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सोमवार, 17 अप्रैल 2017

अमृत द्वार-(विविध) -प्रवचन-01

अमृत द्वार-(विविध)
ओशो
प्रवचन-पहला-(नाचो अहोभाव है नाच)
दिनांक १५ मार्च, १९६८ सुबह पूना।

मेरे प्रिय आत्मन,
एक नया मंदिर बन रहा था उस मार्ग से जाता हुआ एक यात्री उस नव निर्मित मंदिर को देखने के लिए रुक गया। अनेक मजदूर काम कर रहे थे। अनेक कारीगर काम कर रहे थे। न मालूम कितने पत्थर तोड़े जा रहे थे। एक पत्थर तोड़ने वाले मजदूर के पास वह यात्री रुका और उसने पूछा कि मेरे मित्र, तुम क्या कर रहे हो? उस पत्थर तोड़ते मजदूर ने क्रोध से अपने हथौड़े को रोका और उस यात्री की तरफ देखा और कहा, क्या अंधे हो! दिखाई नहीं पड़ता? मैं पत्थर तोड़ रहा हूं। और वह वापस अपना पत्थर तोड़ने लगा। वह यात्री आगे बढ़ा और उसने एक दूसरे मजदूर को भी पूछा जो पत्थर तोड़ रहा था। उसने भी पूछा, क्या कर रहे हो? उस आदमी ने अत्यंत उदासी से आंखें ऊपर उठाई और कहा, कुछ नहीं कर रहा, रोटी-रोटी कमा रहा हूं।
वह वापस फिर अपना पत्थर तोड़ने लगा। वह यात्री और आगे बढ़ा और मंदिर की सीढ़ियों के पास पत्थर तोड़ते तीसरे मजदूर से उसने पूछा, मित्र क्या कर रहे हो? वह आदमी एक गीत गुनगुना रहा था। और पत्थर भी तोड़ रहा था। उसने आंखें ऊपर उठायीं। उसकी आंखों में बड़ी खुशी थी। और वह बड़े आनंद के भाव से बोला, मैं भगवान का मंदिर बना रहा हूं। फिर वह गीत गुनगुनाने लगा और पत्थर तोड़ने लगा।
वह यात्री चकित खड़ा हो गया और उसने कहा कि तीनों लोग पत्थर तोड़ रहे हैं। लेकिन पहला आदमी क्रोध से कहता है कि मैं पत्थर तोड़ रहा हूं, आप अंधे हैं? दिखाई नहीं पड़ता? दूसरा आदमी भी पत्थर तोड़ रहा है, लेकिन वह उदासी से कहता है कि मैं रोजी रोटी कमा रहा हूं। तीसरा आदमी भी पत्थर तोड़ रहा था, लेकिन वह कहता है, आनंद से गीत गाते हुए कि मैं भगवान का मंदिर बना रहा हूं।
ये जो तीन मजदूर थे उस मंदिर को बनाते करीब-करीब हम भी इन तीन तरह के लोग हैं जो जीवन के मंदिर को निर्मित करते हैं। हम सभी जीवन के मंदिर को निर्मित करते हैं, लेकिन कोई जीवन के मंदिर को निर्मित करते समय क्रोध में भरा रहता है, क्योंकि वह पत्थर तोड़ रहा है। कोई उदासी से भरा रहता है क्योंकि वह केवल रोजी-रोटी कमा रहा है। लेकिन कोई आनंद से भर जाता है, क्योंकि वह परमात्मा का मंदिर बना रहा है। जीवन को हम जैसा देखते हैं, जीवन को देखने की हमारी जो चित्त दशा होती है, वह जीवन की हमारी अनुभूति भी बन जाती है। जीवन को देखने की जो हमारी भाव दृष्टि होती है वही हमारे जीवन का अनुभव, जीवन की प्रतीति और जीवन का साक्षात्कार भी बन जाती है। पत्थर तोड़ते हुए से भगवान का मंदिर बनाने की जिसकी दृष्टि है, वह आनंद भर जाएगा। ओर हो सकता है, पत्थर तोड़तेत्तोड़ते उसे भगवान का मिलन भी हो जाए। क्योंकि उतनी आनंद की मनस्थिति पत्थर में भी भगवान को खोज लेती है। आनंद के अतिरिक्त परमात्मा के निकट पहुंचने का और कोई द्वार नहीं है। लेकिन जो क्रोध और पीड़ा में काम कर रहा हो, उसे भगवान की मूर्ति में भी सिवाय पत्थर के और कुछ भी नहीं मिल सकता है। क्रोध की दृष्टि पत्थर के अतिरिक्त कुछ भी उपलब्ध नहीं कर पाती है। जो उदास है, जो दुखी है, वह अपनी उदासी और दुख को ही पूरी जीवन में फैला हुआ देख लें तो आश्चर्य नहीं है। हम वही अनुभव करते हैं, जो हम होते हैं। हम वही देख लेते हैं जो हमारी देखने की दृष्टि होती है। जो हमारा अंतर्भाव होता है।
दो सूत्रों के संबंध में मैंने कल और उससे पहले आपसे बात की है। पहला सूत्र था जीवन क्रांति के लिए, परमात्मा की दिशा में आंखें उठाने के लिए। पहला सूत्र था: विश्वास नहीं, विचार।
दूसरा सूत्र था: ज्ञान नहीं, विस्मय।
और तीसरा सूत्र है: दुख नहीं, आनंद। हम सारे लोग जीवन को दुख और पीड़ा से ही देखते हैं और हजारों वर्षों की शिक्षाओं ने, गलत शिक्षाओं ने जीवन को आनंद के भाव से देखने की हमारी क्षमता ही नष्ट कर दी है। जीवन को हम, वे लोग जो अपने धार्मिक समझते हैं, जीवन को असार, व्यर्थ, दुख भरा, ऐसा देखने के आदी हो गए हैं। न मालूम किस दुर्भाग्य के क्षण में मनुष्य जाति के ऊपर यह कालिमा आ पड़ी! न मालूम किस दुर्भाग्य के क्षण में मनुष्य जाति को यह खयाल पैदा हो गया कि परमात्मा और जीवन में कोई विरोध है! तो परमात्मा की तरफ केवल वे ही जा सकते हैं जो जीवन को बुरा, असार, दीन-हीन; घृणित...,कंडमनेशन जो जीवन का करें वे ही केवल परमात्मा की ओर जा सकते हैं। इस दृष्टि ने सारी मनुष्य जाति के चित्त को अंधकार और पीड़ा से भर दिया है। इस दृष्टि ने फिर परमात्मा को खोजने की दिशा हां बंद कर दी, द्वार ही बंद कर दिए। क्योंकि उसे जानने के लिए आनंद से थिरकता हुआ हृदय चाहिए, गीत गाती हुई श्वासें चाहिए, नृत्य करता हुआ चित्त चाहिए तो ही हम उसके अनुभव को उपलब्ध हो सकते हैं, क्योंकि हम अगर आनंद को उपलब्ध होना चाहते हैं तो आनंद के अतिरिक्त, आनंद तक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं हो सकती।
एक छोटे से गांव में सुबह ही सुबह एक बैलगाड़ी आकर रुकी। और उस बैलगाड़ी के मालिक ने उस गांव के दरवाजे पर बैठे हुए एक बूढ़े आदमी से पूछा, ऐ बूढ़े! इस गांव के लोग कैसे हैं? मैं इस गांव में स्थायी रूप से निवास करना चाहता हूं। क्या तुम बता सकोगे, गांव के लोग कैसे हैं? उस बूढ़े ने उस गाड़ी वाले को नीचे से ऊपर तक देखा। उसकी आवाज को खयाल किया, उसने आते ही कहा, ऐ बूढ़े! वृद्धजनों से यह बोलने का कैसा ढंग है? फिर उस बूढ़े ने उससे पूछा कि मेरे बेटे, इसके पहले कि मैं तुझे बताऊं कि इस गांव के लोग कैसे हैं, मैं यह जान लेना चाहूंगा कि उस गांव के लोग कैसे थे, जिसे तू छोड़कर आ रहा है। क्योंकि उस गांव के लोगों के संबंध में जब तक मुझे पता न चल जाए तब तक इस गांव के संबंध में कुछ भी कहना संभव ही है। उस आदमी ने कहा, उस गांव के लोगों की याद भी मत दिलाओ, मेरी