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मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

केनोउपनिषद--प्रवचन--08

अनादि.....अनंत—आठवां प्रवचन
दिनांक 12 जुलाई 1973, प्रात:,
माउंट आबू राजस्थान।


             द्वितीय खंड
        यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि
        नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।
        यदस्य त्वं यदस्य देवेष्यथ नु
        मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम्।।1।।

        नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च।
       यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च।।2।।


                        द्वितीय अध्याय


                             1
     तुम सोचते हो कि तुम ब्रह्म को भलीभांति जानते हो,
           तो तुम वास्तव में बहुत कम जानते हो,  
       क्योंकि ब्रह्म का जो रूप तुम जीवित प्राणियों में
     तथा देवताओं में समाया हुआ देखते हो वह एक मामूली बात है।
     इसलिए तुम्हें ब्रह्म के बारे में और आगे खोजबीन करनी चाहिए।



                           2
     मैं नहीं सोचता कि मैं उस?ए भलीभांति जानता हूं,
न ही मैं ऐसा सोचता हूं कि मैं उसे नहीं जानता। फिर भी मैं जानता भी हूं।
हममें से वही उसे जानता है जो जानता है कि वह अज्ञात और ज्ञात दोनों से भिन्न है।

उस परम का ज्ञान कई कारणों से विरोधाभासी है। एक दावा कि मैं जानता हूं—यही बाधा बन बन जाता है। क्योंकि जैसे ही तुम कहते हो कि मैं जानता हूं तो तुम्‍हारा जो केवल ज्ञान पर नहीं होता, तुम्हारा जोर 'मैं' पर भी होता है; और यह 'मैं' ही बाधा है। अहंकार सर्वाधिक सूक्ष्म बाधा है, किंतु सर्वाधिक शक्‍तिशाली। इसलिए जब कोई कहता है कि मैं जानता तो वह 'मैं'ही ज्ञान को नष्ट कर देता है। 'मैं' उसे नहीं जान सकता क्योंकि उसे जाना ही तभी जाता है जबकि तुम पूरी तरह तिरोहित हो गये होते हो। जब तुम नहीं हो जाते हो, तो बह होता है। यह पहली समस्‍या है।
ऐसा कहा जाता है कि डेल्‍फी के ओरेकल ने घोषणा की कि सुकरात अभी जीवित लोगों में सर्वाधिक ज्ञानी आदमी है। जिन्होंने उसे सुना वे सुकरात के पास गये और बोले,''ओरेकल ने घोषणा की है कि मैं पृथ्वी पर सर्वाधिक ज्ञानी आदमी हैं।''
सुकरात हंसने लगा और बोला,''ओरेकल को यह घोषणा थोडा पहले करनी चाहिए थी—तब मैं प्रसन्‍न हुआ होता। अब तो बहुत देर हो गई। वापस जाओ और ओरेकल को कहो कि मैं पृथ्वी पर सर्वाधिक अज्ञानी आदमी हूं।

