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सोमवार, 13 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--39)

संन्यास का एक नया अभियान—(प्रवचन—उन्‍नतालीसवां)

'नव—संन्यास क्या?':
गीता—सत्र से संदर्भ प्रवचनांश
बम्बई प्रथम सप्ताह जनवरी 1971  
एवं ला प्रथम सप्ताह फरवरी 1971

जो भी मैं कह रहा हूं संन्यास के संबंध में ही कह रहा हूं। यह सारी गीता संन्यास का ही विवरण है। और जिस सन्यास की मैं बात कर रहा हूं वह वही संन्यास है जिसकी कृष्ण बात कर रहे हैं—करते
हुए अकर्त्ता हो जाना, करते हुए भी ऐसे हो जाना जैसे मैं करने वाला नहीं हूं। बस संन्यास का यही लक्षण है।
गृहस्थ का क्या लक्षण है? गृहस्थ का लक्षण है, हर चीज में कर्त्ता हो जाना। संन्यासी का लक्षण है, हर चीज में अकर्त्ता हो जाना। संन्यास जीवन को देखने का और ही ढंग है।

गीता दर्शन--(भाग--7) --(प्रवचन--169)

असंग साक्षी(प्रवचनसातवां)

अध्‍याय—14
सूत्र—

नान्यं गुणेभ्‍य: कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यीत।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्‍छति।। 19।।
गुणानेतानतीत्‍य त्रीन्‍देही देहसमुद्भवान्।
जन्मस्त्युऋजरादु:खैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते।। 20।।

और हे अर्जुन, जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है अर्थात गुण ही गुणों में बर्तते है, ऐसा देखता है और तीनों गुणों से अति परे सच्चिदानंदधनस्वरूप मुझ परमात्‍मा को तत्‍व से जानता है, उस काल में वह पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
तथा यह पुरूष इन  स्थूल शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्‍था और सब प्रकार के दुखों से मुक्‍त हुआ परमानंद को प्राप्त होता है।

रविवार, 12 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--38)

आनंद व अहोभाव में डूबा हुआ नव—संन्‍यास—(प्रवचन—अडतीसवां)

नव—संन्‍यास क्‍या? :
चर्चा व प्रश्‍नोत्‍तर
अहमदाबाद, दिनांक 6 दिसम्‍बर 1970

भी—अभी साधना मंदिर में जो भजन चल रहा था। उसे देखकर मुझे एक बात खयाल में आती है। वहां सब इतना मुर्दा, इतना मरा हुआ था जैसे जीवन कि कोई लहर नहीं है, सब औपचारिक था—करना है, इसलिए कर लिया। तुम्‍हारा भजन, तुम्हारा नृत्य, तुम्‍हारा जीवन भी औपचारिक न हो, फॉरमल न हो। उदासी के लिए तो नव—संन्यास 'में जरा भी जगह न हो। क्‍योंकि संन्यास अगर मरा तो उदास लोगों के हाथ में पड़कर मरा।

'हंसता हुआ संन्यास', पहला सूत्र तुम्हारे खयाल में होना चाहिए। अगर हंस न सको तो समझना कि संन्यासी नहीं हो। पूरी जिंदगी एक हंसी हो जानी चाहिए। संन्यासी ही हंस सकता है। उदासी एवं गंभीरता संन्यासी के लिए एक रोग जैसा है।

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--168

रूपांतरण का सूत्र: साक्षी—भाव—(प्रवचन—छठवां)

अध्‍याय—14
सूत्र:  

कर्मण: सुकृतस्याहु: सात्‍विक निर्मलं फलम्।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमस: फलम्।। 16।।
सत्‍वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ श्व च।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ।। 17।।
ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठीन्त राजसाः।
जधन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्‍छन्ति तामसा:।। 18।।

सात्‍विक कर्म का तो सात्‍विक अर्थात सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है। और राजस कर्म का फल दुख, एवं तामस कर्म का फल स्नान कहा है।
तथा सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्‍न होता है और रजोगुण से निःसंदेह लोभ उत्पन्न होता है, तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्‍न होते हैं और अज्ञान भी होता है।

