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मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-09)

नौवां—प्रवचन 

साधक के लिए शून्‍यता, सत्‍य योग, अजपा गायत्री और विकारमुक्‍ति का महत्‍व

शून्यं न संकेत:।
परमेश्वर सत्
सत्यसिद्धयोगो मठ:।
अमरपदं न तत् स्वरूपम्।
आदिब्रह्म स्व—संवित्।
अजपागायत्री विकारदंडो ध्येय:।
मनोनिरोधिनी कन्‍था।
                        शून्य संकेत नहीं है।
                        परमेश्वर की सत्ता है।
            सच्चा और सिद्ध हुआ योग (संन्यासी का ) मठ है।
               उस आत्मस्वरूप के बिना अमरपद नहीं है।
                        आदि ब्रह्म स्व—चेतन है।
                  अजपा गायत्री है। विकार—मुक्ति ध्येय है।
                    मन का निरोध ही उनकी कन्था है।

साधक के लिए शून्यतासत्य योग, अजपा गायत्री और विकार—मुक्ति का महत्‍व:

 शून्य संकेत नहीं परमेश्वर की सत्ता ही है।
जिन्होंने भी जाना हैउन्होंने परमेश्वर को या तो पूर्ण कहा हैया शून्य कहा है। ये दो ही उपाय हैं। परमात्मा के संबंध में कोई संकेत करने के ये दो ही उपाय हैं। या तो हम कहें वह पूर्ण हैया हम कहें वह शून्य है।
उलटे मालूम पड़ते हैं। पूर्ण और शून्य से ज्यादा विरोधी और क्या होगाइसलिए जो जानते नहींवे अगर पूर्ण को मानते हैंतो शून्य का विरोध करते हैं। न जानने वाले यदि शून्य को मान लेते हैं परमात्मा का स्वरूपतो पूर्ण का विरोध करते हैं।

लेकिन शून्य या पूर्ण दो उपाय हैं उसके संबंध में कुछ कहने के। या तो कह दो कि वह सभी कुछ हैया कह दो कि वह कुछ भी नहीं हैसभी से खाली है। या तो इनकार कर दो उस सब काजो हमें शात है और कह दोयह भी वह नहींयह भी वह नहींयह भी वह नहीं। इस सबके बाद जो बच रहता हैवही है। यह शून्य का मार्ग है। या कहोयह भी वही हैवह भी वही हैसब कुछ वही है। यह पूर्ण का मार्ग है।
यह व्यक्ति पर निर्भर है कि वह किस मार्ग को प्रीतिकर समझेगा। गिलास आधा भरा होतो कोई कह सकता हैआधा भराकोई कह सकता हैआधा खाली। विपरीत वक्तव्य हैं दोनों। और जिन्होंने न देखा हो गिलासवे इस पर विवाद भी कर सकते हैं कि हम आपस में विरोधी हैं। तुम कहते होआधा खालीहम कहते हैंआधा भरा। अब निश्चित ही भरा और खाली विपरीत सत्य हैं। लेकिन जिन्होंने देखा हैवे कहेंगेये आधे भरे गिलास को कहने के दो ढंग हैं।
और जब हम परम सत्ता के संबंध में कुछ कहने चलते हैंतो अति में ही बात करनी पड़ेगीएक्सट्रीम पर ही बात करनी पड़ेगीसीमांत पर बात करनी पड़ेगी। या तो इनकार कर देना पड़ेगा उस सब काजिसे हम जानते हैंजो संसार हैस्वप्‍नवत। कह देना पड़ेगा कि यह वहां कुछ भी नहीं है।     बुद्ध से कोई पूछता थाकैसा है सत्यतो बुद्ध कहते थेजो भी तुम जानते होवैसा जरा भी नहीं है। जो भी तुम पहचानते होवह काम नहीं पड़ेगा। जो भी तुमने सुना हैसमझा हैअनुभव किया हैवह वहां काम नहीं आएगा। और जैसा सत्य हैउसको कहने का कोई उपाय नहीं हैक्योंकि जिस तरह भी हम उसे कहेंगेउसमें तुम्हारे सुने हुएसमझे हुए शब्दों का ही उपयोग करना पड़ेगा। इसलिए बुद्ध कहते थेमुझे चुप रहने दोमुझे मजबूर मत करो उसके संबंध में कुछ कहने को। और अगर कोई बहुत मजबूर ही करतातो वे कहतेशून्य है। पहले तो वे इनकार करते वक्तव्य देने से कि मैं कुछ न कहूंगामुझे चुप रह जाने की आशा दो। अगर कोई नहीं ही मानता और जिद किए चला जातातो बुद्ध कहतेवह शून्य है।
लेकिन जब हम सुनते हैंकोई कहे परमात्मा शून्य हैतो लगता है शायद वह कह रहा हैपरमात्मा नहीं है। लेकिन अगर 'नहीं हैकहना थातो शून्य के प्रयोग करने की कोई जरूरत ही न थी। सीधा ही कहा जा सकता थानहीं है। जो नहीं हैउसे नहीं है कहने में कौन सी बाधा थीजो हैउसे चाहे प्रकट न भी किया जा सकेलेकिन जो नहीं हैउसके संबंध में तो वक्तव्य दिया ही जा सकता है।
लेकिन बुद्ध कहते हैंवह शून्य है। 'हैसे इनकार नहीं करते। है निश्चित हीलेकिन शून्य है। और शून्य कहने का कारण यह हैताकि हम अपने मन की कोई भी धारणाएंवे जो हमारी कैटेगरीज आफ इन्टेलेक्ट हैंहमारी बुद्धि की जो धारणाएं हैंउन सबको छोड्कर उसकी तरफ चलना। अपने को छोड्कर चलें उसकी तरफ।
परमात्मा को शून्य कहने का अर्थ है कि केवल वे ही उसे जान पाएंगे जो शून्य होने की तत्परता दिखाएंगे। जब वे बिलकुल शून्य हो जाएंगेतो जान पाएंगे उसे। क्योंकि तब उन दोनों का एक सा स्वभाव मिल जाएगा। एक हारमनीएक एफीनिटीदोनों के बीच एक संवाद शुरू हो जाएगा। शून्य हैयह कहने का यह अर्थ है कि वहा कोई शब्द नहींकोई ध्वनि नहींवहा कोई रस नहीं। इंद्रियां जो भी जानती और पहचानती हैंउनमें से वहां कुछ भी नहीं। फिर भी वह है।
शून्य कहने का एक कारण और है। यह बहुत गहन है। पर खयाल में ले लेना जरूरी हैक्योंकि हम गहन यात्रा पर ही निकले हैं। अगर कोई परमात्मा को पूर्ण कहेतो यह भी सोचा जा सकता है कि और भी पूर्णतर हो सकता है। कितना ही पूर्ण होथोड़ा और पूर्ण होने में कौन सी असुविधा हैपूर्णतर हो सकता है। पूर्ण में और भी कुछ होने का उपाय बना रहता है। लेकिन और शून्य नहीं हो सकता। जब कोई कहता हैपरमात्मा शून्य हैतो आखिरी बात आ गई। दो शून्य छोटे और बड़े नहीं हो सकते। शून्य यानी शून्य। वहां कोई है ही नहीं।
अगर मैं कमरे में मौजूद हूं तो भिन्न भी हो सकता हूं। मेरी मौजूदगी भिन्न भी हो सकती है। जैसा अभी हूं कल उससे अन्यथा भी हो सकता हूं। लेकिन कमरे में मेरी गैर —मौजूदगी हैऐब्सेंस हैवह भिन्न नहीं हो सकती कभी भी। इट विल रिमेन द सेम। ऐब्सेंस में कैसे फर्क पड़ेगाशून्य सदा थिर होगा। होगा तो पूर्ण भी सदा थिरलेकिन शून्य ज्यादा तर्कयुक्त है। पूर्ण के साथ हम सोच सकते हैं और भी पूर्णताएं हैंलेकिन शून्य के साथ और भीशन्यताएं नहीं सोची जा सकतीं। शून्य का अर्थ ही है कि जो बिलकुल खाली है। अब और खाली कैसे होगा! तो बुद्ध ने शून्य का प्रयोग किया है।
यह उपनिषद का ऋषि भी कहता हैशून्य न संकेत:।
यह कहता है कि जब हम कहते हैंपरमात्मा शून्य हैतो तुम ऐसा मत सोचना कि हम केवल संकेत करते हैं। यह बड़ी हिम्मत का वक्तव्य है। ऋषि कहता हैयह मत सोचना कि हम सिर्फ संकेत करते हैं शून्य सेऔर परमात्मा शून्य नहीं है। नहींहम कहते हैंपरमेश्वर सत्ता। शून्य ही परमेश्वर की सत्ता है। सत्ताएं दो तरह की हो सकती हैं—पॉजिटिवविधायकनिगेटिवनकारात्मक। लेकिन जहां—जहां नकार होता हैवहां—वहां विधेय होता है। जैसे बिजली जल रही हैतो उसमें एक निगेटिव पोलेरिटी हैएक पॉजिटिव पोलेरिटी है। उसमें ऋण विद्युत भी हैधन विद्युत भी है। अगर दो में से एक हट जाए तो बिजली बुझ जाए। दोनों का सर्किटदोनों का वर्तुल चाहिए तो बिजली जलती है। स्त्री हैपुरुष है। एक नकारात्मक हैएक विधायक है। दो में से एक हट जाएतो जीवन की यात्रा बंद हो जाती है।