जब मैं छोटा था और अहंकार से भरा था तो मेरी रास थी ओरेकल की है—कि मैं जानता हूं—क्योंकि तब मेरा 'मैं' इतना मजबूत था कि बह सोच ही नहीं सकता था कि उस आत्यंतिक रहस्‍य को जाना ही नहीं जा सकता। 'मैं' इतना प्रबल था कि मैं यह सोच ही नहीं सकता था कि मैं भी अज्ञानी  हो सकता हूं। जो भी था, मैं सोचता था मैं जानता हूं, अथवा जाना जा सकता है। लेकिन जैसे—जैसे मेरा ज्ञान बढ़ा, मेरी समझ बढी, वैसे—वैसे मेरा अज्ञान मुझे मालूम होने लगा। इसलिए वापस जाओ और ओरेकल से कह दो कि सुकरात स्वयं कहता है कि वह सिर्फ अज्ञानी है, उसे कुछ भी पता नहीं है।''
 लोग लौटे, और उन्होंने ओरेकल से कहा, ''तुम जो कहते हो सुकरात उसे स्वीकार करने से इंकार करता है। और जब वह स्वयं इंकार करता है तो जरूर इसका कुछ मतलब होना चाहिए। वह कहता है वह सर्वाधिक अज्ञानी आदमी है।''
ओरेकल हंसने लगा और उसने कहा, ''इसीलिए हमने उसके सर्वाधिक ज्ञानी होने की घोषणा की है, क्‍योंकि महाज्ञानी ही यह जान सकता है कि वह अज्ञानी है।''
यही विरोधाभास है : जो अज्ञानी हैं वे सदैव सोचते हैं कि वे जानते हैं। यह अज्ञान का ही हिस्सा है। यह सोचना कि तुम जानते हो यह अज्ञान का हिस्सा है, यह अज्ञान से ही आता है। यदि तुम अज्ञानी हो तो गुम सोचोगे कि तुम बहुत कुछ जानते हो। तुम जितने अज्ञानी होते हो उतना तुम्हें ज्ञानी होने का भ्रम होता है। अज्ञान ज्ञान से भरा होता है। सच पूछा जाये तो अज्ञान ज्ञान पर ही जीता है, उसी पर पलता है। जितने अधिक तुम ज्ञानी होते जाते हो, सजग होते जाते हो, समझदार होते जाते हो, उतना ही अधिक तुम्हें मालूम पड़ता है कि तुम कितने अज्ञानी हो। और एक क्षण ऐसा आता है कि तुम्हें लगता है कि तुम कुछ भी नहीं जानते। तुम बस अज्ञानी हो। ज्ञान का सारा बोझ हट जाता है। ज्ञान का कोई भार तुम पर नहीं रहता। तुम पा तने हलके हो जाते हो कि तुम उडने लगते हो। ज्ञान बोझ है।
जब तुम्हें प्रतीति होती है कि तुम नहीं जानते हो तो अहंकार विलीन हो जाता है; वह बच ही नहीं सकता है। वह सिर्फ ज्ञान के साथ बच सकता है। वास्तव में जब भी तुम ज्ञान का दावा करते हो तो वह दावा सिर्फ तुम्हारे अहंकार का ही होता है। 'मैं जानता हूं—जोर जानने पर नहीं है बल्कि सारा जोर 'मैं' पर है। जब तुम कहते हो कि मैं नहीं जानता तो जोर अज्ञान पर नहीं है, अब जोर अहंकारशून्यता पर है। जैसे ही तुम कहते हो कि मैं नहीं जानता, तब तुम कहां हो? कहा है 'मैं'? अब वह कहीं भी नहीं है। अब वह केवल एक शब्द ही रह गया है उपयोग करने के लिए। अब उसका समानार्थी तुम्हारे भीतर कुछ भी नहीं बचा। यह पहली समस्या है।
एक ईसाई संत तरतुलियन ने मनुष्यता को दो भागों में बांटा है। वह कहता है कि मनुष्य जाति का एक हिस्सा एक वर्ग में है—वह है अज्ञानी जानने वाले, और दूसरा वर्ग है : जानने वाले अज्ञानी। पूरी मनुष्य जाति दो भागों में बांट दी गई है। एक तो अज्ञान है जो कि जानता है, और दूसरा ज्ञान है जो कि अज्ञानी है। यदि तुम ज्ञान का दावा करते हो तो तुम अज्ञानी हो। यदि तुम अज्ञान को स्वीकार करते हो तो तम ज्ञान को उपलब्ध हो सकते हो? क्योंकि अज्ञान में 'मैं' नहीं बच सकता। और जब 'मैं' नहीं होता तो द्वार खुला होता है। तुम वास्तविकता को सीधे देख सकते हो।
तुम ही बाधा हो। जब तुम नहीं होते तो कोई बाधा नहीं होती—यह पहली बात है।
दूसरी बात वह आत्यंतिक केवल अज्ञात ही नहीं है, ब्रह्म केवल अज्ञात ही नहीं है—वह अज्ञेय भी है। तम उसे जान सकते हो लेकिन तुम उसे समग्रत: नहीं जान सकते। इससे एक नई उलझन खड़ी होती है। तम उसे जान तो सकते हो, परंतु तुम उसे समग्रत: नहीं जान सकते? क्यौंकि तुम सिर्फ इसके एक हिस्से हो, और एक हिस्सा सर्व को, पूर्ण को नहीं जान सकता। कैसे एक हिस्सा पूर्ण को समग्रता से जान सकता है और साथ ही हिस्सा बिलकुल अनभिज्ञ भी नहीं रह सकता, क्योंकि वह पूर्ण का हिस्सा है। अत: एक तरह से वह जानता भी है, वह एक तरह से अनुभव भी करता है, वह एक प्रकार से समझता भी है, किंतु फिर भी वह समग्र को समझ नहीं सकता, क्योंकि समग्र इतना विराट है।
एक नदी सागर में गिरती है... वह सागर को जान पाती है, वह सागर को अनुभव कर पाती है, वह सागर में ही रहती है, वह उसी में समा जाती है, लेकिन वह समग्र सागर में नहीं घुल सकती, वह सारे सागर पर नहीं फैल सकती; वह समग्र सागर को नहीं जान सकती। वह सिर्फ एक हिस्से को ही जान सकती है।
जब तुम्हारी चेतना नदी की भांति ब्रह्म में गिरती है, उस आत्यंतिक के महासागर में, तो तुम 'उसे' जानते हो, लेकिन तुम उसे उसकी समग्रता में नहीं जान पाओगे। तुम जान नहीं सकते, उसकी कोई संभावना नहीं है। इसलिए ब्रह्म अज्ञेय है, क्योंकि सर्व अंश के लिए अज्ञात ही बना रहता है। इसलिए समस्या खड़ी होती है। जब भी कोई जान लेता है—वह अज्ञानी हो जाता है, अहंकारशून्य हो जाता है और जान लेता है—तो भी वह नहीं कह सकता कि मैंने सर्व को जान लिया।
वह नहीं कह सकता कि मैंने नहीं जाना है, और वह यह भी नहीं कह सकता कि मैंने जान लिया है। वह यही कह सकता है कि एक तरह से मैं जानता भी हूं और एक तरह से मैं नहीं भी जानता हूं। एक अर्थ में मैंने 'उसमें' प्रवेश किया है, और 'उसने' मुझमें प्रवेश किया है, किंतु मैं एक बूंद हूं और वह एक सागर है। मैं उसे जानता हूं किंतु फिर भी सर्व एक रहस्य ही है। इसी कारण, जिन्होंने अपनी निर्दोषता में उसे जान लिया है, उसमें गिरकर उसे पहचान लिया है, वे भी एक प्रकार से मुश्किल में ही हैं कि उसके लिए क्या कहें। वे अपने ज्ञान का इनकार भी नहीं कर सकते, और अपने शान की घोषणा भी नहीं कर सकते। यह ऐसा ही है।
इसी कारण बहुत—से लोग चुप ही रह गये। बुद्ध ब्रह्म के बारे में किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं देते थे। जहां कहीं भी जाते उनके शिष्य यह खबर फैला देते थे कि उस आत्यंतिक के बारे में कोई प्रश्न न पूछा जाये, क्योंकि बुद्ध उसका कोई उत्तर नहीं देने वाले हैं।
किसी ने बुद्ध से पूछा, '' आखिर आप उत्तर क्यों नहीं देते हैं?''
बुद्ध ने उत्तर दिया, ''यदि मैं उत्तर देता हूं तो वह किसी न किसी तरह से झूठ ही होने वाला है। यदि मैं कहूं कि मैं जानता हूं तो यह बात गलत है क्योंकि बूंद सागर को कैसे जान सकती है? यदि मैं कहूं कि मैं नहीं जानता हूं तो भी बात गलत होगी, क्योंकि बूंद सागर को जानती है। बूंद सागर की ही आणविक इकाई है। सारा सागर बूंद में भी मौजूद है।
''वस्तुत: एक बूंद को समग्रता से जान कर तुम सागर को जान सकते हो, क्योंकि बाकी तो कुछ और नहीं है। बूंद में वह सब मौजूद है, लेकिन फिर भी वह बूंद ही है। इसलिए अगर मैं कहता हूं कि मैं जानता हूं तो बात गलत होगी, क्योंकि मैं एक बूंद ही हूं। यदि मैं कहूं कि मैं नहीं जानता हूं तो भी बात गलत हो जायेगी क्योंकि मैं जानता हूं। मैं भी सागर हूं—एक सूक्ष्म सागर, अत: अच्छा है कि मौन ही रहा जाये। ''लेकिन मौन भी गलत समझा जा सकता है, और गलत ही समझा गया। जो लोग बुद्ध के विरुद्ध थे उन्होंने कहना शुरू किया कि बुद्ध इसलिए नहीं बोलते क्योंकि वह जानते नही हैं। अब तक उन्होंने ब्रह्म में प्रवेश ही नहीं किया है, इसलिए वे चुप हैं। वरना उन्हें कहना चाहिए।
देखें इस मुश्किल को। यदि वे कहते हैं कि मैं जानता हूं तो भी दिक्कत होने वाली है; यदि वे कहते हैं कि मैं नहीं जानता हूं तो भी मुश्किल पैदा होने वाली है। और यदि वे चुप रहें तो लोग गलत समझेंगे।
उस आत्यंतिक को किसी भी तरह संप्रेषित नहीं किया जा सकता, चाहे तुम मौन रहो चाहे कुछ कहो। वह असंप्रेषित ही रहता है। उसे हस्तांतरित नहीं किया जा सकता; वह बिना दिये ही रह जाता है। उसे रांप्रेषित भी नहीं किया जा सकता। वह संप्रेषण के भी पार है।
एक तीसरी कठिनाई और आती है, और एक नई समस्या बना देती है। वह समस्या यह है कि ब्रह्म का अर्थ होता है—आधार—सभी कुछ का स्रोत। स्रोत को रहस्य ही बने रहना चाहिए। उसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। कौन उसको भाषा देगा? क्योंकि कोई भी उससे हट कर खड़ा नहीं हो सकता उसका रहस्य खोलने के लिए कोई होना चाहिए जो दूर से, अलग खड़ा होकर द्रष्टा हो सके, तटस्थ रह कर देख सके। हम आत्यंतिक से दूरी पर खड़े नहीं रह सकते। हम उसी में हैं जैसे कि तालाब में मछलियां तैरती होती हैं। वे मछलियां पृथक खड़ी नहीं हो सकतीं, वे तालाब को द्रष्टा की भांति नहीं देख सकतीं।
कबीर कहा करते थे कि एक बार दो पंडित नदी के किनारे खड़े होकर सागर कैसा होता है इस पर बात करते थे। एक मछली को यह बात पकड गई; उसने पूछताछ शुरू कर दी। उसके लिए यह बात निरंतर चिंतन का विषय बन गई—सागर कैसा होता है?
उसने अपने बड़े—बूढ़ों से पूछा, परंतु उन्होंने कहा कि उन्होंने भी दूसरों से सागर के बाबत सुना है पर उन्हें कुछ पता नहीं है कि सागर कैसा होता है। उन्होंने सागर कभी देखा नहीं था—और वे सागर में ही थीं। लेकिन तुम जिसमें रहते हो उसे कैसे देख सकते हो? वे उसी में पैदा हुई थीं, लेकिन जिसमें तुम पैदा हुए हो, उसे तुम कैसे जान सकते हो? तुम उससे इतने एक होते हो, और वह तुमसे इतना एक होता है कि कोई भी दूरी नहीं होती, अत: तुम उसे नहीं जान सकते।
तो वह जिज्ञासु मछली पता लगाती ही गई। कोई भी उसके सवाल का जवाब नहीं दे पाया, लेकिन सभी ने यही कहा कि उन्होंने भी सुना है कि सागर होता है।