आंखों में खून उतर आता है। उस गांव जैसे दुष्ट, उस गांव जैसे पापी, उस गांव जैसे बुरे लोग जमीन पर कहीं भी नहीं हैं। उन दुष्टों के कारण ही तो मुझे वह गांव छोड़ना पड़ा है। और किसी दिन अगर मैं ताकत इकट्ठी कर सका तो उस गांव के लोगों को मजा चखाऊंगा। उस गांव के लोगों की बात ही मत छेड़ो। उस बूढ़े ने कहा, मेरे बेटे, तू अपनी बैलगाड़ी आगे बढ़ा। मैं सत्तर साल से इस गांव में रहता हूं, मैं तुझे विश्वास दिलाता हूं, इस गांव के लोग उस गांव के लोगों से भी बुरे है। मैं अनुभव से कहता हूं। इस गांव से बुरे जैसे आदमी तो कहीं भी हनीं हैं। अगर तू यहां रहेगा तो पाएगा कि उस गांव के लोगों से यह गांव और भी बदतर है। तू कोई गांव खोज ले। जब उसने बैलगाड़ी बढ़ा ली तो उस बूढ़े ने कहा, और मैं जाते वक्त तुझसे यह भी कहे देता हूं, कि इस पृथ्वी पर कोई भी गांव तुझे नहीं मिल सकता, जिस गांव में उस गांव से बुरे लोग न हों। लेकिन वह आदमी तो जा चुका था।
वह गया भी नहीं था कि एक घुड़सवार आकर रुक गया और पूछा कि इस गांव के लोग कैसे है? मैं भी इस गांव में ठहर जाना चाहता हूं। उस बूढ़े ने कहा, बड़े आश्चर्य की बात है! अभी-अभी एक आदमी यही पूछकर गया है। लेकिन मैं तुमसे भी पूछना चाहूंगा कि उस गांव के लोग कैसे थे, जहां से तुम छोड़कर आए हो। उस घुड़सवार की आंखों में कोई जैसे रोशनी आ गई। उसके प्राणों में जैसे कोई गीत दौड़ गया। जैसे किसी सुगंध उसकी श्वासें भर गयीं और उसने कहा, उस गांव के लोगों की याद भी मुझे खुशी की आंसुओं से भर देती है, इतने प्यारे लोग हैं। पता नहीं, किस दुर्भाग्य के कारण मुझे वह गांव छोड़ना पड़ा। अगर कभी सुख के दिन वापस लौटेंगे तो मैं वापस लौट जाऊंगा उसी गांव में, वही गांव मेरी कब्र बने, यही मेरी कामना रहेगी। उस गांव के लोग बड़े भले हैं। इस गांव के लोग कैसे हैं? उस बूढ़े ने उस जवान आदमी को घोड़े से हाथ पकड़कर नीचे उतार लिया, उसे गले लगा लिया और कहा, आओ, हम तुम्हारा स्वागत करते है। उस गांव के लोगों को मैं भली भांति जानता हूं। सत्तर साल से जानता हूं। इस गांव के लोगों को तुम उस गांव के लोगों से बहुत भला पाओगे। ऐसे भले लोग कहीं भी नहीं है।
 आदमी जैसा होता है, पूरा गांव वैसा ही उसे दिखायी पड़त है। आदमी जैसा होता है, पूरा जीवन उसे वैसा ही प्रतीत होता है। आदमी जैसा होता है संसार उसे वैसा ही मालूम होने लगता है। जो लोग भीतर दुख से भरे हैं और जिनकी जीवन दृष्टि अंधेरी है वे लोग कहते हैं कि जीवन दुख है, जीवन अंधकार है, जीवन माया है। ये घोषणाएं धार्मिक आदमी की घोषणाएं हैं। यह उन लोगों की घोषणाएं हैं--जीवन की निंदा की, जीवन की कुरूपता की, जीवन की पीड़ा की घोषणाएं उन लोगों की घोषणाएं हैं जिन्होंने आनंद के भाव को खो दिया है; जीवन को लोगों की घोषणाएं हैं जिन्होंने आनंद के भाव को खो दिया है; जीवन को देखने की जिनकी क्षमता खो गयी है। जो उनके भीतर है वही वह पूरे जीवन पर फैला कर देख सकते हैं। जो उन्हें दिखाई पड़ रहा है वह उनके अंतर्भाव का ही प्रोजेक्शन है, वह उनका ही प्रक्षेपण है। लेकिन इन लोगों ने पिछले तीन हजार वर्षों तक धर्म को दिशा दी इसलिए धर्म विकृत हुआ, धर्म मार्गच्युत हुआ। और सारी मनुष्य जाति धीरे-धीरे अधार्मिक होती चली गई।
मनुष्य जाति को अधार्मिक बनाने वालों में उन लोगों का हाथ नहीं है जिन्हें हम नास्तिक कहते हैं, जिन्हें हम अधार्मिक कहते हैं। मनुष्य जाति को अधार्मिक बनाने वालों में उनका हाथ है जिन्होंने जीवन की निंदा की, जिन्होंने जीवन को बुरा कहा, जिन्होंने जीवन को दुख और पीड़ा कहा और जिन्होंने  जीवन से ही छुटकारे को ही धर्म का लक्ष्य बनाया। धर्म का लक्ष्य जीवन से छुटकारा नहीं है, धर्म का लक्ष्य तो और परिपूर्ण जीवन को उपलब्ध करना है। धर्म का लक्ष्य जीवन से भाग जाना नहीं है, धर्म का लक्ष्य तो उस जीवन को उपलब्ध करना है, जिसका फिर कोई अंत नहीं होता है। धर्म तो परम जीवन की दिशा है। और धर्म, दुख के भाव से पैदा नहीं होता। दुख के भाव से कभी भी कोई स्वास्थ्य चीज पैदा नहीं होती है। दुख के भाव हमेशा अस्वस्थ दृष्टियां होती हैं--रुग्ण और बीमार और विक्षिप्त।
 आनंद के भाव से जीवन और जीवन के स्वस्थ अनुभव, जीवन का सौंदर्य और जीवन का सत्य और जीवन का शिवत्व उपलब्ध होता है। इसलिए आज के दिन तीसरे सूत्रों में मैं आपसे कहना चाहता हूं, अगर जीवन को धार्मिक बनाना है तो दुख के भाव को छोड़ देना होगा और आनंद के भाव को जगह देनी होगी।
दुख का भाव क्या है, और आनंद का भाव क्या है? किस भांति हमारे मन में दुख के भाव को धीरे-धीरे बिठाया गया और किस भांति हमारे मन में आनंद का भाव तिरोभूत हो गया। यह सब समझ लेना जरूरी है।
पहली बात--एक बड़े रहस्य की बात, अगर मैं एक फल लेकर आपके पास आऊं, बहुत सुंदर फूल लेकर आपके पास आऊं, एक बहुत सुंदर फूल लेकर आपके पास आऊं, एक गुलाब का फूल लेकर आप के पास आऊं और अगर आप जीवन को दुख से दुखने के आदी हो गए हैं, और मैं आपसे कहूं कि कितना सुंदर फूल है! आप कहेंगे छोड़ो भी। यह फूल सुंदर नहीं हो सकता, इस फूल में इतने कांटे होते हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं। यह फूल सुंदर कैसे हो सकता है? गुलाब सुंदर कैसे हो सकता है? गुलाब में कितने कांटे हैं! कांटे देखो और कांटों की गिनतियां करो। तो करोड़ कांटे हैं तब कहीं एक फूल है। फूल सुंदर नहीं हो सकता लेकिन अगर आप आनंद के भाव में दीक्षित हो गए हैं तो मैं एक गुलाब का कांटा भी लेकर आपके पास आऊं तो आप कहेंगे, धन्य है यह कांटा क्योंकि इस कांटे के बीच यह गुलाब का फूल पैदा होता है। तो आप कहेंगे, यह कांटा भी कांटा नहीं हो सकता क्योंकि यह गुलाब का कांटा है।
