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गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

सहज--योग--(सरहपा--तिलोपा) --ओशो

सहज योग—(सरहपा—तिलोपा)
ओशो

(सरहपा—तिलोमा वाणी पर आधारित ओशो के बीस अमृत प्रवचन: प्रथम दस प्रवचन सरहपा वाणी पर है, क्रमश: एक प्रवचन सूत्र पर और चार प्रवचन प्रश्‍नोतर; दूसरे दस प्रवचनतिलोपा वाणी पर, क्रमश: एक प्रवचन सूत्र पर और चार प्रवचन प्रश्‍नोत्‍तर। प्रवचन स्‍थल: श्री रजनीश आश्रम पूना। दिनांक 21 नवंबर से 10 दिसंबर 1978 तक।)

 हज योग कहता है: मनुष्‍य अभी जहां है वहींसे परमात्‍मा से जुड़ा है। जरा पहचानने की बात है; जरा गैल पकड़ लेने की बात है। रास्‍ता है; एक अदृष्‍य सेतु हमें जोड़े हुए है। हम सुख जो जानते है, तो फिर महासूख हमसे बहुत दूर नहीं है। विजातीय नहीं है। हम सुख जानते है। तो महासूख भी जान सकते है। हमने बूंद जानी है तो सागर को भी जान सकते है। क्‍योंकि सागर बूंदों का ही जोड़ है। ऐसे ही महासुख सुखों का ही जोड़ है। और क्‍या है? सुख होगी बूंद, महासूख होगा सागर।


जो भेद है वह सहज योग की दृष्‍टि से, वह मात्रा का है, गुण का नहीं। बस यही सहज-योग का क्रांतिकारी उदघोष है। शरीर सूख में और आत्‍म सूख में जो भी भेद है। वह मात्रा का है। सहज—योग के अनुसार मात्रा का है। भीतरका महासूख है, बाहर का बिलकुल छोटा—सा सुख है। मगर दोनों जुडें है एक से।


ओशो