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रविवार, 6 अक्तूबर 2013

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-04)

चौथा—प्रवचन

पावन दीक्षी—परमात्‍मा से जुड़जाने की



                        निरालंब पीठ:।
                         संयोगदीक्षा।
                         वियोगोपदेश:।
                        दीक्षासंतोषपावनम् च।
                     द्वादश आदित्यावलोकनम्।


                     आश्रयरहित उनका आसन है।
            (परमात्मा के साथ) संयोग ही उनकी दीक्षा है।
                     संसार से छूटना ही उपदेश है।
                     दीक्षा संतोष है और पावन भी।
                     बारह सूर्यों का वे दर्शन करते है।



पावन दीक्षापरमात्मा से जुड़ जाने की

साधक की अंतर— भूमिका के संबंध में ये सूत्र हैं। वे जो प्रभु को खोजने निकले हैंउन्हें निरालंब हो जाना पड़ता है। उन्हें और सब आश्रय खो देने पड़ते हैंतभी प्रभु का आसरा मिलता है। उन्हें असहाय हो जाना पड़ता है—हेल्पलेस—तभी सहायता उपलब्ध होती है। जब तक उन्हें लगता हैमैं ही कर लूंगाजब तक उन्हें लगता है कि मैं ही समर्थ हूं जब तक उन्हें लगता है कि मेरे पास साधन हैआसरा हैआलंबन हैतब तक वे प्रभु की अनुकंपा पाने से वंचित रह जाते हैं।
ऐसे हीजैसे वर्षा होती है—पहाड़ पर भी होती हैपर पहाड़ वंचित रह जाते हैं। वे खुद ही अपने से इतने भरे हैं कि और उनमें भरने की जगह नहींसुविधा नहीं। गड्डों में भी होती है वर्षापर गड्डे भर जाते हैंक्योंकि वे खाली हैं। जो खाली हैवह भर दिया जाता हैजो भरा हैवह खाली रह जाता है।
निरालंब पीठ:।
आलंबनरहितआश्रयरहितयही उनके होने का ढंग है। यही उनका आसन है। कोई सहारा नहींकोई आलंबन नहींअसुरक्षित। असुरक्षा की इस बात को थोड़ा गहरे में खयाल कर लें।
धन होतो आदमी को लगता है मेरे पास कुछ हैपद होतो लगता है मेरे पास कुछ हैज्ञान होतो लगता है मेरे पास कुछ है। ये सब साधन हैं। ये सब आलंबन हैं। ये सब आश्रय हैं। इनके आधार पर आदमी अपने अहंकार को मजबूत करता है।
निरालंब पीठ:।
संन्यासी तो वे हैंजिनके पास कोई साधन नहींजिनके पास कुछ भी नहीं है। कुछ भी नहीं है का यह अर्थ नहीं है कि वे बिना वस्त्रों के नग्न खड़े होंगेतभी कुछ नहीं होगा। क्योंकि जो नग्न खड़ा है बिना वस्त्रों केवह भी हो सकता है अपने त्याग को आलंबन बना ले और कहेमेरे पास त्याग हैदिगंबरत्व हैनग्नता हैसंन्यास है। मेरे पास कुछ है। तो फिर आलंबन हो गया।
और जब आपके पास कुछ हैतो आप परमात्मा के द्वार पर पूर्ण भिक्षु की तरह खड़े नहीं हो पातेआपकी अकड़ कायम रह जाती है।
बुद्ध ने इसीलिए संन्यासियों को स्वामी का नाम नहीं दिया जानकर। शब्द बहुत अदभुत था। भिक्षु दियाभिखारी कहाकुछ भी नहीं है जिसके पास। भिक्षा का पात्र है जो बसऔर कुछ भी नहीं। वह जो भिक्षा का पात्र बुद्ध ने संन्यासियों के हाथ में दियावह सिर्फ भीख मांगने के लिए ही नहीं था। बुद्ध कहते थेअपने को भी एक भिक्षा का पात्र ही जाननाउससे ज्यादा नहींतो ही उस परम सत्य की उपलब्धि हो सकेगी।
निरालंबन हो जाना अति कठिन है। मन कहता हैकोई आलंबनकोई सहाराकोई आश्रय—कुछ तो हाथ में हो! अकेला न रह जाऊंअसुरक्षित न रह जाऊंखतरे से बचने का कोई तो इंतजाम हो! तो हम सब इंतजाम करते हैं। गृहस्थ का अर्थ वही है—जो आलंबन की तलाश करता है। गृहस्थ का यह अर्थ नहीं है कि जो घर में रहता है। गृहस्थ का अर्थ हैजो सुरक्षा का घर खोजता रहता हैकहीं भी असुरक्षित नहीं हो सकता।
एलन वाट ने एक अदभुत किताब लिखी है। उस किताब का नाम हैविजडम आफ इनसिक्यूरिटीअसुरक्षा की बुद्धिमत्ता।
संन्यास का अर्थ ही यही है। संन्यास का अर्थ यह है कि हम जान गए यह बात कि सुरक्षा का उपाय करो कितना भीसुरक्षा हो नहीं पाती। कितना ही धन जोड़ोआदमी निर्धन ही रह जाता हैभीतर गरीब ही रह जाता है। और कितनी ही शक्ति का आयोजन करोभीतर आदमी अशक्त ही रह जाता है। और मृत्यु से बचने के लिए कितने ही पहरे लगाओमौत न मालूम किस अज्ञात मार्ग से बिना पदचाप किए आ जाती है। सारी सुरक्षा का इंतजाम पड़ा रह जाता है और आदमी मिट जाता है।
संन्यास इस बात की प्रज्ञाइस बात की समझ हैअंडरस्टैंडिंग है कि सुरक्षा करके भी सुरक्षा होती कहां है! हो भी जातीतो भी ठीक था। होती ही नहींहो ही नहीं पाती। सिर्फ धोखा होता हैलगता है कि हम सुरक्षित हैंहो नहीं पाते सुरक्षित कभी।
जिंदगी असुरक्षा है सिर्फ मरे हुए लोगों के अतिरिक्त कोई भी सुरक्षित नहीं हैक्योंकि सिर्फ मरे  'हुए लोग ही नहीं मर सकतेबाकी तो सभी मरेंगे। असुरक्षा चारों तरफ है। हम असुरक्षा के सागर में हैं। कूल —किनारे का कोई पता नहींगंतव्य दिखाई नहीं पड़तापास में कोई नाव—पतवार नहींडूबना निश्चित है। फिर आंखें  बंद करके हम सपनों की नावें बना लेते हैं। आंखें  बंद कर लेते हैं और तिनकों का सहारा बना लेते हैं। तिनकों को पकड़ लेते हैं और सोचते हैंकिनारा मिल गया। ऐसे धोखासेल्फ डिसेप्शनआत्मवचना होती है।
संन्यासी का अर्थ हैजो इस सत्य को समझा कि सुरक्षा करो कितनी हीसुरक्षा नहीं होती है। मृत्यु से बचो कितने हीमृत्यु आती है। कितना ही चाहो कि मैं न मिटूंमिटना सुनिश्चित है। और जब सुरक्षा से सुरक्षा नहीं आतीतो संन्यासी का अर्थ है कि वह कहता हैहम असुरक्षा में राजी हैं। अब हम राजी हैं। अब हम कोई झूठी नाव न बनाएंगे। अब हम कागज के सहारे न खोजेंगे। अब हम ताश के महल खड़े न करेंगे। अब हम पहरेदार न लगाएंगे। अब हम तिनकों का सहारा न पकड़ेंगे। अब हम जानेंगे कि कोई कूल —किनारा नहींअसुरक्षा का सागर है और डूबना निश्चित है और मरना अनिवार्य है। मिटेंगे हीहम राजी हैं। अब हम कोई उपाय नहीं खोजते।
और जो इतने होने को राजी हो जाते हैंअचानक वे पाते हैंअसुरक्षा मिट गई। अचानक वे पाते हैंसागर खो गया। अचानक वे पाते हैंकिनारे पर खड़े हैं।
क्योंऐसा क्यों हो जाता होगाऐसा चमत्कार क्यों घटित होता है कि जो सुरक्षा खोजता हैउसे सुरक्षा नहीं मिलती और जो असुरक्षा से राजी हो जाता हैवह सुरक्षित हो जाता हैऐसा मिरेकलऐसा चमत्कार क्यों घटित होता है?