जगत में जिस चीज का भी अस्तित्व हैउसमें एक विधायक और एक नकारात्मक हिस्सा संयुक्त रूप सेजैसे बैलगाड़ी के दो चाक या आदमी के दो पैरऐसे जिस चीज की भी सत्ता हैउसके दो पैर हैंएक नकार हैएक विधेय है।
लेकिन परमात्मा अगर नकार हैतो विधेय कौन होगा फिरफिर तो हमें एक परमात्मा और सोचना पड़े। और इसीलिए कुछ धर्मों ने परमात्मा के साथ शैतान को भी सोचा हुआ है। वह नंबर दो का परमात्मा हैबुरा परमात्मा। लेकिन है वहऔर मिट नहीं सकता। क्योंकि उनको खयाल में आया है कि सत्ता तो विभाजित है। अगर परमात्मा शुभ हैतो उसके विपरीत अशुभ की भी सत्ता होनी चाहिएइसलिए शैतान को बना ही लेना पड़ा।
सिर्फ भारत एक देश हैजहां हमने परमात्मा के विपरीत किसी सत्ता को निर्मित नहीं किया। ईसाइयत भी शैतान के बाबत सोचती हैइस्लाम भी शैतान के बाबत सोचता हैयहूदी भी शैतान के बाबत सोचते हैंपारसी भी शैतान के बाबत सोचते हैं। सिर्फ इस देश में कुछ लोगों ने बिना शैतान के और परमात्मा के होने की संभावना को स्वीकार किया है। फिर अगर परमात्मा को स्वीकार करना है बिना शैतान के. और शैतान के साथ स्वीकार करना कोई स्वीकार करना नहीं हैक्योंकि फिर एक कास्टैंट काफ्लिक्ट हैजिसका कोई अंत नहीं होगा। शैतान और परमात्मा का कभी अंत नहीं हो सकता। वह विरोध चलता ही रहेगा।
सुना है मैंने कि मुल्ला नसरुद्दीन जिस दिन मरामौलवी उसे पश्चात्ताप करवाने आया है। और मुल्ला से कहता हैपश्चात्ताप करोपरमात्मा से क्षमा मांगो और मरते वक्त शैतान को इनकार करो। मुल्ला बिलकुल चुप रहा। आंख खोलकर उसने देखा जरूरफिर आंख बंद कर लीं। मौलवी ने कहातुमने सुना नहींज्यादा देर नहीं हैआखिरी घड़ी है। क्षण दो क्षण की श्वास है। परमात्मा को स्वीकार करो और शैतान को इनकार करो। मुल्ला ने कहा कि आखिरी वक्त में मैं किसी को भी नाराज नहीं करना चाहता। क्योंकि पता नहींआगे की यात्रा किस तरफ हो! मैं चुप ही रहूंगा। जिस तरफ चला जाऊंगाउसी की प्रशंसा कर दूंगा। मगर अभी तो कुछ पक्का नहीं है। तो ऐसे डेलिकेट मोमेंट मेंमुल्ला ने कहाऐसे नाजुक क्षण में जिद मत करो। अभी कुछ पक्का नहीं हैशैतान की तरफ जाऊं कि परमात्मा की तरफ जाऊं। और किसी को नाराज करना ठीक भी नहीं। जिंदगी की बात और थीअब तो यह आखिरी क्षण हैतो चुप ही मुझे मर जाने दो।
अगर शैतान और परमात्मा का अस्तित्व है साथ—साथतो यह अस्तित्व सदा ही द्वंद्व होगाऔर द्वंद्वातीत होना असंभव है। इसलिए ऋषि नहीं कहते कि अस्तित्व द्वंद्व है। ऋषि कहते हैंजगत द्वंद्व है—जगतजो हमें दिखाई पड़ता है वह। लेकिन जो हैवह निर्द्वंद्व है।
उस निर्द्वंद्व को कैसे प्रकट करेंकहें विधेयपॉजिटिवकहें निषेधनिगेटिवतो मुश्किल हो जाएगीद्वंद्व खड़ा हो जाएगा। तो दो ही उपाय हैं उसको प्रकट करने के। या तो कह दें दोनोंअर्थात पूर्ण—एक साथ। और या कह दें दोनों नहींअर्थात शून्य। ये दो उपाय हैं। या तो परमात्मा को कह दें पूर्ण। उसका अर्थ यह हुआ कि जो भी इस जगत में हैसभी परमात्मा है।
इससे बड़ी परेशानी पश्चिम मेंखासकर ईसाई विचारकों को होती है। वे कहते हैंफिर बुराई का क्या होगाबुराई हैबीमारी हैमृत्यु हैदुख हैइसका क्या होगा ई क्या यह भी परमात्मा है?
जो कहता है पूर्ण है परमात्मावह यह भी स्वीकार कर रहा है कि बुराई हैवह भी परमात्मा है। वह जो चोर हैवह भी परमात्मा है। चोर परमात्मा हैहै परमात्मा ही।
ईसाइयत को बड़ी कठिनाई पड़ी इस बात को समझने में। क्योंकि अगर चोर भी परमात्मा है और अगर राम भी रावण हैंतो फिर आदमी के लिए विकल्प क्या हैआदमी क्या चुनेक्या बुरा है?
इस जगत में कोई बुराई नहीं है। अगर सभी परमात्मा हैतो फिर बुराई नहीं है। अकाल आता हैबाढ़ आती हैलोग मर जाते हैंयुद्ध होता है। सिर्फ हिंदुओं ने हिम्मत की कि वह भी परमात्मा है।
यह हिम्मत बहुत अदभुत है। समझ के थोड़े पार भी है। क्योंकि हमारा भी मन कहता है कि इसे इनकार करो। अच्छाई को परमात्मा से जोड़ दोबुराई को अलग करो। लेकिन ऋषि कहते हैंबुराई को फिर कहां रखोगेफिर तुम्हें शैतान निर्मित करना पड़ेगा। बुराई को रखोगे कहांबुराई भी परमात्मा है।
असल में अगर बुराई भी परमात्मा हैतो बुराई बुराई हो नहीं सकती अंततः। वह सिर्फ हमारे देखने की भूल होगी या पूरा पर्सपेक्टिव न होगापूरी बात दिखाई न पड़ रही होगी। एक घटना घटती हैपैर में काटा चुभ जाता हैआप कहते हैंयह तो सीधी बुराई है। दुख हो रहा हैपीड़ा हो रही है।
हसन नाम का सूफी फकीर एक रास्ते से गुजर रहा है। पत्थर से चोट लग गई और पैर से खून बहने लगातो उसने हाथ जोड़कर आकाश की तरफ परमात्मा को धन्यवाद दिया कि तेरी बड़ी कृपा है। उसके शिष्य तो बहुत हैरान हुए। उन्होंने कहायह कृपा है! तो अकृपा क्या होती हैपैर में पत्थर लग गया हैखून बह रहा हैअगर यह कृपा हैतो हमें छुट्टी दो। हम सब परमात्मा की कृपा को खोजने निकले हैं और तुम्हारे पीछे इसीलिए चल रहे हैं। अगर यह कृपा हैतो हम वापस लौट जाएं।
तो हसन ने कहा कि जो इसमें कृपा न देख पाएगाउसे कृपा कभी भी न मिल सकेगी। और फिर मैं तुमसे कहता हूं कि आज मुझे फांसी होनी चाहिए थीलेकिन उसकी कृपा है कि सिर्फ पैर में एक पत्थर लगकर मैं बच गया हूं। कर्म तो मेरे ऐसे थे कि आज फांसी निश्चित थी। नियति तो मेरी फांसी की थीलेकिन उसकी कृपा है।
और ऐसा मत सोचना कि हसन को फांसी लगतीतो हसन न कहता कि तेरी बड़ी कृपा है। तो भी यही कहता। क्योंकि और बडी फांसिया हो सकती हैं। फांसी से भी बड़ी फांसिया हो सकती हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन ने इकट्ठी चार शादियां कर ली थीं। जिस जगह वह रहता थाउस जगह का कानून इसे फांसी के योग्य मानता था। अदालत में हाजिर होना पड़ा। मजिस्ट्रेट ने कहा कि जुर्म तो तुमने बहुत भयंकर किया है। फांसी ही इसकी सजा है। लेकिन मुल्लाहम तुम्हें फांसी नहीं देते। हम तुम्हें माफ करते हैं और यह दंड देते हैं कि चारों स्त्रियों के साथ जाकर रहो। मुल्ला ने कहायह फांसी से भी बदतर है। इससे तो तुम फांसी दे दोबड़ी कृपा होगी।