एक दुखी व्यक्ति देखता है, हजारों कांटों की गिनती कर लेता है। और तब कहता है कि इतने कांटे इतने कांटे, कि एक फूल की कीमत नहीं है कोई। एक फूल का--हो या न हो, बराबर है। लेकिन आनंद के भाव से देखने वाले दिखाई पड़ता है। कितनी अदभुत है यह दुनिया! जहां इतने कांटे हैं वहां एक फूल भी पैदा होता और जब कांटों में फूल पैदा हो सकता है तो कांटे हमारे देखने के भ्रम होंगे क्योंकि जिन कांटों के बीच फूल पैदा हो जाता है वे कांटे भी फूल सिद्ध हो सकते हैं। जो कांटों की गिनती करता है उसके लिए फूल भी कांटा दिखायी पड़ने लगता है और जो फूल के आनंद को अनुभव करता है उसके लिए धीरे-धीरे कांटे भी फूल बन जाते हैं। एक दुखी और निराश और उदास चित्त से अगर हम पूछें कि आनंद के भाव में डूबे आदमी से हम पूछें कि कैसी पायी तुमने दुनिया? वह कहेगा बड़ी अदभुत थी। दो उजाले से भरे दिन होते थे, तब बीच में एक छोटी सी अंधेरी रात होती थी। रात में भी है, दिन भी हैं। कांटे भी हैं फूल भी हैं। लेकिन हम क्या देखते हैं, हमारी दृष्टि क्या है इस पर पूरी की पूरी जीवन की दिशा और जिन का आयाम। निधार्रित होगा। और आश्चर्य तो यह है कि हम जो देखना शुरू करते हैं, धीरे धीरे उसके विपरीत जो था उसी में परिवर्तित होता चला जाता है। वह भी उसी में परिवर्तित होता चला जाता है। कांटे फूल बन सकते हैं। फूल कांटे बन सकते हैं। हमारी दृष्टि पर निर्भर है कि हम किस भांति देखना शुरू करते हैं।
 एक अंधेरी रात में एक गरीब फकीर के झोपड़े पर एक चोर घुस आया उसने आकर द्वार पर धक्का दिया। वह गरीब फकीर का झोपड़ा था, द्वार पर कोई ताला नहीं लगा था, न सांकल बंद थी घरों के ताले और सांकलें हम इसलिए थोड़ी बंद करते हैं कि बाहर चोर है, बल्कि इसलिए कि हमारे भीतर चोर बैठा हुआ है, उससे हम हमेशा सचेत है। वह गरीब फकीर था, उसे चोरों का कोई खयाल भी न था, द्वार अटका था धक्का दिया, चोर भीतर घुस गया। चोर घबड़ा गया। आधी रात थी, उसे पता न था कि घर का मालिक जागता होगा। लेकिन वह फकीर बैठकर किसी को चिट्ठी लिख रहा था। उस चोर ने घबड़ाहट में छुरा बाहर निकाल लिया। सामने मालिक था लेकिन उस फकीर ने कहा, मेरे भाई, थोड़ी देर बैठ जाओ। मैं चिट्ठी पूरी कर लूं, कोई जल्दी तो नहीं है? वह चोर घबड़ाहट में बैठ गया कुछ उसे सूझा नहीं कि क्या करे और क्या न करे, लेकिन छुरा सामने लिए रहा उस फकीर ने कहा, क्यों व्यर्थ हाथ थकाते हो? छुरे को भीतर रख लो। यहां छुरे की कोई भी जरूरत नहीं पड़ेगी। फिर उसने पूरी चिट्ठी की और पूछा कि कैसे आए हो क्या इरादा है? मैं क्या सेवा कर सकता हूं? तुम क्या इरादा से आए हो, मुझे पता चल जाए? उसकी सीधी, सरल, निर्दोष आंखों में उस चोर ने झांका और झूठ बोलने का साहस उसे नहीं हो सका। उसने कहा, मैं चोरी करने आया हूं, मुझे क्षमा करें।
उस फकीर ने कहा, बड़ी मुश्किल में डाल दिया तूने मुझे। अगर चोरी ही करने आना था तो पहले से खबर भेज देते। मैं कुछ इंतजाम कर रखता। यहां तो कुछ भी नहीं है। और तुम खाली हाथ लौटोगे तो जीवन भर के लिए मेरे मन में पीड़ा रह जाएगी। उसकी आंख में आंसू आ गए और उसने हाथ आकाश की तरफ उठाया और कहा, हे परमात्मा, यह दुख भी देखने को बचा था, इसका मुझे खयाल न था। एक आदमी आधी रात को आएगा। बहुत मुसीबत में होगा, तभी तो? अंधेरी रात में कौन निकलता है? और वह भी एक फकीर के झोपड़े पर चोरी करने आएगा। और मेरे पास कुछ भी नहीं है। तभी उस खयाल आया कि सुबह दो दिन पहले कोई दस रुपए भेंट कर गया था और वे आले में पड़े हैं। फिर उसने कहा, ठीक है, बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन कोई दो दिन पहले कुछ रुपए भेंट कर गया था और वे दस रुपए आले में पड़े हैं। अगर वे बहुत कम मालूम न पड़ें तो मेरे मित्र तुम उन्हें उठा लो। और अब दुबारा जब भी आओ मुझे पहले से खबर कर देना, मैं कुछ इंतजाम करके रखूंगा। और ऐसी अंधेरी रातों में मत आया करो। भरे उजाले में दिन में आ जाओ। रास्ते खराब हैं, चोट खा सकते हो। भटक सकते हो पत्थर पड़े हैं मार्ग पर और यह ऊबड़-खाबड़ जगह है जहां मैं रहता हूं यह झोपड़ा गरीब फकीर का गांव के बाहर है। दिन में आ गए। उजाले में आ गए। चोट लग जाए, गिर पड़ो, हाथ-पैर टूट जाए कुछ हो जाए तो फिर मुसीबत हो सकती है।
वह चोर तो बहुत हैरान हो गया। उसे कल्पना भी न थी कि चोर के साथ कोई ऐसा व्यवहार करेगा। उसे उठते न देखकर वह फकीर उठा और दस रुपए उठाकर उसे आले में से दे दिए और कहा, ये दस रुपए हैं। अगर तुम नाराज न हो तो एक रुपया इसमें से छोड़ दो, मैं बाद में वापस लौटा दूंगा। कल सुबह ही सुबह शायद मुझे जरूरत पड़ जाए। मैं वापस लौटा दूंगा, यह उधारी रही मेरे ऊपर, वह चोर कहने लगा, इसमें इधारी की क्या बात है? सब आपका है। उस फकीर ने कहा, अगर मेरा ही कुछ होता तो मैं फकीर ही क्यों होता। मेरा कुछ नहीं है इसलिए तो मैं फकीर हो गया। अब उधार है, सब चोरी है। जो भी जिसके पास है वह उधार है। और जो भी जिसके पास है, सब चोरी है। सब संपत्ति चोरी है क्योंकि कोई आदमी कुछ भी लेकर नहीं आता और कोई आदमी कुछ भी लेकर नहीं जाता मेरा कुछ भी नहीं है। कल सुबह जरूरत पड़ जाएगी, इसलिए रोक रखता हूं। फिर वापस लौटा दूंगा।
वह एक रुपया छोड़ कर चोर भागा। वह घबड़ा गया था बहुत इतना वह कभी किसी से नहीं घबड़ाया। क्योंकि जिनसे मिला था वह भी उसी तरह के लोग थे जिस तरह का यह आदमी था। कोई छोटा चोर है, कोई  बड़ा चोर है। जिनसे भी मुलाकात हुई थी वे एक ही जाति के लोग थे। यह आज पहली दफा एक अनूठे और अजनबी आदमी से, स्ट्रेंजर से मिलना हो गया था, जिसको समझना मुश्किल था। बहुत घबड़ा गया था। वह भागने लगा दरवाजे से निकल कर। उस साधु ने कहा कि रुको। दरवाजा तुमने खोला था, कम से कम उसे बंद कर जाओ। किसी का दरवाजा खोले तो बंद कर दिया करो! दरवाजा बंद कर दो क्योंकि रुपए कल तुम्हारे खत्म हो जाएंगे लेकिन द्वार बंद करके तुम जो प्रेम मेरी तरफ प्रकट कर जाओगे वह आगे भी काम पड़ सकता है। उस चोर ने जल्दी से दरवाजा बंद किया। उस फकीर ने उसे धन्यवाद दिया कि धन्यवाद मेरे मित्र। जमाने बहुत बुरे हो गए हैं, कौन किसका दरवाजा बंद करता है!
