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गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

अनंत की पुकार—(अहमदाबाद)-प्रवचन-10

अनंत की पुकार(अहमदाबाद)
ओशो


प्रवचन-दसवां-(कार्यकर्ता का व्यक्तित्व)

दोत्तीन बातें कहनी हैं। एक तो इस संबंध में थोड़ा समझना और विचारना जरूरी है। काम बड़ा हो और कार्यकर्ता उसमें उत्सुक हो काम करें, तो उन कार्यकर्ताओं में कुछ होना चाहिए, तो काम को आगे ले जा सकते हैं, नहीं तो नहीं ले जा सकते। वह कोई सामान्य संस्था हो, कोई सेवा-प्रसारी हो, कोई और तरह की सामाजिक संस्था हो, तो एक बात है। जिस तरह की बात लोगों में पहुंचानी है, तो हमारे पास जो कार्यकर्ता हों, उनमें उस तरह की कोई लक्षणा और उस तरह के कुछ गुण होने चाहिए। तो ही काम ठीक से पहुंचे, नहीं तो नहीं पहुंच सकता।
जैसे कि हमारे पास, शिविर, अगर बीस कार्यकर्ता शिविर में काम कर रहे हैं, तो उन बीस के ध्यान में उनकी थोड़ी गति होनी चाहिए। और उनके व्यक्तित्व में भी थोड़ा परिवर्तन आना चाहिए। वे अलग से दिखाई पड़ने चाहिए। नहीं तो उनसे फिर यह काम बहुत मुश्किल है होना। इसलिए एक खास कार्यकर्ता यहां अलग से बैठें। और आगे यह भी मेरा खयाल है कि कार्यकर्ताओं का एक शिविर अलग भी हो। क्योंकि उनको एक नुकसान पहुंचता है, वह पूरा उसमें से नहीं ले पाते। काम में उलझे हुए...।