फांसी से बदतर स्थितियां हो सकती हैं। अगर हसन को फांसी भी लगतीतो वह कहतातेरी बड़ी कृपा है। नहींसवाल यह नहीं है कि कौन सी बात हुई है। सवाल इस हृदय का हैजो हर जगह परमात्मा को देख लेता है।
ऋषि कहते हैं कि वह परमात्मा या तो पूर्ण हैसभी कुछ वही हैक्षुद्रतम से लेकर विराटतम तक वही है। एक तो यह रास्ता है। दूसरा रास्ता यह है कि इसमें से कुछ भी वह नहीं है। निर्वाण उपनिषद का ऋषि तो कहता हैवह शून्य है। और इस पर जोर देने का कारण है। और मेरा भी झुकाव इस बात का है कि परमात्मा को पूर्ण न कहा जाए शून्य ही कहा जाए। यह जानते हुए कि पूर्ण भी कहा जा सकता हैफिर भी मेरा अपना झुकाव भी यही है कि परमात्मा को शून्य ही कहा जाए। क्योंवह मैं आपको कहूं।
क्योंकि जैसे ही हम परमात्मा को पूर्ण कहते हैंहमारे अहंकार को परमात्मा के साथ मिटाना मुश्किल हो जाता है। वह बढ़ता है। क्योंकि लगता हैपरमात्मा को पाकर हम पूर्ण हो जाएंगे। लेकिन जब कहा जाता हैपरमात्मा शून्य हैतो उसका अर्थ है कि परमात्मा को पाना होतो हमको मिटना पड़े और शून्य होना पड़े।
इसलिए साधक की दृष्टि से परमात्मा को शून्य कहना ही उचित है। दर्शन की दृष्टि से पूर्ण भी कहा जा सकता हैलेकिन साधक की दृष्टि से पूर्ण कहना बहुत खतरनाक है। क्योंकि साधक बहुत नाजुक हालत में है। सवाल यही है कि अहंकार मिट जाएतो वह परमात्मा को पा लेजो पूर्ण है या शून्य हैजो भी है। लेकिन पूर्ण परमात्मा की कल्पना के साथ अपने को मिटाने का खयाल नहीं आताबल्कि और अपने बड़े हो जाने का खयाल आता है। ऐसा लगता है कि परमात्मा को पाकर हम और भी मजबूतऔर भी विराटऔर भी अमृतऔर भी दुख के पार —र लेकिन हम बच रहेंगे। मैं बच रहूंगा।
तो हमारा अहंकार कह सकता हैअहं ब्रह्मास्मिमैं ब्रह्म हूं। और इसलिए अक्सर ऐसा हो जाता है कि अहं ब्रह्मास्मि की घोषणा करने वाले साधु—संन्यासी अति अहंकार से पीड़ित हो जाते हैं। अहंकार उनके रोएं—रोएं पर लिख जाता है। उसका कारण है। वक्तव्य अगर परमात्मा के पूर्ण होने का स्वीकार किया जाएतो उस पूर्ण के साथ स्वयं को जोड़ने में शून्य होना कठिन पडेगा।
इसलिए साधक को ध्यान में रखकर ऋषि कहता है कि शून्य उसका स्वभाव है। और जब तक तुम शून्य न हो जाओतब तक उसे न पा सकोगे। यद्यपि जो पा लेते हैंवे उसे पूर्ण भी कह सकते हैंकोई अंतर नहीं पड़ता। लेकिन जिन्होंने नहीं पाया हैउनकी तरफ से अगर ध्यान रखना होतो शून्य कहना ही उचित है। क्योंकि परमात्मा को वही बताना उचित हैजो हमें बनना हो। परमात्मा को ऐसा कोई भी संकेत देना खतरनाक हैजो हमारे मिटने में बाधा बन जाए। मिट जाना हैखाली हो जाना हैतो ही हम उससे भर पाएंगे। तो जो हमें हो जाना 'हैपरमात्मा को वही कहना उचित है।
इसलिए शून्य प्रेफरेबल हैचुनाव योग्य है। और ऋषि ने शून्य को ही चुना और कहा कि यह शून्य संकेत नहीं हैऐसा मत मानना कि हम सिर्फ इशारा करते हैं शून्य से उस परमात्मा काजो कि पूर्ण है। यह कहा कि वह शून्य ही हैइशारा भी नहीं करते। उसका स्वभाव शन्य है। यह स्वभाव शून्य हैयह और भी एक—दो दिशाओं से समझ लेना चाहिए।
असल में सारा अस्तित्व शून्य से पैदा होता है और शून्य में ही लीन होता है। एक बीज है वृक्ष कातोड़े और खोजें कि वृक्ष उसमें कहां छिपा है! कहीं भी न मिलेगा। पीस डालेंकहीं वृक्ष न मिलेगा। फिर भी इसी बीज से वृक्ष पैदा होता है। यही बीज टूटकर जमीन में बिखर जाता है और अंकुर निकलता है और वृक्ष बन जाता है। लेकिन बीज में खोजने से वृक्ष कहीं भी नहीं दिखाई पड़ता था।
कहा से आता है यह वृक्षशून्य से आता है। बीज में तो सिर्फ इस वृक्ष की ब्‍लू—प्रिंट होती हैवृक्ष नहीं होता। बीज में तो सिर्फ नक्शा होता है कि वृक्ष कैसा होगा। जस्ट ए ब्‍लू—प्रिंटए बिल्ट—इन प्रोग्रैम। जैसे कि कोई आर्किटेक्ट एक मकान बनाता है और अपनी फाइल में एक नक्शा दबाकर चलता है। आप उसके नक्शे में रहने की कोशिश मत करना। वह नक्शा सिर्फ ब्‍लू—प्रिंट है। वह सिर्फ रूपरेखा हैजैसा कि मकान बन सकेगाउसकी सिर्फ रूपरेखा है। बीज में वृक्ष नहीं होताबीज में सिर्फ रूपरेखा होती है। वृक्ष तो शून्य से आता हैबीज रूपरेखा देता है और वृक्ष निर्मित होता है।
आप जब पैदा होते हैंतो आपके पिता और मा से आप पैदा नहीं होतेजस्ट ए ब्‍लू प्रिंट इज गिवेन। मां और बाप सिर्फ ब्‍लू प्रिंट देते हैंरूपरेखा देते हैं कि नाक कैसी होगीआंख कैसी होगीबाल का रंग कैसा होगाउम्र कितनी होगीसब रूपरेखा दे देते हैंलेकिन जो जीवन आता हैवह शून्य से आता है।
सारा अस्तित्व शून्य से निकलता है और सारा अस्तित्व शून्य में लौट जाता है। जब एक वृक्ष गिरता है और नष्ट होता हैतो पत्ते जमीन में मिलकर फिर मिट्टी हो जाते हैं। वे मिट्टी से आए थे। रूपरेखा खो गईबिल्ट—इन प्रोग्रैम थावह समाप्त हो गया। सत्तर साल वृक्ष को रहना थावह बात समाप्त हो गई। मिट्टी अपनी मिट्टी खींच लेती हैपानी अपना पानी वापस ले लेता हैआकाश अपना आकाश मांग लेता हैसूर्य अपनी किरणों को वापस उठा लेता हैहवाएं अपनी हवाओं को खींच लेती हैं। लेकिन वृक्ष कहां गयावह जो जीवन थाजिसने इस मिट्टी को इकट्ठा किया था और हवा को बांधा था और जिसने पानी खींचा था आकाश से और सूरज से किरणें ली थींवह जो जीवन थाजिसने यह सब संघट किया थायह सारा आर्गनाइजेशन किया थावह जीवन कहां हैवह शून्य से आया था और शून्य में वापस लौट गया।
परमात्मा को शक कहने का कारण है। जो भी दिखाई पड़ता हैवह तो पदार्थ है। जो भी पकड़ में आता हैवह पदार्थ है। इस सब दिखाई पड़ने वाले और पकड़ में आने वाले के अतिरिक्त कहीं कोई मूल स्रोत जीवन का चाहिए। उसे हम क्या कहेंउसे हम कोई भी नाम देंगेतो वह पदार्थ जैसा मालूम पड़ेगा। शून्य भर एक शब्द है हमारे पासजो पदार्थ जैसा मालूम नहीं पड़ता।
इसलिए परमात्मा को शून्य कहा है। इसीलिए उसे निराकार कही हैसिर्फ शून्य ही निराकार हो सकता है। सिर्फ शून्य ही निराकार हो सकता है। इसीलिए उसे निर्गुण कहा हैसिर्फ शून्य ही निर्गुण हो सकता है। इसीलिए उसे सनातन कहा है—सदा एक जैसा रहने वाला—सिर्फ शून्य ही सदा एक जैसा हो सकता है। जैसे ही आकृति आती हैबदलाहट आ जाती है। जैसे ही गुण आते हैंपरिवर्तन आ जाता है। जैसे ही रूप आता हैजन्म और मृत्यु आ जाती है। सिर्फ शून्य ही अजन्माअमृत हो सकता है।
