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मंगलवार, 22 मार्च 2016

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--48)

पत्रपाथय48

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय
25 मार्च 1962

प्रिय मां,
दोपहर तप गई है। पलाश वृक्षों पर फूल अंगारों की तरह चमक रहे हैं।
एक सुनसान रास्ते से गुजरता हूं। बांसों के घने झुरमुट हैं और उनकी छाया भली लगती है।
कोई अपरिचित चिड़िया गीत गाती है। उसके निमंत्रण को मान वहीं रुक जाता हूं। एक व्यक्ति साथ हैं। पूछ रहे हैं, ‘‘क्रोध को कैसे जीते, काम को कैसे जीते?'' यह बात तो अब रोज—रोज पूछी जाती है। इसके पूछने में ही भूल है। यही उनसे कहता हूं। समस्या जीतने की है ही नहीं। समस्या मात्र जानने की है। हम न क्रोध को जानते हैं और न काम को जानते हैं।

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--47)

पत्र—पाथय—47  

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

प्रिय मां,
सांझ से ही आधी पानी है। हवाओं ने थपेड़ों से बड़े—बड़े वृक्षों को हिला डाला है। बिजली बद हो गई और नगर में अंधेरा है।
घर में एक दीपक जलाया गया है।
उसकी लौ ऊपर की और उठ रही है दीया भूमि का भाग है पर लौ न मालूम किसे पाने निरंतर ऊपर की और भागती रहती है।
लौ की भांति मनुष्य की चेतना है।

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--46)

पत्र—पाथय—46

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय
प्रिय मां,
एक कागज की नाव पानी में डूब गई है।
कल कुछ रेत के घरोंदे बच्चों ने बनाए थे वे भी मिट गये हैं।
रोज नावें डूबती हैं और रोज घरोंदे टूट जाते हैं।
एक महिला आईं थीं। सपने उनके पूरे नहीं हुए हैं। जीवन से मन उनका उचाट है। आत्म हत्या के विचार ने उन्हें पकड़ लिया है। आंखें गड्डों में चली गई हैं और सब व्यर्थ मालूम होता है।
मैंने कहा, ‘‘सपने किसके पूरे होते हैं। सब सपने अंतत: दुःख ही देते हैं; कारण, कागज की नावें कहीं भी तो कितनी दूर बह सकती हैं? इसमें भूल सपनों की नहीं है।

मौलिलकता का दूसरा नाह है ओशो—स्‍वामी चैतन्‍य कीर्ति

ओशो सर्वथा मौलिक हैं, क्योंकि उनकी
सत्व की अनुणतइ शाख्यों रो नहीं हुई,
उधार ज्ञान से नहीं हुई, परमात्मा के मूल
स्‍त्रोत से जुड़ने से हुई है। जो मूल से जुड
जाता है वह मौलिक हो जाता है।

ओशो कौन हैं? यह प्रश्न लाखों नए जिज्ञासुओं का भी प्रश्न है। इस प्रश्न का उत्तर देना बहुत कठिन है, क्योंकि कोई भी उत्तर बहुत छोटा और ओछा होगा, कण मात्र कह पाएंगें और एक महासागर पीछे छूट जाएगा। ओशो एक ऐसे बहु— आयामी व्यक्तित्व का नाम है— व्यक्तित्व ही नहीं, अस्तित्व का नाम है।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--30)

अध्याय—तीस

मुर्शिद मिकेयन का स्वम्न सुनाते हैं

नरौंदा : मुर्शिद के बेसार से लौटने से पहले और उसके बाद काफी समय तक हमने मिकेयन को एक मुसीबत में पड़े व्यक्ति की तरह आचरण करते देखा। अधिकतर वह अलग रहता, न कुछ बोलता, न खाता और कम ही अपनी कोठरी से बाहर निकलता। अपना भेद वह मुझे भी नहीं बता रहा था। और हम सब चकित थे कि मुर्शिद उसे बहुत चाहते हैं. फिर भी वे उसकी पीड़ा को कम करने के लिये न कुछ कह रहें है न कुछ कर रहे हैं।

एक दिन जब मिकेयन तथा बाकी साथी अँगीठी के चारों ओर बैठे आग ताप रहे थे, मुर्शिद ने निज घर के लिये महाविरह के विषय में प्रवचन आरम्भ किया।
मीरदाद : एक बार किसी ने एक सपना देखा। और वह सपना यह था.
उसने अपने आप को एक चौड़ी. गहरी खामोशी से बहती नदी के हरे —भरे तट पर खड़े देखा। तट हर आयु के और हर बोली बोलने वाले स्त्री —पुरुषों और बच्चों के विशाल समूहों से भरा हुआ था।. सबके पास अलग —अलग नाप तथा रंग के पहिये थे जिन्हें वे तट पर ऊपर और नीचे की ओर ठेल रहे थे।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--29)

