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बुधवार, 19 अप्रैल 2017

एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-109

धर्म का सार—बांटना—प्रवचन—109


 सूत्र:

            हन्‍नति भोगा दुम्‍मेधं नौ चे पारगवेसिनो।
भोगतण्‍हाय दुम्‍मेधो हन्‍ति अज्‍जेव अत्‍तनं ।।293।।

तिणदोसानि खेत्‍तानि रागदोसा अयं पजा।
तस्‍मा हि वितरागेसु दिन्‍नं होति महप्फलं ।।294।।

तिणदोसानि खेत्‍तानि दोसदोसा अयं पजा।
तस्‍मा हि वीतदोसेसु दिन्‍नं होति महप्फलं ।।295।।

तिणदोसानि खेत्‍तानि मोहदोसा अयं पजा।
तस्‍मा हि वीतमोहेसु दिन्‍नं होति महप्फलं ।।296।।

तिणदोसानि खेत्‍तानि इच्‍दादोसा अयं पजा।
तस्‍मा हि विगतिच्‍देसु दिन्‍नं महप्फलं ।।297।।



र्म का सार है—दान। दान से अर्थ. धन का ही दान नहीं है, दान से अर्थ है : जो है जिसके पास—दे, बांटे, रोके नहीं। ज्ञान है—तो ज्ञान दे। शक्ति है—तो शक्ति दे। गीत है—तो गीत बांटे। क्योंकि बांटने से ही आत्मा उपलब्ध होती है।
जो जितना रोकता है, उतना ही रुक जाता है। रोकने में रुक जाना है, देने में फैलाव है। जो जितना बांटता है, उतना फैलता चला जाता है। जो जितना बांटता है, उतना बड़ा हो जाता है। जो सब बांट देता है, जो भीतर शून्य हो जाता है, वही परमात्मा के निवास के योग्य हो जाता है।
तो दान की परिसीमा है—शून्यता; मेरा कुछ भी न बचे; मैं भी न बचूं मेरा। जिससे पाया है, सब उसी स्रोत को वापस लौट जाए। जैसे गंगा अपने को पूरा सागर में उंड़ेल देती है, उसी से पाया, उसी को लौटा दिया। त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।
जो मिला है, वह तुम्हारा नहीं है। वह किसी का भी नहीं है। है तो परमात्मा का है। इस परमात्मा की वस्तु पर मेरे का आरोपण लोभ है। लोभ पाप है। इस परमात्मा की वस्तु पर मेरे का आरोपण नहीं—दान है। दान पुण्य है।
जो हो जिसके पास—बांटता चले, लुटाता चले।
जीसस का प्रसिद्ध वचन है. जो देगा, उसे और मिलेगा। जो बांटेगा, वह और पाने का हकदार हो जाता है। जो रोक लेता है, सड़ जाता है।
जैसे कोई कुएं से पानी न भरे इस डर से कि कहीं पानी खर्च न हो जाए। कुएं को बंद करके ताला लगाकर रख दे कि कहीं पानी मेरा चुक न जाए। कभी ग्रीष्म आए, अड़चन हो, अकाल पड़े तो मेरा पानी चुक न जाए। रोककर रखूं,  सम्हालकर रखूं; तिजोड़ी में रख ले कुएं को। उसका कुआं सड़ जाएगा। उसमें जीवन की धार नहीं बहेगी। उसका पानी गंदा होता रहेगा। धीरे — धीरे उसका पानी विषाक्त हो जाएगा, पीने योग्य नहीं रह जाएगा।
कुएं का जल निर्मल होता, ताजा होता, क्योंकि रोज—रोज पानी भरा जाता। कुआं रोज —रोज लुटाता है। और जब कुआं लुटाता है, तो नए झरने उसे भरते चले जाते हैं। तो कुआं जवान रहता है, का नहीं होता। सडता नहीं; गलता नहीं। गंदा नहीं होता।
नदी बहती रहती है, तो स्वच्छ, उज्ज्वल रहती है। जहां नदी अटकी, वहीं सड़ाध है। जीवन की नदी के संबंध में भी यही सत्य है।
दान धर्म का मूल है। और खयाल रखना, फिर दोहरा दूं। अक्सर तुमने सोच लिया है कि दान यानी धन का दान। क्योंकि हम धन के ऐसे दीवाने हैं कि हम संसार के संबंध में सोचते, तो धन के संबंध में सोचते। और धर्म के संबंध में सोचते हैं, तो भी धन के संबंध में सोचते हैं! हमारा धन पर ऐसा रुग्ण मोह है! तो जब कोई कहता है—दान, तो तत्‍क्षण तुम्हें खयाल आता है : मेरे पास क्या है? शायद यह भी खयाल आता हो कि ठीक है, दान होना चाहिए; कोई मुझे दे!
मैंने सुना है : एक धनपति गांव में था, कभी किसी को कुछ न दिया था। फिर भी लोग जाते थे, क्योंकि वह सब से बड़ा धनपति था। शायद आज नहीं दिया, कल दे, परसों दे।
गांव में कोई गरीबों के लिए भोज का आयोजन हो रहा था। लोगों ने सोचा : इसमें तो दे देगा। अकाल पड़ा था। तो लोग गए। उस धनपति ने उनकी बातें सुनीं। उन्होंने कहा कि दान की बड़ी महिमा है। दान से ही व्यक्ति स्वर्ग जाते हैं; दान सीढ़ी है। उसे उन्होंने प्रसन्न देखा, खुला देखा, तो और दान की प्रशंसा की। आशा बंधी कि शायद आज कुछ देगा!
लेकिन आशा जल्दी ही निराशा में परिणत हो गयी। उस आदमी ने कहा : बिलकुल ठीक! उस धनपति ने कहा : आप बिलकुल ठीक कहते हैं। कहा : चलो मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूं। उन्होंने कहा. कहां साथ चलते हैं! कुछ दान दें। उसने कहा : नहीं, मैं भी साथ चलता हूं ताकि लोगों को दान देने के लिए समझाएंगे। जब दान की इतनी महिमा है, तो मैं यहां बैठा नहीं रहूंगा, मैं भी चलूंगा तुम्हारे साथ। और लोगों को समझाऊंगा कि दान दो।
दान देने की बात जो करते हैं, हो सकता है, वे भी सिर्फ दान से बचने के लिए दान देने की बात कर रहे हों। यह धनपति जाने को राजी है! दान के प्रचार के लिए राजी है। यह कहता है. जब ऐसी महत्वपूर्ण बात है, तो मैं भी प्रचार करूंगा। लेकिन देने का भाव नहीं उठता।
देने की हमारे भीतर भावना ही पैदा नहीं होती। हमने जन्मों—जन्मों से नहीं दिया है। हमने कुछ भी नहीं दिया है। हम सदा भिखमंगे हैं। हम सदा मांग रहे हैं। जब लोग कहते हैं : प्रेम, तब भी वे प्रेम मांगते हैं, देते नहीं। जो देता है, उसे तो बहुत मिलता है। उसे मांगना नहीं पड़ता। उसे हजार गुना मिलता है। लाख गुना मिलता है। करोड़ गुना मिलता है। लेकिन लोग कहते हैं कि कोई हमें प्रेम नहीं करता!
मेरे पास लोग रोज आते हैं, वे कहते हैं. क्या करें? जीवन में प्रेम नहीं मिलता! कैसे प्रेम मिले? शायद ही कोई आकर पूछता हो कि मैं प्रेम देना चाहता हूं, कोई लेने वाला नहीं मिलता।
अगर तुम प्रेम देना चाहो, तो लेने वाले तो बहुत मिलेंगे, क्योंकि सारे लोग प्रेम के भूखे हैं। और तुम दोगे, तो तुम्हें मिलेगा। दिए बिना किसी को नहीं मिलता।
लेकिन लोग मतलब भी अपने निकाल लेते हैं! अब दान की इतनी महिमा शास्त्रों ने कही है, इसका परिणाम यह हुआ कि पंडित—पुरोहितों ने दान का धंधा बना लिया। वे समझाने लगे लोगों को कि दान दो। शास्त्र का उन्होंने शोषण कर लिया।
शास्त्र से भी मतलब की बात निकाल ली।
भिखमंगा भी रास्ते पर खड़ा होकर कहता है कि दान से बड़ा धर्म नहीं है। दान दो। और अगर न दो, तो उसकी आंखों में तुम्हारे प्रति घृणा है।
भिखमंगा दान से जी रहा है। तुम्हारे साधु—संत भी दान से जी रहे हैं। तुम्हारे पंडित—पुरोहित भी दान से जी रहे हैं। लेकिन सब चूक गए हैं बात।
दान का मतलब मांगना नहीं है। दान का मतलब देना है। तुम्हारे पास जो हो। धन न हो, तो फिकर छोड़ो। धन ही तो धन नहीं है; और भी तो धन हैं। प्रेम तो है। इतना निर्धन आदमी तो कोई भी नहीं है कि जिसके हृदय में प्रेम न हो। और प्रेम से बड़ा धन और क्या!
तुम एक गीत गा सकते हो, तो गीत ही गुनगुना दो। तुम बांसुरी बजा सकते हो, तो बांसुरी ही बजा दो। तुम नाच सकते हो, तो पैर में शर बांध लो, नाचो। किसी के कान में तुम्हारे शर की आवाज पड़ेगी—दान हुआ। तुम्हें कुछ बोध हुआ है; अपना बोध बांटो। तुम्हें कुछ समझ मिली है, अपनी समझ बांटो। तुम्हारे पास जो है.। और ऐसा कोई भी व्यक्ति जगत में नहीं है, जिसके पास कुछ भी न हो। तुम राह पर पड़े काटे तो बीन सकते हो! किसी के राह में पड़े कंकड तो हटा सकते हो! किसी के पास बैठकर हंस तो सकते हो। किसी रोते के आंसू तो पोंछ सकते हो।
एक आदमी रास्ते से गुजर रहा है, और एक भिखमंगे ने हाथ फैलाया। उस आदमी ने अपनी जेबें तलाशी। लेकिन कुछ था नही उसके पास। उसने भिखमंगे के हाथ में अपना हाथ रख दिया और कहा : भाई! मुझे क्षमा कर। मेरे पास अभी कुछ भी नहीं। कल जब आऊंगा तो जरूर कुछ लेकर आऊंगा।
उस भिखमंगे की आंखें गीली हो गयी। उसने कहा अब लाने की कोई जरूरत नहीं; जो देना था, तुमने दे दिया। तुमने मेरे हाथ में हाथ रखा, तुम पहले आदमी हो। तुमने मुझे भाई कहा; तुम मेरे पहले दाता —हो। अब और कुछ की जरूरत नहीं। बस, मेरे पास दो घड़ी बैठ जाओ। यह हाथ मेरे हाथ में रहने दो। यह पहला हाथ है, जो मेरे हाथ में आया। धन देने वाले तो बहुत मिले है, प्रेम देने वाला कोई भी नहीं मिला। और भाई तो मुझे किसी ने कहा ही नहीं। यह शब्द कितना प्यारा है—वह भिखमंगा कहने लगा—इसमे कितना मधुरस है! तुमने मुझे सब दे दिया। कभी यहां से गुजरो, तो मेरे हाथ में हाथ देकर क्षण भर बैठ जाया करे। फिर कभी मुझे भाई कहकर पुकारना।
तुम्हारे पास जो हो। किसी को भाई कहकर तो पुकार सकते हो। इतने कृपण तो मत हो जाओ कि किसी को भाई कहना मुश्किल हो जाए।
ईसाई फकीर हुआ——संत फ्रांसिस। वह वृक्षों को भी कहता था भाई। मछलियों को कहता था बहन। चांद—तारों से दोस्ती करता था। पहाड़ों—नदियों से बात करता था। और तो उसके पास कुछ भी नहीं था, फकीर था। लेकिन इतना तो कर सकता था। जितना फ्रांसिस ने दिया, उतना दुनिया के करोड़ों का दान देने वालों ने भी नहीं दिया। यह सारी प्रकृति उसके दान से आह्लादित हो उठी थी। जिस वृक्ष पर फ्रांसिस ने हाथ रखकर कहा होगा. भाई!.
ऐसे ही औपचारिक नहीं। क्योंकि वृक्षों से उपचार कोन निभाता है! आदमियों में शायद तुम उपचार भी निभाते हो; किसी से मतलब हो, काम हो, तो कहते हो भाई! कहते हैं न, कि जरूरत पड़े, तो आदमी गधे को भी बाप कह देता है! मगर भीतर तो जानता ही रहता है कि है तो गधा ही, यह काम पर पिताजी कहना पड़ रहा है! जरूरत पड़ती है, तो राजनेता के भी पैर तुम छू लेते हो, उसको भी महात्मा कह देते हो। हालांकि तुम जानते हो. गधा तो गधा है! जरूरत पड़ी, तो बाप कहना पड़ रहा है। उपचार!
लेकिन वृक्ष से तो कोई उपचार निभाना नहीं है। चांद—तारे तो कोई शिकायत करेंगे नहीं। जब फ्रांसिस ने पक्षियों को, जानवरों को, वृक्षों को भाई कहकर पुकारा, यह अंतर्तम से उठी आवाज, यह प्रार्थना बन गयी, यह दान हो गया।
तो खयाल रहे धर्म का सार है दान। दान अर्थात देने की क्षमता। क्या दिया—इस पर जोर नहीं है। दिया—इस पर जोर है। और जिसने दिया, उसे बहुत मिला। और जिसे बहुत मिला, उसने फिर बहुत दिया। और ऐसे यह श्रृंखला बढ़ती ही चली जाती है। इसका फिर कोई अंत नहीं है। और जिसने सब दिया, उसने समग्र पा लिया। जो देकर शून्य हो गया, उस पर सारा अस्तित्व बरस उठता है, परमात्मा उसे अपना घर बना लेता है।
दान का अर्थ है देने की क्षमता, बांटने की कला। खयाल रखना दान भी बेहूदा हो सकता है, अगर कला न हो। तुम इस ढंग से दे सकते हो कि जिसको तुम दो, उसको पीड़ा दे जाओ। तुमने अगर दो पैसे भिखमंगे की तरफ फेंक दिए हैं, तो तुमने दिया कम, चोट ज्यादा पहुंचायी। तुम दे। पैसे देकर अपनी अमीरी दिखाए। तुमने दो पैसे क्या दिए, तुमने उस गरीब की छाती में छुरा भोंक दिया! तुमने इतनी अकड़ से दिए कि तुम्हारा दान जहर हो गया। अच्छा होता, तुमने न दिया होता। अच्छा होता, तुम मुंह फेरकर चले गए होते। अच्छा होता कि तुमने सुनी ही न होती भिखमंगे की आवाज। लेकिन यह देना, देना न हुआ।
अक्सर तुमने दिया है क्रोध में। अक्सर तुमने दिया है सिर्फ बचाव के लिए। भीड़— भाड़ है, बाजार है, चार लोग क्या कहेंगे कि भिखमंगा हाथ जोड़े खड़ा है, और तुम दो पैसे नहीं दे पाते! अक्सर तुमने भिखमंगे को दिया है र लेकिन दिया लोगों के कारण है, जो देख रहे हैं बाजार में। तुम्हारी प्रतिष्ठा दाव पर लगी है। तुमने अपने अहंकार को ही दिया, भिखमंगे को नहीं दिया। और देकर तुमने चाहा है कि वह धन्यवाद करे। देकर तुमने चाहा है कि तुम्हारी स्तुति करे
अगर तुम्हारे देने में कोई भी चाह है— धन्यवाद की भी चाह है—तो देना गलत हो गया। अच्छा होता, तुम न देते। अच्छा होता, तुम मुंह फेरकर चले जाते। अच्छा होता, तुम थोड़े कठोर होते। लेकिन अगर तुमने यह चाहा कि भिखमंगा तुम्हारा अनुग्रह माने, तो चूक हो गयी, तो दान का धोखा हुआ, दान नहीं हुआ।
दान—देने की क्षमता और बांटने की कला है। जब कोई किसी को देता है, तो बहुत ही प्रसादपूर्ण होना चाहिए देना। इतना प्रसादपूर्ण होना चाहिए कि जिसे तुमने दिया है, वह आह्लादित हो; जिसे तुमने दिया है, वह प्रफुल्लित हो—दीन न हो जाए।
तुम देकर किसी को दीन कर दो, तो भूल हो गयी। तुम्हारे देने से कोई समृद्ध हो, ऊपर उठे। तुम्हारे देने के कारण तुम्हारे समतुल हो जाए। तुम जब किसी को दो, तो इस तरह देना कि जैसे उसने लेकर तुम पर अनुग्रह किया है। यह देने की कला है। तुमने अनुग्रह किया, ऐसा नहीं।
इसलिए इस देश में हम दान भी देते हैं और दक्षिणा भी। दक्षिणा का मतलब वही होता है। दुनिया के किसी कोने में दक्षिणा का रिवाज नहीं है। दान तो सारी दुनिया में है, लेकिन दक्षिणा बिलकुल भारतीय बात है।
यह दक्षिणा क्या है? तुमने किसी को कुछ दिया—यह दान हुआ। फिर इस दान को उसने स्वीकार कर लिया—इसका धन्यवाद भी दोगे या नहीं! वह दक्षिणा है। वह तुम्हारा अनुग्रह का भाव है कि मैं धन्यभागी हुआ कि आपने, मैंने जो कुछ छोटा—मोटा दिया, फूल तो नहीं था, फूल की पाखुडी थी, फिर भी आपने स्वीकार कर लिया—मैं धन्यभागी हूं। आप इनकार भी कर सकते थे। आप कह देते. रखो अपनी फूल की पाखुडी। मुझे फूल चाहिए। तुम्हारा इनकार मुझे तोड़ जाता। तुमने मुझे तोड़ा नहीं। तुम्हारी बड़ी कृपा है, अनुकंपा है। तुम्हारी करुणा है।
यह बड़ी अपूर्व बात है दक्षिणा। यह भारत की अपनी अनूठी खोज है। और इसमें सारी कला छिपी है दान की। इसका मतलब यह हुआ कि देने वाला अनुगृहीत है लेने वाले का। क्यों? ऐसा क्यों होना चाहिए?
साधारण गणित तो यही कहेगा कि जिसको मिला है, वह अनुगृहीत हो। लेकिन हमने कुछ और गहरा गणित खोजा। हमने कहा जिसने दिया है, वह अनुगृहीत हो। क्यों? क्योंकि जिसने दिया है, उसे बहुत गुना मिलेगा।
जिसने लिया है, उसका तो लेना समाप्त हो गया। जिसने दिया है, उसने बहुत पाने का उपाय कर लिया। जिसने लिया है, उसका तो कोई आगे का द्वार नहीं खुलता। जिसने दिया है, वह बहुत पाने का मालिक हो गया, हकदार हो गया। तो धन्यवाद कोन करे?
धन्यवाद वही करे, जिसने दिया है। अगर यह गरीब इनकार कर देता, तो ये द्वार स्वर्ग के बंद हो जाते। इस गरीब ने तुम्हारे स्वर्ग के द्वार खोल दिए। तुम इसे धन्यवाद दो। यह देने की कला है।
तो दान है देने की क्षमता, देने की कला, और देने का आनंद।
देते समय तुम आनंदित होने चाहिए। कभी क्रोध से मत देना। कभी भय से मत देना। कभी लोभ से मत देना। कभी प्रतिष्ठा के मोह में मत देना। ये सब गलत देने हैं। ये सब विषाक्त हैं। जब दो, तो आनंद भाव से देना। देना इसलिए कि मेरे पास इतना है कि मैं करूं भी क्या! मैं न दूं तो क्या करूं! देने का सहज आनंद ही कारण हो, बस।
तुमने जीसस की कहानी सुनी एक अमीर बागवान ने कुछ मजदूर सुबह काम पर बुलाए। मह पक गए थे और तोड्ने थे। फिर कुछ मजदूर दोपहर बुलाए। क्योंकि मह शाम तक टूट न पाएंगे। फिर कुछ मजदूर सांझ को भी बुलाए। जब सूरज ढल रहा था, तब भी कुछ लोग आए। फिर तो सूरज ढल गया। सब को मजदूरी बांटी। सब को बराबर मजदूरी बांट दी।
जीसस यह कहानी बहुत बार कहते थे।
स्वभावत: सुबह से जो दिनभर काम किए थे; भर दुपहरी जो जुते रहे थे धूप में; पसीना—पसीना हुए थे, सूरज ऊगते आए थे और सूरज डूबते जा रहे थे। न भोजन करने गए थे, न एक क्षण को हटे थे काम से—उनको भी उतना ही दिया! तो वे जरा नाराज हुए। उन्होंने कहा यह अन्याय है! और जो लोग दोपहर आए, उनको भी उतना! उनको आधा मिलना चाहिए। और जो अभी—अभी आए हैं, जिन्होंने काम किया .ही नहीं कुछ, उनको भी उतना! इनको तो कुछ भी नहीं मिलना चाहिए।
वह अमीर हंसने लगा, और उसने कहा : मैं तुम से यह पूछता हूं कि तुमने जितना काम किया, उतने के दाम तुम्हें मिले या नहीं? उन्होंने कहा नहीं, हमें उतने के दाम मिले, थोड़े ज्यादा भी मिले। वह सवाल नहीं है। लेकिन जो दोपहर को आए थे इनको, और जो सांझ को आए इनको?
उस अमीर ने कहा धन मेरा है और मेरे पास बहुत है। अगर मैं बाटना चाहूं? तो तुम्हें कुछ एतराज है? मैं अगर नदी में फेंकना चाहूं, तो तुम्हें कुछ एतराज है? यह मैं मेरे पास अधिक है, इसलिए दे रहा हूं। इन्होंने काम नहीं किया, मेरे पास भी आंख है। कोई दोपहर आया, कोई सांझ आया, काम क्या करेंगे ये सांझ को आए हुए लोग! लेकिन मेरे पास जरूरत से ज्यादा है, इसलिए दे रहा हूं।
यह आनंद के भाव से देना है।
जो तुम्हारे पास जरूरत से ज्यादा हो, उसी को देने में मजा हो सकता है। जिस संबंध में तुम अभी खुद ही कंजूस हो, खुद ही पकड़े बैठे हो, जो अभी तुम्हें लगता है कम है, वह तुम कैसे दोगे? दोगे भी तो किसी और कारण से दोगे। उसमें हेतु आ जाएगा। और जहां हेतु आया, मोटिव आया, वहां दान मर गया।
दान की आत्मा है अहेतुकी— भाव—कि बिना किसी कारण के दे रहे हैं। देने के शुद्ध आनंद से दे रहे हैं। ऐसा जो देना सीख लेता है, वह सम्राट हो जाता है।
सम्राट, कितना तुम्हारे पास है, इससे नहीं होता कोई। सम्राट, तुम देने में कितने
समर्थ हो, इससे होता है कोई। मिलने वाला भिखमंगा रह जाता है।
और ध्यान रखना. धनी से धनी आदमी भी माग रहा है। गरीब ही मांग रहा है, ऐसा नहीं, धनी भी मांग रहा है। अमीर से अमीर, अरबपति भी मांग रहा है। कहता है और मिल जाए, और मिल जाए।
इसलिए इस दुनिया में भिखमंगे ही भिखमंगे हैं। गरीब भिखमंगे हैं, अमीर भिखमंगे हैं! मगर सब भिखमंगे हैं। यहां कभी—कभी कोई सम्राट होता है। सम्राट वही होता है, जो माग नहीं रहा है; जिसने बांटना शुरू कर दिया है। बांटने से साम्राज्य का विस्तार है।
ऐसा अहेतुक दान तभी संभव है, जब तुम्हारे जीवन में प्रेम की थोड़ी सुवास हो। इसलिए मैंने कहा. धर्म का सार है दान। और दान का मूल है प्रेम।
प्रेम का अर्थ होता है : मैं अलग नहीं। मैं भिन्न नहीं, पृथक नहीं। मैं सब से जुड़ा हूं। तो अगर कहीं कोई पीड़ा में है, तो मैं दौड़ता हूं, क्योंकि मैं ही पीड़ा में हूं।
अगर वृक्ष सूख रहा है जल के बिना, और मैं जल देता हूं तो इसीलिए कि वृक्ष में मैं ही सूख रहा हूं। अगर कोई रो रहा है, और मैं आंसू पोंछता हूं, तो सिर्फ इसीलिए कि वे आंसू मेरे ही आंसू हैं; वे आंखें मेरी ही आंखें हैं। इस भाव का नाम प्रेम है। प्रेम का अर्थ है मैं अस्तित्व से भिन्न नहीं हूं —अभिन्न हूं एक हूं। प्रेम का अर्थ है अद्वैत की प्रतीति।
हम अलग हो भी कहां —सकते हैं! प्रतिपल श्वास चाहिए, भोजन चाहिए, जल चाहिए, तो ही जी सकते हैं। और यह सब मिलता है हमें बाहर से, अस्तित्व से।
वृक्षों में फल लग रहे हैं, वे तुम्हारे लिए तैयार हो रहे हैं कि तुम उन्हें पचाओगे। वे तुम्हारा रक्त —मांस —मज्जा बनेंगे। नदियों में जलधार बह रही है कि तुम्हारे वृक्षों में पानी जाएगा, फल पकेंगे। और नदियों में जलधार तुम्हारे घर तक आ रही है कि तुम्हारी प्यास होगी, और प्यास के लिए पानी की जरूरत होगी। और आकाश में बादल मंडरा रहे हैं, और वर्षा हो रही है—तुम्हारे लिए। और सुबह सूरज निकला है—तुम्हारे लिए। और रात चांद—तारों से भर जाता है आकाश—तुम्हारे लिए—कि तुम अब विश्राम में चले जाओ।
जरा गौर से देखो, यह सब तुम्हारे लिए है। यह सब तुम्हारे लिए है और तुम इसके लिए नहीं हो—यह अप्रेम है। यह धोखा हुआ। यह बेईमानी है। यह सब तुम्हारे लिए हो रहा है और तुम इसके लिए बिलकुल नहीं!
जिस दिन तुम्हें यह दिखायी पड़ता है : यह सारा अस्तित्व मेरे लिए; उस दिन तुम पूरे भाव से कहते हो. मैं भी इस सारे के लिए। तब प्रेम। और प्रेम मूल है दान का। धर्म का सार है दान। दान का मूल है प्रेम। और प्रेम का अर्थ है, निरअहंकारिता। यह धर्म का, दान का, शास्त्र हुआ। निरअहकारिता पर ही दान खड़ा होगा। अगर देने में जरा भी अहंकार है, तो चूक गए; फिर प्रेम नहीं है।
आज के सूत्र दान पर हैं, इन्हें ठीक से समझना। इसके पहले कि हम सूत्रों में चलें, उन परिस्थितियों को समझ लें, जिनमें ये सूत्र बुद्ध ने कहे थे।

