'अमृत
वाणी'
से
संकलित सुधा—बिन्दु
1970—71
एक आकाश, एक स्पेस
बाहर है, जिसमें
हम चलते हैं, उठते हैं, बैठते हैं—जहां
भवन निर्मित
होते हैं और
खंडहर हो जाते
हैं। जहां
पक्षी उड़ते, शून्य
जन्मते और पृथ्वीयां
विलुप्त होती
है—यह आकाश
हमारे बाहर है।
किंतु यह आकाश
जो बाहर फैला
है, यही
अकेला आकाश
नहीं है— 'दिस
स्पेस इज
नाट द ओनली
स्पेस' —एक
और भी आकाश है,
वह हमारे
भीतर है। जो
आकाश हमारे
बाहर है वह
असीम है।
वैज्ञानिक
कहते हैं, उसकी
सीमा का कोई
पता नहीं लगता।
लेकिन जो आकाश
हमारे भीतर
फैला है, बाहर
का आकाश उसके
सामने कुछ भी
नहीं है। कहें
कि वह असीम से
भी ज्यादा
असीम है। अनंत
आयामी उसकी
असीमता है— 'मल्टी डायमेंशनल
इनफिनिटी'
है।
बाहर के
आकाश में चलना,
उठना होता
है, भीतर
के आकाश में
जीवन है। बाहर
के आकाश में
क्रियाएं
होती है, भीतर
के आकाश में
चैतन्य है।
जो
बाहर के ही
आकाश में
खोजता रहेगा
वह कभी भी जीवन
से मुलाकात न
कर पाएगा।
उसकी चेतना से
कभी भेंट न
होगी। उसका
परमात्मा से
कभी मिलन न
होगा। ज्यादा
से ज्यादा
पदार्थ मिल
सकता है बाहर, परमात्मा
का स्थान तो
भीतर का आकाश
है, अंतराकाश
है, इनर
स्पेस है।
जीवन
के सत्य को
पाना हो तो
अंतर आकाश में
उसकी खोज करनी
पड़ती है।
लेकिन हमें
अंतर आकाश का
कोई भी अनुभव
नहीं है। हमने
कभी भीतर के
आकाश में कोई
उड़ान नहीं
भरी है। हमने
भीतर के आकाश
में एक चरण भी
नहीं रखा है, हम भीतर
की तरफ गए ही
नहीं। हमारा
सब जाना बाहर
की तरफ है। हम
जब भी जाते है
बाहर ही जाते
है।
मित्र
का प्रश्न
इससे संबंधित
है।
उन्होने
पूछा है कि जब
भीतर की
स्वरूप की
स्थिति परम
आनंद है तो यह
मन कहां से आ
जाता है? जब भीतर
नित्य आनंद का
वास है तो ये
मन के विचार
कैसे जन्म
जाते है? ये
कहां से अंकुरित
हो जाते है?
इस
अंतर आकाश के
संबंध में उसे
भी समझ लेना
उपयोगी है। यह
प्रश्न सदा
ही साधक के मन
में उठता है
कि जब मेरा
स्वभाव ही शुद्ध
है तो यह
अशुद्धि कहां
से आ जाती है? और जब मैं
स्वभाव से
अमृत हूं तो
यह मृत्यु कैसे
घटित होती है?
और जब भीतर
कोई विकार ही
नहीं है, निर्विकार,
निराकार का
आवास है सदा
से, सदैव
से, तो ये
विकार के बादल
कैसे घिर जाते
हैं, कहां
से इनका जन्म
होता है, कहां
इनका उदगम है?
इसे समझने
के लिए थोड़ी—सी
गहराई में
जाना पड़ेगा।
पहली
बात तो यह
समझनी पड़ेगी
कि जहां भी
चेतना है वहां
चेतना की
स्वतंत्रताओं
में एक स्वतंत्रता
यह भी है कि वह
अचेतन हो
सकेगी। ध्यान
रखें, अचेतन
का अर्थ जड़
नहीं होता।
अचेतन का अर्थ
होता है : चेतन,
जो कि सो
गया—चेतन, कि
छिप गया! यह
चेतना की ही
क्षमता है कि
वह अचेतन हो
सकती है। जड़
की यह क्षमता
नहीं है। आप
पत्थर से यह
नहीं कह सकते
कि तू अचेतन
है। जो चेतन
नहीं हो सकता
वह अचेतन भी
नहीं हो सकता।
जो जाग नहीं
सकता, वह
सो भी नहीं
सकता।
और
ध्यान रखें, जो सो
नहीं सकता वह जागेगा
कैसे? चेतना
की ही क्षमता
है अचेतन हो
जाना। अचेतन
का अर्थ चेतना
का नाश नहीं
है। अचेतन का
अर्थ है :
चेतना का
प्रसुप्त हो
जाना, छिप
जाना, अप्रगट हो जाना।
चेतना की
मालकियत है यह,
कि चाहे तो
प्रगट हो, चाहे
तो अप्रगट
हो जाए। यही
चेतना का
स्वामित्व है—या
कहें, यही
चेतना की
स्वतंत्रता
है। अगर चेतना
अचेतन होने को
स्वतंत्र न हो
तो चेतना
परतंत्र हो
जाएगी। फिर
आत्मा की कोई
स्वतंत्रता न
होगी।
इसे
ऐसे समझें कि
अगर आपको बुरे
होने की स्वतंत्रता
ही न हो तो
आपके भले होने
का अर्थ क्या
होगा? अगर
आपको बेईमान
होने की
स्वतंत्रता
ही न हो तो
आपके ईमानदार
होने का कोई
अर्थ होता है?
