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शनिवार, 15 अप्रैल 2017

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-प्रवचन-10

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-ओशो

दिनांक 10-फरवरी, सन् 1981,
ओशो आश्रम, पूना।
प्रवचन-दसवां-(अपने ही प्राणों को पढ़ो)


     प्रश्न-सार


*     जब-जब  आया  द्वार  तिहारे, बस  खाली  हाथ  चला।
      फूल न लगा एक हाथ भी, मन का माली साथ चला।
      तेरे  दया  भंडार  में  मेरे  लिए  ही  कुछ  कम  है।
      हाथ  पसारे  दुआ  मांगते  अब  मेरी  आंखें  नम  हैं।
      अब  तक  न  की  दया  मुझ  पे, बस  इतना  सा  गम  है।
      दया के सागर से अपनी ले, खाली प्याली साथ चला।
      जब-जब  आया  द्वार  तिहारे, बस  खाली  हाथ  चला।

*     अतीत के सभी ज्ञानी, जिनमें पिछली सदी के परमहंस रामकृष्ण को भी सम्मिलित करना
      उचित होगा, स्त्री के बहुत विरोध में थे। इसका क्या कारण हो सकता है? क्या ज्ञानोपलब्धि
      के बाद भी कुछ अतीत के संस्कार शेष रह जाते हैं?


पहला प्रश्न: भगवान,
जब-जब आया द्वार तिहारे, बस खाली हाथ चला।
फूल न लगा एक हाथ भी, मन का माली साथ चला।
तेरे दया भंडार में मेरे लिए ही कुछ कम है।
हाथ पसारे दुआ मांगते अब मेरी आंखें नम हैं।
अब तक न की दया मुझ पे, बस इतना सा गम है।
दया के सागर से अपनी ले, खाली प्याली साथ चला।
जब-जब  आया  द्वार  तिहारे, बस  खाली  हाथ  चला।

भगवानदास आर्य,
द्वार आना इतना आसान तो नहीं। और द्वार जो आ जाए, खाली हाथ जाता नहीं--जा सकता नहीं। तुम आए भी, गए भी; मगर न तो आए, न खुले। बंद-बंद, अपनी धारणाओं, अपने तथाकथित ज्ञान से इतने दबे हो कि मैं जो कहता हूं वह तुम्हें सुनाई भी नहीं पड़ता। तुम्हारे हाथ पहले ही इतने भरे हैं कि मैं जो भेंट दूं उसके लिए अवकाश भी नहीं है।
झेन फकीर रिंझाई के जीवन में यह प्यारा उल्लेख है कि एक बहुत बड़े पंडित ने, पहाड़ी चढ़ कर लंबी यात्रा की रिंझाई के झोपड़े तक। थक गया था, पसीने से चेहरा तमतमा रहा था, सांस भर आई थी, चढ़ाई बड़ी थी। और जब रिंझाई के झोपड़े में प्रविष्ट हुआ तो उसने पूछा, जानना चाहता हूं--ईश्वर है या नहीं? आत्मा है या नहीं? ध्यान क्या? समाधि क्या? बुद्धत्व की, संबोधि की घटना क्या? यूं प्रश्नों की कतार लगा दी।
रिंझाई ने प्रश्न सुने, थोड़ा हंसा और कहा कि थक गए हैं आप। थोड़ा विश्राम कर लें। मैं एक कप चाय बना लाऊं। चाय पी लें, फिर पीछे बातें हो लेंगी।
और रिंझाई ने चाय बनाई, चाय लेकर आया। हाथ में पंडित को प्याली दी और प्याली में चाय ढालनी शुरू की तो ढालता ही गया। प्याली पूरी भर गई। साथ की बसी भी भर गई। और अब और एक बूंद कि चाय फर्श पर गिरनी शुरू हो जाएगी--कि पंडित चिल्लाया, अब रुको भी, क्या पागल हो! मेरी प्याली में जगह तो जरा भी नहीं और तुम हो कि चाय ढाले ही चले जाते हो।
रिंझाई ने कहा, मैं तो सोचता था तुम निपट पंडित हो, लेकिन थोड़ी अक्ल तुम में भी है। इतना तुम भी समझ पाते हो कि प्याली अगर पूरी भरी हो तो उसमें एक बूंद चाय और नहीं डाली जा सकती। क्या मैं तुमसे पूछूं, तुम्हारे भीतर की प्याली खाली है जिसमें तुम ईश्वर को समा सकोगे? क्या तुम्हारे भीतर का आकाश तैयार है जहां बुद्धत्व के सूर्य को उगा सकोगे? क्या तुम्हारे भीतर जरा सी भी जगह है कि एक बूंद भी समाधि प्रवेश कर जाए? मैं देखता हूं तुम इतने कचरे से भरे हो, इतने ज्ञान--थोथे, उधार, बासे ज्ञान से। और सब बासा ज्ञान कचरा है, कि इस कचरे में कहां समाधि? कहां संबोधि? कहां बुद्धत्व? कैसा बुद्धत्व? मैं तुम्हें उत्तर दूं तो क्या दूं? उत्तर लेने वाला तैयार कहां है?
और यही मैं तुम्हारे संबंध में पाता हूं, भगवानदास आर्य। यह तुम्हारे नाम के पीछे लगी "आर्य' की पूंछ काफी खबर देती है, प्याली भरी है। यह क्या आर्य और अनार्य का झगड़ा बना रखा है? आर्य शब्द का अर्थ होता है: श्रेष्ठ। यह अहंकार, यह अस्मिता, यह श्रेष्ठ होने का दंभ, इतना तुम्हें भरे हुए है कि मैं तो तैयार हूं सब देने को, मगर तुम लेने को तैयार कहां! हां, तुम वह लेना चाहते हो जो तुम्हारे पक्षपातों के अनुकूल हो, सत्य नहीं। तुम्हारे सिद्धांतों से जो मेल खाए। और तब अड़चन है। तब मुझसे मेल नहीं बैठेगा।
मैं किन्हीं सिद्धांतों का प्रतिपादक नहीं हूं। मैं किन्हीं शास्त्रों का समर्थक नहीं हूं। मैं किसी आर्य समाज, किसी सनातन धर्म, किसी हिंदू, किसी मुसलमान, किसी जैन का परिपोषक नहीं हूं। इस सारे कचरे को छांट देना होगा, विदा करना होगा इस "आर्य' को, तभी तुम भगवानदास हो सकोगे। यह "आर्य' रहा तो भगवानदास होना भ्रांति है, हो नहीं सकता। यह श्रेष्ठ होने का भाव, फिर कैसा समर्पण! फिर कैसी दासता!