पहला दृश्य:

 श्रावस्ती के एक अपुत्रक श्रेष्ठी के मर जाने के बाद कोशल नरेश ने सात दिन तक उसके धन को गाड़ियों में खुलवाकर राजमहल में मंगवाया। इन सात दिनों तक धन ढुलवाने में वह इस तरह उलझा कि भगवान के पास एक दिन भी न जा सका। वैसे साधारणत: वह नियम से प्रतिदिन प्रातःकाल भगवान के दर्शन और सत्संग के लिए आता था।
जिस दिन धन खुलवाने का कार्य पूरा हुआ उस दिन उसे भगवान की याद आयी सो वह भरी दुपहरी में ही भगवान के पास जा पहुंचा।
भगवान ने उससे दोपहर में आने का कारण पूछा। राजा ने सब समाचार बताए और फिर पूछा भंते। एक बात मेरे मन को मथे डालती है। उस अपुत्रक श्रेष्ठी के पास इतना धन था कि मुझे सात दिन लग गए गाडियों में ढुलवाते— ढुलवाते तब बामुश्किल उसके धन को राजमहल ला पाया हूं। फिर भी वह रूखा— सूखा खाता था! फटा— पुराना पहनता था! और टूटे हुए. जराजीर्ण रथों पर चलता था!
इसे सुनकर भगवान ने कहा महाराज! वह पूर्वकाल में तगरशिखी बुद्ध को दान दिया था। दान तो कुछ बड़ा नहीं दिया था। बड़े दान देने की उसकी क्षमता नहीं थी। दान तो बड़ा क्षुद्र दिया था। लेकिन क्षुद्र दान का विराट परिणाम हुआ। उस दान के फलस्वरूप उसे इतनी धन— संपत्ति इस जीवन में मिली।
दान तो उसने थोड़ा ही दिया था पर दान देकर पीछे पछताया बहुत था— कि यह भी क्या भूल कर ली! यह भी किन बातों में आ गया।
उस पछतावे के कारण उसका मन अच्छा खाने— पहनने में नहीं लगता था। वह पछतावा पीछा कर रहा था उस पछतावे के कारण रुपया हाथ से छोड़ने की उसकी क्षमता ही विलीन हो गयी थी। दान देना तो मु अपने उपयोग के लिए भी धन को व्यय करने की उसकी क्षमता खो गयी थी।
उस दान को देने से दो परिणाम हुए थे एक परिणाम हुआ था कि दिया तो बहुत उसके उत्तर में मिला। और देकर पछताया बहुत तो उसका जीवन अत्यंत कृपणता से भर गया। इतना कि खुद भी खा नहीं सकता था कपड़े नहीं पहन सकता था। महाकंजूस हो गया— पछतावे के कारण!
इसने संपत्ति के लिए ही अपने भाई के मरने पर उसके इकलौते बेटे को भी जंगल में ले जाकर मार डाला था। जिसके फलस्वरूप उसे स्वयं संतान पैदा नहीं हुई। उसके बांझ रह जाने का यही मूल कारण था।
इस समय मरकर वह महा रौरव नरक में उत्पन्न हुआ है। क्योंकि पुराना किया हुआ पुण्य समाप्त हो गया है और उसने कोई नया पुण्य किया नहीं।
राजा ने भगवान की बात सुन कहा भंते! उसने बडा बुरा कर्म किया जो आप जैसे बुद्ध के पास ही विहार में रहते हुए भी न दान दिया न धर्म— श्रवण किया न अपनी संपत्ति का कोई सदुपयोग किया। कोई पुण्य न कमाया और सब छोड़कर अंतत: मर ही गया!
शास्ता हंसे और बोले ऐसे ही महाराज! बुद्धिहीन पुरुष धन— संपत्ति पाकर भी निर्वाण की तलाश नहीं करते हैं। और धन— संपत्ति के कारण उत्पन्न तृष्णा उनका दीर्घकाल तक हनन करती है। तब उन्होंने यह गाथा कही:

हन्‍नति भोगा दुम्‍मेधं नौ चे पारगवेसिनो।
भोगतण्‍हाय दुम्‍मेधो हन्‍ति अज्‍जेव अत्‍तनं ।

