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शनिवार, 15 अप्रैल 2017

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-प्रवचन-07

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-ओशो

दिनांक 07-फरवरी, सन् 1981,
ओशो आश्रम, पूना।
प्रवचन-सातवां-(निमंत्रण--दीवानों की बस्ती में)


     प्रश्न-सार


*     पुरुषस्य भाग्यं त्रिया चरित्रम्।
      देवो न जानाति कुतो मनुष्यः।।
      पुरुष का भाग्य, स्त्री का चरित्र देव भी नहीं जानते,
फिर मनुष्य के जानने का तो सवाल कहां।
      क्या आप इससे सहमत हैं?



पहला प्रश्न: भगवान,
पुरुषस्य भाग्यं त्रिया चरित्रम्।
देवो न जानाति कुतो मनुष्यः।।
पुरुष का भाग्य, स्त्री का चरित्र देव भी नहीं जानते, फिर मनुष्य के जानने का तो सवाल कहां।
क्या आप इससे सहमत हैं?

कनुलाल मेहता,

भाग्य जैसी कोई चीज मनुष्य के जीवन में तो नहीं होती, पशुओं के जीवन में होती है। पशु का अर्थ ही होता है--जो पाश में बंधा है। पशु शब्द में ही भाग्य छिपा है--बंधन, बंधा हुआ। जो पैदा होते ही एक विशिष्ट ढंग से जीने को बाध्य है वही पशु है। कुत्ता कुत्ते का भाग्य लेकर पैदा होता है। लाख उपाय करे तो भी कुछ और नहीं हो सकता। सिंह सिंह का भाग्य लेकर पैदा होता है। कोई साधना, कोई तपश्चर्या रत्ती भर भी अंतर न कर पाएगी।
इसीलिए तो हम किसी पशु को निंदित नहीं कर सकते, पापी नहीं कह सकते। क्योंकि पुण्य की ही स्वतंत्रता न हो तो पाप का दोष कैसे? स्वतंत्रता ही न हो चुनाव की तो फिर कैसा पाप, कैसा पुण्य? कैसी नीति, कैसी अनीति? किसी पशु को तुम दुश्चरित्र नहीं कह सकते। क्योंकि पशु तो जीता है नियति से। पशु तो जीता है बंधा हुआ।
मनुष्य की यही तो गरिमा है, यही तो गौरव है; यही तो पशु और मनुष्य के बीच भेद है कि मनुष्य का कोई भाग्य नहीं। मनुष्य पैदा होता है कोरे कागज की तरह--बिना किसी लिखावट के। फिर तुम्हें ही अपने निर्णय से, अपने चुनाव से, अपनी स्वतंत्रता से लिखना पड़ता है कोरे कागज पर। हस्ताक्षर सिर्फ तुम्हारे--किसी विधाता के नहीं। लकीरें जो चाहो खींचो--तुम्हारी। और जब चाहो मिटा दो। क्योंकि खींचने वाले तुम हो, मिटाने वाले तुम हो।
मनुष्य नियंता है स्वयं का। और जब तक मनुष्य अपना निर्णय स्वयं नहीं लेता तब तक जानना कि पशु ही है, दिखाई पड़ता है मनुष्य जैसा। इसलिए ज्योतिषियों के पास जो जाते हैं वे मनुष्य नहीं हैं। ज्योतिषियों का धंधा पशुओं के कारण चलता है। मनुष्य क्यों जाएगा ज्योतिषी के पास? किसलिए जाएगा? मनुष्य के होने का अर्थ ही स्वतंत्रता है।
गौतम बुद्ध के जीवन में यह प्यारा उल्लेख है। एक दोपहर दूर की यात्रा करके वे एक नदी के तट पर पहुंचे हैं। एक वृक्ष की छाया में बैठे हैं विश्राम करने को। और तभी संयोगवशात काशी से लौटता था एक महापंडित ज्योतिष का। बारह वर्षों तक ज्योतिष का अध्ययन करके लौटता था। कीमती से कीमती ज्योतिष के शास्त्रों का अपने साथ संग्रह भी लाया था। उसकी नजर नदीत्तट पर गीली रेत में बने हुए बुद्ध के चरण-चिह्नों पर पड़ी। देख कर हैरान हुआ। आंखों पर भरोसा न आया। क्या बारह वर्ष का अध्ययन व्यर्थ गया? क्योंकि जो देखा, अगर सच था, तो जो शास्त्र अपने साथ बांध लाया था वे गलत थे। और अगर शास्त्र सही थे तो भरी दोपहरी में इस दीन-दरिद्र गांव के किनारे, इस रूखी-सूखी नदी के तट पर ये चरण-चिह्न कैसे?
क्योंकि चरण-चिह्नों में जो रेखाएं थीं, वे उसके शास्त्रों के अनुसार चक्रवर्ती सम्राट की रेखाएं थीं। वैसी रेखाएं केवल उसके ही पैरों में हो सकती हैं जो सारे जगत का, छहों महाद्वीपों का एकमात्र सम्राट हो, जो पूरी पृथ्वी का मालिक हो। पृथ्वी का मालिक, चक्रवर्ती सम्राट इस भरी दोपहरी में नंगे पैर इस गंदे से किनारे पर इस दीन-दरिद्र नदी के पास क्या करने आएगा? क्यों आएगा? ऐसे व्यक्ति तो स्वर्ण-पथों पर भी नंगे पैर नहीं चलते। ऐसे व्यक्ति तो महलों से भी नीचे नहीं उतरते। और अकेला! क्योंकि चरण-चिह्न एक ही व्यक्ति के थे। साथ में वजीर भी नहीं, सेनापति भी नहीं, कोई भी नहीं--अकेला! असंभव। मगर बड़ा कुतूहल उसे पैदा हुआ। जहां से चरण-चिह्न आए थे उस दिशा को उसने देखा। जिस दिशा की तरफ बढ़े थे उस दिशा की तरफ खोज में निकला--कि इस आदमी को खोजना ही होगा, मिलना ही होगा। मेरा सारा भविष्य इस पर ही निर्भर है। मैंने बारह वर्ष यूं ही तो नहीं गंवाए? रेत से तो तेल नहीं निचोड़ता रहा?
जल्दी ही पहुंच गया उस वृक्ष के पास जहां चरण-चिह्न समाप्त हो गए थे। और बुद्ध को उसने बैठे देखा, तब और मुश्किल में पड़ा। एक तरफ से तो यूं लगे--ऐसा प्यारा व्यक्ति, ऐसा सौंदर्य, ऐसा प्रसाद, ऐसी सुगंध, ऐसी आभा, निश्चित ही होना चाहिए चक्रवर्ती। इससे कम नहीं, रत्ती भर कम नहीं। और दूसरी तरफ से लगे--भिखारी, भिक्षापात्र पास में रखा। फटे, जीर्ण-शीर्ण वस्त्र पहने, अकेला, इस वृक्ष से टिका विश्राम कर रहा। भूखा भी हो शायद। पेट पीठ से लग गया है, देह हड्डी-हड्डी हो गई है।
झकझोरा बुद्ध को और कहा, मुझे मुश्किल में डाल दिया है। बारह वर्ष बड़ी मेहनत करके ज्योतिष की शिक्षा लेकर लौटा हूं और तुम पहले आदमी मिल गए, जिसने सब अस्तव्यस्त कर दिया। अराजकता पैदा हो गई मेरे भीतर। ये तुम्हारे चरण-चिह्न कहते हैं कि तुम्हें होना चाहिए चक्रवर्ती सम्राट और तुम्हारा इस वृक्ष के नीचे बैठा होना, भिक्षापात्र, और तुम्हारी यह भिखारी की दशा--जाहिर है कि तुम भिक्षु हो। और तुम्हारी आंखों को भी देखता हूं, तुम्हारे चेहरे को भी देखता हूं--जाहिर है कि तुम चक्रवर्ती भी हो। मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गया। मुझे सुलझाओ।
बुद्ध हंसे और उन्होंने कहा, जब तक बंधा था तब तक तेरा ज्योतिष सच था। अब मैं मुक्त हूं, अब तेरा ज्योतिष सच नहीं। तेरा ज्योतिष उन लोगों के संबंध में सच हो सकता है जो सोए हैं; उनके संबंध में नहीं जो जाग गए हैं। अब मैं स्वतंत्र हूं।
समझा नहीं ज्योतिषी। ज्ञान से भरे हुए लोगों की समझ बड़ी कम हो जाती है। उनकी खोपड़ी में इतना कचरा भरा होता है कि बात हृदय तक पहुंचती ही नहीं। सुना तो जरूर, लेकिन पंडितों से ज्यादा बहरा और कोई भी नहीं होता।
उसने कहा, कैसा बंधन? कैसी मुक्ति? मैं यह पूछना चाहता हूं कि आप मनुष्य हैं या नहीं?
बुद्ध ने कहा कि नहीं।
तो पूछा, क्या आप देवता हैं?
बुद्ध ने कहा, नहीं।
तो पूछा कि क्या आप किन्नर हैं?
बुद्ध ने कहा, नहीं।
तो पूछा कि क्या आप यक्ष हैं?
यूं ज्योतिषी पूछता चला और बुद्ध इनकार करते चले। अंततः घबड़ा गया और उसने कहा कि फिर तुम्हीं कहो--कौन हो?