और तुम कहते हो: "जब-जब आया द्वार तिहारे...।'
आए कहां? मेरे द्वार तो सिर्फ मेरे संन्यासी हैं। बाकी राहगीर हैं, रुक जाते हैं, दो क्षण कुतूहल, झांक कर देख लेते हैं, फिर आगे बढ़ जाते हैं। सिर्फ संन्यासी ही भीतर प्रविष्ट होता है। संन्यास का इतना ही अर्थ है: अपने को खाली करने की तैयारी, ताकि मैं तुम्हें पुनः भर सकूं। और मैं किन्हीं सिद्धांतों या सूचनाओं से तुम्हें भरना नहीं चाहता। उससे भरना चाहता हूं जो तुम्हारा निज स्वभाव है। अभी बीज की तरह है, अगर घास-पात उखाड़ दिया जाए तो वही तुम्हारे भीतर गुलाब बन जाएगा। वही तुम्हारे भीतर सहस्रदल कमल बनेगा। तुमसे ही तुम्हें भरना चाहता हूं।
लेकिन तुम्हारे मोह हैं। तुम अपनी धारणाओं से ऐसे चिपटे हो कि रत्ती भर उन धारणाओं को छोड़ने की तुम्हारी तैयारी नहीं। हां, उनको बचा कर अगर कुछ मिल जाए तो तुम जरूर लेने को राजी हो। मगर उनको बचाने में ही मिलना असंभव है। तुम किन्हीं पंडितों के द्वार पर जाओ, वहां से शायद तुम्हें कुछ मिले; थोड़ा और कचरा बटोर लाओगे। यह किसी पंडित का द्वार नहीं है।
मंजिल से आगे भी कुछ और हैं राहों के निशां
राह के पहले भी, कुछ और राहे-मंजिल हैं
सीना-ए-साहिल पे हैं कुछ मौजेत्तूफां के दस्तख्त
मौजों के दिल में भी छुपे हुए कुछ साहिल हैं
सम्हल-सम्हल के भी भटके यहां कई राहबर
बहक-बहक के भी पहुंचे हुए कुछ गाफिल हैं
बचाने में औरों को खुद खो गए कई रहनुमा
मिटा कर जिंदगी बख्शें, कुछ ऐसे कातिल हैं
जल-जल कर धुआं उगलें, कुछ ऐसे हैं चराग
अश्क पी-पी कर जलें, ऐसे भी शमा-ए-दिल हैं
मुश्किलें मुश्किलें हैं, मुश्किलों का क्या कहिए
मुश्किलें हो गईं आसान, ये क्या कम मुश्किल है
तुम्हारी तकलीफ यह है कि तुम ज्यादा समझदार, जरूरत से ज्यादा समझदार--और यह जगह है गाफिलों के लिए।
सम्हल-सम्हल के भी भटके यहां कई राहबर
बहक-बहक  के  भी  पहुंचे  हुए  कुछ  गाफिल  हैं
तुम अपने को बचा रहे हो। और यहां मिटाने वाले पाते हैं।
बचाने में औरों को खुद खो गए कई रहनुमा
मिटा  कर  जिंदगी  बख्शें, कुछ  ऐसे  कातिल  हैं
तुम डूबना नहीं चाहते। तुम अपने को आनंद के उत्सव में खोना नहीं चाहते। अपने को बचा लेना चाहते हो। अपने को बचा कर तुम सत्य को पाना चाहते हो।
सीना-ए-साहिल पे हैं कुछ मौजेत्तूफां के दस्तखत
मौजों  के  दिल  में  भी  छुपे  हुए  कुछ  साहिल  हैं
कुछ मंजिलें ऐसी हैं कि केवल डूब कर ही पाई जाती हैं। पाकर नहीं पाई जातीं, खोकर पाई जाती हैं। और तुम्हारी खोने की बिलकुल तैयारी नहीं है। तब मैं क्या करूं? खाली हाथ आओगे, खाली हाथ जाओगे।
कहते हो: "जब-जब आया द्वार तिहारे, बस खाली हाथ चला।'
जिम्मेवारी तुम्हारी है और शिकायत तुम मुझसे कर रहे हो।
               "फूल न लगा एक हाथ भी, मन का माली साथ चला।'
वही मन का माली तो तुम्हारी जान ले रहा है। वही मन तो फूलों को खिलने नहीं देता। मन तो दुश्मन है वसंत का। मन तो यूं समझो कि पतझड़ है; यूं समझो कि रेगिस्तान है। वहां कहां फूल हाथ लगेंगे? मगर तुम मन से बुरी तरह भरे हो। मन ही तो है ज्ञान। मन ही तो है सिद्धांत। मन ही तो है सारे प्रत्यय और धारणाएं। मन ही तो बनाता है हिंदू और मुसलमान और ईसाई। मन ने ही तो सारे उपद्रव खड़े किए हैं। और वह मन के माली को तुम अपना राहबर बनाए हुए हो। वह तुम्हारा मार्गद्रष्टा है। उसे तुम विदा करो! उसे तुम द्वार के बाहर छोड़ आओ, तो ही मेरे द्वार में प्रवेश कर सकोगे।
नजर में ढल के उभरते हैं दिल के अफसाने
ये और बात है, दुनिया नजर न पहचाने
वो बज्म देखी है मेरी निगाह ने कि जहां
बगैर शम्अ भी जलते रहे हैं परवाने
ये क्या बहार का जोबन, ये क्या नशात का रंग
फसुर्दा मयकदे वाले, उदास मयखाने
मेरे नदीम, तेरी चश्मे-इल्तिफात की खैर
बिगड़-बिगड़ के संवरते गए हैं अफसाने
ये किसकी चश्मे-फुसूंसाज का करिश्मा है
कि टूट कर भी सलामत हैं दिल के बुतखाने
मिटो, टूटो, तो भीतर की प्रतिमा प्रकट हो। जैसे कोई मूर्तिकार छैनी और हथौड़ी लेकर पत्थर को तोड़ता है, हजार चोटें करता है, चोटों पर चोटें करता है, तब कहीं बामुश्किल मूर्ति प्रकट हो पाती है। मूर्ति तो पत्थर में छिपी है, मौजूद है, कहीं से लानी नहीं है। सिर्फ मूर्ति के चारों तरफ जो व्यर्थ के आवरण हैं, जो असार इकट्ठा हो गया है, उसे जला कर राख कर देना है।
मैं तुम्हारे भीतर छिपे भगवान को प्रकट कर लूं, लेकिन यह तुम्हारा "आर्य' तो काटना पड़े। और तुम इस "आर्य' के मोह में इतने पड़े हो कि भगवान रहे कि जाए, मगर "आर्य' को बचाना है। वही तुम्हारी अड़चन है। इसलिए आते तो जरूर हो, मगर आ नहीं पाते। हां, पूना तक आ जाते हो, मुझ तक नहीं आ पाते। और पूना तक आ जाना मुझ तक आना नहीं है। इस आश्रम तक आ जाना भी मुझ तक आना नहीं है। यहां आकर भी तुम यूं बैठे रहते हो जैसे वर्षा होती हो और कोई घड़ा उलटा रखा रहे। वर्षा होगी और घड़ा खाली रहेगा। या अगर घड़ा सीधा भी रहे, तो खुद के कचरे से इतना भरा है कि वर्षा की एक बूंद भी उसमें प्रवेश न कर पाएगी।
कहते हो तुम: "तेरे दया भंडार में मेरे लिए ही कुछ कम है।'
किसी के लिए कम नहीं है। और मैं बेशर्त दे रहा हूं। मेरी कोई शर्त नहीं है। यह कोई सौदा नहीं है। यह केवल प्रेम का, यह केवल आनंद का सहज बहाव है। मेघ जब वर्षा के जल से भर जाएगा तो बरसेगा ही बरसेगा। और फूल जब सुगंध से भर जाएगा तो सुगंध उड़ेगी ही उड़ेगी। और दीया जब जलेगा तो रोशनी फैलेगी ही फैलेगी। सूरज निकलेगा तो सुबह होगी, पक्षी गीत गाएंगे, जीवन जागेगा। इसमें कुछ लेना-देना नहीं है। मैं कुछ दे नहीं रहा हूं। मैं बस हूं। अब यह सब तुम पर निर्भर है। फूल खिला है, लेकिन तुम्हारे नासापुट तो खुले होने चाहिए, तो ही सुगंध पहुंचे। यह रोशनी जली है, लेकिन तुममें आंख खोलने की जुर्रत भी नहीं। यह शमा मौजूद है, लेकिन परवाना कहां है, जो जल जाने को राजी हो, जो मिट जाने को राजी हो?
तुम आते हो और बचा-बचा कर चले भी जाते हो। अब इसमें कसूर किसका है?
शिकवा बेसूद, शिकायत से भला क्या हासिल
जिंदगी है तो बहरहाल बसर भी होगी
इसी उम्मीद पे मजलूम जिए जाता है
पर्दए-शब से नमूदार सहर भी होगी
चाहता हूं तेरा दीदार मयस्सर हो जाए
सोचता हूं कि मुझे ताबे-नजर भी होगी
यादे-अय्यामे-गुलिस्तां को भुला रक्खा था
क्या खबर थी ये खलिश बारे-जिगर भी होगी
हाय इन्सान, दरिंदों से हैं बढ़ कर वहशी
क्या किसी दौर में तकमीले-बशर भी होगी
मुतमइन हूं मैं बहुत चश्मेत्तवज्जोह से तेरी
इक न इक रोज उधर से ये इधर भी होगी
आज तारीकिए-माहौल से दम घुटता है
कल खुदा चाहेगा "तालिब' तो सहर भी होगी
मगर कल पर भी क्यों टालते हो? खुदा पर भी क्यों टालते हो? सहर तो हो गई है, तुम आंख बंद किए बैठे हो।
शिकवा बेसूद, शिकायत से भला क्या हासिल
बंद करो शिकवा और शिकायत। यह आदत भली नहीं। लूट सको तो लूटो। न लूट सको तो अपना सिर पीटो।
शिकवा बेसूद, शिकायत से भला क्या हासिल
जिंदगी   है   तो   बहरहाल   बसर   भी   होगी
भगवानदास आर्य, यूं ही जिंदगी गुजारनी हो जैसी अब तक गुजारी है, तो बसर भी हो जाएगी। जन्म भी हुआ, मौत भी हो जाएगी। चार दिन हैं, कुछ बहुत लंबे नहीं। आर्य ही रहना है तो ढोओ बोझ।
कुल लोगों को बोझ से ऐसा मोह होता है कि मैंने सुना है, एक भिखारी अपने चीथड़ों की गठरी को सिर पर रखे हुए राह से चल रहा था, कि सम्राट का स्वर्ण-रथ पास से गुजरा। कोई और तो था नहीं राह पर, जंगल की राह थी, सम्राट शिकार करके लौटता था। यूं तो बाजार होता, राजपथ होता, भीड़-भाड़ होती, तो शायद भिखारी पर नजर भी न जाती। लेकिन बूढ़ा भिखारी, गठरी सिर पर लादे, लाठी से टेकता-टेकता चलता है। सम्राट ने अपने सारथी को कहा, रुक! भिखारी से कहा, बाबा, तू रथ में बैठ जा। तुझे कहां उतरना है, हम उतार देंगे। तू बोल तुझे कहां जाना है, हम छोड़ देंगे।
भिखारी झिझका, ठिठका। स्वर्ण-रथ और मैं भिखारी! बोला, नहीं-नहीं। आप भी कैसी बातें करते हैं! कभी नहीं, कभी नहीं!
सम्राट ने कहा, तू पागल है! मैं निमंत्रण देता हूं, बैठ!