अध्याय—उनतीस


शमदाम साथियों को मना कर
अपने साथ मिलाने का असफल यत्न करता है
मीरदाद चमत्कारपूर्ण ढंग से लौटता है
और शमदाम के अतिरिक्त
सब साथियों को विश्वास का चुम्बन प्रदान करता है

नरौंदा : जाड़े ने हमें आ दबोचा था, बहुत फ्लू, बर्फीले, कँपा देने वाले जाड़े ने।
खामोश, साँस रोके खड़े थे बर्फ में लिपटे पहाड़। केवल नीचे वादियों में दिखाई देते थे मुरझाई हरियाली के खण्ड और, कहीं—कहीं बल खाती सागर की ओर वही जा रही तरल चाँदी की कोई रेखा।
सातों साथी कभी आशा की तो कभी सन्देह की लहरों के थपेड़े खा रहे थे।
मिकेयन मिकास्तर तथा जमोरा इस आशा का दामन थामे हुए थे कि मुर्शिद अपने वचन के अनुसार लौट आयेंगे। बैद्य, हिम्बल तथा अबिमार मुर्शिद के लौटने के बारे में अपने सन्देह को पकड़े बैठे थे। किन्तु सब एक भयानक खालीपन तथा वेदनापूर्ण निरर्थकता का अनुभव कर रहे थे।

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--05)

रस की प्‍यास आस नहीं औरां—(प्रवचन—पांचवां)
दिनांक 16 मई 1979;  श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र :

संतो, मगन भया मन मेरा।
अहनिस सदा एकरस लाग्या, दिया दरीबै डेरा।।
कुल मरजाद मैंड सब लागो, बैठा भाठी नेरा। 
जात—पाँत कछु समझौ नाहीं, किसकूँ करै परेरा।।
रस की प्यास आस नहिं औराँ, इहि मत किया बसेरा।
ल्याव ल्याव ऐही लय लागी, पीवै फूल घनेरा।।
सो रस माँग्या मिलै न काहू, सिर साटे बहुतेरा।
जन रज्जब तनमन दे लीया, होइ धनी का चेरा।।

प्राणपति न आए हो, बिरहिण अति बेहाल।
बिन देखे अब जीव जातु है विलमकीजै लाल।।
बिरहिण ब्याकुल केसवा, निसदिन दुःखी बिहाइ
जैसे चंद कुमोदिनी, बिन देखे कुमिलाइ।।
खिन खिन दुखिया दगाधिये, विरह—विथा तन पीर।
घरी पलक में बिनसिये ज्यूँ मछरी बिन नीर।।
पीव पीव टेरत दिन भई, स्वातिसुरूपी आव।
सागर सलिता सब भरे, परि चातिग कै नहिं चाव।।
दीन दुःखी दीदार बिन, रज्जब धन बेहाल।
दरस दया करि दीजिये, तौ निकसै सब साल।।

"संतो, मगन भया मन मेरा!'

जीवन रहस्‍य--(प्रवचन--13)

जीवन क्‍या है?—(प्रवचनतैहरवां)

मेरे प्रिय आत्मन्!
जीसस से कोई पूछ रहा था कि आपका जन्म कब : हुआ? तो जीसस ने जो उत्तर दिया वह बहुत हैरानी का है। यहूदियों का एक बहुत पुराना पैगंबर हुआ है अब्राहम, जीसस से कोई दो हजार साल पहले। अब्राहम यहूदियों के इतिहास में पुराने से पुराना नाम है। जीसस ने कहा कि अब्राहम था, उसके भी पहले मैं था।
विश्वास नहीं हुआ होगा सुनने वाले को। क्योंकि विश्वास हमें केवल उसी बात का होता है, जिसका हमें अनुभव हो। बात पहेली ही मालूम पड़ी होगी, क्योंकि अब्राहम के पहले जीसस के होने की कोई संभावना नहीं मालूम होती। शरीर तो हो ही नहीं सकता। लेकिन जीसस जैसा आदमी व्यर्थ ही झूठ बोले, यह भी संभव नहीं है।

सोमवार, 21 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--28)