अगर वे बिलकुल सामान्यजन जैसे हों, तो काम भला उनसे हो, लेकिन काम में जो परिणाम आने चाहिए वे नहीं आ सकते। अभी खयाल में नहीं थी यह बात, लेकिन यह कुछ करनी पड़े कि कार्यकर्ताओं का एक अलग वर्ग खड़ा होना चाहिए। और उसके लिए मैं, जो भी मेहनत मुझे करनी है, वह मैं करने को तैयार हूं। आपको जो करनी है उसकी थोड़ी तैयारी होनी चाहिए। क्योंकि अगर कोई बहुत नया विचार लोगों तक पहुंचाना हो, तो हमें नये तरह का व्यक्तित्व भी खड़ा करना होगा। और दूसरों से इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती। जो लोग इस काम को करने में और फैलाने में उत्सुक हैं, उनसे और ज्यादा अपेक्षा होनी चाहिए। हमारा व्यवहार भी भिन्न होना चाहिए।
अब मेरे मन में एक-एक छोटे से छोटे आदमी के प्रति आदर है। अगर इस काम करने वाले लोगों के मन में वैसा आदर न हो, तो बड़ी उलटी बात हो जाती है। यानी काम भला करना है, लेकिन वह काम कोई बहुत मूल्य लाने वाला नहीं। जिस दृष्टि से मैंने जाना, उस दृष्टि से नहीं होने वाला। अब मेरे मन में तो एक अदना से अदना आदमी का उतना ही आदर है जितना तीर्थंकर का, या भगवान का। समझो जो मेरे काम को बढ़ाने वाले हों, उनके मन में अगर ऐसा आदर न हो साधारणजन के प्रति, तो फिर वे मेरी बात पहुंचा नहीं सकते बहुत दूर तक।
यानी एक तो निर्जीव काम है, जो कोई भी पहुंचा सकता है--कि किताब छाप लेनी है, किताब बेच देनी है, वह निर्जीव काम है। एक बहुत सजीव क्रांति है, वह आपके जीवन में उतरे तो ही पहुंच सकती है, नहीं तो नहीं पहुंच सकती।
तो इस संबंध में जब भी शिविर हो, मीटिंग हो, तो हर जगह जो हमारे काम करने वाले मित्र हैं उनको तो अलग से बैठना चाहिए। उनके अपने मसले, उनकी अपनी समस्याएं होनी चाहिए, जिनको कि उनको मौका नहीं मिलता बात करने का भी उन सबके बाबत। और आज नहीं कल हमें कार्यकर्ताओं की छोटी शिविर, बीस-पच्चीस लोगों की छोटी शिविर तीन-चार दिन के लिए, जहां वे मेरे साथ तीन-चार दिन रह सकें ज्यादा सुगमता से, इतना बड़ा बोझ उनके ऊपर न हो, और वहां वे अपने मसले हल कर सकें। क्योंकि बहुत से मसले उनके सामने हैं जिनकी कि मुझसे बातचीत उन्हें करनी बहुत जरूरी है। और जैसे कि इस तरह के जो भी काम हैं, मुझ अकेले से वह होने वाला नहीं है। मैं अपनी सारी ताकत भी लगाऊं तो भी मुझ अकेले से क्या हो सकता है! बात इतनी है कि उसे अगर ठीक से पहुंचाना हो, तो हमें बहुत से व्यक्तियों को निर्मित करना पड़े, जो इस बात को ले जाने वाले बनेंगे।
एक तो निर्जीव प्रोपेगेंडा होता है कि उसको वे किसी तरह भी पहुंचा दें ढोल पीट कर। तो वैसा कुछ करने का प्रयोजन नहीं है। वैसे पहुंचती है बात तो बीच में मर जाती है। दूसरा एक सजीव उनका व्यक्तित्व होना चाहिए कि उन्हें देख कर लगे कि यह आदमी भी इस बात में उत्सुक हुआ है, किसी भी व्यक्ति को उसे देख कर लगे कि मुझे भी उत्सुक होना चाहिए। लेकिन अगर यह हमारा काम करने वाला भी छोटी-छोटी बात में नाराज होता हो, रुष्ट होता हो, गुस्से से भर जाता हो, छोटी-छोटी बातों में लड़-झगड़ बैठता हो, तो यह जिस बात को ले जाने के लिए हम सोचते हैं कि यह वाहक बनेगा, वह बात कैसे पहुंचाई जा सकती है? ठीक दिशा, अभी तो कोई ऐसा काम नहीं है, लेकिन आज नहीं कल वह काम बड़ा हो सकता है। और अगर हमारे पास ठीक मित्रों का एक समूह है, तो मैं अपनी पूरी ताकत लगाऊं तो भी इतने परिणाम नहीं आ सकते, जब तक कि मित्रों का एक वर्ग न हो।
मुझे तो उतना ही श्रम पड़ता है, चाहे पांच सौ लोग यहां इकट्ठे हों, चाहे पांच हजार लोग इकट्ठे हों, उसमें मेरे श्रम में तो कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। ज्यादा से ज्यादा लोग उस चीज का फायदा उठा सकें, तो उसके लिए हमें एक मित्रों का वर्ग खड़ा करना पड़े। और वह ऐसे मित्रों का वर्ग खड़ा करना पड़े कि जिस तरह के भी व्यक्ति हमें उपलब्ध हो सकें, हर व्यक्ति से कुछ न कुछ काम लिया जा सकता है। इस जमीन पर ऐसा तो आदमी कोई भी नहीं है जिससे कि कोई भी काम न लिया जा सके। सैकड़ों लोग उत्सुक हैं और वे मुझे कहते हैं जगह-जगह कि हम काम करना चाहते हैं। तो मैं उनको क्या बता सकता हूं? या क्या काम उनके लिए कहूं?
तो आपका एक वर्ग होना चाहिए जो कि उनकी सेवाएं ले सके, उनका श्रम ले सके। वे जो भी सहायता पहुंचाना चाहते हैं, उस सहायता को पूरी तरह ले सके। लेकिन यह आप तभी ले सकते हैं--क्योंकि नया आदमी आता है, अगर वह आज तीन दिन में प्रभाव में आया है, कोई बात समझ में बैठी है और वह आपके पास आया है, और आप अगर बहुत उपेक्षा से उसकी बात सुनें या ऐसे कि हां, ठीक है, कुछ देखेंगे, तो आप एक व्यक्ति खोते हैं जो कि बहुत काम का हो सकता था। वह जब आया था कुछ उत्सुकता लेकर, तो आपके मन के द्वार तो बहुत प्रेमपूर्ण रूप से उसके लिए खुले होने चाहिए। और यह मौका था कि वह व्यक्ति आपके काम में सम्मिलित होता। लेकिन अगर आपने अपेक्षा की, ऐसे ही कहा कि हां, ठीक है, देखेंगे, तो वह आदमी गया। हो सकता था वह कितना काम लाता, हम नहीं कुछ कह सकते हैं। कई बार बहुत छोटे-छोटे लोगों ने भारी काम किए हैं। और बड़े आदमी कोई आकाश से तो पैदा होते नहीं, सब छोटे-छोटे लोग पैदा होते हैं। वह कभी कोई वक्त और काम उन्हें बड़ा बना देता है।
तो हमें प्रत्येक आदमी, जो भी जिस हैसियत से उत्सुक है--पत्थर भी उठाने के लिए और इधर-उधर रखने के लिए कोई उत्सुक है--तो उसका बहुत प्रेम से स्वागत करके उसका उपयोग करना है। और काम इतना बड़ा है कि अगर हम दस-पंद्रह वर्ष ठीक से मेहनत करें, तो इस पूरे मुल्क में एक पूरी क्रांति का वातावरण खड़ा किया जा सकता है। मुल्क तैयार है, मुल्क का मन तैयार है, अगर हम नहीं कर पाएं वह तो वह सिर्फ हमारी कमजोरी और हमारी नासमझी और हमारी असमर्थता होगी। नये युवक हैं, उनके साथ आज कोई उनके जीवन में कोई दिशा नहीं है, कोई मार्गदर्शन नहीं है। तो रुकेंगे थोड़े ही, वे तो चलेंगे ही, गैर-मार्गदर्शन के चलेंगे, गैर-दिशा के चलेंगे। जहां मुल्क जाएगा, जाएगा। अगर हम थोड़ी हिम्मत करें और मेहनत करें, तो उनको मार्ग, दिशा मिल सकती है। और ऐसी स्थिति हमारे मुल्क के युवक की ही नहीं, सारी दुनिया के युवक की है। अगर यहां हमारा प्रयोग सफल होता है, तो वह व्यापक पैमाने पर बाहर भी पहुंच सकता है।