वह चोर चला गया। एक वर्ष बाद वह चोर किसी दूसरी चोरी में पकड़ा गया उस पर मुकदमा चला। उस पर और चोरियां थी उन्हीं चोरियों में पुलिस ने यह भी पता लगाया कि एक रात उसने गांव बाहर जो साधु है उसके झोपड़े पर भी चोरी की थी। चोर बहुत घबड़ाया हुआ था। उस साधु को भी अदालत में बुलवाया गया। चोर बहुत डरा हुआ था। जब उस साधु ने इतना भी कह दिया कि हां, इस आदमी को मैं पहचानता हूं यह एक रात आया था तो किसी और प्रमाण की जरूरत नहीं रह जाएगी। वह इतना प्रसिद्ध आदमी था। उसका एक शब्द कि यह आदमी चोरी करने आया था, काफी था सब प्रमाण पूरा हो जाएगा। चोर बहुत डरा हुआ था।
फिर वह साधु आया। न्यायाधीश ने उससे पूछा कि तुम इस आदमी को पहचानते हो? उस साधु ने कहा, भलीभांति। यह तो मेरे पुराने दोस्त हैं, इन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूं। चोर घबड़ाया। उस न्यायाधीश ने कहा,कभी यह तुम्हारे यहां चोरी करने आया था? उस साधु ने कहा, कि नहीं, चोरी करने तो यह कभी भी नहीं आया। हां दस रुपए जरूर मैंने इसे भेंट किए थे लेकिन वह चोरी नहीं थी, मैंने भेंट किया था। एक रुपया उसमें से अब भी मेरे ऊपर उधार है, वह मैं ले आया हूं उसको एक रुपया मुझे देना है। उधारी मेरी ऊपर है। और यह आदमी तो बहुत प्यारा है। मैंने इसे रुपए भेंट किए थे, इसने मुझे धन्यवाद दे दिया था, बात समाप्त हो गई थी। इसका चोरी से क्या संबंध है? वह न्यायाधीश बहुत हैरान हो गया। उसने कहा कि तुम क्या कहते हो? यह आदमी तुम्हारे घर चोरी करने गया था। उस फकीर ने कहा, अब से मेरे भीतर का चोर मर गया, मुझे कोई चोर दिखायी नहीं पड़ता है। मुझे माफ करें, किसी चोर को पूछें तो वह इसकी चोरी के बाबत कुछ बता सकेगा। मेरे भीतर का चोर जब से मर गया, मुझे कोई चोर नहीं दिखाई पड़ता है।
जीवन वैसा ही दिखाई पड़ता है जो हमारे भीतर है। लोग मुझसे आकर पूछते हैं, ईश्वर है? ईश्वर कहां है? मैं उनसे कहता हूं, ईश्वर नहीं है, ईश्वर नहीं हो सकता, क्योंकि तुम्हारे भीतर आनंद का भाव नहीं है। वह तो आनंद के भाव में देखी गयी सत्ता है। यही जीवन, यह पौधे, यही पशु, यही पक्षी, यही मनुष्य, यही सब कुछ जिस दिन आनंद के भाव से देखा जाता है तो परमात्मा हो जाता है। संसार और परमात्मा दो नहीं हैं, एक ही अस्तित्व को दो ढंग से देख जाने पर--दुख के ढंग से देखे जाने पर संसार है, आनंद के ढंग से देखे जाने पर परमात्मा है।
तो जिन लोगों ने हमें यह सिखा दिया है जीवन दुख है, बुरा है, असार है, छोड़ो भागो, जीवन से हटो, जीवन की सारी धाराएं तोड़ दो, सब खंडित कर दो, जीवन के सेतु अपने बीच सब तोड़ दो, सेतु दो। जिन लोगों ने यह सिखाया वे लोग सोचते रहे होगे कि मनुष्य जाति को परमात्मा की ओर ले रहे हैं, लेकिन वे ही लोग मनुष्य जाति को परमात्मा से वंचित करने का कारण बन गए हैं। उन्होंने किस भांति सिद्ध कर दिया है कि जीवन दुख है?किसी भी चीज को व्यर्थ सिद्ध करने का सीक्रेट है, एक राज है, एक रास्ता है। और एक ही रास्ता है किसी भी चीज को व्यर्थ सिद्ध कर देन का। और जिस आदमी को वह तरकीब हाथ में आ जाए वह किसी भी चीज को व्यर्थ सिद्ध कर सकता है। वह तरकीब है: विश्लेषण, वह तरकीब है एनेलिसिस।
मैं एक गांव में गया। एक बहुत सुंदर जल प्रपात था वहां। पहाड़ से एक बहुत खूबसूरत नदी गिरती है। चांदनी रात में जिन मित्र के घर मैं मेहमान था, वे अपनी कार में मुझे लेकर उस पहाड़ी पर गए। रास्ता। थोड़ी दूर ही पहले खत्म हो जाता; फिर थोड़ी दूर पैदल जाना पड़ता था। पूर्णिमा की रात थी और उस नदी का पहाड़ से गिरना और उसका गर्जन दूर तक सुनायी पड़ता था। हवाएं ठंडी हो गई थी और उस चांदनी रात में वह नदी एक अदभुत आकर्षण तरह हमें खींच लिए जाती थी। हम गाड़ी से नीचे उतरे। गाड़ी को जो ड्राइवर साथ लाया था वह गाड़ी के भीतर ही बैठा रहा। मैंने अपने मित्र को कहा, आप अपने ड्राइवर को भी बुला लें। मैंने उस ड्राइवर को आवाज दी कि दोस्त तुम भी आ जाओ। उसने कहा, क्या खाक रखा है वहां? कुछ पत्थर पड़े हैं, और पानी गिरता है, और वहां कुछ भी नहीं है। और वह ड्राइवर कहने लगा, मैं तो हमेशा हैरान होता हूं कि लोग क्या देखने आते हैं। वहां कुछ भी नहीं है साहब, थोड़े से पत्थर पड़े हैं और पानी गिरता है।
यह ड्राइवर धर्म गुरु हो सकता था। उसने जल प्रपात को पूर्णिमा की रात को सौंदर्य को तोड़कर एनालिसिस करके दो टुकड़ों मग रख दिया कि वहां पत्थर पड़े हैं और कुछ पानी गिरता है। वहां कुछ भी नहीं है। एक कवि देखता है फूल में न मालूम किस सौंदर्य की प्रतिमा को। एक कवि देखता है फूल में न मालूम किस अनुभूति को, न मालूम कौन से द्वार खुल जाते हैं, न मालूम किस अज्ञात लोक में वह प्रविष्ट हो जाता है। और जाकर पूछें किसी वनस्पति शास्त्री को, वह कहेगा, क्या रखा है उस फूल में? कुछ थोड़े से केमिकल्स, कुछ थोड़े से रसायन, कुछ थोड़ा-सा खनिज। और कुछ भी नहीं हैं उस फूल में क्यों पागल हुए जाते हो? किसकी कविता लिखते हो एक छोटे से केमिस्ट्री के फार्मूले में सब जाहिर हो जाता कि फूल में क्या है। फूल में कुछ भी नहीं है। उसने एनासिलिस कर दी, उसने तोड़कर बता दिया कि फूल में इतने-इतने रसायन हैं, इतना-इतना खनिज है, इतनी-इतनी चीजें गीली हैं, और फूल में कुछ भी नहीं है।