बुद्ध ने कहा, मैं तो सिर्फ बुद्ध हूं, जागा हुआ हूं। अब सोया हुआ नहीं हूं। इसलिए तुझसे फिर कहता हूं, सोए हुओं पर तेरा ज्योतिष ठीक है। जो मूर्च्छित हैं उनका भाग्य है। लेकिन जो जाग गए उनका फिर कोई भाग्य नहीं।
इस अवस्था को ही हमने मुक्ति कहा है, मोक्ष कहा है, परम स्वतंत्र कहा है, कैवल्य कहा है, समाधि कहा है, बुद्धत्व कहा है।
कनुलाल मेहता, तुम कहते हो: "पुरुषस्य भाग्यं...पुरुष का भाग्य देवता भी नहीं जानते।'
भाग्य तो होता ही नहीं। भाग्य तो तुम्हारी तंद्रा में है, तुम्हारी मूर्च्छा में है, तुम्हारे यंत्रवत व्यवहार में है, तुम्हारी पशुता में है। जैसे ही तुम थोड? से जागे, वैसे ही भाग्य विदा हो गया।
और पुरुष शब्द को ठीक से समझ लेना। पुरुष का अर्थ यह मत समझ लेना कि जो नारी नहीं है। इस सूत्र को लिखने वाला होगा कोई पंडित, होगा कोई थोथी, व्यर्थ की बौद्धिक बातों से भरा हुआ आदमी। पुरुष का अर्थ ठीक उस शब्द में छिपा है। पुर का अर्थ होता है: नगर। नागपुर, कानपुर, उदयपुर, जयपुर। पुर का अर्थ होता है: नगर। और पुरुष का अर्थ होता है: नगर के भीतर जो बसा है। शरीर है नगर, सच में ही नगर है। विज्ञान की दृष्टि से भी नगर है। वैज्ञानिक कहते हैं: एक शरीर में सात अरब जीवाणु होते हैं। अभी तो पूरी पृथ्वी की भी इतनी संख्या नहीं; चार अरब को पार कर गई है, लेकिन एक-एक शरीर में सात अरब जीवाणु हैं। सात अरब जीवित चेतनाओं का यह नगर है और उसके बीच में तुम बसे हो। मूर्च्छित हो, इसलिए पता नहीं। होश में आ जाओ तो पता चले। तुम देह नहीं हो, मन नहीं हो, भाव नहीं हो।
देह का परकोटा बाहरी परकोटा है तुम्हारे नगर का, जैसे बड़ी दीवाल होती है पुराने नगरों के चारों तरफ--किले की दीवाल। फिर मन का परकोटा भीतर का परकोटा है--और एक दीवाल। और फिर भावनाओं का परकोटा सबसे अंतरंग है--और एक दीवाल। और इन तीन दीवालों के पीछे तुम हो चौथे, जिसको जानने वालों ने तुरीय कहा है। तुरीय का अर्थ होता है: चौथा। और जब तुम चौथे को पहचान लोगे, तुरीय को पहचान लोगे, जब इतने जाग जाओगे कि जान लोगे--न मैं देह हूं, न मन, न हृदय; सिर्फ चैतन्य हूं, सिर्फ बुद्धत्व हूं--उस क्षण तुम पुरुष हुए।
स्त्री भी पुरुष हो सकती है और तुम्हारे तथाकथित पुरुष भी पुरुष हो सकते हैं। स्त्री और पुरुष से इसका कुछ लेना-देना नहीं है। स्त्री का देह का परकोटा भिन्न है; यह परकोटे की बात है। घर यूं बनाओ या यूं बनाओ। घर का स्थापत्य भिन्न हो सकता है, द्वार-दरवाजे भिन्न हो सकते हैं, घर के भीतर की रंग-रौनक भिन्न हो सकती है, घर के भीतर की साज-सजावट भिन्न हो सकती है। मगर घर के भीतर रहने वाला जो मालिक है, वह एक ही है। वह न तो स्त्री है, न पुरुष तुम्हारे अर्थों में। स्त्री के विपरीत नहीं। स्त्री और पुरुष दोनों के भीतर जो बसा हुआ चैतन्य है, वही वस्तुतः पुरुष है।
और पुरुष का तो कोई भाग्य नहीं होता। इसलिए देवता जानना भी चाहें तो क्या खाक जानेंगे! पुरुष की स्वतंत्रता होती है--प्रतिपल स्वतंत्र। वह प्रतिपल जीता है--अनबंधा। न कोई जंजीरें, न कोई आग्रह, न कोई अतीत। वह अतीत से निर्धारित नहीं होता और न उसकी भविष्य की कोई रूप-रेखा होती है। न वह बीते कल से जीता है, न आने वाले कल के कारण जीता है। वह अभी जीता है, यहीं जीता है, इसी क्षण में उसका पूरा का पूरा व्यक्तित्व अपनी समग्रता में खिलता है, जैसे फूल खिलता हो। पुरुष का कोई भाग्य नहीं होता। इसलिए मैं कैसे इस सूत्र से राजी होऊं? इस सूत्र के किसी हिस्से से मैं राजी नहीं हूं।
पुरुषस्य भाग्यं त्रिया चरित्रम्।
देवो न जानाति कुतो मनुष्यः।।
पुरुष का भाग्य होता ही नहीं। जो है ही नहीं, उसे देवता भी कैसे जानेंगे और मनुष्य भी कैसे जानेंगे!
दूसरा हिस्सा है: त्रिया चरित्रम्, स्त्री का चरित्र!
तुम्हारे तथाकथित धार्मिक व्यक्तियों ने स्त्री की जिस तरह हो सके उस तरह निंदा की है; जिस भांति हो सके उस भांति स्त्रियों को गालियां दी हैं। इन गालियों से सिर्फ इतना ही पता चलता है कि उनके मन में बहुत गहरा स्त्रियों के प्रति आकर्षण था। यह आकर्षण का शीर्षासन करता हुआ रूप है। तुम्हारे शास्त्र स्त्रियों को गालियां ही देते रहे हैं सदियों से। लेकिन जिन्होंने भी स्त्रियों को गालियां दी हैं, वे सिर्फ इस बात की घोषणा कर रहे हैं कि अभी उनके मन से स्त्री की वासना नहीं गई। कहीं न कहीं घाव है, कहीं न कहीं मवाद है, कहीं न कहीं दर्द है, टीस है। कहीं कोई चुभन है, कोई कांटा अभी भी गड़ता है। उस कांटे की चुभन के कारण ही गाली निकल रही है।
स्त्री के चरित्र पर भरोसा नहीं। जैसे कि पुरुष जिनको तुम कहते हो उनके चरित्र का कोई भरोसा है! सच तो यह है कि स्त्रियां सदा से ज्यादा चरित्रवान सिद्ध हुई हैं पुरुषों की बजाय।
जिन देवताओं का तुम बड़ा सम्मान करते हो उनका कोई चरित्र है? तुम्हारे पुराणों को उठा कर देखो! कनुलाल मेहता, तुम चकित होओगे। तुम्हारे देवताओं से ज्यादा भ्रष्ट व्यक्ति खोजना मुश्किल है। तुम्हारे देवताओं की सारी कथाएं भ्रष्टता की कथाएं हैं। लेकिन उनका सम्मान है, उनकी पूजा है। और स्त्रियों को गाली। और तुम्हारे देवता तक भी चरित्र को स्वीकार करते मालूम नहीं होते। मगर कसूर किसी का भी हो, गाली स्त्री को पड़ती है। यह हमारा कुछ अजीब तर्क है।
जैसे: लोभ तो हमारे भीतर है, लेकिन धन को हम गाली देते हैं। धन का क्या कसूर है? हजार रुपये रास्ते के किनारे पड़े हैं, तुम्हारी लार टपक रही है और गाली धन को दे रहे हो! जरा सोचते हो कि धन का क्या कसूर है? वे रुपये तुमसे नहीं कह रहे हैं लार टपकाओ। रुपयों को तुम्हारी लार से कोई प्रयोजन नहीं है। रुपयों को तुमसे भी कोई प्रयोजन नहीं है।
भर्तृहरि के जीवन में यह कथा है--प्यारी कथा है--कि भर्तृहरि ने जीवन को खूब देखा, समझा, भोगा। और जो भी देखेगा, समझेगा, भोगेगा, वह मुक्त हो जाएगा। भर्तृहरि महाभोगी थे। इसलिए उन्होंने दो अदभुत किताबें लिखी हैं। ऐसी दो किताबें एक साथ किसी व्यक्ति ने नहीं लिखी हैं। पहली किताब लिखी: शृंगार-शतक। शृंगार की ऐसी अनूठी किताब बेजोड़ है, अद्वितीय है। शृंगार को जरूर जाना, गहरे से जाना, अनुभव से जाना। यह किसी कवि की बात नहीं है, अनुभोक्ता की बात है। इसलिए शृंगार-शतक में बड़ा बल है। और इतनी गहराई से जाना जीवन को, उसके भोग को, कि जान कर मुक्त हो गए। जानने से हमेशा मुक्ति आती है। अनुभव से हमेशा अतिक्रमण आता है। तुम जिस चीज को जान लेते हो, उसी से मुक्त हो जाते हो; जिसको नहीं जान पाते उसी से बंधे रह जाते हो। इसलिए जो भागेगा संसार से, वह संसार में वापस लौट-लौट आएगा। जो संसार में जीकर मुक्त होता है, वह फिर नहीं लौटता है।
भर्तृहरि ने जीवन को देखा। सम्राट थे; सब तरह से भोगा। और फिर देख कर व्यर्थता, ध्यान में प्रवेश किया। फिर दूसरी किताब लिखी: वैराग्य-शतक। भर्तृहरि जैसा व्यक्ति ही लिख सकता है। जिसने शृंगार जाना वही वैराग्य जान सकता है। जिसने राग जाना वही वीतरागता जान सकता है। जिसने संसार जाना वही मोक्ष से परिचय पा सकता है।
भर्तृहरि सब छोड़ कर चले गए। बड़ा राज्य था, अपार संपदा थी। सब को पीठ दिखा दी। जंगल में जाकर, ध्यान में लीन, एक सुबह--ऐसी ही सर्द सुबह रही होगी--सूरज की धूप, भर्तृहरि अपनी शिला पर बैठे ध्यान की मस्ती में डोल रहे हैं। घोड़ों की टाप की आवाज सुनाई पड़ी। आंख खोल कर देखा। जो देखा, उसने भर्तृहरि को बड़ा बोध दिया। देखा कि सामने ही शिला के राह गुजरती है, पगडंडी जंगल की, और उस पगडंडी पर एक इतना बड़ा हीरा पड़ा है। पारखी थे, बहुत हीरे देखे थे। एक क्षण को भूल ही गए कि मैं तो हीरों को छोड़ आया हूं। एक क्षण को मूर्च्छा ने पकड़ लिया, तंद्रा आ गई। एक क्षण को बेहोशी की लहर आ गई। हुआ मन--उठा लूं! लेकिन इसके पहले कि उठाते, दो घुड़सवार दोनों दिशाओं से आए और दोनों की नजर भी करीब-करीब साथ ही हीरे पर पड़ी। दोनों की तलवारें निकल आईं और दोनों ने कहा कि हमारी नजर पहले पड़ी है।