मगर भिखारी ने कहा, मुझे क्षमा करो। मैं गरीब आदमी। यह स्वर्ण-रथ! सोने पर पैर रखना पाप।
सम्राट को हंसी आ गई। उसने कहा, फिर मैं आज्ञा देता हूं। निमंत्रण तू नहीं मानेगा तो आज्ञा देता हूं कि बैठ!
आज्ञा को भिखारी समझा, वह उसकी भाषा थी। जल्दी से बैठ गया। फिर भी भिखारी भिखारी है। ढंग, पुरानी आदतें, बामुश्किल छूटते हैं। गठरी अभी भी सिर पर ही रखे हुए है।
सम्राट ने कहा, तू होश में है या पागल है? अब गठरी तो नीचे रख दे नासमझ!
भिखारी कहने लगा, नहीं-नहीं। इतनी कृपा की, यही क्या कम है कि मुझे बिठा लिया! अब अपनी गठरी का बोझ भी तुम्हारे रथ पर डालूं! यह मुझसे न हो सकेगा। अब तो तुम आज्ञा भी दो, तो भी मैं न मानूंगा। इतना कृतघ्न मैं नहीं हूं। मुझे बिठा लिया, यही क्या कम है! गठरी तो मैं अपने सिर पर ही रखूंगा। तुम्हारे रथ पर इतना बोझ और कैसे डालूं?
अब इस भिखारी का गणित देखते हो! खुद बैठा है, गठरी सिर पर रखे है, बोझ तो रथ पर पड़ ही रहा है। मगर वह गठरी को सिर से नीचे नहीं रखना चाहता। चीथड़े ही हैं उस गठरी में। टूटे-फूटे बर्तन होंगे कुछ।
भगवानदास आर्य, क्या है तुम्हारे पास जिसे छोड़ने में इतनी अड़चन हो रही है? और मैं तो निमंत्रण ही दे सकता हूं, आज्ञा नहीं दे सकता। मैं तो बुलावा ही भेज सकता हूं, प्रेम-पाती लिख सकता हूं कि आ जाओ, बैठ जाओ मेरे रथ पर!
मगर तुम कहते हो, नहीं-नहीं! यह कैसे हो सकता है! मैं भगवानदास आर्य, और यह आपका रथ। इसमें हिंदू बैठे, मुसलमान बैठे, ईसाई बैठे, जैन बैठे, बौद्ध बैठे, यहूदी बैठे, सिक्ख बैठे। इसमें तरहत्तरह के लोग बैठे हैं, मैं कैसे बैठ सकता हूं? और फिर मेरी यह गठरी--यह सत्यार्थ प्रकाश, जिसको सिर पर रखे बैठा हूं। और सत्यार्थ प्रकाश के ऊपर बैठे हैं महर्षि दयानंद। वजन भारी है।
महर्षि दयानंद के चित्र वगैरह देखे? क्या घुटा हुआ सिर! क्या तोंद! क्या जम कर बैठे हैं! और सत्यार्थ प्रकाश जैसी कचरा किताब। बहुत किताबें हैं, मगर सत्यार्थ प्रकाश जैसी कचरा किताब मैंने नहीं देखी। बहुत कचरा किताबें हैं। जब भी मैं कभी गीता में कृष्ण के उस वचन को पढ़ा हूं जिसमें कृष्ण अपनी स्तुति में कुछ अदभुत बातें कहते हैं--कि मैं हाथियों में ऐरावत! गऊओं में कामधेनु! इत्यादि-इत्यादि, वहां हमेशा मुझे खयाल आ जाता है कि कुछ और बातें जोड़ देते; जैसे कचरा किताबों में सत्यार्थ प्रकाश! या शीतल पेयों में कोकाकोला! या बाबाओं में गोबरपुरी के गणेश मुक्तानंद! ऐसे कुछ सुंदर वचन और जोड़ देते। कहां का पुराना दकियानूसी ऐरावत हाथियों में, और कहां की कामधेनु गऊ।
तुम्हारे ऊपर बहुत बोझ है। दयानंद तुम्हें दबाए डाल रहे हैं। ऐसे चढ़ कर बैठते हैं कि जिस पर बैठ जाते हैं उतरते नहीं। एक तो गलत आदमी ही उन्हें बैठने देते हैं। समझदार तो फौरन कहता है, आगे बढ़ो! यहां कहां घुसे आ रहे हो? क्योंकि दयानंद की बातों में सिवाय बकवास के और कुछ भी नहीं। कोई न तो आत्म-अनुभव है, न कोई समाधि है। तर्कजाल है। और वह भी ओछा, टुच्चा, दो कौड़ी का। इस सब बोझ को लेकर तुम आ जाते हो, इसलिए तकलीफ हुई जा रही है। आते हो जरूर, क्योंकि वह बोझ तृप्ति भी नहीं देता। आना तुम्हें पड़ता है। महीने, दो महीने में तुम फिर हाजिर हो जाते हो। आना भी पड़ेगा। क्योंकि जो बोझ तुम ढो रहे हो, उससे कुछ तृप्ति नहीं है, कोई संतोष नहीं है, कोई पोषण नहीं है।
इसी उम्मीद पे मजलूम जिए जाता है
पर्दए-शब   से   नमूदार   सहर   भी   होगी
कभी न कभी रात का पर्दा उठेगा। सुबह भी प्रकट होगी, कभी न कभी।
मगर कभी पर क्यों टालते हो जो अभी हो सकता हो? और कभी का क्या भरोसा है? चाहते तो हो तुम...
चाहता   हूं   तेरा   दीदार   मयस्सर   हो   जाए
चाहते तो हो कि दर्शन मिल जाए, कि सत्य की अनुभूति हो जाए, कि परमात्मा का साक्षात्कार हो जाए।
चाहता हूं तेरा दीदार मयस्सर हो जाए
सोचता   हूं   कि   मुझे   ताबे-नजर   भी   होगी
कि मुझमें देखने की शक्ति भी होगी, ऐसा सोचता हूं।
है! सोचने का सवाल नहीं। लेकिन देखने की शक्ति काफी नहीं है; क्योंकि कोई अपनी आंख बंद रख सकता है। देखने की शक्ति तो पड़ी है भीतर। मगर आंख बंद हो तो जरा सी पलकें पर्याप्त हैं, परमात्मा भी सामने खड़ा रहे तो दिखाई नहीं पड़ेगा।
और मैं तुमसे कहता हूं, परमात्मा सदा सामने खड़ा है। मगर दिखाई नहीं पड़ता, क्योंकि किसी की आंख पर काबा का पत्थर रखा है, किसी की आंख पर वेद रखे हुए हैं, किसी आंख पर तीर्थंकर बैठे हुए हैं, किसी आंख पर बुद्ध सवार हैं। हर आंख भरी है, हर आंख में कचरा है। आंख खाली होनी चाहिए, निर्दोष होनी चाहिए। आंख छोटे बच्चे की भांति होनी चाहिए। फिर तुम खाली हाथ नहीं जा सकोगे।
तुम कहते हो: "हाथ पसारे दुआ मांगते...।'
तुम कह गए। शायद तुमने सोचा भी नहीं कि क्या कह रहे हो। न तो तुमने कभी हाथ पसारा है और न कभी दुआ मांगी है। क्योंकि जो हाथ पसारेगा वह संन्यासी हो जाएगा। जो दुआ मांगेगा वह संन्यासी हो जाएगा।
गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद घर वापस लौटे। बारह साल बाद वापस लौटे। जिस दिन घर छोड़ा था, उनका बच्चा, उनका बेटा एक ही दिन का था, राहुल एक ही दिन का था। जब आए तो वह बारह वर्ष का हो चुका था। और बुद्ध की पत्नी यशोधरा बहुत नाराज थी, स्वभावतः। और उसने एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल पूछा। उसने पूछा कि मैं इतना ही जानना चाहती हूं: क्या तुम्हें मेरा इतना भी भरोसा न था कि मुझसे कह देते कि मैं जा रहा हूं? क्या तुम सोचते हो मैं तुम्हें रोकती? मैं भी क्षत्राणी हूं। अगर हम युद्ध के मैदान पर तिलक और टीका लगा कर तुम्हें भेज सकते हैं, तो सत्य की खोज पर नहीं भेज सकते? तुमने मेरा अपमान किया, बुरा अपमान किया। जाकर किया अपमान, ऐसा नहीं। तुमने पूछा क्यों नहीं? तुम कह तो देते कि मैं जा रहा हूं। एक मौका तो मुझे देते। देख तो लेते कि मैं रोती हूं, चिल्लाती हूं, रुकावट डालती हूं?
कहते हैं, बुद्ध से बहुत लोगों ने बहुत तरह के प्रश्न पूछे होंगे। मगर जिंदगी में एक मौका था जब वे चुप रह गए, जवाब न दे पाए। और यशोधरा ने एक के बाद एक तीर चलाए। और यशोधरा ने कहा कि मैं तुमसे दूसरी यह बात पूछती हूं कि जो तुमने जंगल में जाकर पाया, क्या तुम छाती पर हाथ रख कर कह सकते हो कि वह यहीं नहीं मिल सकता था?