तो एक तो हमारी उत्सुकता होती है इतने दूर तक, कि आप आए हैं, क्योंकि आपको अपने व्यक्तित्व में थोड़ी उत्सुकता है, आप थोड़ा शांत होना चाहते हैं। लेकिन मैं आपसे कहूं, बहुत ज्यादा अपने में ही निरंतर उत्सुक होना एक तरह का रोग है। थोड़ी उत्सुकता स्वयं में होनी चाहिए, लेकिन यह अत्यधिक सेल्फ-सेंटर्ड आदमी जो है वह कभी शांत नहीं हो सकता, क्योंकि यह भी अशांति का एक केंद्र है उसका कि मैं, मैं, मैं--मैं ठीक हो जाऊं, मैं ऐसा हो जाऊं, मैं वैसा हो जाऊं--अगर यह अत्यधिक है उसके चित्त में, तो यही चीज उसको शांत नहीं होने देगी। अगर हमें कोई चीज सत्य मालूम पड़ती हो, कोई चीज ठीक मालूम पड़ती हो, तो हमें अपने मैं के दायरे के थोड़े बाहर आना चाहिए और हमें यह फिकर करनी चाहिए कि अगर यह बात ठीक है तो यह और लोगों तक पहुंच जाए।
और आप हैरान होंगे कि जिस दिन आप दूसरों में उत्सुक होंगे, उस दिन आप पाएंगे कि आपकी वह जो मैं की बीमारी थी जिसकी वजह से आप अशांत थे, वह पचास प्रतिशत विलीन हो गई है। सिर्फ इस वजह से कि आप औरों में भी उत्सुक हुए हैं।
तो यह धार्मिक आदमी जिसको हम कहते हैं उसमें एक जो बुनियादी बीमारी होती है वह यह कि वह अपने में उत्सुक होता है। और इसी तरह जो कौमें बहुत धार्मिक हो गई हैं उनमें हर व्यक्ति सेल्फिश हो गया। वह धर्म का हाथ है उसके पीछे। यानी उसमें वे यह सोचते ही नहीं कि बगल में कोई खड़ा है। और हम यह जानते नहीं कि जिंदगी इतनी सम्मिलित है, इतनी सम्मिलित है, कि यह वैसी ही नासमझी की बात है--मैंने सुना है कि एक नाव में तीन आदमी बैठे हुए थे। उनमें एक आदमी ने अपनी जगह बैठे-बैठे छेद करना शुरू किया। दूसरा आदमी चिल्लाया कि यह तुम क्या करते हो? उसने कहा, मैं अपनी जगह करता हूं, तुम्हारा क्या लेना-देना? तुम्हारी जगह तो छेद करता नहीं। वे दोनों चुप हो गए कि यह तो बात ठीक है, अपनी जगह छेद करता है, हमें क्या लेना-देना!
लेकिन कोई नाव में छेद करेगा तो अपनी और तुम्हारी जगह का सवाल नहीं है, यानी नाव कोई अलग-अलग नहीं है, यह नाव एक है। उसमें किया गया छेद सबको ले डूबने वाला है। आपका पड़ोसी अगर एक छेद कर रहा है, तो हम इकट्ठी नाव में सवार हैं। हमारा जीवन एक इकट्ठी नाव है। उसमें कोई भी छेद कर रहा है तो आप यह मत सोचिए कि वह छेद कर रहा है तो मुझे क्या लेना-देना! जिंदगी इतनी इंटररिलेशनशिप है, इतनी जुड़ी हुई है कि उसमें कहीं भी किया गया छेद आपकी ही नाव में किया गया छेद है। इससे उलटी बात भी सच है, किसी के भी नीचे का बंद किया गया छेद आपकी ही नाव का बंद किया गया छेद है।
तो एक तो इतनी उत्सुकता होती है हमारी कि हमें अपने तक मतलब है कि हम थोड़ी शांति और हो। और एक उत्सुकता और व्यापक होती है, वह इस बात से संबंधित है कि एक शांतिपूर्ण वातावरण हो। वह शांतिपूर्ण वातावरण आपके लिए भी होगा, लेकिन आपकी दिशा, आपका चिंतन एक व्यापक पैमाने पर गति करता है। इस बात को खयाल में रखेंगे, तो एक फर्क दिखाई पड़ेगा।
पूरब के जितने धर्म पैदा हुए सब व्यक्ति-केंद्रित थे, कोई धर्म समूह-केंद्रित नहीं था। क्रिश्चिएनिटी अकेला धर्म है जो समूह-केंद्रित है। तो क्रिश्चिएनिटी के समूह-केंद्रित चिंतन में और पूरब के व्यक्ति-केंद्रित धर्म में आज जो फर्क पड़ गए हैं, उनको विचार करने से हैरानी होती है कि वे कहां खड़े हो गए हैं दोनों। इन दोनों में थोड़ा अधूरापन है। क्योंकि क्रिश्चिएनिटी फिर बिलकुल ही समूह-केंद्रित हो गई है, उसमें व्यक्ति का कोई केंद्र स्थान नहीं रहा। यहां के सारे धर्म बिलकुल व्यक्ति-केंद्रित हो गए, उनमें समूह की कोई दृष्टि नहीं रही।
ठीक धार्मिक व्यक्ति अपनी शांति, अपने आनंद में उत्सुक होता है, इसीलिए सबकी शांति और सबके आनंद में उत्सुक हो जाता है। न वह व्यक्ति-केंद्रित होता, न समूह-केंद्रित। वह सिर्फ शांति और आनंद में उत्सुक हो जाता है। और इस बात को वह समझ लेता है कि मेरी शांति और आपकी शांति बहुत लंबे पैमाने में दो अलग चीजें नहीं हैं; क्योंकि बहुत लंबे पैमाने में एक ही नाव है।
तो कार्यकर्ता का मतलब है कि अब वह केवल एक व्यक्तिगत साधक नहीं रहा, बल्कि उसके मन में एक खयाल आया है, एक बात उसे सूझ पड़ी है, वह फैल जाए व्यापक पैमाने में, इसको फैलाने की दृष्टि में कुछ सोच-विचार करना जरूरी है। अभी तो बिना सोचे-विचारे, जो काम चलता है मित्रों का वह बिना सोचे-विचारे है। और वह जो भी काम है उसमें मेरा अब तक कोई हाथ नहीं है। वह मित्रों का ही काम है, उनको जैसा ठीक लगा उन्होंने किया है। जो किया वह बहुत है। लेकिन अब मुझे ऐसा लगता है कि मुझे उस काम में सम्मिलित होना पड़ेगा। तो ही शायद ठीक से व्यवस्था उसको दी जा सकती है, नहीं तो व्यवस्था नहीं दी जा सकती। तो आपके मन में इस दिशा में जो भी खयाल आते हों, विचार आते हों, सोच-विचार आता हो, वह बैठक आप अलग लेकर अपनी उनको रख सकते हैं, उनकी बात करनी चाहिए। छोटे-छोटे मसले हैं, उन पर भी बात करनी चाहिए।
आपके मसले जरूर दूसरे ढंग के होंगे, इसलिए श्रोताओं के बीच चर्चा उनकी करने का कोई प्रयोजन नहीं है। जितने लोग इस काम को दूर तक पहुंचाने के लिए उत्सुक हों, उनको सोच-विचार में थोड़ा लगना चाहिए--इस दृष्टि से कि यह काम दूर तक जाए, उसके लिए मैं क्या तैयारी करूं? क्योंकि अकेले काम भेजने का सवाल नहीं है, आपकी तैयारी के द्वारा ही वह काम वहां जा सकता है। संगठन बनाने का सवाल नहीं है। कोई बहुत सेंट्रल आर्गनाइजेशन बनाने का सवाल नहीं है। एक कामचलाऊ केंद्र है, उसे कामचलाऊ ही समझना चाहिए। क्योंकि जब बहुत केंद्र संगठित हो जाए तो वह कई तरह से दीवालें खड़ी करना शुरू करता है।
