कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

केनोउपनिषद--प्रवचन--06

परमात्‍मा आस्‍तित्‍व है—छठवां—प्रवचन

दिनांक 11 जुलाई 1973प्रात:माउंट आबू राजस्थान।

सूत्र:

यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षषि पश्यति

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।। 6।।

 यच्छोत्रेण न शृणोति येन श्रोतमिद श्रुतम्।
 तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।। 7।।

 यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राण: प्रणीयते।
  तदेव ब्रह्म त्वं विद्ध नेदं यदिदमुपासते।। 8।।

           

                  केनोपनिषद प्रथम अध्याय

                        6
जिसे दृष्टि नहीं देख पाती लेकि?न जो दृष्टि को देख पाता है—तू जान कि वही एकमात्र ब्रह्म हैऔर वह नहीं जिसकी लोग यहां पूजा करते हैं।

                        7
जिसे कान नहीं सुन पाते लेकिन जो कानों को सुन पाता है—
तू जान कि वही एकमात्र ब्रह्म हैऔर वह नहीं जिसकी लोग यहां पूजा करते हैं।

                        8
जिसे प्राण प्रगट नहीं कर पाते लेकिन जो प्राण को प्रगट कर पाता है—तू जान कि वही एकमात्र ब्रह्म हैऔर वह नहीं जिसकी लोग यहां पूजा करते हैं।



यह सदी एक बड़ी विचित्र घोषणा से प्रारंभ हुई। और उस घोषणा को करने वाला फ्रेडरिक नीत्‍शे था। उसने कहा, ‘’परमात्‍मा मर गया है। और इसलिए आदमी पूर्णत: स्‍वतंत्र है।‘’ जब यह घोषणा की गई थी तब यह बड़ी विचित्र मालूम पड़ी थी। लेकिन यह भविष्‍यवाणी सही सिद्ध हुई। और धीरे—धीरे यह बात आधुनिक मन के लिए आधार स्‍तंभ हो गई।