'संसार को पार होने की कोशिश नहीं करने वाले दुर्बुद्धि मनुष्य को भोग नष्ट कर डालते हैं। भोग की तृष्णा में पड़कर वह दुर्बुद्धि पराए की तरह अपना ही घात करता है।'
सूत्र के पहले इस घटना को ठीक—ठीक विश्लिष्ट करके समझ लें।
पहली तो बात. श्रावस्ती के एक अपुत्रक श्रेष्ठी के मर जाने के बाद।
अक्सर ऐसा होता है। जिनके पास धन है, उनको पुत्र नहीं होते। जिनके पास धन है, उनको संतान नहीं होती। अक्सर ऐसा होता है कि धनी आदमियों को गोद लेने पड़ते हैं बेटे। यह सारी दुनिया में ऐसा है! गरीबों के घर खूब बेटे—बेटियां पैदा हो जाते हैं, अमीरों के घर कुछ चूक हो जाती है। इस चूक के पीछे जरूर कुछ मनोविज्ञान होगा।
मेरे देखे मनोविज्ञान यही है कि धनी आदमी में प्रेम नहीं होता। असल में धन को कमाने में उसको अपने प्रेम को बिलकुल नष्ट कर देना होता है।
प्रेमी धन कमा नहीं सकता। कमा भी ले, तो बचा नहीं सकता। एक तो कमाना मुश्किल होगा प्रेमी को, क्योंकि उसे हजार करुणाएं आएंगी। वह किसी की छाती में छुरा नहीं भोंक सकेगा। और किसी की जेब भी नहीं काट सकेगा। किसी से ज्यादा भी नहीं ले सकेगा। डांडी भी नहीं मार सकेगा। धोखा भी नहीं कर सकेगा। जालसाजी भी नहीं कर सकेगा। जिसके हृदय में प्रेम है, वह ज्यादा से ज्यादा अपनी रोटी—रोजी कमा ले, बस, बहुत। उतना भी हो जाए तो बहुत!
धन इकट्ठा करने के लिए तो हिंसा होनी चाहिए। धन इकट्ठा करने के लिए तो कठोरता होनी चाहिए। धन इकट्ठा करने के लिए तो छाती में हृदय नहीं, पत्थर होना चाहिए, तभी धन इकट्ठा होता है।
तो धन प्रेम की हत्या पर इकट्ठा होता है। और जिसके प्रेम की हत्या हो जाती है, वह बांझ हो जाता है। वह सब अर्थों में बांझ हो जाता है। उसके जीवन में फूल लगते ही नहीं। संतति तो फूल है। जैसे वृक्ष में फूल लगते, फल लगते। लेकिन अगर वृक्ष में रसधार बहनी बंद हो जाए, तो फिर फूल भी नहीं लगेंगे, फल भी नहीं लगेंगे। संतति तो फल और फूल हैं तुम्हारे जीवन में। तुम्हारे प्रेम की धारा बहती रहे, तो ही लग सकते हैं।
इसके पीछे बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण है। जितना ज्यादा धनी, उतना ही प्रेम में दीन हो जाता है। अक्सर तुम गरीबों को प्रेम से भर हुआ पाओगे, अमीरों को प्रेम से रिक्त पाओगे। यह आकस्मिक नहीं है। बात उलटी है।
तुम सोचते हो. गरीब आदमी प्रेमी है। असल बात यह है कि प्रेमी आदमी गरीब रह जाता है। बात उलटी है। तुम सोचते हो अमीरों में प्रेम क्यों नहीं? तुम समझे ही नहीं। प्रेम ही होता, तो वे अमीर कैसे होते! अमीर होना कठिन हो जाता। प्रेम को तो मारकर चलना पडा। प्रेम को तो काट देना पड़ा। प्रेम को तो गड़ा देना पडा जमीन में। जिस दिन उन्होंने अमीर होना चाहा, जिस दिन अमीर होने की आकांक्षा जगी, उसी दिन प्रेम की हत्या हो गयी। प्रेम की लाश पर ही अमीरी के महल खड़े हो सकते हैं, नहीं तो नहीं खड़े हो सकते। प्रेम से कीमत चुकानी पड़ती है।
और प्रेम तुम्हारी आत्मा की सुगंध है। आत्मा की सुगंध खो जाती है और तुम्हारी देह धन से घिर जाती है। तुम्हारे पास जड़ वस्तुएं इकट्ठी हो जाती हैं, और तुम्हारा जीवन—स्रोत सूखता चला जाता है।
इसलिए अमीर से ज्यादा गरीब आदमी तुम न पाओगे। उसकी गरीबी भीतरी है। उसके भीतर सब सूख गया। उसके भीतर कोई रस नहीं बहता अब। उसका जीवन बिलकुल मरुस्थल जैसा है। वहां कोई हरियाली नहीं है। कोई पक्षी गीत नहीं गाते। कोई मोर नहीं नाचते। कोई बांसुरी नहीं बजती। कोई रास नहीं होता। सूख गयी इस जीवन चेतना में ही संतति के फल लगने कठिन हो जाते हैं।
श्रावस्ती के एक अपुत्रक श्रेष्ठी के मर जाने के बाद...। और स्वभावत:, कोई बेटा नहीं था उसका। और मर गया, तो सारा धन राजा के घर चला जाएगा।
कोशल नरेश ने सात दिन तक उसके धन को गाड़ियों में ढुलवाकर राजमहल में मंगवाया। इन सात दिनों तक धन ढुलवाने में वह इस तरह उलझा कि भगवान के पास एक दिन भी न जा सका।
अब यह जरा मजा देखना! यही कोशल नरेश जिज्ञासा से भरता है कि यह धनी आदमी है! इतना धन था! फिर भी न कभी ठीक से पहना, न कभी ठीक से खाया, न कभी ठीक रथों में चला! यह धनी आदमी, बुद्ध इसके पास ही विहार करते, कभी सत्संग को नहीं गया! इस धन में से कुछ बुद्ध के विराट काम में लगा देता, यह भी नहीं किया। और अब मर गया; और अब सब यहीं पड़ा रह गया!
यह दूसरे के संबंध में तो सोच रहा है, अपने संबंध में नहीं सोच रहा है! यह दूसरे का धन अपने घर बुलवा रहा है सात दिन तक; यह बुद्ध को भूल गया। ये सात दिन इसे बुद्ध की याद ही न आयी! साफ है बात कि बुद्ध की याद भी तभी आती है, जब फुरसत हो, जब और कोई काम न हो। बुद्ध इसकी जीवन—सूची में प्रथम नहीं हैं। प्रथम धन ही है।
जब सब तरह राहत होती है, और कोई काम नहीं होता, तब सोचता है. बैठे —ठाले क्या करना है! चलो र सत्संग कर आएं। सत्संग पर इसका जीवन दांव पर नहीं लगा है। यह सात दिन दूसरे का धन अपने घर लाने में व्यस्त है।
खड़ा रहा होगा वहा कि कहीं कोई और न ले जाए! कहीं धन यहां —वहां न बिखर जाए। कहीं लाने वाले नौकर—चाकर कुछ न लूट लें। कहीं कोई बैलगाड़ी महल की तरफ न आकर किसी और तरफ न मुड़ जाए। यह खड़ा रहा होगा। संभावना यही है कि बैलगाड़ियों के साथ —साथ धनी के घर से राजमहल आया होगा। भूल ही गया बुद्ध को!
और ध्यान रखना. अगर बुद्ध प्रथम नहीं हैं तुम्हारी जीवन —सूची में, तो हैं ही नहीं। अगर धर्म प्रथम नहीं है तुम्हारी जीवन—सूची में, तो है ही नहीं।
परमात्मा को तो सभी ने जीवन—सूची के अंत में रख दिया है! लोग कहते हैं धन कमा लें पहले, पद कमा लें पहले, बेटे की शादी कर लें, बच्चे बड़े हो जाएं, घर सब सम्हल जाए, फिर—फिर प्रभु — भजन में लगेंगे। अंतिम!
और न कभी घर सम्हलता पूरा, क्योंकि एक समस्या से दूसरी उठती चली जाती है। बच्चों का विवाह हो जाता है, तो उनके बच्चे खड़े हो जाते हैं। अब इन बच्चों का विवाह करना है। अब इनकी चिंता पकड़ने लगती है।
यहां उलझनें कभी समाप्त थोड़े ही होती हैं। जिंदगी में कभी ऐसा थोड़े ही होता है, जैसा फिल्मों में होता है—दि एंड। यहां कभी ऐसा होता ही नहीं कि खतम हो गयी कहानी—इतिश्री!
नहीं; यहां तो जिंदगी चलती चली जाती है। तुम खतम हो जाओगे, जिंदगी चलती चली जाती है। तुम कई बार खतम हो गए और जिंदगी चलती रही। जिंदगी कभी खतम नहीं होती। व्यक्ति आते हैं और चले जाते हैं, और जिंदगी बहती रहती है।
इसलिए तुम यह मत सोचना कि जिंदगी की धारा जब रुक जाएगी, सब चिंताओं से मुक्त हुए, सब समस्याएं हल हो गयीं, सब हिसाब—किताब पूरा हो गया, फिर बैठकर हरि— भजन करेंगे।
फिर तुम न करोगे। तुम्हारी लाश चलेगी; दूसरे लोग हरि— भजन करेंगे : राम —नाम सत्य है। वह दूसरे लोग हरि— भजन करेंगे, वह भी तुम्हारे लिए—कि बेचारा खुद तो नहीं कर पाया, अब इसको मरघट पहुंचाते तक तो कर दो! हालांकि अब लाश ही पड़ी है, वहां कोई सुनने वाला भी नहीं है!
तुम तो गंगा नहीं जा पाते, जब मर रहे होओगे, तो दूसरे बोतलों में बंद गंगाजल तुम्हारे मुंह में डाल देंगे! तुम गटक भी न पाओगे; आधा तो बाहर ही बह जाएगा! अब तो गटकने की भी क्षमता नहीं रह गयी।
तुम मर रहे हो, तुम्हारा होश खो रहा है, और लोग तुम्हारे कान में भगवान का नाम लेंगे या नमोकार मंत्र पढ़ेंगे, या भक्तांबर स्त्रोत या गीता—पाठ या वेद की ऋचाएं! वह मर रहा है आदमी! उसे अब कुछ सुनायी नहीं पड़ता! जिंदगीभर यह सोचता था कि कभी पूरा निश्चित हो जाऊंगा, तो बैठकर प्रभु का स्मरण कर लूंगा। मगर यह हो नहीं पाता।
प्रभु—स्मरण करना हो, तो अभी, या कभी नहीं। यही क्षण! एक क्षण के लिए भी टालना मत, क्योंकि एक क्षण का भी भरोसा नहीं। कोन जाने, दूसरे क्षण मौत आती हो, राम—नाम सत्य हो जाए! तो इसके पहले तुम राम—नाम को सत्य कर लो—अपने जीवन में।
यह कोशल नरेश धन ढोने में भूल गया बुद्ध को। हालांकि यह बड़े मजे की बात है, और यह सब के जीवन में होता है। दूसरे की आंख में तो अगर जरा सा कूड़ा—कर्कट पड़ा हो, तो तुम्हें ऐसा लगता है जैसे पहाड़। और अपनी आंख में पहाड़ भी पड़ा हो, तो कूड़ा—कर्कट भी नहीं मालूम होता!
हम दूसरे के संबंध में निर्णय लेने में बड़े कुशल हैं! हम अपने को बचाए ही चले जाते हैं। हम कभी नहीं सोचते अपने संबंध में।
धन ढोते वक्त इसने यह न सोचा कि सात दिन हो गए! मैं रोज सुबह जाता था बुद्ध के प्रवचन सुनने, रोज सत्संग करने, दर्शन करने! सात दिन में फुरसत न मिली! धन में ऐसा उलझा! और दूसरे का धन! अपना भी नहीं। और यह भी देख रहा है कि दूसरा मर गया सब छोड़कर, ऐसे ही मैं भी मर जाऊंगा।
मगर वह सवाल नहीं है। वह सवाल उठता ही नहीं। बुद्धिमान जिंदगी के सब सवालों को अपनी तरफ मोड देता है और बुद्ध सदा दूसरों की तरफ मोड़े रखता है। यह आदमी अगर थोड़ा बुद्धिमान होता, तो बजाय बैलगाड़ियों को राजमहल ले जाने के, बैलगाड़ियों को वहीं छोड़ता, राजमहल छोडता; जाकर बुद्ध से कहता कि आ गया शरण में। बुद्धं शरणं गच्छामि! अब कहीं न जाऊंगा। देख लिया : एक आदमी इतना धन छोड़कर मर गया, किसी काम नहीं पड़ा। और जब मर गया, तो एक कोड़ी साथ न ले जा सका। अब मैं क्या ले जाऊंगा! मेरी भी मौत करीब आती है।
उस अपुत्रक श्रेष्ठी की मृत्यु में अपनी मौत दिख गयी होती। उस अपुत्रक श्रेष्ठी की व्यर्थ जीवन— धारा में, अपने जीवन की व्यर्थता दिख गयी होती। क्रांति घट जाती। लेकिन सात दिन तो याद भी न आयी बुद्ध की। हां, कई बार यह सवाल उठा कि यह भी कैसा आदमी था! सब पड़ा रह गया आखिर! अरे! भोग लेता। कुछ उपयोग कर लेता। अब सब दूसरे ले जा रहे हैं!
और इस कोशल नरेश को खयाल ही नहीं कि ऐसे ही तुम मरोगे और इसी तरह दूसरे ले जाएंगे।
कोई इकट्ठा करता है, कोई ले जाता है! जो ले जाता है, वह भी इकट्ठा कर रहा है, वह भी मरेगा, फिर कोई ले जाएगा। धन यहीं का यहीं पड़ा रहता है, हम आते और चले जाते हैं। न कोई धन लेकर आता, न कोई लेकर जाता—जिसको यह दिखायी पड़ जाता है, उसके जीवन में बड़े अर्थ, बड़ी भाव— भंगिमाओं में रूपांतरण हो जाते हैं, नए अर्थ आ जाते हैं। तब दान की संभावना है।
जो है ही नहीं मेरा, उसको पकड़ना क्या! जिसको मुझे छोड़कर जाना ही पड़ेगा, उसको फिर मौज से ही क्यों न दे देना! मजे से क्यों न दे देना! जो दूसरे के हाथ लगने ही वाला है, उसे अपने ही हाथ से देने का मौका क्यों चूक जाना! और फिर पता नहीं किसके हाथ लगेगा?