इसलिए ऋषि कहता हैशून्य संकेत नहीं है हमाराशून्य उसकी सत्ता है। विराट जगत उसी से पैदा होता है और उसी में लीन हो जाता है। शून्य परमात्मा की सत्ताउसका अस्तित्वउसके होने का ढंग है। इसीलिए वह दिखाई नहीं पड़ता। इसीलिए परमात्मा का दर्शनठीक शब्द नहीं है कहना। आंख से तो वह दिखाई नहीं पड़ेगा। कहना पड़ता हैक्योंकि मजबूरी है। कोई भी शब्द उपयोग करेंगेतो इंद्रियों का होगा। परमात्मा की होती है प्रतीतिहोती है अनुभूतिहोती है एक्सपीरिएसिंगदर्शन नहीं। कहते हैंशब्द के लिए उपाय नहीं कोई। परमात्मा शून्य हैइसीलिए तो मौजूद होकर भी मौजूद नहीं मालूम पड़ता। सब तरफ होकर भी अनुपस्थित है। जगह—जगह होकर भी कहीं भी नहीं मालूम पड़ता।
स्वामी राम निरंतर एक बात कहा करते थे। वे कहते थेएक परम नास्तिक था। और उसने कहीं दीवार पर लिख छोड़ा था—गॉड इज नोव्हेयरईश्वर कहीं भी नहीं है। उसका छोटा बच्चा पैदा हुआबड़ा हुआस्कूल पढ़ने जाने लगा। अभी नया—नया पढ रहा थातो पूरे लंबे अक्षर नहीं पढ़ पाता था। नोव्हेयर काफी बड़ा है। वह बच्चा पढ़ रहा था दीवार पर लिखा हुआ गॉड इज नोव्हेयरउसने पढ़ागॉड इज नाऊ हियर। तोड़कर पढ़ा। वह नोव्हेयर जो थाउसे तोड़ लिया। बड़ा लंबा शब्द था। उतना लंबा उसकी अभी सामर्थ्य के बाहर था।
बाप तो बहुत चौंका। लिखा थागॉड इज नोव्हेयर। पढ़ने वाले ने पढ़ागॉड इज नाउ हियर। उस दिन से बाप बड़ी मुश्किल में पड़ गया। जब भी वह दीवार पर देखतातो उसको भी पढ़ाई में आने लगागॉड इज नाउ हियर।
एक दफा बात खयाल में आ जाए तो फिर उसे भुलाना बहुत मुश्किल हो जाता है। नोव्हेयरनाउ हियर भी हो सकता है। जो कहीं नहीं हैवह सब कहीं भी हो सकता है। जो कहीं नहीं हैवह यहीं और अभी भी हो सकता है। लेकिन उसकी उपस्थिति अनुपस्थिति जैसी है। हिज प्रेजेंस इज जस्ट लाइक ऐब्सेंस। असल में अगर परमात्मा की उपस्थिति भी उपस्थिति जैसी होतो बहुत वायलेट हो जाएबहुत हिंसक हो जाए। उसे ऐसा ही होना चाहिए कि हमें पता ही न चले कि वह हैनहीं तो हम बड़ी मुश्किल में पड़ जाएं। खयाल है आपको!
मैंने सुना है कि एक ईसाई ननएक ईसाई साध्वीबाइबिल में पढ़ते—पढ़ते इस खयाल पर पहुंच गई। बाइबिल में उसने पढ़ा कि ईश्वर सब जगह है और हर जगह देखता है। वह बड़ी मुश्किल में पड़ी। उसे लगा कि वह बाथरूम में भी होता ही होगा। वह कपड़े पहनकर स्नान करने लगी कि कहीं नंगा न देख ले। और दूसरी साध्वियों को पता चला। उन्होंने कहातू यह क्या पागलपन करती है कि तू बाथरूम में कपड़े पहनकर स्नान करती है! वहां कोई भी नहीं है। उस साध्वी ने कहा कि नहींजब से मैंने पढ़ा बाइबिल मेंउसमें लिखा हैसब जगह वह देख रहा हैउसकी आंख हर जगह हैतो इसलिए मैं कपड़े पहनकर ही नहा लेती हूं।
लेकिन उस पागल को पता नहीं कि जो बाथरूम के भीतर देख सकता हैवह कपड़े के भीतर भी देख सकता है। उसे इसमें क्या कठिनाई होगीनथिंग इज इम्पासिबल फार हिम। अगर दीवार के भीतर ही घुस जाता हैतो कपड़े के भीतर ऐसी कौन सी अड़चन आती होगी। और कपड़े के भीतर जो घुस सकता हैदीवार के भीतर जो घुस सकता हैचमड़ी और हड्डी उसको कोई बाधा बनेगीऔर जो इतना सब कहीं हैक्या वह भीतर भी न होगाप्राणों में न होगालेकिन उसकी मौजूदगी बड़ी नान—वायलेट हैबड़ी अहिंसात्मक है।
ध्यान रखेंमौजूदगी में हिंसा हो जाती है। बाप बैठा हैतब देखेंबेटे की चाल बदल जाती है। बाप कमरे में बैठा हैबेटा जब निकलता हैतो उसकी चाल बदल जाती हैक्योंकि बाप की मौजूदगी हिंसात्मक होगी। अगर परमात्मा इस तरह मौजूद होतो जीवन बड़ी मुश्किल में पड़ जाए। जीना मुश्किल ही हो जाएउठना—बैठना मुश्किल हो जाएकुछ भी करना मुश्किल हो जाए।
नहींआदमी के जीवन के लिए पूरी स्वतंत्रता इसीलिए संभव है कि उसकी उपस्थिति अनुपस्थिति जैसी है। वह सिर्फ उन्हें ही दिखाई पड़ना शुरू होता हैजिन पर उसकी मौजूदगी की कोई हिंसा नहीं होती। वह सिर्फ उन्हें ही अनुभव में आना शुरू होता हैजो इतने विकाररहित हो गए होते हैं कि अब नग्न हो सकते हैं और प्रकट हो सकते हैं। वह सिर्फ उन्हीं के निकट जाहिर होता हैजिनके पास छिपाने को कुछ भी नहीं रह जाता। इसलिए ऋषि कहते हैंवह शून्य है। यह संकेत नहींउसकी सत्ता है।
सच्चा और सिद्ध हुआ योग संन्यासी का मठ है। सत्यसिद्धयोगो मठ:।
सिद्ध हुआ योग ही संन्यासी का मठ हैवही उसका मंदिर हैवही उसका आवास। सिद्ध हुआ योग! बड़ी जागरूकता ऋषि के मन में होगी। सिर्फ इतना नहीं कहा कि योग उसका मंदिर है। क्योंकि योग सिर्फ बातों में हो सकता हैचर्चा में हो सकता हैसिद्धांत में हो सकता है। उस योग का कोई मतलब नहीं है।
योग म्यूजियम में भी हो सकता हैयह मुझे आज पता चला। एक मित्र निमंत्रण दे गए हैं ब्रह्माकुमारियो का। उसमें लिखा है कि राज—योग का म्यूजियम। मुझसे कह गए कि आप जरूर देखें। राज—योग का बिलकुल म्‍यूजियम बनाकर रखा है।
अभी योग इतना नहीं मर गया है कि म्यूजियम बनाना पड़े। म्यूजियम तो मरी हुई चीजों के लिए बनाना पड़ता है।
बर्ट्रेंड रसेल के ऊपर कोई व्यक्ति थीसिस लिखना चाहता था। तो बर्ट्रेंड रसेल ने कहा कि कम से कम मुझे मर तो जाने दो। अन्वेषण का काम तो मरने के बाद ही शुरू होना चाहिएअभी तो मैं जिंदा हूं। और अभी तुम कैसे थीसिस लिखोगेअभी जिंदा आदमी न मालूम और क्या—क्या कहेगा। तुम्हारी थीसिस गड़बड़ हो सकती है। तुम थोड़ा वेट करोथोड़ा ठहरो। इतने घबराओ मतमैं भी मरूंगा ही। फिर तुम थीसिस लिख लेना।
लेकिन राज—योग के म्यूजियम का क्या मतलब हो सकता हैयोग कोई म्प्रइजयम की बात हैलेकिन हो गई करीब—करीब।
इसलिए ऋषि नहीं कहता कि योग उसका मठ है। क्योंकि योग सिद्धांत में हो सकता हैचर्चा में हो सकता हैम्‍यूजियम में हो सकता हैविचार में हो सकता हैदर्शन में हो सकता है।
ऋषि कहता हैसिद्ध हुआ योग—वही उसका मठ है। सिद्ध हुआ योग। जब वह अनुभूति बन जाए स्वयं कीतभी। वह पतंजलि के शास्त्र में तो लिखा हैउस शास्त्र को सिर पर लेकर ढोते रहेंतो कोई हल नहीं होता। उस शास्त्र को कंठस्थ कर लेंतो भी कुछ नहीं होता। उस शास्त्र पर बड़ी व्याख्याएं कर डालेंतो भी कुछ नहीं होता। उस शास्त्र के बड़े जानकार बन जाएंऐसा कि पतंजलि भी मिल जाए तो डरेतो भी कुछ नहीं होता। वह सिद्ध हो योग। क्योंकि योग जो हैवह विचार नहीं हैअनुभव है। सिद्ध हुआ योग ही मठ है
