कुल पेज दृश्य

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

निर्वाण उपनिषद--ओशो (तेरहवां प्रवचन)

तेरहवां—प्रवचन

असार बोध, अहं विसर्जन और तुरीय तक यात्रा—चैतन्‍य और साक्षीत्‍व से





                  शिवम्तुरीयं यज्ञोपवीतं तन्‍यता शिखा।
                चिन्‍मयं चौत्‍सृष्‍टिदंड्म संतताक्षि कमंडलूम।
                        कर्म निर्मूलनं कन्‍था।
                मायाममताहकार दहन श्मशाने अनाहतागी।



           

            तुरीय ब्रह्म उनका यज्ञोपवीत है और वही शिखा है।
      चैतन्यमय होकर संसार—त्याग ही दंड है, ब्रह्म का नित्य दर्शन कमंडलु है।
            और कर्मों का निर्मूल कर डालना कन्धा है।
श्मशान में जिसने दहन कर दिए हैं माया, ममता, अहंकार, वही अनाहत अंगी—पूर्ण व्यक्तित्व    वाला है।


असारबोध, अहं विसर्जन और तुरीय तक यात्रा—चैतन्न और साक्षीत्व से


तुरीय ब्रह्म ही उनका यज्ञोपवीत वही उनकी शिखा है।
तुरीय शब्द के संबंध में पहली बात तो यह जान लेनी जरूरी है कि यह शब्द सिर्फ संख्या का सूचक है। तुरीय का अर्थ है चौथा, द फोर्थ। बहुत—बहुत मार्गों से तुरीय को समझने की कोशिश की गई है। एक तो मैंने कहा, तीन गुणों के जो पार है, द फोर्थ, वह है चौथा। उसे नाम जानकर नहीं दिया है। क्योंकि वह अनाम है, इसलिए अंक दिया है। नाम में झगड़ा भी हो सकता है, अंक में तो झगड़ा नहीं हो सकता। कोई उसे राम कहे, कोई उसे रहीम कहे, झगड़ा हो सकता है; लेकिन द फोर्थ, चौथे में तो कोई झगड़ा नहीं हो सकता। चौथा चाहे हिंदी में कहो, चाहे अंग्रेजी में कहो, चाहे अरबी में कहो, चाहे हिल में कहो, कोई झगड़ा नहीं हो सकता। जिन्होंने उसे चौथा कहा है, बड़ी अंतर्दृष्टि की बात की है।
नाम देते ही झगड़ा शुरू होता है, क्योंकि नाम के साथ मोह बनना शुरू हो जाता है। और मेरा ना।। सत्य है, मेरा दिया नाम सत्य है, दूसरे का दिया नाम असत्य होगा, ऐसा अहंकार मानना शुरू कर देता है। लेकिन आकड़े में झगड़े की संभावना न के बराबर है। जैसा ऋषियों ने कहा, तुरीय, ऐसा अगर सारे जगत ने कहा होता; आकड़ा, अंक, गणित का उपयोग किया होता, तो विवाद नहीं हो सकता था।
यह भी बहुत मजे की बात है कि उपनिषद का ऋषि और गणित के अंक का प्रयोग करता है, ब्रह्म के लिए। यह जानकर आप हैरान होंगे कि इस जगत में, इस पूरे मनुष्य की जानकारी में गणित ही अकेला शास्त्र है, जिसमें सबसे कम विवाद है। उसका कारण है। क्योंकि शब्द का कोई उपयोग नहीं है। अंकों का उपयोग है। अंकों में विवाद नहीं हो सकते। और दो और दो किसी भी भाषा में लिखे जाएं, और परिणाम चार किसी भी तरह कहा जाए तो अंतर नहीं पड़ता है। इसलिए गणित सबसे कम विवादग्रस्त विज्ञान है। और वैज्ञानिक मानते हैं कि आज नहीं कल हमें सारे विज्ञान की भाषा को गणित की भाषा में ही रूपांतरित करना पड़ेगा, तो ही हम अन्य विज्ञानों और शास्त्रों के विवाद से मुक्त हो सकेंगे। बहुत पहले, हजारों साल पहले ऋषि उस ब्रह्म को, उस परम सत्ता को कहता है? द फोर्थ, चौथा, तुरीय।
मैंने कहा, एक तो तीन गुणों के जो पार है, वह चौथा। एक और गहन खोज, जिसका सारा श्रेय उपनिषदों को है और आधुनिक मनोविज्ञान उस श्रेय के ठीक—ठीक मालिक को खोज लेने में समर्थ हो गया है, कि उपनिषद ही उस श्रेय के हकदार हैं, वह है मनुष्य के चित्त की तीन दशाएं हैं—जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति। जागते हैं, स्वप्न देखते हैं, सोते हैं। अगर इन तीनों में ही मनुष्य समाप्त है, तो वह कौन है जो जागता है! वह कौन है जो सोता है! वह कौन है जो स्वप्न देखता है!