मैं किसी को प्रेम करूं और पहुंच जाऊं किसी शरीरशास्त्री के पास। वह कहेगा, क्या रखा है इस शरीर में? इसमें कुछ भी नहीं है, कुछ हड्डियां हैं, कुछ मांस है कुछ मज्जा है, कुछ खून है, और कुछ भी नहीं है पहुंच जाऊं किसी रासायनिक के पास तो वह कहेगा, एक आदमी के शरीर में मुश्किल से चार रुपए बाहर आने का सामान होता है, इससे ज्यादा का नहीं। कुछ लोहा होता है, कुछ केल्शियम होता है, कुछ फलां होता है, कुछ ढिकां होता है। अगर बाजार में खरीदने जाएं तो चार-चार रुपए में सब मिल जाता है। क्या परेशान हो रहे हैं इसको प्रेम करने के लिए? शरीर में कुछ भी नहीं है। यह चार-पांच रुपए का सामान है, बाजार से खरीद लें, एक पेटी में रख लें। खूब प्रेम करें। वह बात बिलकुल ठीक कह रहा है। उसने आदमी के शरीर का विश्लेषण करके बता दिया कि इतना लोहा है, इतना फलां है, इतना यह है। इसमें ज्यादा कुछ है नहीं। क्यों परेशान हुए जाते हैं? इसमें प्रेम करने की बात कहां है। उसने एनालिसिस कर दी, उसने चीजों को तोड़ कर रख दिया।
एक बड़ी प्यारी कविता है उसे सुनते हैं तो प्राणों के तार झनझना जाते हैं। उसे सुनते हैं तो प्राणों की वीणा बज उठती है। लेकिन पहुंच जाएं किसी व्याकरण जानने वाले के पास, किसी ग्रेमेरियन के पास। वह कहेगा क्या रखा है इसमें! कुछ शब्दों का जोड़ है। एक-एक शब्द तोड़कर रख देगा। मार्क टर्वेन एक अपने मित्र उपदेशक का भाषण सुनने गया था। वह उपदेशक बहुत अदभुत था। उसकी वाणी में कुछ जादू था, कोई बात थी। सुनने वालों के प्राण किसी दूसरे स्तर पर उठ जाते थे। एक डेढ़ घंटे तक मार्क टर्वेन उसे सुनता रहा। लोग मंत्र-मुग्ध थे, फिर मार्क टर्वेन बाहर निकला। उसके मित्र उपदेश ने पूछा कि कैसा लगा? मैंने जो कहा, वह कैसा लगा? मार्क टर्वेन ने कहा कुछ भी नहीं। सब गड़बड़ था और सब उधार था। एक किताब मेरे पास है, उसमें यह सब लिखा हुआ है जो सब तुमने बोले। एक-एक शब्द लिखा हुआ है उसमें। बड़े बेईमान आदमी मालूम होते हो, इसमें तुमने कुछ भी नहीं बोला। मेरे पास एक किताब है, उसमें सब लिखा है। वह बहुत हैरान हो गया। उसने कहा, कौन-सी किताब, जिसमें यह लिखा हुआ है एक-एक शब्द? मैं तुमसे शर्त बदलता हूं क्योंकि मैं तो आज तक कोई किताब पढ़ी नहीं। मैंने जो कहा है, वह मैंने कहा है। मार्क टर्वेन ने उससे एक-एक हजार रुपए की शर्त बद ली। वह उपदेशक बहुत हैरान था कि यह कैसे हो सकता है। दूसरे दिन मार्क टर्वेन ने एक डिक्शनरी उसके पास भेज दी कि इसमें सब शब्द लिखे हुए हैं। जो भी तुम बोले इसमें सब लिखा हुआ है। एक-एक शब्द लिखा हुआ है। पढ़ लो और एक हजार रुपए मुझे भेज दो।
उसने विश्लेषण कर दिया। मार्के टर्वेन ठीक कहता है। डिक्शनरी में लिखा हुआ है। सभी शब्द लिए हुए हैं। जो भी दुनिया में कोई बोल सकता है, सब लिखे हुए हैं। लेकिन बोलना शब्दों का जोड़ नहीं है और न आदमी हड्डियों और मांस मज्जा का जोड़ है न फूल रसायन और खनिज का जोड़ है और न कविता व्याकरण के नियमों का जोड़ है। जिंदगी चीजों का जोड़ नहीं है, जोड़ से कुछ ज्यादा है और वह ज्यादा उसको दिखाई पड़ता है जो चीजों को तोड़ना नहीं जोड़ता है। उस ज्यादा को देख लेना ही धार्मिक मनुष्य का अनुभव है।
पिकासो का नाम सुना होगा। एक अदभुत चित्रकार है। एक पेंटर अमरीकी करोड़ पति ने अपना एक चित्र बनवाया पिकासो से। करोड़पति था। उसने यह उचित न समझा कि दाम पहले तय कर ले। कितना मांगेगा ज्यादा से ज्यादा? फिर उसके पास पैसे की कोई कमी भी न थी। पिकासो ने भी दाम तय करने की बात कोई ठीक न समझी। चित्र दो साल में बना। वह करोड़पति बार-बार पूछवाता रहा कि चित्र बन गया कि नहीं। पिकासो ने कहा थोड़ा धैर्य रखिए एकदम आसान बात नहीं है। भगवान भी आपको बनाता है तो नौ महीने लग जाते हैं। लेकिन मैं तो भगवान नहीं हूं, मैं तो एक साधारण मनुष्य हूं, मैं बना रहा हूं आपको फिर से दुबारा। दो चार वर्ष लग जाए तो कोई कठिन नहीं है। बड़ा हैरान था वह करोड़पति कि क्या पागलपन की बातें कर रहा है! मेरा चित्र बना रहा है तो क्या दो-चार वर्ष लगाएगा फिर? दो वर्ष बाद उसने खबर भेजी कि चित्र बन गया, आप आ जाएं और चित्र ले जाएं। वह करोड़पति लेने आया। चित्र सुंदर बना था, उसे बहुत पसंद पड़ा। उसने पूछा, इसके दाम? पिकासो ने कहां, पांच हजार उसने कहा, क्या? पांच हजार डालर। थोड़ा सा कैनवास और थोड़े से रंग, इसका दाम पांच हजार डालर? क्या मजाक करते हैं? इस कैनवास के टुकड़े को और इन रंगों की इतनी कीमत? दस पांच रुपए बाजार से मिल जाएगा यह सब सामान। उसने एनालिसिस कर दी। उसने विश्लेषण कर दिया कि इतनी-इतनी चीजों से मिलकर बना है। इसको दमा पांच हजार डालर! यह कोई बात है।
पिकासो ने अपने सहयोगी को कहा कि जो भीतर, इससे बड़ा कैनवस का टुकड़ा ले आ और रंग की पूरी की पूरी टयूब ले आ और इनका दे दे। और जितने दाम ये देते हों दे जाएं। उसका साथी गया, वह एकदम कैनवस ले आया और रंग की भरी हुई टयूब ले आया, लाकर सामने रख दिया और कहा, अब आपकी जो मर्जी हो--दस पांच डालर, वह दे जाएं और ले जाएं। यह आपका पोट्रेट रहा। वह करोड़पति कहने लगा, क्या मजाक करते हैं? रंग और कैनवस को ले जाकर मैं क्या करूंगा?