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

मन ही पूजा मन ही धूप--(प्रवचन--05)

गाइ—गाइ अब का कहि गाऊं—(प्रवचन—पाँचवाँ)

सूत्र:

गाइगाइ अब का कहि गाऊं।
गावनहर को निकट बताऊं।।
जब लगि है इहि तन की आसा, तब लगि करै पुकारा।।
जब मन मिल्‍यौ आस नहीं तन की, तब को गावनहारा।।
जब लगि नदी न समुंद समावै, तब लगि बढै हंकारा।।
जब मन मिल्‍यौ रामसागर सौ, तब यह मिटी पुकारा।।
जब लगि भगति मुकति की आसा, परमत्‍व सुनि गावै।।
जहं—जहं आस घरत है इहि मन, तहं—तहं कछू न पावै।।
छांडै आस निरास परमपद, तब सुख सति कर होई।।
कहि रैदास जासौ और करत है, परमतत्‍व अब सोई।।

मैं कहता अांखन देखी--(प्रवचन--37)

संन्‍यास के फूल: संसार की भूमि में—(प्रवचन—सैंतीसवां)   

'नव—संन्यास क्या?':
चर्चा व प्रश्रोत्तर
जबलपुर प्रथम सप्ताह नवम्बर 1970

गवान श्री आपने कहा है कि बाहर से व्यक्तित्व व चेहरे आरोपित कर लेने में सूक्ष्म चोरी है तथा इससे पाखष्ड और अधर्म का जन्म होता है। लेकिन देखा जा रहा है कि आजकल आपके आसपास अनेक नये—नये संन्यासी इकट्ठे हो रहे हैं और बिना किसी विशेष तैयारी और परिपक्‍कता के आप उनके संन्यास को मान्यता दे रहे हैं। क्या इससे आप धर्म को भारी हानि नहीं पहुंचा रहे हैं? कृपया इसे समझाएं?
हली बात, अगर कोई व्यक्ति मेरे जैसा होने की कोशिश करे तो मैं उसे रोकूंगा। उसे मैं कहूंगा, कि मेरे जैसा होने की कोशिश आत्मघात है।

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--167

संबोधि और त्रिगुणात्‍मक अभिव्‍यक्‍ति—(प्रवचन—पाँचवाँ)

अध्‍याय—14
सूत्र: 

            अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।। 13।।
यदा सत्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।
तदोत्तमीवदां लोकानमलान्मीतयद्यते ।। 14।।
रजसि प्रलयं गत्वा कर्ममङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयीनिषु जायते।। 15।।

है अर्जुन, तमोगुण के बढने पर अंतःकरण और इंद्रियों में अप्रकाश एवं कर्तव्य— क्रमों में अप्रवृति और प्रमाद और निद्रादि अंतःकरण की मोहिनी वृत्तियां, ये सब ही उत्पन्‍न होते हैं।
और हे अर्जुन, जब यह जीवात्मा सत्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के मलरीहत अर्थात दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है। और रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर क्रमों की आसक्‍ति वाले मनुष्यों में उत्पन्‍न होता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ पुरूष मूढ़ योनियों में उत्पन्‍न होता है।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--36)

संन्यास और संसार—(प्रवचन—छत्‍तिसवां)

'नव— संन्यास क्या?':
चर्चा एवं प्रश्रोत्तर 
दिनांक 20 अक्टूबर 1970

संसार को छोड़कर भागने का कोई उपाय ही नहीं है, कारण हम जहां भी जाएंगे वह होगा ही, शक्लें बदल सकती हैं। इस तरह के त्याग को मैं संन्यास नहीं कहता। संन्यास मैं उसे कहूंगा कि हम जहां भी हों वहा होते हुए भी संसार हमारे मन में न हो। अगर तुम परिवार में भी हो तो परिवार तुम्हारे भीतर बहुत प्रवेश नहीं करेगा। परिवार में रहकर भी तुम अकेले हो सकते हो और ठेठ भीड़ में खडे होकर भी अकेले हो सकते हो।
इससे उल्टा भी हो सकता है कि एक आदमी अकेला जंगल में बैठा हो लेकिन मन में पूरी भीड़ घिरी हो और ठेठ बाजार में बैठकर भी एक आदमी अकेला हो सकता है।