यह भी बुद्ध कैसे कहें कि यहीं नहीं मिल सकता था। क्योंकि सत्य तो सभी जगह है। जंगल में मिल सकता है, तो बाजार में मिल सकता है। यह और बात है कि बाजार में जो है वह सोचता हो कि नहीं मिल सकता। मगर मिल जाने के बाद तो कोई कैसे कहेगा कि बाजार में नहीं मिल सकता? वह तो सब जगह है। फिर आंखें झुक गईं।
और तीसरी बात उसने बड़ी गहरी चोट की की, मगर उस चोट में ही यशोधरा उलझ गई। तीसरी बात उसने की, राहुल को सामने किया और कहा कि ये तेरे पिता हैं। ये देख, ये जो भिखारी की तरह खड़े हैं हाथ में भिक्षापात्र लिए, यही तेरे पिता हैं। ये तुझे छोड़ कर भाग गए थे जब तू एक ही दिन का था, अभी पैदा ही हुआ था। अब ये लौटे हैं, फिर पता नहीं कब मिलना हो या न हो। इनसे तू अपनी वसीयत मांग ले। तेरे लिए क्या इनके पास देने को है, वह मांग ले।
यह बड़ी गहरी चोट थी। बुद्ध के पास देने को था क्या? यशोधरा प्रतिशोध ले रही थी बारह वर्षों का। लेकिन उसने कभी सोचा भी न था कि यह घटना यूं रुख ले लेगी, यह बात यूं बदल जाएगी। भगवानदास आर्य ने भी पूछते वक्त नहीं सोचा होगा कि बात यूं रुख ले लेगी।
बुद्ध ने तत्क्षण अपना भिक्षापात्र राहुल को दे दिया और कहा कि बेटे, मेरे पास कुछ और देने को नहीं। लेकिन जो मैंने पाया है वह तुझे दूंगा। तू संन्यस्त हो जा।
बारह वर्ष के बेटे को संन्यस्त कर दिया! यशोधरा की आंखों से झर-झर आंसू गिरने लगे। उसने कहा, यह आप क्या करते हैं!
पर बुद्ध ने कहा, जो मेरी संपदा है वही तो दे सकता हूं। समाधि मेरी संपदा है, और उसको बांटने का ढंग संन्यास है। और यशोधरा, जो बीत गई बात उसे बिसार दे। आया ही इसलिए हूं कि तुझे भी ले जाऊं। अब राहुल तो गया, तू भी चल। जिस संपदा का मैं मालिक हुआ हूं, उसकी तू भी मालिक हो जा।
और सच में ही यशोधरा ने सिद्ध किया कि वह क्षत्राणी थी। तत्क्षण पैरों पर झुक गई और उसने कहा, मुझे दीक्षा दें। और दीक्षा लेकर भिक्षुओं में, संन्यासियों में यूं खो गई कि फिर उसका कोई उल्लेख नहीं आता। उल्लेख ही नहीं आता! कभी उसने संन्यासियों में इस तरह की अस्मिता प्रकट नहीं की कि मैं बुद्ध की पत्नी हूं, कि मैं विशिष्ट हूं, कि मैं खास हूं। वह यूं खो गई कि बौद्ध शास्त्रों में इस घटना के बाद उसका फिर कोई उल्लेख नहीं आता। कैसे जीयी, कैसे मरी; कब तक जीयी, कब मरी; कुछ पता नहीं चलता। वह सारे संन्यासियों की भीड़ में चुपचाप एक हो गई, यूं लीन हो गई, यूं डूब गई। इसको आना कहते हैं, भगवानदास आर्य!
तुम कहते हो: "हाथ पसारे दुआ मांगते...।'
हाथ पसारो, और देखो मैं क्या देता हूं! वही दे सकता हूं जो मेरे पास है। जो मैंने पाया वही दे सकता हूं। और यह कुछ ऐसा है कि जितना दो उतना बढ़ता है। दुआ मांगो, खाली नहीं जा सकोगे।
कहते हो तुम: "हाथ पसारे दुआ मांगते अब मेरी आंखें नम हैं।'
झूठी बातें न कहो। अगर आंखें नम हो जाएं तो फिर इस महफिल से उठने की कहां गुंजाइश? फिर इस मैकदे को छोड़ कर जाने का कहां सवाल?
कहते हो: "अब तक न की दया मुझ पे, बस इतना सा गम है।
               दया के सागर से अपनी ले, खाली प्याली साथ चला।
               जब- जब  आया  द्वार  तिहारेबस  खाली  हाथ  चला।'
किस खाली प्याली की बात कर रहे हो? खाली ही प्याली हो तो मैं भर न दूं? प्याली तो तुम्हारी भरी हुई है। और प्याली हजार शर्तें रखती है कि इस तरह भरो तो ही भरूंगी--मेरे अनुकूल, मेरे अनुसार। और तब मैं मजबूर हूं। मैं तुम्हारे अनुसार न तो तुम्हें कुछ दे सकता हूं, न तुम्हारे अनुसार चल सकता हूं।
लेकिन साधारणतः यही होता है। जिनको तुम नेता कहते हो, वे अपने अनुयायियों के भी अनुयायी होते हैं। और जिनको तुम साधु कहते हो, वे अपने भक्तों के भी भक्त होते हैं। तुम्हारे साधु तुम्हारी मान कर चलते हैं। तुम्हारे मुनि तुम्हारी मान कर चलते हैं।
एक तेरापंथी जैन मुनि कोई दस वर्ष पहले मुझसे मिलने आए थे। मैंने उनसे पूछा कि यह मुंह-पट्टी? फेंको-फांको!
वे कहने लगे कि जानता तो मैं भी हूं कि बेकार है, मगर मेरे श्रावकों का क्या होगा? श्रावक यानी मेरे अनुयायियों का क्या होगा? वे बड़े नाराज होंगे। और उन्होंने मुझे पहले ही चेताया था कि आप वहां जा रहे हो, कुछ गड़बड़ करके न आ जाना। पहले तो मुझे रोका उन्होंने आने से। बामुश्किल तो आ पाया हूं। और आपने आते से ही यह बात मुंह-पट्टी की छेड़ दी। जानता तो मैं भी हूं कि इस मुंह-पट्टी में क्या रखा है! मगर मेरे श्रावक इसी मुंह-पट्टी के कारण तो मुझे साधु मानते हैं। यह मुंह-पट्टी गई कि मेरी साधुता गई। और अब इस उम्र में, साठ साल का हो गया, अब कहां जाऊं, क्या करूं? यह मुंह-पट्टी है तो लोग चिंता करते हैं, सेवा करते हैं, ध्यान रखते हैं। मुंह-पट्टी गई तो सब गया। यह मेरी दुकान है। और मेरे श्रावक तत्क्षण मेरे दुश्मन हो जाएंगे।
न मालूम कितने साधुओं के पत्र मुझे मिलते हैं, साध्वियों के पत्र मिलते हैं, कि हम आपकी बातें पढ़ते हैं, समझते हैं, समझ भी पाते हैं; मगर अड़चन यह है कि हमारे आस-पास जो समूह है हमारे मानने वालों का, उसके सामने हम घोषणा नहीं कर सकते। उसके सामने हम दिखा भी नहीं सकते।
मजा है यह कि मुझे गालियां देते हैं उस समूह के सामने। और एकांत में किताबें पढ़ते हैं और मुझे पत्र भी लिखते हैं। अभी कुछ दिन पहले दिगंबरों के एक बहुत बड़े ज्ञानी--तथाकथित ज्ञानी--कानजी स्वामी की मृत्यु हुई। मेरे एक संन्यासी स्वराज्यानंद उनसे मिलने गए थे। मेरे संन्यासी को देख कर कई लोग यूं भड़क जाते हैं कि जैसे मौत आ गई। बस स्वराज्यानंद को देखा कि एकदम भड़क गए। और कहा कि तुम भी इस चक्कर में पड़ गए!
पुराने परिचित थे उनके। पहले भी जाते थे; जब संन्यासी नहीं थे तब भी जाते थे।
तुम भी इस चक्कर में पड़ गए! इस आदमी की किताबों से बचना! इस आदमी की किताबें जहर हैं! इसकी बातों से बचना। यह तुम्हें डुबा लेगा। यह तुम्हें भ्रष्ट कर देगा।
स्वराज्यानंद ने गौर से देखा कि वे जो किताब पढ़ रहे थे वह मेरी किताब थी। कानजी स्वामी मेरी एक छोटी सी किताब "अहिंसा-दर्शन' कुंदकुंद के बड़े शास्त्र में छिपाए हुए रखे थे। मगर स्वराज्यानंद पहचान गए कि किताब तो भीतर जो है वह मेरी है। उन्होंने कहा कि जरा मैं यह किताब देखूं!