सचमुच आज के आदमी के लिए परमात्‍मा मर गया है। ऐसा नहीं है कि परमात्‍मा मर गया है; यदि परमात्‍मा मर जाए तो फिर कुछ भी जीवित नहीं रह सकता। क्‍योंकि परमात्‍मा से हमारा मतलब है, एक मूलभूत, शाश्‍वत जीवन जो कि अस्‍तित्‍व की आधारशिला है। लेकिन आधुनिक मनुष्‍य के लिए परमात्‍मा मर गया है। अथवा हम यूं भी कह सकते है कि आज का आदमी परमात्‍मा की और मर चूका है। संबंध टूट चूका है। वह सेतु अब नहीं रहा। चाहे तुम विश्‍वास करो, या न करो, इससे कोई भेद नहीं पड़ता। तुम्‍हारा विश्‍वास भी बहुत उपरी है। वह बहुत गहरे नहीं जाता।
तुम्‍हारा अविश्‍वास भी बहुत उपरी है। जब विश्‍वास ही ऊपरी है तो फिर अविश्‍वास गहरे कैसे जा सकता है। जब आस्‍तिक ही बड़े थोथे है तो फिर नास्‍तिक भी बहुत गहरे कैसे हो सकते है। जब हां का ही अर्थ खो गया है, तो फिर ना में क्‍या अर्थ हो सकता है? जो भी अर्थ नास्‍तिक का होता है वह आस्‍तिक से ही आता है। जब ऐसे लोग हों जो कि अपने पूरे अस्‍तित्‍व से परमात्‍मा को हां कह सकें तभी केवल ना का कुछ अर्थ होता है; वह गौण है।
परमात्मा मर गया है और उसके साथ ही अविश्वास भी मर चुका है। विश्‍वास मृत हो गया है और उसके साथ ही अविश्वास भी मृत हो गया है। यह सदी और आज का आधुनिक मन एक प्रकार से बड़ी ही विचित्र स्थिति में है। ऐसा पहले कभी भी नहीं हुआ।
ऐसे लोग थे जो कि आस्तिक थेजो सचमुच में ही विश्वास करते थे कि परमात्मा है। ऐसे भी लोग थे जो कि पक्के नास्तिक थेजो कि उतनी ही त्वरा से विश्वास करते थे कि परमात्मा नहीं है। लेकिन आधुनिक मन उदासीन है। वह चिंता नहीं करता कि परमात्मा है या नहींयह बात असंगत है। कोई परमात्मा के पक्ष में या विपक्ष में सिद्ध करने में रस नहीं लेता।
वास्तव मेंयही अर्थ है नीत्शे की घोषणा का कि परमात्मा मर गया है। तुम उसे इंकार करने की भी परवाह नहीं करते। तुम उसके विरुद्ध तर्क भी नहीं करते। वह सेतु ही टूट गया। हमारा उससे अब कोई सबंध नहीं रहा—न पक्ष मेंन विपक्ष में। ऐसा क्यों हो गया हैक्यों ऐसी घटना आधुनिक मन के भीतर इतनी प्रगाढ़ हो गई है—यह उदासीनताहमें इसके कारणों का पता लगाना चाहिए।
पहला तो कारण यह है कि हम सदा से परमात्मा के बारे में एक व्यक्ति की तरह सोचते रहे हैं। परमात्‍मा के बारे में एक व्यक्ति की तरह सोचना गलत हैअसत्य हैऔर यह खयाल नष्ट हो जाना चाहिए यह विचार कि परमात्मा कोई व्यक्ति हैनियंता हैसर्जक हैपालनकर्ता हैयह बात गलत है। परमात्‍मा कोई व्यक्ति नहीं है। यह विचार हमारे मन के कारण ही इतना महत्वपूर्ण हो गया है। जब भी हम किसी चीज के बारे में सोचते हैं तो हम हमेशा उसके बारे में या तो किसी व्यक्ति की भांति सोचते हैं या फिर किसी वस्तु की भांति सोचते हैं। केवल ये ही दो विकल्प हमारे लिए खुले होते हैं। यदि कोई चीज है या तो वह वस्तु की भांति होनी चाहिएया फिर व्यक्ति की भांति होनी चाहिए।
हम यह सोच भी नहीं सकतेकभी कल्पना भी नहीं कर सकते कि वस्तु और व्यक्ति दोनों किसी चीज के प्रगट रूप हैं—जो कि छिपी है। वही शक्ति वस्तु हो जाती हैवही शक्ति व्यक्ति हो जाती हैकिंतु वह शक्ति दोनों ही नहीं है। वह परमात्मा मर गया है जिसे व्यक्ति की तरह समझा गया था। वह धारणा मृत हो गई है। और उस धारणा को मरना ही थाक्योंकि व्यक्ति की तरह परमात्मा को सिद्ध नहीं किया जा सकता। एक व्यक्ति के रूप में वह हमारी कोई समस्या नहीं सुलझा सकता। बल्कि इसके विपरीत वह और भी समस्याएं खड़ी कर देता है। क्योंकि यदि परमात्मा है तो फिर जगत में इतनी बुराई क्‍यों हैतो फिर वही इस बुराई को होने दे रहा हैवह जरूर इसके साथ सहयोग कर रहा है। तब वह एक बुरे व्यक्ति के रूप में आ जाता है।
आंद्रे गाइड ने कहीं पर कहा है, ''मेरे लिए यह कल्पना करना कि परमात्मा शभ हैमुश्किल है। लेकिन मैं यह —कल्पना कर सकता हूं कि वह बुराई हैबुराई की भाति हैशैतान की भांति हैक्योंकि संसार में इतनी बुराई हैइतना दुख हैइतनी यातना हैइतनी पीड़ा है। '' हम विश्वास ही नहीं कर सकते की ईश्वर यह सारा कारोबार चला रहा है। जरूर कोई शैतान इस सब का चलाने वाला होना चाहिए—कोई महाशैतान। ईश्वर तो जरूर शुभ होना चाहिएवरना कैसा ईश्वर है वहएक बुनियादी अच्‍छी होनी ही चाहिए। लेकिन जैसा जगत हमको दिखलाई पड़ता हैउसके हिसाब से तो परमात्मा अच्‍छाई की तरह नहीं हो सकता बल्कि दुष्टता की तरह मालूम पड़ता है—कि वह बुराई के साथ खेल रहा है। और एक प्रकार से यह भी लगता है कि वह इतने सारे दुख देकर तथा लोगों को सता कर आनंद ले रहा है।
यदि परमात्मा कोई व्यक्ति है तो फिर दो विकल्प बचते हैं : या तो वह कोई शैतान होना चाहिएया फिर हमें इंकार करना पड़ेगा कि वह है। और दूसरा विकल्प ज्यादा अच्छा है। ईश्वर को एक व्यक्तिकी भांति मरना पड़ा क्योंकि यह कल्पना करना कि वह अच्छा है मुश्किल हो गया। लेकिन यह धारणा ही गलत थीयह धारणा मनुष्य केंद्रित थी, 'एन्थोपोसेन्‍ट्रिकथी। हमने परमात्मा की कल्पना एक सर्वोच्च व्‍यक्‍ति की भांतिएक अतिमानवसुपरमैन की भाति की थी। परमात्मा को भी हमारी ही तरह का एक बढ़ा दिखाया गया व्यक्ति ही माना गया था। हमने सिर्फ मनुष्य का ही एक विकसित रूप दिखा दिया था।
बाइबिल में कहा गया है कि परमात्मा ने आदमी को अपनी शकल में बनायालेकिन यह बात भी आदमी की ही कही हुई है। असली बात ठीक उल्टी है—आदमी ने परमात्मा को अपनी शकल में निर्मित किया है। इस आदमी की प्रतिमूर्ति का जाना जरूरी था। और अच्छा ही हुआ कि इस प्रकार का परमात्मा मर गया। क्योंकि इस धारणा के खो जाने के बाद हम एक नईताजा खोज शुरू कर सकते हैं कि परमात्मा क्या है।
उपनिषद बिलकुल भिन्न हैंवे कभी भी नहीं कहते कि परमात्मा कोई व्यक्ति हैइसलिए वे आज के आदमी के लिए संगत हैं। वे नहीं कहते कि परमात्मा कोई व्यक्ति है। वे कहते हैं कि परमात्मा अस्तित्व की आधारशिला हैन कि व्यक्ति। परमात्मा अस्तित्व हैन कि अस्तित्वगत है। यह भेद जरा सूक्ष्म है लेकिन इसे समझने की कोशिश करो।
एक वस्तु होती हैएक पुरुष होता हैएक स्त्री होती हैएक व्यक्ति होता हैलेकिन वे नष्ट हो सकते हैं। जो भी होता है वह नहीं भी हो सकता है। वह उसमें अंतर्निहित है। जो भी अस्तित्व में आ सकता हैवह अस्तित्व के बाहर भी जा सकता है। लेकिन अस्तित्व स्वयं विनष्ट नहीं हो सकता। इसलिए हम कह सकते हैं कि एक कुर्सी होती हैहम कह सकते हैं कि एक मकान होता हैक्योंकि उनका अस्तित्व विनष्ट हो सकता है। लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि परमात्मा होता है।
परमात्मा ही अस्तित्व हैऐसा नहीं है कि परमात्मा का अस्तित्व हैपरमात्मा अस्तित्व का ही पर्यायवाची है। वास्तव मेंयह कहना भी कि परमात्मा हैयह भी पुनरुक्ति है। परमात्मा का अर्थ है, 'है'। यह भाषा ही गलत है कि परमात्मा हैक्योंकि होने का अर्थ ही है परमात्मा। परमात्मा का अर्थ ही होता है —हैहोना। ऐसा कहना कि परमात्मा का अस्तित्व हैगलत है। परमात्मा ही अस्तित्व हैअथवा परमात्मा अस्तित्व का ही दूसरा नाम है। अस्तित्व कभी नहीं मरता हैकभी अस्तित्व के बाहर नहीं जाता है। रूप आते हैंऔर जाते हैंरूप बदलते रहते हैं। रूप के जगत मेंआकृतियों के जगत में कुछ भी स्थायी नहीं है। इसलिए उपनिषद कहते हैं कि नाम तथा रूप—ये ही संसार हैंऔर जो कुछ भी नाम और रूप के परे है वही परमात्मा है। लेकिन क्या है नाम और रूप के परेअस्तित्व स्वयं ही नाम तथा रूप के परे है।