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--166

होश: सत्‍व का द्वार—(प्रवचन—चौथा)

अध्‍याय—14
सूत्र:

रजस्तमश्चाभिभूय सत्वं भवति भारत।
रज: सत्वं तमश्चैव तम: सत्व रजस्तथा ।। 10।।
सर्वद्वरेषु देहेऽस्मिप्रकाश उयजाक्ते।
ज्ञानं यदा तदा विद्यद्ववृद्धं सत्‍वमित्‍युत।। 11।।
लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पृहा।
रजस्यैतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ।। 12।।

और हे अर्जुन, रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्वगुण होता है अर्थात बढता है तथा रजोगुण और सत्‍वगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है; वैसे ही तमोगुण और सत्‍वगुण की दबाकर रजोगुण बढ़ता है।
इसलिए जिस काल में इस देह में तथा अंतःकरण और इंद्रियों में चेतनता और बोध—शक्‍ति उत्पन्‍न होती है, उस कल्प में ऐसा जानना चाहिए कि सत्वगुण बड़ा है। और हे अर्जुन, रजोगुण के बढने पर लोभ और प्रवृत्ति अर्थात सांसारिक चेष्टा तथा सब कार के क्रमों का स्वार्थ— बुद्धि से आरंभ एवं अशांति अर्थात मन की चंचलता और विषय— भोगों की लालसा, ये सब उत्पन्‍न होते है

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--35)

संन्यास : नयी दिशा, नया बोध—(प्रवचन—पैंतीसवां)

'नव—संन्यास क्या?’
से संकलित एक प्रवचन साधना—शिविर मनाली (हिमाचल प्रदेश),
दिनांक 28 सितम्बर 197० रात्रि

 पको अपने संन्यास का स्मरण रखकर ही जीना है ताकि आप अगर क्रोध भी करेंगे तो न केवल आपको अखरेगा, दूसरा भी आप से कहेगा कि आप कैसे संन्यासी हैं। साथ ही साथ उनका नाम भी बदल दिया जाएगा। ताकि अन्य पुराने नाम से उनकी जो आइडेन्टिटी, उनका जो तादात्थ था वह टूट जाए। अब तक उन्होंने अपने व्यक्तित्व को जिससे बनाया था उसका केन्द्र उनका नाम है। उसके आस—पास उन्होंने एक दुनियां रचायी, उसको बिखेर देना है ताकि उनका पुनर्जन्म हो जाए। इस नये नाम से वे शुरू करेंगे यात्रा और इस नये नाम के आस—पास अब वे संन्यासी की भांति कुछ इकट्ठा करेंगे। अब तक उन्होंने जिस नाम के आस—पास सब इकट्ठा किया था वह गृहस्थ की तरह इकट्ठा किया था।

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--165

हे निष्‍पाप अर्जुन—(प्रवचन—तीसरा)

अध्‍याय—14
सूत्र: 

रजो रागत्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्‍न्‍िबघ्‍नति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्।। 7।।
तमस्थ्यानजं विद्धि मोहन सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्‍निबध्‍नाति भारत।। 8।।
सत्यं सुखे संजयीत रज: कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्‍य तु तम: प्रमादे संजयन्वत।। 9।।

हे अर्जुन, रागरूय रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्‍न हुआ जान। वह हम जीवात्मा को कर्मों की और उनके फल की आसक्ति से बांधता है।
और हे अर्जुन, सर्व देहाभिमानियों के मोहने वाले तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न हुआ जान। वह हस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बांधता है।

