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बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

निर्वाण-उपनिषद--ओशो


उपनिषद--निर्वाण उपनिषद



उपनिषद का अर्थ होता है, द सीक्रेट डाक्ट्रिन। उपनिषद का अर्थ होता है, गुह्य रहस्य। उपनिषद शब्द का अर्थ होता है, जिसे गुरु के पास चरणों में बैठकर सुना। और निर्वाण उपनिषद का नाम सून कर तो मानों मन गद्द-गद्द हो उठता है। एक मिश्री की मिठास तन-मन को घेर लेती है।
सारे उपनिषद मूलत: किसी भी धर्म की शिक्षा नहीं देते। ये इतने शुद्धतम व्यिक्तत्व है, कि इनके आगे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं होती। एक-एक उपनिषद अपने में पूर्णता को समाएँ हुए हे। उपनिषदों के सूत्र—कोई ऐसे नहीं है कि उन सून हो और पूर्ण हो जाओ। ये तुम्‍हे जागरूक करने के, साधना करने के, आप अंदर अमृत्‍व भरने के लिए उत्‍साहित करते है। इस लिए एक बात कितनी अजीब है किसी भी उपनिषद के रचयिता का कोई पता नहीं है। क्‍योंकि जो इतने उचे शब्‍द जमीन पर उतार रहे है उनमें मैं का भाव है ही नहीं। न जाने कितने-कितने ऋषियों ने इन उपनिषदों की रचना में सहयोग किया होगा। लेकिन फिर भी इनका को रचयिता घोषित नहीं है। इस परम्‍परा में निर्वाण उपनिषद भी है। इस में भी ऋषि किसी सूत्र में अपना नाम घोषित नहीं करता।

इसलिए उपनिषदों  पर बोले ओशो के अमृत वचन सुनने का अपना ही आनंद है। वह बातों-बातों में न जाने कितने गुह्म रहस्‍यों में ले जाते है.......आगे एक सूत्र आता है, बहुत ही क्रांतिकारी है—टू मच रेवत्थूशनरि। शायद यही कारण है कि निर्वाण उपनिषद पर टीकाएं नहीं हो सकीं। यह निग्लेक्टेड उपनिषदों में से एक है, उपेक्षित। जब पहली दफा मैंने तय किया कि इस शिविर में इस पर बात करनी है, तो अनेक लोगों ने मुझे पूछा कि ऐसा भी कोई उपनिषद है —निर्वाण उपनिषद? कठोपनिषद है, छांदोग्य है, मांडूक्य है—यह निर्वाण क्या है? यत्न बहुत ही खतरनाक है।
‘’बहुत अद्भुत है निर्वाण उपनिषाद। इस पर हम यात्रा शुरू करते है और यह यात्रा दोहरी होगी। एक तरफ मैं आपको उपनिषद समझता चलूंगा। और दूसरी और आपको उपनिषद चलूंगा। क्‍योंकि समझाने से कभी कुछ समझ में नहीं आता हे। करेंगे तभी समझ में आएगा। इस जीवन में जो भी महत्‍वपूर्ण है, उसका स्‍वाद चाहिए। अर्थ नहीं। उसकी व्‍याख्‍या नहीं,उसकी प्रतीति चाहिए। आग क्‍या है, इतने से काफी नहीं होगा। आग जलानी पड़ेगी। उस आग में जलना पड़ेगा और बुझना पड़ेगा। तब प्रतीति होगी निर्वाण क्‍या है।‘’
ओशो

‘’निर्वाण उपनिषद तो समाप्‍त हो जाता है, लेकिन निर्वाण-निर्वाण उपनिषाद के समाप्‍त होने से नहीं मिलता। निर्वाण उपनिषद जहां समाप्‍त होता है, वहां से निर्वाण की यात्रा शुरू होती हे।
इस आशा के साथ अपनी बात पूरी करता हूं कि आप निर्वाण की यात्रा पर चलेंगे, बढ़ेंगे। और यह भरोसा रखकर मैंने ये बातें कहीं है कि आप सुनने को, समझने को तैयार होकर आए थे।     
मैंने जैसा कहा है और जो कहा है, उसमें अगर रत्‍तीभर भी आपकी तरफ से जोड़ने का ख्‍याल आए, तो स्‍मरण रखना कि वह अन्‍याय होगा—मेरे साथ ही नहीं, जिसने निर्वाण उपनिषद कहा है, उस ऋषि के साथ भी।
आपके ध्‍यान करने की चेष्‍टा ने मुझे भरोसा दिलाया है कि जिनसे मैने बात कहीं है, वे कहने योग्‍य थे।
निर्वाण उपनिषद समाप्‍त !
निर्वाण की यात्रा प्रारंभ !’’

ओशो
निर्वाण उपनिषद