उसका कारण है। जितनी हम सुरक्षा खोजते हैंउतनी ही हम असुरक्षा अनुभव करते हैं। असुरक्षा का जो अनुभव हैवह सुरक्षा की खोज से पैदा होता है। जितना हम डरते हैंजितना हम भयभीत होते हैंउतने हम भय के कारण अपने चारों तरफ खोजकर खड़े करते हैं। वह जो असुरक्षा का सागर मैंने कहावह है नहींवह हमारी सुरक्षा की खोज के कारण निर्मित हुआ है। एक विसियस सर्किलएक दुष्टचक्र है। असुरक्षा से बचने की जो आकांक्षा हैवह असुरक्षा पैदा कर देती है। जब असुरक्षा पैदा हो जाती हैतो हमारे भीतर और बचने की आकांक्षा पैदा होती है। वह और असुरक्षा पैदा कर देती है। सागर बड़ा होता जाता है। भीतर बचने की आकांक्षा प्रगाढ़ होती जाती है। वही आकांक्षा  सागर को बड़ा करती जाती है।
संन्यासी का अनुभव यह है कि जो सुरक्षा का खयाल ही छोड़ देता हैउसकी अब कैसी असुरक्षाजिसने मरने के लिए तैयारी कर लीजो राजी हो गयाउसकी कैसी मौतअब मौत करेगी भी क्यावह तो उसी पर कुछ कर पाती हैजो बचता थाभागता थासुरक्षा का इंतजाम करता था कि मौत आ न जाए। मौत उसी के लिए हैजो मौत से भयभीत है। जो भयभीत ही नहीं हैजो मौत को आलिंगन करने को तैयार हैउसके लिए कैसी मौत! मौतमौत में नहींमौत के भय में है 1 उस भय के कारण हमें रोज मरना पड़ता है। रोज मरने में ही जीना पड़ता हैजी ही नहीं पातेमरते ही रहते हैं।
निरालंब पीठ:।
संन्यासी निरालंब होने को ही अपनी स्थिति मानते हैं। वही स्थिति है। वे मांग ही नहीं करते। वे कहते ही नहीं कि हमें बचाओ। वे कहते हैंहम तैयार हैंजो भी हो। वे सूखे पत्तों की तरह हो जाते हैंहवाएं जहा ले जाती हैंवहीं चले जाते हैं। वे नहीं कहते कि पश्चिम जाएंगे कि पश्चिम हमारा किनारा हैकि पूरब जाएंगे कि पूरब हमारी मंजिल है। वे नहीं कहते कि हुवा हमें आकाश में उठाए और बादलों के सिंहासन पर बिठा दे। हवा नीचे गिरा देती हैतो वे विश्राम करते हैं वृक्षों के तले मेंहवा ऊपर उठा देती हैतो वे बादलों में परिभ्रमण करते हैं। हवा पूरब ले जाती हैतो वे पूरब चले जाते हैंहवा पश्चिम ले जाती हैवे पश्चिम चले जाते हैं। उनका कोई आग्रह नहीं है कि हमें कहीं जाना है।
जिनका कोई आग्रह नहीं है। जो किसी विशेष स्थिति के लिए आतुर नहीं हैं कि ऐसा ही हो। जो भी होता है उसके लिए राजी हैंउनके जीवन में कष्ट समाप्त हो जाता है। इसलिए एलन वाट ने कहा हैविजडम आफ इनसिक्यूरिटी। जो बुद्धिमान हैंवे असुरक्षा के लिए राजी हो जाते हैं और सुरक्षित हो जाते हैं।
संन्यासी से ज्यादा सुरक्षित कोई भी नहीं है और गृहस्थ से ज्यादा असुरक्षित कोई भी नहीं है। और गृहस्थ से ज्यादा सुरक्षा का इंतजाम कोई नहीं करता। और संन्यासी से कम सुरक्षा का इंतजाम कौन करता है!
निरालंब पीठ:।
ये बहुत अदभुत दो छोटे से शब्द हैं। उनकी बैठकउनका आसननिरालंब होना है। और जब कोई व्यक्ति इतना साहस जुटा लेता हैतो उसे परमात्मा का आलंबन तत्‍क्षणतत्‍क्षण  उपलब्ध हो जाता है। परमात्मा केवल उनके ही काम आ सकता हैजिनका यह भ्रम छूट गया कि हम हमारे काम आ सकते हैं। हम कुछ कर लेंगेऐसी जिनकी भांति टूट गईजिनके कर्ता का भाव टूट गयापरमात्मा की सहायता केवल उन्हीं को उपलब्ध हो सकती है। क्षण की भी देर नहीं लगतीपरमात्मा की ऊर्जा दौड़ पड़ती हैआपके रोएं—रोएं में समा जाती है।
लेकिन हम अपने पर ही भरोसा करते चलते हैं। सोचते हैंअपने को बचा लेंगे। कितने लोग सोचते रहे हैं! यहीं जहा आप बैठे हैं—एक—एक आदमी जहा बैठा है—वहां कम से कम दस—दस आदमियों की कब बन चुकी हैकम से कम। जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं है इंचभरु जहां दस कब्रें न बन चुकी हों। आदमियों की कह रहा हूं और प्राणियों की तो बात अलग है। वे भी यही सोचते थेजो आप सोच रहे हैं उन्हीं की जगह पर बैठकरवहां दस आदमी गड़े हैंजले हैं। वहा दस आदमियों की राख आपके नीचे है। वे भी यही सोच रहे थेआप भी बैठकर यही सोच रहे हैं। आपके बाद भी उसी जगह और लोग बैठकर यही सोचते रहेंगे। क्या सोच रहे हैंलेकिन एक बात नहीं देखते कि हमारे उपाय से कुछ भी तो उपाय नहीं होता। तो फिर हम निरुपाय होने का उपाय कर लें!