अध्याय—अट्ठाईस

बेसार का सुलतान
शमदाम के साथ नीड़ मे आता है
युद्ध और शान्ति के विषय में सुलतान और मीरदाद में वार्तालाप
शमदाम मीरदाद को जाल में फँसाता है

नरौंदा : मुर्शिद ने अपनी बात समाप्त की ही थी और हम उनके शब्दों पर विचार कर रहे थे, तभी बाहर भारी पद—चाप और उसके साथ दबे स्वर में कुछ अस्पष्ट बातचीत सुनाई दी। शीघ्र ही दो विशालकाय सिपाहां, जो एड़ी से चोटी तक शस्त्रों से सज्जित थे, द्वार पर आये और उसके दोनों ओर खड़े हो गये। उनके हाथों में नंगी तलवारें थीं जो धूप में चमक रही थीं।
उनके बाद राजचिह्नों से सज्जित एक युवा सुलतान आया जिसके पीछे—पीछे शमदाम सकुचाया —सा चला आ रहा था, और शमदाम के पीछे थे दो और सिपाही।
सुलतान दूधिया पर्वत—माला के सबसे अधिक शक्तिशाली और दूर तक विख्यात शासकों में से एक था। वह क्षण भर के लिये द्वार पर रुका और उसने अन्दर एकत्रित व्यक्तियों के चेहरों को ध्यानपूर्वक देखा। फिर अपनी बड़ी —बड़ी, चमकती हुई आंखें मुर्शिद पर टिकाते हुए उसने बहुत नीचे तक मस्तक झुकाया और कहा :

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--27)

अध्यायसत्ताईस

सत्य का उपदेश क्या सबको दिया जाना चाहिये
या कुछ चुने हुए व्यक्तियों को?
अगर — बेल के दिवस से एक दिन पहले
अपने लुप्त होने का भेद मीरदाद प्रकट करता है
और झूठी सत्ता की चर्चा करता है

नरौंदा : प्रीति—भोज जब स्मृति —मात्र रह गया था. उसके काफी समय बाद एक दिन सातों साथी पर्वतीय नीड़ में मुर्शिद के पास इकट्ठे हुए थे। उस दिन की स्मरणीय घटनाओं पर जब साथी विचार कर रहे थे तो मुर्शिद चुप रहे। कुछ साथियों ने उत्साह के उस महान उद्वेग पर आश्चर्य प्रकट किया जिसके साथ जनसमूह ने मुर्शिद के वचनों का स्वागत किया था।
कुछ और ने शमदाम के उस समय के विचित्र तथा रहस्यपूर्ण व्यवहार पर टिप्पणी की जब सैकडों ऋण —आलेख नौका के कोषागार से निकाल कर सबके सामने नष्ट कर दिये गये थे, शराब के सैकड़ों मर्तबान और मटके तहखानों में से निकाल कर दे दिये गये थे और अनेक मूल्यवान उपहार लौटा दिये गये थे, क्योंकि उस समय शमदाम ने किसी प्रकार का विरोध — जिसका हमें डर था — नहीं किया था, बल्कि चुपचाप, बिना हिले —डुले, आँखों से आंसुओं की धारा बहाते हुए सब —कुछ देखता रहा था।

जीवन रहस्‍य--(प्रवचन--12)

धन्‍य है वे जो सरल है(प्रवचनबाहरवां)

क छोटी सी कहानी कहूं और उससे ही अपनी चर्चा शुरू करूं।
एक रात, एक सराय में, एक फकीर आया। सराय भरी हुई थी, रात बहुत बीत चुकी थी और उस गांव के दूसरे मकान बंद हो चुके थे और लोग सो चुके थे। सराय का मालिक भी सराय को बंद करता था, तभी वह फकीर वहां पहुंचा और उसने कहा, कुछ भी हो, कहीं भी हो, मुझे रात भर टिकने के लिए जगह चाहिए ही। इस अंधेरी रात में अब मैं कहां खोजूं और कहां जाऊं! सराय के मालिक ने कहा, ठहरना तो हो सकता है, लेकिन अकेला कमरा मिलना कठिन है। एक कमरा है, उसमें एक मेहमान अभी—अभी आकर ठहरा है, वह जागता होगा, क्या तुम उसके साथ ही उसके कमरे में सो सकोगे? वह फकीर राजी हो गया। एक कमरे में दो मेहमान ठहरा दिए गए।

जीवन रहस्‍य--(प्रवचन--11)

प्रेम करना : पूजा नहीं(प्रवचनग्‍याहरवां)