कबीर कहते हैं कि यही हालत आदमी की भी है जो कि पूछता ही चला जाता है कि ईश्वर क्या होता है, वह कहां है, ईश्वर कौन है? हम सब परमात्मा में ही हैं, इसीलिए यह कठिनाई है। और मछली के लिए तो यह भी संभव है कि नदी के या सागर के बाहर छलांग लगा ले। कुछ क्षणों के लिए तो मछली सागर के बाहर छलांग लगा ही सकती है, और किनारे पर आकर सागर को देख सकती है। लेकिन मनुष्य के लिए तो वह भी संभव नहीं है। तुम ब्रह्म के बाहर छलांग नहीं लगा सकते, उसका कोई भी किनारा नहीं है। तुम बाहर नहीं कूद सकते क्योंकि कुछ भी उसके बाहर नहीं है। सभी कुछ उसके भीतर है, और कुछ भी बाहर नहीं है। यही अर्थ होता है असीम का।
तुम अस्तित्व के बाहर नहीं जा सकते—या कि जा सकते हो? क्योंकि जिस क्षण भी तुम अस्तित्व के बाहर जाते हो वैसे ही तुम '' हो जाते हो। तुम अस्तित्व के बाहर नहीं जा सकते। सभी कुछ अस्तित्व है। सभी जगह अस्तित्व ही है। तुम कहीं भी जाओ, अस्तित्व ही है। अत: दूरी संभव नहीं है। तुम द्रष्टा नहीं हो सकते, तुम ब्रह्म का अवलोकन नहीं कर सकते। इस रहस्य को खोला नहीं जा सकता। यह रहस्य इतना आधारभूत है, इतना आत्यंतिक है, इतना सार्वभौमिक है, और तुम सिर्फ सागर की एक मछली हो। ब्रह्म को उस भांति नहीं जाना जा सकता जैसे कि हम दूसरे तथ्यों को जानते हैं क्योंकि दूसरे तथ्य हम देख सकते हैं।
विज्ञान खोलता है, विज्ञान खोलता ही जाता है। लेकिन विज्ञान रहस्यों को खोलता जा सकता है क्योंकि विज्ञान आत्यंतिक प्रश्न को नहीं लेता। वह सिर्फ उन प्रश्नों को लेता है जो अंतिम नहीं हैं। वह यह जान सकता है कि हाइड्रोजन क्या है। वह यह भी जान सकता है कि आणविक ढांचा क्या होता है। तुम देख सकते हो। तुम प्रयोगशाला में जा सकते हो और देख सकते हो। और तुम वस्तुओं के रहस्य में प्रवेश कर सकते हो। क्योंकि वस्तु आखिरी, आत्यंतिक बात नहीं है। लेकिन तुम ब्रह्म के साथ प्रयोग कैसे कर सकते हो और कैसे उसे देख सकते हो? कहां और कैसे उसमें प्रवेश करोगे? जहां भी जाओगे तुम उसी के एक हिस्से होओगे, उसी में होओगे। इस रहस्य को खोला नहीं जा सकता।
ब्रह्म एक रहस्य ही बना रह जाता है। और यदि ब्रह्म एक आत्यंतिक रहस्य है तो तुम कैसे कह सकते हो कि तुमने जान लिया? तुम कुछ तभी जान सकते हो यदि उसका रहस्य—रहस्य न रहे। जैसे ही तुम कुछ जानते हो वह रहस्य नहीं रह जाता। इसीलिए विज्ञान रहस्य को नष्ट करने वाला है। और जितना अधिक विज्ञान बढ़ता जाता है, और जितने अधिक लोग वैज्ञानिक ढंग से प्रशिक्षित होते जाते हैं, उतना ही रहस्‍य से उनका नाता टूटता जाता है।
विज्ञान सच में ही रहस्य का हत्यारा है, वह रहस्य की हत्या करता चला जाता है। इसीलिए संसार इतना दरिद्र हो गया है, और विज्ञान ने उसे इतना समृद्ध कर दिया है! जगत पहले कभी भी इतना दरिद्र और इतना समृद्ध नहीं था।
प्रत्येक चीज पहले से ज्यादा समृद्ध हो गई है। तुम ज्यादा अच्छे मकानों में रह रहे हो, ज्यादा अच्‍छे कपड़ों का उपयोग कर रहे हो, अधिक अच्छा भोजन कर रहे हो। प्रत्येक चीज पहले से ज्यादा समृद्ध हो गई है। सम्राट भी ईर्ष्या से भर जायेंगे यदि उन्हें उनकी कब्रों से निकाल कर जीवित कर दिया जाये। अशोक और अकबर भी तुम्हारे सामने दरिद्र ही दिखलाई पड़ेंगे, क्योंकि अशोक भी वैसी कमीज का उपयोग नहीं करता था जैसी कमीज तुम पहनते हो। जो स्नानघर तुम काम में लाते हो वह अकबर के लिए भी एक विलासिता की बात थी।
जहां तक वस्तुओं का सवाल है संसार पहले से बहुत ज्यादा समृद्ध हो गया है, लेकिन आदमी अधिकाधिक दरिद्र हो गया है, क्योंकि कोई रहस्य ही नहीं बचा है। जीवन बिना किसी रहस्य का हो गया है—मृत। केवल रहस्य ही जीवंत हो सकता है।

जरा बच्चों की ओर देखो : वे ज्यादा जीवंत हैं। क्यों? और क्यों एक का आदमी इतना जीवंत नहीं दिखलाई पड़ता? यह कोई उम्र के ज्यादा हो जाने का सवाल नहीं है। बुनियादी बात थोड़ी गहरी है। बच्‍चा जीवंत है क्योंकि बच्चा रहस्य के जगत में जी रहा है; उसके लिए हर बात एक रहस्य है—प्रत्येक चीज। बीज फूट रहा है, बच्चा उस फूटते बीज को देख रहा है। यह एक इतना बड़ा रहस्य है कि उसको विश्‍वास नहीं होता कि ऐसा भी हो सकता है। एक चिड़िया एक डाल पर आ बैठी है और गीत गा रही है : यह बात कितनी रहस्यपूर्ण है! आकाश में बादल घुमड़ रहे हैं और वर्षा हो रही है... सभी कुछ रहस्यपूर्ण है। बच्‍चा एक आश्चर्य के जगत में रहता है; इसीलिए इतनी जीवंतता है क्योंकि हर चीज एक चुनौती है। जीवन सपाट नहीं है। जीवन में कई क्षेत्र हैं जो कि अनजान हैं। बच्चा कूदता—फांदता रहता है, पूछताछ करता रहता है, हर चीज की ओर देखता रहता है। हर चीज इतनी विस्मयपूर्ण है क्योंकि बच्चा अबोध है।

