कर सकता है। यह कानून के विपरीत ही है, यह असंभव है। क्योंकि इतने लोगों ने जो उसे आदर दिया है इसे ठुकराने के लायक कोई ऐसी चीज नहीं हो सकती जो इससे ज्यादा मूल्यवान हो जिसको चुरा लिया जाए।
एक-एक आदमी के मन में अच्छे होने का भाव है, लेकिन उसे कोई अच्छा माने तब! और जब कोई उसे अच्छा मानने को मिल जाता है तो उसके भीतर क्या जग जाता है, इसका हमें कोई खयाल नहीं।
एक अमरीकी अभिनेत्री ग्रेटागार्बो का नाम आपने सुना होगा। वह यूरोप के एक छोटे से देश में एक गरीब घर में पैदा हुई। और एक बाल बनाने के सैलून में दाढ़ी पर साबुन लगाने का काम करती रही जब तक उन्नीस वर्ष की थी। दो पैसे में दाढ़ी पर साबुन लगाने का काम नाई की दुकान में करती रही। एक अमरीकी यात्री ने--वह उसकी दाढ़ी पर साबुन लगा रही थी--और आईने में उसका चेहरा देखा और कहा कि बहुत सुंदर है! बहुत सुंदर है!
ग्रेटा ने उससे कहा, क्या कहते हैं आप? मुझे आज छह वर्ष हो गए लोगों की दाढ़ी पर साबुन लगाते, किसी ने मुझसे कभी नहीं कहा कि मैं सुंदर हूं। आप कहते क्या हैं? मैं सुंदर हूं?
उस अमरीकन ने कहा, बहुत सुंदर! मैंने बहुत कम इतनी सुंदर स्त्रियां देखी हैं।
ग्रेटागार्बो ने अपनी आत्मकथा में लिखा है: मैं उसी दिन पहली दफा सुंदर हो गई। एक आदमी ने मुझे सुंदर कहा था। मुझे खुद भी खयाल नहीं था। मैं उस दिन घर लौटी और आईने के सामने खड़ी हुई और मुझे पता लगा कि मैं दूसरी औरत हो गई हूं!
वह लड़की जो उन्नीस साल की उम्र तक केवल साबुन लगाने का काम करती रही थी, वह अमरीका की बाद में श्रेष्ठतम अभिनेत्री साबित हुई। और उसने जो धन्यवाद दिया, उसी अमरीकी को दिया, जिसने उसे पहली दफा सुंदर कहा था। उसने कहा कि अगर उस आदमी ने उस दिन वे दो शब्द न कहे होते तो शायद मैं जीवन भर वही साबुन लगाने का काम करती रहती। मुझे खयाल ही नहीं था कि मैं सुंदर भी हूं। और हो सकता है उस आदमी ने बिलकुल ही सहज कहा हो। हो सकता है उस आदमी ने सिर्फ शिष्टाचार में कहा हो। और हो सकता है उस आदमी ने कुछ खयाल ही न किया हो, सोचा भी न हो कि मैं यह क्या कह रहा हूं, बिलकुल कैजुअल रिमार्क रहा हो। और उसे पता भी न हो कि मेरे एक शब्द ने एक स्त्री के भीतर सौंदर्य की प्रतिमा को जन्म दे दिया है। वह जाग गई, उसके भीतर जो चीज सोई थी।
जिन लोगों से काम लेना हो उनके भीतर जो सोया है उसे जगाना जरूरी है। इसलिए वे जो हैं, इस पर ध्यान देने की कम जरूरत है; वे जो हो सकते हैं, इस पर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है; अगर मित्रों से कोई बड़ा काम लेना हो। नहीं तो काम नहीं लिया जा सकता। अगर मैं कभी मित्रों को कहता हूं कि फलां आदमी से काम लो। मुझे बता दिया जाता है कि वह आदमी बुरा है, वह आदमी बेईमान है, या उस आदमी का भरोसा नहीं किया जा सकता।
यह ठीक है कि आदमी बुरा है, आदमी बेईमान है। कौन आदमी बुरा नहीं? कौन आदमी बेईमान नहीं? लेकिन वह आदमी क्या हो सकता है, सवाल यह है। वह क्या है, यह सवाल ही नहीं है। हमें उसके भीतर उसको पुकार लेना है जो वह हो सकता है, अगर उससे कोई बड़ा काम लेना हो।
गांधीजी के आश्रम में कृपलानी भोजन बनाते रहे, रसोइये का काम करते रहे। एक अमरीकी पत्रकार आश्रम में ठहरा हुआ था। उसने पूछा कि यह आदमी जे.बी.कृपलानी मालूम होता है जो खाना बनाता है आपका!