अब सोचना. यह श्रेष्ठी मरा, यह चाहता तो बुद्ध को भी दे सकता था। लेकिन अब राजा के हाथ लगा। शायद इसी राजा से चुराया होगा टैक्स इत्यादि में। इसी राजा से बचाया होगा। उसी के हाथ लग गया! यह दान भी हो सकता था। उस गांव में गरीब भी थे बहुत। उनको दे गया होता। उस गांव में बीमार भी थे बहुत, उनकी औषधि का इंतजाम कर गया होता। लेकिन कुछ भी न कर पाया। अपने लिए ही नहीं कर पाया, तो दूसरे के लिए क्या करेगा?
इसलिए तुमसे एक बात और इस संदर्भ में कह दूं। जब मैं कहता हूं प्रेम करो, तो कभी भूलकर यह मत समझना कि मैं कहता हूं अपने से प्रेम नहीं करो। जो अपने से करता है प्रेम, वही दूसरे से कर सकता है।
यह श्रेष्ठी खुद ही ठीक से खाया—पीया नहीं, इसको गरीब को भूखा मरते देखकर दया नहीं आ सकती। कैसे आएगी? यह खुद ही गरीब की तरह रह रहा है! यह कहेगा. इसमें क्या खास बात है! हम भी ऐसा ही रूखा—सूखा खाते हैं। तो धन का क्या करोगे? धन हमारे पास है, फिर भी हम रूखा—सूखा खाते हैं। और तुम भी रूखा—सूखा खाते हो, धन तुम्हारे पास नहीं है। धन की जरूरत क्या है? हमें भी देखो, इस तरह के फटे—पुराने कपड़े पहनते हैं। तुम पहनो, तो कोई बहुत बड़ी कुरबानी कर दी! कि तुम बड़े शहीद हो गए! हमारी बैलगाड़ी देखो! यह भी टूटी—फूटी; तुम्हारी भी टूटी—फूटी। हम तुम्हीं जैसे हैं। धन के होने, न होने से क्या जरूरत है!
जो आदमी स्वयं ठीक से नहीं खाया, वह किसी की भूख नहीं समझ सकेगा। आमतोर से तुम उलटा तर्क सोचते हो। तुम आमतोर से सोचते हो : जिस आदमी ने दुख देखा, वह दूसरे के दुख समझ सकेगा। गलत बात है। क्योंकि जिसने खुद दुख देखा, वह दुख के कारण जड़ हो जाता है, वह दूसरे का दुख नहीं देख पाता। जिसने सुख देखा, वह दूसरे का दुख देख पाता है। सुख के कारण तुलना पैदा होती है। गरीब आदमी दूसरे गरीब आदमी के प्रति कोई दया नहीं कर पाता।
तुमने किसी भिखमंगे को किसी भिखमंगे के प्रति दया करते कभी देखा? भिखमंगा छीन लेगा दूसरे भिखमंगे से। भिखमंगों के भी अपने दादा होते हैं! उनके भी गुरु होते हैं। भिखमंगा छीन लेगा दूसरे भिखमंगे से। लेकिन भिखमंगों ने कभी दान नहीं दिया है।
अगर गरीबी और दुख का अनुभव दया लाता होता, तो भिखमंगे इस दुनिया में सबसे ज्यादा दयालु होते। वे सबसे ज्यादा कठोर हैं।
मेरी समझ और है। जिन्होंने जाना, उनकी भी समझ और है। उनकी समझ यह है कि तुम जितने सुख में जीओगे, उतना ही तुम अनुभव कर पाओगे कि लोग कितने दुखी हैं।
इसलिए मैं सुख का विरोधी नहीं हूं। मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूं कि तुम सब बांटकर और दुखी हो जाओ। मैं तुमसे यह भी नहीं कह रहा हूं कि तुम जाकर फकीर हो जाओ। मैं तुमसे यह भी नहीं कह रहा हूं कि तुम दीन—हीन होकर भटकने लगो। मैं तुमसे यही कह रहा हूं कि तुम अपने को प्रेम करो। अपने को प्रेम किया, उसी प्रेम से तुम दूसरे को प्रेम करने में धीरे — धीरे सफल हो पाओगे। जिसने अपने को प्रेम नहीं किया, उसने कभी किसी को प्रेम नहीं किया।
इसलिए तुम्हारे तथाकथित महात्मा जो कहते हैं, वह मैं तुम से नहीं कह रहा हूं। तुम्हारे तथाकथित महात्मा यह कहते हैं. अपने प्रति कठोर रहो, और दूसरे के प्रति दयावान। महात्मा गांधी का एक सूत्र यह भी था—अपने प्रति कठोर और दूसरे के प्रति दयावान।
लेकिन जो अपने प्रति कठोर है, वह कभी दूसरे के प्रति दयावान नहीं हो सकता। जो अपना न हुआ, वह किसका हो सकेगा? जो अपने प्रति कठोर है, वह दूसरे के प्रति भी भयंकर रूप से कठोर होगा।
उदाहरण के लिए, गांधी ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया। तो वह व्रत था, ब्रह्मचर्य नहीं था। जबर्दस्ती थी। थोप दिया अपने ऊपर। जिस दिन उन्होंने ब्रह्मचर्य अपने ऊपर थोपा, और कठोर हो गए। उसी दिन से वे दूसरों के प्रति दयाहीन हो गए। वे अपने बेटों को भी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे कि बेटे किसी के प्रेम में पड़े। वे बिलकुल जासूसी रखते थे अपने आश्रम में कि कोई किसी के प्रेम में न पड़ जाए। वे, जो भी प्रेम में पड़ जाए, उसको क्षमा नहीं कर पाते थे।
जिसने अपने जीवन को जबर्दस्ती ब्रह्मचर्य में बांध लिया, अब वह दूसरों के साथ भी वही जबर्दस्ती करेगा।
गांधी के सेक्रेटरी किसी के प्रेम में पड़ गए, तो सेक्रेटरी को निकालकर आश्रम से बाहर कर दिया। अगर कोई दो व्यक्ति गांधी के आश्रम में प्रेम में पड़ जाते और विवाह करना चाहते, तो गांधी सब तरह की बाधा डालते थे। पहली तो बाधा यह डालते थे. वे कहते थे कि दो साल ब्रह्मचर्य से रहो। और एक—दूसरे को देखो भी मत, चिट्ठी—पत्री भी मत लिखो। फिर उसके बाद भी अगर प्रेम बचेगा, तो सोचेंगे।
असहाय, कमजोर आदमी से किस तरह की अपेक्षाएं! और दो साल में यह आदमी सब तरह से अपने को दबाएगा, रोकेगा, कठोर हो जाएगा। शायद इसके भीतर जो प्रेम का अंकुर निकला था—ताजा, कोमल—वह मर ही जाएगा। दो साल बाद यह भी सोचेगा कि कहां झंझट में पड़ना! अब तो अंकुर भी मर चुका। अब महात्मा ही क्यों न बन जाओ!
गांधी स्वयं के भोजन के प्रति अति कठोर थे, इसलिए दूसरों के भोजन के प्रति भी अति कठोर थे। अपने प्रति कठोर थे, तो दूसरे के प्रति कठोर थे।
तुम्हारे महात्मा इसीलिए तो तुम्हारे प्रति बहुत कठोर हैं, क्योंकि अपने प्रति बहुत कठोर हैं। तुम्हारे महात्मा अगर तुम्हारी तरफ इस तरह देखते हैं कि तुम पापी हो, तो कुछ आश्चर्य नहीं। क्योंकि वे देखते हैं : हम उपवास कर रहे हैं, तुम मजे से भोजन कर रहे हो! हम शरीर सुखा रहे हैं, और तुम्हारा शरीर भरा—पूरा है! और हम नंगे बैठे हैं, और तुम सुंदर कपड़े पहने बैठे हो! और हमारे पास कुछ भी नहीं; तुम्हारे पास सब है! तुम महापापी हो।
इसलिए तुम्हारे महात्माओं की अंगुली तुम्हें महापापी सिद्ध करती रहती है। और तुम्हारे महात्मा बैठे —बैठे मजा किस बात का लेते हैं? एक ही बात का कि सब सडेंगे नर्क में। सिवाय उनके और सब नर्क जा रहे हैं। इससे राहत मिलती है मन को बडी—कि ठीक है, आज भोग लो। कल तो नर्क में सडोगे, तब याद आएगी कि महात्मा ने कितना चेताया था, फिर भी नहीं चेते! हम ऊपर बैठेंगे स्वर्ग में, और तुम नर्क में सडोगे, तब तुम जानोगे असली बात; तब राज तुम्हें पता चलेगा।
लेकिन जो आदमी दूसरों को नर्क में सड़ा रहा है, यह उनके पहले नर्क पहुंच जाएगा। तुमको, महात्मा जी तुम्हारे, अगुआ की तरह मिलेंगे, मार्गदर्शन करते हुए मिलेंगे नर्क के रास्ते पर। यहां भी तुम्हारे अगुआ हैं, वहां भी तुम्हारे अगुआ होंगे! भेद नहीं पड़ने वाला है। क्योंकि जो आदमी कठोर है, वह स्वर्ग नहीं जा सकता। जो आदमी कठोर है, वह सुख की उमंग से ही नहीं भर सकता। और जो आदमी अपने प्रति कठोर है, वह सबके प्रति कठोर हो जाता है।
तुम देखते हो. अडोल्फ हिटलर में और महात्मा गांधी में बहुत फर्क नहीं है। अडोल्फ हिटलर भी अपने प्रति उतना ही कठोर था, जितना महात्मा गांधी। हिंदुस्तान में होता, तो हम कहते, महात्मा हिटलर! शाकाहारी था। कभी मांसाहार नहीं किया। ब्रह्म—मुहूर्त में उठता था, याद रखना। बिलकुल हिंदू था! सूरज उग आए—कभी नहीं सोया उसके बाद। सूरज उगने के पहले उठ आता था। न चाय पीता था, न सिगरेट पीता था, न शराब पीता था। और महात्मा में क्या गुण होने चाहिए?
मगर यह दुष्ट आदमी सारी दुनिया को भयंकर विनाश में ले गया। इसकी कठोरता! यह अपने पर कठोर था, इसने पूरी जर्मन जाति को सेना—स्थल में बदल दिया। इसने प्रत्येक जर्मन को कठोर बना दिया। ये कठोर बनने की तरकीबें हैं।
मैं कई बार सोचता हूं कि अगर यह दो—चार सिगरेट पी लेता, तो कुछ हर्जा नहीं था, लाभ ही होता दुनिया को। यह अगर किसी स्त्री के प्रेम में पड़ जाता और थोड़ी मूढ़ताएं कर लेता, तो लाभ ही होता दुनिया को। एकाध—दों बच्चे इसको पैदा हो जाते, और यह ब्रह्मचारी ही न रहता, तो शायद इसके जीवन में थोड़ी सरसता आ जाती। तो शायद दूसरा के बच्चे हैं—और उन पर बम गिराना कठिन हो जाता। कि दूसरे लोग भी प्रेम करते हैं, कि उनकी भी प्रेम की आकांक्षाएं हैं—उनको मारना कठिन हो जाता।
लेकिन यह कठोर महात्मा था। यह महात्मा दुनिया को महायुद्ध में ले गया।
दुनिया महात्माओं से बुरी तरह पीड़ित रही है। कारण? वे अपने को ही प्रेम करने में असमर्थ हैं; दूसरे को प्रेम न— कर सकेंगे। वे अपने को सताने में कुशल हैं, वे दूसरों को भी सताने के मौके खोजते रहेंगे।
यह कोशल नरेश! यह तो सोच रहा है कि यह आदमी नर्क जाएगा। न कभी सुख से जीया, न खाया, न पीया। सब पडा रह गया! दान कर लेता। पुण्य कर लेता। कुछ कर लेता। लेकिन स्वयं बुद्ध को भूल गया। वह इस तरह उलझा रहा धन को ढुलवाने में कि एक भी दिन भगवान के पास न आ सका। वैसे साधारणत: वह नियम से प्रतिदिन प्रातःकाल भगवान के दर्शन और सत्संग के लिए आता था।
आज कसौटी थी। धन को छोड़कर आना संभव नहीं हुआ। सब सुविधा में चल रहा था, तो आने में कोई अड़चन न थी। वहां भी बैठकर झपकी लेता होगा। वहा भी बैठकर विश्राम करता होगा। वहा भी बुद्ध जो कहते होंगे, सुनता नहीं होगा। सुना होता, तो सात दिन तक भूल कैसे जाता? वह सब सुना मिट्टी में गया। उस सब सुने में कुछ सार नहीं।
सुना होता, तो आज तो यह बड़ा प्रमाण मिल गया था, बुद्ध जो कहते थे उसी का. कि यह सब पडा रहा जाएगा। यह सब ठाठ पड़ा रह जाएगा, जब बांध चलेगा बनजारा! आज तो प्रमाण मिल जाता, आज तो देखकर आंखें खुल जातीं, कि बुद्ध ठीक ही कहते हैं। अब और देर करनी उचित नहीं। जैसे यह श्रेष्ठी मर गया, ऐसे कल मैं मर जाऊंगा। उसके पहले कुछ कर लूं कुछ खोज लूं कुछ सत्य से नाता जोड़ लूं। बुद्ध के चरण पकड़ लूं। बुद्ध जो कहते हैं, उसे गुन लूं उसे जीवन में उतार लूं।
लेकिन जिस दिन धन ढुलवाने का काम पूरा हुआ, उसे उस दिन फिर भगवान की याद आयी!
अब फिर खाली था। फिर फुरसत थी। तो भगवान यानी एक तरह का मनोरंजन। काम—वाम अब नहीं है कुछ। अब चलो, वहा हो आएं। इस संसार को तो सम्हाल ही लें, उस संसार को भी सम्हाले रहें। और जब भी दोनों में संघर्ष हो, तो इसको पहले सम्हालना है, उसको बाद दे देनी है।
सो वह भरी दुपहरी में भगवान के पास जा पहुंचा।
शायद थोड़ा भीतर अपराध— भाव भी हुआ होगा—कि सात दिन से नहीं गया हूं भगवान पूछेंगे : कहां रहे! शायद भीतर कुछ कलुष भी लगा होगा, कालिमा भी लगी होगी कि यह भी मैंने क्या किया! शायद उसी अपराध के कारण दोपहर में ही पहुंच गया। जाता सुबह था, वही मिलने का समय भी था। असमय पहुंच गया। भर दोपहर!
भगवान ने उससे दोपहर में आने का कारण पूछा। भगवान ने यह नहीं पूछा कि सात दिन क्यों नहीं आया!
