या जब कभी अंत:
श्वास और बहिर्श्वास
एक दूसरे में विलीन
होती है, उस
क्षण में
ऊर्जारहित,
ऊर्जापूरित
केंद्र को स्पर्श
करो।
हम
केंद्र और
परिधि में
विभाजित है।
शरीर परिधि
है। हम शरीर
को, परिधि को
जानते है।
लेकिन हम यह
नहीं जानते कि
कहां केंद्र
है। जब
बहिर्श्वास
अंत:श्वास
में विलीन
होती है। जब
वे एक हो जाती
है। जब तुम यह
नहीं कह सकते
कि यह अंत:श्वास
है कि बहिर्श्वास,
जब यह बताना
कठिन हो कि श्वास
भीतर जा रही
है कि बाहर जा
रही है। जब श्वास
भी तर प्रवेश
कि बाहर की
तरफ मुड़ने
लगती है, तभी
विलय का क्षण
है। तब श्वास
जाती है और न
भीतर आती है।
श्वास
गतिहीन है। जब
वह बहार जाती
है, गतिमान है, जब
वह भीतर आती
है, गतिमान
है। और जब वह
दोनों में कुछ
भी नहीं करती
है। तब वह मौन
है, अचल है। और
तब तुम केंद्र
के निकट हो।
आने वाली और
जाने वाली श्वासों
का यह विलय
विंदु तुम्हारा
केंद्र है।









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