कृपलानी बर्तन साफ करते थे, उन्होंने कहा कि यह जो बूढ़ा है, अदभुत है! असल में मैं रसोइये के योग्य ही था। और इस आदमी ने मेरे भीतर वह जगा दिया जिसका कोई हिसाब नहीं!
छोटे-छोटे आदमी के भीतर जादू घटित हो सकता है। एक दफा हम उसे पुकारें और उसकी आत्मा में जो सोया है उसे निकट लाएं, उस पर विश्वास करें। उसके भीतर जो सोया है उसको आवाज दें, उसको चुनौती खड़ी करें। उसके भीतर बहुत कुछ निकल सकता है। और एक बड़े से बड़े आदमी को हम निराश कर सकते हैं। एक श्रेष्ठतम व्यक्ति को हम कह सकते हैं कि तुम कुछ भी नहीं हो। और अगर दस-पांच दफा सब तरफ से उसे यही सुनाई पड़े कि वह कुछ भी नहीं है, तो निश्चित मानना वह कुछ भी नहीं हो जाएगा।
तो एक बड़े पैमाने पर अगर मुल्क में कोई एक आध्यात्मिक क्रांति करनी हो...और वह करनी जरूरी है और होनी चाहिए। और अगर हम उसके लिए सिर्फ रास्ता भी साफ कर सकें, तो कोई आगे कर लेगा। इससे क्या फर्क पड़ता है कि हम ही उसको करें! वह हमसे ही हो जाए, यह भी सवाल नहीं है। लेकिन अगर हम रास्ता भी साफ कर दें जिस पर पीछे कोई क्रांति गुजर जाएगी, तो भी काफी है, बात हो गई। पर उसको करनी हो अगर तो बहुत व्यापक समूह बनाना जरूरी है।
संगठन कभी बहुत व्यापक नहीं हो सकता, मित्रों का समूह बहुत व्यापक हो सकता है। क्योंकि उसमें विभिन्नता के लिए स्वीकृति है, उसमें जोर-जबर्दस्ती नहीं है बांधने की किसी को। उसमें सबके लिए मुक्ति है, कोई बंधा हुआ नहीं है। और जहां भी ऐसा मालूम होने लगता है कि हम बंधे हैं, वहीं श्रेष्ठ आदमी को कठिनाई शुरू हो जाती है। कोई श्रेष्ठ चेतना बंधना नहीं चाहती है। छोटे लोग ही सिर्फ बंधना चाहते हैं। जिनके भीतर एकदम क्षुद्र ही क्षुद्र है वे ही बंधने में रस लेते हैं, नहीं तो कोई बंधना नहीं चाहता।
इसलिए इतना खुला रखना है कि भीतर कोई आए तो उसे ऐसा लगे ही नहीं कि वह कहीं आया, कहीं बंध गया; वह मुक्त अनुभव करे। वह भीतर आए या बाहर जाए, उसे फर्क न मालूम पड़े कि कोई भेद पड़ गया है। ऐसा यह समूह बन सके, यह मित्रों का एक दल बन सके; व्यापक बन सके। क्योंकि क्रांति कितनी बड़ी है, यह प्रथम रूप से जो लोग उस क्रांति के लिए इकट्ठे होते हैं उनको पता ही नहीं होता।
लेनिन के साथियों को कोई पता नहीं था कि उन्नीस सौ सत्रह में जो हुआ वह सारी दुनिया में इतना अनूठा काम बनेगा। वोल्टेयर या उसके मित्रों को भी पता नहीं था कि फ्रेंच क्रांति क्या ले आएगी। गांधी और उनके मित्रों को भी कोई पता नहीं था कि क्या होगा, क्या नहीं होगा। क्राइस्ट को तो बिलकुल ही पता नहीं हो सकता था कि यह जो बात शुरू हो रही है...आठ मित्र थे केवल क्राइस्ट के। और वे भी बहुत बेपढ़े-लिखे लोग, गंवार लोग थे। कोई बढ़ई था, कोई चमार था, कोई मछुवा था। कोई पढ़े-लिखे लोग नहीं थे। क्राइस्ट को तो कल्पना भी नहीं हो सकती थी कि इतनी बड़ी क्रांति फैलेगी कि एक दिन आधी पृथ्वी क्राइस्ट के संदेश के प्रति आदरपूर्ण हो जाएगी। इसकी कल्पना भी नहीं हो सकती थी।
कौन से बीज कितने बड़े वृक्ष बन जाएंगे, इसकी कोई कल्पना प्राथमिक रूप से बोने वालों को कभी नहीं होती। अगर उन्हें होती, तो शायद काम कितना सुंदर हो जाता, इसका कभी हम खयाल भी नहीं कर सकते।