उपनिषद परमात्मा को किसी व्यक्ति की भांति नहीं सोचते हैंबल्कि एक अस्तित्व की भाति—अस्तित्व की आधारशिला की भांतिसोचते हैं। नाम और रूप के परे। क्या है नाम और रूप के परे न: इस मकान के चारों ओर वृक्ष हैंवे हैं। इन वृक्षों के परे पहाड़ियां हैंवे भी हैं। तुम यहां होतुम भी हो। इन वृक्षों मेंइन पहाड़ियों मेंतुम मेंक्या चीज है जो कि समान हैरूप समान नहीं हैतुम्हारा रूप भिन्‍न हैवृक्षों का रूप अलग हैपहाड़ियों की आकृति बिलकुल अलग है। नाम भी समान नहीं हैरूप भी समान नहीं है। फिर क्या है समानवह जो सामान्य तत्व हैवही है परमात्मा। तुम होवृक्ष हैंपहाडियां हैंयह होनायह अस्तित्व समान है। बाकी हर चीज सांयोगिक है। सारभूत बात यह है कि तुम होवृक्ष हैंपहाड़ियां हैंअस्तित्व समान है। यह अस्तित्व ही परमात्मा है।
परंतु उपनिषद कभी लोकप्रिय नहीं हुए। वे कभी लोकप्रिय हो भी नहीं सकतेक्योंकि परमात्मा अस्तित्व है तो फिर तुम्हारे लिए सारा अर्थ ही खो जाता है—क्योंकि तब तुम अस्तित्व से अपना संबंध  कैसे जोड़ोगेयदि परमात्मा कोई व्यक्ति होपिता होमां होभाई होप्रेमिका होप्रेमी हो तो तुम संबंध जोड़ सकते होतुम किसी न किसी संबंध की कल्पना कर सकते हो। लेकिन अस्तित्व के साथ कैसे संबंध जोड़ोगेअस्तित्व तो इतना शुद्ध हैइतना अमूर्त है! फिर तुम उससे प्रार्थना कैसे करोगेफिर तुम  उसे कैसे पुकारोगेफिर तुम उसके समक्ष कैसे रोओगे और चिल्लाओगेवहां कोई भी नहीं है।
मनुष्य की इस कमजोरी की वजह से उपनिषद कभी भी लोकप्रिय नहीं हुए। वे इतने सत्य हैं कि वे कभी भी बहुत लोकप्रिय नहीं हो सकते। सत्य को लोकप्रिय बनाना करीब—करीब असंभव है क्योंकि आदमी का मन उसे जैसा वह है वैसा ही स्वीकार नहीं करेगा। मनुष्य का मन केवल इतना ही सोच सकता कि यदि परमात्मा कोई व्यक्ति है तो हम उससे संबंधित हो सकते हैं। इसलिए भक्ति की परंपरायें इतनी लोकप्रिय होती रही हैं। कोई प्रार्थना कर सकता हैभक्ति में डूब सकता हैसमर्पण कर सकता है। कोई है वहां जिसके प्रति वह यह सब कर सकता हैइसलिए यह बात इतनी आसान हो गई। तुम प्रार्थना कर सकते होतुम बात कर सकते होतुम संवाद कर सकते हो। वास्तव मेंवहां कोई नहीं हैपरंतु तुम्हारे लिए यह बात सरल हो जाती है। यदि तुम कल्पना कर सकते हो कि कोई वहां है जो कि तुम्हारी प्रार्थना को सुन रहा है तो तुम्हारे लिए प्रार्थना करना सरल हो जाता है।
कोई भी नहीं सुन रहा है.. सिर्फ अमूर्त अस्तित्व है जिसके पास न तो कान हैं सुनने के लिएन आंखे हैं देखने के लिएऔर न हाथ हैं स्पर्श करने के लिए। लेकिन तब तुम्हारे लिए प्रार्थना करना कठिन हो जाएगा। इस कठिनाई के कारण ही मनुष्य ने ईश्वर को एक व्यक्ति की तरह सोचा। तब हर बात सरल हो जाती हैलेकिन हर बात गलत भी हो जाती है। एक तरफ सरल हो जाती हैलेकिन दूसरी तरफ सब बात गलत हो जाती है।
वैसा ईश्वर मर गया है और अब उसे पुनर्जीवित करने का कोई उपाय भी नहीं है। कोई उपाय नहीं है उसमें फिर से प्राण फूंके जायें और उसकी धड़कन को गति दी जाए। वह वस्तुत: ही मर गया है। उस ईश्‍वर को जगत में वापस नहीं लाया जा सकता है। हम उस जगह सेउस क्षण से गुजर चुके। मनुष्य का मन ज्यादा प्रौढ़ हो गया है। परमात्मा के प्रति बच्चों जैसा रुख पुन: नहीं आ सकता। लेकिन हम अभी भी उसके साये में जी रहे हैंअभी भी हम वही सोच रहे हैं जो कि मर गया है। अभी भी हम उसके विषय में उन्‍हें परिभाषाओं में सोच रहे हैं जो मुर्दा हो गई हैं। अभी भी हम उसके चित्र बनाये जा रहे हैं यद्यपि सारे नाम और रूप खो चुके हैं।
अब उपनिषद संगत हैं। पांच हजार वर्ष पहले वे अपने समय से आगे थे। जब यह केनोपनिषद लिखा गया तो यह अपने समय से पूर्व था। अब समय आ गया है और अब इस केनोपनिषद को समझा जा सकता है। उपनिषदों को समझा जा सकता है क्योंकि परमात्मा अब व्यक्ति की तरह नहीं रहा। अब ईश्‍वर केवल एक अवैयक्तिक अस्तित्व की तरह हो सकता है।
लेकिन इसमें कठिनाई आयेगी क्योंकि तब तुम्हें सब कुछ बदलना पड़ेगा। तुम्हारे धर्म का सारा ढांचा ही परिवर्तित करना पड़ेगाक्योंकि केंद्र ही विलीन हो गया है। पुराने धर्म का केंद्र विलीन हो गया हैऔर एक नए केंद्र के साथ एक नए प्रकार का धर्म पैदा होगा—धर्म का एक नया ही रूप जन्मेगा।
इसलिए मेरा जोर ध्यान पर हैप्रार्थना पर नहीं। क्योंक्योंकि प्रार्थना के लिए किसी व्यक्ति की जरूरत होती हैध्यान के लिए किसी व्यक्ति की जरूरत नहीं है। तुम वहा बिना किसी व्यक्ति के हुए ध्‍यान कर सकते होक्योंकि ध्यान प्रार्थना नहीं है। वह किसी के प्रति नहीं किया जा रहा है। वह तो बिना किसी के वहां हुए तुम कर रहे होवह कोई संबंध नहीं है।
यदि ईश्वर मर गया है तो प्रार्थना अर्थहीन हो गई। केवल ध्यान ही अर्थपूर्ण हो सकता है। जब तुम प्रार्थना करते हो तो तुम किसी के प्रति प्रार्थना करते हो। लेकिन जब तुम ध्यान करते हो तो तुम सिर्फ ध्यान करते हो। जब तुम प्रार्थना करते हो तो प्रार्थना में दो होते हैंवह द्वैत की बात है—एक तुम हो और एक दूसरा भी कोई होता है जिसके प्रति वह प्रार्थना की जा रही होती है। ध्यान अद्वैतवादी हैवहां दूसरा कोई नहीं है। वह संबंध जरा भी नहीं हैतुम अकेले हो। और जितना अधिक तुम इस अकेलेपन में उतरते हो, उतना ही तुम ध्यान में प्रवेश करते चले जाते हो।
ध्यान का अर्थ है अकेले होने की सामर्थ्य। और न केवल अकेला होना बल्कि अकेले होने का आनंद लेना। इतना अकेला होना कि दूसरा बिलकुल ही मिट जाए—कि दूसरा न हो जाए। इतना अकेला होना कि तुम अपने भीतर गिरने लग जाओ। भीतर खाई पैदा हो जाये और तुम उस खाई में गिरते ही चले जाओ। जब तुम अपने भीतर गिर जाते हो तो देर—अबेर आकृति खो जाएगीनाम भी खो जाएगाक्‍योंकि वे सिर्फ ऊपरी सतह पर ही होते हैं। जितने गहरे तुम डुबकी लगाते हो उतने ही तुम परमात्मा के निकट होते हो। क्योंकि परमात्मा अस्तित्व की भांति हैव्यक्ति की भांति नहीं।
तो यही भेद है। यदि तुम प्रार्थना करते हो तो परमात्मा बाहर हैऔर वह परमात्मा मर गया है। अब वह बाह्य परमात्मा नहीं रहा। तुम उसके विषय में सोचते रह सकते हो कि वह कहीं स्वर्ग में हैकि आकाश के पार हैलेकिन तुम्हें भी लगेगा कि यह बात बड़ी बचकानी है। वहां कोई भी नहीं है। वैसा ईश्वर प्रत्येक निवास से भागता रहा है।
एक समय ऋग्वेद के जमाने में वैसा परमात्मा हिमालय में रहता थाक्योंकि हिमालय में पहुंचा नहीं जा सकता था। वह कैलाश पर्वत पर रहता था। लेकिन आदमी वहां भी पहुंच गयाइसलिए वह वहा से भागा और भागकर ऐसी जगह पहुंच गया जहां कि अब नहीं पाया जा सके। फिर उसने अपना घर चांद—तारों पर बनाया। लेकिन आदमी चांद पर भी पहुंच गयाऔर अब वह वहां भी नहीं है। आज नहीं कल आदमी सब जगह पहुंच जाएगा और ईश्वर कहीं भी नहीं मिलेगा क्योंकि वह आखिर कहां छिप सकता हैअब कोई भी जगह ऐसी नहीं है जो कि पहुंच के बाहर होअथवा सब जगह पहुंचा जा सकेगा। अब कोई स्थान उसके छिपने के लिए नहीं बचेगा। अब यह धारणा और आगे नहीं चल सकती। ईश्वर को व्यक्ति की तरह नहीं पाया जा सकता। और यह अच्छा ही है क्योंकि अब तुम प्रार्थना से हट कर ध्यान पर आ सकते हो।
प्रार्थना सच में बचकानी बात है। एक तरह से वह रुग्ण बात हैक्योंकि तुम ईश्वर को अपनी ही कल्पना के अनुसार बनाते हो और फिर उसकी प्रार्थना करते हो। और तुम इतने भ्रांतिपूर्ण हो सकते हो कि तुम स्वयं ही अपनी प्रार्थना का उत्तर भी परमात्मा की तरफ से देने लग सकते हो। तब तुम सचमुच ही विक्षिप्त हो गए। तब तुम अपने होश में नहीं हो। तुम ऐसा कर सकते होबहुत से लोगों ने ऐसा किया हैऔर वे बड़े संत माने जाते हैं। वे रुग्ण लोग थेक्योंकि ईश्वर के साथ सिर्फ मौन ही संभव है। जब तुम गौन होते हो तो तुम किसी और से संबंधित नहीं हो सकतेतुम अपने ही भीतर चले जाते हो। फिर परमात्मा एक भीतर की शक्ति हो जाता है। वह अब कोई बाहरी व्यक्ति नहीं रहाअब वह आंतरिक शक्ति हो गया।
प्राचीन भारतीय साहित्य में एक सुंदर कहानी है :