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

गीता दर्शन--(भाग--7) प्रवचन--164

त्रिगुणात्‍मक जीवन के पार—(प्रवचन—दूसरा)

अध्‍याय—14
सूत्र—

            सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या:।
तासो ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता।। 4।।
सत्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसंभवा।
निबध्‍नन्ति महाबाहो देहे देहिनमध्ययम्।। 5।।
तत्र सत्वं निर्मलत्‍वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्‍नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ।। 6।।

तथा है अर्जुन, नाना प्रकार की सब योनियों में गिनी मूर्तियां अर्थात शरीर उत्पन्‍न होते है, उन सकी त्रिगुणमयी माया तो गर्भ को धारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला बिता हूं।
हे अर्जुन, सत्‍वगुण, रजोगुण और तमोगुण, ऐसे यह प्रकृति से उत्पन्‍न हुए तीनों गुण हम अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं।
हे निष्पाप, उन तीनों गुणों में प्रकाश करने वाला निर्विकार सत्‍वगुण तो निर्मल होने के कारण सुख की आसक्ति ले और ज्ञान की आसक्‍ति से अर्थात ज्ञान के अभिमान से बांधता है।

मन ही पूजा मन ही धूप-(प्रवचन--04)

मन माया है—(प्रवचन—चौथा) 

प्रश्न—सार:

1—ओशो,
इस देश में आपका सर्वाधिक विरोध आपके काम, सेक्‍स संबंधी विचारों के गिर्द खड़ा
हुआ है। पंडित—पुरोहित विरोध करें, यह बात समझ में आती है, लेकिन सच्‍चाई यह है कि आधुनिक मनोविज्ञान से सुपरिचित सुधीजन भी यह स्‍वीकारने में घबड़ाते भी यह स्‍वीकारने में घबडाते है कि काम और राम जुड़े है। क्‍या इस संदर्भ में हमें स्‍पष्‍ट दिशा—बोध देने की कृपा करेंगे।

2—ओशो,
गुरु और सदगुरू दो अलग शब्‍’ होने का क्‍य’ कारण है, जब कि गुरु ही सदगुरू है'?

 3—ओशो,
मैं बड़ा संदेहग्रस्‍त क्‍या इससे छूटकारे का कोई उपाय है?

4—ओशो,
संत कहते है कि संसार माया है, फिर भी इतने लोग क्‍यों संसार में ही उलझे रहते है?

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--34)

नव—संन्यास का सूत्रपात—(प्रवचन—चौतीसवां)

'नव—संन्यास क्या?’
से संकलित एक प्रवचन साधना—शिविर मनाली (हिमाचल प्रदेश),
दिनांक 28 सितम्बर 197० रात्रि
 संन्यास मेरे लिए त्याग नही, आनन्द है। संन्यास निषेध भी नहीं है, उपलब्धि है। लेकिन आज तक पृथ्वी पर संन्यास को निषेधात्मक अर्थों में ही देखा गया है—त्याग के अर्थों में, छोड़ने के अर्थों मे—पाने के अर्थ में नहीं। मैं सन्यास को देखता हूं पाने के अर्थ में। निश्चित ही जब कोई हीरे—जवाहरात पा लेता है तो कंकड़ —पत्थरों को छोड देता है। लेकिन कंकड—पत्थरों को छोडने का अर्थ इतना ही है कि हीर—जवाहरातों के लिए जगह बनानी पड़ती है। कंकड़—पत्थरों का त्याग नहीं किया जाता। त्याग तो हम उसी बात का करते हैं जिसका बहुत मूल्य मालूम होता है। कंकड़—पत्थर तो ऐसे छोड़े जाते है जैसे घर से कचरा फेंक दिया जाता है। घर से फेंके हुए कचरे का हम हिसाब नहीं रखते कि हमने कितना कचरा त्याग दिया।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--33)

ब्रह्म के दो रूप(प्रवचनतैतिसवां)