उपनिषदों के दिनों में हर व्यक्ति इतना जीवंत होता था, प्रत्येक चीज रहस्यपूर्ण थी। विस्मय का भाव था। और जब विस्मय होता है तो तुम जीवंत होते हो क्योंकि बाहर एक चुनौती होती है रहस्य का पता लगाने के लिए। विज्ञान रहस्यों को मारता जाता है। वह हर चीज को समझाता जाता है। तुम चाहे कुछ भी करो, उसकी व्याख्या मौजूद है। और एक बार व्याख्या हो गयी तो विस्मय समाप्त हो गया, हर चीज सपाट गयी। जब कुछ भी खोजने को बाकी न रहा तो सारी चुनौती ही जाती रही। और जब कोई चुनौती न हो जीवन मर जाता है, वह नाच नहीं सकता, वह विस्फोटित नहीं हो सकता। फिर कुछ भी नहीं बचता।
इन तीन सौ वर्षों में मनुष्यता इतनी दरिद्र बना दी गई है कि उसकी कल्पना नहीं की जा सकती विज्ञान ने वस्तुओं के जगत की व्याख्या कर दी, और मनोविज्ञान ने मन के जगत को स्पष्ट कर दिया यदि तुम प्रेम में पड़ते हो तो यह एक रहस्य है। लेकिन जाओ फ्राँयड के पास, और वह सारी बात समझा देगा। वह कहेगा, ''यह कुछ नहीं है, केवल शरीर में हारमोन्स हैं, और इनके बारे में बहुत गंभीर होने की आवश्यकता नहीं है। यह सिर्फ रसायनों का काम है। सिर्फ एक विशेष प्रकार के हारमोन्स हैं जो कि तुम्हें प्रेम में पड़ने के लिए मजबूर करते हैं। इसमें कुछ पागल होने की जरूरत नहीं है। उन हारमोन्स को शरीर के बाहर निकाला जा सकता है, और प्रेम विलीन हो जायेगा। अथवा उन हारमोन्स का एक इंजेक्यान देने की जरूरत है और तुम गहरे प्रेम में पड़ जाओगे। अत: यह बात सिर्फ हारमोन्स की है। इसमें ज्यादा खो जाने की जरूरत नहीं है। ''और एक बार यह बात स्पष्ट कर दी जाये, तो प्रेम का सारा रहस्य चला गया।
अभी वे सारी दुनिया में यौन सिखा रहे हैं। एक तरह से तो यह अच्छा है लेकिन सिर्फ एक विपरीत दवा की भांति। विक्टोरिया के जमाने की अतिनैतिक शिक्षा है, उसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप ठीक है कि बच्चों को यौन की शिक्षा दी जाये। लेकिन गहरे में यह बहुत खतरनाक है क्योंकि एक बार बात साफ हो गई तो सेक्स का रहस्य ही समाप्त हो जायेगा। और ऐसा विशेषकर अमेरिका में हो रहा है जहां कि यौन के संबंध में सभी कुछ पता है, लोग यौन में रस खोते जा रहे हैं। उनका रस खो ही जायेगा यदि सारी बात जान ली गयी।
मास्टर्स तथा जॉनसन, इन दो प्रयोगकर्ताओं ने यौन के रहस्य में इलेक्ट्रानिक्स यंत्रों द्वारा प्रवेश किया है। जब कोई युगल प्रेम कर रहा हो तो स्त्री के गुप्तांग में इलेक्ट्रानिक यंत्रों के द्वारा यह बात रिकार्ड होती जाती है कि क्या घट रहा है। एक ग्राफ बनता जाता है। जब एक युगल प्रेम कर रहा होता है तब यंत्र सारे समय यह रिकार्ड करते हैं कि रक्त में, श्वास में, शरीर में, हारमोन्स में क्या घट रहा है। तब सारा रहस्य ही स्पष्ट हो जाता है और तब वे कहते हैं, ''यह बस एक यांत्रिक बात है। ऐसा इन इन कारणों से होता है। '' एक बार यौन का रहस्य खो जाये तो तुम्हारा जीवन एक ऊब हो जायेगा। जब तुम अपनी पत्नी के साथ या प्रेमिका के साथ प्रेम कर रहे होओगे तो तुम्हें पता है कि क्या घट रहा है। रक्त—चाप बदल रहा है, हारमोन्स दौड़ रहे हैं, तुम्हें सब पता है। और तब सच में कोई जरूरत ही नहीं रह जायेगी कि तुम प्रेम में पड़ो, क्योंकि तब प्रेम यंत्रों द्वारा भी किया जा सकता है।
मास्टर्स तथा जॉनसन ने इलेक्ट्रानिक के लिंग तथा योनियां भी तैयार की हैं। और अब वे कहते हैं कि एक इलेक्ट्रानिक लिंग, एक विद्युत—यंत्र, ज्यादा गहरे संभोग का चरम आनंद प्रदान कर सकता है बजाय किसी भी पुरुष के, क्योंकि वह कंपित होता ही जाता है—और सारी बात सिर्फ कंपन की ही तो है। आदमी के पास सीमित ऊर्जा है, लेकिन एक इलेक्ट्रानिक उपकरण के पास असीम ऊर्जा है। चालू कर दो और वह कंपित होता ही रहता है। वह किसी स्त्री को बहुत गहरे संभोग का आनंद दे सकता है। वह एक साथ बहुत—से संभोग के चरम आनंद प्रदान कर सकता है। और एक बार एक स्त्री को पता चल जाये कि एक बिजली से चलने वाला लिंग आनंद ऊंचाई इतनी ऊंचाई दे सकता है तो फिर उसके सामने सारे प्रेमी फीके पड़ जायेंगे। लेकिन यह खतरनाक है। यह एक बहुत ही खतरनाक क्षेत्र में उतरना है। एक बार रहस्य का पता चल गया तो सारा रोमांस ही चला जाएगा।
विज्ञान ने हर प्रकार से जीवन के रहस्यों को खोलने की कोशिश की है। मैं इस तथ्य पर इसलिए जोर दे रहा हूं क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि में तुम धर्म का अर्थ समझ सकते हो।
धर्म है जीवन को रहस्य से भरना, और विज्ञान है रहस्य को खोलना। धर्म कहता है कि रहस्य इतना आत्यंतिक है कि उसके बारे में कुछ भी नहीं जाना जा सकता है। और तुम जो भी जानते हो वह बस अस्थायी है। और जो भी तुम जानते हो वह सिर्फ समस्या को आगे सरकाना है। यह कभी हल होता नहीं। तुम सिर्फ एक कदम और पीछे सरका देते हो। कुछ हल तो होता नहीं। तुम्हारी सारी व्याख्याएं सिर्फ कृत्रिम हैं क्योंकि आत्यंतिक तो छिपा ही रहता है, और कोई भी व्याख्या उसे स्पष्ट नहीं कर पाती। क्यों का उत्तर नहीं दिया जा सकता, चाहे तुम कैसे का उत्तर दे भी दो।
उदाहरण के लिए, विज्ञान कह सकता है कि पानी में कोई भी रहस्य नहीं है। केवल हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के अणुओं को मिलाने से पानी बन जाता है—एच टू ओ—और सारा रहस्य हल हो गया। दो अणु हाइड्रोजन के और एक अणु ऑक्सीजन का और सारा रहस्य सामने आ जाता है। लेकिन धर्म कहता है कि यह तो केवल कैसे का उत्तर हुआ। क्यों का तो उत्तर नहीं आया। क्यों दो अणु हाइड्रोजन के और एक अणु ऑक्सीजन के मिलाने से पानी बन जाता है—क्यों? हम केवल कैसे को जानते हैं, कि यदि दो अणु हाइड्रोजन तथा एक अणु ऑक्सीजन को मिलाया जाये तो पानी निर्मित हो जाता है। हम केवल कैसे को जानते हैं, लेकिन क्यों का उत्तर तो नहीं आता—और यह क्यों ही ब्रह्म है।
क्यों ऐसा होता है कि दो अणु हाइड्रोजन तथा एक अणु ऑक्सीजन से पानी बनता है? क्यों हाइड्रोजन के तीन अणुओं से नहीं? क्यों नहीं हाइड्रोजन के चार अणु और आक्सीजन का एक अणु? विज्ञान कहता है, ''हमारा रस क्यों में नहीं है। हम केवल कैसे से ही मतलब रखते हैं। ''धर्म कहता है, ''कैसे तो बहुत ऊपरी पूछताछ की बात है, क्योंकि जब तक तुम क्यों का उत्तर नहीं देते, कैसे का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन रहस्य तो अपनी जगह पर मौजूद है, रहस्य मिटा नहीं। अस्तित्व का क्यों ही ब्रह्म है। ''
अत: विज्ञान अंततः टेकनालाजी में परिवर्तित हो जाता है, क्योंकि यह सिर्फ 'कैसे' है—जानकारी। इसलिए विज्ञान हमेशा ही टेक्नालाजी में परिवर्तित होता जाता है। तुम कैसे को जानते हो, फिर तुम्हें तकनीक का पता चल जाता है, तुम उसका उपयोग कर सकते हो, और इस तरह तकनीक पैदा हो जाती है। अत: विज्ञान टेक्नालाजी के आगे आगे दौड़ने वाला बन जाता है, बस टेक्नालाजी का एक मार्गदर्शक। धर्म रहस्य पर आधारित है। उसका विश्वास रहस्य में है और इस बात में है कि रहस्य आत्यंतिक है। तुम उसे नहीं मिटा सकते, तुम उसे परिभाषित नहीं कर सकते। और यही उसकी सुंदरता है क्योंकि एक बार तुम्हें अनुभव हो जाए कि यह जो रहस्य है, आत्यंतिक है और इसकी व्याख्या नहीं की जा सकती, तो तुम पुन: एक छोटे बच्चे की भांति हो जाते हो जो कि आश्चर्य से भरा है। और जब आश्चर्य तुम्हें पकड़ ले तभी तुम सर्वाधिक जीवंत हो। और जब कोई विस्मय का भाव नहीं है तो तुम न्यूनतम पर जी रहे हो।