तो हमें तो इतना फैलाना चाहिए कि काम इतना विस्तीर्ण हो जाना चाहिए कि उसमें कोई केंद्र का पता भी न चले कि कोई केंद्र है। हर जगह उसका केंद्र है और कहीं उसका केंद्र नहीं है। क्योंकि केंद्र बहुत गहरा मजबूत हो, तो वह गहरा और मजबूत, शाखाओं को, दूसरे केंद्रों को कम करके ही होता है।
दिल्ली की राजधानी बहुत मजबूत हो, तो प्रांतों की राजधानियों को कम करके ही होती है, नहीं तो बहुत मजबूत नहीं होती। तो वह जितनी मजबूत होती चली जाए, उतनी प्रांतों की राजधानी कमजोर होती चली जाएगी। तो फिर उसके खतरे हैं। वह आखिर में जाकर कुछ व्यक्तियों के, एक व्यक्ति के, दो-चार व्यक्तियों के हाथ में केंद्रित हो जाता है। वैसा कोई केंद्रीकरण करने का बहुत सवाल नहीं है। लेकिन कामचलाऊ केंद्र तो जरूरी है। पर यह जान कर कि वह कामचलाऊ है। और हमें जगह-जगह इतनी मेहनत करनी चाहिए कि वह जगह-जगह करीब-करीब स्वावलंबी केंद्र हो। वह अपनी फिकर करे, अपना चिंतन करे। उसको जितनी सहायता हम दे सकें केंद्र से, उतनी सहायता दें। और जितनी कम हम उससे सहायता ले सकें, उतनी कम सहायता लें। यह हमें दृष्टि में होना चाहिए। हम उससे जितनी कम सहायता ले सकें, और जितनी ज्यादा हम उसे दे सकें उतनी दें।
और जगह-जगह की अलग-अलग स्थितियां होंगी, अलग-अलग सोच-विचार के लोग होंगे। तो वहां जो भी योजना, जो भी काम वे करना चाहें, हमें ऐसा लगता हो कि बस वे हमारे केंद्रीय चिंतन के विरोध में नहीं हैं, तो उस काम को हमें करने का मौका देना चाहिए। वे जो भी काम करना चाहें उन्हें करने देना चाहिए। और पूरी तरह उन्हें स्वतंत्र और स्वावलंबी काम करने की, हमसे जितनी सहायता बन सके हमें पहुंचानी चाहिए।
बहुत लोग काम में उत्सुक होंगे, अन्य तरह के लोग उत्सुक होंगे। अगर हम यह चाहें कि ठीक हमारे तरह के ही लोग काम में आएं, हम गलती में हैं। बहुत तरह के लोग काम में आएंगे। हमें इतना ध्यान होना चाहिए कि हमारे काम और विचार के विरोधी प्रवृत्तियों के लोग तो वहां नहीं आ जाते हैं। बस इतना भर हमें ध्यान में होना चाहिए। और जो भी आता है उसके लिए द्वार खुले होने चाहिए कि सब लोग आ जाएं।
संगठित संस्थाओं में एक खतरा होना शुरू होता है। जिन लोगों के हाथ में संगठित संस्था होती है...आमतौर से जैसी संस्थाएं होती हैं दुनिया में, वैसी संस्था हमें नहीं बनानी...तो यह खतरा होना शुरू होता है कि अगर मेरे हाथ में या चार मित्रों के हाथ में एक संस्था है, तो वे निरंतर भयभीत रहने लगते हैं इस बात से कि कुछ लोग आकर उन्हें डिसप्लेस न कर दें, कुछ लोग आकर उन्हें हटा न दें। यह सारी संस्थाओं में यह प्रवृत्ति होनी शुरू होती है। और तब यह प्रवृत्ति दरवाजा रोकने वाली बन जाती है। और काम को नुकसान पहुंचेगा।
मेरा कहना है कि हमारे पास तो कोई पद और स्थान हैं ही नहीं। कोई पद और स्थान जैसी चीज बनानी नहीं है। इसलिए किसी को चिंतातुर होने का कोई कारण नहीं। और हमारा जो काम है वह तो ऐसा काम है कि उसमें भी अगर पद का और प्रतिष्ठा का हमें खयाल आया, तो हम जो क्रांति ले जाने वाले हैं वह कहां ले जाएंगे? क्योंकि वह सारी क्रांति पद और प्रतिष्ठा को तोड़ने के लिए है। तो हममें तो इतनी तैयारी होनी चाहिए कि जब भी कोई आदमी हमको स्थान से अलग करने को हो तो हम उत्सुकता से जगह खाली कर दें कि हमसे बेहतर आदमी आ गया, अब वह काम करेगा, मैं दूसरा काम लेता हूं। इतना स्वागत हमारे मन में हो काम का, तब तो काम बहुत बड़ा हो सकता है।
अब वे जो छोटी-छोटी बातें मेरे खयाल में आती हैं, रोज कोई मुझे आकर कहता है, यह कोई मुझे आकर कहता है, वह...तो मुझे हैरानी भी होती है। क्योंकि वे इतनी छोटी-छोटी बातें हैं कि अगर उन पर हमारे बीच स्थितियां बनती हों, चिंतन खड़ा होता हो, विचार चिंता बनती हो, तो फिर बहुत हैरानी की बात है। उनसे फिर बड़ा काम होना बहुत कठिन हो जाएगा। तो इस सब पर खुले चिंतन की भी जरूरत है।
और अगर कार्यकर्ताओं के बीच में, मित्रों के बीच में अगर कोई भी वैमनस्य, कोई भी बात खड़ी होती हो, तो उसकी आपस में बिलकुल चर्चा बंद कर देनी चाहिए, उसे तो जब भी हम इकट्ठे बैठें तब सब बात कर लेनी चाहिए। जब हम तीस जन इकट्ठे बैठें हों, किसी को, सी.एस. ने कुछ गड़बड़ की है, इनके बाबत कुछ कहना है, तो फिर उसे कह देना चाहिए सबके सामने। लेकिन यहां-वहां किसी को नहीं कहना चाहिए। क्योंकि यहां-वहां कहने से वह रोग पैदा करता है। हम सब इकट्ठे हैं, वहां हम कह सकते हैं कि अग्रवाल साहब ऐसा है, यह हमें पसंद नहीं पड़ता, यह गलत मालूम होता है। तो हम सब बैठ कर विचार कर लें, अग्रवाल साहब सही हों, तो हम सब तय करें कि वे ठीक कहते हैं, आप गलत चिंता में पड़ गए; और गलत हों तो उनसे कहें कि इससे तो नुकसान पहुंचेगा, इस बात को छोड़ देना चाहिए।
और हमारी इतनी तैयारी होनी चाहिए कि इसमें छोड़ने-पकड़ने में है क्या! और इन बातों को हम छोड़ने-पकड़ने में अगर भयभीत हो जाएं, तो मैं तो लोगों को जो बातें छोड़ने के लिए कह रहा हूं, वे बेचारे कैसे छोड़ पाएंगे? क्योंकि उनके तो मैं बिलकुल प्राणों पर चोट कर रहा हूं। जो उनकी हजारों-हजारों वर्षों की पकड़ी धारणाएं हैं, उनको छोड़ने के लिए तैयार करना है, और हम छोटी-छोटी बातें पकड़ कर बैठेंगे तब तो बहुत कठिन होगा।
सिर्फ इसमें एक बात ध्यान रखनी जरूरी है कि अलग-अलग ये बातें नहीं की जानी चाहिए। उससे व्यर्थ की कटुता खड़ी होती है। वह हमेशा जब हम इकट्ठे हों, तब खुली बात करनी चाहिए सबको, काम को ध्यान में रख कर, कि यह बात बाधा बन सकती है, तो हमें इसकी बात करनी है।
और एक बात ध्यान में जरूर रखिए कि शायद अभी आपको अंदाज नहीं हो सकता, दो-चार-पांच वर्षों में अंदाज हो, कभी अंदाज नहीं होता किसी को कि कोई काम कितना बड़ा हो सकता है। काश, पहले से अंदाज हो, तो वह काम बहुत जल्दी बड़ा हो सकता है, कम बाधाओं में बड़ा हो सकता है। लेकिन कभी अंदाज नहीं होता। इतनी दूरदृष्टि मुश्किल से होती है लोगों के पास कि वे यह देख सकें कि दस साल बाद यह काम कैसा होगा।