जैसे-जैसे मैं मुल्क के अधिकतम लोगों से मिला हूं, यह अहसास होना शुरू हुआ है कि यह तो बहुत बड़ा वट-वृक्ष बन सकता है। इस वृक्ष के नीचे हजारों लोगों को छाया मिल सकती है। यह तो इतना बड़ा झरना बन सकता है कि लाखों लोग उससे अपनी प्यास बुझा लें। लेकिन आज कोई खयाल नहीं हो सकता उन मित्रों को जो प्राथमिक रूप से इकट्ठे हुए हैं। अगर उनको यह खयाल आ जाए तो शायद वे बहुत विचार कर काम करना शुरू कर दें।
अभी मैं एक वैज्ञानिक किताब पढ़ता था। वे रूस में कोई रास्ते बना रहे हैं, तो वे सौ साल बाद का विचार करते हैं कि सौ साल बाद इन रास्तों पर कितने लोग चलेंगे, उतना चौड़ा रास्ता बनाते हैं। सौ साल बाद कितने लोग निकलेंगे इस रास्ते पर से, उसके हिसाब से रास्ते की चौड़ाई बनाते हैं।
एक हम भी हैं, हमारे मुल्क में हम भी रास्ता बनाते हैं। हम दो साल बाद कितने लोग निकलेंगे, इसका भी खयाल नहीं रखते। हर दो साल बाद रास्ता तोड़ना पड़ता है कि फिर थोड़ा जोड़ो, फिर थोड़ा जोड़ो। हर पांच साल में हमको पता चलता है कि ट्रैफिक ज्यादा हो गया, रास्ता छोटा हो गया।
हम अंधे लोग हैं क्या? हमको इतना अंदाज नहीं है कि पांच साल बाद कितने लोग निकलेंगे इस रास्ते से? अदभुत कौमें हैं जो सौ साल बाद का विचार करती हैं कि सौ साल बाद कितने लोग होंगे इस गांव में, कितनी आबादी होगी, कितने बड़े रास्ते सौ साल बाद जरूरी होंगे, अभी से बना लेना उचित है। जो लोग इतना दूरगामी सोचते हैं उनके काम में एक सरलता और सहजता उत्पन्न होती है और बार-बार की कठिनाइयां कम हो जाती हैं।
अभी तो मित्रों का समूह छोटा है, लेकिन दस साल में यह इतना बड़ा हो सकता है जिसकी आप कोई कल्पना नहीं कर सकते। और उसको ध्यान में रख कर कुछ काम करना है, उतना चौड़ा रास्ता बनाना है। अनजान, अपरिचित लोग दस साल बाद इस रास्ते पर चलेंगे। हो सकता है आप न हों, मैं न होऊं, कोई न हो, इस रास्ते पर कोई चलेगा। तो उसको ध्यान में रख कर अगर हम काम करते हैं...और हमें ध्यान रखना चाहिए कि हम बहुत मूल्य के नहीं हैं, मूल्य उस रास्ते का है जिस पर हम अपने जीवन को लगा देते हैं। और वह जो रास्ता बन जाता है, अगर वह बड़ा बन जाता है तो बहुत लोग उस पर चल सकते हैं।
तो इन सारी बातों पर विस्तार में विचार करना जरूरी है। ये तो मैंने कुछ मुद्दे की बातें कहीं कि इनके आस-पास हम सोचेंगे इन दिनों में। और इन पर विस्तार में, डिटेल्स में, एक-एक बात पर--क्या किया जा सकता है, क्या नहीं किया जा सकता है--वह सब विचार कर लेना जरूरी है। विस्तार में मेरी समझ बहुत कम है, उसमें आपकी समझ मुझसे ज्यादा है। मैं कुछ केंद्र की बात आपसे कह सकता हूं कि इस केंद्र पर चिंतन किया जाए, लेकिन विस्तार में शायद मेरी समझ नहीं के बराबर है--कि वह कैसे हो, कितने लोग करें, कितना धन जरूरी हो, कितनी शक्ति जरूरी हो, कितना श्रम लगे--वह शायद आप मुझसे ज्यादा जानते हैं। वह व्यावहारिक रूप से कैसे कितनी दूर तक पहुंचाई जाए, वह निश्चित ही आप मुझसे ज्यादा जानते हैं। मुझे उसका क ख ग भी पता नहीं है। इसलिए सोचा कि मैं अपनी बात आपसे कह दूंगा और आपकी बात भी सुनूंगा और उस बीच उन दोनों बातों के मेल से कुछ बन सकेगा।
