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रविवार, 30 अप्रैल 2017

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-10

जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
प्रवचन-दसवां-(जीवंत अद्वैत)
श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक ३० जुलाई १९८०

पहला प्रश्न: भगवान! मार्टिन बूबर को पढ़ते हुए ऐसा लगा कि वे हसीदी साधना द्वारा बुद्धत्व के करीब पहुंचे हुए एक महापुरुष थे। उन्होंने जीवन के आध्यात्मिक और भौतिक दोनों पहलुओं को स्वीकार करता हुआ यहूदी मानवतावाद पर खड़ा हुआ एक संघ बसाना चाहा, लेकिन यहूदियों ने ही उनका इनकार कर दिया। और खास कर आइसमन और अरब के सिलसिले में तो इजरायल ने उन्हें देशद्रोही सिद्ध करने की कोशिश की, जब कि वे सिर्फ बदला लेने के बजाय क्षमा और मैत्री साधने को कह रहे थे। अपने ही देश में निंदित रहे, जब कि दुनिया भर के लोग, खासकर ईसाई, उनसे प्रभावित थे।
भगवान, कच्छ में बसते हुए हमारे अपने कम्यून के संदर्भ में इस पर कुछ कहने की अनुकंपा करें।

अजित सरस्वती!

मार्टिन बूबर निश्चय ही एक महापुरुष थे, लेकिन महापुरुष ही--बुद्धत्व के करीब जरा भी नहीं। करीब तो करीब--दूर भी नहीं! बुद्धत्व के आयाम में बिलकुल अछूते। महापुरुष थे, नैतिक अर्थों में। धर्म का उनके जीवन में कोई अनुभव नहीं था। धर्म का दीया उनके प्राणों में जला नहीं था। सोचा था बहुत; साफ-सुथरा था उनका चिंतन; तर्क-सरणी स्पष्ट थी। मगर सोच-विचार सोच-विचार है। न उससे पेट भरता है, न प्यास बुझती है।
कितने ही सुंदर शब्द क्यों न हों, शब्द कोरे शब्द हैं; उनमें कोई प्राण नहीं होते। शब्द व्यक्ति को पंडित बना सकते हैं--प्रज्ञावान नहीं।
मार्टिन बूबर नैतिक चिंतना के धनी थे। उन्होंने नैतिक सोच-विचार के आधार पर क्षमा और मैत्री को जीवन के बहुमूल्य आदर्श माना था। लेकिन बुद्ध और महावीर ने सोच-विचार से ये निष्कर्ष नहीं लिए थे। इन निष्कर्षों का उदगम अलग-अलग है।
बुद्ध और महावीर ने उस परम अनुभूति से, जहां व्यक्ति विराट में लीन हो जाता है, जहां व्यक्ति शून्य हो जाता है और पूर्ण की अभिव्यक्ति होती है; जहां व्यक्ति तो मिट जाता है, उसकी तो कब्र बन जाती है, लेकिन उसकी कब्र पर पूर्ण के फूल खिलते हैं; उस अनुभूति से यह निचोड़ पाया था, यह इत्र उपलब्ध किया था, यह सुगंध पाई थी--कि जब हम अलग-अलग नहीं हैं, तो कैसा बैर, कैसा विरोध! किससे लड़ना है? किसको मारना है! किससे बदला लेना है! यह तो ऐसे ही होगा, जैसे बायां हाथ दाएं हाथ को मारे। जैसे बायां हाथ दाएं हाथ को तोड़ डाले। ये दोनों हाथ मेरे हैं। इन दोनों हाथों में मैं समाया हुआ हूं।
छोटे-छोटे बच्चे अकसर ऐसा करते हैं कि अगर उनके बाएं हाथ से कोई चीज गिर गई और टूट गई, इतने गुस्से में आ जाते हैं कि एक चपत लगा दी बाएं हाथ को! बच्चों को क्षमा किया जा सकता है; बच्चे हैं! लेकिन आश्चर्यों का आश्चर्य तो यह है: हमारे बूढ़े भी बच्चे हैं! उम्र बढ़ जाती है शरीर की, आत्मा जैसे बढ़ती ही नहीं! आत्मा जैसे पैदा ही नहीं होती!
जार्ज गुरजिएफ ठीक कहता था कि सभी लोगों में आत्मा नहीं होती; सिर्फ आत्मा की संभावना होती है। आत्मा तो कभी-कभी किसी व्यक्ति में होती है--जिसने अपनी संभावना को वास्तविकता बना लिया।
मार्टिन बूबर ने सोचा-विचारा। और जो भी सोचेगा-विचारेगा, पाएगा: मैत्री अच्छी चीज है, शत्रुता बुरी चीज है। प्रेम शुभ है, घृणा अशुभ है। और व्यक्ति को शुभ के अनुसार चलना चाहिए। गलत को छोड़ो, सही को पकड़ो।
नीति की सारी आधारशिला यही है: यह छोड़ो, यह पकड़ो। और धर्म की? न कुछ पकड़ो, न कुछ छोड़ो: अपने में ठहरो। ये बड़े भिन्न आयाम हैं।
और साधारणतः नैतिक व्यक्ति महापुरुष मालूम होगा, क्योंकि तुम्हारी चिंतना से उसकी चिंतना का तालमेल बैठेगा। तुम्हें भी लगता है कि गलत क्या है, सही क्या है। जिसके पास भी थोड़ा-सा मस्तिष्क है, जो सोच सकता है, उसे यह बात दिखाई पड़ने लगती है कि क्या करने योग्य है, कर्तव्य है; और क्या करने योग्य नहीं है--अकर्तव्य है। लेकिन इससे जीवन रूपांतरित नहीं होता। तुम अगर चेष्टा भी करके अपने को सही-सही ढांचे में ढाल लो, तो भी वह जो गैर-सही है, तुम्हारे भीतर मौजूद होता है। और वह जो गैर-सही है, आज नहीं कल प्रतिकार लेगा। जिसको दबाया है--उभरेगा। तुम्हारे सिर पर चढ़ कर बोलेगा। उससे छुटकारा नहीं है! पहले तो उसे दबाना भी आसान नहीं है।
संत अगस्तीन ने कहा है कि जो ठीक है--जो मैं जानता हूं कि ठीक है--वह मैं कर नहीं पाता। और जो गलत है--जो मैं जानता हूं कि गलत है--वही मैं करता हूं। हे प्रभु! मुझे मुझसे बचा। संत अगस्तीन की इस प्रार्थना में समस्त नैतिक व्यक्तियों की विडंबना प्रकट होती है।
मालूम तो है कि ठीक क्या है! किसको मालूम नहीं? और किसको मालूम नहीं कि गलत क्या है! सभी को मालूम है। हवा में ही सिद्धांत तैर रहे हैं! बचपन से ही हर एक की छाती पर सिद्धांत लादे जा रहे हैं। सबको पता है। लेकिन फिर भी उससे जीवन कहां गतिमान होता है? कहां जीवन रूपांतरित होता है?
मार्टिन बूबर अगर बुद्धत्व के करीब पहुंचते--करीब भी पहुंच जाते--तो जो पहली बात मिटती, वह तो यहूदी होने का भाव मिटता। वह नहीं मिटा। वह जीवन भर नहीं मिटा। वे कट्टर यहूदी थे। लेकिन चूंकि सोच-विचार वाले व्यक्ति थे--उन्होंने अपने यहूदी होने को भी थोड़ा रंग दिया था; उसको यहूदी मानवतावाद कहते थे! लेकिन मानवतावाद और यहूदी इनमें तालमेल नहीं है; इनमें विरोध है।
यह वैसा ही विरोध है, जैसा महात्मा गांधी के जीवन में था। वे भी मानवतावादी थे। मगर गहरे में वह मानवतावाद हिंदू-धर्म का पर्यायवाची था। यूं तो कहते थे कि कुरान में भी वही है, गीता में भी वही है। मगर गीता को अपनी माता कहते थे। कुरान को अपना पिता नहीं कहा! पिता दूर--चाचा भी नहीं कहा! यूं तो रोज उनके आश्रम में प्रार्थना दोहराई जाती थी: अल्लाह-ईश्वर तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान। लेकिन जब गोली लगी, तो अल्लाह नहीं निकला मुंह से। निकला--हे राम! वह राम बहुत भीतर बैठा है! वह हिंदू होने की बात जड़ तक व्याप्त हो गई है। तो संवारा, सुधारा, लीपा-पोता। मगर बात हिंदू की ही रही। मंदिर हिंदू का ही रहा। उस पर कुछ आयतें कुरान की भी लिख दीं, और कुछ वचन धम्मपद के भी लिख दिए!
मगर यह बात भी ध्यान रहे कि कुरान की वे ही आयतें गांधी ने चुनी थीं, जो गीता से मेल खातीं। जो वस्तुतः ऐसा लगता है कि गीता का ही अनुवाद है! अरबी में--संस्कृत में नहीं है। धम्मपद से भी उन्होंने वे ही वचन चुने थे, जो गीता की ही प्रतिध्वनि हैं। बाइबिल से भी उन्होंने वे ही सुभाषित संकलित कर लिए थे, जो गीता में ही मिल जाते। लेकिन जो बात भी गीता के विपरीत पड़ती थी, गांधी ने कभी न तो कुरान से चुनी, न बाइबिल से चुनी, न धम्मपद से चुनी। वह बात तो मद्दे-नजर कर दी। वह बात तो जैसे है ही नहीं--ऐसा मान कर चले। यह निश्चित ही उदार हिंदू-वाद है!