कानजी स्वामी बहुत बेचैन हुए। उन्होंने कहा कि मैं जरा देख रहा था कि यह आदमी किस तरह लोगों को भ्रष्ट करता है।
फिर स्वराज्यानंद ने पता लगाया तो पता चला कि वे एक-एक किताब पढ़ते हैं, टेप भी सुनते हैं। और दूसरों को समझा रहे हैं कि किताब पढ़ना मत। मजबूरी है।
तुम न तो अभी हाथ पसारे हो, न तुमने प्रार्थना की है, न तुम्हारी आंखें अभी गीली हैं, न तुम्हारी प्याली खाली है। काश! तुम इतना कर सको कि प्याली खाली हो, आंखें गीली हों और हाथ तुम पसारो, दुआ तुम मांगो! फिर खाली हाथ जा सकते हो? असंभव! एकदम असंभव! तुम भर कर जाओगे। मधुमास से भर कर जाओगे। संगीत से भर कर जाओगे। आनंद और उत्सव से भर कर जाओगे। मगर उसके पहले कुछ तो करना होगा।
और देर न करो। यूं भी तुमने बहुत देर कर दी है।
मिट गया जब मिटने वाला, फिर सलाम आया तो क्या
दिल की बरबादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या
छूट गईं नब्जें, उम्मीदें देने वाली हैं जवाब
अब उधर से नामाबर ले के पयाम आया तो क्या
आज ही मिटना था ऐ दिल, हसरते-दीदार में
तू मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या
काश अपनी जिंदगी में हम ये मंजर देखते
अब सरेत्तुर्बत कोई मशहर-खिराम आया तो क्या
सांस उखड़ी, आस टूटी, छा गया जब रंगे-यास
नामाबर लाया तो क्या, खत मेरे नाम आया तो क्या
मिल गया वो खाक में, जिस दिल में था अर्माने-दीद
अब कोई खुर्शीद-वश बालाए-बाम आया तो क्या
मिट गया जब मिटने वाला, फिर सलाम आया तो क्या
और मिटने की कौन कहे? कल का भरोसा नहीं। अगले क्षण का भरोसा नहीं। तुम आते हो बार-बार, जाते हो, प्रश्न भी पूछते हो। लेकिन पुराने आग्रह, पुरानी आदतें, पुराने संस्कार नहीं छोड़ पा रहे हो। अगर तुम्हें उन संस्कारों से आनंद मिल रहा है तो यहां मत आओ। अगर उन पुराने संस्कारों से तुम्हें कुछ भी नहीं मिल रहा है तो उन्हें छोड़ो और यहां आओ। मगर कुछ तय करो। ऐसे तो न घर के रहोगे न घाट के रहोगे, धोबी के गधे हो जाओगे। मेरी बातें सुनोगे तो पुरानी बातों से भरोसा हट जाएगा। फिर अगर उनको छोड़ा नहीं तो बहुत मुश्किल में पड़ोगे। जब तक भरोसा था, तब तक कम से कम इतना तो था कि जो ढो रहे हैं वह सोना है। अब जब भरोसा न रहेगा तो पत्थर ढो रहे हो। जानते हो कि सोना नहीं है, मगर ढोना भी नहीं छूटता।
दो साधु एक जंगल से गुजरते थे--गुरु और शिष्य। बार-बार बूढ़ा गुरु अपने शिष्य से पूछता था--क्योंकि सांझ होने लगी, सूरज ढलने लगा--गांव कितनी दूर है? गांव कितनी दूर है? गांव कितनी दूर है?
युवक ने कहा कि आज तक कभी आपने इस तरह उत्सुकता नहीं दिखाई। जंगल पड़ा तो हम जंगल में ठहर गए, गांव आ गया तो गांव में ठहर गए। आप तेजी से भी चल रहे हो, जल्दबाजी भी कर रहे हो। और भी मैं एक काम देख रहा हूं जो आप बार-बार कर रहे हो, अपने झोले में हाथ डाल-डाल कर देखते हो। माजरा क्या है? मामला क्या है? राज क्या है?
गुरु ने कहा, तू इन बातों में मत पड़। समय न गंवा, जल्दी चल, हमें गांव पहुंचना है, जंगल में ठहरना खतरनाक है।
तभी कुआं आया; दोनों हाथ-मुंह धोने, पानी पीने को रुके। गुरु ने अपना झोला शिष्य को दिया और कहा कि सम्हाल कर रखना, होशियारी से रखना।
शिष्य को मौका मिला। झोले में हाथ डाल कर देखा, दो सोने की ईंटें थीं। सब राज खुल गया। इन्हीं ईंटों की वजह से आज चिंता है, आज परेशानी है। अब तक कभी न थी। गांव पहुंचने की जल्दी है, जंगल में कहीं ठहरना न पड़े। घबड़ाहट है। गुरु तो पानी खींच रहा था कुएं से, हाथ-मुंह धो रहा था, जल्दी-जल्दी में था; शिष्य ने दोनों ईंटें निकाल कर जंगल में फेंक दीं। उनकी जगह दो पत्थर के टुकड़े, उसी वजन के करीब-करीब, झोले के भीतर डाल दिए।
गुरु ने जल्दी से हाथ-मुंह धोकर...बड़ी जल्दी-जल्दी किया। क्योंकि सूरज ढला ही जा रहा है, अंधेरा हुआ ही जा रहा है...जल्दी से झोला वापस लिया, कंधे पर टांगा, टटोल कर देखा--ईंटें अपनी जगह हैं। फिर दोनों चल पड़े। तेजी से चले जा रहे हैं। कोई दो मील चलने के बाद--लेकिन गांव का कोई पता नहीं, रास्ता लगता है भटक गए हैं--युवक से कहा कि बड़ी मुसीबत है, गांव का कुछ पता नहीं है, रात उतर आई, देर होने लगी। गांव पहुंचना जल्दी जरूरी है। दीया भी नहीं दिखाई पड़ता दूर अंधेरे में कहीं कोई। कोई झोपड़ा भी दिखाई नहीं पड़ता। क्या हम रास्ता तो नहीं भूल गए?
युवक हंसने लगा। उसने कहा, आप फिकर न करें। अब हम रास्ता भी भूल जाएं तो कोई चिंता की बात नहीं। चिंता तो मैं कुएं के पास ही फेंक आया।
घबड़ा कर गुरु ने जल्दी से झोले में हाथ डाला। समझ में आ गया कि चिंता का क्या मतलब! झोले में देखा तो दो पत्थर के टुकड़े थे। एक क्षण तो धक्का लगा। एक क्षण को तो हृदय नहीं धड़का होगा। एक क्षण को तो सांस अटक गई होगी। लेकिन फिर गुरु को समझ में भी बात आ गई। समझ में इसलिए आ गई कि दो मील से वह पत्थर ढो रहा था और चिंतित हो रहा था सोने के लिए। सोना था ही नहीं। झोला उसने वहीं गिरा दिया। हंसने लगा। उसने कहा, तूने अच्छा किया कि चिंता फेंक दी। मैं खुद ही परेशान हो रहा था, मगर फेंक न पाता, मैं न फेंक पाता। अब हम यहीं सो जाएं। अब गांव वगैरह क्या जाना! अब इसी झाड़ के नीचे आराम कर लें। अब कोई फिकर ही न रही।
भगवानदास आर्य, तुमसे मैं यही कहता हूं। तुम जो ढो रहे हो, जब तक तुम सोचते हो सोना है, तब तक तो ठीक। है तो सोना नहीं, मगर कम से कम ढोओगे, सुख से ढोओगे कि सोना है। मेरे पास आते रहे तो दिखाई पड़ना शुरू हो जाएगा कि पत्थर है। और तब मुसीबत होगी। छोड़ न पाओगे पुरानी आदत सोने को पकड़ने की। और अब जान भी लिया कि पत्थर है, सोना नहीं है। अब विडंबना पैदा होगी। अब तुम किंकर्तव्यविमूढ़ अपने को अनुभव करोगे। वही मेरी प्रतीति है जो तुम्हें हो रहा है।
तुम छोड़ दो पुराने कचरे को, झोला खाली करो, मैं भरने को राजी हूं। और मैं अपने से नहीं भरूंगा। यही भेद है। यही बुनियादी भेद है। पंडित-पुरोहित अपने से भर देते हैं तुम्हारे प्राणों को। सदगुरु वही है जो तुम्हें दूसरे से तो खाली कर देता है, ताकि तुम अपने से भर सको। पत्थर हटा देता है, ताकि तुम्हारे झरने मुक्त हो जाएं, तुम्हारे जल-स्रोत मुक्त हो जाएं, तुम्हारा अमृत-रस मुक्त हो जाए। तुम्हारे भीतर विराट झरने छिपे पड़े हैं। जरा से पत्थर हटाओ, और तुम सागर हो। कहीं मांगने नहीं जाना है। जिसको तुम मांग रहे हो वह तुम्हारे भीतर मौजूद है। किसी से मांगना नहीं है। किससे मांग रहे हो, मालिकों का मालिक तुम्हारे भीतर मौजूद है!
न सुकूने-दिल की है आरजू, न किसी अजल की तलाश है
तेरी जुस्तजू में जो खो गई, मुझे उस नजर की तलाश है
जिसे तू कहीं भी न पा सका, मुझे अपने दिल में वो मिल गया
तुझे जाहिद इसका मलाल क्या, ये नजर-नजर की तलाश है
न सुकूने-दिल की है आरजू...
तुझे दो जहां की खुशी मिली, मुझे दो जहां का अलम मिला
वो तेरी नजर की तलाश थी, ये मेरी नजर की तलाश है
न सुकूने-दिल की है आरजू...