निश्चित ही चौथा भी होना चाहिए जिस पर जागरण का प्रकाश आता है, जिस पर निद्रा का अंधकार आता है, जिस पर स्वभों का जाल बुन जाता है। वह द फोर्थ, चौथा होना चाहिए वह तीन में नहीं हो सकता। अगर मैं तीन में से एक हूं तो बाकी दो मेरे ऊपर नहीं आ सकते। अगर मैं जाग्रत ही हूं तो निद्रा मुझ पर कैसे उतरेगी? अगर मैं निद्रा ही हूं तो मुझ पर स्वर्णों की तरंगें कैसी बनेंगी? ये तीन अवस्‍थाएं हैं, और जो मैं हूं वह निश्चित ही चौथा होना चाहिए। उपनिषद उसे तुरीय कहते हैं, वह जो चौथा है।
और मनुष्य के चित्त की इन चार दशाओं की चर्चा सबसे पहले जगत में उपनिषद के ऋषियों ने की है। पश्चिम के मनोविज्ञान ने अभी सौ वर्षों में सिर्फ नंबर दो पर कदम रखा है। सौ वर्षों में—सिर्फ पिछले सौ वर्षों में—पश्चिम के मनोविज्ञान को खयाल आया कि मनुष्य को जाग्रत ही समझने की कोशिश खतरनाक है और आमूल गलत है। क्योंकि आदमी जितनी देर जागता है, वह सिर्फ एक अंग है। फिर सोता भी है, फिर स्वभ भी देखता है। और चारकाट से लेकर फ्रायड तक पश्चिम ने बड़ी मेहनत की इस बात की कि हम मनुष्य के स्वम्नों के संबंध में जब तक न जान लें, तब तक मनुष्य के संबंध की जानकारी हमारी अधूरी होगी। और जब फ्रायड मनुष्य के स्वप्नों की गहराइयों में उतरा, तो उसने कहा, मनुष्य के जागने पर भरोसा ही मत करना, क्योंकि आदमी जागकर धोखा देता है। सपने से जो जाना जाता है, वही सत्य है।
इसलिए आज मनोविश्लेषक आपके जागने की फिक्र नहीं करता। वह आपसे पूछता है, आप स्वभ कौन से देखते हैं? क्योंकि स्वम्न में आप धोखा नहीं दे सकते। जागने में आप दूसरे को ही नहीं, अपने को भी धोखा दे सकते हैं। जागने में आप ब्रह्मचारी हो सकते हैं, लेकिन स्वप्न आपके ब्रह्मचर्य की सारी पट्टी उधेड़ देगा और आपके व्यभिचार को प्रकट कर देगा।
इसलिए तथाकथित ब्रह्मचारी नींद से डरते हैं, सोने से भयभीत होते हैं, क्योंकि उनकी सब साधना जागरण के दरवाजे पर रखी रह जाती है। स्वप्न में उनका कुछ वश नहीं चलता। छोटे —मोटे साधक नहीं, जिन्हें हम बड़े साधक कहें, जो नीति को ही साधकर चलते हैं, उनके लिए यह कठिनाई बनी ही रहेगी। जो योग को बिना जाने, धर्म को बिना जाने, केवल नैतिक आचरण में ही अपने जीवन को लगा देते हैं, उनको यह झंझट रहेगी।
महात्मा गांधी जैसे साधक को भी अंततः यह कहना पड़ा कि जागने में ही मैं अपने संयम को साध पाता हूं स्वप्न में तो मेरा संयम टूट जाता है। स्वभ में मेरे संयम पर मेरा कोई काबू नहीं रहता।
लेकिन स्वप्न में अगर संयम टूट जाता है, तो संयम अभी ऊपरी है। क्योंकि जो संयम स्वभ तक को नहीं जीत पाता, वह सत्य को क्या जीत पाएगा? जो संयम स्वप्न तक से पराजित हो जाता है, उस संयम की सत्य में क्या गति हो सकेगी? बहुत निर्बल है, बहुत ऊपरी है, बहुत झीनी चादर की तरह है। भीतर सब रोग छिपे रहते हैं, ऊपर हम चादर की सजावट कर लेते हैं। श्रृंगार है।