अमृत— वाणी'
से संकलित सुधा— बिंदु 1971—71

 भी विगत पन्द्रह वर्षों की गहन खोज ने विज्ञान को एक नयी धारणा दी है— 'एक्सपेंडिंग युनिवर्स' की, फैलते हुए विश्व की। सदा से ऐसा समझा जाता था कि विश्व जैसा है, वैसा है। नया विज्ञान कहता है, विश्व उतना ही नहीं है जितना है—रोज फैल रहा है, जैसे कि कोई गुब्बारे में हवा भरता चला जाए और गुब्बारा बड़ा होता चला जाए! यह जो विस्तार है जगत का, यह उतना नहीं है, जितना कल था। यह निरंत्तर फैल रहा है।

ये जो तारे रात हमे दिखायी पड़ते है, ये एक दूसरे से प्रति पल दूर जा रहे है—'एक्सपेंडिंगयुनिवर्स’, फैलता हुआ विश्व! इसके दो अर्थ हुए : कि एक क्षण ऐसा भी रहा होगा, जब यह विश्व इतना सिकुड़ा रहा होगा कि शून्य केंद्र पर रहा होगा—आप पीछे लौटें! समय में जितने पीछे लौटेंगे, विश्व छोटा होता जाएगा, सिकुड़ता जाएगा।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

गीता दर्शन--(भाग-7) प्रवचन--163

चाह है संसार और अचाह हे परम सिद्धि—(प्रवचन—पहला)

अध्‍याय—14
सूत्र:
     
श्रीमद्भगवद्गली अथ चतर्दशोऽध्याय —

 श्रीभगवानवाच:
परं भूय: प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।
यज्ज्ञात्वा मुनय: सर्वे परां सिद्धिमितो गता।। 1।।
हदं ज्ञानमुपाश्‍चित्‍य मम साधर्म्यमागता:।
सगेंऽपि नोयजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।। 2।।
मम योनिर्महद्रब्रह्म तीस्मनार्भं दधाथ्यहम्।
संभव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत।। 3।।

इसके उपरांत श्रीकृष्ण बोले हे अर्जुन, ज्ञानों में भी अति उत्तम परम ज्ञान को मैं फिर भी तेरे लिए कहूंगा? कि जानकर जानकर सब मुनिजन हम संसार से मुक्‍ति होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं।
हे अर्जुन, हम ज्ञान को आश्रय करके अर्थात धारण करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुन: उत्पन्‍न नहीं होते हैं और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते हैं।  है अर्जुन, मेरी महत ब्रह्मरूप प्रकृति अर्थात त्रिगुणमयी माया संपूर्ण भूतों की योनि है अर्थात गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतनरूप बीज को स्थापन करता हूं। उस जड़—चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

मन ही पूजा मन ही धूप--(प्रवचन--03)

क्‍या तू सोया जाग अयाना—(प्रवचन—तीसरा)

सूत्र:

जो दिन आवहि सो दिन जाही। करना कूच रहन थिरू नाही।।
संगु चलत है हम भी चलना। दूरि गवनु सिर ऊपरि मरना।।
क्‍या तू सोया जाब अयाना। तै जीवन जगि सचु करि जाना।।
जिनि दिया सु रिजकु अंबराबै। सब घट भीतरि हाटु चलावै।।
करि बंदिगी छांडि मैं मेरा। हिरदे नामु सम्‍हारि सबेरा।।
जनमु सिरानो पंथु न संवारा। सांझ परी दह दिसि अंधियारा।
कह रविदास नदान दिवाने। चेतसि नाही दुनिया फनखाने।।

ऊंचे मंदिर, सालि रसोई।एक घरी पुनि रहन न होई।।
इह तनु ऐसा जैसे घास की टाटी। जलि गयो घास रलि गयो माटी।
भाई बंधरू कुटंब सहेरा। ओई भी लागे काढ़ सबेरा।।
घर की नारि उरहि तन लागी।उह तौ भूत भूत करि भागी।।
कहि रविदास सबै जग लूटया। हम तौ एक राम कहि छूटया।।