नाथूराम गोडसे ने, जिसने उन्हें गोली मारी, उसका हिंदूवाद अनुदार है। गांधी का हिंदूवाद उदार है, मानवतावादी है। लेकिन जहर को कितना ही उदार करो, और उसको कितने ही सुगंधित बोतलों में रखो, रंगीन बोतलों में रखो, और चाहे उस पर अमृत का ही लेबिल क्यों न लगा दो, तो भी जहर जहर है। और मेरे हिसाब से तो यही उचित है कि जहर की बोतल पर जहर ही लिखा हो, उससे धोखा नहीं होता। जहर की बोतल पर अमृत लिखना ज्यादा खतरनाक है।
मैं तो कहूंगा: नाथूराम गोडसे साफ-सुथरा आदमी है। सीधा-सादा। जैसा है, वैसा है। बुरा तो बुरा। भला तो भला। उसने कुछ आवरण नहीं ओढ़ा है। उस अर्थ में नाथूराम गोडसे ज्यादा ईमानदार है; महात्मा गांधी उतने ईमानदार नहीं।
यूं मैं नहीं कह रहा हूं कि जानकर वे बेईमान हैं। जान कर वे बेईमान नहीं हैं। अनजाने बेईमान हैं। उन्हें शायद साफ-साफ भी नहीं है कि वे जो कह रहे हैं, कर रहे हैं, वह वही है। उसमें कुछ भी भेद नहीं हैं। थोड़ा संस्कारशील रूप है उसका। थोड़े सुंदर आभूषण पहना दिए हैं! थोड़े बाल काट-छांट दिए हैं। थोड़े वस्त्र नए कर दिए हैं। मगर बात वही की वही है; उसमें जरा भी भेद नहीं है। मगर अब ज्यादा खतरनाक हो गई, क्योंकि ज्यादा लोगों को धोखा दे देगी। इसमें कुछ मुसलमान भी फंसेंगे; इसमें कुछ जैन भी फंसेंगे; इसमें कुछ बौद्ध भी फंसेंगे। और इस आशा में फंसेंगे कि यह कोई मतवाद नहीं है; यह कोई धर्मांधता नहीं है। मगर यह शुद्ध धर्मांधता है। सिर्फ इसके आवरण और हैं।
मार्टिन बूबर में मुझे भी रस है, लेकिन उससे मैं राजी नहीं हूं। आदमी अच्छा था, अच्छी भावनाओं का था, और जीवन भर चेष्टा की ढंग से जीने की। मगर आधार गलत थे। और आधार गलत हों, तो तुम मंदिर भी बनाना चाहो, तो क्या! कैसे बनेगा? आधार सही होने चाहिए। वह यहूदीवाद ही उसका जहर था। यूं उसकी चेष्टा जीवन भर रही कि किसी तरह जीसस को भी समाविष्ट कर ले।
यूं तो जीसस यहूदी घर में पैदा हुए; ईसाई तो नहीं थे! तब तक ईसाइयत ही नहीं थी। कोई चर्च नहीं था। कोई पादरी नहीं था। पुरोहित नहीं था। ईसाई धर्म तो बहुत बाद में विकसित हुआ। तो यूं तो एक अर्थ में वे यहूदी ही रहे। यहूदी घर में ही बड़े हुए, यहूदी ही मरे। कुछ और होने का उपाय भी न था। लेकिन जीसस एक बुद्धपुरुष थे। इसलिए कभी यहूदी धर्म को छोड़ा नहीं। छोड़ने की कोई बात भी नहीं उठती थी। छोड़कर कहीं कुछ और जाने का सवाल भी न था। लेकिन फिर भी जीसस यहूदी नहीं थे। नहीं तो यहूदी उन्हें सूली न देते!
जीसस ने बिना यहूदी धर्म को छोड़े, यहूदीवाद छोड़ दिया। यहूदियों का जो आग्रह था, कि हम ही चुने हुए व्यक्ति हैं परमात्मा के द्वारा, वह आग्रह छोड़ दिया। उस आग्रह के छोड़ने से ही यहूदी नाराज हो गए। लगा कि जीसस बगावत कर रहे हैं। और यहूदियों ने जीसस को अभी भी माफ नहीं किया। सूली पर चढ़ा कर भी साफ नहीं किया!
मार्टिन बूबर से यहूदी इसीलिए नाराज थे कि वह यहूदी मानवतावाद के नाम पर किसी तरह जीसस को भी समाविष्ट कर लेना चाहता था। वह यह चाहता था कि जीसस और यहूदियों के बीच जो फासला पड़ गया है, वह तोड़ दिया जाए। इससे ईसाई प्रसन्न थे। क्योंकि ईसाई यह चाहते हैं कि जीसस की प्रशंसा हो। और जब कोई यहूदी जीसस की प्रशंसा करे, तो ईसाइयों के हृदय में आनंद की लहर दौड़ जाती है!
इस बात को भी तुम ठीक से समझ लो, कि यह दुनिया बड़ी अजीब है। एक हिंदू थे गणेशवर्णी। हो गए जैन! जैन मुनि हो गए। तो हिंदुओं में तो उनकी बड़ी निंदा रही, मगर जैनियों में बड़ा सत्कार था। ऐसा सत्कार कि दूसरे सारे जैन मुनि फीके पड़ गए। ऐसी कुछ खास बात न थी उनमें, कि कोई दूसरे जैन मुनियों को फीका पड़ने की जरूरत आती। मगर एक खास बात थी, जो जैन मुनियों में न थी। जैनी घर में पैदा हुए थे और जैनी रहे। उनसे कुछ सिद्ध नहीं होता। लेकिन गणेशवर्णी का जैन हो जाना एक बात सिद्ध करता है कि हिंदू-धर्म गलत है, नहीं तो क्यों ऐसा महापुरुष हिंदू-धर्म को छोड़कर जैन होता!
एक सिक्ख साधु सुंदरसिंह ईसाई हो गए थे। तो तुम जान कर हैरान होओगे कि ईसाईयों में जितने ईसाई फकीर थे, उन सबको मात कर दिया साधु सुंदरसिंह ने! क्योंकि कोई आदमी सिक्ख-धर्म को छोड़ कर ईसाई हो गया, इससे सिद्ध होता है: सिक्ख-धर्म गलत है! और छोटा-मोटा आदमी नहीं, इतना महापुरुष! फिर इस महापुरुष को खूब बड़ा करके बताना चाहिए। क्योंकि जितना यह बड़ा होगा, उतनी ही यह बात सिद्ध होगी कि सिक्ख-धर्म गलत था। यह अगर कोई छोटा-मोटा, ऐरा-गैरा नत्थू खैरा हो, तो ठीक है; छोड़ दिया होगा। क्या पता: समझ में भी इसके कुछ आया कि नहीं! मगर यह महापुरुष होना ही चाहिए; इसको महापुरुष बनाना ही पड़ेगा! इसको ऊंचे से ऊंचे शिखर पर बिठाना पड़ेगा। जितने ऊंचे शिखर पर बिठाओगे, उतना ही सिद्ध होगा कि देखो, इतनी अदभुत प्रतिभा का व्यक्ति, नानक जैसी प्रतिभा का व्यक्ति--और सिक्ख-धर्म को छोड़ कर ईसाई हो गया!
सिक्ख भी माफ नहीं कर सके सुंदरसिंह को। और सुंदरसिंह एक दिन लापता हो गए! आज तक उनका पता नहीं चला। इस बात की बहुत संभावना है कि सिक्खों ने उनका फैसला कर दिया! खात्मा ही कर दिया। कुछ तय नहीं है, क्योंकि कुछ पता ही नहीं चल सका। मगर सिक्खों को हम जानते हैं कि वे तर्क तो क्या करेंगे! तलवार निकाल लेते हैं!
लेकिन साधु सुंदरसिंह का खो जाना, मर जाना, या जो कुछ भी हुआ--सब अज्ञात है--उन्हें और बड़ा महापुरुष सिद्ध कर गया। ईसाइयों ने उनकी इतनी प्रशंसा की! सारी दुनिया में प्रशंसा हुई।
गणेशवर्णी में कुछ खास खूबी की बात न थी। बस, इतनी खूबी थी कि वे हिंदू-धर्म को छोड़ कर आए। छोड़ कर आए, तो जैनियों ने उनको सिर पर उठा लिया!
तुम जान कर जरूर चकित होओगे कि ईसाइयों ने बहुत कोशिश की कि महात्मा गांधी ईसाई हो जाएं! और कई दफा वे ईसाई होने के बिलकुल करीब पहुंच गए थे। कई बार विचार करने लगे थे: हो जाऊं। ईसाई उनमें उत्सुक थे, सिर्फ एक कारण से, कि अगर वे ईसाई हो जाएं, तो कर दिया हिंदू-धर्म को उन्होंने चौपट! सिद्ध कर देंगे, दुनिया के सामने कि देखो, हिंदुओं का श्रेष्ठतम महात्मा, महानतम व्यक्ति हिंदू परंपरा में जो कभी भी पैदा हुआ हो, वह भी ईसाई हो गया!
मुसलमान भी कोशिश करते थे कि वे मुसलमान हो जाएं! क्योंकि जब वे कहते थे: अल्ला-ईश्वर तेरे नाम! तो वे कहते थे: फिर आप हिंदू क्यों हैं? मुसलमान क्यों नहीं हो जाते? मुसलमान हो जाते, तो मुसलमान उनके प्रति ऐसी श्रद्धा प्रकट करते, जैसी उन्होंने कभी किसी के प्रति प्रकट नहीं की! हिंदुओं को आग लग जाती। हिंदुओं को तो इतने ही से आग लग गई थी कि उन्होंने अल्ला-ईश्वर तेरे नाम कह दिया! दोनों बराबर, एक कोटि में रख दिए! हिंदुओं को तो इतने से ही आग लग गई कि उन्होंने कुरान के साथ और गीता का उल्लेख कर दिया! हिंदू क्षमा नहीं कर सके।
महात्मा गांधी को मुसलमानों ने गोली नहीं मारी। ज्यादा संभावना यही हो सकती थी कि मुसलमान गोली मारते। अंग्रेजों ने गोली नहीं मारी। ज्यादा संभावना यही हो सकती थी कि अंग्रेज उनको गोली मारते। क्योंकि यही आदमी उपद्रव की जड़ था। इसको खतम कर देते, तो शायद भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन को ही वर्षों पीछे हटाया जा सकता था। उन्होंने गोली नहीं मारी। मारी गोली एक हिंदू ने! क्योंकि हिंदू नाराज थे इस बात से कि तुम हमारी गीता के समकक्ष धम्मपद, कुरान और बाइबिल को रखते हो! तुम हमारे कृष्ण के समकक्ष बुद्ध, महावीर, क्राइस्ट, मोहम्मद तक को रखते हो?