नजर तो भर्तृहरि की पहले पड़ी थी, लेकिन अब तक भर्तृहरि सम्हल गए थे; पांव डगमगाया था, मगर सम्हल गए थे। सम्हल गए थे, यह सोच कर थोड़ी हंसी भी आ गई थी कि इस तरह के बहुत से हीरे तो मेरे खजाने में थे, इससे बड़े-बड़े हीरे थे, उनको मैं छोड़ कर चला आया और इस हीरे पर मेरी नजर बिगड़ गई, नीयत बिगड़ गई। मैं भी कैसा हूं! अगर इन्हीं हीरों पर रस था तो आया ही क्यों? हंसे अपने पर--अपनी मूढ़ता पर। और अब यह तो कहने का सवाल ही न था कि नजर मेरी पहले पड़ी, चुप ही रहे।
उन दोनों ने तो भर्तृहरि को देखा ही नहीं, देखने का सवाल ही कहां था! सवाल तो तय करने का था कि नजर किसकी पहले पड़ी। जिसकी नजर पड़ी वह मालिक। दोनों में विवाद हो गया, तलवारें खिंच गईं, तलवारें चल गईं। एक क्षण में हो गई यह सारी बात। दोनों की तलवारें एक-दूसरे की छाती में छिद गईं। दोनों गिर पड़े। दो लाशें पड़ी थीं। खून का फव्वारा छूट गया था। हीरा अपनी जगह पड़ा था। दो आदमी अभी जिंदा थे, अभी मुर्दा हो गए।
भर्तृहरि और भी खिलखिला कर हंसे। पहले तो मुस्कुराए थे, अब खिलखिला कर हंसे कि हद हो गई, हीरे को कुछ लेना-देना नहीं, आदमी जिंदा रहे कि मर जाए। ये दो आदमी मर गए, हीरे की आंख में आंसू भी न आया, हीरे को पता भी न चला, हीरे को कुछ प्रयोजन भी नहीं। और ये दो आदमियों ने अपनी जान गंवा दी एक पत्थर के लिए। और कभी मैं भी यूं ही जान गंवा देता। क्षण भर पहले मुझे भी लहर आई थी, मुझे भी तरंग आई थी।
धन को क्या गाली देते हो? अगर समझना है तो लोभ को समझो। मगर आदमी का यह हिसाब है: अपना दोष दूसरे पर टाल देता है।
पुरुषों के मन में स्त्रियों के प्रति प्रबल कामना है। इतनी प्रबल जितनी कि स्त्रियों के मन में पुरुष के प्रति नहीं है। यही कारण है कि स्त्रियों ने पुरुषों को गाली देने वाली किताबें नहीं लिखीं। पुरुषों ने किताबें लिखीं। मेरा भी अपना अनुभव यह है कि मैंने सब तरह की स्त्री साध्वियां देखीं, संन्यासिनियां देखीं; पुरुष साधु देखे, पुरुष संन्यासी देखे। स्त्री साध्वियों में एक तरह की गरिमा है। स्त्री साध्वियों में एक तरह की निष्ठा है। पुरुष साधु बेईमान हैं, झूठे हैं। और फिर भी गाली जब देंगे तो त्रिया चरित्र को। कारण तुम समझ लेना। कारण यह है कि अभी भी इनको स्त्री आकर्षित करती है।
और इसके पीछे मनोविज्ञान ही नहीं है, इसके पीछे पुरुष और स्त्री की जैविक व्यवस्था भी है। पुरुष की कामवासना आक्रामक है। स्त्री की कामवासना ग्राहक है। तो जो आक्रामक है उसको तो अपनी वासना बहुत दिखाई पड़ती है, क्योंकि वह हमेशा छलांगें मारती है, वह कुछ कर दिखाने को आतुर होती है। तलवारें चमकाती है। म्यान के बाहर आ-आ जाती है। स्त्री को अपनी वासना दिखाई नहीं पड़ती; दिखाई पड़ भी नहीं सकती, वह ग्राहक है। कोई स्त्री कभी किसी पुरुष के पीछे नहीं दौड़ती। और दौड़े तो पुरुष ऐसा भागे...। कोई स्त्री पुरुष के पीछे नहीं जाती। कोई स्त्री पुरुष से प्रेम का निवेदन नहीं करती।
मुल्ला नसरुद्दीन और उसकी पत्नी सुबह ही सुबह चाय की टेबल पर ही उलझ पड़े। वहीं से शुरू होता है रोज पुराण। चाय की टेबल से ही शुरू हो जाता है। कुछ और भी पहुंचे हुए हैं, वे बिस्तर से ही शुरू कर देते हैं। आंख खुली नहीं कि पुराण शुरू।
मुल्ला नसरुद्दीन कहने लगा कि मैं भी कहां की झंझट में पड़ गया! तुझसे विवाह करके किस उपद्रव को मैंने अपने सिर ले लिया!
पत्नी ने कहा कि मैं तुम्हारे पीछे न पड़ी थी। तुम्हीं पूंछ हिलाते मेरे पीछे घूमते थे। तुम्हीं मेरे पापा के हाथ-पैर जोड़ते थे, मेरी मम्मी को चढ़ोत्तरी चढ़ाते थे। तुम्हीं लिखते थे लंबे-लंबे प्रेम-पत्र। मैंने अभी भी संदूक में सम्हाल कर रखे हैं। कहो तो निकाल लाऊं? क्या-क्या तुमने लिखा है--कि हे प्राण प्यारी, तेरे बिना मर जाऊंगा, जी न सकूंगा, एक क्षण न रह सकूंगा। भूल गए वे सब बातें? मैं तुम्हारे पीछे नहीं पड़ी थी।
नसरुद्दीन ने कहा, यह बात सच है। कोई भी चूहादानी किसी चूहे के पीछे नहीं पड़ती। मगर ये मूरख चूहे खुद ही चले जाते हैं।
स्वभावतः, जब मूरख चूहा चूहेदानी में फंस जाएगा तो चूहेदानी को गाली देगा कि फंसा लिया। ये मूरख चूहों की बातें हैं--पुरुषस्य भाग्यं त्रिया चरित्रम्। इनको त्रिया का चरित्र समझ में नहीं आता। जैसे कि इनको अपना चरित्र समझ में आ गया हो। इनका खुद का चरित्र तो देखो!
मगर दोष दूसरे को देना मनुष्य की एक बुनियादी कमजोरी है--हमेशा दोष दूसरे पर टाल देना। और यह अच्छा लक्षण नहीं है। यह धार्मिक व्यक्ति का लक्षण नहीं है। इसलिए तुम्हारी धर्म-किताबों में मुझे बहुत कम धर्म दिखाई पड़ता है, अधर्म बहुत ज्यादा दिखाई पड़ता है। निन्यानबे प्रतिशत अधर्म, कभी भूल-चूक से एकाध बात कोई धर्म की आ जाती हो तो आ जाती हो, नहीं तो अधर्म ही अधर्म दिखाई पड़ता है।
अब जैसे, तुम जरा सोचो कि अगर कोई स्त्री पुरुषों के कपड़े चुरा कर झाड़ पर बैठ गई होती तो तुम कहते--पुरुषस्य भाग्यं त्रिया चरित्रम्, देवो न जानाति कुतो मनुष्यः। अरे मनुष्य का क्या है? मनुष्य का क्या बस है, यह स्त्रियों का कुछ ढंग ही समझ में नहीं आता। पुरुष बेचारे नहा रहे हैं, सीधे-सादे पुरुष, साधु-संत नहा रहे हैं, ये उनके कपड़े चुरा कर झाड़ पर चढ़ जाती हैं!
मगर कृष्ण कन्हैया यही करते रहे और तुमको उनका चरित्र समझ में आता है। यह बड़े मजे की बात है! वे जो नग्न स्त्रियां खड़ी हैं पानी में, उनका चरित्र तुम्हें समझ में नहीं आ रहा। और ये सज्जन जो ऊपर चढ़ बैठे हैं कदंब के झाड़ पर कपड़े लेकर, इनका चरित्र तुम्हें समझ में आ रहा है। न केवल चरित्र समझ में आ रहा है बल्कि तुम इनको पूर्णावतार कहते हो। पूर्णता से समझ में आ रहा है कि ये कोई साधारण पुरुष नहीं हैं, पूर्ण अवतार हैं।
एक गांव में रास-लीला हो रही थी। रास-लीला में वह दृश्य आया, जब दुर्योधन द्रौपदी की साड़ी खींचने लगता है। इंतजाम पूरा किया गया था, ढंग से बनाई गई थी सारी व्यवस्था। ऐसी व्यवस्था पहले भी रही होगी। छप्पर के ऊपर बिजली से चलने वाली एक मशीन लगाई थी, जिसमें साड़ियों पर साड़ियां बंधी हुई थीं। इधर कृष्ण भगवान बटन दबाते और उधर बिजली चलती, साड़ियों में बंधी हुई साड़ियां निकलती चली आतीं, निकलती चली आतीं। मगर संयोग की बात, बिजली चली गई। यूं गैसबत्तियां भी थीं, इसी डर से थीं, क्योंकि गांव था छोटा और बिजली आठ-दस दफे दिन में जाती ही थी, सो कब बिजली चली जाए पता नहीं। लेकिन यह किसी ने विचार ही न किया था कि ठीक ऐसे समय बिजली जाएगी। तो प्रकाश तो था, बत्तियां तो थीं, मगर साड़ियां आनी बंद हो गईं। कृष्ण कन्हैया बहुत मुश्किल में पड़े। उनकी तो जान पर बन आई, वे भूल ही गए मामला कि अब क्या करना! और दुर्योधन और द्रौपदी में झगड़ा था; सो वह माने ही नहीं, वह साड़ी खींचे ही चला जाए। कृष्ण ने बहुत कहा, अरे दुष्ट! ठहर! बिजली चली गई। जरा ठहर!
दुर्योधन बोला कि ऐसी की तैसी बिजली की! अरे आए बिजली कि जाए, मुझे क्या लेना-देना? आज रास-लीला पूरी होकर रहेगी। आज इस रांड को नंगा करके बताता हूं! और देख ले जनता भी कि यह रांड नहीं, रंडुआ है।
और उसने खींच ही दी साड़ी। वह गांव का ही एक पहलवान द्रौपदी बना था। तालियां पिट गईं। जो रास-लीला हुई वह देखने लायक थी। जनता एकदम ताली बजा रही। जो सो गए थे वे भी जग गए। बच्चे किलकारी मार रहे। लोग खड़े हो गए कि यह तो गजब हो गया! और कृष्ण कन्हैया कुछ भी न कर पाए। अब क्या करो, बिजली ही चली गई!