ऐसा कहा जाता है कि ईश्वर ने संसार को बनाया और फिर वह इस पृथ्वी पर रहने लगा। यह संसार उसी का बनाया हुआ था इसलिए उसे इसमें आनंद आया और वह आदमीपशुओंवृक्षों के साथ रहने लगा। लेकिन वह बड़ी मुसीबत में पड़ गयाक्योंकि सारे दिन उसे परेशान किया जाने लगारात भी चैन से नहीं सो सकता था। लोग शिकायतें करते रहते थे कि यह गलत हैवह गलत हैआपने ऐसा क्‍यों कियाआप इसे ऐसा क्यों नहीं करतेप्रत्येक आदमी आता और अपनी सलाह और सुझाव देता।
ईश्वर इतना परेशान और तंग हो गया कि उसने अपने मुख्य देवताओं तथा मंत्रियों की एक सभा बुलाई और उनसे कहा, ''ऐसी जगह खोजो जो कि मेरे अपने सृजन से दूर होजहा कि मैं छिप सकु क्योंकि या तो ये लोग मुझे मार डालेंगे या फिर मैं आत्महत्या कर लूंगा। हर क्षण ये मुझे सलाह देने चले आते हैं और कहते हैं—यह करोवह करोयह गलत हैवह नहीं किया जाना चाहिएऔर इनकी रायें भी इतनी एक—दूसरे से विरोधी हैं कि यदि मैं इनकी मानूं तो भारी गड़बड़ हो जायेगी।''
तो किसी ने सुझाव दिया, ''आप हिमालय चले जायें। आप गौरीशंकर पर्वत परएवरेस्ट पर छिप जायें।
ईश्वर ने कहा, ''लेकिन तुम आगे की नहीं देखते हो। कोई तेनसिंहहिलेरी वहां भी आ जायेंगेऔर सिर्फ थोड़े ही घंटों का सवाल है। '' ईश्वर के लिए तो थोड़े ही घंटों की बात हैइसलिए उसने कहा, ''इससे कुछ भी नहीं होगा। ''
तब फिर किसी ने सुझाव दिया, ''आप चांद पर चले जायें।''
ईश्वर ने कहा, ''लेकिन तुम्हें पता नहीं कुछ मिनटों के बाद आदमी वहां भी पहुंच जायेगा। ''तब एक का मंत्री खड़ा हुआ और उसने आकर धीरे से ईश्वर के कान में कहा, ''अच्छा होगा कि आप आदमी के भीतर ही छिप जायें। वहां वह कभी भी घुसने की कोशिश नहीं करेगा। ''और ऐसा कहा जाता है कि ईश्वर ने उसका सुझाव मान लियाऔर उस क्षण के बाद उसे किसी ने परेशान नहीं किया।