लेकिन ऋषि एक शर्त और लगाता हैसच्चा और सिद्ध हुआ—दू एंड एक्सपीरिएंस्त। यह और कठिन शर्त है। इसका मतलब यह हुआ कि गलत योग भी सिद्ध हो सकता है। इसलिए ऋषि एक शर्त और लगाता है कि सत्य और सिद्ध हुआ योग। गलत योग भी सिद्ध हो सकता है। इस जगत में कोई भी चोज ऐसी नहीं हैजिसका गलत रूप न हो सके। सब चीजों के गलत रूप हो सकते हैं। और सही रूप जानने में बड़ा कठिन होता हैइसलिए गलत रूप चुनने सदा आसान होते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी का जन्म—दिन था। तो वह हीरे का हार लेकर आया। पत्नी तो पागल हो गई। लाखों का हार मालूम पड़ता था। उसने कहानसरुद्दीन तुम इतना मुझे प्रेम करते होयह मुझे कभी पता न था। नसरुद्दीन ने कहा कि बिना हीरे के हार के कहीं प्रेम का पता चलता हैअब तो पक्का हैयह हार देख। पर पत्नी ने कहालाखों खर्च हो गए होंगे। नसरुद्दीन ने कहाहो ही गए। तो पत्नी ने कहा कि जब लाखों ही खर्च करने थेतो बेहतर था एक राल्‍स रायस कार खरीद ली होती। नसरुद्दीन ने कहाइमीटेशन कार कहीं मिलती हैंतो हम वही खरीद लाते। यह इमीटेशन हार है। यह लाखों का दिखता हैहै नहीं। लेकिन कार तो मिलती नहीं कहीं इमीटेशन।
जो भी चीज इस जगत में हो सकती हैउसका इमीटेशन हो सकता है। इमीटेशन सस्ता मिलता है। और आदमी सस्ते को खरीदने को बड़ा उत्सुक होता हैसरलता से मिल जाता है। सस्ते योग भी हैंइमीटेशन योग भी हैं। इसलिए ऋषि ने कहासत्य और सिद्ध हुआ। )
इमीटेशन योग क्या हैथोड़ी सी बात समझ लेनी चाहिए।
सम्मोहन से संबंधित सब योग इमीटेशन योग होते हैं। जैसे कि उदाहरण के लिए अभी फ्रांस में एक बहुत योग्य सम्मोहन विद्या का पारंगत व्यक्ति था इमायल कुवें। इमायल कुवे सिर्फ लोगों की सम्मोहन से चिकित्सा करता था। एक आदमी बीमार हैसिर में दर्द हैतो कुवे कोई दवा नहीं देता था। वह सिर्फ उसे लिटाकर कहता कि तुम शिथिल पड़ जाओ और सोचो मन में कि दर्द नहीं है। और वह दोहराता कि दर्द नहीं है। वह बाहर से कहता कि दर्द नहीं हैदर्द झूठ हैदर्द नहीं है। मरीज मन में सोचता कि दर्द नहीं हैदर्द नहीं हैदर्द नहीं है। अगर यह भाव गहरा प्रवेश कर जाएतो दर्द मिट जाता है।
मिट जाने के दो कारण हैं। पहला कारण तो यह है कि निन्यानबे मौकों पर दर्द होता नहींसिर्फ खयाल होता है। निन्यानबे मौकों पर दर्द होता नहीं हैसिर्फ खयाल होता हैतो खयाल से मिट जाता है। एक मौके पर दर्द हो भीतो खयालविपरीत खयाल से छिप जाता है। इमायल कुवें को मुल्ला नसरुद्दीन जैसा आदमी नहीं मिला।
पर मैंने सुना है कि एक दूसरे सम्मोहन शास्त्री से मुल्ला नसरुद्दीन की मुलाकात हुई। नसरुद्दीन ने जाकर उससे कहा कि मैं बड़ी तकलीफ में पड़ा हुआ हूं। मुझे घर में बैठे —बैठे सर्दी पकड़ जाती है। भली धूप निकली हैसब ठीक हैअचानक सर्दी पकड़ जाती है। उस सम्मोहनविद ने कहाकोई फिक्र नहीं। तुम घर में बैठेआंख बंद किए सोचा करो कि सिर पर सूरज की तेज किरणें पड़ रही हैं। सिर गरम हो रहा है। नसरुद्दीन ने कहाठीक है। सात दिन बाद नसरुद्दीन की पत्नी ने फोन किया कि महाशयआपने क्या कर दिया! उनको घर में बैठे—बैठे लू लग गई है।
लग ही जाएगी। वह सर्दी भी मन का खेल थीयह लू भी मन का खेल। जो सर्दी लगा सकता हैवह लू भी लगा सकता है। इसमें कौन सी कठिनाई है! कला तो वही हैट्रिक तो वही है।
आदमी सम्मोहन से झूठे योग सिद्ध कर सकता है। अपने मन में सिर्फ भाव क्र—करकेकर—करके कर सकता है। वे सच्चे योग नहीं हैं। सम्मोहन का भी उपयोग किया जा सकता है सच्चे योग के मार्ग परऔर किया जाता हैलेकिन बड़ा भिन्न है। आदमी में जो बीमारिया सम्मोहन से पैदा हुई हैंउनको काट दिया जा सकता हैडी—हिम्मोटाइज किया जा सकता है। आदमी के भीतर जो रोग सम्मोहन से ही 
पैदा हुए हैंवे सम्मोहन से जरूर काट देने चाहिए। लेकिन सम्मोहन से स्वास्थ्य नहीं पैदा करना चाहिए नहीं तो वह झूठा होगा। फर्क समझ लें।
सम्मोहन से पैदा हुई बीमारी है झूठीमन की मानसिक बीमारी हैतो मानसिक विचार से उसे तोड़ा जा सकता है। लेकिन अगर कोई मानसिक विचार से समझे कि मैं स्वस्थ हूं मैं स्वस्थ हूं तो वह स्वास्थ्य भी मानसिक विचार होगावह स्वस्थ हो नहीं पाएगा। इसलिए हिम्मोटिज्य का निगेटिव उपयोग हो सकता है। योग में होता हैनकारात्मकसिर्फ काटने के लिए। पुराने बंधे हुए सम्मोहन को काटने के लिए उपयोग होता हैलेकिन कोई नया सम्मोहन पैदा करने के लिए उपयोग नहीं होता।
झूठे योग में नया सम्मोहन पैदा करने के लिए उपयोग होता है। तो आप बैठकर एक पत्थर की मूर्ति को भगवान मानकर अगर सम्मोहन करते रहेंकरते रहेंकरते रहेंतो मूर्ति भगवान मालूम होने लगेगी। बातचीत भी मूर्ति से हो सकती हैचर्चा भी हो सकती है। हालांकि और किसी को सुनाई नहीं पड़ेगी सिर्फ आपको ही सुनाई पडेगी। लेकिन अगर दों—चार दिन भी अभ्यास छोड़ देंतो चर्चा बंद हो जाएगी मूर्ति फिर पत्थर मालूम होने लगेगी। वह जो सम्मोहन थाआपका प्रोजेक्यान था।
नहींपत्थर में भी भगवान खोजा जा सकता है। दो ढंग हैं—एक ढंग तो यह है कि मैं पत्थर में भगवान मानूं और आरोपित करूं। तो निरंतर आरोपण करने से पत्थर में भगवान दिखाई पड़ने लगेंगे। वे भगवान मेरे ही कल्पित भगवान हैंवह सच्चा योग नहीं है। नहींमैं पत्थर में भगवान मानूं ही नहीं। मैं तो सिर्फ अपने भीतर चित्त को विचारों से खाली करूंखाली करूंखाली करूं और वह घड़ी ले आऊंजब कि चित्त बिलकुल दर्पण की तरह शून्य हो जाए। पत्थर सामने होगा। भगवान उसमें प्रकट हो जाएंगे।
लेकिन यह भगवान मेरे कल्पित नहीं होंगे। क्योंकि कल्पना करने वाला चित्त और विचार तो मैं छोड़ चुका। कल्पना करने वाला मन तो मैं हटा चुका। अब तो वहां पत्थर है और यहां मेरी चेतना है। चेतना और पत्थर का मिलन हो जाएतो पत्थर भगवान हो जाता है। लेकिन बिना चेतना के मिलन के मन के ही आधार पर अगर मैं निरंतर चिंतन करता रहूं मनन करता रहूं अभ्यास करता रहूं कि यह मूर्ति भगवान हैभगवान हैभगवान हैऐसा दोहराता रहूं दोहराता हूं दोहराता रहूं तो एक दिन मैं वह भांति पैदा कर लूंगा जिस दिन मूर्ति भगवान हो जाएगी।
पत्थर में भगवान प्रकट होते हैंलेकिन उस आदमी के लिएजिसका मन गिर जाता है। और जो मन से ही पत्थर में भगवान प्रकट करता हैवह झूठा योग है।
तो ऋषि कहता हैसच्चा और सिद्ध हुआ योग।
अनुभवित होअनुभव से ठहरा होजाना हो और फिर भी जरूरी नहीं—क्योंकि अनुभव भी काल्पनिक हो सकता हैअनुभव भी झूठा हो सकता हैअनुभव भी स्वप्‍नवत  हो सकता है—इसलिए एक शर्त और लगाईसच्चा। सच्चे का अर्थ यही हैदो तरह की संभावनाएं हैं हमारी। अगर हम मन से सत्य की तरफ चलेंतो जो भी होगा वह सच्चा नहींझूठा होगा। अगर हम मन को छोड्कर चलेंतो जो भी होगा वह सच्चा होगा। सत्य योग का अर्थ हैमन से साधा गया नहींमन के विसर्जन से पाया गया। झूठे योग का अर्थ हैमन से ही साधा गया। मन के पार कुछ भी पता नहीं।