नहीं, बुद्ध जैसे व्यक्ति तुम्हें पीड़ा देना ही नहीं चाहते, किसी तरह की पीड़ा नहीं देना चाहते। यह पूछना अशोभन होगा कि सात दिन क्यों नहीं आया! यह उसके घाव को छूना होगा। अब जो हुआ, हुआ।
बुद्ध जैसे व्यक्ति क्षमा करना जानते हैं। देख तो रहे हैं कि सात दिन से नहीं आया। पता भी चल चुका होगा, खबर भी आ गयी होगी कि श्रेष्ठी मर गया, उसका धन ढो रहा है कोशल नरेश। लेकिन यह नहीं पूछा कि सात दिन क्यों नहीं आए। पूछा यही आज भर दुपहरी में कैसे चले आए!
बुद्ध जैसे व्यक्ति सदा विधायक को देखते हैं, नकारात्मक को नहीं। अंधेरे को छोड़ देते हैं, रोशनी को पकड़ते हैं। क्योंकि रोशनी में ही ले जाना है, तो रोशनी को ही पकड़ना उचित है।
राजा ने सब समाचार बताए और फिर पूछा : भंते! उस अपुत्रक श्रेष्ठी के पास इतना धन था, फिर भी वह रूखा—सूखा खाता था, फटा—पुराना पहनता था, टूटे हुए जराजीर्ण रथों पर चलता था! मामला क्या है? इसका राज क्या है?
सुनकर भगवान ने कहा महाराज! वह पूर्व काल में तगरशिखी बुद्ध को दान दिया था, जिसके फलस्वरूप इतनी धन—संपत्ति उसे मिली थी। दान तो बहुत छोटा था...।
बीज बड़ा छोटा होता है जैसे, और फिर विराट वृक्ष बन जाता है, ऐसा ही दान का बीज है। और ध्यान रखना : ऐसा ही पाप का बीज भी है। तुम जो बोओगे, वही बड़ा होता चला जाता है। तो बोते समय खयाल रखना। कहीं जहर के बीज मत बो लेना। एक बार जो तुमने बो दिया है, उसकी फसल काटनी पड़ेगी। और जो बोया है, वही बड़ा होकर मिलेगा।
छोटा सा बीज तुम बोते हो, और बड़ा वृक्ष हो जाता है, जिसके नीचे सैकड़ों लोग बैठ सकें छाया में; कि अनेक बैलगाड़ियां विश्राम कर सकें; कि अनेक पक्षी बसेरा कर सकें। बड़ा हो जाता है वृक्ष। खूब फल लगते हैं, खूब फूल लगते हैं। एक बीज से फिर अनंत बीज लगते हैं। इसलिए सोच—समझकर बीज बोना।
दान तो उसने किसी बुद्धपुरुष को—तगरशिखी कों—थोड़ा सा ही दिया था। ज्यादा देने की उसकी क्षमता भी नहीं थी। देने की क्षमता होती, तो फिर पछताता ही क्यों? दे गया होगा किसी संवेग के क्षण में।
इस बात को खयाल में लेना। अक्सर संवेग का क्षण होता है। किसी की वाणी सुनी, तगरशिखी को सुना होगा, उनके अपूर्व वचन! भाव में आ गया होगा, संवेग में आ गया होगा। उस संवेग के क्षण में ही बोल गया होगा खड़े होकर—कि चलो, इतना दान करता हूं। वह भावाविष्ट दशा रही होगी। जब घर लौटा होगा, तब रास्ते में सोचा होगा. यह मैं क्या कर गया!
मार्क ट्वेन ने लिखा है कि मैं एक चर्च में व्याख्यान सुनने गया। दस मिनट तक सुना। ऐसा व्याख्यान मैंने कभी सुना नहीं था। बडा अपूर्व था। सौ डालर मेरे खीसे में थे। मैंने सोचा कि आज सौ ही डालर दान दे दूंगा।
जैसे ही यह सोचा कि सौ ही डालर दान दे दूंगा; मन में हजार शकाएं—कुशकाए उठने लगीं। कि हो सकता है, यह आदमी सिर्फ बोलने में कुशल हो! हो सकता है कि यह सिर्फ बातचीत ही बातचीत हो, भाषा का ही जाल हो, शैली का ही प्रभाव हो। नहीं, सौ ज्यादा हैं; पचास से काम चल जाएगा।
जब से सौ देने का विचार किया, तब से सुनना तो बंद ही हो गया, क्योंकि वह भीतर विचार चलने लगा. पचास से ही काम चल जाएगा। अब सुनने में ठीक—ठीक रस भी नहीं आ रहा था, क्योंकि देने का भाव पैदा हो गया था। अब तो घबड़ाहट होने लगी।
और दस मिनट सुना। उसने सोचा कि नहीं, पचास के लायक यह आदमी नहीं! तुम हमेशा अपने मन का हिसाब खोज लेते हो। पच्चीस से काम चल जाएगा!
घंटे पूरे होते—होते तो वह आ गया दो डालर पर! और उसने लिखा है कि फिर मैं निकल भागा वहा से—कि कहीं ऐसा न हो कि जब दान को बटोरने वाली थाली मेरे पास आए, तो मैं उसमें से कुछ निकाल लूं। जब सौ से दो पर आ गया, तो कितनी देर लगेगी निकालने में! और डर इतना लगा कि—मार्क ट्वेन ने लिखा—कि मैं निकल भागा इसके पहले कि थाली आए; नहीं तो उलटे पाप हो जाए कुछ!
संवेग का क्षण था। दस मिनट के बाद अगर उसने दे दिया होता, तो सौ डालर दे दिए होते। लेकिन पछताता फिर। घर पहुंचते —पहुंचते रोता—कि यह भी क्या भूल कर ली! मैं भी कैसे सम्मोहन में पड़ गया! मेरे जैसा बुद्धिमान आदमी! और धोखे में आ गया!
यह धनपति बुद्ध को दान दिया, जिसके फलस्वरूप उसे इतनी धन—संपत्ति मिली। इस धन—संपत्ति को जो तूने सात दिन तक बैलगाड़ियों में ढोया है, यह उस एक छोटे से बीज से पैदा हुई।
दों—बहुत मिलता है। जो दोगे—वही मिलता है। जितना दोगे, उससे अनंत गुना मिलता है। और जरूरी नहीं है कि तुम जाकर मंदिर में दो, कि मस्जिद में दो; जहां देना हो, वहां दो। पत्नी को दो, बच्चों को दो, पड़ोसियों को दो, मित्रों को दो। देने की भावदशा रहे।
दान तो उसने थोड़ा दिया था, बुद्ध ने कहा, पर दान देकर पछताया बहुत। जितना दिया था, उससे अनंत गुना पछताया। ऐसे एक बीज तो अमृत का बोया और हजार बीज उसी के आसपास जहर के बो दिए। अमृत का वृक्ष भी बड़ा हुआ, जहर के फूल भी लगे। तो वह जहर की बागुड़ में घिर गया अमृत का वृक्ष। जहरीले फलों ने सब तरफ से कंटीली झाड़ियों की तरह अमृत के वृक्ष को घेर लिया। वे बहुत थे।
उस पछतावे के कारण ही उसका मन फिर अच्छा खाने —पहनने में नहीं लगता था। यह उसी जन्म से —शुरू हो गया। दे आया होगा कुछ दान, अब सोचता होगा. कैसे उतना दान निकाल लूं वापस! कहां से निकालूं? तो चलो, थोड़ा कम खाओ, थोड़ा कम पहनो। इस वर्ष नहीं बनाएंगे नया कोट सर्दियों में, तो चलेगा। पुराना बिलकुल ठीक है। और नहीं लेंगे नया रथ। अब लोग कारें लेते हैं, तब रथ लेते थे! नहीं लेंगे नया रथ, नया माडल नहीं लेंगे। पुराने ही माडल से एक साल और खींच लेंगे। थोड़ा इसी में टीम—टाम, रंग वगैरह करवा लो। यह घोड़ा यद्यपि बूढ़ा हो गया है, लेकिन अभी दो साल और चल जाएगा।
वह जो दान कर आया था, उसको बचाना जरूरी है। तो उसको रस चला गया खाने —पहनने में। और वह जो रस गया, सो गया। वह अभी तक नहीं लौटा। अनंत जन्म बीत गए होंगे इस बीच, क्योंकि तगरशिखी बुद्ध गौतम बुद्ध से कोई पांच हजार साल पहले थे। कितने जन्म इस आदमी के हो गए होंगे!
लेकिन खयाल रखना. गंगोत्री में गंगा बड़ी छोटी है, गो—मुख से गिरती है। फिर गंगासागर में जाकर बहुत बड़ी हो जाती है, सागर हो जाती है। ऐसे ही जीवन है तुम्हारा। जो किया है, वह रोज बड़ा होता जाता है।
एक—एक कृत्य सोचकर करना, एक—एक कृत्य ध्यानपूर्वक करना, नहीं तो बहुत पछताओगे। अशुभ से बच सको, तो अच्छा। शुभ कर सको, तो अच्छा। और एक ही बात से तोल लेना : अहंकार और निरअहंकार। जिस बात से भी अहंकार को पुष्टि मिलती हो, समझ लेना कि कुछ गलत करने जा रहे हो। और जिस बात से भी अहंकार गलता हो, विसर्जित होता हो, समझ लेना कि पुण्य हो रहा है। क्योंकि मौलिक रूप से एक ही पाप है—अहंकार।
उस पछतावे के कारण रुपया हाथ से छोड़ने की इसकी क्षमता ही चली गयी। दूसरों के लिए तो सवाल ही नहीं रहा, यह अपने लिए भी अब कठिन हो गया इसे। इसने संपत्ति के लिए ही अपने भाई के मरने पर उसके इकलौते बेटे को भी जंगल में ले जाकर मार डाला—कि उसकी संपत्ति भी इसे मिल जाए।
इसका बेटा नहीं है कोई। यह निःसंतान है। इसके पास अपना बहुत है। लेकिन भाई का भी मिल जाए; तो उसके बेटे को मार डाला!
जो इतना कठोर हो गया कि अपने भाई के बेटे को मार सका! और कोई जरूरत नहीं थी इसको, क्योंकि इसके पास अपना खुद बहुत है, वह भी पड़ा रह जाने वाला है, उसका भी कोई मालिक नहीं है।
भाई के बेटे को मारकर इसका प्रेम बिलकुल सूख गया। इसीलिए यह निःसंतान रह गया। इसके बौझ रह जाने का यही मूल कारण है। इस समय मरकर वह महा रौरव नरक में उत्पन्न हुआ है। क्योंकि पुराना किया हुआ पुण्य समाप्त हो गया है और नया पुण्य उसने किया नहीं।
ध्यान रखना पुण्य भी समाप्त हो जाते हैं! पुण्यों की भी सीमा है। कमाते ही रहोगे, तो ही साथ रहेंगे। बहती ही रहे पुण्य की धारा, तो ही ठीक है। रुकी—कि गयी। ऐसा ही समझो कि जैसे तुम आग जलाते हो। ईंधन झोंकते रहो, तो आग जलती रहेगी, जलती रहेगी। ईंधन बंद हो गया, थोड़ी —बहुत देर जलेगी पुराने ईंधन के कारण, फिर आखिर चुक जाएगी।
हर चीज चुक जाती है। पुण्य भी चुक जाते हैं। सिर्फ एक चीज है जो नहीं चुकती, वह पुण्य और पाप के भी अतीत है, उसको साक्षी भाव कहा है। वही भर नहीं चुकता। वही भर शाश्वत है, बाकी सब चीजें क्षणभंगुर हैं।
पुण्य भी दूर तक साथ जाता है। लेकिन सदा साथ नहीं जा सकता। कमायी है एक तरह की, उसका लाभ ले लोगे, समाप्त हो जाएगी।
इसलिए जब अवसर मिले शुभ का, तो करते रहना। ऐसा मत सोचना कि बहुत कर चुके शुभ, अब क्या करना! जिस दिन तुमने ऐसा सोचा कि बहुत कर चुके शुभ, अब क्या करना है! उसी दिन से शुभ मरने लगेगा, उसी दिन से तुम्हारी पूंजी चुकने लगेगी। जैसे आदमी को कमाते रहना चाहिए, तो ही पूंजी आती है, ऐसे ही पुण्य करते रहना चाहिए, तो ही पुण्य में धारा बहती रहती है, सातत्य रहता है।
राजा ने भगवान की बात सुनकर कहा भंते! उसने बडा बुरा कर्म किया, जो आप जैसे बुद्ध के पास ही विहार में रहते हुए भी दान नहीं दिया, न धर्म— श्रवण किया। और अपनी इतनी संपत्ति को छोड़कर मर गया!
वह पुराने बुद्ध से जो एक दफे भूल हो गयी, उस कारण वह इन बुद्ध के पास आया भी नहीं होगा! मेरे देखने में ऐसा ही है। वह पछतावा इतना गहरा हो गया है कि एक दफा गया था—ऐसा कोई चेतन उसके मन में नहीं है, लेकिन गहरे अचेतन में संस्कार है—एक दफा गया था बुद्ध के पास, तब भूल हो गयी थी, दान कर बैठा था। अब ऐसी जगह फटकना भी नहीं। अब ऐसी जगह जाना भी नहीं। अब ऐसे लोगों से बचना।
ये खतरनाक लोग हैं। इनके पास आदमी भावाविष्ट हो जाता है और कुछ का कुछ कर बैठता है! होश गंवा बैठता है! प्रेम में पड जाता है इनके। इनके साथ मदहोश हो जाता है। ऐसी जगह जाना ही नहीं। ऐसा मजबूत कर लिया होगा। ऐसी मजबूत धारा बन गयी होगी।
अब बुद्ध का पड़ाव पास में ही था, दो—चार घर के पास ही होगा। शायद वहीं से रोज निकलता होगा। लेकिन निकलते वक्त मुंह फेर लेता होगा, या कानों में अंगुलियां डाल लेता होगा। हालाकि कानों में अंगुलियां डालने की जरूरत नहीं, क्योंकि लोग वैसे ही बहरे हैं! आंख उस तरफ कर लेता होगा। हालांकि कोई जरूरत नहीं, क्योंकि लोग आंख के रहते भी देखते कहां हैं!
जल्दी—जल्दी निकल जाता होगा कि कहीं कोई जान—पहचान का आदमी न मिल जाए और कहे कि आओ, आज तो सत्संग कर लो। कहीं कोशल नरेश न मिल जाएं सत्संग से आते हुए—कि अरे, कभी आते नहीं! कहीं लाज—संकोच में, किसी की बात के प्रभाव में फंस न जाऊं! उस रास्ते से न निकलता होगा। दूसरे रास्तों से जाता होगा। बचता होगा।