उन्नीस सौ इक्कीस या बीस में गांधी जी संभवतः कलकत्ते में गोखले के यहां ठहरे। और गोखले को डर हुआ कि यह आदमी ऐसे कपड़े बांधे हुए है साधुओं जैसे, मैं इसके साथ मंच पर जाऊं कि नहीं? लोग तो हंसेंगे कि यह...क्योंकि उस समय तक तो कांग्रेस बहुत व्यवस्थित कपड़े पहनने वालों की, बड़े वकीलों की, इस तरह के लोगों की संस्था थी। यह आदमी तो ऐसा आदमी नहीं था जैसे लोगों की वह संस्था थी। तो इसके साथ जाना भी कि नहीं? तो यह सोच कर उन्होंने बहाना किया कि मेरे सिर में दर्द है और मैं आज नहीं जाता हूं। उनको पता नहीं था कि यह जो आदमी एक गांव के किसान के कपड़े पहन कर खड़ा हो रहा है, यह इसका इस भांति के कपड़े पहनना, इसका गरीब की हैसियत में खड़ा होना ही इस मुल्क में क्रांति लाने का कारण बन जाएगा। इसकी किसी को कल्पना ही नहीं थी। गोखले को कल्पना नहीं थी।
तो दुनिया में जो भी काम हुए हैं, वे कब बड़े हो सकते हैं, इसकी कोई कल्पना पहले से नहीं होती। पहले से कल्पना हो तो हम गांधी को कितनी मुसीबतों से बचा सकते थे, उसका कोई हिसाब नहीं था। और जो काम पच्चीस साल बाद हुआ वह पंद्रह साल में हो सकता था। लेकिन कोई अंदाज ही नहीं होता। कोई काम जब होता है तब हमें खयाल आता है कि यह हो सकता है।
तो जिस खयाल में आप उत्सुक हैं वह खयाल बहुत दूरगामी क्रांति ला सकता है। इस बड़े खयाल को ध्यान में रखें और अपने को खयाल में न लें। और इस बड़े काम को किस भांति बिना बाधा के पहुंचाया जाए, उसको देखें। और यह भी आप समझ लें कि एक बड़ी जिम्मेवारी आपके ऊपर है। क्योंकि जो मैं कह रहा हूं, वह जब तक छोटे-छोटे ग्रुप्स में मैं कह रहा हूं तब तक वह उपद्रव नहीं ला रहा है, जिस दिन बड़ी भीड़ आनी शुरू होगी उस दिन उसके साथ उपद्रव भी आने शुरू होंगे। वह सुनिश्चित है। और जितना बड़ा बल बढ़ेगा उस विचार का, उतने ही खतरे और उपद्रव आने शुरू होंगे। तो उनकी भी तैयारी होनी चाहिए। जब कोई परिवर्तन की और क्रांति की बात करनी हो, तो बहुत तरह की तैयारी होनी चाहिए।
तो जिम्मेवारी बहुत बड़ी है आपके ऊपर। अभी मैं नहीं पाता कि उतनी तैयारी है। जिस दिन आपकी तैयारी हो, उतनी बड़ी जिम्मेवारी आपके लिए खड़ी हो जाएगी। और मैं तो कदम-कदम में मुझे रुकना पड़ता है, इस खयाल से कि वह कौन झेलेगा उस सारी जिम्मेवारी को? अगर वह पूरी की पूरी आपके सिर पर आई तो कौन झेलेगा? तो इसकी तैयारी आप जितनी जल्दी करते हैं उतनी जल्दी ठीक-ठीक लोगों से वह बात कही जा सकती है। जिसको कि दो वर्ष बाद कहना पड़े, उसे आज कहा जा सकता है। गांव-गांव तक पहुंचा देने की बात है, एक-एक घर तक पहुंचा देने की बात है। तो वह कैसे पहुंचानी, क्या करना, वह सब आपको बैठ कर चिंतन करना चाहिए। क्योंकि एक या दो या तीन आदमी यह नहीं कर सकेंगे। क्योंकि जितने व्यापक व्यक्ति आएंगे उतना बड़ा काम हो सकेगा। और जितने विभिन्न पहलू वाले व्यक्ति आएंगे, जितने विभिन्न व्यक्तित्व के, उतना बड़ा काम हो सकेगा।
तो आपकी संस्था को तो यह खयाल में लेकर काम करना चाहिए कि वह सिर्फ एक मिलन-स्थल है, इससे ज्यादा नहीं। उसमें जितने विभिन्न कोणों के, विभिन्न ढंग के, विभिन्न वर्गों के लोग आ सकें, उनको लाने भर का काम आपका है कि वे आ जाएं। उनसे कैसे काम लिया जाए वह आपके चिंतन का है, खयाल का है कि उनसे कैसे काम लिया जाए। और अत्यंत प्रेमपूर्ण, स्वागतपूर्ण भाव से अगर हम बहुत लोगों को ला सकते हैं, तो इसमें कोई शक का कारण नहीं है।
और जो मैं कह रहा हूं, आज इसकी सारी की सारी दृष्टि धर्म से संबंधित है। आज नहीं कल समाज के और पहलुओं पर भी मुझे कहना पड़ेगा। समाज के आर्थिक पहलू हैं, राजनैतिक पहलू हैं। समाज की जिंदगी इकट्ठी जिंदगी है। अगर पूरे समाज के जीवन-दृष्टिकोण में कोई फर्क लाना हो, तो हमें उसके सारे पहलुओं पर बात करनी पड़ेगी। तो जब तक मैं धर्म पर बोल रहा हूं तब तक एक पहलू की बात है। और उतनी ही क्रांति की बात जीवन के हर पहलू पर जरूरी है। तो हम एक पूरी क्रांतिकारी योजना देश के मन के सामने उपस्थित कर सकते हैं।
तो कल अगर मैं राजनीति पर, अर्थ पर, समाज पर, शिक्षा पर, इन सब पर पूरी दृष्टि देना शुरू करूंगा, तो काम में और बहुत तरह के लोगों की जरूरत होगी जिनकी अभी हमें कल्पना भी नहीं है कि वे लोग इसके लिए जरूरी हो जाएंगे। आज उसमें से बहुत से लोग उत्सुक भी होते हैं, लेकिन अभी तो हमारे पास कोई काम भी नहीं कि उनको हम कहें। न मालूम कितने प्रोफेसर्स उत्सुक हुए हैं मुल्क में। अगर हमारी तैयारी हो, तो कल हम प्रोफेसर्स का अलग ही कैंप आयोजित करें। और उसमें मैं, शिक्षा के संबंध में ही जो कुछ हो सकता है, उसके बाबत बात करूं। युवक उत्सुक हुए हैं, कल हम कालेज के विद्यार्थियों का अलग ही कैंप आयोजित करें। उनसे बात हो सके। ढेर राजनीतिज्ञ मुल्क में उत्सुक हुए हैं, आज नहीं कल अगर हम व्यापक काम करें, तो हम राजनीतिज्ञों के लिए एक अलग ही कैंप रखें। हम उनसे सीधी बात कर सकें, उनको कुछ कह सकें।
लेकिन यह तभी हो सकता है जब हम हर तरह के लोगों को भीतर आने दें। कल फिर उनके अलग-अलग वर्ग के लिए अलग-अलग चिंतन हो सकता है। अब अभी बहुत से प्रश्न होते हैं जिनको मैं छोड़ देता हूं, सिर्फ इसीलिए कि वह जिन लोगों के सामने बात की जानी चाहिए वे लोग तो नहीं हैं, तो उनकी क्या बात करें!
अब जैसे कि निरंतर ऐसा कोई दिन नहीं होता जिस दिन कि शिक्षा पर कोई प्रश्न न पूछ लेता हो। लेकिन शिक्षा पर बात करने से क्या प्रयोजन है, जब तक कि शिक्षाशास्त्री के सामने वह बात न की जाए। आप क्या करेंगे बहुत उसके लिए?
अब कल दो-एक प्रश्न हैं राजनीति पर, लेकिन क्या मतलब है उनकी बात करने से। जब तक कि हमारे पास एक राजनैतिक पूरी योजना, जहां से हम पूरी बात कह सकें पूरी दृष्टि को ध्यान में रख कर। और किनके सामने कहें?