अब समय आ गया है कि उसे वहां भी परेशान होना पड़े। और ध्यान से ही तुम वहां प्रवेश कर सकते होन कि प्रार्थना से। क्योंकि तुम्हारी प्रार्थना सोचती है कि वह कहीं गौरीशंकर पर अथवा चंद्रमा पर अथवा कहीं और हैप्रार्थना सदा उसे कहीं बाहर खोजने में लगी रहती है। ध्यान इस धारणा को पूरी तरह मिटा देता है कि वह कहीं बाहर हैअथवा उससे प्रार्थना की जा सकती हैअथवा उससे बात—चीत की जा सकती हैअथवा उससे संबंध जोड़ा जा सकता है। नहींसिर्फ तुम अपने भीतर प्रवेश कर सकते हो। और जितने गहरे तुम भीतर उतरते होउतने ही गहरे तुम उसमें उतरते जाते हो। लेकिन यह मिलन मौन में होगा क्योंकि वह दूसरा नहीं है। वह तुम ही हो। वह तुम्हीं होकर तुममें छिपा है।
यदि तुम मेरी बात समझ रहे होयदि तुम प्रार्थना और ध्यान में अंतर समझ सकते हो—ईश्वर एक व्यक्ति की भांतिऔर ईश्वर एक अस्तित्व की भाति—तो इस सूत्र को समझना आसान होगा:

जिसे दृष्टि नहीं देख पाती लेकिन जो दृष्टि को देख पाता है— तू जान कि वही एकमात्र ब्रह्म हैऔर वह नहीं जिसकी लोग यहां पूजा करते हैं।

जिसे दृष्टि नहीं देख पाती
यदि वह बाहर है तो तुम उसे देख सकते होतब दृष्टि उसे देख पाने में असफल नहीं हो सकती। तब फिर मार्ग और विधियां खोजी जा सकती हैंऔर तुम उसे देख सकते हो यदि वह बाहर है। लेकिन वह वहां नहीं है। इसीलिए यह सूत्र कहता है :
जिसे दृष्टि नहीं देख पाती
तुम उसे नहीं देख सकतेउसे देखने का कोई रास्ता नहीं है। चाहे तुम कुछ भी करोतुम उसे नहीं देख सकते। लेकिन लोगों ने उसे देखा हैफिर उनके लिए क्या कहेंउनके लिए क्या सोचें? उन्होंने देखा है।
ऐसे ईसाई संत हुए हैं जिन्होंने कहा कि हमने जीसस को हमारे सामने खड़ा हुआ देखा है। ऐसे हिंदू भक्त हुए हैं जिन्होंने कहा कि हमने कृष्ण को बांसुरी बजाते देखा है। ऐसी बहुत—सी घटनाएं घटी हैं सारी दुनिया में। कोई उसे राम की भांति देखता हैकोई उसे कृष्ण की भांति देखता हैकिसी ने जीसस की तरह से देखा हैकिसी ने मेरी की तरह देखा हैऔर वे देखते ही चले जाते हैं। और यह उपनिषद कहता है
जिसे दृष्टि नहीं देख पाती......
तब फिर वे लोग कोरी कल्पना ही कर रहे होंगे। सुंदर कल्पना! बहुत गहरी तृप्ति देने वाली! जब तुम जीसस को अपने सामने खड़े हुए देखते हो तो तुम एक गहरी तृप्ति से भर जाते होबहुत गहरे संतोष को पा लेते हो। लेकिन यह भी सपना ही हैसुंदर है पर सपना ही है। ऐसा स्वप्न जो तुमने निर्मित किया हैऐसा स्वप्न जिसकी तुमने कामना की थीजिसे तुमने देखने की चाह की थी। और जिसे भी तुम देखना चाहते हो तुम उसे देखने में समर्थ होक्योंकि मनुष्य का मन समर्थ है किसी भी कल्पना को निर्मित करने में और उसे साकार रूप देने में। यह मनुष्य के मन की क्षमता है। तुम एक सपना निर्मित कर सकते हो और उसे साकार रूप भी दे सकते हो।
निश्चित हीवह सिर्फ तुम्हारे ही लिए वास्तविक होगाकिसी और के लिए नहीं। इसलिए जब तुम जीसस को देखो तो तुम उन्हें दूसरों को नहीं दिखा सकते। यदि तुम्हारे मित्र कहें कि हमें भी तुम्हारे स्वप्‍न को दिखाओ तो तुम कुछ भी नहीं कर सकते। तुम कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि स्वप्न का एक विशेष गण यह होता है कि उसमें किसी को भी सहभागी नहीं बनाया जा सकता। तुम अपना सपना देख सकते होमैं अपना सपना देख सकता हूं लेकिन तुम मेरे सपने में प्रवेश नहीं कर सकतेमैं तुम्हारे सपनों में प्रवेश नहीं कर सकता। सपना सर्वाधिक निजी बात है संसार में। हर चीज को सार्वजनिक बनाया जा सकता हैलेकिन सपनों को सार्वजनिक नहीं बनाया जा सकता। चाहे तुम अपने मित्र कोअपनी पत्नी कोअपने पति को कितना ही प्रेम करते होओचाहे तुम कितने ही निकट क्यों न होतुम एक—दूसरे के सपनों में प्रवेश नहीं कर सकते। सपना निजी ही रहता है।
और यही बात ऐसे दर्शनों के लिए भी सही है। जैसे तुम जीसस को देख रहे होकोई अन्य इस अनुभव को तुमसे नहीं बांट सकता। तुम उनके साथ सड़क पर चल रहे होलेकिन बाकी सब लोग तुम्हें अकेले ही चलते हुए देखेंगेवह तुम्हारा अपना निजी कल्पित स्वप्न है। मैंने एक घटना के बाबत सुना है। एक बार ऐसा हुआ :