कोशल नरेश ने कहा : भंते! उसने बड़ा बुरा कर्म किया, जो आप जैसे बुद्ध के पास ही विहार में रहते हुए न दान दिया, न धर्म— श्रवण किया और अपनी इतनी संपत्ति को छोड़कर अंततः मर ही गया न! काम क्या आया!
अब ये कोशल नरेश किससे कह रहे हैं? इनको भी यह समझ में नहीं आया कि वह संपत्ति अपनी नहीं है, जिसको घर ढो लाए। अपनी न दें, कम से कम जो अपनी नहीं है, उसको तो दान कर दें! इन्हें यह भी याद नहीं आ रहा है कि सात दिन दूसरे की संपत्ति घर ढोने में बुद्ध को भूल गए थे। वह बेचारा तो अपनी संपत्ति को बचाने में भूला था; ये तो दूसरे की संपत्ति लूटने में भूल गए थे! यह भी दिखायी नहीं पड़ता।
कुछ बड़ा मजा है। इस सत्य को ठीक से समझना। हमें दूसरों के कृत्य दिखायी पड़ते हैं, उनके मनोभाव नहीं दिखायी पड़ते। हमें अपने मनोभाव दिखायी पड़ते हैं, अपने कृत्य नहीं दिखायी पड़ते। और यह एक बड़ी जटिल मनोवैज्ञानिक गुत्थी है।
जैसे कोई आदमी चोरी करता है। तो हमें उसका कृत्य दिखायी पड़ता है कि इसने चोरी की। हमें यह नहीं दिखायी पड़ता कि इसके भीतर मनोभाव क्या थे। उस चोर को स्वयं अपना चोरी का कृत्य नहीं दिखायी पड़ता। उसको अपने मनोभाव दिखायी पड़ते हैं। उसके मनोभाव समझो।
इसलिए चोर कहेगा : मुझे कोई समझता नहीं है। मुझे कोई समझ नहीं पाता। तुम सभी यही कहते हो : कोई मुझे समझता नहीं! पत्नी पति को नहीं समझती; पति पत्नी को नहीं समझता। बाप बेटे को नहीं समझता; बेटा बाप को नहीं समझता। भाई— भाई को नहीं समझता। कोई किसी को समझता ही नहीं! इस दुनिया में हरेक को एक ही शिकायत है, कोई मुझे समझता नहीं।
कारण क्या होगा इस शिकायत का? यह इतनी सार्वभौम है! कारण यही है। तुम्हें अपना मनोभाव दिखायी पड़ता है।
जो आदमी चोरी करने गया, उसके मन में भी खयाल उठा कि चोरी करना ठीक नहीं है। लेकिन और हजार बातें उठीं—कि जिसकी मैं चोरी करने जा रहा हूं इसके पास जरूरत से ज्यादा पहले ही से है। इससे लेने में हर्जा क्या? शायद मैं एक तरह का साम्यवाद फैला रहा हूं; चोरी नहीं कर रहा हूं। इसका खुद का कहां है? दूसरों से छीनकर बैठा है। यह खुद चोर है। इससे ले लेने में हर्ज नहीं है।
फिर मेरी देखो. पत्नी बीमार है, और बच्चे को दूध भी नहीं मिलता। पत्नी की बीमारी, पत्नी को बचाना है। पत्नी को दवा नहीं है, बच्चे को दूध नहीं है। ये दो जीवन बचाने के लिए अगर थोड़ी सी चोरी की, तो इसमें पाप कैसे हो सकता है? दो जीवन बचा रहा हूं।
फिर भीतर वह सोचता है कि आज जरूरत है, तो चोरी कर लेता हूं। जब मेरे पास होगा, दान कर दूंगा। सब ठीक हो जाएगा। गंगा स्नान कर आऊंगा। मंदिर में पुण्य कर दूंगा। और अगर चोरी ठीक से हाथ लग गयी, तो इसमें से कुछ—एक नारियल—हनुमानजी को चढ़ा आऊंगा! गरीबों को बांट दूंगा कुछ इसमें से।
उसके मनोभाव! वह अपने मनोभाव देखता है। उसके मनोभाव अच्छे— अच्छे बनाता है। उन अच्छे मनोभावों की बड़ी श्रेणी में वह चोरी का छोटा सा कृत्य बिलकुल दब जाता है। उसे इसमें कुछ खास बात नहीं दिखायी पड़ती। अपने ही मनोभावों को गूंथकर वह चोरी करने चला जाता है। जैसे कि पुण्य करने जा रहा है, जैसे कि कोई बड़ा महाकृत्य करने जा रहा है, जैसे दुनिया की सेवा करने जा रहा है! तुम्हें दिखायी पड़ता है उसका चोरी का कृत्य, तुम कहते हो, पापी है! और तब वह कहेगा : तुम मुझे समझ नहीं पा रहे!
तुम्हें कृत्य दिखता है, उसे अपने मनोभाव दिखते हैं। और यही हालत तुम्हारी है। तुम्हें अपने कृत्य नहीं दिखते, और अपने मनोभाव दिखते हैं। इसलिए दुनिया में कोई किसी को समझता हुआ मालूम नहीं पड़ता।
हिटलर ने लाखों यहूदी मार डाले। उसको यही खयाल था कि इनको मारने से दुनिया का हित होगा। वह दुनिया के हित के लिए कर रहा था, कल्याण के लिए कर रहा था! स्टैलिन ने लाखों लोग रूस में मार डाले—साम्यवाद आएगा! दुनिया में सुख आएगा!
न तो हिटलर के मारने से यहूदियों को दुनिया में कोई सुख आया। और न स्टैलिन के लाखों लोगों को मार डालने से दुनिया में कोई साम्यवाद आया। फिर वही माओ ने किया। फिर दुनिया में सभी यही करते हैं। मगर करने वाला यह सोचता है कि मेरे भाव! वे भाव उसको ही दिखायी पड़ते हैं, किसी और को दिखायी नहीं पड़ते; और बड़ी भूल—चूक हो जाती है।
एक झूठा लतीफा।
मेरे दो संन्यासी, विजयानंद और विनोद, एक बस में सफर कर रहे थे और बीच में एक बड़ी अपूर्व महिला—टुनटुन बैठी थी। अब टुनटुन बीच में बैठी हो, तो सीट तो उसने पूरी ले ही ली थी। वे किसी तरह अपने को सम्हाले थे दोनों कोनों पर। गिरे—अब गिरे, तब गिरे! बस जरा हिलती—कि गिरे!
फिर विनोद ने धीरे से कहा, बहनजी! टेहुनी तो न मारो। मगर उसने सुना ही नहीं। फिर विजयानंद ने भी हिम्मत बांधी और कहा, बहनजी! जरा जोर से कहा, टेहुनी तो न मारो। मगर उसने वह भी न सुना। तब जरा विनोद को क्रोध भी आ गया। उसने कहा कि सुनती हैं कि नहीं बहनजी! टेहुनी न मारो। तो टुनटुन ने कहा : अरे, हद्द हो गयी। क्या श्वास लेना भी जुर्म है!
वह तो बेचारी सिर्फ श्वास ले रही है। लेकिन अब मोटी महिला! श्वास ले, तो दूसरे समझ रहे हैं कि टेहुनी मार रही है।
ऐसी भूल रोज होती है। आदमी अपने भीतर अपना मनोभाव देखता है। दूसरा व्यक्ति उसके बाहर क्या कृत्य घट रहा है, वह देखता है। इसलिए कोई किसी को समझ नहीं पाता।
यह कोशल नरेश उसका कृत्य तो देख रहा है, उसका मनोभाव नहीं देखा। कैसे देखे? अपना मनोभाव देख रहा है, अपना कृत्य नहीं देख रहा है। कैसे देखे?
जो अपना कृत्य देखने लगे और दूसरों के मनोभाव देखने लगे, वही बुद्धत्व को उपलब्ध है। फिर उससे भूल नहीं होती। फिर किसी को समझने में उससे भूल नहीं होती।
शास्ता हंसे और बोले.। इसलिए बुद्ध हंसे, यह देखकर कोशल नरेश की बात, कि यह दया खा रहा है उस गरीब पर, जो मर गया है। इसे दया अपने पर नहीं आ रही! यह सोच रहा है कि उसने कैसा महापाप किया। लेकिन यह अपने बाबत जरा भी विचार नहीं कर रहा है!
असल में हम दूसरों के संबंध में इसलिए विचार करते हैं, ताकि हम अपने संबंध में विचार करने से बच जाएं।
हम सोचते ही रहते हैं दूसरों के संबंध में! तुमने कभी अपने संबंध में सोचा? कभी घड़ी आधा घड़ी बैठकर तुमने कभी अपने संबंध में सोचा? जब तुम घड़ी आधा घडी बैठते हो शांत, तब भी तुम दूसरों के संबंध में सोचते हो! पड़ोसियों के संबंध में, अखबार में छपी खबरें, फिल्मों में देखी कहानियां, रेडियो पर सुने गीत—वही गूंजते रहते हैं। और तुम उसी विचार में तल्लीन रहते हो!
दूसरा महत्वपूर्ण नहीं है। पहले अपने में तो जाग लो, अपने को तो देख लो! पहले दर्पण अपने चेहरे के सामने करो, उससे ही क्रांति की शुरुआत है, उससे ही धर्म का प्रारंभ है।
इसलिए शास्ता हंसे और बोले. ऐसे ही महाराज! बुद्धिहीन पुरुष धन—संपत्ति पाकर भी निर्वाण की तलाश नहीं करते हैं। और धन—संपत्ति के कारण उत्पन्न तृष्णा उनका दीर्घकाल तक हनन करती है।
फिर भी बुद्ध ने सीधा नहीं कहा। फिर भी बुद्ध ने परोक्ष ही 'कहा। बुद्ध ने फिर भी सत्य ही कहा, लेकिन उस सत्य को व्यक्ति—सूचक नहीं बनाया। सिर्फ इतना ही कक्ष : ऐसे ही महाराज! बुद्धिहीन पुरुष धन—संपत्ति पाकर भी निर्वाण की तलाश नहीं करते हैं।
जिनके पास धन—संपत्ति नहीं है, जिनके पास भोजन नहीं है, कपड़े नहीं, छप्पर नहीं, अगर वे निर्वाण की तलाश न करें, उन्हें क्षमा किया जा सकता है। क्योंकि अभी उनके जीवन की छोटी—छोटी समस्याएं ही इतनी बड़ी हैं, उनको ही नहीं सुलझा पा रहे हैं। लेकिन जिनके पास सब है, जिन्हें अब कोई उलझाव नहीं रहा है, वे भी अगर सत्य की तलाश न करते हों, तो उन्हें क्षमा नहीं किया जा सकता।
अगर गरीब धार्मिक न हो, क्षम्य है। अगर अमीर धार्मिक न हो, तो बुद्ध है, क्षम्य नहीं है। तो जड़ है। मंद है। अगर गरीब धार्मिक हो, तो महाबुद्धिशाली है। और अगर अमीर धार्मिक हो, तो होना ही चाहिए; इसमें कुछ महाबुद्धिशाली होने की बात नहीं है।
इन सत्यों को खयाल में रखना। जब तुम्हारे पास सब सुविधा हो, जब तुम घडीभर शांत बैठ सकते हो —द्वार बंद करके, संसार को भूलने की सुविधा हो तुम्हें घडीभर के लिए, तो भूलना। क्योंकि उसी भूलने से तुम्हें परमात्मा की सुधि आनी शुरू होगी, सुरति जगेंगी।
बुद्ध ने कहा. ही महाराज! ऐसा ही हाल है। और हंसे। शायद कोशल नरेश ने उनके हंसने का भी यही अर्थ लगाया होगा कि हंस रहे हैं उस दुर्बुद्धि निःसंतान श्रेष्ठी के लिए। फिर भी शायद न सोचा होगा कि यह हंसने का तीर कोशल नरेश की तरफ है।
आदमी अपने को बचा लेता है। बच जाता है। तीर आता है, तो इधर सरक जाता, उधर सरक जाता। तीर को निकल जाने देता है।
यह तीर सीधा था। बुद्ध ने हंसकर जो कहना था, कहा था। देखकर हंसे होंगे कि कैसी दुर्दशा है मनुष्य की! यह दूसरे की भूलें देख रहा है और उन्हीं भूलों में खुद पड़ा है!
धन—सपत्ति के कारण उत्पन्न तृष्णा अनंतकाल तक स्वयं का हनन करती है। 'संसार को पार होने की कोशिश नहीं करने वाले दुर्बुद्धि मनुष्य को भोग नष्ट करते हैं। भोग की तृष्णा में पड़कर वह दुर्बुद्धि पराए की तरह अपना ही घात करता है। '
तुम ध्यान रखना. जो व्यक्ति ध्यान नहीं कर रहा है, वह जाने — अनजाने आत्मघात कर रहा है। क्योंकि जो ध्यान नहीं कर रहा है, वह आत्मा को न पा सकेगा। जो ध्यान नहीं कर रहा है, वह मरणधर्मा में उलझा रहेगा। और मरणधर्मा में जीवन का सार नहीं है। वह क्षुद्र में ही लगा रहेगा। और क्षुद्र में कोई आनंद नहीं है। क्षुद्र में कोई मुक्ति नहीं है। यह आत्मघात है।
जिसको तुम जीवन कहते हो, यह आत्मघात है, रोज—रोज मरते जाते हो। एक—एक दिन बीतता और जीवन कम होता जाता है। जितने दिन बीत गए, उतने अवसर बीत गए। उतने दिन बीत गए, जिनमें तुम स्वयं को उपलब्ध हो सकते थे, जिनमें परमात्मा का साक्षात हो सकता था, जिनमें शून्य घट सकता था, पूर्ण घट सकता था—उतने अवसर बीत गए।
मगर मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जो बीत गए दिन, उनके लिए बैठकर रोओ अब। अब जो बीत गए, सो बीत गए। अब रोने में इसको भी मत गंवा देना।
और सुबह का भूला सांझ भी घर आ जाए, तो भूला नहीं है; भूला नहीं कहाता है। और सदा समय है। अगर एक पल भी बाकी है तुम्हारे जीवन का.. और निश्चित ही अभी जीवित हो, तो यह पल तो है ही। आने वाले पल की कोई बात नहीं, यह पल तो तुम्हारे हाथ में है। यह पल भी अगर तुम पूरी त्वरा से अपने को देख लो, तो रूपांतरण का पल हो जाए।
एक क्षण में संसार मिट सकता है और परमात्मा सामने हो सकता है। गहन तीव्रता चाहिए, उत्तप्तता चाहिए, सब दाव पर लगाने की क्षमता चाहिए।