फ्रायड ने मनुष्य के चित्त को ठीक से समझना हो, तो उसके स्वप्न को जानना अनिवार्य बना दिया। अब पश्चिम का पूरा मनोविज्ञान आदमी के संबध में जो भी जानकारी पा सका है, वह उसके सपनों के द्वारा है। यह बहुत उलटा मालूम पड़ता है कि आपकी सचाई आपके सपने से पता चले। हद हो गई! आपकी सच्चाई और आपके सपनों में खोजनी पड़े!
आदमी ने अपने को निश्चित ही इतना धोखा दे दिया है, जागना इतना भ्रांत और झूठ हो गया है कि सोए बिना आपके भीतर क्या चलता है, इसका कुछ भी पता चलना मुश्किल है। आपको ही पता नहीं चलता, दूसरे को पता चलना तो अति कठिन है।
लेकिन अभी पश्चिम का मनोविज्ञान सिर्फ दूसरी अवस्था पर गया है—वेकिंग एंड ड्रीमिंग। अभी

असार बोध, अहं विसर्जन और तुरीय तक यात्रा—चैतन्य और साक्षीत्व से

डीप स्लीप पर सिर्फ दस साल में काम शुरू हुआ है। वह जिसे सुषुप्ति कहते हैं उपनिषद के ऋषि, केवल पिछले दस वर्षों में—केवल पिछले दस वर्षों में, ऋषि के वचन तो हजारों वर्ष पुराने हैं—केवल दस वर्षों में स्लीप लैब अमरीका में बने हैं, प्रयोगशालाएं बनी हैं, जहां आदमियों की स्वम्परहित निद्रा पर प्रयोग चल रहे हैं।
कोई दस हजार लोगों पर अभी इन दस वर्षों में प्रयोग किए गए हैं। प्रयोगशालाएं हैं, जिनमें लोग रातभर सोते हैं। और हजारों तरह के यंत्रों से जांच की जाती है कि उनका स्वप्न क्या है? और जब स्वान समाप्त हो जाता है, तो निद्रा की स्थिति में उनकी मन की तरंगें, बेक कैसी होती हैं? उनके चित्त की, चेतना की दशा कैसी होती है? भीतर वे किन गहराइयों में उतर जाते हैं? निद्रा क्या हे? क्योंकि जब स्वर न से इतना पता चल सका कि हम मनुष्य को जानने में ज्यादा सफल हुए, तो शायद निद्रा से और गया: सत्यों का पता चले।
तो तीसरी अवस्था पर पश्चिम का मनोविज्ञान गहन प्रयोगों में लगा है। पश्चिम में सिर्फ पिछले दस वर्षों में निद्रा के ऊपर पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, इसके पहले नहीं। आदमी सोता सदा से रहा है। और एक आदमी आठ साल जीता है, तो बीस साल सोता है। इतने बड़े हिस्से को अज्ञात छोड़ देना महंगा है। जहां हम अपने जीवन के बीस वर्ष गुजारते हैं, उस अवस्था का हमें कुछ भी पता न हो, तो हम अपने आत्मज्ञान में गति नहीं कर सकते हैं।