एक सुंदर युवा लड़की ने स्वप्न में देखा कि एक राजकुमार घोड़े पर चढ़ कर आयाउसने उसे ऊपर उठायाउसका गहरा चुंबन लियाऔर फिर उसे घोड़े पर बिठा कर ले गया। घोड़ा तेजी से दौड़ रहा था और तब उस लड़की ने राजकुमार से पूछा, ''तुम मुझे कहां लिए जा रहे होयह तो बताओतुम मुझे कहां ले जा रहे हो? '' उस राजकुमार ने कहा, ''यह तुम्हारा सपना है। तुम्हीं बताओ। सपना तुम्हारा हैतुम्हें ही बताना होगा कि मैं कहां ले जा रहा हूं। तुम मुझे बताओ! ''

जब तुम जीसस या कृष्ण को सामने देखते हो तो वास्तव में होता यह है कि तुम अपने मन को दो भागों में बांट लेते हों—एक जो कि भक्त बन गया होता हैऔर दूसरा जो कि ईश्वर हो जाता है। और यदि तुम पूछो कृष्ण से कि तुम मुझे कहा ले जा रहे होतो वह कहेंगे कि यह तुम्हारा सपना हैतुम्हीं मुझे बताओ!
लेकिन जब मैं तुम्हें कह रहा हूं कि यह सपना है तो मैं कोई इसकी निंदा नहीं कर रहा हूं। मैं सिर्फ तथ्य की बात कर रहा हूं। सपना सुंदर है। तुम उसका आनंद ले सकते हो! उसमें कुछ भी गलत नहीं है। सपने काएक सुंदर सपने का आनंद लेने में गलत हो भी क्या सकता हैतुम उसका आनंद ले सकते हो। समस्या तो तब खड़ी होती है जब तुम उसे सत्य समझने लगते हो। तब तुम खतरनाक रास्ते पर चलने लगेतब सजग हो जाओ। मन कुछ भी प्रक्षेपित कर सकता है।
किसी भी पागलखाने में जाओ और देखो। वहां तुम प्रत्येक को किसी न किसी से बातें करते हुए देखोगे जो कि वहां मौजूद नहीं है। प्रत्येक बात कर रहा है और जवाब भी दे रहा है। वहां हर आदमी दो में बंट गया है। वे लोग स्वप्न देखते ही रहते हैंवे प्रक्षेपणों को देखते रहते हैं। और वे प्रक्षेपण उन्हें इतने सत्य प्रतीत होते हैं कि हमें उन लोगों को पागलखाने में रखना पड़ता हैक्योंकि अब इन लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। उनका वास्तविकता से संबंध छूट गया हैऔर अब वे सिर्फ स्वप्न के संसार से जुड़े हुए हैं।
पागल आदमी का इतना ही अर्थ है कि उसका वास्तविकता से संबंध छूट गयातथ्य से कोई संबंध नहीं रहाकेवल उसका अपनी कल्पना से संबंध है। वह अपने ही निजी संसार में रहता है। वह तुम्हारे साथ इस संसार में नहीं जीतावह उसका हिस्सा नहीं है। और तुम एक पागल आदमी को विश्वास नहीं दिला सकते कि वह गलत है। यह बात असंभव है। वह तुम्हारी समझ को गड़बड़ा सकता हैलेकिन तुम उसे भ्रम में नहीं डाल सकते। और यदि तुम लंबे समय तक किसी पागल आदमी के साथ रहो तो तुम भी पागल हो सकते हो।
मैंने सुना है कि एक बार ऐसा हुआ :

एक बादशाह पागल हो गया। उसे शतरंज खेलने का बड़ा शौक थाअत: किसी मनोवैज्ञानिक ने सलाह दी कि यदि कोई शतरंज का बहुत बड़ा खिलाड़ी उसके साथ शतरंज खेले तो उसका दिमाग तनावरहित हो सकता है। वह बादशाह अभी भी शतरंज का शौक रखता था। सारा संसार उसके लिए मिट गया थाकेवल शतरंज ही उसके और वास्तविक संसार के बीच एकमात्र सेतु था। अत: एक बहुत बड़े शतरंज के खिलाड़ी को बुलाया गयाऔर उसने उस बादशाह के साथ शतरंज खेलना शुरू किया। एक साल तक यह चलता रहा। वह आदमी उस पागल बादशाह के साथ शतरंज खेलता रहा। और अंत में यह हुआ कि वह बादशाह तो ठीक हो गयालेकिन वह शतरंज का खिलाड़ी पागल हो गया। बादशाह वापस अपनी पुरानी स्थिति में आ गयालेकिन वह बेचारा शतरंज का खिलाड़ी पागल हो गया।