निरालंब पीठ का अर्थ हैनिरुपाय जो हो गए। जो कहते हैंहम कुछ भी न कर पाएंगे। तेरी मर्जीउसके लिए हम राजी हैं। तो तू डुबा दे यहींतो यही हमारा किनारा है।
संयोग ही उनकी दीक्षा है। सयोगदीक्षा।
ये सूत्र ऐसे हैं जैसे केमिस्ट्री केरसायन—शास्त्र के सूत्र होते हैं। इसलिए मैंने कहा कि टेलीग्रैफिक है उपनिषद।
संयोगदीक्षा।
बसइतना कहा है दीक्षा के लिए कि संयोग ही उनकी दीक्षा है। टु बी इन कम्यूनियन इज द इनीसिएशन। परमात्मा के साथ जुड़ जाना ही उनकी दीक्षा है। परमात्मा के साथ सेतु खोज लेनाब्रिज बना लेनापरमात्मा और अपने बीच आवागमन की एक जगह बना लेना ही उनकी दीक्षा है।
दीक्षित का अर्थ ही यही होता है। दीक्षा का अर्थ यही होता है कि मैं अब अपने तक नहीं जीऊंगा। वह जो विराट हैजिससे मैं आया और जिसमें वापस लौट जाऊंगाअब मैं उसके साथ संयुक्त होकर जीऊंगा। अब मैं अपने को पृथक मानकर न जीऊंगा। अब मैं बूंद की तरह नहींसागर के साथ एक होकर जीऊंगा।
निश्चित हीसागर के साथ एक होना खतरनाक हैक्योंकि बूंद मिट जाती है। लेकिन यह खतरा बहुत ऊपरी है। क्योंकि सागर के साथ बूंद तो मिट जाती हैलेकिन मिट जाती है इस अर्थों में कि सागर हो जाती है। क्षुद्रता टूट जाती हैविराट के साथ मिलन हो जाता है। लेकिन विराट के साथ हिम्मत तो जुटानी पड़ती है अपनी क्षुद्र सीमाओं को तोड़ देने की।
अगर अपने घर के आंगन को आकाश के साथ एक करना होतो घर के आंगन की दीवारें तो तोड़ ही देनी पड़ेगी। अगर आप दीवारों को आंगन समझते थेतो आपको लगेगा भारी नुकसान हुआऔर अगर दीवारों के बीच में घिरे हुए आकाश को आंगन समझते थेतो समझेंगे कि लाभ ही लाभ है। वह आपकी समझ पर निर्भर करेगा। अगर आपने अपने अहंकार की सीमा को समझा थायही मैं हूं तो आप समझेंगे मिटे। अगर आपने अपने अहंकार के भीतर घिरे हुए शून्य कोचैतन्य कोभगवत्ता को समझा थायही मैं हूं तो दीवारें गिर जाने से अनंत के साथ एक हो गया। विराट उपलब्धि है फिर। खोना जरा भी नहीं हैपाना ही पाना है।
संयोगदीक्षा।
ऐसे संयोग का नाम दीक्षा हैजहा आपके आंगन की दीवारें गिर जाती हैं और विराट आकाश से मिलन हो जाता है। जहां बूंद अपनी सीमाएं छोड़ देती। साहस का कदम है यह—बहुत बड़े साहस काकहें दुस्साहस का—क्योंकि हम सबकी मनोदशा यही है कि हम अपनी सीमा को ही अपना अस्तित्व समझते हैं। सीमा में जो घिरा हैउसे नहींसीमा को ही अपना अस्तित्व समझते हैं। तो बड़े दुस्साहस की जरूरत पड़ेगीअपने को छोड़नाखोनामिटना।
जीसस कहते थे : जो अपने को बचाएगावह मिट जाएगाऔर जो अपने को मिटा देगाउसके मिटने का कोई भी उपाय नहीं।
जीसस के पास एक युवक आया एक रातनिकोडैमस। और निकोडैमस ने कहा कि मैं सब छोड़ने को तैयार हूं मुझे स्वीकार कर लेंमुझे अंगीकार कर लें। जीसस ने कहातू स्वयं को छोड़ने को तैयार है? उसने कहाऔर सब छोड़ने को तैयार हूं। तो जीसस ने कहालौट जा वापस। जिस दिन स्वयं को छोड़ने को तैयार होउस दिन आ जाना। क्योंकि हमें प्रयोजन नहीं कि तू कुछ और छोड़हमें इतना ही प्रयोजन है कि तू अपने को छोड़। और अपने को कोई न छोड़ेतो संयोग नहीं होगादीक्षा नहीं होगी।
ये तो सब प्रतीक हैं कि संन्यासी का हम नाम बदल देते हैंसिर्फ इसी खयाल से कि उसकी पुरानी आइडेंटिटीउसका पुराना तादात्म्य छूट जाए। कल तक जिन सीमाओं सेजिस नाम से समझा था कि मैं हूं वह टूट जाए। उसके वस्त्र बदल देते हैंताकि उसकी इमेज बदल जाएउसकी जो प्रतिमा थी कल तक कि लगता था यह मैं हूं यह कपड़ायह ढंगवह टूट जाए। बाहर से शुरू करते हैंक्योंकि बाहर हम जीते हैं। और बाहर से ही बदलाहट की जिसकी हिम्मत नहीं हैवह भीतर से बदलने की तैयारी कर पाएगायह जरा कठिन है।
मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैंकपड़े तो बाहर हैंबदलाहट तो भीतर की चाहिए। मैं उनसे पूछता हूं कपड़े बदलने तक की हिम्मत तुम्हारी नहीं हैतुम भीतर की बदलाहट कर पाओगेकपड़े बदलने में कुछ भी तो नहीं बदल रहा हैयह तो मुझे भी पता है। लेकिन तुम कपड़ा बदलने तक का साहस नहीं जुटा पाते और तुम कहते होहम आत्मा को बदल लेंगे। शायद अपने को धोखा देना आसान होगा आत्मा को बदलने की बात मेंक्योंकि किसी को पता नहीं चलेगा कि बदल रहे हो कि नहीं बदल रहे हो। खुद को भी पता नहीं चलेगा। ये कपड़े पता चलेंगे।
लेकिन जो बदलने के लिए तैयार हैवह कहीं से भी शुरू कर सकता है। भीतर से शुरू करना कठिन हैक्योंकि भीतर का हमें कोई पता ही नहीं है। भोजन करते वक्त हम नहीं कहते कि यह तो बाहरी चीज हैक्या भोजन करना! पानी पीते वक्त नहीं कहते कि यह तो बाहरी चीज हैइसके पीने से क्या प्यास मिटेगी! प्यास तो भीतर है।
