दिनांक
1 दिसंबर ,1978;
श्री
रजनीश आश्रम,
पूना।
सारसूत्र
:
वढ़
अणं लोअअ गोअर
तत्त पंडित
लोअ अगम्म।
जो
गुरुपाअ पसण
तंहि कि चित्त
अगम्म।।1।।
सहजें
चित्त विसोहहु
चंग।
इह
जम्महि
सिद्धि मोक्ख
भंग।।2।।
सचल
णिचल जो
सअलाचर।
सुण
णिरंजण म करू
विआर।।3।।
हंउ
जग हंउ बुद्ध
हंउ णिरंजण।
हंउ
अमणसिआर
भवभंजण।।4।।
तित्थ
तपोवण म करहु
सेवा।
देह
सुचिहि ण
स्सन्ति
पावा।।5।।
देव
म पूजहू तित्थ
ण जावा।
देव
पूजाहि ण
मोक्ख पावा।।6।।