मैं आपको थोड़ी सी आकाश की बातें कह सकता हूं, लेकिन पृथ्वी की बातों का मुझे बहुत पता नहीं है। और अकेले आकाश की बातों का कोई बहुत मूल्य नहीं होता। जड़ें तो जमीन में जानी पड़ती हैं, उन्हें तो पृथ्वी से पानी पाना पड़ता है, रस खींचना पड़ता है। तो आकाश में कैसे वृक्ष फैल सकता है, उसमें कैसे फूल आ सकते हैं, उनकी बात मैं करूंगा। जड़ों के संबंध में आप थोड़ा सोचना। और स्मरण रखना कि फूल उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं जितनी जड़ें महत्वपूर्ण हैं; फूल जड़ों पर ही निर्भर होते हैं। तो क्या हम इस काम के लिए कौन सी रूट्स, कौन सी जड़ें दे सकते हैं कि यह वृक्ष बड़ा हो सके।
मैं अपना सारा श्रम, अपनी सारी शक्ति, वह बड़ा हो या न हो, तो भी दूंगा ही, दे ही रहा हूं। वह मेरे लिए कोई काम नहीं, मेरा आनंद है। उसमें कोई संगी-साथी नहीं होगा तो कोई फर्क नहीं पड़ता, वह काम वैसा ही चलता रहेगा। लेकिन अगर उसमें संगी-साथी हुए तो वह काम बहुत बड़ा हो सकता है, बहुत दूर तक पहुंच सकता है, अनेक लोगों तक पहुंच सकता है।
इन थोड़ी सी बातों पर मैंने यह बात कही, इस पर आप थोड़ा सोचें--डिटेल्स के लिए, वह विस्तार के लिए कि क्या हो सकता है, कैसे हो सकता है। बहुत खुले मन से सोचें और उस पर हम यहां विचार करें। कल सुबह हम आप सबके मत आमंत्रित हैं, उनको आप कहें, उन पर सोचें, कुछ निर्धारित करें।
यह तो छोटा शिविर लिया है। फिर खयाल यह है कि पूरे मुल्क के जो मेरे मित्र हैं, जो इस काम में उत्सुक हुए हैं, उन सबका एक शिविर हो। अभी तो प्रयोग के लिए, ताकि थोड़े से लोग ज्यादा आसानी से सोच सकेंगे। ज्यादा लोग होंगे तो शायद कठिनाई पड़ेगी। तो हम सोचें। फिर एक बड़ा शिविर हो, जिसमें पूरे मुल्क से मित्र इकट्ठे हो जाएं। उनका आपस में भी मिलना जरूरी है। उनकी एक-दूसरे से पहचान होनी भी जरूरी है। वे अपनी-अपनी जगह पर काम कर रहे हैं, उनके काम के लिए आपका सहयोग और सदभावनाएं जरूरी हैं। वे वहां अकेले न मालूम पड़ें, उन्हें ऐसा लगे कि और भी मित्र हैं पूरे मुल्क में। वे कहीं अकेले नहीं खड़े हुए हैं, कोई साथी उनके हैं। जरूरत पड़ेगी तो वे साथ देंगे, सुझाव देंगे। वहां काम की जरूरत होगी तो वहां पहुंच कर कुछ करेंगे।
अभी राजकोट में मित्रों ने मुझसे कहा कि हम उन नगरों में जाकर आपकी बात पहुंचाना चाहते हैं जहां आप अभी नहीं गए हैं और वहां भूमिका खड़ी करना चाहते हैं ताकि आप वहां जा सकें।
यह बात जरूरी हो गई है। मैं एक नये नगर में जाता हूं, दस-पच्चीस, सौ दो सौ, हजार पांच सौ लोग सुनते हैं। अगर वहां भूमिका बन सके पहले से तो वहां दस हजार लोग सुन सकते हैं, पचास हजार लोग सुन सकते हैं।
तो जगह-जगह मित्र अलग-अलग सुझाव देते हैं। उनके सुझाव महत्वपूर्ण हैं, उपयोग के हैं। वे सारे मित्र पीछे इकट्ठे हों और विचार कर सकें, उसके लिए भी यहां, इससे भूमिका बन जाएगी।
तो अभी तो और ज्यादा नहीं कहूंगा। फिर विस्तार में कल सुबह से हम बात शुरू करेंगे। और आप यहां सुनने नहीं आए हैं, यह ध्यान में रहे। यह कोई मेरी चर्चाओं के लिए आयोजन नहीं है। यह मैंने जो इतनी बात भी की वह इसीलिए ताकि आप बोल सकें--यह मेरा बोलना नहीं है--ताकि आप विचार कर सकें। और सामूहिक विचार से और सामूहिक चिंतन से कुछ निष्पत्तियां हम लें, इन दो दिनों में इस तरफ खयाल है, ताकि हम कुछ निश्चित निष्कर्ष लेकर चल सकें और उन पर कुछ काम हो सके।

बस, इतना ही।