लेकिन अभी प्राथमिक चरण है। निद्रा की खोज पश्चिम में पहले कदम पर है। लेकिन ऋषि श्री न की बात करते हैं। वे कहते हैं, निद्रा भी ठीक, पर उसके भी पार एक है, जो इन तीनों से गुजरता है। ये तीनों तो सिर्फ उसकी स्थितियां हैं। ये स्टेशन्स हैं कहें। एक आदमी गुजरता है, एक स्टेशन से दूसरे, दूसरे से तीसरे। और वह आदमी समझ ले कि मैं यही स्टेशन हूं फिर समझ ले दूसरे स्टेशन पर कि मैं यही स्टेशन हूं, फिर तीसरे पर कि मैं यही स्टेशन हूं तो भ्रांति होगी। उपनिषद के ऋषि कहते हैं, जो स्टेशनों को पार कर रहा है, वह यात्री स्टेशनों से अलग है। जागते हैं, वह एक स्थिति है। स्वप्न देखते हैं, वह दूसरी स्थिति है। सो जाते हैं, वह तीसरी स्थिति है। लेकिन जिसकी ये स्थितियां हैं, वह इन तीनों के पार चौथा, तुरीय, द फोर्थ, वह चौथा है, वह यात्री है। ये तो केवल पड़ाव हैं।
पश्चिम के मनोविज्ञान को शायद अभी और सैकड़ों वर्ष लगेंगे, जब वह तुरीय की खबर ला पाए। लेकिन अब तो इतना तो उन्हें भी खयाल होने लगा और कार्ल गुस्ताव कं ने स्वीकार किया है कि जब भारतीय मनीषा के इस सत्य को हम पहले कभी स्वीकार नहीं कर पाए थे कि स्वप्न का भी कोई मूल्‍य हो सकता है, फिर हमें वह स्वीकार कर लेना पड़ा। फिर हमें कभी खयाल भी नहीं था कि निद्रा का भी कोई मूल्य हो सकता है, वह भी हमें स्वीकार कर लेना पड़ा। ज्यादा देर नहीं लगेगी, कि जिनके तीन चरण हमें स्वीकार कर लेने पड़े, उनके चौथे चरण को भी हमें स्वीकार करना पड़े। क्योंकि जो तीन तक सही निकप्ने हैं, कोई कारण नहीं मालूम होता कि वे चौथे पर क्यों सही न हों। और जब इतने तक वे सही निकले हैं, तो चौथे पर सही होने की संभावना गहन हो जाती है और गलत कहने की हिम्मत क्षीण हो जाती है।
यह ऋषि कह रहा है कि वह जो ब्रह्म है, तुरीय, वह जो चौथी अवस्था है, वही संन्यासी का यज्ञोपवीत है। वहू उस चौथी अवस्था को ही अपने गले में डालकर जीता है। वही उसकी शिखा है। इससे कम, इससे कम पर संन्यासी राजी नहीं है। यज्ञोपवीत ही डालना है, तो वह तुरीय अवस्था का डाल लेगा। वह तीनों के पार हट जाएगा और अपने को चौथे के साथ एक कर लेगा।
इसे थोड़ा प्रयोग करेंगे तो ही खयाल में आ सकेगा कि यह कैसा यज्ञोपवीत है।
जब जागे तब ऐसा मत समझें कि मैं जाग रहा हूं तब ऐसा ही समझें कि जागरण मेरे ऊपर आया, मैं देख रहा हूं। बी ए विटनेस टु इट। साक्षी हों, एक मत हो जाएं। अगर आप दिनभर जागकर यह साक्षीभाव रख सकें कि यह जागरण भी एक स्थान है, जहां मैंने पड़ाव डाला, मैं यात्री हूं यह स्थान है, पड़ाव है, तो धीरे—धीरे आप स्वम्न में भी यह स्मरण रख पाएंगे कि स्वम्न भी एक पड़ाव है और मैं एक यात्री हूं। और फिर निद्रा में भी इस साक्षीभाव का प्रवेश किया जा सकता है। तब आप यह भी जान पाएंगे कि निद्रा मुझ पर आती और जाती है, मैं पृथक हूं। और जब आप तीनों से अपने को पृथक जान पाएंगे, तभी वह यज्ञोपवीत आपके गले में पड़ता है, जो तुरीय ब्रह्म का है।
लेकिन हम, जो हमारे ऊपर आता है, उसी के साथ एक हो जाते हैं। जो लहर हमें पकड़ लेती है, हम उसी के साथ एक, हम उसी से रंग जाते हैं। भूल ही जाते हैं कि रंग हमारे ऊपर पड़ा, हम रंग से पृथक हैं। जुड़ जाते हैं तत्काल।