क खलीफा सिकंदरिया पहुंचा था। और सिकंदरिया के बहुत बड़े विराट पुस्तकालय में उसने आग लगवा दी थी। उस खलीफा ने जाकर उस पुस्तकालय के अध्यक्ष को कहा था— एक हाथ में कुरान लेकर और एक हाथ में मशाल—उससे कहा था कि मैं यह पूछने आया हूं कि कुरान में जो कुछ लिखा है, तुम्हारे इस पुस्तकालय में जो किताबें हैं, क्या उनमें भी वही लिखा है जो कुरान में लिखा है? अगर वही लिखा है तो इतनी किताबों की कोई जरूरत नहीं, कुरान काफी है, कुरान पर्याप्त है। और अगर तुम यह कहो कि इन किताबों में ऐसी बातें भी लिखी हैं जो कुरान में नहीं हैं,
तो मैं कहूंगा, ये किताबें खतरनाक हैं, क्योंकि सत्य सब कुरान में लिखा है, उसके अतिरिक्त जो भी है वह असत्य है। दोनों हालतो में मैं कुरान की कसम लेकर और कुरान को साक्षी रख कर इस मशाल से इस पुस्तकालय में आग लगाता हूं।

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--04)

संन्‍यास : अस्‍तित्‍व के साथ प्रेम की कला—(प्रवचन—चौथा)
दिनांक 14 मई सन्1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1—आप मंदिर—मस्जिदों के इतने खिलाफ हैं, फिर आप स्वयं क्यों यह विशाल मंदिर बना रहे हैं?
2—कल संन्यास लिया हूं। रज्जब जी की तरह घोड़े पर मौर पहनकर सवार तो नहीं, हताशा और विषाद से भरा हूं। संसार में डूबकर कुछ पा सकँगा, ऐसी मेरी हैसियत नहीं। ऐसे में क्या मेरा संन्यास उचित है? आशीष दें कि मेरा संन्यास भगोड़े का परिणाम न बने!
3—जीवन में इतना दुःख क्यों है?
4—एक संन्यासी द्वारा अपने एक संन्यासी गुरुभाई के संबंध में प्रश्न!
5—..... मैं निपट नास्तिक हूं। ध्यान भी करता हूं, पर मन का कोई सहयोग नहीं रहता। आपके प्रवचनों में अनोखा आकर्षण, मन को आनंदाभिभूत प्रेरणाएँ; मन की गुत्थियाँ खुल जाना तथा आपके प्रति अगाध श्रद्धा से भर जाना। क्या मैं आपके संन्यास के योग्य हूं?

चेतना की अंतहीन लहर है ओशो—अमृत साधना


 ओशो के बारे में क्‍या कहें? परम विध्वंसक?
या एक द्रष्टा जो दृष्टि बन जाता है?
निश्चित रूप से अस्‍तित्व के लिए एक प्रस्ताव कि हर
व्यक्ति को चेतना के अनुभव का आनंद लेने का जन्‍मसिद्ध अधिकार है।
ओशो दर्शन में कोई पूर्ण विराम नहीं है, यह एक—अंतहीन प्रवाह है चेतना का।
--अमृत साधना

रविवार, 20 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--26)

अध्याय—छबीस

अंगूर—बेल के दिवस पर आये
यात्रियों को मीरदाद प्रभावशाली उपदेश देता है
और
नौका को कुछ अनावश्यक भार से मुक्त करता है

मीरदाद : देखो मीरदाद को — अंगूर की उस बेल को जिसकी फसल अभी तक नहीं काटी गई, जिसका रस अभी तक नहीं पिया गया। अपनी फसल से लदा हुआ है मीरदाद। पर, अफसोस, लुनेरे दूसरी ही अगर —वाटिकाओं में व्यस्त हैं।
और रस की बहुलता से मीरदाद का दम घुट रहा है। लेकिन पीने और पिलाने वाले दूसरी ही शराबों के नशे में चूर हैं।

हल, कुदाल और दराँती चलाने वालो, तुम्हारे हलों, कुदालों और दराँतियों को. मैं आशीर्वाद देता हूँ।
आज तक तुमने क्या जोता है, क्या खोदा है, क्या काटा है '

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--25)