नहींयह हम नहीं कहते। लेकिन संन्यास लेना हो तो हम सोचते हैंकपड़ा बदलने से क्या होगायह तो बाहर है। और आप जो हैंबाहर का ही जोड़ हैं कुल जमाफिलहाल। भीतर का तो कोई पता ही नहीं। उस भीतर का पता मिल जाएइसी की तो खोज है। इमेज तोड़नी पड़ती हैप्रतिमा विसर्जित करनी पड़ती है। वह जो हम हैं अब तकउसमें कहीं से तोड़ पैदा करनी पड़ती है। और अच्छा है कि सीमाओं से ही तोड़ शुरू करेंक्योंकि सीमाओं पर ही हम जीते हैंअंतस में हम जीते नहीं हैं।
लेकिन वस्तुत: दीक्षा तो फलित तभी होती हैजब भीतर का तार जुड़ जाता है अनंत से।
जब आप बैठे हों सागर के किनारेमौन हो जाएं। थोड़ी देर में सागर कौन है और आप कौन हैंयह फासला गिर जाएगा। आकाश के नीचे लेटे होंमौन हो जाएं। कौन तारा है और कौन देखने वाला हैथोड़ी देर में फासला गिर जाएगा।
सब फासला विचार का है। वियोग विचार का हैसंयोग निर्विचार का है। जहां भी निर्विचार हो जाएंगेवहीं संयोग हो जाएगा।
एक वृक्ष के पास बैठ जाएं और निर्विचार हो जाएंतो वृक्ष और वृक्ष को देखने वाला दो नहीं रह जाएंगे। द ऑबजर्ब्द एंड द ऑबजर्वर विल बी वन। जो देख रहा है वहऔर वह जो देखा जा रहा हैएक हो जाएगा। एक क्षण को भी ऐसा अनुभव हो जाए कि वह जो धूप मुझे घेरे हुए हैवह और मैं एक हूंवह जो वृक्ष मुझ पर छाया किए हैवह और मैं एक हूंबदलिया जो आकाश में तैर रही हैंवह और मैं एक हूं।
यह विचार से नहींयह आप सोच सकते हैं। यह आप वृक्ष के पास बैठकर सोच सकते हैं कि मैं और वृक्ष एक हूं। तब संयोग नहीं होगाक्योंकि अभी सोचने वाला मौजूद है। और यह जो कह रहा हैमैं एक हूं यह अपने को समझा रहा है कि मैं एक हूं। और समझाने की तभी तक जरूरत हैजब तक अनुभव नहीं होता कि एक हूं।
वृक्ष के पास निर्विचार हो जाएंतो अचानक उदघाटन होगा कि एक हूं। यह विचार नहीं होगा तबयह रोएं—रोएं में प्रतीत होगा। वृक्ष के पत्ते हिलेगेतो लगेगा मैं हिल रहा हूं। वृक्ष में फूल खिलेंगेतो लगेगा मैं खिल रहा हूं। वृक्ष से सुगंध फैलने लगेगीतो लगेगी मेरी सुगंध है। लगेगीयह विचार नहीं होगायह प्रतीति होगीयह आत्मिक अनुभव होगा।
ऐसा जिस दिन समस्त अस्तित्व के साथ लगने लगता हैउस दिन दीक्षा—सयोगदीक्षा। उठतेबैठतेचलते—श्वास—श्वास मेंकण—कण मेंरोएं—रोएं में ऐसी प्रतीति होने लगती हैएक हूं एक ही है। वह जो आपकी छाती में छुरा भोंक देवह शत्रु भी एक ही है। वह हाथजो छाती में छुरा भोंक गया हैमेरा ही है। तबतब दीक्षा है। तब संयोग है।
तो ऋषि कहता हैसंयोग दीक्षा। वियोग उपदेश।
एक ही उपदेश है—वियोग। किससे वियोग और किससे संयोगजो हम नहीं हैंउससे वियोग। और जो हम हैंउससे संयोग। जो स्वप्‍न जैसा है उससे वियोगऔर जो सत्य हैउससे संयोग। जो हमने ही प्रोज्येक्ट किया हैहमने ही प्रक्षेप किया हैउस विचार के जगत से वियोगऔर जो है हमसे पहले से और हम नहीं होंगे तब भी होगाउस अस्तित्व के जगत से संयोग।
हम सब एक अपनी दुनिया बनाकर जीते हैं—ए वर्ल्ड आफ अवर ओन। पर्ल बक ने एक किताब लिखी है अपने जीवन संस्मरणों कीमाई सेवरल वर्ल्ड्समेरे अनेक जगत। ठीक है नामक्योंकि प्रत्येक आदमी अलग— अलग जगत में जीता है। एक ही घर में अगर सात आदमी होते हैंतो सेवन वर्ल्ड्ससात दुनियाएं होती हैं। क्योंकि बेटे की दुनिया वही नहीं हो सकतीजो बाप की है। और इसीलिए तो घर में कलह होती है। सात दुनिया एक घर में रहेंसात जगततो कलह होने ही वाली है। सात बर्तन में हो जाती हैतो सात जगत बड़ी चीजें हैं। घर बहुत छोटा है। उपद्रव सुनिश्चित है। ट्रेसपासिंग होगी ही। बाप की दुनिया बेटे की दुनिया पर चढ़ना चाहेगीबेटे की दुनिया बाप की दुनिया पर चढ़ना चाहेगी। पत्नी पति की दुनिया पर कब्जा करना चाहेगी।
इस जमीन पर इस समय कोई तीन अरब आदमी हैंतो तीन अरब जगत हैं। जगत वह नहीं हैजो हमारे बाहर हैजगत वह हैजो हम निर्मित करते हैं। वह हमारा कंस्ट्रक्यान है।
समझें। एक वृक्ष के पास आप भी बैठे हुए हैं। आप एक बढ़ई हैं। एक चित्रकार बैठा हुआ हैएक कवि बैठा हुआ हैएक प्रेमी बैठा हुआ है जिसे उसकी प्रेमिका मिली नहींऔर एक ऐसा प्रेमी बैठा हुआ है जिसे उसकी प्रेमिका मिल गई। तो बढ़ई के लिए वृक्ष में सिवाय फर्नीचर के कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। वह वृक्ष एक ही हैलेकिन बढ़ई फर्नीचर की दुनिया में बैठा होगा वहां।
चमार को आपके जूते के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। वह आपको आपके जूते के नंबर से पहचानता है। दर्जी की आपसे जो पहचान हैवह आपके कपड़े के नाप से है। चमार को चेहरा भी देखना नहीं पड़तासड़क पर गुजरते हुए लोगों के जूतों की हालत देखकर वह जानता है कि माली हालत क्या होगी। चेहरा देखने की जरूरत नहीं और बैंक बैलेंस देखने की भी जरूरत नहीं। जूते की हालत ही बता देती है कि यह आदमी किस हालत में होगा। उसकी अपनी दुनिया है।