तुम जीवन से बिना किसी विस्मय भरी आंखों के गुजर जाते हो, इसीलिए जीवन इतना ऊब से भरा प्रतीत होता है। जीवन ऊबपूर्ण नहीं है, ये सिर्फ तुम्हारी विस्मय से रहित आंखें हैं, वे ही ऊब पैदा करती हैं। यदि तुम अंतर्दृष्टि पुन: प्राप्त कर सको, यदि तुम एक विस्मय भरा चित्त फिर से प्राप्त कर सको जो अंत तक विस्मय से भरा रहे, जहां यह उस परम रहस्य से मिलता है, जहां तुम विस्मय करते ही चले जाते हो, करते ही चले जाते हो और तुम इसे कभी हल नहीं कर सकते हो...।
पहेली कोई रहस्य नहीं है क्योंकि तुम पहेली को हल कर सकते हो। लेकिन रहस्य एक ऐसी पहेली हे जिसको हल नहीं किया जा सकता है। विज्ञान का रस उन पहेलियों में है जिन्हें हल किया जा सकता है, जिनका उत्तर दिया जा सकता है। धर्म का रस तो सिर्फ रहस्य में है जिसका कोई समाधान नहीं है। और जितने गहरे तुम प्रवेश करते हो, उतना ही तुम जानते हो कि इसका समाधान करना असंभव है।
यूनानी दर्शन शास्त्री कहते हैं कि दर्शनशास्त्र का जन्म विस्मय में होता है। उपनिषद कहते हैं कि दर्शन का जन्म विस्मय में होता है, लेकिन धर्म का अंत भी विस्मय में ही होता है। क्योंकि दर्शनशास्त्र का जन्म विस्मय में होता है, लेकिन वह विस्मय के विरुद्ध है। वह पैदा तो विस्मय में ही होता है, लेकिन फिर वह उसको मिटाने की कोशिश में लग जाता है, उसके उत्तर पाने की कोशिश में लग जाता है, उत्तर और व्‍याख्याएं पाने की कोशिश करने लगता है। दर्शन का जन्म विस्मय में होता है, और उस विस्मय पर विजय पाना है, ग्रीक दर्शनशास्त्र के इस दृष्टिकोण के कारण ही पश्चिमी विज्ञान का जन्म हुआ। उसका स्रोत ग्रीक मन में ही रहा।
पश्चिमी विज्ञान सिर्फ ग्रीक—दर्शन की सफलता है। दर्शनशास्त्र का जन्म आश्चर्य में होता है, लेकिन उसका अंत व्याख्या में होता है, और तब वह विज्ञान हो जाता है। दर्शनशास्त्र शुरू तो विस्मय से होता है लेकिन समाप्त होता है व्याख्या में, प्रणाली में, विधान में; तब फिर वह विज्ञान हो जाता है। और फिर विज्ञान प्रयोग करता है, और 'कैसे' को जान लेता है तो वह टेक्नालाजी  बन जाता है।
उपनिषद कहते हैं कि धर्म का अंत भी विस्मय में ही होता है; ऐसा नहीं कि वह शुरू विस्मय में होता है। तुम चाहे कहीं भी प्रारंभ करो, धर्म का अंत भी विस्मय में ही होगा। रहस्य वहा ज्यों का त्यों बना रहता है, उसका कभी हल नहीं हो पाता। यही बुनियादी भेद है भारतीय चित्त और ग्रीक चित्त में। और ये ही दो आधारभूत चित्त हैं सारे जगत में। ग्रीक चित्त के कारण पश्चिमी विज्ञान का जन्म हुआ। और भारतीय चित्त के कारण किसी विज्ञान का जन्म नहीं हुआ; धर्म का जन्म हुआ।
सारे बड़े धर्म पूर्व में पैदा हुए। पश्चिम में कभी कोई धर्म पैदा नहीं हुआ। सारे बड़े धर्म पूर्व में ही पैदा हुए, और जो सबसे गहरे धर्म थे वे भारत में पैदा हुए। दूसरे धर्म जो कि भारत के आस—पास पैदा हुए लेकिन ठीक भारत में नहीं, वे सिर्फ भारतीय धर्म की प्रतिध्वनिया हैं। क्राइस्ट मूल रूप से हिंदू थे, इसीलिए यहूदी उन्हें नहीं समझ सके, उन्हें उनको मारना पडा। सारे गहनतम धर्म—हिंदू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म—भारत में ही पैदा हुए। और विज्ञान मौलिक रूप से एथेन्स में पैदा हुआ—यह ग्रीक है।
ग्रीक दृष्टिकोण यह है कि जब तुम जीवन के प्रति सजग होते हो तो तुम विस्मय से भर जाते हो। अब मनुष्य के मन का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह इस विस्मय को नष्ट कर दे, और व्याख्या खोजे। उपनिषद कहते हैं कि जहा भी तुम्हें कोई व्याख्या मिले, तुम उसमें गहरे जाओ—देर— अबेर तुम उस आधार पर पहुंच जाओगे जहां कि रहस्य है। व्याख्या केवल ऊपरी सतह है।
किसी बात की व्याख्या नहीं की जा सकती है : उपनिषदों का यह दृष्टिकोण है। प्रत्येक चीज अव्याख्य है और अव्याख्य ही रहेगी। यह सिर्फ मनुष्य का अहंकार ही है जो कि सोचता है कि व्याख्या मिल गई है। रहस्य पर इतना जोर क्यों है? क्योंकि यदि रहस्य हो केवल तभी तुम अज्ञानी बने रह सकते हो। इसे स्मरण रखो—यदि रहस्य है, अस्तित्व में परम रहस्य है, केवल तभी तुम अज्ञानी रह सकते हो। रहस्य के होते हुए ही तुम भीतर हृदय में अज्ञानी रह सकते हो। यदि सभी की व्याख्या की जा सके तो तुम जानी हो जाते हो। तब तुम ज्ञान से चिपक सकते हो। तब तुम ज्ञान से चिपक जाओगे और शान बहुत जयादा महत्वपूर्ण हो जायेगा।
पश्चिमी विश्वविद्यालयों में वे सदियों से शान पढ़ा रहे तैं। अभी पूर्व में भी विश्वविद्यालयों में शान की शिक्षा दी जा रही है, क्योंकि वे पश्चिम की नकलें ही हैं। प्रारंभ में बुनियादी रूप से पूर्वी विश्वविद्यालयों ने ज्ञान की शिक्षा कभी नहीं दी। नालंदा तथा तक्षशिला ने कभी ज्ञान की शिक्षा नहीं दी। मैं ध्यान सिखा रहे थे। वे एक गहरे अज्ञान की, और चारों ओर फैले एक रहस्य की शिक्षा दे रहे थे। अब कोई पूर्वी विश्वविद्यालय नहीं बचा है। सारे विश्वविद्यालय पश्चिमी हो गये हैं, चाहे वे कहीं भी हों, पूर्व में हों चाहे पश्चिम में। वे हमारे मस्तिष्कों को ज्ञान से भर रहे हैं।
अत: जब भी कोई विद्यार्थी विश्वविद्यालय से लौट कर आता है तो भरा हुआ होता है। उसके पास आत्मा नहीं होती, उसके पास सिर्फ ज्ञान होता है। और फिर वह समस्याएं खड़ी करता है। वह करेगा ही, क्योंकि विश्वविद्यालय ने सिर्फ उसे एक अहंकार ही दिया है। उसने मानवता अथवा विनम्रता का एक छोटा—सा टुकड़ा भी नहीं सीखा। उसने निरहंकारिता का तो एक बिंदु भी नहीं जाना। उसने कभी उस खिड़की से नहीं झांका जहां जीवन रहस्य है और उसे कुछ भी पता नहीं है—उसने उस झरोखे से कभी नहीं देखा। उसे तो बस ज्ञान से भर दिया गया है। शान उसे ऐसी अनुभूति देता है कि वह बहुत अर्थपूर्ण और बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह जानता है। उसका अहंकार मजबूत हो जाता है और फिर वह अहंकार सारी संभव समस्याएं पैदा करता है।
अहंकार ही राजनीति पैदा करता है, अहंकार ही महत्वाकांक्षा को जन्म देता है। अहंकार ही ईर्ष्या को जन्म देता है, अहंकार ही सतत संघर्ष, हिंसा पैदा करता है, क्योंकि अहंकार तब तक संतुष्ट नहीं हो सकता जब तक वह शिखर पर नहीं हो। और प्रत्येक आदमी शिखर पर पहुंचना चाहता है। एक गलाघोंट प्रतियोगिता जीवन के हर कार्यक्षेत्र में चलती रहती है—अर्थशास्त्र में, राजनीति में, शिक्षा में, सब कहीं एक गलाघोंट प्रतिस्पर्धा चल रही है। कोई भी स्वयं में रुचि नहीं ले रहा है। हर आदमी शिखर पर पहुंचने की महत्वाकांक्षा में रस ले रहा है। और कोई भी नहीं सोचता कि वह जा कहां रहा है, वह कब शिखर पर पहुंचेगा। तुम्हें मिलेगा क्या शिखर पर पहुंच कर? कुछ भी तो नहीं मिलने का। तुम सिर्फ अपना जीवन बरबाद कर लोगे।
पूर्वी विश्वविद्यालय एक गहरा अज्ञान सिखा रहे थे—वह जो आधारभूत अज्ञान है कि मनुष्य रहस्य में प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि रहस्य आखिरी है, परम है। वह प्रकृति का आधार है, और मनुष्य उसी रहस्य का हिस्सा है। जब ये दो रहस्य मिलते हैं—मनुष्य के भीतर का रहस्य तथा अस्तित्व के भीतर का रहस्य—जब ये दो रहस्य मिलते हैं तो आनंद होता है। जीवन सौंदर्य से भर जाता है, वह एक शाश्वत संगीत हो जाता है, वह एक नृत्य हो जाता है। तुम तभी नृत्य कर सकते हो जब कि कोई रहस्य हो। एक नर्तक परमात्मा की जरूरत है—एक ऐसा परमात्मा जो कि नृत्य कर सकता हो। और अस्तित्व चारों ओर नृत्य कर रहा है। देखो! यह कोई सिद्धात की बात नहीं है। देखो अस्तित्व को! वह चारों ओर नृत्य कर रहा है। प्रत्येक कण नाच रहा है। केवल तुम ही जमीन में गड़ कर बैठ गये हो। तुम हिल भी नहीं सकते, तुम नृत्य नहीं कर सकते, क्योंकि तुम जानते हो—तुम्हारा ज्ञान ही विष बन गया है।
अब हम सूत्र में प्रवेश करें