उस आत्मस्वरूप के बिना अमरपद नहीं है और वह जो सच्चा और सिद्ध हुआ योग हैउससे मिलने वाला जो अनुभव हैअमरपदं न तत् स्वरूपम् उसे जाने बिनाउसे पाए बिना अमर पद नहीं है। उसे पाए बिना अमृत की कोई उपलब्धि नहीं हैमृत्यु बनी ही रहेगी। इसका अर्थ हुआजहां तक मन होगावहां तक मृत्यु होगी। मन की सीमा मृत्यु की सीमा है। मन और मृत्यु एक ही अस्तित्व के नाम हैं। मन के पार अमृत हैमन 'की सीमा के पार अमृत है।
और अमृत को पाए बिना चैन नहीं मिल सकता—जन्म—जन्मकोटि—कोटि जन्म भटककर भी चैन नहीं मिल सकता। क्योंकि जब मृत्यु पीछा कर रही हो निरंतरतो कैसे चैन मिल सकता हैमृत्यु गले में हाथ डाले खड़ी हो निरंतरतो कैसे चैन मिल सकता हैथोड़ी—बहुत देर भुलावा हो सकता हैवह दूसरी बात है। लेकिन फिर—फिर याद आ जाती हैफिर—फिर याद आ जाती है। मौत फिर—फिर घेर लेती है। अमृत को जाने बिना निश्चितता नहीं हो सकती। जब तक मुझे लगता है कि मिट जाऊंगामिट सकता हूं तब तक प्राण कंपते ही रहेंगे।
एक बहुत कीमती विचारक हुआ पश्चिम में—सोरेन कीर्कगार्ड। उसने एक किताब लिखी हैउसमें उसने कहा है कि मैन इज ए ट्रैम्बलिंगआदमी एक कंपन है। पर व्हाई मैन इज ए ट्रैम्बलिंगबिकाज आफ डेथ। आदमी क्यों एक कंपन हैमृत्यु के कारण। मृत्यु चौबीस घंटे सामने खड़ी होकपेंगे नहीं तो क्या करेंगेअमृत को पाए बिना कंपन नहीं मिटेगा। कंपन के मिटे बिना स्वभाव की सरलतानिर्दोषता अनुपलब्ध रहेगी।
ऋषि कहता हैउस आत्मस्वरूप के बिना अमरपद नहीं है।
उस आत्मपद को जानना ही पड़ेगा। उस आत्मस्वरूप को जानना ही पड़ेगा। उसे जानना ही पड़ेगाजो है। उस मन को छोड़ना ही पड़ेगाजो भरमाता हैभटकाता हैभ्रम पैदा करता हैस्वप्‍न  जन्माता है।
आदिब्रह्म स्व—संवित्।
वह जो ब्रह्म हैवह जो चैतन्य है हमारे भीतर छिपा हुआआदि चैतन्य है हमारे भीतरवह स्व—संवित् है। यह बहुत कीमती विचार है उपनिषदों का—स्व—संवित्सेल्क—कांशस।
यहां हम बैठे हैं। बिजली बुझ जाएतो फिर हम एक—दूसरे को दिखाई न पड़ेंगे निश्चित ही। क्योंकि एक—दूसरे का देखना जो हैवह स्व—प्रकाशित नहीं हैपर—प्रकाशित है। एक प्रकाश पर निर्भर है। यह बिजली जलती हैतो मैं आपको देख रहा हूं। बिजली बुझ गईतो मैं आपको नहीं देख सकूंगा। सूरज हैतो मुझे रास्ता दिखाई पड़ रहा हैसूरज ढल गयातो मुझे रास्ता दिखाई नहीं पड़ताक्योंकि रास्ता स्व—प्रकाशित नहीं है। दूसरे से प्रकाशित है।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने कमरे में बैठा है। अमावस की रात है। एक मित्र मिलने आया है। सांझ थीसूरज ढल रहा थातब आया था। तब सब चीजें दिखाई पड़ती थीं। फिर गपशप में काफी वक्त निकल गया। रात अंधेरी हो गई। तो मित्र ने मुल्ला नसरुद्दीन से कहा कि तुम्हारे बाएं हाथ की तरफ दीया रखा हैऐसा मैंने सांझ को देखा था। उसे जला क्यों नहीं लेतेमुल्ला ने कहाआर यू मैड! अंधेरे में पता कैसे चलेगा कि कौन सा मेरा बायां हाथ है और कौन सा मेरा दाहिना?
और अगर अंधेरे में पता चलता है कि कौन सा बाया है और कौन सा दायांतो भीतर कोई शक्ति है जो स्व—संवेदित हैस्व—प्रकाशित है। कुछ पता न चलेइतना तो पता चलता है कि मैं हूं। अंधेरे में कुछ पता न चले इतना तो पता चलता है कि मैं हूं। अपना तो पता चलता है अंधेरे में भी। तो इसका मतलब यह हुआ कि अपने होने में जरूर कोई प्रकाश होगाजो अंधेरे में भी दिखाई पड़ता हूं मैँ अपने कोकोई चेतना होगी। इतना तो तय है कि मेरा होना किसी और चीज के आधार से मुझे पता नहीं चलतामेरे ही आधार से पता चलता है।
लेकिन हम भीतर तो कभी जाकर देखते नहीं कि वहा एक स्व—संवित्स्व—प्रकाशितस्व—ज्योतिर्मय तत्व मौजूद है। और कभी अगर देखें भीतो हम ऐसी उलटी कोशिशें करते हैंजिसका कोई हिसाब नहीं।
एक रात मुल्ला नसरुद्दीन अपने घर के बाहर पकड़ लिया गया। दो बजे थे। पुलिस वाले ने जोर से धीमे—धीमे आकर उसकी कमर पकड़ ली। वह एक खिड़की में से झांक रहा था। घर उसी का था। अंधेरी रात थी। लेकिन पुलिस वाले को क्या पताजब पुलिस वाले ने पकड़ा तो मुल्ला ने कहाधीमे—धीमेआवाज मत करना! कहीं वह जाग न जाए। उसने पूछाकौन जाग न जाएतुम खुद ही तो मुल्ला नसरुद्दीन मालूम पड़ते हो! उसने कहा कि मैं ही हूं लेकिन चुप! उसने कहाकर क्या रहे होबड़ी देर से मैं देख रहा हूं तो मैं समझा कोई चोर। इधर—उधर घूमते होइस खिड़की से झांकते होउस दरवाजे से...।
उसने कहातू बकवास तो मत कर। जोर से तो मत बोल। सुबह आनाबता दूंगा। तो उसने कहामैं छोड्कर भी नहीं जा सकता। बात क्या है? नसरुद्दीन ने कहानहीं मानतातो सुन। बात यह है कि लोग कहते हैं कि मैं नींद में उठकर चलता हूं। सो आई एम जस्ट चेकिंग। वे ठीक कहते हैं कि नहीं। मैं खिड़की में से देख रहा हूं कि मुल्ला चल तो नहीं रहा है। लेकिन कोई नहीं चल रहा हैबिस्तर पर भी कोई नहीं है। कोई सो भी नहीं रहा हैचलने का तो सवाल ही नहीं है। आधी रात खराब हो गई। अभी तक तो चलता हुआ दिखाई नहीं पड़ा। लोग कहते हैंसोते में चलता हूं। जस्ट चेकिंग।
कभी—कभी जब हम अपने को भी ऐसे ही खोजने जाते हैंतो ऐसे ही दरवाजे—खिड़की से झांकते हैं। अपने ही भीतर दरवाजे—खिड़की से झांकते हैं। वहा कोई न मिलेगाक्योंकि जिसको खोजने गए हैंवह बाहर खड़ा है।
स्व—संवित् होने का अर्थ हैजिसे हम बाहर से नहीं जान सकते हैं। जिसे हमें भीतर से ही जानना पड़ेगा। जिसे हम भीतर से जान ही रहे हैंपर न मालूम भूल गए हैंविस्मरण हो गया हैयाददाश्त खो गई है।
मुल्ला भागा जा रहा है अपने गधे पर बहुत तेजी से। सारा गांव चौकन्ना हो गया है। सड़क पर लोगों ने रास्ते छोड़ दिए हैं। लोगों ने चिल्लाकर पूछा कि मुल्ला जा कहां रहे होमुल्ला ने कहामेरा गधा खो गया है। तो लोगों ने कहाठहरोतुम गधे पर सवार हो। उसने कहाअच्छा बताया। मैं इतनी तेजी में था कि मैं सारी जमीन खोज आता और पता न चलता कि गधे पर बैठा हुआ हूं। मैं तेजी में थाइन टू मच हरी। बहुत जल्दी में था। ठीक किया लोगोजो याद दिला दिया। अन्यथा आज बड़ी भूल हो जातीलौटना मुश्किल हो जाताक्योंकि नीचे देखने की फुर्सत किसको है! मेरी आंखें  तो आगे टिकी थीं कि गधा है कहा। चारों तरफ देख रहा थाऔर नीचे देखने का मौकामैं कहता हूं निश्चित ही न आता। क्योंकि जो चारों तरफ देख रहा हैवह नीचे कैसे देखेगा?