मेरी राहतों को मिटा के भी, तेरे गम ने दी मुझे जिंदगी
तेरा गम नहीं यूं ही मिल गया, मेरी उम्र भर की तलाश है
न सुकूने-दिल की है आरजू...
रही "नूर' मेरी ये आरजू, न रहे ये गर्दिशे-जुस्तजू
जो फरेबे-जल्वा न खा सके, मुझे उस नजर की तलाश है
न सुकूने-दिल की है आरजू, न किसी अजल की तलाश है
तेरी जुस्तजू में जो खो गई, मुझे उस नजर की तलाश है
जिसे तू कहीं भी न पा सका, मुझे अपने दिल में वो मिल गया
तुझे जाहिद इसका मलाल क्या, ये नजर-नजर की तलाश है
जिसको तुम खोज रहे हो, वह तुम्हारे भीतर मौजूद है। जिसके लिए तुम जन्मों-जन्मों से भटक रहे हो, उसे एक क्षण को भी तुमने गंवाया नहीं है, वह सदा से तुम्हारे भीतर बैठा है। अपने भीतर लौट आओ। जरा लौटो, बस इतना ही तो मेरा शिक्षण है। अपनी तरफ आंख खोलो। अपनी किताब खोलो। अपने प्राणों को पढ़ो। अपनी आत्मा को पहचानो। और फिर कोई असंतोष नहीं, कोई दुख नहीं, कोई पीड़ा नहीं। स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं।

वच वच वच
दूसरा प्रश्न: भगवान,
अतीत के सभी ज्ञानी, जिनमें पिछली सदी के परमहंस रामकृष्ण को भी सम्मिलित करना उचित होगा, स्त्री के बहुत विरोध में थे। इसका क्या कारण हो सकता है? ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद भी उन्हें स्त्री में विशेष खतरा क्यों नजर आया किया? क्या ज्ञानोपलब्धि के बाद भी कुछ अतीत के संस्कार शेष रह जाते हैं?

सुलोचना भारद्वाज,

मैं तुम्हारे अतीत के ज्ञानियों को जितना ही विचारता हूं, सोचता हूं, उतनी ही एक बात साफ होती चली जाती है कि उन सौ में से निन्यानबे तो सिर्फ तुम्हारी मान्यता के कारण ज्ञानी हैं। शायद एकाध सच में जागा है। और जो जागा है उसकी भी मजबूरी है। मजबूरी है यह कि उसे अपने युग की भाषा में बोलना पड़ेगा।
सौ में से निन्यानबे तो जागे हुए नहीं हैं। यह कहता हूं तो लोगों को कष्ट होता है। तुम कहो तो मैं उनके नाम भी गिना दूं, लेकिन लोगों की भावनाओं को बड़ी ठेस लगती है। लोगों की भावनाएं क्या हैं? छुई-मुई!
तुमने लजनू नाम का पौधा देखा? जरा हाथ से छू दो कि बस लाज खा जाता है। पत्ते कुम्हला जाते हैं, मुरझा जाते हैं, डाल झुक जाती है। लजनू--ऐसी दशा है लोगों की। तैयार ही बैठे हैं लाज खा जाने को। तैयार ही बैठी है उनकी भावना ठेस खा जाने को। उघाड़े ही बैठे हैं कि आ बैल, सींग मार! और फिर चीख-पुकार मचाते हैं।
सौ में निन्यानबे तो तुम्हारे ज्ञानी ज्ञानी नहीं हैं, पंडित हैं, जानकार हैं, प्रबुद्ध नहीं। और वह जो एक प्रबुद्ध भी है, उसकी भी मजबूरी है। वह भी अपने युग की ही भाषा में बोल सकता है। दूसरे युग की भाषा में बोलेगा भी कैसे? आखिर महावीर बोलेंगे तो पच्चीस सौ साल पहले की भाषा में ही बोलेंगे। मैं जिस भाषा में बोलता हूं उसमें कैसे बोल सकते हैं? मेरे बाद पच्चीस सौ साल बाद जो लोग बोलेंगे, निश्चित ही वे अपने समय की भाषा में बोलेंगे। वे मेरी भाषा में नहीं बोल सकेंगे। बोलना तो किसी भाषा में पड़ेगा। और भाषा के अपने निहित अर्थ होते हैं। और भाषा सिर्फ वही नहीं होती जो तुम बोलते हो, जो तुम सोचते हो, विचारते हो। भाषा के कारण ही तो दुनिया में तीन सौ धर्म हैं। ये विभिन्न भाषाओं के कारण। ये बोलने के अलग-अलग लहजे, अलग-अलग शैलियां, अलग-अलग समयों की शैलियां।
रामकृष्ण परमहंस वही पुरानी भाषा में बोल रहे हैं, यद्यपि वे जाग्रत पुरुष हैं। उन सौ लोगों में से एक में मैं उनकी गिनती करता हूं। रामकृष्ण परमहंस और महर्षि दयानंद दोनों समकालिक थे। महर्षि दयानंद की गिनती मैं निन्यानबे लोगों में करता हूं, परमहंस रामकृष्ण की गिनती मैं एक व्यक्ति में करता हूं। लेकिन बेपढ़े-लिखे थे। आधुनिक बिलकुल नहीं थे। दूसरी कक्षा तक पढ़े थे। ग्रामीण थे, ग्राम्य उनकी भाषा है।
यह जान कर तुम्हें हैरानी होगी, हालांकि कोई किताब यह लिखती नहीं, लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी जिन लोगों ने रामकृष्ण से संबंध रखा है, उनसे मुझे पता चला है। मेरे एक प्रोफेसर उस परिवार में से आते हैं जिनके दादा-परदादा रामकृष्ण के सत्संगियों में से थे। ऐसे बंगाल में बहुत से परिवार हैं जिनकी पिछली पीढ़ियों में से किसी ने रामकृष्ण का सत्संग किया। उन सबका कहना है कि वे मां-बहन की गाली भी देते थे।
अब तुम बहुत चौंकोगी, सुलोचना भारद्वाज, कि रामकृष्ण परमहंस! और मां-बहन की गालियां देते थे! मगर परमहंसों का कुछ न पूछो। ग्राम्य थे और आधुनिकता से तो बिलकुल परिचित नहीं थे। इसलिए भाषा जो बोल रहे थे वह कम से कम दो-ढाई हजार साल पुरानी थी। उस भाषा में अध्यात्म पर्यायवाची था: कामिनी-कंचन का त्याग करो। हालांकि इस बात में कुछ सचाई है, मगर सचाई कुछ ऐसी है कि समझनी पड़े।
अगर तुम मुझसे पूछो तो मैं कहूंगा कि जो व्यक्ति अध्यात्म को उपलब्ध होता है, वह कामिनी और कांचन का अतिक्रमण कर जाता है। मैं भी वही कह रहा हूं। कामिनी और कांचन का अतिक्रमण कर जाता है, जो व्यक्ति समाधि को उपलब्ध होता है। जिस व्यक्ति ने स्वयं के आनंद को पा लिया वह क्यों किसी और में आनंद खोजेगा? आखिर स्त्री में या पुरुष में हम आनंद क्यों खोजते हैं? क्योंकि खुद दुखी हैं। कहीं और से मिल जाए। पुरुष स्त्रियों की तरफ देख रहे हैं, स्त्रियां पुरुषों की तरफ देख रही हैं कि आनंद किसी से मिलेगा। मां-बाप बच्चों की तरफ देख रहे हैं, बच्चे मां-बाप की तरफ देख रहे हैं कि आनंद किसी से मिलेगा। सब किसी और की तरफ टकटकी लगाए बैठे हैं। और आनंद का स्रोत भीतर है। और जब भीतर के स्रोत का पता चल जाता है तो स्वभावतः बाहर की आकांक्षा अपने आप विलुप्त हो जाती है।
पुरानी शैली यह थी कि कामिनी-कांचन का त्याग करो तो समाधि मिलेगी। और मैं तुमसे कहना चाहता हूं, ज्यादा वैज्ञानिक यह होगा कहना कि समाधि को उपलब्ध हो जाओ, अपने आनंद को पा लो, कामिनी-कांचन का अतिक्रमण हो जाता है। त्याग शब्द का भी उपयोग नहीं करूंगा, क्योंकि त्याग में चेष्टा मालूम होती है--छोड़ना। नहीं, मैं कहूंगा: छूट जाता है।
और छोड़ने में और छूट जाने में जमीन-आसमान का फर्क हो जाता है। जब तुम छोड़ते हो, तो तुम भयभीत हो जाते हो। जिसको छोड़ा है उससे भागते हो, कि कहीं फिर न पकड़ जाओ। हालांकि धन किसी को पकड़ता नहीं, तुम्हीं धन को पकड़ते हो। इसलिए भय यही है कि कहीं मैं ही फिर न पकड़ लूं। पुरानी धारणा। और अभी आत्मज्ञान तो हुआ नहीं है, समाधि तो मिली नहीं। समाधि पाने के लिए धन छोड़ा है। अब समाधि कब मिलेगी, क्या पता! इस बीच धन फिर मिल जाए, फिर रास्ते में मिल जाए, तो विचार उठने लगे कि अब समाधि जब मिलेगी, मिलेगी, अगले जन्म में देखेंगे, कोई जल्दी क्या है? अब यह धन तो पड़ा मिल गया, इसको क्यों छोड़ना? इसको तो भोग ही लो। और बहाने और तर्क तो आदमी खोज ही ले सकता है कि जब परमात्मा ने भेजा ही है, प्रसाद-स्वरूप...जैसे संजीव रेड्डी कहते हैं कि उनको राष्ट्रपति परमात्मा ने बनाया है, परमात्मा का प्रसाद।
गजब का प्रसाद परमात्मा बांट रहा है! परमात्मा भी लगता है अंधा हो गया। कहावत है न--अंधा बांटे रेवड़ी, देख-देख कर दे! पहचान-पहचान कर देता है, अपना वाला है कि नहीं। अब ये संजीव रेड्डी! इनको रेवड़ी मिली। सत्तर करोड़ के इस देश में अंधे ने रेवड़ी बांटी, इनको दी! इनमें क्या खूबी थी? शायद रेड्डी और रेवड़ी में कुछ थोड़ा सा तुकबंदी हो तो हो, और तो कुछ कारण दिखाई नहीं पड़ता।
और अब? यह अभी पंद्रह दिन पहले ही उन्होंने कहा था कि परमात्मा के प्रसाद से मुझे यह रेवड़ी मिली। और अभी पंद्रह दिन बाद ही कहने लगे कि रेवड़ी सड़ी है, कि यह राजनीति तो बिलकुल सड़ी-गली है। अगली बार मुझे राष्ट्रपति नहीं बनना है।
यह बड़ा मजा हो गया। पंद्रह दिन पहले कह रहे थे: परमात्मा ने रेवड़ी दी। परमात्मा की रेवड़ी भी सड़ी-गली निकल गई! और अगर परमात्मा फिर रेवड़ी दे तो फिर क्या करोगे? माने ही नहीं, वह कहे कि नहीं, रेड्डी, लेना ही होगा! हम तो रेवड़ी तुम्हीं को देंगे! हमें कोई और जंचता ही नहीं। हम तो तुम्हीं को देंगे। तुमने खूब सम्हाल कर भी रखी! फिर क्या करोगे? क्या परमात्मा के प्रसाद को इनकार कर दोगे?