जैन बहुत प्रसन्न थे। जैनों की संख्या थोड़ी है भारत में। लेकिन जितने जैन महात्मा गांधी के आंदोलन में जेल गए, अनुपात की दृष्टि से, उतना किसी समाज के लोग नहीं गए। क्यों? जैनों को ऐसी क्या उत्सुकता जेल जाने की आ गई थी? और जैन ऐसे, कोई लड़ाकू लोग नहीं हैं! कोई जेल वगैरह जाने में उन्हें आसानी नहीं हुई। लेकिन महात्मा गांधी ने अहिंसा परमो धर्मः--अहिंसा परम धर्म है, इसकी उदघोषणा कर दी। इससे सिद्ध हो गया कि महावीर ठीक कहते हैं।
महात्मा गांधी ने चूंकि यह कह दिया कि श्रीमद राजचंद्र जैनियों के एक महापुरुष मेरे तीन गुरुओं में से एक हैं--इससे जैनियों के हृदय गदगद हो गए। ईसाई भी बहुत प्रसन्न हुए, क्योंकि बाकी दो गुरु ईसाई--टालस्टाय और थारो। और एक गुरु जैन! हिंदुओं को चोट लगी। एक भी गुरु हिंदू नहीं! दो ईसाई--और एक जैन! जैन खुश थे। ईसाई खुश थे। सी.एफ.एन्ड्रयूज जैसा ईसाई गांधी के चरणों में आकर बैठा था इसीलिए।
और जैन तो मानते थे कि महात्मा गांधी जैन ही हैं एक अर्थ में। कहने मात्र को हिंदू हैं। अन्यथा अहिंसा को किसने इतनी ऊंचाई पर उठाया? किसने इतना अहिंसा के लिए प्रचार किया? किसने अहिंसा को एक जीवन-दर्शन बना दिया--बीसवीं सदी में? महावीर के नाम को फिर से गुंजा दिया। तो जैन खुश थे; बहुत खुश थे।
आदमी की खुशियां और दुख भी उनके मताग्रहों के कारण होते हैं!
यहूदी नाराज थे मार्टिन बूबर से। स्वभावतः। जैसे जैन मुझसे नाराज हैं। जितने जैन मुझसे नाराज हैं, उतना कोई मुझसे नाराज नहीं है। क्योंकि पहले जैनों ने मुझ पर बड़ी आशा बांधी थी। सब तरह से मुझे बांधने की कोशिश की थी, कि मैं जैन-धर्म का प्रचार करूं। उन्हें बड़ी आशा थी कि मेरे द्वारा जैन-धर्म विश्व के कोने-कोने तक पहुंचेगा। मैंने उनकी सारी आशाओं पर पानी फेर दिया!
मैं किसी की आशाओं में बंधूं क्यों? मेरे लिए तो जन्म केवल संयोग की बात है; उसका कोई भी मूल्य नहीं। धर्म कोई जन्म से नहीं मिलता। तो तुम जरा गणित को समझने की कोशिश करो।
सबसे पहले मुझसे दिगंबर जैन नाराज हुए, क्योंकि मैं दिगंबर जैन घर में पैदा हुआ। श्वेतांबर जैन मुझसे नाराज जल्दी नहीं हुए। दिगंबर जैन सबसे पहले मुझसे नाराज हुए, क्योंकि वे सबसे निकट थे। उनको सबसे ज्यादा आशा थी कि मैं दिगंबर-जैन-धर्म का प्रचार करूंगा! लेकिन श्वेतांबर मुझसे खुश थे। वे इसलिए खुश थे कि देखो, यह एक दिगंबर जैन और हमारे श्वेतांबर सम्मेलनों में भी आता है! श्वेतांबर मुनियों को मिलता है। श्वेतांबर मुनियों से चर्चा-मशविरा करता है। श्वेतांबर प्रचार में सम्मिलित दिखाई पड़ता है।
श्वेतांबर मुझसे प्रसन्न थे। दिगंबर नाराज होते गए। श्वेतांबर मुझसे प्रसन्न होते गए। लेकिन जल्दी ही उनको समझ में आया कि मैं किसी धर्म में बंधने वाला नहीं हूं। मैं किसी सीमा में बंधने वाला नहीं हूं। तब श्वेतांबर भी मुझसे नाराज हो गए!
अब दिगंबर और श्वेतांबर दोनों मुझसे समान रूप से नाराज हैं। श्वेतांबर और भी ज्यादा। क्योंकि दिगंबर तो काफी पहले नाराज हो चुके थे। बात पुरानी पड़ गई। श्वेतांबर अभी-अभी तक आशा बांधे थे। अभी-अभी ताजा घाव है; भरा नहीं। इससे बड़े नाराज हैं!
उसके बाद मुझसे हिंदू नाराज हुए--बाद में नाराज हुए। उसके बाद मुझसे मुसलमान नाराज हुए। ये वर्तुल के ऊपर वर्तुल हैं। उसके बाद मुझसे ईसाई नाराज हुए। पहले कैथोलिक ईसाई नाराज हुए। क्योंकि भारत में कैथोलिक ईसाइयों का प्रभाव है। अब मुझसे प्रोटेस्टेंट ईसाई भी नाराज हुए! वे जर्मनी में हैं, मैं यहां बैठा हूं। मैं जर्मनी जाता नहीं। सब से आखिर में यहूदी मुझसे नाराज हुए! क्योंकि अब यहूदी मेरे संन्यासी होने लगे आकर। भारत में जितने यहूदी तुम यहां पाओगे, किसी और जगह पर नहीं पा सकते। अब मुझसे पारसी भी नाराज हो गए! क्योंकि पारसी भी संन्यासी होने लगे।
मैंने जागतिक ढंग से लोगों को बिगाड़ने का आयोजन किया हुआ है! तो जिन-जिन को बिगाडूंगा, वे-वे नाराज हो जाएंगे!
मार्टिन बूबर से यहूदी नाराज थे, ईसाई खुश थे। स्वभावतः। क्योंकि मार्टिन बूबर जीसस की प्रशंसा कर रहे थे और चाहते थे कि जीसस को यहूदी-धर्म आत्मसात कर ले; वापस आत्मसात कर ले। और यह यहूदी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। यह तो देश-द्रोह है। यह तो धर्म-द्रोह है। जिसको हमारे पुरखों ने फांसी दी, उसको यह आदमी कह रहा है कि वापस आत्मसात कर लो! यह मानवतावाद के नाम पर अधर्म का प्रचार कर रहा है!
लेकिन ईसाइयों ने बहुत प्रशंसा की। उनको तो यहूदी-गढ़ में अपना एक साथी मिल गया।
यह यूं ही समझो कि जैसे रामायण में, जितने राम भक्तों ने रामायण लिखी है, उसमें विभीषण की खूब प्रशंसा की गई है। लेकिन अगर रावण को मानने वाले कोई किताब लिखते, तो उसमें क्या विभीषण की प्रशंसा हो सकती थी? उसमें वह दगाबाज, धोखेबाज, देशद्रोही! स्वभावतः अपने भाई को भी धोखा दे गया! दुश्मनों से जा मिला! इससे बड़ा और क्या गर्हित कृत्य हो सकता है?
लेकिन राम के भक्तों ने विभीषण को धार्मिक महात्मा सिद्ध करने की कोशिश की है। यह दुनिया का रिवाज है। इस रिवाज को समझोगे, तो अड़चन नहीं रह जाएगी।
यहूदियों की मौलिक मान्यता यही है कि वे ईश्वर के चुने हुए लोग हैं। उनके अलावा और कोई ईश्वर का चुना हुआ व्यक्ति नहीं है। वह जाति ईश्वर के द्वारा चुनी गई है। और इसी मूर्खतापूर्ण बात ने उन्हें सदियों तक परेशान रखा है। उनकी यह अहंकार की घोषणा उनको जगह-जगह पीड़ित करवाई है। कितना उन्होंने सहा है! लेकिन बड़ी अजीब प्रक्रिया है जीवन की।
तुम्हें जिस चीज के लिए जितनी कुरबानी देनी पड़ती है, तुम्हारे मोह उससे उतने ही ज्यादा हो जाते हैं। आदमी का गणित बहुत अजीब है! जिस चीज के लिए तुम्हें जितनी कुरबानी देनी पड़े, वह उतनी महंगी हो गई; उतनी कीमती हो गई। और जो चीज तुम्हें मुफ्त मिल जाए, उसकी कौन फिक्र करता है! मुफ्त मिली--मुफ्त गई। क्या फिक्र!
यहूदियों ने तीन हजार साल निरंतर कुरबानी दी है। लाखों यहूदी मारे गए हैं, इस एक विचार के आधार पर, कि हम चुने हुए व्यक्ति हैं। इसको वे छोड़ नहीं सकते। यह क्या तुम मानवतावाद वगैरह की बातें कर रहे हो!
इसका मतलब यह है--मानवतावाद का अर्थ यह होता है कि सभी मनुष्य समान हैं। कोई चुना हुआ नहीं है। कोई ईश्वर के द्वारा विशिष्ट रूप से चुना गया नहीं है।
जर्मनों ने इतनी बड़ी कुरबानी दी--अडोल्फ हिटलर के हाथों राजी हो गए अपने को बरबाद करने को--सिर्फ एक बात के आधार पर, कि अडोल्फ हिटलर ने उनसे कहा कि तुम ईश्वर के चुने हुए व्यक्ति हो। यह जो नार्डिक जाति है, ये जो शुद्ध जर्मन हैं, ये पैदा ही ईश्वर ने इसलिए किए हैं कि ये दुनिया पर राज्य करें।
इसमें दोहरा प्रलोभन था। एक तो ईश्वर के द्वारा चुने गए लोग--यह रस कौन न लेना चाहेगा? और दूसरा: दुनिया पर राज्य करने का प्रलोभन। जर्मन जाति मरने को राजी हो गई! छोटी-सी जाति ने सारी दुनिया को हिला दिया। सारी दुनिया को इकट्ठा होकर लड़ना पड़ा, तब भी बामुश्किल जीते। क्योंकि जो लड़ रहे थे, उनके पास ऐसा कोई बल न था; ऐसी कोई पागलपन की धारणा न थी, जैसी जर्मनों के पास थी।
तुम जानकर चकित होओगे यह भी कि जर्मनों से सिर्फ साथ बना जापानियों का। क्योंकि जापानी मानते हैं कि उनका मूल उदगम सूर्य से हुआ। वे सूर्य देवता के पुत्र हैं! जर्मन सम्राट सूर्य का वंशज है। वे शिष्ट लोग हैं।
जर्मनी में और जापान में एक आंतरिक समझौता हो गया कि हम पश्चिम सम्हालते हैं, तुम पूरब सम्हाल लो। तुम पूरब के विशिष्ट लोग हो, हम पश्चिम के विशिष्ट लोग हैं। उन्होंने एक दूसरे की धारणा को स्वीकार कर लिया। उनमें तालमेल बैठ गया। बाकी सारी दुनिया को उनके खिलाफ लड़ना पड़ा। जापानी भी जिस ढंग से लड़े, कोई कभी नहीं लड़ा। जी-जान से लड़े। और जितनी बड़ी कुरबानी देनी पड़ती है, उतने ही आग्रह मजबूत होते चले जाते हैं। क्योंकि जितना खून सींचा हमने, उतना ही हमारा मोह प्रगाढ़ हो जाता है।
यहूदी कैसे मानवतावाद की बात मानें?