हमारी हालत ऐसी है, जैसी कि फोटो प्लेट की होती है। कैमरे के भीतर जो फोटो प्लेट है या फोटो फिल्म है, हमारी हालत वैसी है। जरा सा झांक लेती है कैमरे के बाहर, जो दिख जाता है, उसी को पकड़ लेती है। जरा, सेकेंड के भी छोटे से हिस्से के लिए कैमरे का पर्दा हटता है, आंख खुलती है; और वह जो भीतर छिपी फोटो प्लेट है, वह जो भी बाहर दिख जाता है—दरख्त तो दरख्त, झील तो झील, आदमी तो आदमी—जो भी दिख जाता हैं, उसे पकड़ लेती है। उसी के साथ एक हो जाती है। इसीलिए तो फोटो उतर पाता है, नहीं तो फोटो नहीं उतर पाएगा। फिर आप तस्वीर लिए फिरते हैं और कहते हैं, झील की तस्वीर है। झील की तस्वीर है माना, लेकिन यह जो फिल्म का टुकड़ा है, यह बड़ी भ्रांति में पड़ गया। यह जो था, वह न रहा; और जो यह नहीं है, उसको पकड़ लिया।
संन्यासी जीता है दर्पण की भांति, फोटो प्लेट की भांति नहीं। दर्पण के सामने जो भी आता है, दिखाई पड़ता है, हट जाता है, हट जाता है; दर्पण फिर खाली हो जाता है। दर्पण पकड़ता नहीं, रिफ्लेक्ट जरूर करता है। प्रतिबिंब जरूर बनाता है, लेकिन पकडता नहीं। सब तस्वीरें फिसलकर नीचे गिर जाती हैं और दर्पण अपने स्वभाव में थिर रहता है।
इसीलिए दर्पण एक ही को देखकर खराब नहीं होता, फोटो प्लेट एक को ही देखकर खबर हो जाती है। दर्पण हजार को भी देखकर निर्मल बना रहता है। पकड़ता ही नहीं, तो विकृत होने का कोई सवाल नहीं है।
हम भी फोटो प्लेट की तरह हैं। जो भी सामने आ जाता है, उसी को पकड़ लेते हैं। जागरण होता है तो समझ लेते हैं कि मैं जागरण, स्वप्न होता है तो समझ लेते हैं कि मैं स्वभ, निद्रा होती है तो समझ लेते हैं कि मैं निद्रा, जन्म होता है तो समझ लेते हैं कि मैं जीवन, मृत्यु होती है तो समझ लेते हैं कि मैं मुर्दा। बस ऐसे ही चलते हैं। जो भी, वह पकड़ लेते हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन एक मरघट के करीब से गुजर रहा है। साझ हो गई है और डर उसे लग रहा है। गांव अभी दूर है। तभी उसने देखा कि दूर से कुछ लोग चले आ रहे हैं, बैंड—बाजे हैं। वह डरा और भी, कोई लुटेरे तो नहीं हैं! दीवार थी मरघट की, छलांग लगाकर उस तरफ चला गया कि छिप जाए। नई कोई कब खुदी थी, अभी आया तो नहीं था मेहमान उस कब का। सोचकर कि इसमें लेट जाए यह भीड़—भाड़ निकल जाए उपद्रवियों की जो बाहर से गुजर रहे हैं, फिर अपने घर लौट जाएगा, उसमें लेट गया। रात सर्द थी, थोड़ी देर में हाथ—पैर ठंडे होने लगे। किताब में पढ़ा था उसने कि आदमी जब मरता है, तो हाथ —पैर ठंडे हो जाते हैं। सोचा कि गए। मर गए। जब सोचा कि मर गए तो हाथ—पैर और ठंडे होने लगे।