कैसे-कैसे आदमी धोखे अपने को देते हैं और दूसरों को देते हैं! परमात्मा का प्रसाद था, पंद्रह दिन में सड़ा-गला हो गया। और अब नहीं लेना इनको। अब ये कहते हैं, हमें राष्ट्रपति बनना ही नहीं! अरे तो पहले ही क्यों नहीं कह दिया कि हमें बनना ही नहीं है? तो परमात्मा और बड़ी रेवड़ी देता! मगर अब दिखता है कि रेवड़ी छिन जाएगी। इसके पहले कि छिने, साफ कह दो कि हमें चाहिए ही नहीं। अरे हमें लेना ही नहीं। हमें इस रेवड़ी में कोई रस नहीं। यह सड़ी-गली रेवड़ी! इसमें रखा क्या है?
धन मिल जाए, अगर तुम धन छोड़ कर भागो, तो घबड़ाहट होगी। हाथ-पैर कंपने लगेंगे। विनोबा भावे के सामने तुम रुपये ले जाओ--सौ रुपये का हरा नोट--और वे एकदम से आंख बंद कर लेते हैं! तुम ले जाकर देख लो। इसको अध्यात्म माना जाता है कि उन्होंने आंख बंद कर ली। मगर आंख बंद करने की...कागज को देख कर आंख बंद करते शर्म नहीं आती? मराठी मानुष हैं, इन्होंने कहानी तो सुनी ही होगी न रांका-बांका की!
मराठी कहानी है कि रांका एक बड़े संत पुरुष थे। मगर ऐसे ही संत पुरुष--भगोड़े, छोड़ कर भागे। धन छोड़ दिया, त्याग कर दिया धन का। लकड़ी काट-काट कर बेचते। उसी से जो मिल जाता, काम चलाते। एक बार तीन दिन वर्षा होती रही और लकड़ी काटने जाना मुश्किल हुआ। तीन दिन भूखे रहे। घर तो पैसा था नहीं पास में। मांग सकते नहीं थे--पुरानी अकड़। धन तो छूट गया, अकड़ नहीं गई थी। रस्सी जल जाती है, अकड़ नहीं जाती। अरे मांग लेते, मुहल्ले-पड़ोस वालों से मांग लेते। मगर मांगा नहीं। तीन दिन भूखे ही रहे। तीन दिन बाद गए। पत्नी भी साथ गई। क्योंकि कमजोर, तीन दिन की भूख, अकेले ला सकेंगे लकड़ी का गट्ठा या नहीं, तो दो बांट कर दो हिस्सों में ले आएंगे। लकड़ियां काटीं, बामुश्किल तो लकड़ियां काट पाए, फिर गट्ठा बांध कर चले। रास्ते में आ रहे थे कि देखा कि किसी घुड़सवार का...दिखता है, आगे-आगे एक घोड़ा निकला है, टापें अभी भी सुनाई पड़ रही हैं...उसकी बसनी गिर गई है। बसनी नगद सोने के सिक्कों से भरी है। कुछ सिक्के बसनी के बाहर भी गिर गए हैं। और सिक्के बसनी में भरे हुए हैं। सोचा रांका ने कि मैं तो पुरुष हूं...।
पुरुष को तो हमेशा यह खयाल है कि स्त्री तो नरक का द्वार है। पता नहीं अगर स्त्री नरक का द्वार है तो पुरुष ही नरक जा सकते हैं, स्त्रियां तो नरक जा ही नहीं सकतीं। द्वार कहां जाएगा? अरे द्वार तो द्वार पर रहेगा। इसलिए मैं तो मानता हूं कि स्त्रियों को खुश होना चाहिए कि कम से कम तुम द्वार तो हो! भेजो इन दुष्टों को, जाने दो! द्वार तो बाहर ही रहेगा न! ये जितने भैया आएं, इनको भेजते जाओ कि चले आओ, अंदर जाओ। और निकलने मत देना बाहर। भीतर कर दिया और फिर बाहर निकलने देना मत। और द्वार तो बाहर है ही। द्वार को क्या पड़ी है? द्वार का क्या लेना-देना नरक से? यह तो फायदे की बात है। संत तो गलती में कह गए। वे समझे नहीं इसका राज कि द्वार, फिर द्वार का क्या होगा?
रांका ने भी सोचा कि यह स्त्री है, पीछे आ रही है, कहीं इसका मन न डोल जाए, कहीं धन पर इसका मन न आ जाए। इतने सोने के सिक्के, तीन दिन की भूख! परेशानी! औरत औरत है, अरे औरत का क्या भरोसा!
पुरुषों को औरत का भरोसा ही नहीं है। और इस न भरोसे का कुल कारण इतना है कि खुद का भरोसा नहीं है। नहीं तो औरत से क्या तकलीफ है? स्त्रियों को पुरुषों पर इतना गैर-भरोसा नहीं है जितना पुरुषों को है। असलियत यह है कि पुरुषों को अपने पर भरोसा नहीं है, डर है।
जल्दी से उन्होंने बसनी को डाल दिया गङ्ढे में और मिट्टी से पूरने लगे। तभी उनकी पत्नी आ गई। उसने पूछा, क्या करते हो? तो सच बोलने की कसम खाई थी, इसलिए मजबूरी में सच बोलना पड़ा। कहा कि अब तुझसे कैसे छिपाऊं! मैंने कसम खा ली है सच बोलने की। यहां अशर्फियां पड़ी थीं--सोने की अशर्फियां, चमकती हुई अशर्फियां--सोचा कहीं तेरा मन न आ जाए। इसलिए उनको गङ्ढे में दबा कर मिट्टी से ढांक रहा हूं।
स्त्री खिलखिला कर हंसी। उसने कहा, यह भी हद हो गई! और तुम तो मुझे समझाते थे कि सोना मिट्टी है। मिट्टी में मिट्टी को दबाते तुम्हें शर्म नहीं आती? और तुम्हीं तो मुझे समझाते थे कि सोना मिट्टी है! और अब मिट्टी को मिट्टी में दबा रहे हो? अभी तुम्हें सोना दिखाई पड़ता है? अभी चमकदार सोना दिखाई पड़ता है?
तब से ही उनकी स्त्री का नाम बांका हुआ। रांका को मात दे दी न, इसलिए बांका!
अब विनोबा भावे को पता होगा--रांका और बांका की कहानी। महाराष्ट्र की ही घटना है। लेकिन वे भी नोट को देख कर आंख बंद कर लेते हैं। अरे जब कागज ही है तो आंख क्या बंद करना! दूसरे किसी कागज को देख कर आंख नहीं बंद करते, इसी कागज का क्या कसूर है? आंख बंद करने की क्या जरूरत?