तो बढ़ई अगर बैठा है वृक्ष के नीचेतो वह वृक्ष उसके लिए संभावी फर्नीचरइससे ज्यादा कुछ भी नहीं है। उस वृक्ष में फूल नहीं खिलतेकुर्सियां—मेजें लगती हैं। उसकी अपनी दुनिया है। उसके बगल में जो चित्रकार बैठा हैउसके लिए वृक्ष सिर्फ रंगों का एक खेल है।
इधर इतने वृक्ष लगे हैं। साधारण आदमी को वृक्ष हरे दिखाई पड़ते हैं और हरा लगता है कि एक रंग हैलेकिन चित्रकार को हरे हजार रंग हैं—हजार शेड हैं हरे रंग के। वह चित्रकार को ही दिखाई पड़ते हैंआम आदमी को दिखाई नहीं पड़ते। हरा यानी हराउसमें कोई और मतलब नहीं होता। लेकिन चित्रकार जानता है कि हर वृक्ष अपने ढंग से हरा है। दो वृक्ष एक से हरे नहीं हैं। हरे में भी हजार हरे हैं। पता—पत्ता अपने ढंग से हरा है। तो जब चित्रकार देखता है वृक्ष कोतो उसे जो दिखाई पड़ता हैवह हमें कभी दिखाई नहीं पड़ता। उसे पत्ते—पत्ते का व्यक्तित्व दिखाई पड़ता है।
वहीं उसके पास एक कवि बैठा है। तो वृक्ष उसके लिए काव्य बन जाता है। थोड़ी ही देर में वृक्ष खो जाता है और वह काव्य के लोक में प्रवेश कर जाता है। वह हमें कभी खयाल में नहीं आएगा कि कवि किस यात्रा पर निकल गया। उसका अपना जगत है।
उसी खिले हुए फूलों से लदे हुए वृक्ष के नीचेजहा कि वर्षा की तरह फूल गिर रहे होंजिस प्रेमी को उसकी प्रेयसी नहीं मिल 'सकी हैवहा उसे फूल काटे जैसे दिखाई पड़ते रहेंगे। फूल उदास मालूम होंगेवृक्ष रोता हुआ और मरता हुआ मालूम होगा। इससे वृक्ष का कोई संबंध नहीं है। यह उसके अपने भीतर के जगत का विस्तार हैजो वह वृक्ष पर फैला देता है। पूर्णिमा का चांद भी उदास प्रेमी को उदास मालूम पड़ता है। प्रफुल्ल प्रेमी को अमावस की रात भी काफी चांदनी से भरी हुई मालूम होती हैकाफी उजाली होती है।
हम अपने जगत को अपने भीतर से फैलाते हैं अपने चारों तरफ। एक प्रोजेक्यान हैएक प्रक्षेप है। हर आदमी अपने भीतर बीज लिए है अपने जगत काऔर अपने चारों तरफ फैला लेता है।
वियोग इस जगत से। निरंतर हम सुनते रहे हैं कि संन्यासी संसार को छोड़ देता हैलेकिन हमें मतलब पता नहीं है कि संसार का मतलब ही क्या होता है। इस प्रोजेक्टेडयह जो प्रत्येक व्यक्ति अपने बाहर एक जगत का फैलाव करता है... वह सपने का जगत हैबिलकुल झूठा है। वह मेरा फैलाव हैमेरे मरने के साथ मिट जाएगा वह जगत। हर आदमी के मरने के साथ एक दुनिया मरती है। जो थीवह तो बनी रहती हैलेकिन जो हमने फैलाई थीबनाई थीहमारा सपना थीवह खो जाता है।
संसार के त्याग का मतलब यह नहीं कि ये जो चट्टानें हैं इनको छोड़ देनाये जो वृक्ष हैं इनको छोड़ देना या जो लोग हैं इनको छोड़ देना। संसार के त्याग का अर्थ हैवह जो प्रोजेक्यान है हमाराप्रक्षेप हैउसे छोड़ देना। जो है उसे वैसा ही देखनाउस पर कुछ भी आरोपित न करना।
अगर उसी वृक्ष के नीचेजिसकी मैंने बात कीएक संन्यासी खड़ा होउसका कोई जगत नहीं है। संन्यासी का अर्थ हैजिसका कोई जगत नहीं हैचीजों को देखता हैजैसी वे हैं। अपनी तरफ से आरोपित नहीं करताइंपोज नहीं करताउन पर कुछ थोपता नहीं है।
असल में किसी पर भी कुछ थोपना बड़ी हिंसा है। एक वृक्ष को मैं अपनी उदासी थोप दूं और कहूं कि वृक्ष बड़ा उदास मालूम पड़ता हैमैं हिंसा कर रहा हूं। चांद पर मैं अपनी प्रफुल्लता थोप दूं और कहूं कि चांद बड़ा आनंदित मालूम पड़ रहा हैक्योंकि मैं आज आनंदित हूं क्योंकि लाटरी मुझे मिल गई हैतो मैं बड़ी हिंसा कर रहा हूं। और मैं एक झूठ का विस्तार कर रहा हूं। वियोग उपदेश।
उपनिषदों काऋषियों का इतना ही उपदेश है कि इस संसार से—जो हम फैला लेते हैं—उससे वियोगउससे अलग हो जाना। एक संसार हैजो परमात्मा का फैलाव हैऔर एक संसार हैजो हमारा फैलाव है। हमारा फैलाव गिर जाना चाहिएतो हम परमात्मा के संसार से संबंधित हो सकते हैं। जब तक मेरा अपना फैलाव हैतब तक संयोग कैसे होगा उससेजो परमात्मा का है।
मेरे एक मित्र थे। युनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे और ख्यातिनाम विद्वान थे अर्थशास्त्र के। आक्सफोर्ड में भी प्रोफेसर थेफिर यहां भारत के भी अनेक विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर थे। जब पहली दफे मेरी उनसे —मुलाकात हुई तो बड़ी अजीब हुई। रास्ते से मैं निकल रहा था। सांझ का अंधेरा थासूरज ढल रहा थाढल गया था करीब—करीब। अंधेरा उतर रहा था। घूमने मैं निकला था रास्ते परहम दोनों अकेले थेमैं उन्हें जानता नहीं था। जैसे ही मैं उनके पास पहुंचाउन्होंने खीसे से निकालकर जोर से सीटी बजाई। और फिर दूसरे खीसे से निकालकर एक छुरा बाहर किया। नाम उनका मैं जानता थापरिचय कभी नहीं हुआ था। मैंने नमस्कार किया। मैंने कहाआप यह क्या कर रहे हैंउन्होंने कहा कि दूर रहिए! मैंने पूछाबात क्या है?