दूसरी परिस्थिति:

 गवान के तातविंस भवन में पांडुकमल शिलासन पर बैठे समय देवताओं में यह चर्चा चली— कि इंदक के अपने लिए लाए भोजन में से कलछीभर अनुरुद्ध स्थविर को दिया दान का फल अंकुर के दस हजार वर्ष तक बारह योजन तक चूल्हों की कतार बनवाकर दिए हुए दान से भी महाफल का हुआ। यह कैसा गणित है? इसके पीछे तर्क— सरणी क्या है?
इसे सुनकर शास्ता ने अंकुर से कहा : अंकुर! दान चुनकर देना चाहिए। ऐसा करने से वह अच्छे खेत में भली प्रकार बोए हुए बीज के सदृश्य महाफल होता है। किंतु तूने वैसा नहीं किया इसलिए तेरा दान महाफल नहीं हुआ। दान ही सब कुछ नहीं है; जिसे दिया वह भी अति महत्वपूर्ण है। और जिस भावदशा से दिया वह भी अति महत्वपूर्ण है। और तब उन्होंने ये गाथाएं कहीं.

 तिणदोसानि खेत्‍तानि रागदोसा अयं पजा।
तस्‍मा हि वितरागेसु दिन्‍नं होति महप्फलं ।।
तिणदोसानि खेत्‍तानि दोसदोसा अयं पजा।
तस्‍मा हि वीतदोसेसु दिन्‍नं होति महप्फलं ।।
तिणदोसानि खेत्‍तानि मोहदोसा अयं पजा।
तस्‍मा हि वीतमोहेसु दिन्‍नं होति महप्फलं ।।
तिणदोसानि खेत्‍तानि इच्‍दादोसा अयं पजा।
तस्‍मा हि विगतिच्‍देसु दिन्‍नं महप्फलं ।।