जो बाहर देख रहा हैवह भीतर कैसे देखेगा?
स्व—संवित् का अर्थ है कि हमारे भीतर वह जो आदि चेतना हैवह जो ओरिजनल कांशसनेस हैवह जो सदा से हमारे भीतर हैवह हमें भूल गई हैक्योंकि हम उस पर ही सवार हैं और उसी को खोज रहे हैं। तो खोजते रहें। ऋषि चिल्लाकर कहते हैं कि जरा ठहरोकिसे खोजने निकले होजरा रुकोजरा सुनो भी! क्योंकि तुम जिसे खोजने निकले होकहीं उसी पर तो सवार नहीं हो! कहीं तुम वही तो नहीं होजिसको खोजने निकले हो!
जो जानते हैंवे कहते हैंद सीकर इज दं साट। वह जो खोज रहा हैउसकी ही खोज चल रही हैइसलिए हो नहीं पातीइसलिए असफलता हो जाती है।
झेन फकीर कहते हैंडोन्ट सीकइफ यू वान्ट टु सीक। खोजो ही मतअगर खोजना है। —रुक जाओ। क्योंकि खोजने में तो दौड़ना पड़ेगा। ठहर जाओ। और एक दफा देखो तो कि तुम कौन होतुम किसे खोजने निकले होकहीं वह तुम्हारे भीतर ही तो नहीं है?
स्व—संवित् का अर्थ होता हैजिसे जानने के लिए किसी और प्रकाश की जरूरत न पड़ेगीऔर जिसे पहचानने के लिए किसी से पूछना न पड़ेगा। जिसके होने में ही जिसकी पहचान छिपी हैजिसके होने में ही जिसका प्रकाश छिपा हैजो अपने से ही प्रकाशित है। दूसरे किसी प्रकाश की कोई भी जरूरत नहीं है।
अजपा गायत्री है। विकार—मुक्ति ध्येय है।
गायत्री तो हम सब जानते हैं कि क्या है। लेकिन ऋषि कहता हैअजपा गायत्री। लेकिन जिस गायत्री को हम जानते हैंवह तो जपी जाती है। वह तो जपा है। तो यह ऋषि तो उलटी बात कह रहा है। यह कह रहा हैअजपागायत्री विकारदंडो ध्येय:। जिसे जपा ही नहीं जा सकताउसमें ठहर जाना गायत्री है। जिसका कोई नाम ही नहींजपोगे कैसेजिसका कोई शब्द नहींजपोगे कैसेजिसका कोई रूप नहींउसे जपोगे कैसेसब छोड्करजप भी छोड्कर जहां पहुंचा जाता हैवहा गायत्री है। वही मंत्र हैजहा मंत्र भी नहीं रह जाता। जहां प्रभु का नाम भी नहीं रह जातावहीं उसके नाम की उपलब्धि है—अजपा।
अगर हम अपने भीतर देखेंशब्द हम बोलते हैंजब हम शब्द बोलते हैंउसके पहले भी शब्द होता है एक पर्त नीचे—जब हम शब्द को सोचते हैं—बोला नहीं गया अभी शब्दसिर्फ सोचा गया है। अभी बाहर प्रकट नहीं हुआअभी भीतर ही प्रकट हुआ। लेकिन सोचा गया शब्द जब भीतर प्रकट होता हैउसके पहले भी होता है। तब वह सोचा भी नहीं गया होता है।
कई दफे आपको लगा होगा कि किसी का नाम खो गया है। याद है—लोग कहते हैंजीभ पर रखा है—फिर भी याद नहीं आता। बड़े अजीब लोग हैं। अगर जीभ पर ही रखा हैतो अब और क्या दिक्कत हैमगर उनकी कठिनाई मैं समझता हूं। उनकी कठिनाई सच्ची हैजीभ पर ही रखा है। उन्हें पक्का पता है कि याद है और याद नहीं आ रहा है। ये दोनों बातें एक साथ हो रही हैं। इसका मतलब यह हुआ कि उन्हें याद है। यह याद कहा होगायह याद उनके विचार के तल के नीचे है;, और विचार के तल में पकड़ में नहीं आ रहा है।
और कई दफा अगर आप बहुत कोशिश करें—इन टू मच हरीसवार हो जाएं खोजने के लिए—न मिलेगा। घबड़ा जाएंगेपरेशान हो जाएंगेसिर पीट लेंगे। फिर भूल जाएंगे। छोड़ देंगे कि जाने दो। चाय पी रहे हैं और अचानकवह जो नहीं मिल रहा थानिकल आया और आ गया। यह कहां से आया? यह कहां था? निश्चित ही यह विचार में तो नहीं थानहीं तो आप पहले ही पकड़ लेते। यह विचार से नीचे के तल पर था।
तीन तल हुए—एक वाणी में प्रकट होएक विचार में प्रकट होएक विचार के नीचे अचेतन में हो। ऋषि कहते हैंउसके नीचे भी एक तल है। अचेतन में भी होता हैतो भी उसमें आकृति और रूप होता है। उसके भी नीचे एक तल हैमहाअचेतन का कहेंजहां उसमें रूप और आकृति भी नहीं होती। वह अरूप होता है। जैसे एक बादल आकाश में भटक रहा है। अभी वर्षा नहीं हुई। ऐसा एक कोई अज्ञात तल पर भीतर कोई संभावितपोटेंशियल विचार घूम रहा है 1 वह अचेतन में आकर अंकुरित होगाचेतन में आकर प्रकट होगावाणी में आकर अभिव्यक्त हो जाएगा। ऐसे चार तल हैं।
गायत्री उस तल पर उपयोग की है जो पहला तल हैसबसे नीचे। उस तल पर अजपा का प्रवेश है। तो जप का नियम है। अगर कोई भी जप शुरू करें—समझें कि राम—राम जप शुरू करते हैंया ओमकोई भी जप शुरू करते हैंया अल्लाहकोई भी जप शुरू करते है—तो पहले उसे वाणी से शुरू करें। पहले कहेंरामरामजोर से कहें। फिर जब यह इतना सहज हो जाए कि करना न पड़े और होने लगेइसमें कोई एफर्ट न रह जाए पीछेप्रयत्न न रह जाएयह होने लगेजैसे श्वास चलती हैऐसा हो जाए कि रामराम चलता ही रहेतो फिर ओंठ बंद कर लें। फिर उसको भीतर चलने दें। फिर बोलें न रामरामफिर भीतर बोल चले रामराम।
फिर इतना इसका अभ्यास हो जाए कि उसमें भी प्रयत्न न करना पड़ेतब इसे वहां से भी छोड़ देंतब यह और नीचे 'डूब जाएगा। और अचेतन में चलने लगेगा—रामराम। आपको भी पता न चलेगा कि चल रहा हैऔर चलता रहेगा। फिर वहां से भी गिरा दिए जाने की विधियां हैं और तब वह अजपा में गिर जाता है। फिर वहां रामराम भी नहीं चलता। फिर राम का भाव ही रह जाता है—जस्ट क्लाउडीएक बादल की तरह छा जाता है। जैसे पहाड़ पर कभी बादल बैठ जाता है धुआ—धुआऐसा भीतर प्राणों के गहरे में अरूप छा जाता है।
उसको कहा है ऋषि नेअजपा। और जब अजपा हो जाए कोई मंत्रतब वह गायत्री बन गया। अन्यथा वह गायत्री नहीं है।
और क्या है इस अजपा का उपयोगइस अजपा से सिद्ध क्या होगाइससे सिद्ध होगाविकार— मुक्ति। विकारदंडो ध्येय: इस अजपा का लक्ष्य है विकार से मुक्ति।
यह बहुत अदभुत कीमिया हैकेमेस्ट्री है इसकी। मंत्र शास्त्र का अपना पूरा रसायन है। मंत्र शास्त्र यह कहता है कि अगर कोई भी मंत्र का उपयोग अजपा तक चला जाएतो आपके चित्त से कामवासना क्षीण हो जाएगीसब विकार गिर जाएंगे। क्योंकि जो व्यक्ति अपने अंतिम अचेतन तल तक पहुंचने में समर्थ हो गयाउसको फिर कोई चीज विकारग्रस्त नहीं कर सकती। क्योंकि सब विकार ऊपर—ऊपर हैंभीतर तो निर्विकार बैठा हुआ है। हमें उसका पता नहीं हैइसलिए हम विकार से उलझे रहते हैं।