यदि तुम सोचते हो कि तुम ब्रह्म को भलीभांति जानते हो तो तुम वास्तव में बहुत कम जानते हो.......

वस्तुत:, तुम कुछ भी नहीं जानते—जरा सा भी नहीं, क्योंकि तुम अभी भी मौजूद हो दावा करने के लिये। अहंकार अभी भी बना हुआ है। अहंकार अभी भी केंद्र बना हुआ है। अहंकार अभी भी दावा कर रहा है, कह रहा है, ''मैं जानता हूं। ''
यदि तुम सोचते हो कि तुम ब्रह्म को भलीभांति जानते हो तो तुम वास्तव में बहुत कम जानते हो...
और यदि तुम ऐसा कहते हो तो यह केवल सोचना मात्र है—कोई अनुभव नहीं। तुम सोच सकते हो कि तुम जानते हो, लेकिन यह कोई अनुभव नहीं है। यदि तुम अनुभव कर लो तब तुम यह कहने में समर्थ नहीं होगे कि ''मैं जानता हूं।''
वह इतना विराट है कि तुम उसको जानोगे कैसे? वह इतना अंतहीन, आदिहीन है कि कैसे जान पाओगे तुम उसे? यह दावा मूढ़तापूर्ण, अश्लील प्रतीत होता है। ब्रह्म को जानने की बात केवल एक मूढ़तापूर्ण दावा प्रतीत होती है। केवल मूढ़ ही ऐसा दावा कर सकते हैं। ऐसा दावा सिर्फ अज्ञान से ही आ सकता है। क्योंकि वस्तुत: तुम अभी कुछ भी नहीं जानते, तुम दावा कर सकते हो।
यदि तुम सोचते हो कि तुम ब्रह्म को भलीभांति जानते हो तो तुम वास्तव में बहुत कम जानते हो क्योंकि ब्रह्म का जो रूप तुम जीवित प्राणियों में तथा देवताओं में समाया हुआ देखते हो वह एक मामूली बात है।
यदि तुमने ब्रह्म की अनुभूति प्रगट जगत में कर भी ली हों—वृक्षों में, पहाड़ों में, व्यक्तियों में, पशुओं में, पक्षियों में—यदि तुमने इस जीवन को भी ब्रह्म की तरह अनुभव कर लिया हो तो भी यह एक मामूली बात है। यह सिर्फ अप्रगट का एक बिलकुल छोटा—सा हिस्सा है।
उपनिषद कहते हैं कि ब्रह्म के दो रूप हैं—प्रगट तथा अप्रगट। प्रगट रूप संसार बन गया है, और अप्रगट अज्ञात ही रहता है। उसमें से बहुत—से संसार निकलते जाते हैं, बहुत—से उसमें वापस खो भी जाते हैं। यह कोई पहला संसार नहीं है, याद रखो।
ईसाइयत अभी दो सदी पहले तक कहा करती थी कि जगत सिर्फ जीसस से चार हजार चार वर्ष पूर्व ही बना है। फिर इस दावे में तथा वैज्ञानिक अन्वेषणों में भारी द्वंद्व उठ खड़ा हुआ, क्योंकि विज्ञान के हिसाब से यह पृथ्वी लाखों—करोड़ों वर्षों से अस्तित्व में है। उनमें विरोध था। अब, वैज्ञानिकों का ज्ञान जितना अधिक बढ़ता जाता है, प्रारंभ उतना ही पीछे सरकता जाता है। लेकिन उपनिषद कहते हैं कि यह तो बहुतों में से सिर्फ एक जगत है; इसके पहले भी कितने ही जगत बने और विलीन हो गये।
अस्तित्व एक अनंत प्रक्रिया है। इसलिए वस्तुत: उसका कोई प्रारंभ नहीं है और न ही कोई अंत हो सकता है। कोई प्रारंभ हो भी कैसे सकता है? प्रारंभ का तो अर्थ होता है कि उसके पहले कुछ भी नहीं था। तो फिर कुछ नहीं में से यह संसार कैसे निकला? कुछ भी होने के लिए कुछ तो होना ही चाहिए। 'कुछ' कुछ नहीं में से नहीं निकल सकता। वह व्यर्थ की बात है। कैसे 'कुछ नहीं' में से कुछ निकल सकता है? और यदि कुछ भी निकलता है तो इसके पहले कुछ न कुछ होना ही चाहिए।
उपनिषद कहते हैं कि यह पहली सृष्टि नहीं है, यह पहला सृजन नहीं है। यह आदिहीन, अंतहीन अस्तित्व की लंबी शृंखला की एक कड़ी है। सृष्टियां होती रही हैं, और मिटती रही हैं। जैसे कि एक बच्चा पैदा होता है, फिर वह जवान होता है और फिर मर जाता है। लेकिन बच्चा माता—पिता से पैदा होता है, और वे माता—पिता भी दूसरे माता—पिता से पैदा होते हैं। और ऐसा चलता चला जाता है, और तुम्हें कहीं भी इसका प्रारंभ नहीं मिलने वाला है।
उपनिषद के पास अदम और ईव की कोई धारणा नहीं है, जो कि पहले स्त्री—पुरुष थे। वे कहते हैं कि पहला पुरुष, पहली स्त्री संसार में कभी नहीं हुए। पहले की बात ही व्यर्थ है। हम सदा मध्य में हैं। प्रारंभ कभी नहीं था, इसलिए कभी अंत भी नहीं होने वाला है।
बच्चे की भांति पृथ्वी भी माता—पिता से उत्पन्न होती है। यह दो बड़े तारों के बीच में टकराव हो सकता है। जब दो माता—पिता टकराये तो पृथ्वी का जन्म हुआ। अब वैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसी ही कोई घटना घटी होगी कि दो तारे टकराये होंगे। कौन जानता है? हो सकता है कि उपनिषद सच हों? जब दो तारे, एक पुल्लिंग व एक स्त्रीलिंग टकराये तो पृथ्वी पैदा हुई। पृथ्वी जीवंत है—वह मृत नहीं है। मृत पृथ्वियां भी हैं। अभी वैज्ञानिकों को शक होने लगा है कि कहीं चांद मृत पृथ्वी न हो। हो सकता है कि कुछ समय पहले वह जीवंत रहा हो।
यह पृथ्वी जीवंत है। यह जो वृक्षों का हरापन है यह उसके जीवन का हिस्सा है। तुम्हारी चेतना उसके विकास का एक हिस्सा है। यह विकसित हो रही है। यह जवान है, यह की होगी, और यह मरेगी भी, लेकिन जीवन तब कहीं और प्रस्फुटित हो जायेगा। अब वैज्ञानिक कहते हैं कि गणित के हिसाब से पचास हजार पृथ्वियों की सारे अस्तित्व में जीवित होने की संभावना है—पचास हजार जीवित ग्रह! मात्र एक गणितीय संभावना। हमारा दूसरी जीवित पृथ्वियों से कोई संपर्क नहीं है। लेकिन जब एक पृथ्वी मर जाती है तो दूसरी पैदा होती है। कहीं जन्म घटित होता है तो कहीं पर मृत्यु; कहीं मृत्यु घटित होती है तो कहीं पर जन्म। जीवन सतत चलता रहता है। यह एक सातत्य है—एक सनातन सातत्य।
जो भी हम जानते हैं वह एक बहुत छोटा—सा, आणविक हिस्सा है। पीछे की तरफ वह एक अनादि आदि की भांति फैला है; आगे की तरफ वह एक अंतहीन अंत की भांति फैला है। हम सदा मध्य में हैं। केवल अस्तित्व का एक कण ही जाना गया है। और यह सारा अस्तित्व जो कि इतना विराट है, वह भी एक हिस्सा ही है। सर्व भी एक हिस्सा ही है क्योंकि यह प्रगट है।
मेरी ओर देखो. मैं तुम्हें कुछ संप्रेषित कर रहा हूं। जो कुछ भी मैं तुम्हें संप्रेषित कर रहा हूं वह एक प्रगट हिस्सा है। मेरे हृदय में बहुत—सा भाग बचा रहता है जो कि असंप्रेषित है, वह अप्रगट हिस्सा है। मेरा मौन एक अप्रगट भाग है। मेरे शब्द प्रगट भाग हैं। मेरे शब्दों में मेरे मौन का कुछ अंश भी संप्रेषित हो जाता है, लेकिन मेरे शब्द मेरा पूरा अस्तित्व नहीं हैं। मेरे शब्द सिर्फ एक हिस्सा हैं, और इस हिस्से के पीछे एक गहरा मौन छिपा हुआ है।
एक कवि एक गीत गा रहा है—रवीन्द्रनाथ अथवा शैली अथवा यीट्स एक गीत गा रहा है—वह गीत कवि के अस्तित्व का बस एक प्रगट हिस्सा है। लेकिन उस अस्तित्व से हजारों—लाखों गीत प्रगट हो सकते हैं।
उपनिषद कहते हैं कि यह सारा जगत—यह सारा संसार, यह ब्रह्मांड—सिर्फ एक गीत है जो कि प्रगट हो गया है। भगवत्ता के हृदय में अनंत गीत प्रतीक्षा कर रहे हैं प्रगट होने के लिए। उसने बहुत—से गीत गाये हैं जो कि विलीन हो गये हैं। वह अभी इस गीत को गा रहा है; वह बहुत—से गीत गायेगा। हम सिर्फ एक ही गीत से परिचित हो सकते हैं, एक गीत से भी पूर्णत: परिचित होना मुश्किल है—सिर्फ उसकी धुन के एक हिस्से से, एक टुकड़े से, एक शब्द से, एक भाव से परिचित हो सकते हैं। अनंत है इसके चारों ओर जो कि अनजाना ही छूट जाता है।
यह सूत्र कहता है :