'खेतों का दोष है घास—पात, खेतों का दोष है तृण, इसी तरह प्रजा का दोष है राग। इसलिए वीतराग लोगों को दान देने में महाफल होता है। '
'खेतों का दोष है तृण, इसी प्रकार प्रजा का दोष है द्वेष। इसलिए वीतद्वेष व्यक्तियों को दान देने में महाफल होता है। '
'खेतों का दोष है तृण, इस प्रजा का दोष है मोह। इसलिए वीतमोह व्यक्तियों को दान देने में महाफल होता है।'
'खेतों का दोष है तृण, इस प्रजा का दोष है इच्छा। इसलिए विगतेच्छ व्यक्तियों को दान देने में महाफल होता है।'
पहले तो परिस्थिति को खूब हृदयंगम कर लें। यह कथा थोड़ी अनूठी है। इस कथा में दो दृश्य हैं। इस एक दृश्य में दो दृश्य समाए हैं।
पहला. भगवान तो अपने भिक्षुओं के पास बैठे हैं। भिक्षुओं ने उन्हें घेरा हुआ है। उनके सामने ही एक महादानी अंकुर नाम का व्यक्ति बैठा हुआ है, उसने अपूर्व दान किया है। उसका दान ऐसा है कि इतिहास में खोजे से न मिले। उसने ऐसा दान किया है. दस हजार वर्ष तक—जन्मों—जन्मों से वह दान कर रहा है—बारह योजन तक चूल्हों की कतार बनवाकर दान देता रहा है निरंतर।
जितना दिया है, उतना उसे और मिला है। लेकिन हर बार जितना मिला है, वह भी उसने दे दिया है। ऐसे उसका धन भी बढ़ता गया, उसका दान भी बढता गया। जितना दान बढ़ा है, उतना धन बढ़ा। जितना धन बढ़ा, उतना उसने दान बढ़ाया है। ऐसे दस हजार सालों में उसकी सारी जीवन—यात्रा दान की महाकथा है। बारह योजन तक चूल्हों को बनवा रखा है उसने। और उसमें जो भी तैयार होता है रोज भोजन, वह दान करता है। लाखों लोगों को भोजन देता है, कपड़े देता है।
वह अंकुर महाश्रेष्ठी सामने ही बुद्ध के बैठा है।
ऊपर आकाश में देवताओं की बैठक हो रही है। वे देवता आपस में सोचते हैं कि एक बड़ी अजीब बात है। यह अंकुर बैठा है बुद्ध के सामने। इसने इतना दान दिया है। लेकिन हमने सुना है कि एक छोटे से दान के सामने भी इसका दान कुछ .नहीं है। वह दान किया था इंदक नाम के आदमी ने।
वह इंदक भी वहां बुद्ध के पास मौजूद है। कहीं पीछे बैठा होगा। क्योंकि वह महाश्रेष्ठी नहीं है। उसको कोई जानता भी नहीं है। उसका दान भी ऐसा नहीं है कि उसकी कोई प्रशंसा करे। उसने दान दिया था अनुरुद्ध नाम के एक के भिक्षु को—स्थविर अनुरुद्ध को। वे बुद्ध के खास शिष्यों में एक थे, जो बुद्ध के सामने ही बुद्धत्व को उपलब्ध हुए।
इंदक ने अपने लिए लाए भोजन में से—इंदक खुद ही भिक्षु है, लेकिन अनुरुद्ध बीमार थे, और इंदक अपने लिए मांगकर भोजन लाया था——बूढे अनुरुद्ध को उसने कलछीभर अपने भोजन में से भोजन दिया। और देवता कह रहे हैं कि हमने सुना है कि उसका दान अंकुर के दान से ज्यादा श्रेष्ठ है और महाफल लाने वाला है।
भगवान के तातविस भवन में पांड़कमल शिलासन पर बैठे समय देवताओं में यह चर्चा चली—कि इंदक के अपने लिए लाए भोजन में से कलछीभर अनुरुद्ध स्थविर को दिया दान का फल, अंकुर के दस हजार वर्ष तक बारह योजन तक चूल्हों की कतार बनवाकर दिए हुए दान से भी महाफल हुआ है। यह कैसा गणित है? इसके पीछे तर्क —सरणी क्या है?
इसके पीछे बड़ी तर्क —सरणी है। अंकुर ने जो दिया है, उसके पास बहुत है, इसलिए दिया है। देकर उसे कोई अड़चन नहीं होती। देना सुविधापूर्ण है। सच तो यह है कि उसे हाथ में एक कला पकड़ गयी, एक कुंजी पकड़ गयी। दस हजार सालों में जितना दिया, उतना धन बढ़ता गया। उसने और दिया, तो और धन बढ़ता गया है। देने से उसे कोई कष्ट नहीं हुआ है। देने से उसे कोई पीडा नहीं हुई है। देने में कोई त्याग नहीं है, कोई बलिदान नहीं है। देना सुविधापूर्ण है।
इंदक का देना ज्यादा मूल्यवान सिद्ध हुआ है। इंदक भीख मांगकर लाया है। वह गरीब भिखारी जैसा भिक्षु है। उसकी कोई प्रतिष्ठा नही है। उसे कोई जानता नहीं है। उसे भीख मिलना भी मुश्किल होती होगी।
तुम थोड़ा सोचो! बुद्ध जब एक गांव में आते थे, तो उनके साथ दस हजार भिक्षु आते थे। छोटे—छोटे गांव बिहार के, उनमें दस हजार भिक्षुओं को भोजन मिलना! बड़ी कठिन बात थी। जो अग्रणी थे, उनको तो सरलता से मिल जाता था। लोग निमंत्रण दे देते थे—महाकाश्यप को, कि सारिपुत्त को, कि मौद्गल्यायन को, कि अनुरुद्ध को, कि मंजुश्री को—ये तो बड़े —बड़े प्रसिद्ध बोधिसत्व थे, इनको तो लोग निमंत्रण करके ले जाते थे। लेकिन फिर दस हजार भिक्षुओं की भीड़ थी। उसमें दीन—हीन भिक्षु भी थे, जिनका कोई नाम भी नहीं जानता था। इनको भिक्षा मिलनी भी कठिन हो जाती थी।
इंदक ऐसा ही गरीब भिक्षु है, अज्ञात नाम, अज्ञात कुल। मुश्किल से भिक्षा मिली होगी। हो सकता है, दो —चार दिन बाद मिली हो। दो —चार दिन भूखा रहा हो। और इधर आया और देखा कि अनुरुद्ध बीमार हैं। के हैं। और भिक्षा मांगने नहीं जा सके हैं। शायद जो थोड़ा सा लाया था, उसमें से आधा या आधे से ज्यादा, कलछीभर, अनुरुद्ध को उसने दे दिया है।
इसके पीछे सीधा गणित है। जब तुम बिना किसी कष्ट के देते हो—देना तो अच्छा है, लेकिन इसका महाफल नहीं हो सकता। फल होगा। महाफल तो तब होगा, जब दुम जरूरत पड़े, तो अपने को त्याग कर भी देते हो, अपने को दाव पर लगाकर भी देते हो—तब महाफल होगा।
फल और महाफल में क्या फर्क है? फल बाहर का होता है; महाफल भीतर का। फल तो हुआ अंकुर को। धन दिया था, धन मिलता रहा। जितना दिया, उतना धन मिलता रहा। यह फल है। इससे यह मत समझना कि उसको कम मिला। दस रुपए दिए थे, तो हजार मिले। हजार दिए, तो दस हजार मिले। दस हजार दिए तो लाख मिले, कि करोड़ मिले।
तुम्हारे हिसाब में तो खूब महाफल हुआ। लेकिन बुद्ध की विचार सरणी में वह महाफल नहीं है, क्योंकि धन ही मिला न। एक रुपया दिया था, करोड रुपए मिले, तो भी मिला तो धन ही न। बाहर का ही दिया था, बाहर का ही मिला। फिर ये करोड़ भो दे दोगे, तो और अनंत करोड़ मिलेंगे। फार मिलेगा बाहर का ही। बाहर का दोगे, तो बाहर का ही मिलेगा। बाहर के देने से भीतर का नहीं मिलता है। और भीतर है, असली महाफल।
इस इंदक गरीब भिक्षु ने वह जौ कलछीभर दिया, इसमें भीतर का भी कुछ दिया। बाहर का तो दिया ही, वह तो सब को दिखायी पड़ रहा है। भीतर का भी कुछ दिया। इसमें त्याग है, इसमें आहुति है। इसमें अपने को बाद देने —की क्षमता है। इसने अपने को हटा लिया बीच से। इसने अपने अहंकार को बीच में नहीं आने दिया, अपनी अस्मिता को बीच में नहीं आने दिया—कि मुझे भी जरूरत है, कि मैं भी भूखा हूं? कि मैं दो दिन का भूखा हूं —इसने यह कोई बात नहीं आने दी। वृद्ध, बीमार अनुरुद्ध, इसने अपना भौजन उन्हें दे दिया। यह शायद उस दिन भूखा ही रह गया होगा। अध—पेट रह गया होगा। पानी पीकर ही सो गया होगा। इसने भीतर का कुछ दिया है। इसका महाफल हुआ है।
देवताओं में चर्चा चलती है। क्योंकि देवता भीतर की बात नहीं देख सकते। देवता बाहर की ही देख सकते हैं। जो भीतर की देख लें, वे तो बुद्धपुरुष हो जाते हैं। उनको देवता नहीं कहा जाता। वे देवताओं के पार हो जाते हैं।
देवता तो सुख देख सकते हैं— धन का, पद का, प्रतिष्ठा का। देवता तो सुख में तल्लीन हैं, उनकी बाहर की पकड़ है। उनको समझ में नहीं आ रहा है—कि यह बात कुछ जंचती नहीं। यह कोन सा नियम है? हमने सुना कि इंदक का फल ज्यादा है! शायद बुद्ध ने कहा होगा कि इंदक का फल ज्यादा है।
अंकुर का फल है, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं है। बाहर—बाहर का है। इससे इसकी आत्मा अछूती रह गयी है।
इसे सुनकर—देवताओं की इस चर्चा को सुनकर—शास्ता ने अंकुर से कहा, जो सामने ही बैठा हुआ है, कि अंकुर! दान चुनकर देना चाहिए। ऐसा करने से वह अच्छे खेत में भली प्रकार बोए हुए बीज के सदृश्य महाफल होता है। किंतु —तूने वैसा नहीं किया है। इसलिए तेरा दान महाफल नहीं हुआ। दान ही सब कुछ नहीं है। जिसे दिया, वह भी अति महत्वपूर्ण है। और जिस भाव से दिया, वह तो और भी अधिक महत्वपूर्ण है।
किसको दिया!
जीसस भी बीज और खेत की बात करते हैं। वे कहते हैं. किसी ने आकर खेत में बीज फेंके। कुछ बीज रास्ते पर पड़े, रास्ता कठोर था, पथरीला था। बीज नहीं ऊगे। कुछ बीज मेड़ पर पड़े। ऊगे तो जरूर, लेकिन मेड़ पर लोग चलते थे, इसलिए ऊगे और मर गए। कुछ बीज खेत के बीच पड़े। ऊगे भी और बड़े फलवान हुए।
ऐसा ही, बुद्ध कहते हैं, बीज कहां डाला, इस पर भी बहुत कुछ निर्भर है। बीज तो है ही महत्वपूर्ण; लेकिन बीज को किस भूमि में बोया, यह भी बहुत महत्वपूर्ण है। अच्छी भूमि खोजी, कि ऐसे ही कहीं डाल दिया! रास्ते पर डाल दिया! मेड़ पर डाल दिया! जहां से लोग चलते हैं, वहां डाल दिया, कि ठीक—ठीक भूमि खोजी! दान अगर ठीक भूमि खोजकर किया जाए, तो महाफलदायी होता है। किसको दिया? फिर किस भाव से दिया?
अंकुर को एक कुंजी हाथ लग गयी है। वह देखता है. धन देने से धन मिलता है। यह तो बड़ा हिसाब सस्ता हो गया! यह तो दुकानदारी हो गयी। यह तो जिसको मिल जाएगी कुंजी, वही यह करने लगेगा।
तुम डरते हो कि देने से कहा मिलने वाला है, जो हाथ में है, वह चला जाएगा; इसलिए नहीं देते। लेकिन तुममें और अंकुर में बहुत फर्क नहीं है। तुम इसलिए नहीं देते कि तुम डरते हो कि देने से चला जाएगा। अंकुर देता है, क्योंकि जानता है कि देने से मिलता है
मैंने सुना है, एक कार को एक भिखमंगे ने रोका। कार रुकी। भिखमंगे ने कहा कुछ मिल जाए। कार के मालिक ने बाहर सिर झांककर देखा। भिखमंगा तो भिखमंगा था। लेकिन चेहरे का ढंग कुलीन था। कपड़े यद्यपि पुराने थे, फट गए थे, लेकिन कीमती थे। व्यक्ति के मांगने में, उसकी भाषा में शिष्टता थी। पढ़ा—लिखा था। विश्वविद्यालय का स्नातक होगा। उसके पास हवा सुसंस्कृत की थी, यद्यपि दीन—हीन खड़ा था।
वह धनपति चकित हुआ। उसने कहा कि मैं तुम्हें देखकर कह सकता हूं कि तुम अच्छे कुल से आते हो, सुशिक्षित हो, पढे —लिखे हो। यह दुर्दशा कैसे हुई? उसने कहा. आप न पूछें। दुख न पूछें। कुछ दे सकते हों, दे दें।
उस धनपति ने सौ डालर निकालकर उसको दिए। उस भिखमंगे ने हंसकर लिए और कहा कि अब आपको बता ही दूं। यही हालत मेरी थी कुछ वर्षों पहले। ऐसे सौ —सौ दे—देकर बरबाद हुआ। आप भी ज्यादा दिन इस हालत में न रहेंगे। मैं आपकी भविष्यवाणी किए देता हूं। जो मेरी हालत हो गयी, वही आपकी हो जाएगी!
आमतोर से यही हम सब सोचते हैं कि दिया, तो गया! इसलिए हम पकड़ते हैं। इस अंकुर को यह कला हाथ लग गयी कि दिया, तो बढ़ता है।
मगर तुममें और अंकुर में बुनियादी भेद नहीं है। तुम भी धन को पकड़ रहे हो, वह भी धन को पकड़ रहा है। इसलिए भाव कोई शुभ नहीं है। अशुभ भाव से ही दिया जा रहा है। इसलिए बीज तो फेंक रहा है, लेकिन ठीक भूमि मैं नहीं पड़ रहे हैं। और चूंकि देने से मिलता है, इसलिए देने में वह पात्रता की भी फिकर नहीं करता। देने से मिलता है—कोई ले जाए। चोर ले जाएं, हत्यारे ले जाएं। फिर चाहे इसके धन को पाकर हत्यारे हत्या करें, और चाहे चोर इसके धन को पाकर चोरी करें—इसकी इसे कोई चिंता नहीं है। यह फिकर ही नहीं करता कि किस खेत में बीज पड़ रहे हैं। इसको तो मिलने का राज हाथ लग गया।
इसलिए बुद्ध कहते हैं : किसको दिया, यह भी खयाल में रहे। और किनको देने योग्य है.।
'खेतों का दोष तृण है.। '
जैसे खेतों में घास—पात उगी हो, वहां तुम बीजों को फेंक दो, खराब हो जाएंगे। घास—पात खा जाएगी उन बीजों को। पैदा भी होंगे, तो बढ़ न पाएंगे, घास—पात में खो जाएंगे।
'ऐसे ही प्रजा का दोष राग है।'
रागी को दोगे, तो तुम्हारा दिया हुआ खो जाएगा। उसके राग को ही बढ़ाएगा। जैसे किसी आदमी को तुमने रुपए दे दिए और वह वेश्यागामी है, तो करेगा क्या रुपयों का! वह वेश्या के यहां चला जाएगा।
मैंने सुना है : एक चर्च में एक परिवार कभी नहीं आता था। तो चर्च की महिलाओं की समिति थी, उनको बड़ी चिंता हुई। वे सारी महिलाएं उनके पास गयीं—कि तुम कभी चर्च नहीं आते! उन्होंने कहा : हम कैसे आएं! हमारे पास एक ही जोड़ी कपड़े हैं। इन्हीं को हम बाजार में पहनते, इन्हीं को हम काम में पहनते। ये फट भी गए, पुराने भी हो गए। चर्च में इनको पहनकर, इस गंदगी को लेकर कहां आएं! हमारे पास दूसरी जोड़ी कपड़े नहीं हैं।
उन महिलाओं को बड़ी दया आयी। उन्होंने जल्दी से पैसा इकट्ठा किया सब ने। बाजार गयीं। अच्छे वस्त्र उनके लिए खरीदकर लायीं। पूरे परिवार के लिए। पत्नी, बच्चे, पति..। और दूसरे रविवार को उन्होंने बड़ी प्रतीक्षा की चर्च में, लेकिन वे नहीं आए। बड़ी चकित हुईं। वापस उनके घर पहुंचीं। पूछा कि आए क्यों नहीं?
उन्होंने कहा कि कपड़े पहनकर हमने जब आईने में अपने चेहरे देखे, तो इतने सुंदर मालूम पड़े कि हम सिनेमा चले गए! ऐसे जंच रहे थे कि हमने सोचा कि चर्च में क्या सार! चर्च में जाने से होगा भी क्या? कुछ पैसे भी आप लोग छोड़ गयी थीं, तो सिनेमा के बाद हम होटल चले गए। उसी में सब समय समाप्त हो गया!
तुम जिसको दे रहे हो, वह क्या करेगा, इसकी थोड़ी सदबुद्धि चाहिए।
'लोगों का दोष है राग, इसलिए वीतराग लोगों को दान देने में महाफल है।' जो राग के अतीत हो गया हो, जिसकी कोई कामवासना न रही हो, जिसके मन में कोई लोभ न रहा हो, अगर उसकी भूमि में तुम अपने दान का बीज डाल दोगे, तो महाफल होगा, आंतरिक फल होगा।
'खेतों का दोष घास —पात र प्रजा का दोष द्वेष.। '
अगर तुम किसी हत्यारे को पैसा दे दोगे, तो वह करेगा क्या? वह बंदूक खरीद लेगा। वह किसी की हत्या कर देगा।
मैंने सुना है कि एक अंधा और एक लंगड़ा साथ —साथ रहते थे। तुमने कहानी सुनी होगी। जंगल में जब आग लग गयी थी, तो उन दोनों ने एक—दूसरे को सहारा दिया और जंगल से बाहर आ गए। क्योंकि लंगड़ा चल नहीं सकता था, देख सकता था। अंधा देख नहीं सकता था, चल सकता था। दोनों जुड़ गए। अंधे ने लंगड़े को कंधे पर ले लिया। तो लंगड़ा देखता रहा, अंधा चलता रहा। दोनों आग से बाहर निकल आए। लेकिन बाहर आकर उनमें झगड़ा हो गया।
अक्सर ऐसा हो जाता है। आग से बाहर आकर झगड़ा होता है। क्योंकि वे यह कहने लगे कि मैंने बचाया तुझे। वह कहने लगा मैंने बचाया तुझे। मैं आ गया बीच में। मार—पीट हो गयी।
पुरानी कहानी है। उन दिनों ईश्वर देखता रहता था ऊपर से कि कहां क्या हो रहा है! अब तो थक गया, ऊब गया। और अंधे —लंगड़ों को कब तक देखता रहे! उसे बड़ी दया आयी! उसने कहा कि इन दोनों को ठीक कर दूं जाकर। आया। दोनों नाराज होकर एक—दूसरे से अलग— अलग झाड़ों के नीचे बैठे थे। विचार कर रहे थे कि किस तरह! अंधा सोच रहा था कि इस लंगड़े की आंखें किस तरह फोड़ दूं। बड़ी अकड़ बनाए हुए है आंखों की। और लंगड़ा सोच रहा था कि इस अंधे की टाग कैसे तोड़ दूं।
तभी ईश्वर आया। उसने पूछा पहले को। उसने सोचा कि जब मैं अंधे से पूछंगा कि तू कोई एक वरदान मांग ले, तो वह मांगेगा वरदान कि मेरी आंखें ठीक कर दो। जब उसने अंधे से कहा कि तू एक वरदान मांग ले। तो अंधे ने कहा कि हे प्रभु! जब दे ही रहे हों—इतना दिल दिखा रहे हो—तो एक काम करो : इस लंगड़े की आंखें फोड़ दो। और यही लंगड़े ने भी किया।
ईश्वर तो बहुत चौंका। तभी से तो आता नहीं कि ये अंधे —लंगड़े बड़े खतरनाक है
लंगड़े से पूछा। सोचता था यही कि कम से कम यह बुद्धिमानी दिखाएगा; अपने पैर ठीक करवा लेगा। लेकिन उसने कहा कि जब आ ही गए आप, और यही तो मैं सोच रहा था, जन्मों —जन्मों की आशा मेरी पूरी कर दी। तो अब इतना कर दो कि इस अंधे की टागें तोड़ दो!
आदमी जैसा है, ईश्वर के वरदान का भा गलत ही उपयोग होगा। तुम्हारे दान की क्या बात है!
'खेतों का दोष घास—पात, इस प्रजा का दोष द्वेष है। इसलिए वीतद्वेष व्यक्तियों को दान देने में महाफल होता है।'
उन्हें देना जो वीतद्वेष हैं, तो तुमने जो दिया है, उसकी शुभ ही शुभ परिणति होगी।
'खेतों का दोष घास—पात, प्रजा का दोष मोह है। इसलिए वीतमोह व्यक्तियों को दान देने में महाफल होता है।'
'खेतों का दोष घास—पात, प्रजा का दोष इच्छा। इसलिए विगतेच्छ, जो इच्छा के पार हो गए हैं, ऐसे व्यक्तियों को दान देने में महाफल होता है।'
इन वचनों पर विचार करना, चिंतन करना, मनन करना।
तुम्हारा जीवन दान बने, प्रेम बने, निरअहंकार भाव बने। और तुम्हारा जीवन उन दिशाओं में संलग्न हो जाए, उन खेतों में तुम्हारे बीज पड़े—दान के और प्रेम के—जहां राग के, द्वेष के, इच्छाओं के, घृणाओं के, तृष्णाओं के जहर नहीं हैं। फिर महाफल निश्चित है।


 आज इतना ही।