मुल्क की, जीवन के बहुत पहलू हैं, सभी पहलुओं पर संयुक्त क्रांति का काम हो सकता है। पर इसके लिए हमारी तैयारी बढ़नी चाहिए। अब जैसे यही कैंप है--चार सौ लोग आए हैं; इस कैंप में दो हजार लोग हो सकते थे। हमें थोड़ी फिकर करनी पड़े। और आप हैरान होंगे कि चार सौ लोग, यही चार सौ लोगों को ज्यादा फायदा होता अगर दो हजार लोग यहां होते तो। क्योंकि जितनी बड़ी संख्या है उतना बड़ा वायुमंडल, उतना बड़ा एटमास्फियर खड़ा होता है।
और हमारा चूंकि जीवन हमेशा से विस्तार को अनुभव करता है, जितना विस्तीर्ण हो। आप ध्यान करने बैठे हैं, अगर आपके आस-पास दस हजार लोग ध्यान कर रहे हैं, आपके ध्यान में फर्क पड़ता है। और आप अकेले कर रहे हैं तो फर्क पड़ता है। क्योंकि आपको लगता है, कुछ समझ में आना शुरू हुआ, फिर एक साइकिक, एक मनो-वातावरण बनता है। इतने लोगों का चिंतन, इतने लोगों के मन की हवाएं, इतने लोगों के मन की तरंगें एक हवा बनाती हैं।
बुद्ध जिस गांव में भी जाते, दस हजार भिक्षु साथ जाते। हम कहेंगे, इतनी भीड़ लेकर चलने का क्या मतलब था? लेकिन पूरे गांव की हवा बदल देते। क्योंकि दस हजार भिक्षु एक खास ढंग से निर्मित, एक खास तरह के चित्त को लिए हुए, खास तरह की आंखें, खास तरह के पैर--चलने का ढंग, उठने का ढंग, बात करने का ढंग, दस हजार शांत लोग, जिस गांव में खड़े हो जाते दस हजार लोग शांत, वह गांव एकदम देखता रह जाता कि क्या!
एक गांव में ठहरे हैं, उस गांव का राजा मिलने गया। दस हजार लोग ठहरे हैं गांव के बाहर। तो उसने अपने मंत्रियों से कहा, कितनी दूर है?
उन्होंने कहा, बस ये जो वृक्ष दिखाई पड़ रहे हैं, उसके पास है।
उसने कहा, मुझे शक होता है। अपनी तलवार बाहर निकाल ली। तुम मुझे धोखा देना चाहते हो? तुम कहते हो दस हजार लोग ठहरे हैं, लेकिन यहां तो ऐसा पता नहीं चलता कि एक आदमी ठहरा हुआ है! इतना सन्नाटा, दस हजार लोग थोड़े ही फासले पर ठहरे हैं दरख्तों के पास, इतना सन्नाटा है रात में! मुझे शक होता है। उसने तलवार बाहर निकाल ली। कोई षडयंत्र तो नहीं है!
वे मंत्री हंसे, उन्होंने कहा कि आप तलवार बाहर ही रखिए, कोई षडयंत्र नहीं है, लेकिन आप चलिए, वे दस हजार लोग और ही तरह के लोग हैं।
वह गया, वह देख कर वहां दंग रह गया कि वृक्षों के नीचे दस हजार लोग बैठे हैं, चुपचाप! कोई एक बात नहीं कर रहा है।
अब यह एक साइकिक वातावरण में प्रवेश कर रहा है। जहां यह बोलना भी चाहे तो नहीं बोल सकता। दस हजार लोग मौजूद हैं चुपचाप। कोई बात नहीं कर रहे हैं, बैठे हैं चुप। तो यह आदमी इनमें रुकता है, यह आदमी बदल जाता है। यह इसने देखा ही नहीं है, इसकी कल्पना में नहीं है कि ऐसी भी एक हवा हो सकती है।
काम बहुत हो सकते हैं। मेरा वह भी खयाल है कि गांवों पर मॉरल अटैक होने चाहिए। लेकिन हमारे पास लोग हों। मेरे मन में है यह कि दो हजार लोग एक गांव में तीन दिन के लिए ठहर जाएं। अभी हम कैंप लेते हैं। अगर हमारे पास दो हजार ऐसे लोग तैयार होते हैं जिनको हम समझते हैं कि इन्होंने ध्यान में थोड़ी गति की है, ये शांत हुए हैं, इनको विचार खयाल में आया है; कल हम चलते हैं और एक गांव चलते हैं, बीस हजार का गांव, उसमें दो हजार लोग घरों में मेहमान हो जाते हैं तीन दिन के लिए हाथ जोड़ कर कि हम इस पूरे गांव पर एक नैतिक आक्रमण कर रहे हैं। जाकर दस हजार के गांव में दो हजार लोग पांच-पांच घर के बीच जाकर एक-एक आदमी जाकर मेहमान हो जाता है। वे तीन दिन उनके साथ रहेंगे दो हजार लोग, मोहल्ले में पांच घरों के लोगों से बात करेंगे, सांझ को हमारी बैठक होगी, उसमें पूरे गांव के बच्चे-पत्नियों को लेकर वे हमारे दो हजार लोग हाजिर होंगे। उन दो हजार लोगों का उठना, बैठना, बात करना, सोचना, उस सब की हवा हम उस गांव में खड़ी करेंगे। हम तीन दिन क्यों जंगल में कैंप लेंगे? जंगल में कैंप लेने की मजबूरी सिर्फ एक ही है कि हमारे पास आदमी नहीं हैं कि हम शहर में जाकर वातावरण खड़ा कर सकें। हमारे पास दो हजार आदमी होंगे तो हम एक गांव पर हमला करेंगे। वर्ष में हम बारह गांव पर हमला कर दिया करेंगे। और बारह गांव में हम एक जादू खड़ा कर सकते हैं पूरा का पूरा कि तीन दिन के लिए वह गांव चकित खड़ा रह जाए, और उस गांव की जिंदगी में एक फर्क पड़ जाए।
तो काम तो बहुत दिशाओं में बहुत रूप ले सकता है। पर वह रूप, जैसे-जैसे आपकी ताकत बढ़ती है, आप इकट्ठे होते हैं, सोचते हैं, उस रूप में बन सकेगा।
आज की बैठक इसी खयाल से बुलाई कि अगली बार से हमेशा ही, मेरा खयाल यह है कि कैंप तीन दिन का न होकर चार दिन का हुआ करे। पहले दिन सारे हमारे मित्र इकट्ठे हो जाया करें। एक दिन उनके साथ व्यतीत हो, दूसरे दिन से कैंप शुरू होगा। ताकि उनके लिए कुछ मैं कर सकूं और वे इस दिशा में कुछ सोच सकें, विचार कर सकें। और जिस गांव में भी हम मिलते हैं, बैठकें लेते हैं, वहां भी एक बैठक घंटे भर की वहां के उन मित्रों के लिए जो काम करने के लिए सक्रिय रूप से उत्सुक हुए हैं, उनके लिए एक बैठक होनी चाहिए। और हम कैसे बड़ा से बड़ा कर सकें, उसका हमें चिंतन करना चाहिए। और जो भी जो योजनाएं ला सके, वे योजनाएं लानी चाहिए और मित्रों को समझाना चाहिए कि इस योजना से काम यहां आगे जा सकता है।
इस पर आप चिंतन करें, खयाल करें, इसलिए। और कुछ बात इस संबंध में पूछनी हो तो पूछ लें।
अभी उन लड़कों ने जबलपुर में अच्छा थोड़ा सा काम किया। अच्छा थोड़ा काम किया। और युवक उत्सुक हो जाएं तो--वह उत्सुक आपको करने हैं--अभी दस-पंद्रह-बीस लड़कों ने एक ग्रुप जबलपुर में बनाया, तो वे घर-घर साहित्य पहुंचा रहे हैं। बहुत अच्छा रिस्पांस मिला है। जिस घर में भी गए, बहुत अच्छा रिस्पांस मिला। बहुत अच्छा रिस्पांस मिला।
एक मित्र की योजना थी एक वीकली बुलेटिन की। तो वे लड़के तैयार करते हैं जनवरी से, जबलपुर से निकालने का एक वीकली बुलेटिन। एक छोटी सी पत्रिका छह पन्नों की, जिसमें कि सारी सूचनाएं पूरी की पूरी मिल सकें।