.. ब्रह्म का जो रूप तुम जीवित प्राणियों तथा देवताओं में समाया हुआ देखते हो वह एक मामूली बात है इसलिए तुम्हें ब्रह्म के बारे में और आगे खोजबीन करनी चाहिए।
सचमुच इस खोज का कहीं अंत नहीं आता। यह चलती ही रहती है। और जितना अधिक तुम जानते हो उतनी ही गहराइया और और खुलती चली जाती हैं। जितना अधिक तुम खोजबीन करते हो उतने ही बड़े द्वार खुलते चले जाते हैं। रहस्य कभी भी खुल नहीं पाता, वह और अधिक गहरा होता जाता है। जितना अधिक तुम जानते हो, उतना ही तुम्हारे आगे जानने को शेष रह जाता है। जितना विशाल तुम्हारा दृष्टि—क्षेत्र होता है, जितनी विशाल तुम्हारी चेतना होती है, उतनी ही विशाल संभावनाएं तुम्हारे आगे जानने के लिए प्रगट होती हैं। और ऐसा चलता जाता है, और आगे और आगे। यह खेल अंतहीन है।
इसलिए जब भी तुम्हें लगे कि रुकना है, तो सजग हो जाना। ऐसा कोई बिंदु नहीं है जहा कि रुका जा सके। जहां भी तुम्हें महसूस हो, '' अब मैंने पा लिया, ''तो सजग हो जाना! तुम पुन: अहंकार के ही शिकार हो रहे हो। ऐसा कोई भी बिंदु नहीं है जहां कोई कह सके, ''मैंने पा लिया। '' हमेशा ऐसा है कि अब पहुंचे कि तब पहुंचे, पर पहुंचते कभी भी नहीं हैं।
यही अर्थ है ब्रह्म की असीमता का। तुम कभी ऐसी जगह पर नहीं पहुंचते जहा तुम कह सको, ''अब यात्रा समाप्त हुई। ''यात्रा चलती ही चली जाती है। और यह यात्रा अनंत जीवन की है। तुम कहीं पर मिट जाते हो परंतु यात्रा कभी समाप्त नहीं होती। तुम्हारा अहंकार एक बिंदु पर नहीं रहता। और उस क्षण ही वास्तविक यात्रा का प्रारंभ होता है—लेकिन तब वह अनंत तक चलती चली जाती है। उसका कभी अंत ही नहीं आता, उसका कोई अंत आ भी नहीं सकता। तुम कहीं खो जाते हो। जब तुम्हें महसूस होता है कि तुम स्वयं के लिए एक बोझ हो तो तुम स्वयं को गिरा देते हो और आगे चले जाते हो। यह चलना शाश्वत है।
मैं नहीं सोचता कि मैं उसे भलीभांति जानता हूं...
गुरु कहता है :
मैं नहीं सोचता कि मैं उसे भलीभांति जानता हूं न ही मैं ऐसा सोचता हूं कि मैं उसे नहीं जानता...
यही है रहस्य। मैं नहीं कह सकता कि मैं उसे भलीभांति जानता हूं क्योंकि जानने को बहुत शेष बचा है, और हमेशा और बहुत जानने को शेष बचा ही रहेगा। यह ब्रह्म को जानना, इसकी हमेशा सिर्फ शुरुआत होती है, लेकिन कोई अंत कभी नहीं आता। तुम एक बार प्रारंभ कर दो बस, फिर यह चलता चला जाता है।
इसलिए मैं नहीं कह सकता कि मैं उसे भलीभांति जानता हूं... यह दावा गलत ही होगा... न ही मै ऐसा सोचता हूं कि मैं उसे नहीं जानता.. यह विपरीत बात भी सच नहीं है। मैं यह भी नहीं कह सकता कि मैं उसे नहीं जानता— मैं उसे जानता भी हूं।
यही अंतर है ग्रीक तथा भारतीय चित्त में। ग्रीक चित्त इस वाक्य को कभी नहीं समझ सकता है। अरस्तु के लिए यह वाक्य सोच पाना असंभव है। अरस्तु कहेगा, ''यह तर्क का बुनियादी सिद्धात है कि यदि तुम जानते हो तो तुम जानते हो; और यदि तुम नहीं जानते हो तो नहीं जानते हो, इसके बीच में कुछ भी नहीं हो सकता है। '' यदि तुम जिंदा हो तो जिंदा हो, यदि तुम मृत हो तो तुम मृत हो। इन दोनों के बीच में कुछ भी नहीं हो सकता है। या कि हो सकता है? क्या तुम कह सकते हो, ''मैं नहीं कह सकता कि मैं जीवित हूं और मैं यह भी नहीं कह सकता कि मैं मर गया हूं '? तब अरस्तू कहेगा, ''तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। दोनों में से एक ही बात सही है—दोनों बातें सही नहीं हो सकतीं। ''अरस्तु कहता है, ''दोनों बातें सही नहीं हो सकतीं, दो विपरीत बातें सत्य नहीं हो सकतीं। केवल एक ही सत्य होगी।''
उपनिषद का यह ऋषि कहता है, ''मैं नहीं कह सकता कि मैं जानता हूं। ''
तो फिर अरस्तू कहेगा, ''रुको, बात खतम हुई। यदि तुम नहीं कह सकते कि जानते हो, तो खतम करो बात को।''
लेकिन ऋषि फिर आगे यह भी कहता है, ''मैं यह भी नहीं कह सकता कि मैं नहीं जानता हूं। ''इस बात को अरस्तू स्वीकृति नहीं दे सकता। पश्चिमी तर्क का जनक, उसको संस्थापित करने वाला अरस्तु ऐसी बात के लिए स्वीकृति नहीं दे सकता। वह कहेगा, ''अब तुम्हारा दिमाग खराब हुआ जा रहा है। ''क्या तुम कह सकते हो कि तुम कमरे के भीतर हो? तुम नहीं कह सकते हो। और तुम यह भी नहीं कह सकते हो कि तुम कमरे के बाहर हो। या तो तुम कमरे के भीतर हो या तुम कमरे के बाहर हो—दोनों सत्य नहीं हो सकते हैं।
क्या तुम कह सकते हो, ''मैं नहीं कह सकता हूं कि मैं कमरे के भीतर हूं और मैं यह भी नहीं कह सकता हूं कि मैं कमरे के बाहर हूं ''? हमें भी यही सही दिखता है। अरस्तू सही दिखता है। सामान्य मन के लिए, साधारण तर्क के लिए वह बिलकुल ठीक है; तर्कसंगत है।
इन अर्थों में भारतीय ऋषि अतर्कसंगत हैं। वे विरोधी बातें एक साथ कहे चले जाते हैं, लेकिन इसके माध्यम से उन्हें कुछ संप्रेषित करना है। वस्तुत: वे गलत नहीं हैं। उनके पास कहने को कुछ है और वह 'कुछ' इतना रहस्यपूर्ण. है कि उसे केवल तभी कहा जा सकता है जब विरोधी बातें एक साथ कही जाएं। रहस्य केवल विरोधों के माध्यम से, असंगतियों के माध्यम से ही कहा जा सकता है।
मैं नहीं सोचता कि मैं उसे भलीभांति जानता हूं न ही मैं ऐसा सोचता हूं कि— मैं उसे नहीं जानता; फिर भी मैं जानता भी हूं।
''एक अर्थ में मैं उसे जानता हूं और एक अर्थ में मैं उसे नहीं जानता। मैं जानता हूं क्योंकि मैं उसका ही एक हिस्सा हूं। यह असंभव है कि मैं उसे नहीं जानूं। और मैं उसे नहीं जानता क्योंकि अंश समग्र को कैसे जान सकता है? यह बात असंभव है एक अंश के लिए कि वह समग्र को जान सके।''