तुम हिंदुओं से कहो कि मानवतावाद की बात मान लें। नहीं मान सकते हैं। क्योंकि हिंदू--सनातन धर्म है। और सब धर्म तो बाद में आदमियों द्वारा ईजाद किए गए। हिंदू-धर्म ईश्वर से अवतरित हुआ है! वेद स्वयं ईश्वर ने रचे हैं। सारे अवतार हिंदुओं के घरों में पैदा हुए हैं। यह भारत-भूमि पुण्य-भूमि है; धर्म-भूमि! यहां देवता पैदा होने को तरसते हैं!
हिंदू-धर्म ठीक यहूदियों जैसा ही भ्रांतियों से भरा हुआ धर्म है।
यह भी खयाल में रखना: यहूदी किसी को यहूदी नहीं बनाते। वे कहते हैं: यहूदी तो जन्म से होता कोई व्यक्ति। ईश्वर ही किसी को यहूदी बनाए तो बनाए! वैसे ही हिंदू भी किसी को हिंदू बनाना पसंद नहीं करते थे। यह तो आर्यसमाज ने ईसाइयों की नकल शुरू की और लोगों को हिंदू बनाना शुरू किया। हिंदू माफ नहीं कर सके आर्यसमाजियों को। सनातन धर्मी आर्य-समाजी को माफ नहीं कर सकता। इसका तो यह अर्थ हुआ हम किसी को भी हिंदू बना सकते हैं! तो फिर शूद्र को ब्राह्मण बना सकते हो। फिर जिसको तुम हिंदू बनाओगे, यह किस वर्ण का होगा? वर्ण तो जन्म से होते हैं।
समझो, कि एक ईसाई हिंदू बन जाए। यह ब्राह्मण होगा, शूद्र होगा, क्षत्रिय होगा, वैश्य होगा--क्या होगा? इसको कहां रखोगे? इसको किस कोटि में बिठाओगे? हिंदू तो जन्म से होता है। हिंदू दूसरे धर्म को रूपांतरित नहीं करता, वैसे ही जैसे यहूदी।
यहूदी और हिंदुओं की मूढ़ताएं बड़ी समान हैं। ये दोनों ही धर्म किसी को रूपांतरित नहीं करते। और ये दोनों प्राचीनतम धर्म हैं। इन दोनों ही धर्म से दुनिया के और दूसरे धर्म विकसित हुए हैं। यहूदियों से इस्लाम और ईसाइयत, और हिंदुओं से जैन और बौद्ध।
जैन और बौद्ध दोनों दूसरों को अपने धर्म में निमंत्रित करते हैं। करना ही पड़ेगा। क्योंकि जो धर्म बाद में आए, वे आदमी कहां से लाते? खुद महावीर हिंदू घर में पैदा हुए। जैनियों के चौबीस तीर्थंकर ही हिंदू घरों में पैदा हुए। बुद्ध हिंदू घर में पैदा हुए। अब इनको और बौद्ध और जैन कहां मिलेंगे? इनको रूपांतरण करना ही होगा।
इसलिए स्वभावतः जैन और बौद्ध नहीं मानते कि धर्म जन्म से होता है। धर्म कर्म से होता है--जन्म से नहीं। स्वभावतः, उनका निहित स्वार्थ उसमें है। जन्म से होगा तो मारे गए! यहूदी भी मानते हैं: धर्म जन्म से होता है।
ईसाई और मुसलमान नहीं मानते, कि धर्म जन्म से होता है। कोई भी व्यक्ति मुसलमान हो सकता है, कोई भी ईसाई हो सकता है। और किसी को भी ईसाई बनाया जा सकता है, मुसलमान बनाया जा सकता है। सीधे-सीधे न बने, तो तलवार के बल से भी बनाया जा सकता है। प्रलोभन दिए जा सकते हैं--आर्थिक सुविधा-संपन्नता के। रिश्वत दी जा सकती है। लेकिन धर्म बदलाया जा सकता है। धर्म रूपांतरित हो सकता है।
जो-जो धर्म मानते हैं कि धर्म रूपांतरित हो सकता है, उनका यह मानना ही बताता है कि वे बाद में पैदा हुए होंगे। और जो धर्म मानते हैं कि धर्म रूपांतरित नहीं हो सकता, उनकी यह धारणा बताती है कि वे अत्यंत प्राचीन धर्म हैं। हिंदू और यहूदी दुनिया के अत्यंत प्राचीन धर्म हैं।
प्राचीन धर्मों की कठिनाई यह है कि सिकुड़ते हैं--फैलते नहीं। वे मानवतावाद को स्वीकार नहीं कर सकते। नए धर्म फैलने को उत्सुक होते हैं, विस्तारवादी होते हैं। इसलिए वे मानवतावाद को जल्दी स्वीकार करते हैं। ईसाइयत मानवतावाद के लिए बिलकुल आतुर है। ऐसे ही जैन भी आतुर हैं; बौद्ध भी आतुर हैं। इस्लाम भी आतुर है।
हिंदू और यहूदियों को छोड़ कर सब चाहेंगे कि सारी मनुष्यता एक ही झंडे के नीचे आ जाए। अच्छे-अच्छे बहाने खोजेंगे, सुंदर-सुंदर सिद्धांत निर्मित करेंगे, मगर पीछे वही अभीप्सा है--साम्राज्य विस्तार की।
मार्टिन बूबर को मैं निश्चित महापुरुष कहूंगा। लेकिन बुद्धपुरुष नहीं। महापुरुष और बुद्धपुरुष में मैं बुनियादी भेद करता हूं। महापुरुष हमारे ही जैसा व्यक्ति है। उसमें और हमारे बीच जो भेद हैं, वे परिणाम के हैं, मात्रा के हैं। हम कम जानते हैं, वह ज्यादा जानता है। शायद हम कम चरित्रवान हैं, वह ज्यादा चरित्रवान है। शायद हमारी जीवन-शैली उतनी सुंदर नहीं, जितनी उसकी जीवन-शैली है। शायद हमारे विचार उतने तर्क शुद्ध नहीं, जितने उसके विचार तर्क शुद्ध हैं। मगर हमारे और उसके बीच कोई गुणात्मक भेद नहीं है।
बुद्धपुरुष और हमारे बीच गुणात्मक भेद होता है। वह और लोक का वासी है। हमारे बीच और उसके बीच कम-ज्यादा का फर्क नहीं होता; आयाम का भेद होता है।
महापुरुष सोचने की ऊंचाइयां छूता है। बुद्धपुरुष निर्विचार की गहराइयां छूता है।
मार्टिन बूबर को निर्विचार का कोई अनुभव नहीं था। मार्टिन बूबर की सबसे प्रसिद्ध किताब है--मैं और तू। इस किताब में मार्टिन बूबर ने अपने श्रेष्ठतम विचारों को संजो कर रख दिया है। यह उनकी वसीयत है। इसमें मार्टिन बूबर ने कहा है कि प्रार्थना का अर्थ है: मैं और तू के बीच संबंध। मैं यानी जीव और तू यानी परमात्मा। जब मैं और तू के बीच संवाद होता है, तो वही प्रार्थना है।
कोई बुद्धपुरुष ऐसी बात नहीं कह सकता। कहां--प्रार्थना में न मैं बचता न तू बचता। अगर मैं यह किताब लिखूं तो इसका नाम होगा--न मैं, न तू! जब तक मैं है, जब तक तू है, तब तक कैसी प्रार्थना? तब तक तो मैं-मैं, तूत्तू है! तब तक संवाद-विवाद होगा। जब न मैं रही, न तू रही, जब बूंद सागर में खो गई, तब...।
प्रार्थना कही नहीं जाती। मार्टिन बूबर सोचते थे: प्रार्थना डायलाग है, संवाद है। न तो प्रार्थना डायलाग है--न मोनोलाग। न तो संवाद, न एकालाप। प्रार्थना शून्य आनंदभाव है, शून्य अनुग्रह-बोध है। शून्य में जलती हुई ज्योति है। न कुछ कहने को है, न कुछ सुनने को है।
प्रार्थना ध्यान की पराकाष्ठा है। वह प्रेमी के द्वारा ध्यान को दिया गया नाम है। वह प्रेम की भाषा है। लेकिन जो कहा जा रहा है, वह तो वही है, जो ध्यान में अनुभव होता है। ध्यानी की भाषा में--निर्विकल्प समाधि। और प्रेमी की भाषा में--प्रार्थना। मगर इंगित एक ही सत्य की ओर।
मार्टिन बूबर को कभी भी ध्यान का कोई अनुभव नहीं हुआ। यह सच है कि वे हसीदी फकीरों में उत्सुक थे। मगर उन्होंने साधना कभी की हो, ऐसा दिखाई नहीं पड़ता। इसके लक्षण नहीं मिलते। अंतःसाक्ष्य नहीं है।
उन्होंने हसीदी फकीरों के जीवन को खूब अध्ययन किया, गहराई से अध्ययन किया। उनके पिता को भी हसीदों में रुचि थी। इसलिए बचपन से ही उनके पिता उनको हसीदी फकीरों के पास ले जाते थे।
और हसीद फकीर इस जमीन पर उन थोड़े से अनूठे लोगों में से एक हैं, जिनके जीवन में सुगंध होती है। जैसे बौद्धों में झेन फकीर, जैसे मुसलमानों में सूफी फकीर, वैसे यहूदियों में हसीदी फकीर।
इस लिहाज से जैन-धर्म गरीब है। उसके पास इनके मुकाबले कुछ भी नहीं है। हिंदू-धर्म भी गरीब है। उसके पास इनके मुकाबले कुछ भी नहीं। सिक्ख धर्म भी गरीब है। न हसीद हैं, न सूफी हैं, न झेन फकीर हैं!
