पत्र—पाथय—48
निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
जबलपुर
(म. प्र.)
आर्चाय
रजनीश
दर्शन
विभाग
महाकोशल
महाविद्यालय
25 मार्च 1962
प्रिय मां,
दोपहर
तप गई है।
पलाश वृक्षों
पर फूल
अंगारों की
तरह चमक रहे हैं।
एक
सुनसान
रास्ते से
गुजरता हूं।
बांसों के घने
झुरमुट हैं और
उनकी छाया भली
लगती है।
कोई अपरिचित
चिड़िया गीत
गाती है। उसके
निमंत्रण को मान
वहीं रुक जाता
हूं। एक
व्यक्ति साथ
हैं। पूछ रहे
हैं, ‘‘क्रोध
को कैसे जीते,
काम को कैसे
जीते?'' यह
बात तो अब रोज—रोज
पूछी जाती है।
इसके पूछने
में ही भूल है।
यही उनसे कहता
हूं। समस्या
जीतने की है
ही नहीं।
समस्या मात्र
जानने की है।
हम न क्रोध को
जानते हैं और
न काम को
जानते हैं।