बहुत बड़ा काम है।

काम तो बहुत बड़ा हो सकता है। और आप जितना तैयार हों, मैं उसको उतनी बड़ी दिशा दे सकता हूं। मेरी कल्पना में है सारी बात कि क्या नहीं हो सकता है! बहुत हो सकता है। इतना हो सकता है कि हम एक पंद्रह-बीस साल में इस मुल्क में दूसरी हवा पैदा कर दें।

इसलिए आपने जो कहा है कि ध्यान का प्रयोग हम कार्यकर्ताओं को, ठीक ढंग से करना चाहिए...

तैयार करना पड़े हमें एक अलग वर्ग।

न न न

बहुत से लोगों का ऐसा खयाल कार्यक्रमों में हो जाता है कभी-कभी कि आप कोई बात बोलते हैं, फिर थोड़े टाइम पर और कुछ बात बोलते हैं, तो समझ नहीं पाते हैं कि पहली बात सच्ची या दूसरी बात सच्ची। शायद आपका ध्यान बहुत लंबे तक होने के बाद कुछ फर्क होना होता हो। तो बहुत सा टाइम चर्चाओं में चला जाता है। इसका एक नमूना अब यह हो गया कि लोगों को यह खयाल आ गया कि आपका फोटो रखा जाए या न रखा जाए। अब ये आप कोई और ढंग से सोच रहे होंगे। जो कार्यक्रम शुरू से ही चर्चा हो जाती है। तो मेरे खयाल से कुछ बातें कार्यक्रम...

कार्यक्रम की बैठक हो, तो जो भी बात हो वह पूछ लेनी चाहिए।

तो एक लंबी दृष्टि से कोई विचार हो तो शायद कभी समझ में न आए, पर एक बनानी है बात तो उस वक्त पूरी एनर्जी दी जाए। और उसके बाद न कुछ घटने लगे तो आपको लौटा दे कि भई यह ठीक नहीं है। लेकिन करना है, उस टाइम तो फिर जोर से किया जाए।

पूरी ताकत से। क्योंकि जो भी करना है उसकी समझ...अब वह फोटो का ही मामला ऐसा हो गया कि मेरे पास हर महीने सैकड़ों चिट्ठियां पहुंचती हैं कि हमें फोटो भेज दीजिए। मैं उनको कहां से फोटो भेजूं? नहीं भेजता तो उनकी फिर चिट्ठी पहुंचती है कि आप एक चित्र भी हमको नहीं भेजते हैं! तो सिवाय इसके कोई उपाय नहीं है कि फोटो रख दी जाएं, जिसको लेना हो वह ले जाए। मैं उनको कहां से चित्र भेजूं? वहां लोग पहुंच जाते हैं घर पर भी कि आपका एक फोटो दे दीजिए। मैं कहां से फोटो लाकर उनके लिए रखूं? और कितने फोटो रखे जाएं?
तो उसके लिए तो स्टाल पर रख दिए; जिसको चाहिए, उठा कर ले जाए; नहीं चाहिए, बात खतम हो गई।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

कोई भी मामला हो उस पर सोच लेना चाहिए।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

मुझे वहां देने का इंतजाम करना पड़ता है। मैं किसी को मना क्या करूं! वह आया है कि चित्र चाहिए आपका एक। तो अब उसको क्या कहा जाए? और किसी की चिट्ठी आती है कि उसको चित्र चाहिए। अब उसको चित्र की व्यवस्था करो, वह खर्च करो; फिर उसे भेजने के लिए डाक का खर्च करो। उससे मतलब क्या है? और न भेजो तो वह दुखी होता है कि हमें एक चित्र नहीं भेजा।

अच्छा यह सब क्लब जैसा कुछ बनाना चाहिए?