बौद्ध-धर्म ने अपनी पराकाष्ठा पाई झेन फकीरों में। झेन शब्द आया है ध्यान से। ध्यान का ही रूपांतरण है। चूंकि बुद्ध संस्कृत नहीं बोलते थे, पाली बोलते थे। पाली में ध्यान को झान कहते हैं। और जब झान शब्द चीन पहुंचा, बोधिधर्म जब उसे चीन ले गया, तो झान को लिखने को चीन में कोई सुविधा नहीं। झ के लिए चीन में कोई प्रतीक नहीं है। इसलिए चीन में उसे लिखा गया--चान। फिर चीन से यात्रा करता हुआ यह शब्द जापान पहुंचा। जापानी भाषा में वे ही प्रतीक होते हैं, जो चीनी भाषा में होते हैं। प्रतीकों में फर्क नहीं होता। लेकिन उच्चारण भिन्न होते हैं। जैसे कि हिंदी और बंगाली में शब्द बहुत से एक से होते हैं, मगर उच्चारण अलग होते हैं।
एक युवती मुझे मिलने आई। उसका परिचय मुझे दिया गया: इसका नाम है--रोमा। मैंने कहा, रोमा! नाम जरा अनूठा है। रोम के आधार पर रखा है? जिसने परिचय दिया, उसने कहा, आप समझे नहीं। इसका नाम रमा है! मगर बंगाली में रोमा! रमा एकदम रोमा हो गई! बंगाली हर चीज को गोल कर देते हैं--रसगुल्ला बना देते हैं! रसगुल्ला को भी रसोगुल्ला! एक गोलाई आ गई। कहां रमा और कहां रोमा!
चीनी और जापानी में प्रतीक एक होते हैं, लेकिन उच्चारण भिन्न होते हैं। जिसको चीनी--प्रतीक वही रहेगा--उसको वह चान पढ़ेगा, और जापानी उसको झेन पढ़ेगा।
बुद्ध-धर्म ने अपनी पराकाष्ठा पा ली झेन में। यहूदी-धर्म ने अपनी पराकाष्ठा पा ली हसीदों में। इसलाम ने अपनी पराकाष्ठा पा ली सूफियों में।
इस अर्थ में जैन गरीब रह गए। और उसका यह कारण था कि जैन-धर्म पंडितों के हाथ में पड़ गया। और पंडित इस पृथ्वी पर सबसे थोथे लोग हैं--जिनके पास शब्द ही शब्द होते हैं, कोई अनुभव नहीं होता।
मैं जैन मुनियों के पास वर्षों तक निरीक्षण करता रहा। मुझे एक जैन मुनि नहीं मिला, जो ध्यान जानता हो! ध्यान के संबंध में बहुत जानता है। शास्त्र लिख देता है ध्यान पर। प्रवचन करता है ध्यान पर! और बड़ी बारीक बातें करता है--बाल की खाल निकालता है! लेकिन अनुभव कुछ भी नहीं। अनुभव से लेना-देना नहीं। अनुभव की बात ही भूल गई।
इसलिए महावीर के वृक्ष पर फूल नहीं लगे। महावीर के वृक्ष पर शास्त्र लटक रहे हैं! एक से एक बड़े शास्त्र वृक्ष की जान लिए ले रहे हैं! मगर फूल नहीं लगे।
हिंदू-धर्म तो सदियों से ब्राह्मणों के चक्कर में है, पंडितों और पुरोहितों के चक्कर में है। वे चाहते भी नहीं कि कोई ध्यान को उपलब्ध हो। और जो कोई ध्यान को उपलब्ध हुआ--उसको हिंदुओं ने निकाल बाहर किया। ऐसे ही तो जैन और बौद्ध अलग हुए। नहीं तो अलग होने की कोई जरूरत न थी।
बुद्ध को आत्मसात नहीं कर सके, क्योंकि बुद्ध ने ध्यान की घोषणा की--ज्ञान के विपरीत। यह ब्राह्मणों के बर्दाश्त के बाहर था। क्योंकि ब्राह्मण को उत्सुकता नहीं है ध्यान में। जब सस्ता ज्ञान मिलता हो, और ज्ञान के आधार पर आजीविका चलती हो--सदियों से चलती हो, और ज्ञान के आधार पर लोगों की छाती पर बैठने का मजा मिल रहा हो--कौन ध्यान की झंझट में पड़ेगा! ये बुद्ध और एक उपद्रव सिखाने आ गए! इनको अलग करो। इनको निंदित करो। खूब निंदा बुद्ध की की!
हिंदू-शास्त्र कहते हैं कि शैतान थक गया बैठा-बैठा नर्क के द्वार पर, कोई आए ही न, आए ही न! तो उसने फिर जाकर ईश्वर से प्रार्थना की कि तुमने क्या सृष्टि बनाई! यह नर्क किसलिए बनाया? क्या मैं ही बैठा रहूं वहां! कोई आता ही नहीं! तो उन्होंने कहा, मत घबड़ा। अब जब बनाया है, तो आदमी भी भेजूंगा। स्वभावतः। अब बन ही गई बात, तो कुछ उपयोग करेंगे। जल्दी ही मैं बुद्ध के रूप में अवतार लूंगा, और लोगों को भ्रष्ट करूंगा! जैसे मैं भ्रष्ट कर रहा हूं! ऐसे लोगों को भ्रष्ट करूंगा।
और बुद्ध का अवतार हुआ और लोगों को उन्होंने भ्रष्ट किया! और तब से नर्क ऐसा खचाखच भरा है कि तुम अगर आज मरो, तो सौ पचास साल तो क्यू में खड़े रहोगे, तब कहीं भीतर प्रवेश मिलेगा! वह भी रिश्वत वगैरह देनी पड़ेगी। क्योंकि क्यू में खड़े-खड़े थक जाओगे। सोचोगे कि नर्क भी ठीक, मगर कम से कम भीतर तो आने दो! कम से कम छप्पर तो होगा। अरे, सता लेना जो सताना हो, मगर यहां क्यू में कब तक खड़े रहें! भूखे, प्यासे, वर्षा, धूप! कम से कम रात तो सोने दोगे। यहां तो खड़े ही खड़े गुजर रहा है। और धक्कम-धुक्की अलग। और जरा लघुशंका को चले जाओ, कि दूसरा आ गया क्यू में नंबर! फिर पीछे खड़े होओ! जीवन संकट में है।
तो हिंदुओं ने यह कथा गढ़ी। मैं उनसे कह दूं कि अपनी कथा में इतना और जोड़ दो, कि जब से बुद्ध भारत से उखड़ गए, फिर नर्क में भीड़ कम हो गई। अब मुझको भेजा है! अब फिर बिगाडूंगा लोगों को! आखिर कोई तो चाहिए जो बिगाड़े! सब लोग बनाते ही रहें, बनाते ही रहें, बनाते ही रहें--सृष्टि का क्या होगा फिर! सभी लोग यहां मुक्त करवाते रहें, मुक्त करवाते रहें, तो परमात्मा को अपना धंधा भी तो चलाना कि नहीं? आखिर वह भी सोचेगा कि यहां सभी आवागमन से मुक्त करवाने वाले महात्मा हों। अरे, कोई आवागमन में फंसाने वाला भी चाहिए! संतुलन बना रहता है। नहीं तो यह सृष्टि का मजा ही चला जाए। यहां जो देखो वही झाड़ उखाड़ने में लगा है। थोड़े दिन में बरबादी हो जाएगी, रेगिस्तान हो जाएगा। परमात्मा अपनी सृष्टि को ऐसे बरबाद होते हुए नहीं देखना चाहता। कभी-कभी अपने कुछ प्रेमियों को भेज देता है कि भैया, कुछ तो वृक्षारोपण करो! मैं वृक्षारोपण कर रहा हूं। मैं लोगों से कह रहा हूं: पैर जमा कर जीओ। क्या आवागमन से छुटकारा! जब परमात्मा ने भेजा है, तो राज होगा कोई उसका। उसके राज को पूरा समझो। रस लो।
परमात्मा गलती नहीं कर सकता। और यह तुम्हारी गलती नहीं है, खयाल रखना। तुम्हारा होना तुम्हारी गलती नहीं है। तुम्हारा होना अगर होगा, तो परमात्मा की गलती है। और परमात्मा गलती नहीं कर सकता। महात्मा गलती कर सकते हैं; परमात्मा गलती नहीं कर सकता। मगर क्या कहानी गढ़ी!