जब भी हम
किसी व्यक्ति
को कहते है कि
वह ईमानदार है
तो इसमें
निहित है, 'इम्प्लाइड'
है—कि वह
चाहता तो
बेईमान हो
सकता था, पर
नहीं हुआ। अगर
हो ही न सकता
हो बेईमान, तो ईमानदारी
दो कौडी
की हो जाती
है। ईमानदारी
का मूल्य
बेईमान होने
की क्षमता और
संभावना में
छिपा है।
जीवन
के शिखर छूने का
मूल्य जीवन की
अंधेरी घाटियों
में उतरने की
क्षमता में छिपा
है। स्वर्ग पहुंच
जाना इसीलिए
संभव है कि
नर्क की सीडी
भी हम पार कर
सकते है।
प्रकाश
इसीलिए पाने
की क्षमता है
कि हम अंधेरे
में भी हो
सकते हैं।
ध्यान रहे, अगर
आत्मा के लिए बुरा
होने का उपाय ही
न हो तो आत्मा
के भले होने
में बिलकुल ही
नपुंसकता इम्पोटेंसी
हो जायेगी।
विपरीत की शुविधा
होनी चाहिए।
और अगर चेतना को
भी विपरीत की
सुविधा नहीं
है तो चेतना
गुलाम है। और
गुलाम चेतना
का क्या अर्थ
होता है? उससे
तो अचेतन होना,
जड़ होना
बेहतर है।
यह
जो हमारे भीतर
छिपा हुआ परमात्मा
है,
यह परम
स्वतंत्र है,
'एब्सत्थूटफ्रीडम'
है। इसलिए शैतान
होने का उपाय
है, और
परमात्मा
होने की भी
सुविधा है। एक
छोर से दूसरे
छोर तक हम
कहीं भी हो
सकते है। और जहां
भी हम हैं
वहां होना
हमारी मजबूरी
नहीं, हमारा
निर्णय है—'अवर ओन डिसीजन'!
अगर मजबूरी
है तो बात खल
हो गयी।
अगर
मैं पापी हूं
और पापी होना
मेरी मजबूरी
है—पापी मुझे
परमात्मा ने
बनाया है, या
मैं
पुण्यात्मा
हूं और पुण्या
आ मुझे परमात्मा
ने बनाया है तो
मैं पत्थर की तरह
हो गया, मुझमें
चेतना न रही।
मैं एक बनायी हुई
चीज हो गया, फिर मेरे
कृत्य का कोई
दायित्व मेरे
ऊपर नहीं है।
एक
मुसलमान मित्र
मुझे मिलने
आये थे, कुछ दिन
हुए। बहुत समझदार
व्यक्ति है।
वह मुझसे कहने
लगे कि मै
बहुत लोगों से
मिला हूं बहुत
साधु संन्यासियों
के पास गया
हूं लेकिन कोई
हिंदू मुझे यह
नहीं समझा सका
कि आदमी पाप
में क्यों
गिरा?—हिंदू
जैन या बौद्ध,
इस भूमि पर
पैदा हुए तीनों
धर्म, यह
मानते हैं कि
अपने कर्मों के
कारण! उस
मुसलमान
मित्र का
पूछना बिलकुल
ठीक था। वह
कहने लगे, अगर
अपने कर्मों
के कारण गिरा
तो पहले जन्म
में जब उसकी
शुरुआत ही हुई
होगी तब तो
उसके पहले कोई
कर्म नहीं थे।
ठीक है, जब
पहला ही जन्म
हुआ होगा
चेतना का तब
तो वह निष्कपट,
शुद्ध हुई
होगी। उसके
पहले तो कोई
कर्म नहीं थे।
इस जन्म में
हम कहते हैं
कि फलां आदमी
बुरा है
क्योंकि
पिछले जन्म में
बुरे कर्म
किए। पिछले
जन्म में बुरे
कर्म किए
क्योंकि और
पिछले जन्म
में बुरे कर्म
किए। लेकिन
कोई प्रथम
जन्म तो मानना
ही पड़ेगा। उस
प्रथम जन्म के
पहले तो कोई
बुरे कर्म
नहीं हुए, तो
बुरे कर्म आ
कैसे गए?