ऐसा समझें कि एक घाटी है अंधेरीऔर सीलन से भरी और बदबू से भरी। और जंगली जानवर हैं और सांप हैं और सब कुछ उपद्रव है। एक आदमी उस घाटी में है। वह बड़ा परेशान है कि सांपों से कैसे बचूं और सिंह न खा जाए और कोई हमला न कर दे और अंधेरा है और बदबू है और बीमारी है। फिर वह आदमी पहाड़ पर चढ़ना शुरू कर देता है। फिर वह थोड़ा ऊपर पहुंचता हैऔर सूरज की रोशनी मिल जाती है। वहा अंधेरा नहीं है। वहां सांप नहीं सरकते। घाटी में अब भी सरक रहे होंगे। पर वह आदमी घाटी के बाहर आ गया। वह आदमी और ऊपर चलता हैवह प्रकाश—उज्जल शिखर पर पहुंच जाता हैजहां कोई भय नहीं। अब भी घाटी में सांप सरक रहे होंगे।
ठीक ऐसे ही जो अजपा तक किसी ध्वनि को पहुंचा लेता हैवह अपने भीतर उस गहराई में पहुंच जाता हैजहा विकार नहीं चलतेवे सतह पर चलते हैं—ऊपर—ऊपर। हम वहीं लड़ते रहते हैंइसलिए परेशान रहते हैं।
मंत्र शास्त्र कहता हैवहां मत लड़ोवहां से हट जाओ। तुम्हारे भीतर और भी बडी जमीन हैं। तुम्हारे भीतर और भी फैलाव हैं। तुम्हारे भीतर और गहराइयां हैंऔर शिखर हैंवहा हट जाओ। लड़ो मत।
और एक दफा हट जाओ और अपने शिखरों को जान लोफिर तुम लौटकर भी आ जाओगे उसी जगह परतो तुम वही आदमी नहीं हो। तब तुम अपने भीतर इतनी महिमा को जानकर लौटे हो कि तुम्हें क्षुद्र विकार पराजित न कर सकेंगे। तब तुम अपनी इतनी शक्ति से परिचित होकर लौटे हो कि तुम्हें अंधेरा भयभीत न कर सकेगा। तब तुमने अपने स्वरूप का दर्शन किया है और अब तुम्हें कोई भी लुभा न सकेगा। पर एक दफा वहा तक हो आओ।
तो अजपा का उपयोग है विकार—मुक्ति के लिए। और प्रत्येक विकार से मुक्ति के लिए विशेष—विशेष मंत्रों की व्यवस्था है। अगर कोई आदमी क्रोध से पीड़ित हैतो एक विशेष ध्वनि और मंत्र का आयोजन किया जाता है। उसको वह अजपा तक ले जाएतो क्रोध के बाहर हो जाएगा। कामवासना से पीड़ित हैतो दूसरा। भय से पीड़ित हैतो तीसरा। ध्वनियों के ऐसे समूह हैंजिनके माध्यम से आपके विकारों को चोट की जाती है और तिरोहित किया जा सकता है।
कुछ महाध्वनियां हैं। महाध्वनियां ऐसी औषधियां हैंजो सभी विकारों पर काम करती हैं। जैसे अभी हम एक ध्वनि का उपयोग कर रहे हैं—हुंकार। वह महाध्वनि है। उसकी चोट इतनी गहरी है कि अलग— अलग विकारों से लड़ने की जरूरत नहीं है। अगर वह एक ही चोट अजपा तक पहुंच जाएतो सब विकार विसर्जित हो जाएं।
अल्लाह शब्द से हम सब परिचित हैं। अल्लाह शब्द में भी हुंकार का ही उपयोग है। और जब कोई साधक अल्लाह का उपयोग करता हैतो जो उपयोग बनता है वह होता है—अल्लाहू अल्लाहू अल्लाहू। फिर अल्ला छूट जाता है और लाहू लाहू लाहू। फिर ला भी छूट जाता हैफिर हू हू हू। और आखिर में हू डूबता चला जाता है और अजपा बन जाता है। जब हू अजपा बन जाता हैतो सब विकार तिरोहित हो जाते हैं।
तिब्बती मंत्र हैमहामंत्र है—ओम मणि पद्ये हुं। वह हुंहू का रूप है। ओंम भी हू जैसा काम कर सकता है। लेकिन अब शायद नहीं। बहुत सरल लोग होंतो ओंम भी हू का काम करता हैंलेकिन बहुत जटिल लोग हों तो काम नहीं करता। क्योंकि ओंम की जो चोट हैवह बहुत माइल्ड है। ओम की जो चोट हैवह बहुत माइल्ड है। हू की चोट बहुत गहरी है। घाव गहरा है।
ओम की चोट बहुत माइल्ड है। वह बहुत कम मात्रा की दवा है। वह उनके लिए उपयोग में लाई गई
थीजो ज्यादा बीमार ही नहीं थे। सरल चित्त लोग थेनिर्दोष लोग थेचालाक न थेकनिंग न थे बेईमान न थे। सरल थे। ओम काफी था। होमियोपैथी की छोटी सी मात्रा उनकी बीमारी को ठीक करती थी। अब एलोपैथी के बिना नहीं चल सकता। हू एलोपैथिक है। ओम होमियोपैथिक है। हू की चोट भयंकर है। गहरे से गहरे तक जाने वाली है। वह अजपा में उतर जाएतो हू गायत्री बन जाएगा और विकार विसर्जित हो जाएंगे। कोई भी मंत्र गायत्री बन जाता हैजब अजपा हो जाए। यही इस सूत्र का अर्थ है अजपागायत्री विकारदंडो ध्येय:।
मन का निरोध ही उनकी झोली है।
वे जो संन्यासी हैंउनके कंधे पर एक ही बात टंगी हुई है चौबीस घंटे—मन का निरोधमन से मुक्तिमन के पार हो जाना। चौबीस घंटे उनके कंधे पर है।
आपने एक शब्द सुना होगाखानाबदोश। यह बहुत बढ़िया शब्द है। इसका मतलब होता हैजिनका मकान अपने कंधे पर है। खाना—बदोश। खाना का मतलब होता है मकान—दवाखाना—खाना यानी मकान। दोश का मतलब होता है कंधाबदोश का मतलब होता हैकंधे के ऊपर। जो अपने कंधे पर ही अपना मकान लिए हुए हैंउनको खानाबदोश कहते हैं—घूमक्कडू लोगजिनका कोई मकान नहीं हैकंधे पर ही मकान है।
संन्यासी भी अपने कंधे पर एक चीज ही लिए चलता है चौबीस घंटे—मन का निरोध। वही उसकी धारा है सतत श्वास—श्वास कीमन के पार कैसे जाऊंक्योंकि मनातीत है सत्य। मन के पार कैसे जाऊं? क्योंकि मनातीत है अमृत। मन के पार कैसे जाऊंक्योंकि मनातीत है प्रभु।
जाया जा सकता है। ध्यान उसका मार्ग है।

आज इतना ही।

फिर हम अब ध्यान में लगे। चलें मन के पार।
एक पांच मिनट तीव्र श्वास ले लेंगेताकि शक्ति जग जाए। दूर—दूर फैल जाएं। जो लोग तेजी से करते होंवे करीब हों। जिन्हें धीमे करना होवे पीछे फैल जाएं। जो लोग बहुत दूर वहां अंधेरे में बैठे हैंवे भी यहां पास आ जाएंताकि मैं उन्हें दिखाई पड़ सकूं। क्योंकि नजर मुझ पर रखनी है।
जब आप पूरी ताकत में आ जाएंगेतब मैं अपने हाथ हिलाना शुरू करूंगाउसके साथ अपनी ताकत को बढ़ाए चले जाएं। और जब मैं ऊपर हाथ ले जाऊंतब अपनी पूरी शक्ति लगा दें। और जब मुझे लगेगा कि आप अपनी पूरी शक्ति में हैं और वह वातावरण पैदा हो गया है जहां प्रभु को निमंत्रित किया जा सकता हैतो मैं हाथ ऊपर से उलटे करके नीचे लाऊंगातब आप बिलकुल पागल हो जाएं। अनेक मित्रों को शक्तिपात का कल अनुभव हुआ है। कोई भी वंचित नहीं रहेगा। अगर आप अपनी पूरी शक्ति लगाएंगेतो वह अनुभव होना सुनिश्चित है।
पहले पांच मिनट गहरी श्वास ले लेंफिर शुरू करें!

 ओशो