पिकासो ने कहा, फिर याद रखें, चित्र रंग और कैनवस का जोड़ नहीं है, उन दोनों से कुछ ज्यादा है। रंग और कैनवस के द्वारा हम उसको उतारते हैं जो रंग और कैनवस नहीं है। रंग और कैनवस सिर्फ अपर्चुनिटी है, अवसर है। उनके माध्यम से हम उनको प्रकट करते हैं जो कि रंग और कैनवस के बाहर है और रंग और कैनवस से जिनका कोई संबंध भी नहीं है। हम दाम उनके मांगते हैं, और अब पांच हजार में निपटारा नहीं होगा, पचास हजार देते हों तो ठीक है। अब यह बिक्री नहीं होगा। पचास हजार डाल उस चित्र के दिए गए। वह उसे पांच डालर की चीज न मालूम पड़ती थी, वह पचास हजार डालकर की कैसे दिखायी पड़ी? दिखाई पड़ती इसलिए कि अगर चीजों को हम तोड़कर देखें तो दो कौड़ी की हो जाती हैं और उन्हें जोड़कर देखें तो उनमें एक अदभुत अर्थ प्रकट हो जाता है।
जीवन में अगर दुख और निसार और असार साधना हो तो तोड़कर देख लें पूरी जिंदगी को, सब व्यर्थ हो जाएगा। और अगर जिंदगी में परमात्मा को खोजना हो तो एनालिसिस नहीं सिंथीसिस चीजों को जोड़कर देखना है। और ग्रेटर टोटलिटी में, और बड़ी समग्रता में, और बड़ी समग्रता में चीजों को जोड़कर देखना है। अंततः एक पूरी इकाई में जिस दिन सारी चीजों को जोड़कर देखी जाती है उस दिन परमात्मा प्रकट हो जाता है।
तो दुख का मार्ग है विश्लेषण और आनंद का मार्ग है संश्लेषण। केवल वे ही लोग आनंद को उपलब्ध होते हैं जो संश्लेषण की विधि में दीक्षित हो जाते हैं। लेकिन हम सारे लोग विश्लेषण की विधि में दीक्षित किए गए हैं। पहले धर्मों ने विश्लेषण सिखाया, फिर पीछे विज्ञान ने विश्लेषण सिखाया। और सश्लेषण की कोई शिक्षा न रह गयी कि हम चीजों को जोड़कर देख सकें, हम चीजों को इकट्ठा होकर देख सकें, हम चीजों को उनके इकट्ठेपन में देख सकें, उनके टुकड़े-टुकड़े अंशों में नहीं, खंडों में नहीं। जीवन में जो भी श्रेष्ठ है वह अखंड में है। और जीवन में जो भी व्यर्थ है वह खंडों में है। किसी भी चीज को व्यर्थ करना हो खंडों में तोड़ लें और देख लें, वह व्यर्थ हो जाएगी। और किसी भी चीज को सार्थक करना हो तो उसे खंडन में देखें और वह सार्थक हो जाएगी।
आनंद की दृष्टि, आनंद की साधना जीवन के सब खंडों को अखंड में देखने की साधना है। टुकड़ों में, पार्ट्स में होल को देखने की साधना है। और दुख की दृष्टि सब अखंडों को, टुकड़ों में तोड़ने की साधना है।
तीसरा सूत्र--अंतिम यह बात, जीवन की क्रांति के लिए आपको कहना चाहता हूं, कि जीवन को संश्लेषण में देखें। जोड़ें और देखें। चीजों को ज्यादा से ज्यादा बड़े जोड़ में देखें और तब आप पाएंगे, कि रंग और कैनवस के ऊपर जो है उसकी झलक मिलनी शुरू हो गयी। और तब आप पाएंगे, शब्द और व्याकरण के जो ऊपर है उस काव्य की अनुभूति आनी शुरू हो गयी। और तब आप पाएंगे, खनिज और रसायन के जो ऊपर है, उस फुल का दर्शन शुरू हो गया। और तब आप पाएंगे, हड्डी मांस और मज्जा के जो ऊपर है, उस आत्मा की किरणें उतरने लगीं। और तब आप पाएंगे कि मिट्टी पत्थर और आकाश में जो ऊपर है, उस परमात्मा के द्वार भी खुलने शुरू हो गए हैं।
यह द्वार जब भी चलता है, ऐसे ही खुलता है। और यह द्वार जब भी बंद होता है तो ऐसे ही बंद हो जाता है। द्वार हम बंद किए बैठे हैं। हम अपनी पीठ किए बैठे हैं उस तरफ जहां मार्ग हो सकता है और उस तरफ आंखें किए बैठे हैं जहां मार्ग नहीं हो सकता है। इसलिए हम दुखी हैं, इसलिए हम पीड़ित हैं, इसलिए हम परेशान है। और इस परेशानी में, इस दुख में, इस पीड़ा में, इस अशांति में हम किन्हीं भी द्वारों पर भीख मांगने खड़े हो जाते हैं। हमें कोई रास्ता बताओ। और रास्ता बताने वाले लोग मिल जाते हैं। लेकिन मजा यह है ये वे ही लोग हैं रास्ता बताने वाले, जिसने ये सारी की सारी समस्या खड़ी कर दी है। वह फिर यही समझाते हैं कि जीवन असार है। जब तब जीवन को असार न समझोगे, शांत नहीं हो सकते। वह समझाते हैं, जीवन दुख है, छोड़ो जीवन को, हटो जीवन से। संन्यासी की तरफ चलो, छोड़ो सब। पलायन करो। भागो जीवन से। तभी शांति मिलेगी। जीवन में कभी किसी को शांति मिली है? जीवन को छोड़ने से शांति मिलती है। संसार को छोड़ो तो शांति मिलती है। शरीर को छोड़ो तो शांति मिलती है। और छोड़ो तो इस समझाने के लिए व्यर्थ है, जानो। दुख है, पीड़ा है, असार है, यह जानो।
मैंने सुना है एक रात स्वर्ग के एक रेस्तरां में बड़ा मजा हो गया। इधर जमीन पर देख-देख कर देवताओं ने भी रेस्तरां वगैरह खोल लिए होगे स्वर्ग में। क्योंकि देवता आदमी से पीछे रह जाए, इसका कोई कारण तो नहीं है। एक रेस्तरां है स्वर्ग का। लाओत्से, चीन का एक अदभुत विचारक बुद्ध को हाथ पकड़े के उस रेस्तरां में लिए चला जा रहा है। पीछे-पीछे कन्फयूसियस भी चला आ रहा है। वे तीनों जाकर टेबल पर बैठे गए हैं। बुद्ध तो आंखें बंद किए हैं, वे कहते हैं, मुझे बाहर जाने दो। मुझे कुछ रस रंग नहीं आता इन सब बातों में। वहां अप्सराएं नीचे चली जाती है। बुद्ध कहते हैं, मैंने बहुत अप्सराएं देखीं, मैंने बहुत नाच देखे, उन सबको, छोड़कर ही मैं जंगल भाग गया। मुझे नहीं देखने हैं ये सब। वे आंख बंद किए बैठे हैं। कन्फूसियस आधी आंख खोलकर देख रहा है। क्योंकि कन्फयुसियस कहता था, अति एक्सट्रीम पर कभी नहीं होना चाहिए। न पूरी आंख खोलो, न पूरी आंख बंद करो। आधी से देखते रहो, आधी बंद भी रखो। जरूरत पड़े तो बंद में भी सम्मिलित हो जाओ, जरूरत पड़े तो खुले में भी सम्मिलित हो जाओ। वह आधी आंख से नाच भी देखे चला जाता है। आधी आंख से वह ध्यान में भी बना चला जाता है। लेकिन लाओत्से तो पूरा डांवाडोल हुआ जा रहा है। टेबल ठोक रहा है, उसके पैर थिरक रहे हैं। वह तो नाच में लीन हो गया है, वह तो आनंद से भर गया है।
और तभी एक अप्सरा नाचती हुई आती है। वह हाथ में एक जीवन के रास की प्याली लिए हुए है। जीवन रस की प्यासी भरे हुए है। और वह आकर कहती है, जीवन रस लेंगे? जीवन रस पीएंगे? बुद्ध ने तो बिलकुल पीठ फेर ली और आंख बंद कर ली और कहा, जीवन का नाम न लेना। जीवन तो दुख है, जीवन तो पीड़ा है। जीवन तो असार है, नाम न लें यहां जीवन का। यह जीवन ही बंधन है। हटो यहां से दूर। कहां कि मुझे बाहर ले चलो, मैं यहां नहीं बैठना चाहता हूं। जहां जीवन की चर्चा होती है, वहां भी नहीं रुकना चाहता हूं। मुझे नहीं पीना है। मैंने बहुत देख लिया है, जीवन बहुत कड़वा है। कन्फशूशिस आधी आंखों से देख भी रहा है, आधी आंखें बंद भी किए है। उसने कहा, एक बूंद तो कम से कम लेकर देख लूं। क्योंकि बिना पीए कह देना कि कड़वा है, अति है, एक्सट्रीम है। पूरा पी लेना दूसरा अति है। एक बूंद ले लेना गोल्डन मीन है। बीच का मार्ग है, मध्य मार्ग है। एक घूंट तो कम से कम लेकर देख लूं। उसने एक घूंट उस जीवन रस की प्याली से पिया और कहा कि नहीं-नहीं कोई सार नहीं है। न तो आनंद पूर्ण है, न दुखपूर्ण है। उसने कहा, न आनंदपूर्ण है, न दुखपूर्ण है। कोई सार नहीं है, कोई असार भी नहीं है। पियो तो ठीक न पियो तो ठीक। सब बराबर है। फिर उसने अपनी आधी आंखें बंद कर ली, आधी खोल लीं। और बैठ गया।