मैंने
उन मुसलमान
मित्र से कहा—कि
यह बात बिलकुल
तर्कयुक्त
है। लेकिन क्या
इस्लाम और ईसाइयत
जो उत्तर देते
हैं उन पर
आपने विचार किया? उन्होंने
कहा, वह
ज्यादा ठीक
मालूम पड़ता है
कि ईश्वर ने
आदमी को बनाया,
जैसा चाहा
वैसा बनाया।
तो मैंने कहा—यही
थोड़ी—सी बात
समझनी है। इस
देश में पैदा
हुआ कोई भी
धर्म
जिम्मेदारी
ईश्वर पर नहीं
डालना चाहता,
मनुष्य पर
डालना चाहता
है। यह मनुष्य
की गरिमा की
स्वीकृति है। 'रिस्पासिबिलिटी इज ऑन
मैन, नाट
ऑन गॉड।'
ध्यान
रहे,
गरिमा तभी है
जब दायित्व हो।
अगर दायित्व
भी नहीं है—अगर
मैं बुरा हूं तो
परमात्मा ने बनाया,
भला हूं तो परमात्मा
ने बनाया—जैसा
हूं परमात्मा ने
बनाया तो सारी
जिम्मेवारी परमात्मा
की हो जाती है।
और तब और भी
उलझन खड़ी होगी
कि परमात्मा
को बुरा आदमी
बनाने में
क्या रस हो
सकता है? और
परमात्मा ही अगर
बुरा बनाता है
तो हमारी
अच्छे बनने की
कोशिश
परमात्मा के
खिलाफ पड़ती है।
इसका अर्थ
यह हुआ कि
परमात्मा तो
आदमी बुरा
बनाता है, और
तथाकथित साधु
संन्यासी
आदमी को अच्छा
बनाते हैं—यह
तो बड़ी
मुश्किल है!
गुरजिएफ कहा
करता था कि दुनियां
के सब महात्मा
परमात्मा के
खिलाफ मालूम
पड़ते है, दुश्मन
मालूम पड़ते
हैं। वह आदमी
को बुरा बनाता
है या जैसा भी
बनाता है, फिर
आप कौन है
सुधारने वाले?
कर्म का
सिद्धात कहता
है, व्यक्ति
पर
जिम्मेदारी
है लेकिन
व्यक्ति पर जिम्मेवारी
तभी हो सकती
है जब व्यक्ति
स्वतंत्र हो।
स्वतंत्रता
के साथ
दायित्व है—'फ्रीडम इम्प्लाइज
द रिस्पासिबिलिटी।’
अगर
स्वतंत्रता
नहीं है तो
दायित्व
बिलकुल नहीं
है। अगर
स्वतंत्रता
है तो दायित्व
है। लेकिन
स्वतंत्रता
सब द्वयमुखी
है। दोनों तरफ
की
स्वतंत्रता
ही
स्वतंत्रता
होती है।
मुल्ला
नसरुद्दीन
ने अपने बेटे
से कहा है—जब
बेटा बड़ा हो
गया, कि
तिजोरी तेरी
है, चाभी
भर मेरे पास
रहेगी। ऐसे तू
जितना भी खर्च
करना चाहे, खर्च कर
सकता है लेकिन
ताला भर मत
खोलना! स्वतंत्रता
पूरी दी जा
रही मालूम
पड़ती है, और
जरा भी नहीं
दी जाती।
मैने
एक मजाक सुना
है कि जब पहली
दफा फोर्ड ने
कारें बनायी अमरीका
में तो एक ही
रंग की बनायी, काले रंग
की। और फोर्ड
ने, अपनी फैक्ट्री
के दरवाजे पर
एक वचन लिख
छोड़ा था—'यू
कैन द्य ऐनी कलर प्रोवाइडेड
इट इज ब्रैक'—आप कोई भी
रंग चुन सकते
है, अगर वह
काला है तो!
काले रंग की
कुल गाड़ियां
ही थीं, कोई
दूसरे रंग की
तो गाड़ियां
थीं नहीं।
लेकिन
स्वतंत्रता
पूरी थी, आप
कोई भी रंग
चुन लें, बस
काला होरा
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