एक तरफ ये कृष्ण कन्हैया लोगों के वस्त्र चुराते रहे, स्त्रियों के वस्त्र चुरा कर झाड़ पर बैठते रहे। और दुर्योधन जरा लीला करना चाहता था तो कहने लगे कि बिजली चली गई। आखिर दुर्योधन भी तो वही कर रहा था जो कृष्ण का धंधा था--वही गोरखधंधा! कुछ फर्क तो न था। इन्होंने बहुत स्त्रियों के साथ किया था। सोलह हजार स्त्रियां कृष्ण ने इकट्ठी कर रखी थीं--चुराई, भगाई। इनका चरित्र तुम्हें समझ में आता है। कोई चरित्र है यह?
युधिष्ठिर का चरित्र तुम्हें समझ में आता है? उनको धर्मराज कहते हो! सब धन लगा दिया जुए के दांव पर। धन ही नहीं लगा दिया, द्रौपदी को भी लगा दिया--पत्नी को भी लगा दिया। पहले तो पांच भाइयों ने पत्नी बांट ली, यह कोई चरित्र है? फिर भी वे धर्म के रक्षक हैं--पांडव। कौरव जो हैं, वे अधार्मिक हैं; उनको हराना है, उनको विनष्ट करना है। विनष्ट करने का काम कौन करेंगे? ये पांच पांडव करेंगे जिन्होंने एक को बांट लिया। जैसे स्त्री कोई सामान हो!
मगर यही ढंग रहा है। जिन्होंने यह सूत्र कहा है, कनुलाल मेहता, इन्होंने स्त्री को संपत्ति कहा है--स्त्री-संपदा। इसलिए तो कन्यादान करते हैं। और मजा यह है कि अब पढ़ी-लिखी स्त्रियां भी, जब उनका कन्यादान किया जाता है, तो खड़े होकर नहीं कहतीं कि बंद करो यह बकवास! हम कोई सामान नहीं हैं जिनका दान किया जाए! पुत्र-दान नहीं किया जाता, कुंवर-दान नहीं किया जाता, कन्या-दान किया जाता है। ये कुंवरों को, सुंअरों को, इनको दान करो! कन्याओं को बहुत दिन हो गए दान करते।
मगर दान तो चीजों का ही किया जा सकता है। बांट लिया स्त्री को। और बांट लिया, यहां तक भी बात रहती तो भी ठीक थी, तो भी गनीमत थी, उसको दांव पर भी लगा दिया। संपत्ति हो तो दांव पर लगाई जा सकती है। और जब जीत गया दुर्योधन तो पाप क्या था? फिर संपत्ति उसकी हो गई। फिर वह डब्बा खोले कि बंद करे, फिर इसमें अड़चन क्या डालनी? फिर अड़चन भी डालनी है! हार भी गए। हार गए तो हार गए, अब स्त्री उसकी हो गई। चलो पांच की न हुई, छह की हो गई। इसमें क्या फर्क पड़ने वाला था? लेकिन वह कृष्ण की बहन थी, इसलिए चरित्र समझ में आ जाता है। कृष्ण की बहन थी, इसलिए बचाव। और ये सोलह हजार स्त्रियां भी तो किसी की बहनें रही होंगी, किसी की बेटियां रही होंगी, किसी की पत्नियां भी थीं ये। इनमें अधिकतर तो विवाहित थीं। इनको भगा लाए--न शर्म, न संकोच। और पुरुषों का तुम्हें चरित्र समझ में आता है और स्त्रियों का चरित्र समझ में नहीं आता। कैसा पाखंड है!
स्त्री ने हमेशा, पुरुष ने जो भी उससे कहा है, उसे मान लिया है, सरलता से स्वीकार कर लिया है। उसका अगर कोई कसूर है तो यही है कि उसने कभी बगावत नहीं की, इनकार नहीं किया। उससे जो झूठी बातें मनवाईं, वही मान लीं। फिर भी उसका चरित्र तुम्हें समझ में नहीं आता? और दुश्चरित्र तुम हो--पुरुष है।
स्त्रियों को सती होने का पाठ सिखा दिया; वह भी स्त्री ने मान लिया। लाखों स्त्रियां उनके पतियों के मर जाने पर उनकी चिताओं पर चढ़ गईं। और तुम्हें इनका चरित्र समझ में नहीं आता! और ये जिन्होंने सती की व्यवस्था जारी की, इनमें से एक भी कभी अपनी पत्नी के मरने पर उसकी चिता पर न चढ़ा। एक सता न हुआ, सतियां ही सतियां होती रहीं। एकाध तो सता हो जाता। कहने को तो बात रह जाती कि नहीं भाई, सतियों का चौरा ही नहीं, यह सता का चौरा है। स्त्रियों को चढ़ा दिया बलिवेदी पर। क्यों? क्योंकि संपदा है।
पुरुष मर कर भी यह तय कर लेना चाहता था कि मेरी स्त्री किसी और की न हो जाए। वह मर कर भी अपना कब्जा कायम रखना चाहता था। सबसे ज्यादा उचित उपाय यही था कि स्त्री भी मर जाए। क्योंकि जिंदा रहे, तो जिंदगी का क्या भरोसा! जिंदगी स्वतंत्रता है; आज कुछ है, कल कुछ है; जिंदगी रोज बदलती है। कल किसी से प्रेम हो जाए! कोई इसी पुरुष ने तो ठेका नहीं ले लिया था। एक दिन इससे भी प्रेम नहीं था, फिर इससे प्रेम हो गया, तो एक दिन किसी और से भी प्रेम हो सकता है। यह संभावना ही मिटा दो, जीवन का ही अंत कर डालो। यह महाहत्या धर्म के नाम पर चलती रही।
और ध्यान रखना, सती होना आसान मामला नहीं है। जरा आग में अपना हाथ डाल कर देखना! तुम बाहर न भी निकालोगे तो हाथ अपने आप बाहर निकल आएगा। रिफ्लैक्स एक्शन वैज्ञानिक कहते हैं--कि कोई निकालने की जरूरत नहीं है; जो आदमी कोमा में बेहोश पड़ा हो, उसका हाथ भी आग में डाल दो, वह भी बाहर आ जाएगा। इतनी बुद्धि तो हाथ को ही है। इसके लिए उसकी खुद की बुद्धि की कोई जरूरत नहीं है। यह हाथ बाहर निकल आएगा। बेहोश आदमी को भी सुई चुभाओ तो फौरन प्रतिक्रिया होगी, पैर हट जाएगा। रात तुम सोते हो, मच्छर काटता है, तुम हाथ से उड़ा देते हो। चींटा चढ़ने लगे पैर पर, तुम झटक देते हो। नींद नहीं खुलती।
तो आग में हाथ डालने से इतनी मुश्किल होती है, पूरा जीवित व्यक्ति जब आग में उतरता होगा तो आसान तो नहीं है मामला।
और किस पति के लिए? जिसने जीवन में दिया ही क्या था--सिवाय कष्टों के, सिवाय दुखों के! किस पति के लिए? जिसने जिंदगी को दूभर कर दिया था। जिसने जीवन को नरक कर दिया था। मारा होगा, पीटा होगा। क्योंकि बाबा तुलसीदास जैसे तथाकथित धर्मगुरु कह गए कि स्त्रियों को जितना पीटो उतना ही अच्छा।
ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।
इनको तो ताड़ना देनी ही चाहिए। ढोल को मारो न तो बजे न। ऐसे ही स्त्री को मारो न तो बजे न। इसको तो मारते ही रहना चाहिए, पीटते ही रहना चाहिए।
यह बाबा तुलसीदास का चरित्र तुम्हें समझ में आता है! ये स्त्री पर नाराज हैं, क्योंकि स्त्री ने ही इनको बोध दिया। उसको ये क्षमा नहीं कर पाते।
खयाल रखना, इस दुनिया में जिन व्यक्तियों के कारण तुम्हें बोध मिले उनको क्षमा करना बहुत मुश्किल हो जाता है। क्योंकि बोध का क्षण अपमान का क्षण मालूम होता है। जीसस को लोगों ने सूली पर लटका दिया। किसलिए? क्योंकि जीसस ने हजारों लोगों को बोध देने की कोशिश की। लोगों के बरदाश्त के बाहर हो गया--कि यह हमें बुद्धू समझ रहा है! हमें बोध दे रहा है! सुकरात को जहर पिलाया। क्या कसूर था उसका? यही कसूर था कि उसने लोगों को जगाने की कोशिश की। लेकिन जगाने की कोशिश में एक बात तो जाहिर हो जाती है कि तुम सोए हुए हो। और कोई आदमी मानने को राजी नहीं कि मैं और सोया हुआ! सोए होंगे मेरे दुश्मन, सोए होओगे तुम। मैं नहीं सोया हुआ हूं! मैं जागा हुआ हूं।
इसलिए जो इसे जगाएगा उसको यह कभी क्षमा न कर पाएगा।
तुलसीदास को तुलसीदास की पत्नी ने ही जगाया। क्योंकि तुलसीदास की पत्नी गई थी मायके। और ये भैया पहुंच गए। बरसात की रात, अमावस की रात, ये पहुंच गए। ये रह न सके दो-चार दिन भी अकेले। नदी पूर पर थी। नदी को पार करना मुश्किल था। एक लाश का सहारा लेकर नदी पार की। समझा कि लाश नहीं, लक्कड़ है। ऐसा अंधापन! घर के पीछे के दरवाजे से घुसने की कोशिश की, दरवाजा बंद था। सांप लटक रहा था छज्जे से, उसी को पकड़ कर चढ़ गए, समझे कि रस्सी है। ऐसा अंधापन! और जब इनकी पत्नी ने इन्हें देखा, इनकी यह हालत देखी, तो कहा कि अगर तुमने इतनी ही चाहत परमात्मा की की होती, इतना ही प्रेम परमात्मा के प्रति जताया होता, ऐसी ही तुमने कभी अगर एक तल्लीनता से प्रभु की स्मृति की होती, तो उसे पा लेते। क्या मुझ हड्डी-मांस-मज्जा की स्त्री के पीछे पागल हो!