लाओत्से ने पूरी प्याली हाथ में ले ली। वैसे मुग्ध भाव से पूरे हाथ में ले लिया। उसने इतनी कृपज्ञत, और ग्रेटीटयूड से प्याली हाथ में ले ली। उसने न कुछ कहा, न कुछ बोला, न कोई वक्तव्य दिया। वह तो पूरी प्याली को पी गया। पूरी प्याली रख दी उसने नीचे और उठकर नाचने लगा। और उठकर नाचने लगा। कन्फूशियस उससे पूछने लगा कि क्या हुआ? बता। उसने कहा, जो हुआ, बताया नहीं जा सकता, लेकिन उसे केवल वे ही जानते हैं पूरे जीवन को पी लेते हैं। उसे केवल वे ही जानते हैं जो पूरे जीवन के साथ एकरस हो जाते हैं। उसे केवल वे ही जानते हैं जो पूरे जीवन में तल्लीन हो जाते हैं, पूरे जीवन में डूब जाते हैं। उसे वे नहीं जानते जो किनारे पर बैठे रहते हैं। जो जीवन की धारा में पूरी डुबकी ले लेते हैं वे ही जानते हैं। वह नाचने लगा। वह भाव-विभोर।
ये तीन दृष्टियां हो सकती है--न बुद्ध से मतलब है कोई मुझे, न कन्फयूसियस से, न लाओत्से से। यह कहानी किसी पुराण में नहीं लिखी है नहीं तो आप खोज-बीन में लग जाएं और फिर मुझे दोष देने लगें। यदि यह भविष्य में कभी कोई पुराण लिखा जाएगा तो उसमें लिखी जाएगी। यह अभी लिखी हुई नहीं है। यह दृष्टि है कि जीवन को छुओ ही मत, आंख पूरी बंद कर लो। यह दृष्टि घातक है। यह दृष्टि कभी जीवन के सत्य को नहीं जान सकती है। एक दृष्टि है, बीच में तटस्थ हो जाओ। आधी आंख खुली, आधी बंद रखो। यह उदास, उदासीन की दृष्टि है। दुखी की नहीं, उदासीन की दृष्टि है।
पहली दृष्टि पहले पत्थर तोड़ने वाले की दृष्टि है, जो कहता है, अंधे हो? देखते नहीं कि पत्थर तोड़ रहा हूं? यह दूसरी दृष्टि उदास आदमी की दृष्टि है। जो उदासी से, सुस्ती से आंखें ऊपर उठाता है और कहता है कि अपनी रोटी कमा रहा हूं। इसमें कोई आनंद का भाव है, न कोई दुख का भाव है। एक बोझिलता, एक बोर्डम, एक ऊब का भाव है। अपना काम कर रहे हैं। यह दूसरी दृष्टि है। और एक तीसरी दृष्टि है, जीवन के पूरे रस में तल्लीन हो जाएं। वह पूरी दृष्टि है उस पत्थर तोड़ने वाले की, जो कहता है, भगवान का मंदिर बना रहा हूं।
 जीसस संश्लेषण से देखा जाए तो जीवन भगवान को बनाने की एक प्रक्रिया हो जाती है। और जीवन को उसकी परिपूर्णता में जीया जाए और डूब जाए, जीवन के सारे रसों में, जीवन के सौंदर्य में, जीवन के आनंद में, जीवन के फूलों में, जीवन की सुगंध में, जीवन के संगीत में, जीवन के पूरे रस को पी लिया जाए तो फिर कोई नाच उठता है उसकी कृतज्ञता में, उसके ग्रेटीययूड में, उसके धन्यवाद में। फिर उसके हाथ उसके धन्यवाद के लिए जुड़ जाते हैं। उसके प्राण प्रार्थना से भर जाते हैं। और इस आनंद के नृत्य में उसे पहली दफे झलक मिलती है। केवल आनंद के पुलक में ही उसकी झलक मिलती है। दुखी आंख बंद किए बैठे रह जाते हैं और वंचित रह जाते है।
और जो एक इस आनंद को, जीवन की पुलक को देखने को देखने में समर्थ हो जाता है, एक किरण भी जिसके जीवन में इस आनंद की उतर जाती है, धीरे-धीरे सारा जीवन रूपांतरित हो जाता है, सब ट्रांसफार्म हो जाता है। फिर उसे कांटे नहीं रह जाते, फिर उसे फूल ही फूल हो जाते हैं। फिर उसे रातें नहीं होती, फिर उसे दिन ही दिन हो जाते हैं। फिर उसे आंसू नहीं रह जाते, फिर उसके लिए गीत ही गीत हो जाते हैं।
एक छोटी-सी घटना--और अपनी चर्चा मैं पूरी करना चाहूंगा। एक सांझ की बात है। आकाश में बादल घिर गए हैं, वर्षा के दिन आने के करीब है, एकाध दिन और, और वर्षा होगी। उमड़-घुमड़ कर बादल आने शुरू हो गए हैं। दो भिक्षु, दो संन्यासी भागे हुए जा रहे हैं एक रास्ते पर, अपने झोपड़े की तरफ। वर्षा आ रही है, अब वे चार महीने आपने झोपड़े में रहेंगे। आठ महीने वे घूमते रहते हैं, भटकते रहते हैं, रोटी मांगते रहते हैं और जीवन बांटते रहते हैं। दो कौड़ी की चीज लोगों से ले लेते हैं, शरीर को चलाते हैं और अमृत लुटाते रहते हैं। आठ महीने भागते रहते हैं गांव-गांव, रास्तों-रास्तों, किस किसी के रास्ते पर एक दिया जल जाए, कि किसी रास्ते पर फूल रख आए। फिर आठ महीने भागने के बाद चार महीने वर्षा में अपने झोपड़े पर वापस लौट आते हैं।
वे भागे चले जा रहे हैं। झोपड़ा उन्हें दिखायी पड़ने लगा है। नदी के उस पार, पहाड़ के पास उनका झोपड़ा है, लेकिन जैसे-जैसे वे निकट आते हैं, देखकर कुछ हैरान हुए जा रहे हैं। जवान भिक्षु है एक, एक बूढ़ा भिक्षु है। जवान भिक्षु आगे है थोड़ा, बूढ़ा पीछे है। फिर वह जवान भिक्षु देख पाता है, कि झोपड़ा तो टूटा पड़ा है, आधा झोपड़ा हवाओं में उड़ गया मालूम होता है। आधा छप्पर जमीन के पास पड़ा हुआ है। गरीब का झोपड़ा है, उसमें बड़ी लागत तो नहीं होती है। वह तो हवाओं की कृपा से बना रहता है, नहीं तो हवाएं कभी भी उसको गिरा देती। उसको कोई बल तो नहीं होता, उसका कोई अधिकार तो नहीं होता कि वह बना ही रहेगा। वह तो बना रहता है, यह चमत्कार है। जो गरीब का झोपड़ा है उसके बने रहने की कोई वजह नहीं है, कोई कारण नहीं है। हवाओं की कृपा समझें कि बना रहता है।
वह  तो क्रोस से भर गया है भिक्षु, उसने लौटकर अपने बूढ़े भिक्षु को कहा कि देखते हैं? जिस भगवान के गीत गाते फिरते हैं हम, जिस भगवान के लिए सांसें लेते हैं, जिस भगवान के लिए जीते हैं वह भगवान इतनी भी फिकर नहीं कर सकता है कि हमारा झोपड़ा बचा ले। ऐसी ही बातों से तो अविश्वास पैदा हो जाता है। ऐसी बातों से लगता है कि नहीं हैं कोई भगवान। सब झूठी है बकवास! गांव में पापियों से महल खड़े हैं, उनमें से किसी का छप्पर नहीं गिर गया और कोई मकान नहीं टूट गया। और हम भिखारियों के मकान को तोड़ दिया तुम्हारे भगवान ने। अब रखो तुम अपने भगवान को, मुझे छुट्टी दो। बहुत हो गयी यह बकवास। भगवान-वगवान कुछ भी नहीं है। अब वर्षा में क्या होगा? वर्षा सिर पर है, बादल आकाश में घिरे हैं, घुमड़ते हैं, बिजली चमकती है। क्या होगा, अब कहां ठहरोगे? वह इतने क्रोध में हैं, कि देख भी नहीं पाया कि जब वह चिल्ला रहा है तब बूढ़ा भिक्षु क्या कर रहा है।