अध्याय—पच्चीस

अगर — बेल का दिवस और उसकी तैयारी
उससे एक दिन पहले मीरदाद लापता पाया जाता है

नरौंदा : अंगूर—बेल का दिवस निकट आ रहा था और हम नौका के निवासी, जिनमें मुर्शिद भी शामिल थे, बाहर से आये स्वयंसेवी सहायकों की टुकड़ियों के साथ रात —दिन बड़े प्रीतिभोज की तैयारियों में जुटे थे। मुर्शिद अपनी सम्पूर्ण शक्ति से और इतने अधिक उत्साह के साथ काम कर रहे थे कि शमदाम तक ने स्पष्ट रूप से सन्तोष प्रकट करते हुए इस पर टिप्पणी की।
नौका के बड़े —बड़े तहखानों को बुहारना था और उनकी पुताई करनी थी और शराब के बीसियों बड़े—बडे मर्तबानों और मटकों को साफ करके यथास्थान रखना था ताकि उनमें नई शराब भरी जा सके।
उतने ही और मर्तबानों और मटकों को, जिनमें पिछले साल के अंगूर की फसल से बनी शराब रखी थी, सजा कर प्रदर्शित करना था ताकि ग्राहक शराब को आसानी से चख और परख सकें. क्योंकि हर अंगूर—बेल के दिवस पर गत वर्ष की शराब बेचने की प्रथा है।

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--03)

म्‍हारो मंदिर सूनो राम बिन—(प्रवचन—तीसरा)
दिनांक 14 मई 1979;  श्री रजनीश आश्रम पूना।
सूत्र:

संतो, ऐसा यहु आचार।
पाप अनेक करै पूजा में, हिरदै नहीं विचार।। 
चींटी दस चौके में मारें, घुण दस हांडी माहीं।
चाकी चूल्है जीव मारै जो, सो समझै कछु नाहीं।।
पाती फूल सदा हीं तोड़ैं, पूजन कूँ पाषाण।
छार पतंगा होहिं आरती, हिरदै नहीं बिनाण।।
सगले जनम जीव संहारै, यहु खोटे षटकर्मा
पाप प्रपंच चढ़ै सिरि ऊपरि, नाम कहावै धर्मा।।
आप दुःखी औरां दुःखदायक, अंतरि राम न जान्या
जन रज्जब दुःख देहि दुष्टि बिन, बाहरि पाखंड ठान्या।।

शनिवार, 19 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--24)

अध्याय—चौबीस

खाने के लिये मारना क्या उचित है?
ब शमदाम और कसाई चले गये तो मिकेयन ने मुर्शिद से पूछा :
मिकेयन : खाने के लिये मारना क्या उचित नहीं है मुर्शिद?
मीरदाद : मृत्यु से पेट भरना मृत्यु का आहार बनना है। दूसरों की पीड़ा पर जीना पीड़ा का शिकार होना है। यही आदेश है प्रभु —इच्छा का। यह समझ लो और फिर अपना मार्ग चुनो मिकेयन।
मिकेयन : यदि मैं चुन सकता तो अमरपक्षी की तरह वस्तुओं की सुगन्ध पर जीना पसन्द करता, उसके मांस पर नहीं।

मीरदाद : तुम्हारी पसन्द सचमुच उत्तम है। विश्वास करो, मिकेयन, वह दिन आ रहा है जब मनुष्य वस्तुओं की सुगन्ध पर जियेंगे जो उनकी आत्मा है' उनके रक्त—मांस पर नहीं। और तड़पने वालों के लिये वह दिन दूर नहीं।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--23)

अध्याय—तेईस

मीरदाद सिम—सिम को स्वस्थ करता है
और बुढ़ापे के बारे में चर्चा करता है

नरौदा : नौका की पशुशालाओं की सबसे बूढ़ी गाय सिम —सिम पाँच दिन से बीमार थी और चारे या पानी को मुँह नहीं लगा रही थी। इस पर शमदाम ने कसाई को बुलवाया। उसका कहना था कि गाय को मार कर उसके मास और खाल की बिक्री से लाभ उठाना अधिक समझदारी है, बनिस्बत इसके कि गाय को मरने दिया जाये और वह किसी काम न आये।

जब मुर्शिद ने यह सुना तो गहरे सोच में ड़ब गये, और तेजी से सीधे पशुशाला की ओर चल पड़े तथा सिम—सिम के थान पर जा पहुँचे। उनके पीछे—पीछे सातों साथी भी वहाँ पहुँच गये।
सिम—सिम उदास और हिलने —डुलने में असमर्थ —सी थी। उसका सिर नीचे लटका हुआ था, आँखें अधमुँदी थीं, शरीर के बाल सख्त और कान्ति —हीन थे। किसी ढीठ मक्खी को उडाने के लिये वह कभी —कभी अपने कान को थोड़ा —सा हिला देती थी।