इससे तुलसीदास को चोट लगी। अहंकार फन मारा होगा। बात तो साफ थी, इनकार भी नहीं की जा सकती थी, विवाद भी नहीं किया जा सकता था। लौट पड़े। इस स्त्री के प्रति सम्मान प्रकट करना चाहिए था, लेकिन कभी कोई सम्मान प्रकट न किया। इस स्त्री को अपना गुरु मानना चाहिए था, मगर नहीं। इस स्त्री के कारण ही तुलसीदास को थोड़ा सा बोध हुआ, लेकिन उस बोध का बदला उन्होंने यूं लिया--सारी स्त्री जाति को गाली देकर। और पुरुषों का चरित्र तुम्हें समझ में आता है और स्त्रियों का चरित्र तुम्हें समझ में नहीं आता!
स्त्री सीधी-सरल है। उसके चरित्र में कोई उलझाव नहीं है। उलझाव है तो पुरुष के चरित्र में। और अगर स्त्री के चरित्र में कोई उलझाव हो, तो वह पुरुष ने पैदा किया है। इस स्त्री को तुमने जलने के लिए कहा तो जलने के लिए तैयार हो गई। लेकिन जलना आसान तो नहीं था, तो बड़ा आयोजन करना पड़ता था। हजारों ब्राह्मण बड़े जोर-जोर से वेद-पाठ करते थे, ढोल बजाए जाते, मंजीरे पीटे जाते और चिता पर घी फेंका जाता ताकि धुआं उठे--इतना धुआं उठे कि किसी को कुछ दिखाई न पड़े कि स्त्री की हालत क्या हो रही है। और इतने ढोल पीटते और इतने जोर-जोर से वेद-पाठ करते कि स्त्री की चीख-पुकार का पता न चले। जिंदा स्त्री जलेगी तो चीख-पुकार तो होगी ही। और यह ब्राह्मणों का एक समूह चारों तरफ से मशालें लिए खड़ा रहता; वह स्त्री भागती तो उसे मशालों से धक्का देकर वापस गिरा देना पड़ता। यह हत्या थी, शुद्ध हत्या थी।
लेकिन इस हत्या को करने वाले लोगों का चरित्र तुम्हें समझ में आता है। और जिसकी हत्या की गई उसका चरित्र तुम्हें समझ में नहीं आता।
स्त्री को आदमी ने क्या-क्या नहीं बनाया! तुमने देवदासियां बनाईं, जो कि सिर्फ वेश्याओं के लिए दिया गया अच्छा नाम है। और वेश्याएं भी किसने बनाईं?
अब यह थोड़ा सोचो! वेश्या इस बात का सबूत है कि पुरुष का चरित्र समझ में नहीं आता। अगर स्त्री के चरित्र में गड़बड़ होती तो वेश्य बनाती, वेश्याएं नहीं। तो जैसे लाल बत्ती वाला मोहल्ला होता है स्त्रियों का, ऐसा लाल बत्ती वाला पुरुषों का मोहल्ला होता, जहां दादा, गुंडे, अखाड़ेबाज अपने-अपने दरवाजे के सामने दंड-बैठक लगाते हुए प्रदर्शन करते कि बाई, वहां कहां जा रही है, असली दादा यहां रहता! भुजाएं फड़काते। हनुमान जी का चालीसा पढ़ते। लंगोट लगा कर सड़कों पर कवायद करते। अगर स्त्री के चरित्र में कोई गड़बड़ होती तो उसने पुरुष वेश्याएं पैदा की होतीं। गड़बड़ तो पुरुष के चरित्र में मालूम होती है, क्योंकि स्त्री वेश्याएं पैदा क्यों हुईं? किसने पैदा कीं?
लेकिन पुरुष कुछ भी कहे, कहते हैं--वह मर्द बच्चा! पुरुषों का समाज है, पुरुषों की सत्ता है, इसलिए स्त्रियों पर जबरदस्ती तुमने थोप दी हैं चीजें। और फिर भी तुम कहते हो--इनका चरित्र समझ में नहीं आता! इनका चरित्र...तुमने इन्हें मौका ही कहां दिया कि अपना चरित्र निर्माण कर लें? तुमने इन्हें मौका ही कहां दिया, स्वतंत्रता कहां दी?
तुम्हारे शास्त्र कहते हैं कि जब लड़की छोटी हो तो बाप उसकी रक्षा करे। खयाल रखना, मां का नाम नहीं आता उसमें, सिर्फ बाप रक्षा करे। क्यों? छोटी बच्ची की मां रक्षा न करे? मां का क्या भरोसा--त्रिया चरित्रम्! बाप रक्षा करे। और जब लड़की बड़ी हो जाए, विवाहित हो जाए, तो पति रक्षा करे। और जब स्त्री बूढ़ी हो जाए तो उसका बेटा रक्षा करे।
यह बड़े मजे की बात है, रक्षा ही रक्षा हो रही है, तो खतरा किससे है? मतलब बाकी स्त्रियों से खतरा है? बचपन में बाप रक्षा करे, मतलब मां से खतरा है? जवानी में पति रक्षा करे, मतलब मोहल्ले की पत्नियों से खतरा है? बुढ़ापे में बेटा रक्षा करे, मतलब मोहल्ले की बुढ़ियों से, किससे खतरा है? खतरा है तो पुरुष से है। तो चरित्र किसका समझ में नहीं आता?
यह बकवास अब बंद होनी चाहिए। कनुलाल मेहता, मैं तो इससे राजी नहीं। भाग्य तो होता ही नहीं; ईजाद है पंडितों और पुरोहितों की--आदमी के शोषण के लिए। ईजाद है आदमी को सांत्वना देने के लिए। भाग्य के कारण ही इस देश में पांच हजार साल से हम गरीब हैं, गुलाम हैं, परेशान हैं, दुखी हैं, दीन हैं, दरिद्र हैं। भाग्य है! क्या कर सकते हैं! और स्त्री का चरित्र--यह भी पुरुषों का जाल है। स्त्री साफ-सीधी है। उसका अगर कोई कसूर है तो एक मैं मानता हूं और वह यह कि उसने पुरुष के मापदंड स्वीकार किए। इनकार कर देना चाहिए। उसे अपना चरित्र स्वयं खोजना चाहिए। उसे अपनी निजता की घोषणा करनी चाहिए।
और पुरुष को क्या जरूरत पड़ी कि स्त्री का चरित्र समझे? अपना ही समझे! अपना तो समझेंगे नहीं, स्त्री का चरित्र समझने चले हैं! स्त्री अपना समझ लेगी। कोई स्त्री नहीं कहती कि हमें पुरुष का चरित्र समझना है। क्या कचरे से लेना-देना है! उसे पता ही है इनका चरित्र, समझना क्या है! इनकी एक-एक हरकत से वाकिफ है। इनके हर रंग-ढंग से वाकिफ है। समझने जैसा क्या है इनमें! समझने को भी कुछ हो। मगर पुरुष को स्त्री का चरित्र समझना है। क्यों? उसका कारण तुम समझने की कोशिश करो।
पश्चिम के बहुत बड़े विचारक बेकन ने लिखा है: नालेज इज़ पावर। ज्ञान शक्ति है। जो चीज समझ में आ जाए, उसके हम मालिक हो जाते हैं। जब, बिजली कैसे चलती है, हमें समझ में आ गया, तो हम मालिक हो गए। जब तक नहीं समझ में आता था, तब तक बिजली चमकती आकाश में, आदमी घुटने टेक देते। हमारे ऋषि-मुनि का काम ही यह था कि बिजली चमके, जल्दी से घुटने टेकें, हवन-यज्ञ करें, इंद्र देवता को प्रसन्न करें--कि हे देवता, ऐसा न करना! हम से कुछ भूल-चूक हुई हो तो क्षमा करना! बिजली न चमकाओ! नाहक न धमकाओ! दुश्मनों पर गिराओ! अरे हम तो भक्त हैं, हम तो तुम्हारी हमेशा याचना के लिए तैयार खड़े हैं। सोमरस पीयो। विराजो। पधारो! पलक-पांवड़े बिछाते हैं। सोमरस यानी शराब, गांजा-भांग, अफीम। सोमरस पी लो, मगर शांत हो जाओ। मत बिजली चमकाओ।
लेकिन जिस दिन आदमी समझ गया बिजली का राज, उसी दिन बिजली पर काबू हो गया। अब कोई इंद्र देवता की प्रार्थना नहीं करता। बटन दबाई, और इंद्र देवता बेचारे पंखा चला रहे हैं। बटन दबाई, इंद्र देवता बल्ब में लटके हुए हैं, उलटे लटके हुए हैं! रात भर लटके हुए हैं! जो चाहो करवाओ। रेलगाड़ी चलवाओ। यह हवाई जहाज चल रहा है, अगर यह हवाई जहाज ऋग्वेद के समय में चलता, एकदम ऋषि-मुनि गिर पड़ते अपने घुटनों पर कि आ गए इंद्र देवता! यह गर्जन, यह तर्जन, देखते हैं! मगर अब हम जानते हैं। तुम हंस रहे हो! ऋषि-मुनि होते तो रोते!