हां, वह मैंने कहा कि एक क्लब बनाएं, एक तीन-चार चित्रों को उसमें रख दें, खतम हुआ।
(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

लोग जो भी चाहते हों, उसमें जितने की व्यवस्था हम कर सकें, वह हमें कर देनी चाहिए।

कभी क्या खयाल हो जाता है कार्यकर्ताओं का कि लोग चाहते हैं, उसकी व्यवस्था करनी कि नहीं करनी।

हां, वह सोचना चाहिए।

(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं।)

होता क्या है कि हमारा चित्त जो है कभी भी, ठीक बिंदु जो है, उसको नहीं पकड़ता। या तो इधर या उधर। या तो हम चित्रों की पूजा करेंगे और या फिर हम चित्र से डरने लगेंगे कि कहीं चित्र देने से कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए। यह हमारा जो माइंड है। यानी या तो हम मूर्तियां बनाएंगे या मूर्तियां तोड़ेंगे, लेकिन मूर्तियों को सहज रूप से स्वीकार न करेंगे। मूर्ति मूर्ति है, न उसे पूजा की जरूरत है, न उसको फोड़ने की जरूरत है। एक चित्र चित्र है, न उसकी कोई पूजा करने की जरूरत है और न उससे बचने की।
मुसलमान इतने बचे, कि अगर आप मोहम्मद का चित्र बना दो तो मार-पीट हो जाए अभी, अभी दंगा हो जाए फौरन। मोहम्मद का चित्र भर आप टांग लो घर में, आपके घर में आग लगा देंगे। अब यह दूसरी बेवकूफी खड़ी हो गई न। और इसी से खड़ी हुई। खड़ी इससे हुई कि कहीं मूर्ति की पूजा न शुरू हो जाए। तो वह मूर्ति-पूजा के डर से, कहीं कोई चित्र न बना ले मोहम्मद का।
स्वामी सत्यभक्त ने एक मंदिर वहां वर्धा में बनाया। तो सभी धर्मों की मूर्तियां रखीं, उसमें उन्होंने मोहम्मद की मूर्ति बना ली। तो वह झगड़ा-फसाद हो गया। फिर आखिर वह मूर्ति हटानी पड़ी वहां से। क्योंकि वे मोहम्मद का चित्र नहीं बना सकते, मूर्ति बनाने की बात तो बहुत दूर। तो मोहम्मद का कोई आथेंटिक चित्र उपलब्ध नहीं है। अब यह दूसरी बेवकूफी हो गई न।
मैं कहता हूं, चीजों को सरलता से क्यों नहीं लेते? चित्र चित्र है, उसमें क्या है? न पूजा करने की जरूरत है और न उससे घबड़ाने और डरने की जरूरत है।

असल में कार्यकर्ताओं के दिल में इसका एक खयाल बंधा हुआ है कि आप ऐसे होने चाहिए।

हां, वह भी बड़ा मुश्किल है, वह भी बड़ा मुश्किल है। वह भी हमें तोड़ना पड़े। वह हमें तोड़ना पड़े।
अब इतना सुन कर भी हमारे खयाल में यह होता है कि आप किसी के लिए फोटो क्यों खिंचवा रहे हैं? आपको क्या जरूरत है फोटो की? आपको क्यों शौक है फोटो का?

हां, ये सारी बातें हमें समझ लेनी चाहिए। ये सारी बातें हमें समझ लेनी चाहिए। हमारी जरूर धारणा है कि कैसा मुझे होना चाहिए।

साधु कैसे होने चाहिए, वह भी हमारे खयाल में है।

हां। तो जो-जो हम तय किए हैं हजारों साल से, मैं वैसा आदमी बिलकुल भी नहीं हूं। तो वह तो आपकी धारणा जगह-जगह टूटेगी, उसे साफ ही कर लेना चाहिए कि मैं उस जैसा आदमी कहीं भी नहीं हूं। मैं उन दो व्यक्ति में कहीं भी खड़ा नहीं होता। तो न तो मुझे इसमें भय लगता है कि कोई फोटो ले जाए। इसमें कौन से भय का कारण है?

अगर कोई फोटो फाड़ दे तो?

तो फाड़ दे, उसमें कोई भय नहीं है। उस पर थूक दे, उसको जूते में डाल दे, तो क्या बनता-बिगड़ता है!

उसकी पूजा करे तो?

कोई पूजा करे तो...असल में पूजा करने वाला जो मन है उसके विरोध में मैं लड़ रहा हूं। और अगर कोई पूजा करे तो हम क्या कर सकते हैं? इसमें क्या है, ठीक है, उसकी मर्जी है। पूजा करने वाले मन के विरोध में हमारी लड़ाई चल रही है कि पूजा करने की वृत्ति नासमझी से भरी है। फिर भी कोई पागल है तो वह पागल है, पूजा करे तो करे, इससे क्या लेना-देना! और मेरे फोटो की नहीं करेगा तो किसी और के फोटो की करेगा। उससे बनता क्या है? यानी वह पूजा करने वाला मन है तो वह करेगा पूजा। और यह जो विरोध करता है, जो कहता है कि कहीं पूजा का डर है, यह पूजा ही करने वाला मन है, यह कोई दूसरा मन नहीं है। यानी जो पूजा करने वाली बुद्धि है जिसकी...
अब वे जगह-जगह मुझे आकर कहते हैं कि कहीं आपकी बात का संप्रदाय न बन जाए। तो मैंने कहा, यह सांप्रदायिक मन है, यह जो भय की बात कर रहा है। यानी बड़ा मजा यह है कि यह आदमी किसी संप्रदाय में खड़ा हुआ है और कहता यह है कि कहीं संप्रदाय न बन जाए। यह आदमी संप्रदाय तोड़ कर यह बात विचार करे तो ही समझने वाली बात है कि ठीक है, यह ठीक बात कह रहा है। यह संप्रदाय में खड़ा हुआ है भलीभांति। और इसको जो भय होता है वह भय इसका नहीं है कि सांप्रदायिक स्थितियां और न बनें। भय इसको हमेशा यह है कि इसके संप्रदाय का एक काम्पिटीशन और खड़ा होता है। इसको भय सिर्फ यह है बुनियाद में कि यह एक संप्रदाय और खड़ा होता है, तो मेरे संप्रदाय के वैसे ही तो काम्पिटीटर पचास हैं, यह इक्यानबे हुआ। उसका डर...संप्रदाय से भयभीत नहीं है वह; संप्रदाय में तो वह खड़ा ही हुआ है। उसका डर है। उसका डर है।
तो हमें सारी बातें करनी चाहिए, साफ समझनी चाहिए।

इसलिए एक छोटा सा कैंप ले लिया जाए।

कैंप लेंगे। जरूर एक कैंप लिया जाए। वह अच्छा होगा। एक पच्चीसत्तीस मित्रों के लिए। वह सारी बात साफ होनी चाहिए। मेरे संबंध में भी सारी बात साफ होनी चाहिए।

इससे, आप जो बात कहते हैं, वह भी ठीक चलेगी। जो आपका कंसेप्ट है वही हम तक, यानी हम तक आए, तब हम दूसरे तक पहुंचा सकते हैं।

वह तो ठीक ही है।

होता क्या है कि आप कुछ कहते हो और पहुंचाते कुछ और हैं हम। तो आपके संबंध में गलत धारणा हम ही बना रहे हैं।

हां, होता है, होता है।

आज इतना ही।