दोनों ही बातें सही हैं। और यदि तुम्हें दोनों बातें ठीक प्रतीत होती हों तो इन दो विरोधी बातों के बीच एक नया ही अर्थ निकलता मालूम पड़ेगा। तुम्हें प्रतीति होगी कि ऋषि आखिर क्या कहना चाहता है। और तुम्हें यह भी महसूस होगा कि उसे अभिव्यक्त करना कितना कठिन है। बहुत कुछ प्रतीति हो रही है और शब्द उतना अधिक नहीं ले जा सकते, इसलिए दोनों विरोधों की जरूरत है कि उस बात को कह सकें।
उदाहरण के लिए, उपनिषद कहते हैं, ''परमात्मा बहुत दूर है। '' और फिर तुरंत वै यह भी कहते हैं, ''वह बहुत निकट है। '' यदि वह दूर है तो निकट कैसे हो सकता है? अथवा यदि वह निकट ही है तो दूर कैसे हो सकता है? लेकिन उनके पास कुछ कहने के लिए है, और वह बहुत महत्वपूर्ण बात है। इस बेतुकी बात से वे उसको संप्रेषित करने की कोशिश कर रहे हैं जिसे कि संप्रेषित —करना आसान नहीं है, जिसे कि संप्रेषित किया ही नहीं जा सकता। वह बहुत दूर है क्योंकि तुम उसे भूल चुके हो। वह विस्मृति ही दूरी निर्मित करती है। और वह बहुत निकट है, क्योंकि जो कुछ भी तुम करते हो चाहे तुम उसे भूलो, चाहे स्मरण करो, तुम उसके बिना जीवित नहीं रह सकते। वही तुम्हारे हृदय कोई धड़कन है। वही भीतर और बाहर सांस ले रहा है; वही तुम हो। तुम उसे भूल सकते हो, लेकिन फिर भी तुम वही रहते हो। इसीलिए यह विरोधाभासी कहने का ढंग चुना गया है : ''वह दूर भी है, और निकट भी, ''और, ''मैं उसे जानता हूं और मैं उसे नहीं जानता।''
उपनिषद सुकरात से सहमत न?हीं होंगे ' मैंने तुमसे कहा कि सुकरात ने कहा था, ''कभी पहले मैं जानता था; अब मैं कहता हूं कि —मैं नहीं जानता। '' वह पुन: यूनानी ढंग ही अपना रहा है। वह बहुत संगत है। वह कहता है, ''एक बार मुझे महसूस हुआ था कि मैं जानता हूं। लेकिन अब मुझे प्रतीत हो रहा है वह बात गलत थी—अब मैं नहीं जानता हूं। ''उपनिषद कहेंगे कि दोनों ही बातें गलत हैं। एक तीसरी संभावना भी है जबकि तुम कहो, ''एक तरह से मैं जानता हूं एक तरह से मैं नहीं जानता हूं। '' पहले सुकरात परम ज्ञान का दावा कर रहा था, अब वह परम अज्ञान का दावा कर रहा है। लेकिन दोनों ही हालत में वह परम का दावा करता है। वह परम को पकड़े हुए है; वह विरोधाभासी नहीं है। एक बार उसने कहा, ''मैं जानता हूं ''अब वह कहता है, ''मैं नहीं जानता। ''उपनिषद के ऋषि दोनों बातें युगपत कहते हैं : ''मैं जानता हूं और मैं नहीं जानता हूं। '' दोनों के बीच की बात को महसूस करने का प्रयत्न करो, दो पंक्तियों के बीच... ठीक अंतराल में।
हममें से वही उसे जानता है जो जानता है कि वह अज्ञात और ज्ञात दोनों से भित्र है।
जो शात है वह तुम्हारा ज्ञान है, जो अज्ञात है वह तुम्हारा अज्ञान है। यदि तुम कहते हो, ''मैं जानता हूं '' तुमने उसे ज्ञात बना दिया। यदि तुम यह कहते हो, ''मैं नहीं जानता, '' तुमने उसे अज्ञात बना दिया। और तुममें से वास्तविक ज्ञानी केवल वही है, जो कि जानता है कि न तो वह ज्ञात है और न अज्ञात है, बल्कि अज्ञेय है। वह रहस्य है।
केवल वही जो कि उसे एक रहस्य की भांति जानता है, एक परम रहस्य की भांति, एक आत्यंतिक रहस्य की भांति जो कि कभी खोला नहीं जा सकता, केवल वही उसे जानता है।

दिनांक 12 जुलाई 1973, प्रात:,
माउंट आबू राजस्थान।