स्त्री के चरित्र को समझने की जरूरत क्या है? क्योंकि स्त्री पर कब्जा करना है। हम जिस चीज को समझना चाहते हैं उसका कारण ही कुल इतना होता है कि ज्ञान से शक्ति आती है। समझ लिया कि फिर मालिक हो गए। स्त्री के मालिक होना है, सब तरह से मालिक होना है। इतनी मालकियत, लेकिन फिर भी पक्का भरोसा नहीं। तो आदमी जासूसी करता रहता है। दफ्तर से जल्दी आ जाएगा, खिड़की में से झांक कर देखेगा कि कहीं त्रिया चरित्र, अरे क्या भरोसा, किसी से गुफ्तगू कर रही हो! घर में आकर चारों तरफ देखेगा--पहला काम। किसी के जूते दिखाई पड़ जाएं, किसी की छतरी दिखाई पड़ जाए, किसी की टोपी टंगी दिखाई पड़ जाए।
स्वर्ग के दरवाजे पर तीन आदमी एक साथ पहुंचे। सेंट पीटर ने, जो वहां के पहरेदार हैं... ईसाई स्वर्ग रहा होगा। कई दरवाजे हैं। तीनों ईसाई थे पहुंचने वाले, इसलिए ईसाई दरवाजे पर पहुंचे। पहले से पूछा कि भाई, अभी तो तुम्हारे आने की कोई बात न थी, कैसे अचानक आ गए? अभी तुम्हारी उम्र पूरी हुई नहीं।
उस आदमी ने कहा कि मैं अपने घर आया, देखा कि पत्नी बिस्तर पर लेटी है और उसके तकिए के ऊपर बगल में ही एक सिर का और चिह्न बना हुआ है। गङ्ढा बना है तकिए पर। शक पैदा हो गया। मैंने पूछा, यह आदमी कहां है? वह कहने लगी, कहां का आदमी? कैसा आदमी? अरे तुम भी क्या बातें करते हो! मैंने करवट ली होगी तो मेरे ही सिर का निशान बन गया होगा। मगर वह निशान जाहिर था कि दूसरे का ही है। बिस्तर पर भी सलवटें थीं। नीचे झांक कर देखा तो जूते भी थे। फिर तो शक बढ़ गया। फिर मेरा दिमाग एकदम भन्ना गया। फिर मैं भागा, सारे मकान को ढूंढ डाला। यह खिड़की खोली, वह दरवाजा खोला, यह अलमारी खोली, वह अलमारी खोली। ऐसा क्रोध चढ़ा कि चीजें तोड़-फोड़ दीं, बर्तन गिरा दिए। चौंके में पहुंचा, फिर भी कुछ किसी का कहीं कोई पता नहीं। एकदम गुस्से में आकर रेफ्रिजरेटर को सरका कर सातवीं मंजिल से नीचे गिरा दिया। रेफ्रिजरेटर सरका कर गुस्से में गिरा तो दिया, मगर वजनी था, कि मेरा हार्टफेल हो गया।
दूसरे से पूछा कि भाई, तुम यहां कैसे आए?
उसने कहा, मैं भी क्या बताऊं! मैं तो रास्ते से चला जा रहा था कि एकदम रेफ्रिजरेटर मेरे ऊपर गिरा। बचने का मौका ही नहीं मिला। सोचने का भी मौका नहीं मिला। चट मंगनी पट ब्याह हो गया। जब आंख खुली तो यहां खड़ा पाया।
तीसरे से पूछा, तुम्हारी क्या कथा है?
उसने कहा, मैं भी क्या करूं! मैं कुछ कर ही नहीं रहा था। मैं तो सिर्फ रेफ्रिजरेटर के भीतर खड़ा हुआ था। यह हरामजादा आया और इसने एकदम से सात मंजिल से गिरा दिया। मैं तो शांति से बिलकुल ध्यान-मग्न; जिंदगी में पहली बार तो निर्विचार हुआ था, पहली दफे तो समाधि का थोड़ा सा रस आ रहा था, यह कमबख्त आ गया। मैंने किसी का कुछ बिगाड़ा ही नहीं था, सिर्फ रेफ्रिजरेटर में खड़ा था। अब आदमी को कहीं न कहीं तो होना ही पड़ेगा। अरे कोई कहीं तो खड़ा होगा ही।
आदमी घर आता है तो पता लगाता रहता है, उसकी आंखें तलाश करती रहती हैं--कि कहीं स्त्री प्रसन्न तो नहीं दिखाई पड़ रही! कहीं घर में कोई ऐसा जरा सी भी आहट मिल जाए। दफ्तर में भी बैठा यही विचार करता रहता है कि घर क्या हो रहा है! त्रिया चरित्र! और खुद? खुद श्रीमद्भगवद् गीता में कोकशास्त्र छिपा कर पढ़ता रहता है। वह भी त्रिया चरित्र समझने को। ऐसा कुछ...नहीं तो कोकशास्त्र से उसको क्या करना है? त्रिया चरित्र समझने को कोकशास्त्र पढ़ता है। त्रिया चरित्र समझने को महर्षि वात्स्यायन के काम-सूत्र पढ़ता है। त्रिया चरित्र समझने को फिल्में देखने जाता है। त्रिया चरित्र समझने को वेश्याओं के घर जाता है। त्रिया चरित्र समझ कर ही रहेगा! मगर किसलिए? तुम्हारा त्रिया ने क्या बिगाड़ा? अरे तुरीय समझो न, क्या त्रिया समझ रहे हो! ये तीन में ही तो तेरह हो गए, तीन तेरह हो गए, अब चौथे को ही समझो।
चौथे को समझना हो तो स्वयं को समझना होता है। मैं यह बात ही नहीं सोच पाता कि क्यों कोई किसी का चरित्र समझे! अपने को ही समझे।
मगर दूसरे के चरित्र में रस है, क्योंकि दूसरे पर कब्जा करना है। और तुम समझ लो तो मालिक हो जाते हो। रहस्य का कोई मालिक नहीं हो सकता। इसलिए पुरुष की आकांक्षा तो प्रकट होती है, कनुलाल मेहता, इस सूत्र में, और कुछ भी नहीं।
और: देवो न जानाति कुतो मनुष्यः!
और फिर कहा जाता है कि देव भी नहीं जानते त्रिया का चरित्र।
कौन देव? कैसे देव? उनकी जरा कथाएं तो उलट-पलट कर देखो। अगर मैं उनको ठीक-ठीक वर्णन करूं तो नाराज न होना। नहीं तो कई लोग कहते हैं: हमारी भावनाओं को ठेस पहुंच गई। अब मैं क्या करूं, तुम्हारे देवता ही ऐसे हैं, इसमें मेरा क्या कसूर? अपने देवताओं से कहो कि भैया, तुम अपना चरित्र जरा ठीक करो, कि तुम्हारे ऐसे चरित्र के कारण यह आदमी उलटी-सीधी बातें कह देता है, उससे हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचती है! और यह मानेगा नहीं जब तक तुम चरित्र ठीक न करोगे।
मगर देवताओं के चरित्र से तुम्हें कोई चिंता नहीं पैदा होती। ये क्या खाक देवता समझेंगे! ये खुद ही स्त्रियों के पीछे दीवाने हुए घूमते हैं। कोई ऋषि-मुनि बेचारे ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने गए, उनकी स्त्रियों को धोखा दे जाते हैं। ये देवता हैं तुम्हारे! थोड़ी शर्म भी खाओ! फिर लुच्चे-लफंगे किसको कहोगे? कम से कम इतना तो करो कि ऋषि-मुनियों की स्त्रियों को तो न सताओ! वे बेचारे ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने गए। पहले तो उनको समझा दिया इन्हीं देवताओं ने कि ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करो, ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करना बहुत ही अच्छा है। मतलब तुम समझो कि क्यों ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करो? कि मुंह अंधेरे तुम घर के बाहर जाओ तो ये घर के भीतर आएं। और देवता हैं और अंधेरा, सो देवता धोखा दे देते हैं। और देवता हैं, इनकी शक्तियों का तो क्या कहना, चमत्कार ही चमत्कार! पति बन कर चले आते हैं! और पत्नियां धोखा खा जाती हैं। बेचारी अब पत्नियां करें भी क्या, जब पति ही सामने खड़े हों। और फिर यही देवता कहेंगे कि त्रिया का चरित्र समझ में नहीं आता।
अहिल्या को इसी तरह एक देवता ने भ्रष्ट किया। लेकिन मजा तुम देखते हो, जब अहिल्या का पति, ऋषि वापस लौटा, तो उसने देवता को श्राप नहीं दिया, अभिशाप नहीं दिया। यह कैसी बेईमानी है! अभिशाप दिया अहिल्या को कि जा पत्थर हो जा! यह कैसा न्याय? बेईमानी की थी किसी देवता ने, धोखा दिया था किसी देवता ने, बदमाशी की थी किसी देवता ने, कोई देवता गुंडा साबित हुआ था, मगर दोष स्त्री का है! पुरुषों के बीच एक सांठ-गांठ है। देवता को तो दोष देना ही नहीं। स्त्री पत्थर हो गई।
और फिर यह स्त्री भी, राम का चरण जब इसे स्पर्श होगा, तब मुक्त होगी अभिशाप से। क्यों? सीता के पैर से नहीं हो सकता था यह काम? सीता मइया भी पीछे-पीछे चली आ रही थीं। यह रामचंद्र जी के चरण में ऐसी क्या खूबी है? रामचंद्र जी के ही पैर को छूकर क्यों? पहले तो एक देवता भ्रष्ट कर गया, वह भी पुरुष। छुड़ाएगा भी पुरुष ही!
इतना तो करते कम से कम, चलो अहिल्या पर नाराज हो गए थे, पत्नी पर, देवता से डरे होंगे, ऋषि-मुनि थे, कि देवता और कहीं नाराज न हो जाए, बिजली न कड़काए, बादल न भेज दे, कुछ उपद्रव न मचाए, तो जो गरीब है, जो कमजोर है, उसकी गर्दन पकड़ लो। पकड़ ली स्त्री की गर्दन, इसको पत्थर बना दिया। मगर अब तो कम से कम थोड़ा खयाल रखना था कि इसको फिर किसी पुरुष से ही मुक्ति न दिलवाओ। वह भी राम का ही पैर पड़ेगा तो!
और राम का व्यवहार स्त्रियों के साथ अच्छा नहीं है। मर्यादा पुरुषोत्तम होंगे, मगर स्त्रियों को कतई उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं मानना चाहिए। क्योंकि सीता को जब लंका से वे छीन कर लाए तो जो पहले शब्द सीता से बोले, अभद्र हैं। पहले शब्द उन्होंने ये कहे कि सीता, यह तू जान रख, ऐ औरत तू ठीक से पहचान ले कि मैंने तेरे लिए युद्ध नहीं किया है। यह तो अपने वंश की प्रतिष्ठा के लिए युद्ध किया है। यह तो अपने कुल की प्रतिष्ठा के लिए युद्ध किया है। हम जैसे पुरुष स्त्रियों के लिए नहीं लड़ते। अरे स्त्री तो पैर की जूती है, स्त्री के लिए कौन लड़ता है!
यह कोई बात थी? यह कोई स्वागत करने का ढंग था? वर्षों तक यह सीता प्रतीक्षा करती रही इस व्यक्ति की, जो इस बेहूदे ढंग से स्वागत करेगा! और फिर इसकी अग्नि-परीक्षा ली गई। वह भी स्त्री की! कम से कम इतना तो भलेमानस को सोचना था कि जब विवाह किया था तो दोनों ने फेरे लगाए होंगे साथ-साथ। आगे-आगे पति चले होंगे, पीछे-पीछे पत्नी चली होगी। अग्नि-परीक्षा हुई थी तो दोनों को साथ-साथ निकलना था, आगे-आगे पति, पीछे-पीछे पत्नी। दोनों की ही परीक्षा हो जानी थी। क्योंकि स्त्री भी इतने दिन दूर रही थी, पता नहीं त्रिया चरित्र! मगर ये सज्जन भी तो इतने दिन दूर रहे थे, क्या पता इनके चरित्र का!