फिर उनसे संबंध बनामित्रता बनीतो पता चला कि दो साल से वे भयभीत हैं और हर आदमी उन्हें लगता है कि उनकी हत्या करने आ रहा है। तो अकेले में किसी आदमी को देखकर वे दो इंतजाम अपने साथ रखते हैं—एक खीसे में सीटी रखते हैं जोर से बजाने के लिएताकि आसपास के लोगों को पता चल जाए। दूसरे खीसे में छुरा रखते हैं।
अब यह आदमी एक दुनिया में रह रहा है—हत्यारों कीं—जों इसका ही फैलाव है। किसी को प्रयोजन नहीं हैकिसी को मतलब नहीं है। प्रोफेसर को मारेगा भी कौन और किसलिए मारेगा! मारने के लिए भी तो कोई कारण होना चाहिए और मरने की भी तो कोई योग्यता होनी चाहिए। प्रोफेसर को मारनेनिरीह प्रोफेसर को मारने कौन जाएगा और किसलिएइस बेचारे से कुछ भी तो बनता—बिगड़ता नहीं है। यह तो ऐसा है जैसे न हो तो बराबर। जिस दिन लोग स्कूल के मास्टरों की हत्या करने लगेंगेउस दिन तो बड़ी मुश्किल हो जाएगा। इनसे ज्यादा निरीह तो प्राणी होता ही नहीं।
मैंने उन्हें बहुत समझाया कि तुम्हें मारने का कोई कारण भी नहीं है। कौन परेशानी में पड़ेगा तुम्हें मारकरपर उनको खयाल है कि सारी दुनिया उनकी हत्या करना चाहती है। और वे कारण खोज लेते हैं। वे देखते रहते हैं कि यह आदमी आ रहा हैकिस तरह की चाल चल रहा है। इसकी आंख किस ढंग की हैंकुछ संदिग्धससपीशियस तो नहीं है। और उनको देखकर और उनके देखने के ढंग को और उनके खड़े होने को देखकर दूसरा आदमी बेचारा ससपीशियस हो जाता है। उनका जो ढ़ंग हैवह ऐसा है कि दूसरा आदमी सहज नहीं रह सकता उनके साथ। वह भी थोड़ा. और उसकी बेचैनी उनको और—औरफिर विसियस शुरू हो जाता है—थोडी देर में ही वे दुश्मन की हालत में खड़ा कर देते हैं उस आदमी को।
हम सब ऐसे ही जी रहे हैं। हम सबने एक—एक दुनिया बना रखी है अपने चारों तरफ।
वियोग उपदेश है।
इस दुनिया से वियोग होना पड़ेछोड़ देना पड़ेतोड़ देना पड़े। यह गोरखधंधा है। यह बिलकुल मानसिक हैयह बिलकुल विक्षिप्तता हैपागलपन है। इस वियोग को ही ऋषियों का उपदेश कहा गया है। और इस वियोग के बाद ही संयोग हो सकता है परमात्मा से। वह जो परमात्मा का अस्तित्व हैजब हमारे सब प्रोजेक्टेड ड्रीम्सहमारे प्रक्षिप्त स्वप्न गिर जाएंहमारी सारी कल्पनाएं गिर जाएंतो सत्य का उदघाटन हैतो संयोग हो सकता है।
दीक्षा संतोष है और पावन भी। दीक्षा संतोषपावनम् च। दीक्षा संतोष है और पावन भी।
दो बातें हैं।
दीक्षा संतोष है।
यह कभी खयाल में भी न आया होगा कि परमात्मा से मिल जाने के अतिरिक्त इस जगत में और कोई संतोषकोई कटेंटमेंट नहीं है। वियोग असंतोष है। जैसे किसी मां से उसका छोटा सा बेटा बिछुड़ गया हो और असंतुष्ट होठीक वैसे ही हम अस्तित्व से बिछुड़ जाते हैं और असंतुष्ट रहते हैं। उस असंतोष में हम बहुत उपाय करते हैं संतोष केलेकिन सब असफल होते हैंसब फ्रस्ट्रेड हो जाते हैं। एक ही संतोष हैवह मिलनसंयोग उससेजिससे हम छूट गए हैं—वापस उस मूल स्रोत से एक हो जाना। इसलिए संन्यासी के अतिरिक्त संतुष्ट आदमी होता ही नहीं। हो ही नहीं सकता। बाकी सब आदमी असंतुष्ट होंगे ही। वे कुछ भी करेंअसंतोष उनका पीछा न छोड़ेगा। वे कुछ भी पा लें या खो देंअसंतोष से उनका संबंध बना ही रहेगा। वे धनी हों कि निर्धनवे दीन होंदरिद्र हों कि सम्राटअसंतोष उनका पीछा करेगा। असंतोष छाया की तरह पीछे लगा ही रहेगाकहीं भी जाएं आप। सिर्फ एक जगह असंतोष नहीं जाता। वह परमात्मा से जो मिलन हैवहा भर असंतोष नहीं जाता।
उसके कई कारण हैं। पहला कारण तो यह है कि हमने कभी पूछा ही नहीं अपने से कि हम असंतुष्ट क्यों हैं। रास्ते पर एक कार गुजरती दिखाई पड़ जाती हैतो हम सोचते हैंयह कार मिल जाए तो संतोष मिल जाएगा। एक महल दिखाई पड़ जाता हैतो सोचते हैंयह महल मिल जाए तो संतोष मिल जाएगा। एक सम्राट दिखाई पड़ जाता हैतो सोचते हैंयह सिंहासन अपना हो तो संतोष मिल जाएगा। और कभी अपने से पूछा नहीं कि मेरे असंतोष का कारण क्या है। क्या कार न होने से मैं असंतुष्ट हूंक्या महल न होने से मैं असंतुष्ट हूंपद न होने से मैं असंतुष्ट हूं?
तो फिर थोड़ा मा में सोचें। समझ लें कि मिल गई कारमिल गया महलमिल गया सम्राट का पद। पूछें अपने सेमिल गया—संतोष आएगाऔर तत्काल लगेगा कि कोई संतोष आ नहीं सकता। लेकिन हो सकता है कि यह सिर्फ हम सोच रहे हैंइसलिए न मालूम पड़े। तो वह जो कार में बैठा हैउसकी शकल को देखेंवह जो महल में विराजमान हैउसके आसपास परिभ्रमण करेंतो वह जो पद पर बैठा हुआ हैउससे जाकर पूछे कि संतुष्ट होउसे भी ऐसा ही लगा था एक दिन। वह भी हमारे जैसा ही आदमी है। उसे भी लगा था कि इस पद पर होकर संतोष हो जाएगा। फिर पद पर आए तो बहुत दिन हो गएसंतोष तो जरा भी नहीं आया। हीअब उसे लग रहा है कि किसी और बड़े पद पर होंतो संतोष हो जाए। ऐसे जीवन क्षीण होतारिक्त होतामिटताटूटता। रेत में खो जाती है जैसे कोई सरिताऐसे ही हम खो जाते हैं और बिखर जाते हैं।
हमने कभी ठीक से पूछा ही नहीं कि हम असंतुष्ट क्यों हैं। हमारे असंतोष का कुल कारण इतना हैकुल कारण ही इतना है कि हम अपनी जडों से टूट गए हैंअपरूटेड हो गए हैं। हमें कोई पता ही नहीं कि हमारी जड़ें कहां हैं। हम किससे जुड़े हैं और किससे हम जीवन पाते हैंउस मूल स्रोत का हमारा कोई संबंध मालूम नहीं पड़ता। हम अपनी खोपड़ी में कैद हो गए हैंजड़ों से हमारा संबंध टूट गया है। हम सिर्फ विचार करते रहते हैंअस्तित्वएक्सिस्टेंशियल सत्ता से हमारा कहीं कोई मिलन नहीं होता। हम सिर्फ विचार करते रहते हैंविचार में ही जी रहे हैं। और विचार का कोई भी मूल्य नहीं हैअस्तित्व का मूल्य है। होना पड़ेगा कहींसिर्फ सोचने से कुछ भी न होगा।