कहीं भीतर रस मौजूद है। कहीं भीतर किसी न किसी तल पर रस मौजूद है। यह जो भीतर का रस है, वही इन उदघोषणाओं में प्रकट हुआ है। स्त्री का विरोध इसी भय के कारण शुरू हुआ।
तू जो पूछती है, सुलोचना, ठीक पूछती है कि "अतीत के सभी ज्ञानी, जिनमें पिछली सदी के परमहंस रामकृष्ण को भी सम्मिलित करना होगा'--करना ही होगा--"स्त्री के बहुत विरोध में थे। इसका क्या कारण हो सकता है?'
वे जो निन्यानबे झूठे संत हैं, जो स्त्रियों को, धन को छोड़ कर भागे हैं, उन्होंने बड़ा तूफान मचा रखा है। उन्होंने भाषा निर्णीत की, उन्होंने आध्यात्मिक बोलने का ढंग निर्णीत कर दिया। रामकृष्ण जैसे लोग गैर पढ़े-लिखे हैं, सुशिक्षित नहीं हैं, वे इसी भाषा को बेचारे बोलते हैं जो भाषा उन्होंने सुनी है। यद्यपि रामकृष्ण भलीभांति जानते हैं कि वे मुक्त हैं।
तुम जान कर हैरान होओगे कि रामकृष्ण अपनी पत्नी को मां कहते थे। और यूं नहीं कि बाद में कहने लगे थे। रामकृष्ण जब चौदह साल के थे, तब उनको पहली समाधि हुई। आ रहे थे अपने खेत से वापस। झील के पास से गांव में से गुजरते थे। सुंदर गांव की झील, सांझ का समय, सूरज का डूबना, बस डूबा-डूबा! सूरज की डूबती हुई किरणों ने, आकाश में फैली छोटी-छोटी बदलियों पर बड़े रंग फैला रखे हैं। वर्षा के दिन करीब आ रहे हैं। काली बदलियां भी छा गई हैं, घनघोर! जल्दी रामकृष्ण लौट रहे हैं। तभी बगुलों की एक पंक्ति झील से उड़ी और काली बदलियों को पार करती हुई निकल गई। काली बदलियों से सफेद बगुलों की पंक्ति का निकल जाना, जैसे बिजली कौंध गई। यह सौंदर्य का ऐसा क्षण था कि रामकृष्ण वहीं गिर पड़े। घर उन्हें लोग बेहोशी में लाए। लोग समझे बेहोशी है, वह थी मस्ती। बामुश्किल से वे होश में लाए जा सके।
उनसे पूछा, क्या हुआ?
उन्होंने कहा, अदभुत हुआ, बड़ा आनंद हुआ! बार-बार ऐसा ही होना चाहिए। अब मुझे होश में रहने की--जिसको तुम होश कहते हो--उसमें रहने की कोई इच्छा नहीं!
गांव के लोगों ने, घर के लोगों ने सोचा कि लड़का बिगड़ा जा रहा है। यह तो मामला खराब है। यह ऐसे भी साधु-संग करता था, जाता था सुनने सत्संग, तब तक भी ठीक था; अब यह समाधि में भी जाने लगा। अब यह बेहोश हो-हो कर गिरने लगा। यह मामला बिगड़ा जा रहा है। यह हाथ से गया। गदाधर उनका नाम था। जो घर के लोगों का आम सोचने का ढंग होता है, उन्होंने कहा, जल्दी से इसके विवाह वगैरह का इंतजाम करो, हथकड़ी-बेड़ी डाल दो, तो यह रास्ते पर आ जाएगा। सो रामकृष्ण से पूछा कि बेटा, विवाह करोगे?
रामकृष्ण ने कहा, करेंगे!
घर के लोग थोड़े चौंके। उन्होंने सोचा था यह इनकार करेगा।
उन्होंने कहा, जरूर करेंगे! किससे करना है?
घर के लोगों ने कहा, अरे! हम तो सोचते थे तू सत्संगी हो गया है, समाधि लगने लगी और गांव में बड़ी चर्चा है कि तू ज्ञानी हुआ जा रहा है। इसीलिए तो विवाह कर रहे हैं। और तू कहता है करेंगे, किससे करना है? तू इतनी जल्दी में है!
पास में ही गांव में एक लड़की खोजी गई। रामकृष्ण को दिखाने ले गए। रामकृष्ण को जब लड़की मिठाई परोसने आई। बंगाल, तो वहां संदेश परोसा होगा। जब संदेश उसने रामकृष्ण की थाली में रखे, रामकृष्ण ने देखा। शारदा उसका नाम था। खीसे में जितने मां ने रुपये रख दिए थे, सब निकाल कर उसके पैरों पर चढ़ा दिए, और कहा कि तू तो मेरी मां है। शादी हो गई।
लोगों ने कहा, तू पागल है रे! पहले तो शादी करने की इतनी जल्दी की और अब पत्नी को मां कह रहा है! कुछ अक्ल है? बेअक्ल कहीं का!
मगर उसने कहा कि यह तो मेरी मां है। शादी होगी, मगर यह मेरी मां ही रहेगी।
शादी भी हो गई। शादी में इनकार नहीं किया। इसको मैं खूबी कहता हूं रामकृष्ण की। इसलिए रामकृष्ण से मुझे प्रेम है, एक लगाव है। यह आदमी अदभुत है। शादी करने में इनकार ही नहीं किया। नोट देख कर आंख बंद करने वाला आदमी नहीं है यह। अरे शादी से भी नहीं भागा। मगर शादी भी किस मस्ती से की! कहा कि मेरी मां है। और फिर जीवन भर मां ही माना। मां ही कहते थे वे शारदा को। और हर वर्ष जब बंगाल में काली की पूजा होती, तो वे काली की पूजा तो साल भर करते थे, मगर जब काली की पूजा का दिन आता है, उस दिन वे शारदा की पूजा करते थे। और यूं नहीं, तुम थोड़े चौंकोगे, शारदा को नग्न बिठा लेते थे सिंहासन पर। नग्न शारदा की पूजा करते थे। नोट भी यूं नहीं कि कागज में लपेटा हो--अरे बिलकुल नोट, खाली नोट! शारदा को नग्न बिठा लेते सिंहासन पर। और फिर चिल्लाते, रोते, नाचते, मां और मां की गुहार मचा देते। शारदा पहले तो बहुत बेचैन होती थी कि किसी को पता न चल जाए, कि यह तुम क्या कर रहे हो! कोई क्या कहेगा! मगर धीरे-धीरे शारदा के जीवन में भी रामकृष्ण ने क्रांति ला दी।
रामकृष्ण की भाषा जरूर पुरानी है, सुलोचना, लेकिन रामकृष्ण उन सौ में से एक व्यक्तियों में से हैं। उन्होंने पत्नी को छोड़ा नहीं, हालांकि वे कहते यही रहे: कामिनी-कांचन से मुक्त हो जाओ! पुरानी भाषा। वे करें क्या? नई भाषा का उन्हें पता नहीं था।
मैं कहूंगा: कामिनी-कांचन से मुक्त होने का सवाल नहीं है, कामिनी-कांचन का अतिक्रमण करना है। रामकृष्ण ने वही किया--अतिक्रमण किया। मगर उनको इस भाषा का साफ-साफ भेद नहीं था। वे बोलते रहे पुराना ढंग, पुरानी शैली।
मगर रामकृष्ण जैसे सभी लोग नहीं हैं। निन्यानबे ज्ञानी तो, सुलोचना, अज्ञानी हैं, महाअज्ञानी हैं। वे सिर्फ बकवास कर रहे हैं। वे अपने भय का सिर्फ निवेदन कर रहे हैं। वे दो चीजों से डरे हैं: स्त्री से डरे हैं, क्योंकि स्त्री में सुख की आशा मालूम पड़ती है और धन से डरे हैं। बस दोनों को गालियां दे रहे हैं। उनकी गालियां सबूत हैं कि उनके भीतर रस मौजूद है।
अब वक्त आ गया कि यह पुराना ढर्रा बंद होना चाहिए। इसलिए मैं धर्म को नई भाषा देने की कोशिश कर रहा हूं। स्वभावतः मुझे गालियां पड़ेंगी। क्योंकि वे निन्यानबे लोग मेरी भाषा की बदलाहट से स्वभावतः नाराज होने वाले हैं। उनके तो हाथ से धंधा गया। उनकी तो मैं जमीन खींचे ले रहा हूं। हां, सौ में से वह जो एक व्यक्ति है, वह मेरे साथ राजी होगा। रामकृष्ण जैसा व्यक्ति मेरे साथ राजी होगा। रामकृष्ण मुझे मिल जाएं तो मैं उनकी भाषा बदल दूं। वे मुझसे राजी हो जाएंगे। वे कहेंगे, अरे यही मैं कहना चाहता था, मगर मुझे कहने का पता नहीं था! मुझे जो पता था, वैसा मैंने कह दिया था। यही कहना चाहता था।
जीसस मुझे मिल जाएं, मुझसे राजी होंगे। बुद्ध मुझे मिल जाएं, मुझसे राजी होंगे। लेकिन जिन बुद्धुओं को तुम ज्ञानी समझ रही हो, वे मुझसे राजी नहीं हो सकते।

आज इतना ही।

समाप्त