बुद्ध को उखाड़ फेंका। महावीर को भी टिकने नहीं दिया। बुद्ध में बड़ी क्रांति थी, बड़ी लपट थी, इसलिए बुद्ध को तो बिलकुल ही उखाड़ कर फेंकना पड़ा। महावीर थोड़े सौम्य प्रकृति के थे। सौम्य प्रकृति के इस अर्थ में कि उनकी भाषा में बगावत कम थी, परंपरा ज्यादा थी। स्वभावतः। क्योंकि महावीर जैन परंपरा के चौबीसवें तीर्थंकर थे। उनके पहले कम से कम ढाई हजार साल तक परंपरा रह चुकी थी। इसलिए महावीर परंपरावादी थे। वे बोले भी, तो भी परंपरा की सीमा के भीतर बोले। उन्होंने शब्द भी चुने, तो प्राचीन चुने, जिनको सुनने को लोग आदी हो गए थे। जिनसे लोग परिचित हो गए थे। जिनसे अब कोई चोट नहीं पड़ती थी। जिनसे कोई झकझोरा नहीं उठता था। कोई तूफान नहीं आता था; कोई आंधी नहीं उठती थी। परंपरा जिन अंगारों पर खूब राख जमा गई थी, उन्होंने उन्हीं अंगारों की चर्चा की। इसलिए हिंदुओं ने महावीर को उखाड़ कर नहीं फेंका। उनको आत्मसात कर लिया--तरकीब से आत्मसात कर लिया।
महावीर के आस-पास ब्राह्मण इकट्ठे हो गए। उनके ग्यारह ही गणधर, उनके ग्यारह प्रमुख शिष्य--सभी ब्राह्मण थे! उन्होंने महावीर की मिट्टी खराब कर दी। उन्होंने महावीर के आसपास भी पांडित्यवाद का, पुरोहितवाद का अड्डा जमा दिया। बात खतम हो गई। महावीर में वैसे ही क्रांति नहीं थी--परंपरा थी, अतीत था। और इन पंडितों ने कुछ रहा भी होगा थोड़ा-बहुत उसको भी बुझा दिया।
लेकिन बुद्ध में बड़ी जलती आग थी; इसको पंडित भी बुझा नहीं सके। ऐसा नहीं कि कोशिश नहीं की। बुद्ध के आसपास भी ब्राह्मणों का वर्ग इकट्ठा हुआ। सारि-पुत्र भी ब्राह्मण था। मौग्गलान भी ब्राह्मण था। और भी उनके बहुत से शिष्य ब्राह्मण थे। मगर बुद्ध की आग ऐसी थी कि ब्राह्मण गए, और उनका ब्राह्मणपन जल गया। बुद्ध के पास जाकर ब्राह्मण अपना पांडित्य भूल गया, और उसके शास्त्र जल गए।
महावीर के पास ब्राह्मण गया, वहां सब ठंडा-ठंडा था, शीतल था। ब्राह्मण ने अड्डा जमा दिया। और जब महावीर मर गए, तो ब्राह्मण के हाथ में पूरा का पूरा अड्डा आ गया। इसलिए जैन तो भारत में जिंदा रहे, मगर उनके वृक्ष पर फिर फूल नहीं लगे। लगते कैसे?
बुद्ध भारत से तो उखड़ गए, मगर वृक्ष जहां भी गया, जहां भी उसने जमीन में अपनी जड़ें जमा लीं, वहीं उसमें फूल लग गए। और चीन में सुंदर भूमि मिली। क्योंकि लाओत्सू ने भूमि को खूब तैयार किया था। अदभुत रूप से तैयार किया था। इसलिए जब बुद्ध की भाषा, बुद्ध के शब्द चीन पहुंचे, तो ऐसे चला लिए लोगों ने, जैसे प्रतीक्षातुर थे। जैसे वर्षों से वर्षा न हुई हो, और भूमि पुकार रही हो बादलों के लिए, कि घिर जाओ। और बुद्ध आए, तो जैसे मेघ घिरे, और मोर नाचे। पहली बूंदाबांदी हुई, और लोग अमृत से लबालब हो गए।
यहूदियों में हसीद पैदा हुए। हसीदों का सिलसिला जीसस से शुरू हुआ। जीसस को तो सूली पर चढ़ा दिया; तो जीसस के पीछे दो तरह के लोग आए--एक तो वे थे, जो खुले आम जीसस के साथ खड़े हो गए। वह खतरनाक काम था। जीसस के साथ खड़े होने का मतलब था--फांसी; मारे जाएंगे। दूसरे वे लोग थे, जो किसी तरह की बगावत या सामाजिक क्रांति में उत्सुक नहीं थे। लेकिन जीसस की बात की कीमत को समझ गए थे। वे चुपचाप गुफाओं में बैठ रहे। उन्होंने जगह-जगह छुपे हुए स्कूल बना लिए। छुपी मधुशालाएं! जहां वे जीसस का रस पीने लगे। रहे यहूदी। यूं बाहर से यहूदियों का आवेश उन्होंने बनाए रखा। भाषा यहूदियों की बोलते रहे। उद्वरण पुरानी बाइबिल के देते रहे। मगर अर्थ यूं करते रहे कि जो जीसस के थे।
इस तरह यहूदियों में हसीदों का जन्म हुआ। यह जीसस की छाप जो यहूदियों के भीतर छूट गई, यहूदियों के घर में जो चिंगारी छूट गई, जिसको वे न बुझा पाए। जो अलग हो गए, वे तो ईसाई हो गए। उनने एक अलग परंपरा बना ली।
और जान कर हैरानी होगी कि ईसाइयों में वह बात खो गई, जो हसीदों में बच गई। क्योंकि ईसाई सामाजिक संघर्ष में पड़ गए; लड़ाई-झगड़े में पड़ गए। तलवारें खिंच गईं; धर्म-युद्ध शुरू हो गए। उनको फुरसत ही न रही साधना की। उनको अवसर न रहा, मौका न रहा--ध्यान का।
ध्यान के लिए खूब समय चाहिए, खूब सुविधा चाहिए। यहूदी तो जो छिपे जीसस के साथी थे, उनको तो मौका रहा। वे तो चुपचाप अपने काम में लगे रहे। लेकिन जो बाहर हो गए थे, पहले तो यहूदियों से लड़ना पड़ा उनको, फिर मुसलमानों से लड़ना पडा। यह लड़ाई चलती ही रही, चलती ही रही। दो हजार साल की लड़ाई के बाद ईसाइयों के हाथ में कुछ भी नहीं बचा। पोप और पादरी! लेकिन यहूदियों के बीच जो लोग बच रहे थे, छुप रहे थे, उन्होंने गजब का काम किया। उन्होंने हसीदों की परंपरा पैदा की।
इसलिए यहूदी बहुत प्रसन्न नहीं हैं हसीदों से--खयाल रखना। मगर करें भी क्या! वे यहूदी ही हैं। वे बाहर कभी गए नहीं। उन्होंने बाहर कभी जाना नहीं चाहा। इसलिए यहूदियों में उनका कोई सम्मान नहीं है बहुत। लेकिन उनको निकाल भी नहीं सकते। वे बात तो पुराने धर्म की ही बोलते हैं। वे भाषा तो वही उपयोग करते हैं।
मार्टिन बूबर शुरू से ही यहूदियों की इस हसीद परंपरा में उत्सुक हो गया--अपने पिता के कारण। और हसीदों के जगह-जगह अड्डे थे। और हसीद बड़े मस्त लोग हैं। नाचते हैं, गाते हैं। मेरे पास जो बहुत से यहूदी आ गए हैं, उनके आने का कारण हसीद हैं। क्योंकि मेरे पास जो घटित हो रहा है, उसमें उन्हें हसीदों का साफ-साफ स्वर सुनाई पड़ता है।
हसीद मस्ती में विश्वास करते हैं। हसीदों के छोटे-छोटे मेले भरते हैं। मार्टिन बूबर ने उनका संस्मरण लिखा है, अपने बचपन का, कि हसीदों के मेले अब तो उजड़ गए; अब तो नहीं भर सकते। लेकिन बचपन में जब मार्टिन बूबर छोटा था, तो हसीदों के मेले भरते थे। उसने लिखा है, जो मैंने हसीदों के मेलों में देखा, फिर वैसा मुझे कहीं नहीं दिखाई पड़ा। काश! अगर वह आज जिंदा होता, तो उसे यहां बुलाते। उसको कहते कि तू देख, फिर से देख! क्योंकि हसीदों का जो मेला होता था, वह क्या था? नाच ही नाच था! खाना, पीना, पिलाना, नाचना! हजारों की भीड़ साथ-साथ नाचती! हाथ में हाथ लेकर नाचती! स्त्री-पुरुष साथ-साथ नाचते! वह मस्ती! झूम जाते। बहार आ जाती। जाम पर जाम चल जाते।
छू गई उसे यह बात। लेकिन वह एक शास्त्रीय ढंग में लग गया। वह हसीदों की कहानियां इकट्ठी करने लगा। क्योंकि हसीदों के दो काम थे: एक--नाचना। नाचना उनकी प्रार्थना। और दूसरा--धर्म को बड़ी-बड़ी शास्त्रीय बातों में नहीं कहना, बल्कि छोटी-छोटी कहानियों में। और कहानियां हसीदों की बड़ी प्यारी हैं। छोटी-छोटी कहानियां, मगर बड़ी प्यारी, बड़ी चोट करने वाली, बड़ी तीखी--तीर की तरह चुभ जाएं!
तो उन्होंने हसीदों में रस तो लिया, लेकिन रस उनका शास्त्रीय हो गया। उन्होंने इकट्ठी की हसीदों की कहानियां, उनकी जीवनचर्या, उनके नृत्य का ढंग, उनके गीत। और वे उसी में भटक गए। वे हसीद परंपरा के बड़े विद्वान हो गए। लेकिन हसीद होने से वंचित। न तो कभी नाचे, न कभी गाए। न कभी मस्त हुए। न कभी हसीदों की मधुशाला में रिंद बने। न कभी पीया, न पिलाया। मगर हसीदों के संबंध में जो प्रामाणिक कहानियों का संकलन किया, वह उनका अनुदान है मनुष्य जाति के लिए।
इसलिए मैं कहता हूं: वे महापुरुष थे। अदभुत विद्वान थे। अदभुत संग्राहक थे--बड़े प्रामाणिक। लेकिन बुद्धत्व के करीब की तो बात ही छोड़ दो अजित सरस्वती! दूर भी नहीं। बुद्धत्व से कुछ लेना-देना नहीं।
तुमने पूछा है, उन्होंने जीवन के आध्यात्मिक और भौतिक दोनों पहलुओं को स्वीकार करता हुआ यहूदी मानवतावाद पर खड़ा हुआ एक संघ बसाना चाहा।
हसीदों की वह अपूर्व देन है--कि भौतिकवाद और अध्यात्मवाद का मेल होना चाहिए।
तुमने अकसर इस देश में साधु-महात्माओं को भौतिकवादियों की निंदा करते हुए यह बात सुनी होगी, कि इनका दर्शन एक है, कि खाओ-पीओ-मौज करो। किसी की निंदा करनी हो इस देश में, तो हम इस तरह निंदा करते हैं कि अरे, वह क्या! खाओ-पीओ, मौज करो--यही उनकी जिंदगी है! चार्वाकवादी है। चार्वाक शब्द का भी हमने अपना यही अर्थ कर लिया कि जो चरने में रस ले! खाए, पीए, मौज करे। चरने-चरने में लगा रहे। हालांकि चार्वाक का यह अर्थ था नहीं। यह जबर्दस्ती दुश्मनों ने थोप दिया। चार्वाक आता है--चारुवाक से। चारुवाक का अर्थ होता है: जिनके शब्द बड़े मीठे, रस भरे। जिनके शब्दों में शराब है। एक घूंट उतर जाए, तो मस्ती छा जाए, कि पतझड़ में वसंत आ जाए! चारुवाक!