तो ऋषि कहता हैदीक्षा संतोष है।
क्योंकि जैसे ही मिलन होता है परमात्मा सेजरा सा क्षणभर के लिए भी संपर्क जुड़ जाता हैवैसे ही संतोष की वर्षा हो जाती है। कहीं कोई असंतोष नहीं रह जाता। खोजे भी नहीं मिलता।
और दूसरी बात ऋषि कहता हैदीक्षा पावन भी।
पावन बहुत कीमती शब्द हैउसे थोड़ा समझ लेना पड़ेगा। पावन का अर्थ केवल पवित्र नहीं होता। भाषाकोश में वही लिखा है कि पावन का अर्थ पवित्र। लेकिन भाषाकोश की अपनी मजबूरियां हैं। पावन का अर्थ पवित्र होता हैलेकिन एक भेद के साथविद ए डिफरेंस।
पवित्र उसे कहते हैंजो अपवित्र हो सकता है। पावन उसे कहते हैंजिसके अपवित्र होने की कोई संभावना नहीं है। पवित्र उसे कहते हैंजिसमें विकल्प है। अपवित्र भी हो सकता है। पावन उसे कहते हैंजिसका पवित्रता स्वभाव है। जैसे सोना हैवह अशुद्ध भी हो सकता हैमिट्टी उसमें मिल सकती है। तो पवित्र सोना हो सकता हैअपवित्र सोना हो सकता है। लेकिन जैसा मैंने कहाआकाश हैवह पावन है। उसको अपवित्र करने का कोई उपाय नहींउसमें अशुद्ध मिलाने का कोई उपाय नहीं।
तो दीक्षा संतोष भी है और पावन भी।
दीक्षा के बाद अपवित्र होने का कोई उपाय नहीं है। वह असंभावना है। संन्यासी अपवित्र नहीं हो सकतावह पावन है। प्रभु से जुड़ गई हो जरा सी भी धारातो फिर अपवित्रता का कोई उपाय नहीं है। बुद्ध के भिक्षुओं में एक भिक्षु ने एक दिन बुद्ध को आकर कहा कि गांव में एक वेश्या हैउसने मुझे निमंत्रण दे दिया है कि मैं उसके घर रुकूं इस वर्षाकाल में। बुद्ध ने कहाजाओक्योंकि तुम पावन हो गए हो।
भिक्षुओं में बड़ी बेचैनी फैल गई। वेश्या बहुत सुंदरी थी। सम्राटों को भी उसके द्वार पर प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। एक भिक्षु ने खड़े होकर कहा कि यह तो आप उचित नहीं कर रहे हैं। चार महीना वेश्या के घर में यह भिक्षु रहेकहीं अपवित्र हो जाए! तो बुद्ध ने कहाइसीलिए मैंने कहा। अगर पवित्र होतातो रोकता। वह पावन है। चार महीने बाद बात होगी। उस भिक्षु ने कहातो कल मैं भी अगर कहूं कि किसी वेश्या का मुझे निमंत्रण मिल गया हैतो मुझे आज्ञा मिलेगीबुद्ध ने कहातुम पवित्र भी नहीं हो। और वेश्या तुम्हें निमंत्रण देगीऐसा नहीं है। तुम निमंत्रण मांग रहे हो। तुम वेश्या को निमंत्रण दे रहे हो। नहींतुम्हें आज्ञा नहीं मिलेगी।
स्वभावत: बेचैनी रही। चार महीने भिक्षुओं ने बहुत पता लगाने की कोशिश की कि वह भिक्षुजो वेश्या के घर में ठहरा हैक्या कर रहा हैक्या हो रहा हैक्या नहीं हो रहा है। खिड़कीद्वार—दरवाजों से झांका होगापता लगाया होगाअफवाहें उड़ाई होंगी। बुद्ध के पास रोज खबरें आने लगीं कि भ्रष्ट हो गयाबर्बाद हो गया। यह आपने क्या किया! बुद्ध सुनते रहे। चार महीने बाद भिक्षु आया तो वह अकेला नहीं आया थावेश्या भी भिक्षुणी होकर आ गई थी।
पवित्र अगर अपवित्र के संपर्क में आएतो अपवित्र हो सकता है। पावन अगर अपवित्र के संपर्क में आए तो अपवित्र पवित्र हो जाता है। वह पारस हैवह लोहे को भी सोना कर देता है।
दीक्षा संतोष है और पावन भी।
पावन के लिए अंग्रेजी में एक शब्द है प्योरएक शब्द है होली। तो पावन का अर्थ है होली—दिव्यपारस जैसी। कोई उपाय नहीं है उसे छूने का। उसे स्पर्श नहीं किया जा सकता। आकाश का मैंने कहा। जैसे आग है। आग को अपवित्र नहीं किया जा सकताक्योंकि कुछ भी डालोवह जल जाएगा और राख हो जाएगा और आग पावन ही बनी रहेगी। इसलिए अपवित्र आग नहीं होती। मुर्दा जब जलता है चिता परतब भी वे लपटें अपवित्र नहीं होतींवे लपटें पावन ही होती हैं। असल में अपवित्र को डालोतो जल जाता हैराख हो जाता हैआग को नहीं छू पाता। अस्पर्शित आग अलग खड़ी रह जाती है दूर। उसके पास पहुंचने की कोई गति नहीं है।
तो ऋषि कहते हैंदीक्षा पावन भी है संतोष भी। और ऐसी दीक्षा को जो उपलब्ध हैंवे बारह सूर्यों का दर्शन करते हैं।
बारह सूर्यों का क्या अर्थ हैएक सूर्य को तो हम जानते हैं। बारह सूर्य केवल कहने का ढंग है। वे इतने प्रकाश का भीतर अनुभव करते हैं जैसे कि उनके भीतर बारह सूर्य निकल गए हों। एक सूर्य नहीं बारह। जैसे सारा उनका अंतर—आकाश सूर्यों से भर गया हो। वे इतने प्रकाशोज्जल चेतना की अवस्था को उपलब्ध होते हैंजैसे भीतर बारह सूर्य जग गए हों।
लेकिन इस क्रम से प्रवेश हो : आश्रयरहित हो उनका आसन—निरालंब पीठ.संयोग हो उनकी दीक्षा—संयोगदीक्षासंसार से छूटना हो उनका उपदेशदीक्षा संतोष हो और पावनतो वे बारह सूर्यों केअनंत सूर्यों के दर्शन को उपलब्ध होते हैं। वे उस परम सूर्य को जानने में समर्थ हो जाते हैंजो जीवन और चेतना का उदगमआधारआश्रयसब कुछ है।
और ये सूर्य कहीं बाहर खोजने नहीं जाना पड़ता है। ये सूर्य भीतर ही छिपे हैं। लेकिन हम भीतर जाते ही नहीं। बाहर है अंधकारभीतर है प्रकाश। और बाहर कितने ही सूर्य हों तो भी अंधकार मिटता नहींशाश्वत है।