यदि तुम किसी पागल आदमी के साथ एक साल तक रहो तो तुम्हारे लिए पागल न होना मुश्किल होगा। वह तुम्हें बुरी तरह भ्रमित कर देगालेकिन तुम उसे भ्रमित नहीं कर सकतेवह उसके पार है। तुम उसका स्पर्श भी नहीं कर सकते क्योंकि वह अपनी ही निजी दुनिया में रहता हैऔर तुम उसकी इस निजी दुनिया में प्रवेश नहीं कर सकते। उसके निजी संसार में प्रवेश करना असंभव है। और तुम उसको समझा भी नहीं सकते कि वह गलत है। गलत और सहीसच और झूठये सारे भेद वास्तविक दुनिया के हैं। स्वप्न के संसार में न कुछ गलत है न कुछ सही है। जो भी हैवह अपने आप में सही हैसिर्फ वहा होने मात्र से ही वह सही है।
धार्मिक विक्षिप्तताएं हैंऔर धर्म निरपेक्ष विक्षिप्तताएं हैं। जो लोग पागल हो जाते हैंवे दो प्रकार के हैं—धर्म—निरपेक्ष तथा धार्मिक। जब तुम धार्मिक ढंग से पागल होते हो तो लोग तुम्हारी इज्जत करते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि तुमने कुछ उपलब्ध कर लिया है। अत: याद रखो कि धर्म—निरपेक्ष रूप से पागल मत होनासदैव धार्मिक ढंग से ही पागल होना। तब फिर लोग तुम्हारा सम्मान करेंगे—लेकिन सिर्फ पूर्व में। अब पश्चिम में यह बात नहीं रही। चाहे कोई भी ढंग होवे तुम्हें पागल ही कहते हैं।
जब कभी तुम वास्तविकता को अपने मन के माध्यम से प्रक्षेपित करते हो तो तुम अपने चारों ओर एक भ्रम पैदा करते होऔर तब तुम देखते हो। लेकिन उपनिषद इतने ज्यादा वास्तविक हैंवे कहते हैं तम देख ही नहीं सकते है। जिसे दृष्टि नहीं देख पाती लेकिन जो दृष्टि को देख पाता है...
तुम आंखों से उसे नहीं देख सकतेलेकिन वह तुम्हारी आंखों को देख सकता हैक्योंकि वह तुम्हारे पीछे छिपा है। तुम्हारी आंखें उसके सामने हैं। वह तुम ही होवह तुम्हारी आंखों को देख सकता है। लेकिन तुम उसे आंखों से नहीं देख सकते। वह तुम्हारी सारी इंद्रियों के पीछे छिपा हैवह तुम्हारी इंद्रियों को तो देख सकता है।
यदि तुम ध्यान में गहरे जाओ तो तुम अपने शरीर के आंतरिक केंद्र को देख सकते हों—भीतर की दीवार को देख सकते हो। यह एक बड़ी विचित्र घटना रही हैक्योंकि पश्चिम में केवल अभी तीन सौ वर्ष से ही चिकित्सा—विज्ञान शरीर के आंतरिक ढांचे को जान पाया है—और वह भी काट—पीट करके। शरीर को काट करशरीर का विश्लेषण करपश्चिमी चिकित्सा विज्ञान शरीर के भीतरी ढांचे को जान पाया है।
लेकिन यह एक विचित्र घटना रही है। योगी तथा तांत्रिक लोग उसे सदा से जानते रहे हैं। और उन्होंने कभी भी शरीर को काटा नहीं। वे जानते हैं कि कितनी नाडिया हैं। उन्होंने पूरी तरह जाना है कि सारा भीतरी शरीर किस तरह काम करता है लेकिन उन्होंने कभी कोई शरीर काटा—पीटा नहीं। वे कोई शल्‍य—चिकित्सक नहीं थे। कैसे उन्होंने इस सबके विषय में जानाउन्होंने उसके बारे में एक बिलकुल ही भिन्‍न तरीके से जाना। वे भीतर इतने ध्यानपूर्वक मौन हो गये कि वे उस मौन में अपने शरीर से अलग हो गए वे भीतर सिर्फ एक सजगता ही बच गए। तब उन्होंने देखा कि भीतर क्या है।
हम अपने शरीर को सिर्फ बाहर से ही जानते हो। यह बड़ी अजीब बात है क्योंकि तुम रहते तो भीतर लेकिन फिर भी तुमने उसका भीतर से अवलोकन नहीं किया। यह ऐसे ही है जैसे तुम एक घर में रहो औरतुम उसके चारों तरफ ही चक्कर लगाते रहो और उसको भीतर से कभी भी नहीं जानो कि वह भीतर से  कैसा दिखाई पड़ता है। तुम्हारे शरीर की दो सतहें हैं। एक तो बाहरी सतह हैजिसका हमें पता है क्‍योंकि हम उसे आंखों से देख सकते हैंहत्थों से स्पर्श कर सकते हैं। फिर एक भीतर की सतह है शरीर की जिसके लिए आंखों और हाथों का उपयोग नहीं किया जा सकता।
यदि तुम सजग और शांत हो जाओअलग हो जाओतो तुम आंतरिक सतह को जान सकोगे। तब तुम अपनी आंखों को देख सकते होतब तुम अपने कानों को सुन सकते होतब तुम अपने हाथों को स्‍पर्श कर सकते होऔर तब तुम अपने शरीर को जान सकते हो। किंतु तुम्हारा शरीर तुम्हें नहीं जान सकता। यही बात यह सूत्र कहता है :
जिसे दृष्टि नहीं देख पाती लेकिन जो दृष्टि को देख पाता है—तू जान कि वही एकमात्र ब्रह्म है और वह नहीं जिसकी लोग यहां पूजा करते हैं।
सिवाय तुम्हारे शरीर केकोई मंदिर प्रवेश करने और खोजने योग्य नहीं है। कोई मस्जिद और कोई चर्च नहीं है जहां ईश्वर रहता है। वह तुम्हारे ही भीतर रहता है। यदि तुम प्रवेश कर सकोऔर लौट कर वापस अपनी चेतना के केंद्र पर आ सकोतो तुम जानोगे कि वही एकमात्र ब्रह्म है—जो कि आखिरीआत्यंतिक हैवस्तुत: सत्य हैवास्तविक अस्तित्व है। और उसके शिकार मत हो जिसे यहां लोग पूजते हैं। लोग अपनी ही कल्पना की पूजा करते रहते हैं।
लोग अपने ही द्वारा निर्मित चीजों को पूजते रहते हैं। फिर फैशन बदल जाते हैंऔर उनके साथ लोगों की कल्पना बदल जाती है। फिर तुमको मूर्तियां बदलनी पड़ती हैंनई प्रतिमायेंपूजा के नए स्थान बनाने पड़ते हैं। इसी कारण पृथ्वी पर इतने सारे धर्म हैंअन्यथा यह बेतुका है। कैसे इतने सारे धर्म हो सकते हैं। यदि सत्य एक है तो फिर इतने सारे धर्म कैसे हो सकते हैं? विज्ञान एक हैफिर धर्म एक क्यों नहीं हैईसाई विज्ञानहिंदू विज्ञानमुस्लिम विज्ञान ऐसा क्यों नहीं है?
यह संभव नहीं है क्योंकि विज्ञान तथ्यों पर काम करता है। और यदि आप तथ्य पर काम करते हैं तो विज्ञान एक ही हो सकता हैक्योंकि तथ्य कोई निजी नहीं होता। यदि तुमने कोई तथ्य जाना है तो प्रत्येक को उसको स्वीकार करना होता हैदूसरा कोई मार्ग नहीं है। तुम उसे इंकार नहीं कर सकते। और यदि तुम विज्ञान को इंकार करते हो तो उससे तुम्हारा ही अहित होगा। यदि भौतिकशास्त्र किसी नियम को जान पाता हैतो तुम नहीं कह सकते, ''मैं तो भारतीय हूं मैं इसनियम को नहीं मान सकता जो कि इंग्लैंड में खोजा गया है। मैं कैसे एक अंग्रेज आदमी अथवा एक चीनी आदमी का अनुसरण कर सकता हूंहम अलग— अलग देश के लोग हैंहमारी संस्कृतियां भिन्न—भिन्न हैं। '' तुम ऐसा नहीं कह सकते। एक भौतिकी नियमभौतिकी नियम है। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है कि उसे कौन खोजता है। एक बार खोज लिया गया तो वह फिर सारे विश्व का हो गया।
विज्ञान एक हैलेकिन धर्म क्यों एक नहीं हैयदि वह भी आत्यंतिक नियम है तो वह भी एक होना चाहिए, विज्ञान से ज्यादा एक होना चाहिए क्योंकि विज्ञान तो सिर्फ बाहरी तथ्यों की खोज हैधर्म आंतरिक सत्यों की खोज है। फिर ऐसा क्यों होना चाहिएतीन सौ धर्म हैंयह कैसे संभव हो सकता है?
ये तीन सौ धर्म हैं झूठे सपनों के कारणन कि सत्य के कारण। वे तुम्हारे सृजनों के कारण हैंन कि तुम्हारी वास्तविक जानकारी के कारण। तुम अपनी पूजा का ढंग अपने आप निर्मित करते हो। तुम स्वयं अपने—अपने मंदिर बनाते हो। तुम्हारे धर्म एक कलात्मक सृजन हैंन कि वैज्ञानिक प्रतीतिया हैं—कलात्मक रचनाएं हैं। तुम अपने धर्म को एक रंग दे देते होऔर तुम अपने बनाए चित्रों को चाहने लग जाते हो और तुम यह कभी नहीं सोच सकते कि दूसरा कोई भी चित्र तुम्हारे अपने चित्र से अच्छा हो सकता है। तुम उसे चाहते होइसलिए तुम लड़ते चले जाते हो कि तुम्हारा चित्र ही सर्वोच्च हैदूसरा कोई भी ऐसा चित्र नहीं बना सकता। बाकी सब दोयम है। यदि तुम अच्छे आदमी हुए तो तुम दूसरों के चित्रों को सहन कर सकते हो। तुम दूसरों के चित्रों को ज्यादा से ज्यादा स्वीकार कर सकते होअपना बड़प्पन जताते हुएकि वे लोग थोड़े मूर्ख एवं मूढ़ हैं। थोड़ा ठहरो वे भी सही बात पर आ जायेंगे।
ईसाई प्रतीक्षा करते रहते हैं कि हिंदुओं को आखिर समझ आ जाएगीऔर वे ईसाई हो जायेंगे। हिंदू लोग भी इस इंतजार में हैं कि ये मूर्ख ईसाई किसी न किसी दिन लौट कर हिंदू हो जाएंगे। आखिर सत्य से कब तक बचेंगेऔर जैन लोग हैंवे सोचते हैं कि ये सारे हिंदू और ईसाई झूठे गुरुओं काकृष्ण या क्राइस्ट का अनुकरण कर रहे हैं। लेकिन आखिर लंबे अरसे तक ये लोग झूठे गुरुओं का अनुगमन भी कब तक करेंगेकिसी न किसी दिन तो ये सही गुरु महावीर के पास आ ही जायेंगे। अंततः ये लोग महावीर का अनुगमन करेंगे ही।
प्रत्येक आदमी भीतर यही सोचता रहता है कि वह सही हैऔर बाकी सब लोग गलत हैं।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जनसाधारण के लिए धर्म एक कल्पना की बात है। उनकी अपनी कल्पनायें हैंउन्होंने अपने संसार स्वयं रंग लिए हैं। उसमें कोई बुराई भी नहीं है। तुम अपना घर अपनी ही पसंद से सजाते होयह ठीक भी है। कौन है जो कहेगा कि यह बात गलत हैयह कहने का हक किसी को नहीं है। तुम अपनी पसंद के अनुसार अपना घर सजाते होलेकिन तुम सजावट के लिए किसी से लड़ते नहीं। तुम ऐसा तो नहीं कहते कि मेरी सजावट आखिरी सत्य है। प्रत्येक आदमी को अपने अनुसार अपना घर सजाने का हक है।
यही बात तुम अपने मन के साथ भी करते हो। तुम उसे भी अपनी आकृतियों सेपूजा सेप्रार्थना सेअपनी बाइबिल सेअपनी गीताओं से सजाते रहते हो। तुम अपने आंतरिक जगत को सजाते चले जाते होऔर फिर तुम उसके हिस्से हो जाते हो और उसी में रहने लगते हो। यही भांति है।
यह सूत्र कहता है कि वही एकमात्र ब्रह्म है जिसे कि तुम इंद्रियों का अतिक्रमण करने के बाद जान सकते होजबकि तुम इंद्रियों के पीछे चले जाते होऔर जब तुम आंखों को भी देखते होजब तुम कानों को भी सुनते होऔर जब तुम हाथों को भी भीतर से स्पर्श करते हो।
.. तू जान कि वही एकमात्र ब्रह्म है और वह नहीं जिसकी लोग यहां पूजा करते हैं।
जिसे कान नहीं सुन पाते लेकिन जो कानों को सुन पाता है— तू जान कि वही एकमात्र ब्रह्म हैओर वह नहीं जिसकी लोग यहां पूजा करते हैं
जिसे प्राण प्रगट नहीं कर पाते लेकिन जो प्राण को प्रगट कर पाता है— तू जान कि वही एकमात्र ब्रह्म हैऔर वह नहीं जिसकी लोग यहां पूजा करते हैं
सारे मंदिरसारी मस्जिदेंसारे गिरजे झूठे हैं। मैं उनकी कोई निंदा नहीं कर रहा हूं मैं सिर्फ एक तथ्य की बात कह रहा हूं। वे झूठे हैं क्योंकि वे सब हमारी कल्पनाओं की कृतियां हैं। और मैं यह नहीं कहता कि उनको नष्ट कर दो। मैं कहता हूं कि उनका भी आनंद लो। लेकिन ऐसा मत सोचना कि यह आनंद लेना तुम्हें उस आत्यंतिक तक ले जाएगा। इन निर्माणों का रस लो। यह खेल अच्छा हैइसमें कुछ भी तो बुरा नहीं है। लोग सिनेमा देखने जाते हैंलोग नृत्य—घरों में जाते हैं। फिर उन्हें इस धार्मिक—कल्पना का आनंद लेने से क्यों रोका जाएउन्हें अपने मंदिरोंमस्जिदोंगुरुद्वारों में जाने देना चाहिए—वे इसके लिए स्‍वतंत्र हैं। और यह एक तरह से अच्छा ही है कि कोई धार्मिक कल्पना होबजाय कुछ भी न होने के। लेकिन ऐसा मत सोचना कि तुम वहां ब्रह्म को जान लोगे। नहींतुम नहीं जान सकते। वह वहां है ही नहींइसलिए तुम कुछ भी नहीं कर सकते। तुम अपना आनंद ले सकते होतुम अपनी कल्पना का आनंद ले सकते होतुम्हारे सपनों के संसार में विचरण कर सकते हो।
अगर यह बात समझ में आ जाए तो मंदिर हो सकते हैं। वे सुंदर कलाकृतियां हैं लेकिन उनमें ही खो ही जाओ। वहा जरूर जाओलेकिन वहा खो मत जाओ। इसे सतत स्मरण रखो कि जिसे भी लोग यहां पूजते हैंवह असली ब्रह्म नहीं हैक्योंकि असली ब्रह्म तो पूजा करने वाले के भीतर ही छिपा है। इसी बात पर सारा जोर है। जब मैं पूजा करता हूं तो एक मैं हूं और एक वह वस्तु है जिसकी मैं पूजा करता हूं। ब्रह्म कहां हैउस वस्तु में अथवा पूजा करने वाले मेंउपनिषदों का जोर पूजा करने वाले पर हैन कि पूजा की विषयवस्तु परक्योंकि वह वस्तु तो गौण हैवह तो पूजा करने वाले ने निर्मित की है। जो मूल्य उसे तुम देते हो वह तो तुम्हारे द्वारा प्रक्षेपित किया गया हैतुमने ही वह मूल्य दिया है। वह तुम्हारी ही उस वस्तु को दी गई भेंट है।
तुम एक गोल पत्थर कमरे में रखवा सकते हो और तुम उसकी शिव की भांतिशिवलिंग समझकर पूजा कर सकते हो। और यह पत्थर हजारों वर्षों से रास्ते में पड़ा थाअथवा नदी के घाट पर पड़ा था। किसी ने उसकी पूजा नहीं की। किसी ने नहीं सोचा कि वह शिव है। नदी ने कभी कोई परवाह नहीं की। पशु वहां से गुजरेउन्होंने कभी उसकी ओर नहीं देखा और अचानक तुम उस पत्थर को बदल देते हो। अचानक वह पत्थर पूजा की वस्तु बन गयापवित्र हो गयाऔर अब उसे कोई स्पर्श भी नहीं कर सकता है। और पहले लोग उसके ऊपर से पाव रखकर गुजरते रहे। उनके पांव सदियों से उसे छूते रहे। अब अचानक तुम उसका एक मंदिर बना देते हो। तुम उस पत्थर को वहां स्थापित कर देते होतुम कहते हो,  ''यह शिवलिंग हैकि यह शिव—देवता का प्रतीक है, '' फिर और तुम उसकी पूजा करने लगते होऔर तुम बहुत अच्छा महसूस करने लगते हो।
इस सबमें कुछ भी बुरा नहीं है। पत्थर सुंदर हैऔर यदि तुम्हें उसमें आनंद आ रहा हैतो आनंद अवश्य लो। लेकिन स्मरण रहे कि पत्थर सिर्फ पत्थर हैऔर शिव तुम्हारे ही सृजन हैंतुमने ही उन्हें निर्मित किया है। तुमने ही उन्हें प्रक्षेपित किया हैतुमने ही पत्थर को शिव में परिवर्तित कर दिया है।
ईश्वर को तुमने निर्मित कर लिया हैऔर पत्थर को इस बात का पता भी नहीं है। और अगर वह पत्थर यह सब देख पाए तो उसे भी हंसी आएगी और वह भी सोचेगा, ''यह आदमी पागल हो गया है। क्या कर रहे हो यहमेरी पूजा कर रहे हो? '' पूजा करने वाला ही पूजा की वस्तु को निर्मित करता है। भक्त भगवान को निर्मित करता है।
उपनिषद कहते हैं कि तुम वहां वास्तविक ब्रह्म को नहीं पाओगे : तुम सिर्फ अपनी ही कल्पना को वहां पाओगे। अच्छा हो कि तुम पूजा करने वाले के भीतर प्रवेश करो। पूजा की जाने वाली वस्तु को भूलोऔर यह जानने का प्रयत्न करो कि यह पूजा करने वाला कौन है—यह कौन है जो कि पूजा कर रहा हैकौन है यह जो कि प्रार्थना कर रहा है? कौन है यह जो कि मंदिर जा रहा हैऔर यदि तुम यह खोज सको कि कौन है यह जो कि पूजा करता है तो तुमने ब्रह्म को पा लिया।
मैंने सुना है :