लेकिन इस देश के तथाकथित महात्माओं ने चारुवाक को हटा कर चार्वाक शब्द उपयोग करना शुरू कर दिया। मुझे चार्वाक कहते हैं! मेरे खिलाफ जो वक्तव्य दिए जाते हैं, उनमें लिखा जाता है: यह व्यक्ति चार्वाकवादी है!
खाओ, पीओ, मौज करो--मैं भी कहता हूं। लेकिन भौतिकवादी में और मुझमें, भौतिकवादी में और हसीद फकीर में भेद है। भौतिकवादी कहता है: खाओ, पीओ, मौज करो। बस, खतम। हसीद फकीर कहता है: खाओ, पीओ, मौज करो। फिर बात शुरू होती है। उसके बाद ही असली बात शुरू होती है। जब तक तुम खाने-पीने में भी मौज न ले सकोगे, तब तक तुम और ऊंची मौज न ले सकोगे।
कल किसी मित्र ने पूछा था न, किसी वाचस्पति ने, कि आपने कह दिया कि यह धर्म-चक्र-प्रवर्तन नहीं है। यहां तो मजा-मौज है। यह तो मयखाना है, मयकदा है। वे बेचारे वे ही पंडितों, और महात्माओं के, और साधुओं के शब्दों से भरे होंगे। उनका कुछ कसूर नहीं। वही निंदा!
निश्चित मैं कहता हूं: खाओ, पीओ, मौज करो। कहता हूं, यह मयकदा है। क्योंकि मयकदा ही मंदिर बन सकता है। जहां पीने वाले न हों, वहां मंदिर नहीं। और जहां पियक्कड़ बैठ जाएं, वहां आ गई काशी, आ गया काबा।
लेकिन पियक्कड़ के दो पहलू हैं। जैसे कि हमारे जीवन की हर चीज के दो पहलू हैं: एक शरीर और एक आत्मा। शरीर को भी मत उपेक्षा करो। उसे भी खाने दो, पीने दो। वह भी तो परमात्मा का ही रूप है, उसकी अभिव्यक्ति है। उसके भी तो कण-कण में परमात्मा ही समाया हुआ है। पदार्थ भी तो परमात्मा है।
शरीर को भी खाने दो, पीने दो, मौज करने दो। यह तो पहला पाठ है मौज का। मगर यहीं रुक जाओ, तो भौतिकवादी। और अगर इससे आगे बढ़ो--तो अध्यात्म। फिर आत्मा की भी मौज है। आत्मा का भी खाना है; आत्मा का भी पीना है, आत्मा की भी मस्ती है, आत्मा की भी मधुशाला है। उसको मैं मंदिर कहता हूं।
पहले शरीर का मयकदा बनने दो। फिर आत्मा का बुतखाना भी बना लेंगे। कुछ अड़चन नहीं है। मगर बात शुरू से शुरू होनी चाहिए, अ ब स से शुरू होनी चाहिए। शरीर से प्रारंभ--आत्मा पर अंत। हसीदों की यही जीवन-दृष्टि है।
मैं हसीदों से पूरी तरह राजी हूं। मैं बिलकुल सरलता से कह सकता हूं कि मैं एक हसीद हूं। और मैं चाहता हूं कि दुनिया में अब उस धर्म की स्थापना हो, जो शरीर और देह का इनकार न करता हो; जो पदार्थ का और बाह्य का अस्वीकार न करता हो। जो जीवन का समग्ररूपेण अंगीकार करता हो--परिधि भी और केंद्र भी। आखिर परिधि भी तो केंद्र की ही है। और केंद्र भी परिधि के बिना कहां?
आत्मा और देह एक ही ऊर्जा के दो रूप हैं; एक भीतरी--एक बाहरी। शरीर है आत्मा का बहिरंग, और आत्मा है शरीर का अंतरंग। मत करो भेद। भेद के कारण मनुष्य जाति खंडित हो गई। मनुष्य जाति के भीतर प्रत्येक व्यक्ति टुकड़े-टुकड़े हो गया। अब छोड़ो सब भेद। इसको मैं सच्चा अद्वैतवाद कहता हूं।
शंकराचार्य के अद्वैतवाद को मैं सच्चा अद्वैतवाद नहीं कहता। अधूरा अद्वैतवाद कहता हूं। क्योंकि उसमें माया का निषेध है और ब्रह्म का स्वीकार है। ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या। मेरा अद्वैतवाद पूरा है: ब्रह्म सत्य जगत सत्य!
क्यों असत्य को जगह देते हो? क्यों असत्य को थोड़ा-सा भी स्थान देते हो! जो है, सब सत्य। स्वप्न का भी अपना सत्य है। नहीं तो स्वप्न भी कैसे होगा! होता तो है। क्षणभर ही सही, मगर होता तो है। उसका भी अपना सत्य है। चांद सच्चा है, माना। लेकिन चांद का जो प्रतिफलन बनता है झील में, वह भी सच्चा है। क्षण भर को ही सही, मगर है तो चांद का ही प्रतिफलन। झील भी सच्ची है। चांद भी सच्चा है। तो प्रतिफलन कैसे झूठ हो जाएगा? हां, यह मैं नहीं कह रहा हूं कि प्रतिफलन चांद है। प्रतिफलन प्रतिफलन है।
तुम दर्पण के सामने खड़े होते हो। तुम सच्चे, दर्पण सच्चा--तो दर्पण में बनने वाली तस्वीर कैसे झूठी हो जाएगी? हां, यह मैं नहीं कह रहा हूं कि दर्पण में बनने वाली तस्वीर तुम हो। तस्वीर तस्वीर है, तस्वीर की तरह सच्ची है।
माया माया की तरह सत्य है। जगत जगत की तरह सत्य है। ब्रह्म ब्रह्म की तरह सत्य है। दोनों का अपना सत्य है। और दोनों का सत्य जहां मिलता है, एक होता है, वहीं व्यक्ति अपनी परिपूर्णता में प्रकट होता है। उस व्यक्ति को ही मैं धार्मिक कहता हूं। उसको ही मैं परम बुद्ध कहता हूं। वैसे व्यक्ति के जीवन में इनकार होता ही नहीं; सर्व स्वीकार होता है। उसे न कुछ साधारण है, न कुछ असाधारण। वैसा व्यक्ति साधारण को छूता है--असाधारण कर देता है। मिट्टी छूता है, सोना हो जाती है।
मैं तुम्हें वही कीमिया देना चाहता हूं कि कैसे मिट्टी सोना हो जाए।
तुम्हारे महात्मा तुम्हें समझाते रहे कि सोना मिट्टी है। मैं तुम्हें समझाता हूं: मिट्टी सोना है। और मैं तुमसे कहता हूं कि तुम्हारे महात्मा तुमसे झूठ कहते रहे। क्योंकि तुम सोने को उनके पास ले जाओ, वे छूते नहीं! कहते हैं, सोना मिट्टी है। मिट्टी पास ले जाओ, तो डरते नहीं। सोना पास ले जाओ, फिर डरते क्यों हैं? जब कहते हैं, सोना मिट्टी है, तो फिर क्या अड़चन आ रही है?
कबीर का बेटा था कमाल। कबीर यूं बड़े क्रांतिकारी थे, मगर फिर भी कहीं-कहीं परंपरा लिपटी हुई थी। कमाल कमाल ही था। कबीर का बेटा था; कबीर से भी दो कदम आगे गया था।
बेटा ही क्या, जो बाप से दो कदम आगे न जाए! बाप की इज्जत भी इसमें है कि बेटा दो कदम आगे जाए। बाप की बेइज्जती है यह कि बेटा वहीं रुक जाए, जहां बाप रुक गया। मगर सब बाप अपनी बेइज्जती चाहते हैं--करो भी तो क्या करो! सब बाप चाहते हैं: बेटा वहीं रुक जाए, जहां तक मैं गया! वहां से इंच भर आगे न बढ़े। क्योंकि बाप के अहंकार को चोट लगती है कि कहीं बेटा आगे न चला जाए। हालांकि असली बाप हो, तो धक्का देगा बेटे को कि यहीं मत रुक जाना। अरे, यहां तक तो मैं ही आ गया। तेरी क्या जरूरत थी! आगे जा।
जिस दिन कबीर ने कमाल को कमाल नाम दिया था, उसी दिन स्वीकार कर लिया था कि है कुछ कमाल इस लड़के में! कुछ बात हो कर रहेगी। मगर कमाल इतना था, कि कबीर को भी आत्मसात कर लेना मुश्किल था। यूं तो वे बड़े हिम्मत के आदमी थे। बड़े फक्कड़ आदमी थे। कहां उनके मुकाबले का फक्कड़ हुआ भारत में!
कबीर कहते हैं:
कबिरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ।
घर जो बारै अपना चले हमारे साथ।।
लट्ठ लिए बाजार में खड़ा हूं। है कोई माई का लाल! चलता है मेरे साथ! तो लगा दे अपने घर में आग। ऐसे हिम्मत का आदमी! मगर कमाल, आखिर कबीर का ही बेटा था। वह और दो कदम आगे चला गया। जैसे मैं तुमसे कह रहा हूं कि शंकराचार्य से मैं दो कदम आगे! जाना भी चाहिए। शंकराचार्य को बीते हजार साल हो गए। अगर हजार साल में दो कदम भी न चले, तो हद्द हो गई। तो फिर जिंदा क्या हो! मर ही गए! मर ही जाते तो अच्छा था।
कबीर कहते थे, कमाल वही करता था। मगर कई बातें महात्मा कहते हैं--करने की नहीं होती। जैसे कबीर कहते थे--सोना मिट्टी है। यह तो बड़ी प्रचलित बात थी कि सोना मिट्टी है। कबीर कहते थे, बचो कामिनी-कांचन से।
कमाल को यह बात न जंचती, कि जब सोना मिट्टी है, तो बचना क्या? जब मिट्टी है, तो बचना क्या? या कहो कि मिट्टी नहीं है--तो फिर बचने की बात उठती है!