खयाल किया आपनेबाहर खयाल किया आपने कि कितने ही सूर्य कितने अनंत वर्षों से प्रकाश देते हैंलेकिन अंधकार शाश्वत है। सूर्य आते हैंजाते हैंजलते हैंबुझते हैं। क्योंकि यह आप मत सोचना कि सूर्य सदा जलते रहते हैं। उनका भी जन्म है और मरण है। कितने ही सूर्य जन्मे और मिट गए। यह हमारा सूर्य बहुत नया है। इससे बुजुर्ग सूर्य भी हैं आकाश में। अब तक वैज्ञानिक कहते हैं कि कोई तीन अरब सूर्यों की गणना वे कर पाए हैं। यह भी अंत नहीं हैयहां तक हमारी अभी पहुंच है। उसके आगे भी सूर्यों का विस्तार है। ये तीन अरब सूर्यों में रोज कोई एकाध सूर्य मरता हैकोई नया सूर्य पैदा होता रहता है। अस्तित्व के किसी कोने में कोई सूर्य मरता हैबुझ जाता हैराख हो जाता हैबिखर जाता है। अस्तित्व के किसी दूसरे कोने में नया सूर्य पैदा हो जाता है।
अनंत— अनंत वर्षों से—शाश्वत कहें—सूर्य जलते हैंलेकिन अंधेरा शाश्वत है। सूर्य आते हैं और चले जाते हैंअंधेरे का कुछ बिगड़ता नहीं। सुबह सूर्य निकलता हैहमें लगता है अंधेरा खो गया। सिर्फ छिप जाता है। हमें दिखाई नहीं पड़ताकहना चाहिए। या हमारी आंखें  इतनी आवृत्त हो जाती हैं सूर्य के प्रकाश से कि अंधेरे को देख नहीं पातीं। सांझ सूरज थक जाता हैढल जाता है। अंधेरा अपनी जगह है। अंधेरे को आना नहीं पड़ता। वह अपनी ही जगह है।
खयाल किया आपनेप्रकाश को आना पड़ता है। अंधेरा अपनी जगह हैशाश्वत ठहरा हुआ है। कल सूर्य हमारा बुझ जाएगाअंधेरा शाश्वत होगा। सूर्यों का जीवन हैअंधेरा शाश्वत मालूम होता है। अंधेरा कभी नहीं मिटतासदा है। दीया जल जाता हैतो लगता है मिट गया। दीया बुझ जाता हैतो पता चलता है कि है। जरा भी कंपित भी नहीं होता। प्रकाश तो कंपता भी हैअंधेरा कंपता भी नहींअकंप।
बाहर ऐसा है। अंधेरा शाश्वत है। प्रकाश क्षणभर को है। चाहे दीए का हो और चाहे सूर्यों का हो उसका भी क्षण हैएक मोमेंट है और खो जाता है। भीतर इससे उलटी स्थिति है। प्रकाश शाश्वत हैअंधेरा क्षणभर का है। कितना ही हम अज्ञान में भटकें और अंधेरे में जाएं और कितने ही पापों में उतरें और नर्कों की यात्रा करेंभीतर के प्रकाश में कोई अंतर नहीं पड़ताअकंप है। पाप आते हैंचले जाते हैं। नर्कों की यात्रा होती है और समाप्त हो जाती है। और जिस दिन भी हम लौटकर भीतर पहुंचते हैं हम पाते हैं वहां शाश्वत प्रकाश है। भीतर शाश्वत प्रकाश हैबाहर शाश्वत अंधेरा है। बाहर क्षणिक प्रकाश होता हैभीतर क्षणिक अंधेरा होता है।
जो ऐसी चित्त—दशा को उपलब्ध होता हैऋषि कहते हैंवह अनंत सूर्यों का अनुभव करता है। बारह तो केवल डजून की सीमा हैदर्जन की सीमा है। इसलिए बारह। बारह का मतलबज्यादा से ज्यादा सूर्य उसके भीतर भर जाते हैं।
यह प्रकाश बहुत भिन्न है। क्योंकि बाहर जो प्रकाश क्षणभर के लिए होता है या युगभर के लिए—उसका स्रोत है। सूरज से आता हैदीए से आता है। जो भी चीज किसी स्रोत से आती हैवह स्रोत के चुक जाने पर नष्ट हो जाती है। दीए का तेल चुक जाता हैज्योति बुझ जाती है। सूरज की ऊर्जा नष्ट हो जाती हैसूरज चुक जाता है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि कोई चार हजार साल यह सूरज और चलेगा बस। चार हजार साल बाद यह बुझ जाएगा। इसके बुझने के साथ ही ये हमारे वृक्षयह हमारा जीवनये पौधे—पत्तेये हमये सब बुझ जाएंगेक्योंकि उसकी किरणों के बिना हम नहीं हो सकते।
जहा स्रोत है और सीमा हैवहा तो सभी चीजें क्षणिक होंगी। भीतर जो सूर्य हैअगर ठीक से कहेंतो वहा कोई स्रोत नहीं हैसोर्सलेस लाइट। वहां कोई स्रोत नहीं हैस्रोतरहित प्रकाश है। इसलिए वह कभी चुकता नहीं। इसलिए अंधेरा नहीं चुकता बाहरक्योंकि अंधेरे का कोई स्रोत नहीं है।
अंधेरा कहां से आता हैआपको पता हैकहीं से नहीं आता। बस अंधेरा है। उसका कोई स्रोत नहीं हैइसलिए तेल चुकता नहींजिससे कि अंधेरा आता हो। इसलिए दीया मिटता नहींजिससे अंधेरा आता हो। इसलिए सूरज समाप्त नहीं होताजिससे अंधेरा आता हो। अंधेरा है।
ठीक ऐसे ही जैसे बाहर अंधेरा हैभीतर प्रकाश है—बिना स्रोत केस्रोतरहित। जो स्रोतरहित हैवही शाश्वत हो सकता है। जो स्रोतरहित हैवही नित्य हो सकता है। जो स्रोतरहित हैवही सदा हो सकता है। बाकी सब चुक जाता है।
निरालंब होकर जो संयोग को उपलब्ध होते हैं—संयोग के संतोष कोसंयोग की पावनता कोवे उस स्रोतरहित प्रकाश को पा लेते हैं।

आज इतना ही।

अब हम उस स्रोतरहित प्रकाश की तरफ चलें। दो —तीन बातें खयाल में ले लें।
आंख पर सभी को पट्टियां बांधनी हैं। जिनके पास पट्टियां न होंवे प्राप्त कर लें। कान में फोहा डाल लेना हैताकि कान भी बंद हो जाएं। और अपनी शक्ति पूरी लगानी है। मुझे कहना न पड़े।
दस मिनट जब पहले चरण में श्वास लेनी है तो पूरे प्राण लगा देने हैं। पूरे प्राण लगेंगे तो दूसरे चरण में प्रवेश होगा।
फिर दूसरे चरण में इतना कूदनाइतना नाचनाचिल्लानाहंसनारोना है कि सारे प्राण संयुक्त हो जाएं। जब दूसरा चरण पूरी शक्ति से होगा तो तीसरे चरण में प्रवेश होगा।
तीसरे चरण में हुंकार करनी है—हू—हू—इतने जोर से आवाज करनी है कि नाभि के तल तक उसकी चोट पहुंचने लगे और कुंडलिनी पर उसका धक्का लगे और कुंडलिनी जगने लगे और ऊपर की तरफ दौड़ने लगे। तो वे बारह सूर्यजिनकी हम बात कर रहे हैंवे हमें दिखाई पड़ने शुरू हो जाएं। और एक आखिरी बात।
ध्यान के बाद जिनको पड़े रहना होबाद में भीमेरे समाप्त कर देने के बाद भी जिनकी मौज होवे पीछे भी पड़े रह सकते हैं। और जैसे ही मैं कहूं, दस मिनट चुप हो जाना हैउसके बाद फिर जरा भी आवाज नहीं। फिर कोई आवाज नहीं करेगान नाचेगान डोलेगा। दस मिनट जब चुप होना है तो बिलकुल सन्नाटा और शून्य हो जाना है। अगर कोई मित्र यहां देखने भी बाहर आ गए हों तो दूर हट जाएं। पहाड़ी पर दूर बैठ जाएं। और वहां बातचीत न करेंचुपचाप देखते रहें।
ओशो