एक बार एक झेन गुरु हुआ पो उपदेश दे रहा था। अचानक एक आदमी उठ खड़ा हुआ। उस आदमी ने कहा, ''मैं वर्षों से सुनता आ रहा हूं और प्रत्येक यही बात कहता है कि 'स्वयं को जानी', लेकिन मुझे इसका अर्थ समझ में नहीं आता। स्वयं को जानोइससे आपका अर्थ क्या हैकृपया इसका अर्थ सीधे—सादे शब्दों में समझायें। मैं कोई बहुत पढ़ा—लिखा आदमी नहीं हूं। मैं यह पारिभाषिक शब्दावली नहीं समझता। कृपया सरल और सीधी बात कहें। आपका स्वयं को जानने से क्या अर्थ है    ''हुआंग पो ने कहा, ''यदि तुम यह पारिभाषिक शब्द नहीं जानतेतो फिर मैं भाषा का उपयोग नहीं करूंगा।'' उसने लोगों से कहा कि भाईरास्ता दो ताकि मैं इस आदमी तक पहुंच सकूं।
हुआंग पो अपने मंच से नीचे उतरा और उस आदमी के पास गया। वह आदमी तो घबड़ा गया, क्‍योंकि उसने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इतने निकट आने की क्या जरूरत हो सकती है। क्‍या यह आदमी हमला करने वाला हैऔर हुआंग पो बहुत ही आक्रामक दिखाई पड़ रहा थावह शेरनुमा आदमी था। इसलिए वह व्यक्ति तो एकदम डर गयाऔर दूसरे लोग भी घबड़ा गए कि न जाने क्‍या होने वाला है। और वे हुआंग पो के बारे में जानते थे। कभी उसने थप्पड़ लगा दिया था तो कभी उसने किसी की दरवाजे के बाहर फेंक दिया था और कभी उसने पीटा भी था.. अत: क्या होने वाला हैपूर्ण शांति हो गईलोगों की सांसें रुक गईं।
फिर हुआंग पो उसके करीब आया और उसने उस व्यक्ति की कॉलर पकड़ कर कहा, ''अपनी आंखें बंद करो। '' उस आदमी ने डर के मारे आंखें बंद कर लीं। एकदम सन्नाटा छा गया। उस व्यक्ति ने अपनी आंखें बंद की हुई थीं. तभी हुआंग पो बोला. ''अब जानो कि वहां कौन है? ''अत: वह आदमी वहीं खड़ा रहा और पूरे हॉल में शांति छा गईकोई सास भी नहीं ले रहा थाऔर हुआंग पी वहा खड़ा था। उस आदमी ने अपनी आंखें बंद कर ली थीं।
वह आदमी जरूर कोई बहुत सीधा—सादा आदमी रहा होगा। उसने आंखें बंद कर लीं और खोजने  लगा कि वह कौन है तू उसने खोजाखोजा और खोजा और समय बीतता चला गया। फिर हुआंग पी ने पूछा अपनी आंखें खोलोऔर बोलो कि तुम कौन हो?''
उस आदमी ने आंखें खोलींलेकिन उसकी आंखें दूसरी ही हो गई थींउनका सारा गुण बदल गया था। वह आदमी हंसने लगाफिर वह जमीन पर झुका और उसने हुआंग पी के चरण छुए और बोला मैंने कभी नहीं सोचा था कि आप इस तरह से मुझे मेरे ऊपर फेंक देंगे। अब मुझसे मत पूछें। मैं नहीं बता सकता। क्योंकि मैं पढ़ा—लिखा आदमी नहीं हूं। लेकिन अब मैं कभी नहीं पूछूंगा मैं कौन हूं। मैंने जान लिया है।''
उपनिषद तुम्हें तुम्हारे ऊपर फेंकने की कोशिश कर रहे हैं। पूजा की वस्तु को विस्मृत करोकेवल भीतर प्रवेश करो। लेकिन तुम भीतर कैसे जाओगेपूजा की वस्तु को भूलना सरल हैलेकिन भीतर जाना कठिन हैक्योंकि मन में वस्तुएं भरी हैं जो कि तुम्हारे चारों ओर चिपकी हैं। जब भी तुम अपनी आंखे बंद करते हो तो तुम्हारे चारों ओर कल्पना का संसार होता हैसपने तैरते रहते हैंआकृतियां बनती रहती हैंविचारों का जुलूस चलता रहता है। फिर तुम संसार में चले जाते हो। वस्तुओं का संसार अब वहां नहीं हैलेकिन विचारों का संसार वहां मौजूद है। जब तक विचारों का संसार समाप्त न होतुम उस पूजा करने वाले को नहीं जान सकते।
कैसे वह समाप्त होगा?  यदि तुम उसके साथ सहयोग करते चले जाओगे तो तुम उसे निर्मित करते चले जाओगे। तुम वस्तुओं के संसार को कभी नष्ट नहीं कर सकते क्योंकि तुमने कभी उसका निर्माण नहीं किया लगा है। स्मरण रहे कि हम वस्तुओं के संसार को नहीं मिटा सकते। कैसे तुम इन पहाड़ों कोसितारों को, चांद कोपृथ्वी को मिटा सकते हो? तुम इन्हें कभी नहीं मिटा सकते क्योंकि तुमने इनको निर्मित नहीं किया था। लेकिन तुम विचारों के संसार को मिटा सकते हो क्योंकि वहा तुम्हीं एकमात्र निर्माता हो। किसी दूसरे ने उसमें कुछ भी सहायता नहीं की है। तुमने अकेले ही सारा कार्य किया है।
विचार जीते हैं क्योंकि तुम उनके साथ सहयोग करते हो। सहयोग मत करो। केवल यही एकमात्र विधि हैसिर्फ उपेक्षा कर दो। बस उनको देखो—बिना उनको प्यार किएबिना उनसे घृणा किए बिना उनकी निंदा किएबिना उनकी प्रशंसा किएबिना कहे कि वे सुंदर हैंबिना कहे कि वे बुरे हैं। कुछ कहो मतकोई रुख या भाव ही मत रखो। सिर्फ उपेक्षा करो—एक देखने वालेद्रष्टा रहो।
आकाश में बादल चल रहे हैं। तुम एक वृक्ष के नीचे बैठे हो और तुम बादलों को आकाश में तैरते हुए देखते होतुम कोई रुख नहीं अपनाते। तुम नहीं कहते कि ये बादल क्यों तैर रहे हैंउन्हें तैरना चाहिए या उन्हें नहीं तैरना चाहिए। तुम कुछ भी निर्णय नहीं लेते। तुम सिर्फ द्रष्टा बने रहते होऔर तुम बादलों को आकाश में चलते देखते रहते हो।
इसी प्रकार से विचारों को भी अंतर आकाश में चलते देखते रहो। कोई रुख मत अपनाओ। जैसे ही तुमने कोई भी रुख लिया कि तुमने सहयोग शुरू किया। बाहर के आकाश से बादल नहीं चले जायेंगे यदि तुमने कोई भी रुख नहीं लियालेकिन भीतर के आकाश के बादल जरूर विलीन हो जायेंगे। वे तुम्हारे ही कारण होते हैं। यदि तुम उनके प्रति उदासीन हो जाओतो वे चले जाते हैं। वे अतिथि हैंतुम इस बात को चाहे जानो या न जानो। वे अतिथि हैंऔर उनको तुमने ही निमंत्रित किया है।
बहुत समय हो गया है और तुम भूल चुके हो कि तुमने कब उन्हें निमंत्रण भेजा। यह भी हो सकता है कि तुमने पिछले जन्मों में उन्हें निमंत्रित किया हो। लेकिन कुछ भी तुम्हारे अंतर जगत में नहीं होता बिना तुम्हारे निमंत्रण भेजे। प्रत्येक विचार को निमंत्रित किया गया हैऔर अभी भी जब वह उठता है तो तुम उसे ऊजी देते हो।
तुम दो प्रकार से ऊर्जा दे सकते हो : यदि तुम पक्ष में हो तो तुम ऊर्जा देते होयदि तुम विपक्ष में हो तो तुम ऊर्जा देते हो। दोनों ही ढंगों में विचार को तुमसे ऊर्जा मिलती है। केवल एक ही रास्ता है असंबंधित होने काऔर वह है उपेक्षा रखना। बुद्ध ने उसे उपेक्षा कहा है। उन्होंने कहा कि यदि तुम विचारों के प्रति उपेक्षा का भाव रखोगे तो वे विलीन हो जायेंगे।
उपेक्षा पर जोर रहे। कोई भी रुख मत अपनाओकोई चुनाव मत करो। केवल साक्षी रहोऔर वे विलीन हो जायेंगे। और जब वे विलीन हो जाते हैं तो अचानक पूजा करने वाला प्रगट होता हैअचानक तुम प्रगट हो जाते हो तुम्हारे ही समक्ष। वह प्रगट होना ही ब्रह्म हैऔर वह नहीं जिसकी लोग यहां पूजा करते हैं।

दिनांक 11 जुलाई 1973प्रात:,
माउंट आबू राजस्थान।