तभी उसे खयाल आया, लेकिन अभी सांझ का भोजन नहीं किया। कम से कम भोजन तो कर ही लेना चाहिए मरने के पहले। तो वह उचककर कब के बाहर निकला। दीवार कूदकर अपने घर की तरफ भागता था, तो वहां वह जो यात्री दल आया था, उसने अपने ऊंट बांधे थे, वह विश्राम की तैयारी कर रहा था। उसके कूदने से ऊंट भड़क गए, भगदड़ मच गई, लोगों ने उसकी पिटाई की।
पिटा—कुटा घर पहुंचा। पत्नी ने कहा, बड़ी देर लगाई, कहां रहे? मुल्ला ने कहा, यह कहो किसी तरह लौट आए। मर गए थे। पत्नी मन में तो हंसी, फिर भी उसने जिज्ञासावश पूछा कि मर गए थे, मरने का अनुभव कैसा हुआ! मुल्ला ने कहा, मरने में तो कोई तकलीफ नहीं, अनलेस यू डिस्टर्ब देअर कैमल्स। जब तक उनके ऊंटों को तुम गड़बड़ मत करो, तब तक तो बड़ा शांत। लेकिन ऊंट गड़बड़ करो कि सब गड़बड़, बड़ी पिटाई होती है। तो अगर तू मरे, तो एक बात का ध्यान रखना, मुल्ला ने अपनी पत्नी से कहा कि ऊंट भर गड़बड़ मत करना। मौत में तो कोई खतरा ही नहीं है। हम पूरा अनुभव करके आए, कब में लेटकर आ रहे हैं। वह तो हम लौटते भी नहीं, लेकिन सांझ का खाना नहीं लिया था, इसलिए लौट आए। तो एक ध्यान रखना सदा, ऊंट कभी गड़बड़ मत करना।
अप्रासंगिक जो है, इरेलेवेंट जो है, जिसकी कोई संगति भी जीवन की धारा से नहीं है, वह भी पकड़ जाता है। और हमारे भीतर कॉजू और अफेक्ट बन जाता है। ऐसा लगता है कि कार्य—कारण का संबंध है। ऊंट का और मौत से कोई लेना—देना नहीं, लेकिन सिलसिला तो है। मुल्ला ने जिसे मृत्यु समझी उसी के बाद ऊंट गड़बड़ हुए और वह पिटा। मन ने सब पकड़ लिया और सबका तादात्म्य हो गया। सब इकट्ठा जुड गया। जिंदगीभर हम इसी तरह की चीजें जोड़े चले जाते हैं, जोड़े चले जाते हैं। आखिर में यह जो संघट हमारे पास इकट्ठा हो जाता है, यह जो लंबी फिल्म इकट्ठी हो जाती है, इसमें दर्पण जैसा कुछ भी नहीं होता। सब गंदा होता है, सब बिगड़ गया होता है, सब पर धूल जम गई होती है।
इस धूल से भरे हुए मन के साथ हम तुरीय को न जान सकेंगे। वह जो चौथी अवस्था है, वही जान जाएगा, जो दर्पण की तरह रहने में समर्थ है और जो प्रतिपल अपने दर्पण को साफ करता रहता है और पोंछता रहता है और धूल को जमने नहीं देता। जो किसी चीज को अपने दर्पण पर नहीं जमने देता, हमेशा झाडू—पोंछकर दर्पण को साफ रखता है, तो निश्चित ही धीरे— धीरे तीन के पार चौथे का अनुभव शुरू हो जाता है। वही, वही दर्पण की चेतना वाला व्यक्ति संन्यासी है, जिसने चौथे को जाना है।
हमें तो सपने में भी याद नहीं रहता कि हम अलग हैं। सपने के साथ एक हो जाते हैं। इतने एक हो जाते हैं, जिसका हिसाब नहीं है। सपने में आपको कभी याद नहीं रहता कि आप कौन हैं। सपने में यह भी पता नहीं रहता कि यह जो मैं कर रहा हूं, यह मैंने जागने में किया होता! सपने में असंगति भी दिखाई नहीं पड़ती। एक मित्र चला आ रहा है और अचानक आप देखते हैं कि मित्र घोड़ा हो गया, तो पूरी आपके मन में यह सवाल नहीं उठता कि यह आदमी एकदम से घोड़ा कैसे हो गया! सपने में यह भी स्वीकार हो जाता है। एक क्षण को झपकी लगती है, वर्षों के सपने देख लेते हैं। आंख खुलती है, घड़ी में क्षण ही बीता होता है, लेकिन सपने में वर्ष—वर्ष बीत गए मालूम होते हैं। सपने में याद नहीं रह जाता आपको उसका, जो आप जागे हुए थे। वह द्वार बंद हो गया।
