दलीलों के पीछे छिपाममत्व और हिंसा—
अध्याय (1—2) ओशो—प्रवचन—चौथा
प्रश्न :
भगवान श्री, आज सुबह आपने
बताया कि गीता अध्यात्म—शास्त्र नहीं है, मानस—शास्त्र है। मगर
आपने यह भी बताया कि राम में रावण का अंश होता है और रावण में राम का होता है। वैसे
ही गीता में भी क्या ऐसा नहीं हो सकता कि शास्त्र में भी अध्यात्म का कुछ अंश आ गया
हो?
मैं अध्यात्म को ऐसी अनुभूति
कहता हूं, जो अभिव्यक्त नहीं हो सकती। इशारे दिए जा सकते हैं, लेकिन
इशारे अभिव्यक्तिया नहीं हैं। चांद को अंगुली से बताया जा सकता है, लेकिन अंगुली चांद नहीं है।
गीता को जब मैंने कहा कि मनोविज्ञान है, तो मेरा अर्थ
ऐसा नहीं है, जैसे कि फ्रायड का मनोविज्ञान है। फ्रायड का मनोविज्ञान
मन पर समाप्त हो जाता है; उसका कोई इशारा मन के पार नहीं है।
मन ही इति है, उसके आगे और कोई अस्तित्व नहीं है। गीता ऐसा मनोविज्ञान
है, जो इशारा आगे के लिए करता है। लेकिन इशारा आगे की स्थिति
नहीं है।