काशी नरेश को पता चला कि कमाल कुछ उल्टी-सीधी बातें कहता है। अपने बाप के खिलाफ कह देता है। देखें!
परीक्षा करने के लिए वह लाया एक बहुत बड़ा हीरा--जो उसके पास सबसे कीमती हीरा था। और उसने कमाल को भेंट किया। उसने सुना था कि कमाल भेंट ले लेता है। कबीर तो भेंट लेते नहीं थे। कबीर को कुछ लाए कोई, तो वे कहें कि नहीं भाई, मैं परिग्रह नहीं करता। अरे, इस मिट्टी को मेरे सामने से ले जाओ। मुझे नहीं चाहिए सोना। सोना मिट्टी है। मैं क्या करूंगा हीरा। हीरा तो कंकड़-पत्थर है।
कमाल बगल के ही झोपड़े में रहता था। कबीर उसको अपने झोपड़े में नहीं रहने देते थे। क्योंकि कबीर जिसको लौटा देते...कोई सोना लाता, कोई हीरा लाता, कोई चांदी लाता...। जिसको कबीर लौटा देते, कमाल बाहर ही बैठा रहता, वह कहता, रख दे रे! यहीं रख दे। अरे, जब मिट्टी है--कहां ले जा रहा है! छोड़ जा।
कबीर को बहुत दुख होता है कि मैं तो किसी तरह उसको भगाया और इसने रखवा लिया! लोग क्या सोचेंगे कि यह तो तरकीब दिखती है। बाप बेटे की सांठ-गांठ दिखती है! इधर बाप कहता है कि सब मिट्टी है, ले जा। और बेटा कहता है कि रख जाओ। कहां ढोते फिरते हो?
तो उसको कहा कि तू भैया, बगल के झोपड़े में रह। यह तेरा ज्ञान तू अलग चला! तो कमाल अलग रहने लगा।
काशी नरेश ने आकर हीरा भेंट किया। कमाल ने कहा, क्या लाए! लाए भी तो कंकड़-पत्थर! न खा सकते, न पी सकते। अरे, कुछ फल लाते, कुछ मिठाई लाते! बात पते की कही कि क्या करूंगा इसका!
नरेश ने सोचा कि अरे, लोग तो कहते थे कि वह रखवा लेता है! और यह तो बिलकुल और ही बात कर रहा है! तो उसने कहा कि मेरी आंख खुल गई। मैं तो कुछ और ही आपके संबंध में सुना था।
उठ कर चलने लगा हीरे को लेकर। उसने कहा, रुको, अब ले ही आए, तो अब मिट्टी कहां वापस ले जाते हो? समझे नहीं कि मिट्टी है! छोड़!
तब नरेश समझा कि यह आदमी तो बड़ा हद्द का है! पहले तो ऐसा जंचा कि बिलकुल महात्मा जैसी बात कर रहा है। अब तरकीब की बात कर रहा है कि छोड़!
मगर वह भी परीक्षा ही लेने आया था। उसने कहा, कहां रख दूं?
कमाल हंसने लगा कि फिर ले जा। क्योंकि जब तू पूछता है कि कहां रख दूं, तो तू समझा नहीं। तो अभी भी तुझे हीरा ही मालूम हो रहा है। तो पूछता है: कहां रख दूं। अरे, पत्थर को कोई पूछता है कहां रख दूं। कहीं भी रख दे रे! जहां तेरी मर्जी, वहां रख दे।
नरेश तो बड़ी बिबूचना में पड़ा कि यह बात क्या है! उसने वहीं झोपड़े के छप्पर में, सनौलियों का छप्पर था, वहीं हीरे को खोंस दिया। बाहर निकला सोचता हुआ कि इधर मैं बाहर गया, और इसने हीरा निकाला!
कोई पंद्रह दिन बाद आया कि देखें, क्या हाल है! मस्त, कमाल बैठा था। बज रहा था इकतारा। थोड़ी देर इधर-उधर की बात की। फिर नरेश ने पूछा कि हीरे का क्या हुआ?
कमाल ने कहा, कौन-सा हीरा?
अरे, नरेश ने कहा, हद्द कर दी! पंद्रह दिन पहले एक हीरा दे गया था। इतना बहुमूल्य हीरा--भूल ही गए?
कमाल ने कहा, हीरा! एक कंकड़ तुम लाए थे, और पूछते थे, कहां रख दूं; वही तो नहीं! तो तुम जहां रख गए थे, अगर कोई ले न गया हो, तो वहीं होगा। और कोई ले गया हो, तो मुझे पता नहीं!
नरेश ने कहा, है पक्का चालबाज! निकाल भी लिया है इसने--और कह रहा है: कोई ले गया हो, तो मैं क्या कर सकता हूं।
फिर भी उठ कर देखा। चकित हो गया। आंख से आंसू झरने लगे। हीरा वहीं का वहीं रखा था। वही सनौलियों में दबा था। पैरों पर गिर पड़ा।
कमाल ने कहा, क्या पैरों पर गिरते हो! तुम कब समझोगे? तुम अभी भी उसको हीरा मान रहे हो! इस पैरों पर गिरने में भी तुम हीरा ही मान रहे हो। अगर वह वहां न मिलता, कोई ले गया होता--कोई ले ही जाता! कोई मैं यहां चौबीस घंटे उसका पहरा देता हूं? नदी नहाने जाता हूं। गंगा स्नान करता हूं। भजन-कीर्तन करने चला जाता हूं। बाहर भी बैठता हूं। कोई ले ही गया होता। कितने लोग आते-जाते हैं। तो जरूर तुम यही खयाल लेकर जाते कि मैंने निकाल लिया है। अब तुम भैया, उसे ले जाओ। तुम खुद सम्हालो।
और तुम मेरे पैर पर गिरे, उससे पता चलता है कि हीरे का मूल्य है। चूंकि बच गया, इसलिए तुम मेरे पैर पर गिर रहे हो। अगर हीरा न बचता--तो? तो तुम मेरी गरदन काट लेते! ऐसी झंझट यहां न छोड़ो। तुम अपना हीरा ले जाओ।
मगर यह कमाल ज्यादा पते की बात कह रहा है--कमाल की बात कह रहा है!
कबीर ने भी आखिर में इसको स्वीकार किया है। और कबीर ने कहा है: बूढ़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल।
कबीरपंथी तो इसको निंदा मानते हैं, कि यह कमाल की निंदा है, कि बूढ़ा वंश कबीर का--कि कबीर का वंश नष्ट कर दिया इस दुष्ट ने! यह दुष्ट क्या पैदा हो गया कमाल, इसने मेरी सब परंपरा खराब कर दी!
लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। मैं तो मानता हूं: कबीर ने यह अंतिम सील-मुहर लगा दी कि बूढ़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल!
कबीर यह कह रहे हैं कि मुझसे तो कम से कम एक बेटा भी पैदा हुआ था। इतना भी मैंने संसार चला दिया था। मगर यह कमाल अदभुत है। न इसने विवाह किया, न वंश चलाया। उपजा पूत कमाल! यह है कमाल! और क्या गजब का आदमी कि जैसा मैंने कहा है, वैसा ही माना है, वैसा ही जीया है!
यह स्वीकृति की मुहर है। मगर इसको तो कोई समझे--तो समझे। बुद्धू इसको नहीं समझ सकते।
हसीद फकीर इस जगत को और उस जगत को साथ-साथ स्वीकार करते हैं। यह जगत, वह जगत भिन्न-भिन्न नहीं है। मेरी भी वह स्वीकृति है। यह हसीदों की जमात है। मगर मार्टिन बूबर हसीदों की सेवा तो किए--उनकी कहानियां, उनके गीत इकट्ठे कर के, लेकिन हसीद होने से वंचित रह गए। ध्यान का उन्हें कभी स्वाद न लगा। प्रार्थना कभी उन्होंने जानी नहीं। केवल विद्वान थे, तो भी यहूदियों ने उनका विरोध किया।
अजित सरस्वती! तुम पूछते हो कि वे अपने ही देश में निंदित रहे, जब कि दुनिया भर के लोग उनसे प्रभावित थे।
ऐसा ही होता है। अपने ही देश में निंदा झेलनी पड़ती है ऐसे लोगों को, जो कुछ पते की बात कहें। क्योंकि जो अपने हैं, वे नहीं चाहते कि कोई ऐसी बात कहे, जो उनके विपरीत पड़ जाए। और पते की बात कहनी हो, तो बहुत लोगों के विपरीत पड़ेगी। मजबूरी है।
इस दुनिया में भीड़ है अंधों की, पागलों की, विक्षिप्तों की। अगर पते की बात कहनी हो, उनके खिलाफ पड़ने वाली है। वे विपरीत हो ही जाएंगे।
तुम पूछते हो: कच्छ में बसते हुए हमारे कम्यून के संदर्भ में भी इस संबंध में कुछ कहने की अनुकंपा करें।
फिर मैं कोई विद्वान नहीं हूं। तो मैं तो एकाध पते की बात नहीं कह रहा हूं। पते ही पते की बात कह रहा हूं। एक-एक शब्द परंपरावादी के लिए जहर है, मौत है, तीर है। इसलिए मेरा विरोध तो बिलकुल स्वाभाविक है। इसे हमें आनंद से स्वीकार करना है--अहोभाव से। यह धन्यवाद है पूरे देश का। इससे अन्यथा इसे मत लेना। यह उनकी आभार-अभिव्यक्ति है।
आज इतना ही।
श्री रजनीश आश्रम, पूना, प्रातः, दिनांक ३० जुलाई १९८०