मेरे एक मित्र हैं--डाक्टर नावलेकर। उन्होंने एक अदभुत किताब लिखी है: ए न्यू एप्रोच टु रामायण। बड़ी हिम्मतवर किताब है। उन्होंने यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि राम का शबरी से प्रेम था।
शक मुझे भी होता है। पक्का मैं नहीं कह सकता, क्योंकि मुझे राम में इतना रस नहीं है, इसलिए मैंने कोई खोजबीन की नहीं। रस ही नहीं है, क्यों समय खराब करूं? लेकिन शक मुझे भी होता है। क्योंकि सिर्फ प्रेमी ही एक-दूसरे की झूठी चीजें खा सकते हैं। नहीं तो कौन किसकी झूठी चीज खाए? कोई औरत तुम को जूठा बेर करके दे, तुम फौरन कहोगे: ऐ बाई, यह क्या करती है? अरे देना किसी और को। अपने घरवाले को देना! कोई जूठा खा सकता है केवल तभी जब प्रेम हो, बहुत प्रेम हो।
नावलेकर ने तो बहुत प्रमाणों से सिद्ध करने की कोशिश की है कि शबरी से प्रेम था। नावलेकर की तो यह भी मान्यता है कि राम का सोने के मृग को खोजने जाना वस्तुतः सप्रयोजन था। नहीं तो राम क्या इतने बुद्धू हैं कि सोने के मृग को खोजने जाएं?
बात तो सोचने जैसी है। तुम को भी रास्ते में अगर सोने का मृग दिखाई पड़ जाए, तो माना कि तुम महाबुद्धू हो, फिर भी तुम इतना समझोगे कि कहीं सोने का मृग होता है! होता ही नहीं सोने का मृग। और सोने का मृग हो भी तो किसी ने पेंट किया होगा, पोत दिया होगा ऊपर से रंग। लगता है स्वर्ण का, स्वर्ण का हो कैसे सकता है? और सोने का हो तो चलेगा, भागेगा, लौट-लौट कर रामचंद्र जी को देखेगा? सोने का मृग और रामचंद्र जी धोखा खा गए! हद हो गई। और यूं तो ज्ञानी समझाते हैं कि यह जगत मृग-मरीचिका है और राम सोने के मृग की मरीचिका में आ गए!
नावलेकर का कहना है: यह सब जालसाजी है। यह सीता चोरी चली जाए, इसका आयोजन है। क्योंकि सीता के रहते शबरी से कैसे संबंध बने? वह सीता मइया पीछे ही लगी हैं।
मैं नहीं जानता कहां तक यह बात सच है, कहां तक झूठ है। मगर कुछ भी हो, राम को भी परीक्षा देनी चाहिए थी। हमेशा स्त्री-पुरुष के साथ समतौल व्यवहार होना चाहिए। परीक्षा भी ले ली अग्नि की, सीता उसमें से बच कर भी निकल आई, सबूत भी मिल गया।
एक तो मैं ऐसा मानता नहीं कि अग्नि कोई फर्क करेगी। तुम खुद ही प्रयोग करके देख सकते हो। जैसे मैं तुमसे पूछूं, दो और दो कितने? तुम कहो, चार। सच बोल रहे हो न? अब जरा अंगारा हाथ में रखो। झूठ तो तुम बोले नहीं, कोई भी नहीं कहेगा कि झूठ बोले, दो और दो चार। मैं तुमसे पूछूं, घड़ी में कितने बजे? तुम कहो कि सवा नौ। मिनट, सेकेंड बता दो। कोई झूठ तो नहीं बोल रहे। उठाओ अंगारा हाथ में, अगर न जलो तो मैं समझूं कि सत्य के लिए अग्नि भेद कर देती है। और फिर तुम कहो दो और दो पांच और जल जाओ। इतना सीधा सा प्रयोग है, करके घर में देख लेना।
अग्नि की परीक्षा, पहले तो बात ही गलत है। मगर अभी भी इस तरह की मूढ़ता चलती है। अभी चार दिन पहले मैंने अखबारों में पढ़ा कि एक स्त्री को शक हो गया कि उसके घर में जो नौकरानी है--लड़की, जो बर्तन वगैरह साफ करती, गरीब--उसने चोरी कर ली है। घड़ी चोरी चली गई है। वह उसको लेकर मंदिर पहुंच गई। मंदिर के पुजारी ने कहा, परीक्षा ले लो। वह लड़की कह रही है कि मैंने नहीं चुराई है। चूंकि गरीब लड़की है, उसको पक्का भरोसा ही है कि उसने चुराई नहीं है। तो उसने कहा, फिर जलते हुए, उबलते हुए तेल में हाथ डाल दे! भीड़ इकट्ठी हो गई। अग्नि-परीक्षा शुरू। और लड़की को पक्का था कि उसने चुराई ही नहीं है इसलिए उसने तेल में हाथ डाल दिया। हाथ जल गया। हाथ जल गया तो सिद्ध हो गया कि इसने चुराई है। और लड़की कहती रही कि मैंने नहीं चुराई है। और निश्चित है कि उसने नहीं चुराई, नहीं तो वह हाथ डालने में डरती। सीधी-सादी, भोली-भाली लड़की। सोचा होगा उसने कि जब सीता बच गई अग्नि-परीक्षा में तो तेल मुझे ही क्यों जलाएगा जब मैंने चुराई ही नहीं है?
मगर ये मूर्खतापूर्ण बातें हैं। इन मूर्खतापूर्ण बातों को कितना ही तुम बल दो, कितना ही समर्थन जुटाओ, ये ताश के पत्ते हैं, जरा से हवा के झोंके में गिर जाएंगे। मगर इसी तरह की मूर्खतापूर्ण बातों पर इस देश की पूरी की पूरी बुनियादें रखी हैं।
राम को भी जाना था! मगर राम होशियार और त्रिया चरित्र समझ में आता नहीं। राम जानते होंगे कि गए कि जले। और सोचते होंगे--सीता जल ही जाए तो झंझट मिटे। तो लेकर शबरी को अयोध्या नगरी पहुंच जाएं। मगर सीता बच गई।
अब पता नहीं कैसी अग्नि-परीक्षा थी! यूं ही रही होगी जैसी सरकस वगैरह में होती है। स्प्रिट वगैरह से जलाई गई होगी, जिसमें से आदमी निकल सकता है। तुमने सरकस में देखा होगा। स्प्रिट से जलाई जाती है आग, उसमें से छलांग लगा कर निकल सकते हो। यह कोई असली अग्नि नहीं रही होगी। कुछ न कुछ धोखाधड़ी है, कहीं न कहीं कोई न कोई चार सौ बीसी है। आग नियम नहीं बदलती। प्रकृति के नियम निरपवाद हैं।
और फिर भी समझ लो कि अग्नि से यह बच गई थी, तो एक धोबी ने कह दिया, संदेह कर दिया, अपनी पत्नी से कह दिया कि तू रात भर कहां रही? त्रिया चरित्र समझ में ही नहीं आता कि रात भर कहां रही!
अरे रात भर कहीं भी रही हो, त्रिया चरित्र समझ में तो आ ही जाना चाहिए!
चंदूलाल मुझसे कह रहे थे कि मेरी स्त्री बड़ी धोखेबाज है, बड़ी बेईमान है।
मैंने कहा, तुम्हें कैसे पक्का भरोसा हुआ?
उसने कहा, कल रात कहने लगी...मैंने पूछा, कहां रही रात भर? कहने लगी, अरे कहीं नहीं, अपनी सहेली कमला के यहां रुक गई थी। बिलकुल झूठ बोल रही है।
मैंने कहा, चंदूलाल, तुम्हें कैसे पक्का हुआ कि झूठ बोल रही है?
उसने कहा, पक्का झूठ है, क्योंकि कमला के पास तो रात भर मैं था। हरामजादी बिलकुल झूठ बोल रही है! चरित्र तो है ही नहीं। पुरुषस्य भाग्यं त्रिया चरित्रम्--कहने लगे चंदूलाल--देवो न जानाति कुतो मनुष्यः! अरे क्या मनुष्य का वश। क्या चंदूलाल बेचारा जान पाए! देवों को भी समझ में नहीं आता। अब यह देखो दुष्ट बिलकुल झूठ बोल रही है, सरासर झूठ बोल रही है। रात भर मैं कमला के पास रहा, और यह बता रही है मैं कमला के यहां रुकी थी।
धोबी ने कह दिया कि तू रात भर कहां रही? मैं कोई राम नहीं हूं कि तुझे घर में रख लूं।
बस यह बात काफी हो गई, यह पर्याप्त हो गई, अग्नि-परीक्षा व्यर्थ हो गई। और सीता को निकाल बाहर कर दिया। बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताए गर्भवती स्त्री को घर के बाहर फेंक दिया। यह कुछ बात समझ में तुम्हें आती है? यह त्रिया चरित्र में गड़बड़ है या यह तुम्हारे तथाकथित पुरुष के चरित्र में गड़बड़ है?
यह पुरुष चरित्र कुछ भ्रांतियों पर खड़ा हुआ है। एक तो पुरुष का अहंकार, दंभ। वही दंभ बोला कि मैंने अपने वंश की परंपरा के बचाने के लिए तुझे बचाया है, तुझे बचाने के लिए युद्ध नहीं किया है। वही दंभ अग्नि-परीक्षा लिया। वही दंभ एक धोबी के कह देने से...। अगर यूं ही था कि धोबी ने कहा था, तो खुद भी चले जाते कि ठीक है, क्या ऐसे लोगों पर समय खराब करना जिनको मुझ पर भरोसा न हो। क्योंकि उस धोबी ने सिर्फ सीता पर ही तो शक नहीं किया था, उस धोबी ने असल में राम पर शक किया था। बात तो साफ है। उसने यह कहा था: मैं कोई राम नहीं हूं कि तुझे घर में रख लूं! उसका संदेह किस पर था--सीता पर या अपने पर? वह यह कह रहा था कि मैं कोई राम नहीं हूं, तू मुझे राम जैसा गया-बीता न समझ कि तुझे घर में रख लूंगा। संदेह तो उसने राम पर उठाया था। राम तो घर में ही रहे, सीता को निकाल बाहर कर दिया।
ये सब पुरुषों के द्वारा रची गई कथाएं!