जब बूढ़े भिक्षु ने कोई उत्तर नहीं दिया तो उसने अपनी आंखें पोंछी--क्रोध में उसकी आंखों में धुंध आ गयी है, खून आ गया है। लौटकर आंखें, खोलीं तो देखा कि वह बूढ़ा भिक्षु हाथ जोड़े आकाश की तरफ बैठा है और उसकी आंखों से आंसू से बहे जाते हैं। न मालूम किस आनंद से झरना बहा जाता है। उसने उसे हिलाया और कहा, क्या करते हो? लेकिन वह बूढ़ा कुछ बुदबुदा रहा है। वह कह रहा है कि हे भगवान, तेरी कृपा अनूठी है। हवाओं का क्या भरोसा, आंधियों का क्या भरोसा? वे पूरा झोपड़ा भी उड़ाकर ले जा सकती हैं। आधा बचाया तो जरूर तूने ही बचाया होगा, जरूर तूने ही बचाया होगा।
वह बुदबुदा रहा है उसके हाथ जुड़े हैं, उसकी आंखों से आंसू बहे चले जा रहे हैं, उसके चेहरे पर एक रोशनी झलकी रही है। वह यह कह रहा है, जरूर...आंधियों का क्या भरोसा! अंधी आंधियों का क्या भरोसा? पूरा झोपड़ा उड़कर ले जा सकती है। जरूर तूने रोका होगा, जरूर तूने बाधा दी होगी, नहीं तो आधा कैसे बचता? धन्यवाद! आधे झोपड़े से भी काम चल जाएगा। जब तूने समझा कि आधा हमारे लिए काफी है, तो हम कैसे समझे कि न काफी है? जरूर आधे से काम चल जाएगा। वह जवान तो क्रोध से भर गया इस बात को सुनकर और। फिर वे दोनों झोपड़े पर पहुंच गए हैं। बूढ़ा तो ऐसे आनंदमग्न घूम रहा है झोपड़े में, जैसे झोपड़ा महल हो गया हो, जैसे मिट्टी का झोपड़ा सोने का बन गया हो, झोपड़ा  टूटा पड़ा है ध्वस्त और वह जवान क्रोध से भरा हुआ है।
फिर रात उतर आयी बादल चमकने लगे और बिजलियां गरजने लगीं गौर जोर की आवाजें आने लगीं और वे दोनों सो गए हैं। जवान रात भर करवटें बदल रहा है। क्योंकि जो क्रोध घना होता जा रहा है। और ऊपर आकाश दिखाई पड़ रहा है, बिजली चमक रही हैं, पानी की बूंदें पड़ने लगीं हैं, उसका क्रोध घना होता जा रहा है। अगर उसके वश में हो, अभी भगवान मिल जाए तो उनकी गर्दन दबा दे। सारी प्रार्थनाएं वापस ले लेना चाहता है, जो उसने की। और भगवान को जो सारी प्रशंसा की वह सब तोड़ देना चाहता है। उसका मन बड़े विद्रोह से भर गया है। लेकिन बूढ़ा गहरी शांति में सोया हुआ है। बिजली चमकती है तो उसके चेहरे पर जो प्रकाश आता है उससे लगता है जैसे न मालूम वह किस गहरी नींद में है। शायद नींद में नहीं, वह समाधि में है। शायद वह किसी गहरे गहन में है। वह न मालूम किन गहराइयों में डूबा हुआ है।
सुबह दोनों उठते है...एक तो रात भर नहीं सोया है, दूसरा रास्ता भर सोया है। सुबह उठते ही उस जवान से फिर गालियां देनी शुरू कर दीं। वह बूढ़ा सुबह उठकर ही एक गीत लिख रहा है। वह गीत बड़ा प्रसिद्ध है। उस गीत के अर्थ बढ़े अनूठे हैं। उस गीत में वह फिर कहता है कि हे परमात्मा, तू कितना अदभुत है। हमें पता नहीं था कि आधे छप्पर में सोने का आनंद क्या है। रात बिजलियां चमकती थीं तो मेरी नींद भी उनसे आलोकित हो जाती थी। आकाश में तारे दिखायी पड़े, कभी आंख खुली तो तारे दिखाई पड़ गए हैं। नींद में मैंने कभी तारे नहीं देखे थे, और मुझे खयाल भी न था कि शांति में तारे कितने प्रतिपूर्ण मालूम होता हैं और उनसे कैसे संबंध जुड़ जाता है। दिन की रोशनी में, रात के जागरण में देखी थी तेरी प्रकृति, लेकिन नींद के मखमली पर्दे से कभी नहीं झांका था कि तेरी दुनिया इतनी अदभुत है। और अब तो मजा हो जाएगा। वर्षा आ गए है, बूंदें टपकेंगी तेरी, आधे छप्पर में हम सोए भी हरेंगे आधे छप्पर में तेरे बूंदों का संगीत भी रात भर नाचता रहेगा। और कभी आंख खुलेगी तो हम तेरी बूंदों को देख लेंगे। अगर हमें पता होता कि इतना आनंद है, तो हम तेरी हवाओं को कभी तकलीफ न देते, हम खुद ही आधा छप्पर तोड़ देने, लेकिन हमें यह पता ही नहीं था।
यह एक धार्मिक व्यक्ति की जीवन के प्रति दृष्टि है। न तो आपके मंदिर में जाने से आप धार्मिक होते हैं, न आपके मस्जिद में जाने से आप धार्मिक होते हैं, न आप गीता के चरणों में सिर रखने से धार्मिक होते हैं, और आप कुरान को सिर पर ढोने से धार्मिक होते हैं, न बुद्ध और महावीर की तस्वीरों के सामने घुटने टेकने से आप धार्मिक होते हैं। धार्मिक आदमी की तस्वीर यह है कि धार्मिक आदमी के जीवन के कांटों में फलों को देखने में समर्थ होता है, जीवन की पीड़ाओं में आनंद को देखने में समर्थ होता है। आधे उड़ गए छप्पर में आधे बचे छप्पर को देखने में समर्थ होता है।
यह धार्मिक क्रांति का तीसरा सूत्र है--आनंद का, अनुग्रह का,ग्रेटीटयूड का भाव। यह भाव जितना गहरा और विकसित होता चला जाता है उतना ही जीवन रूपांतरित होता है और उतने ही पदार्थ में उसके दर्शन होने लगते हैं जो पदार्थ नहीं। और उतने ही पार्थिव में उसकी झलक मिलने लगती है जो अपार्थिव है। फिर सीमाओं में असीम उतरने लगता और रेखाओं के बीच वह दिखायी पड़ने लगता है जो रेखाओं में बंधता नहीं है। फिर शब्दों में निःशब्द के दर्शन होता हैं और फिर सब और--सब ओर, सब दिशाओं, सबके भीतर और सबके बाहर उस एक ही ज्योति फैलनी शुरू हो जाती है और उस ज्योति में व्यक्ति स्वर्ग भी लीन हो जाता है और एक हो जाता है। जीवन के साथ यह एकता और लीनता ही मुक्ति है, जीवन के विरोध में नहीं। जीवन में डूबकर वह उपलब्ध होता है जो प्रभु है।
अंत में फिर दोहरा दूं--पहली कड़ी: विश्वास नहीं, अंधापन नहीं, विचार। दूसरी कड़ी: ज्ञान नहीं, थोथा ज्ञान नहीं, शब्दों और शास्त्रों से सीखा ज्ञान नहीं बल्कि विस्मय-विमुग्धता। और तीसरी बात...जीवन की असारता, दुख का भाव नहीं, निराशा नहीं, उदासी नहीं, अंधकार नहीं। आनंद की भावदशा अनुग्रह का भाव, धन्यवाद, कृतज्ञता मनुष्य के जीवन में क्रांति लाती है और प्रभु के मंदिर के द्वार पर उसे खड़ा कर देती है।
प्रभु करे, हम सभी प्रभु के मंदिर में पहुंच जाएं। प्रभु करे, हम पत्थर तोड़ने वाले मजदूर न हों। प्रभु करे, हम रोटी कमाने वाले मजदूर न हों। प्रभु करे, हम प्रभु के मंदिर बनाने वाले कारीगर हों।
मेरी इन बातों का इतनी शांति, इतने प्रेम से सुना उसके लिए बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं और सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं मेरे प्रणाम स्वीकार करें।
 ओशो 
पूना, दिनांक १५ मार्च, १९६८ सुबह