रावण की बहन शूर्पणखा ने लक्ष्मण से निवेदन किया कि मुझे तुमसे प्रेम है, मैं विवाह कर लूं। लक्ष्मण जी ने आव देखा न ताव, बड़े भैया की आज्ञा ली कि काट दूं नाक? और बड़े भैया बोले, काट दे, क्या देखता है, लक्ष्मण दास! काट दे नाक!
अब इसमें नाक काटने का क्या सवाल था? क्योंकि हर किसी को हक है। ये दोनों भैया जब गए जनकपुरी और सीता को इन्होंने बगीचे में फूल चुनते देखा, तो दोनों ललचा गए थे। इनकी क्या नाक काटनी थी? दोनों मोहित हो गए थे। इनके मोहित होने का वर्णन खूब रस ले-ले कर कवियों ने किया है।
लेकिन इस स्त्री की क्या भूल थी? इससे इतना ही कह सकते थे कि क्षमा करो, मैं विवाहित हूं! नाक काटने का क्या सवाल था? मैं कई दफे सोचता हूं कि नाक काटने की बात क्यों उठती है? मगर स्त्री है। स्त्री के साथ जो भी दर्ुव्यवहार करो, सब ठीक है। काट दो नाक!
यह भी मैं सोचता हूं कि यह स्त्री जरूर बहुत सुंदर रही होगी। रावण की बहन थी, राजकुमारी थी। अलमस्त, अल्हड़ थी। यही तो कसूर था रावण का और रावण के आस-पास जो लोगों का समूह था उसका--कि वे अलमस्त लोग थे, फक्कड़ लोग थे, ज्यादा आदिम लोग थे। और ये तथाकथित ऋषि-मुनि ईसाई मिशनरियों जैसे थे। ये उनको जबरदस्ती आचरण सिखा रहे थे, उनका अल्हड़पन नष्ट कर रहे थे। और उनकी ही रक्षा के लिए राम को बुलाया गया था। यूं समझो कि वे राम के एजेंट थे--वे सब जो ऋषि-मुनि थे, वशिष्ठ इत्यादि। उनका धंधा यह था कि दक्षिण में जाकर लोगों को वैदिक धर्म में दीक्षित करना।
लेकिन दक्षिण ऐसा मालूम होता है ज्यादा स्वतंत्र था। नहीं तो कोई युवती आकर लक्ष्मण से सीधा निवेदन करे! जाहिर है कि स्वतंत्रता थी, स्त्री और पुरुष के बीच एक समानता थी। उसने कुछ बुराई तो न की थी। इतना ही कहा था कि मैं प्रेम का निवेदन करती हूं, मुझसे विवाह कर लो। मना कर देना था कि मैं पहले से ही विवाहित हूं, क्षमा करो।
लेकिन नाक काटी, इससे मुझे यह शक होता है कि स्त्री बहुत सुंदर रही होगी। और राम ने भी हां भर दी कि काट ही ले नाक। इससे मुझे यह भी साफ होता है कि दोनों को सुंदर लगी होगी। इसके सौंदर्य को नष्ट ही कर दो, नहीं तो खतरा है। खुद के भीतर कहीं खतरा छिपा होगा। वह हम अपना दोष दूसरे पर थोपते हैं।
कनुलाल मेहता, मैं तो कुछ ऐसा नहीं देखता कि स्त्री के चरित्र में कुछ भूल है। अगर भूल है तो वह पुरुष के द्वारा आरोपित चरित्र के कारण है। मैं एक ऐसी दुनिया देखना चाहता हूं जहां स्त्री अपने ढंग से जीए, पुरुष अपने ढंग से जीए। अगर दोनों का मिलन हो जाए तो ठीक। लेकिन मिलन का मतलब गुलामी न हो। मिलन का मतलब मैत्री हो। न कोई पति हो, न कोई पत्नी हो; मित्रता पर्याप्त है। पति का मतलब होता है: मालिक। मालकियत का रिश्ता कोई रिश्ता नहीं है। मालकियत का रिश्ता अपमानजनक है। और स्त्री को जानने की चेष्टा में उसी मालकियत को मजबूत करने का उपाय है।
और किन देवताओं की तुम बात कर रहे हो? देवता कहीं होते हैं? सिर्फ कल्पनाएं हैं। लेकिन तुमने जिन देवताओं की कल्पनाएं की हैं, वे तुम्हारे भीतर की वासनाओं के सबूत हैं। तुम जो नहीं कर सकते हो, वही तुमने देवताओं से करवा लिया है। वह प्रक्षेपण है। जो तुम करना चाहते हो और नहीं कर सकते हो, वह देवताओं से करवा लिया है। देवता तुम्हारी वासनाओं के साकार रूप हैं। देवता कहीं हैं ही नहीं।
और मनुष्य अपने को समझे, अपने को जाने; किसी दूसरे को न समझने की कोई जरूरत है, न जानने की कोई जरूरत है।
और मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा: जिसने अपने को जाना उसने सबको जाना। जिसने अपने को पहचाना उसने सबको पहचाना। जिसने अपने को पा लिया उसने इस जगत में जो भी पाने योग्य है सब पा लिया। उसके लिए कुछ और पाने को शेष नहीं रह जाता है।
खुदा जाने कहां है असगरे-दीवाना बरसों से
कि जिसको ढूंढते हैं काबा-ओ-बुतखाना बरसों से
तड़पना है न जलना है, न जल कर खाक होना है
ये क्यों सोई हुई है फितरते-परवाना बरसों से
कोई ऐसा नहीं या रब कि जो इस दर्द को समझे
नहीं मालूम क्यों खामोश है दीवाना बरसों से
कभी सोजेत्तजल्ली से उसे निस्बत न थी गोया
पड़ी है इस तरह खाकिस्तरे-परवाना बरसों से
हसीनों पर न रंग आया, न फूलों पर बहार आई
नहीं आया जो लब पर नग्मा-ए-मस्ताना बरसों से
जिसे लेना हो आकर उससे अब दर्से-जुनूं ले ले
सुना  है  होश  में  है  असगरे-दीवाना  बरसों  से
कनुलाल मेहता, यहां आ गए हो। यह दीवानों की बस्ती है--पागलों की, मस्तों की! यहां से थोड़ी पीकर लौटो। थोड़ा स्वयं को जानने का सूत्र लेकर लौटो।
खुदा जाने कहां है असगरे-दीवाना बरसों से
कि जिसको ढूंढते हैं काबा-ओ-बुतखाना बरसों से
नहीं मिलेगा मंदिरों और मस्जिदों में। मंदिर-मस्जिद खुद उसको खोज रहे हैं।
तड़पना है न जलना है, न जल कर खाक होना है
और यह क्या हो गया है आदमी को?
तड़पना है न जलना है, न जल कर खाक होना है
ये  क्यों  सोई  हुई  है  फितरते-परवाना  बरसों  से
यह परवाने को क्या हो गया? जलना ही भूल गया।
जो स्वयं को जानता है, वह परवाना अपने ही भीतर की शमा के पास आ जाता है। जो स्वयं को पहचान लेता है, वह परवाना अपनी ही शमा में जल कर राख हो जाता है। अहंकार मिट जाता है। और तभी स्वयं का बोध, स्वयं की अनुभूति प्रकट होती है।
नहीं मालूम क्यों खामोश है दीवाना बरसों से
कोई ऐसा नहीं या रब कि जो इस दर्द को समझे
नहीं  मालूम  क्यों  खामोश  है  दीवाना  बरसों  से
क्या हो गया आदमी को? क्यों यह खामोशी है? क्यों यह खोज नहीं? क्यों जुस्तजू खो गई है? क्यों आदमी ने अपने को खोजना बंद कर दिया है?
कभी सोजेत्तजल्ली से उसे निस्बत न थी गोया
पड़ी है इस तरह खाकिस्तरे-परवाना बरसों से
हसीनों पर न रंग आया, न फूलों पर बहार आई
नहीं आया जो लब पर नगमा-ए-मस्ताना बरसों से
जब तक तुम्हारे ओंठों पर मस्ती का नग्मा न आ जाए...और यह तभी आ सकता है जब अपने को जान लो। यह भीतर का झरना फूटे तो ही अमृत, तो ही गीत, तो ही मस्ती। तो तुम्हारे भीतर से ऋचाएं उठें! तो तुम्हारे भीतर से सूत्र जगें, शास्त्रों का जन्म हो! तुम्हारे कंठ से वेद फूटें!
हसीनों पर न रंग आया, न फूलों पर बहार आई
नहीं आया जो लब पर नगमा-ए-मस्ताना बरसों से
आदमी की जिंदगी में न अब फूल हैं, न रंग है। यूं जैसे कि आदमी के पंख टूट गए। जैसे आदमी परवाज भूल गया, उड़ना ही भूल गया। यह क्या हो गया है?
हम औरों को समझने में लग गए। कोई पदार्थ को समझ रहा है, कोई समाज को समझ रहा है, कोई धर्मशास्त्र को समझ रहा है, कोई स्त्रियों को समझने में लगा है। कोई किसी को समझ रहा है, कोई किसी को समझ रहा है। लेकिन कोई अपने को नहीं समझ रहा।
कनुलाल मेहता, यहां आ गए हो तो कुछ अपनी खोज की प्यास लेकर जाओ।
जिसे लेना हो आकर उससे अब दर्से-जुनूं ले ले
जिसे लेना हो मुझसे थोड़ा सा पागलपन ले ले, थोड़ा सा उन्माद, थोड़ी सी मस्ती ले ले।
जिसे लेना हो आकर उससे अब दर्से-जुनूं ले ले
सुना  है  होश  में  है  असगरे-दीवाना  बरसों से
बहुत दिनों से मैं दीवाना हूं और बहुत दिनों से मैं होश में हूं। जिसको यह होश लेना हो, यह बेहोशी लेना हो--ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं--उसे निमंत्रण है! औरों को समझना छोड़ो, अपने को समझने की शुरुआत करने का समय आ गया है।

आज इतना ही।

वच वच वच