कपार्टमेंट्स हैं। जागने के बाद जैसे ही आप सपने में गए, जागने का द्वार बंद हो गया। जागने के सब तर्क, जागने की सब विचारधारा, सब समाप्त हो गई। स्वप्न की दूसरी दुनिया शुरू हुई। अब आप उससे आइडेंटीफाई हो जाते हैं, उसके साथ एक हो जाते हैं। अब आप एक दूसरी दुनिया के साथ एक हैं। वह दुनिया मिट गई।
अगर आप राजा थे, तो भिखारी हो सकते हैं सपने में, इससे कोई अड़चन न आएगी। और अगर रंक थे, तो राजा भी हो सकते हैं सपने में, इससे भी कोई अड़चन न आएगी। कोई कोना चेतना का यह न कहता हुआ मालूम पड़ेगा कि मैं तो राजा था जागकर, यह भिखारी कैसे हो गया! यह नहीं हो सकता। नहीं, याद ही नहीं आएगा। वह द्वार बंद हो गया। वह स्मृति का पर्दा गिर गया। वह नाटक का अंक समाप्त हुआ। यह दूसरी बात शुरू हो गई। अब आप इसमें ही एक हो गए।
फिर यह सपना भी छूट जाता है। गहरी नींद आ जाती है। तब तीसरी दुनिया में आप प्रवेश कर जाते हैं। गहरी निद्रा में जो होता है, वह आपको कुछ भी याद नहीं रह जाता। सपने में भी जो होता है, वह भी पूरा याद नहीं रह जाता। बहुत आशिक, एक या दो प्रतिशत। वह भी दस—पंद्रह मिनट से ज्यादा याद नहीं रहता सुबह जागने के बाद। थोड़ी सी ओवरलैपिंग हो जाता है। आखिरी सपना सुबह जो चलता होता है, उसकी थोड़ी सी आवाज गूंजती रह जाती है और जागना हो जाता है। तो थोड़ी सी याददाश्त रह जाती है।
इसलिए जो सपने आप सुबह लौगों को बताते हैं कि आपने देखे, बहुत भरोसे से मत बताना कि आपने देखे। बहुत सा तो उसमें आपने सोच लिया बाद में, जो देखा नहीं था। बहुत सा आप भूल गए, जो देखा था। इसलिए सुबह सपने बहुत ही ऐसे मालूम पड़ते हैं कि ये कैसे हो सकते हैं! उनके बहुत से हिस्से छूट गए, भूल गए, स्मृति के बाहर हो गए।
असल में ड्रीम मेमोरी अलग है, आपके भीतर स्वप्न की स्मृति अलग इकट्ठी होती है। जागने की स्मृति अलग इकट्ठी होती है। निद्रा की स्मृति अलग इकट्ठी होती है। और तीनों स्मृतियों का बहुत बाउंड्री पर ही, सीमांत पर ही मिलन होता है, अन्यथा कोई मिलन नहीं होता है। आपको गहरी नींद के बाद इतना ही याद रह जाता है कि खूब अच्छी नींद आई, और कुछ याद नहीं रह जाता।
लेकिन जो इन तीन खंडों से गुजरता है, वह चौथा? उसकी तो हमें बिलकुल ही स्मृति नहीं है। उसका तो हमें कोई खयाल ही नहीं है।
उसका खयाल इसीलिए नहीं है कि जब भी जो हमारे सामने होता है, उसी के साथ हम एक हो गए होते हैं। उसकी स्मृति तो तभी आएगी, कि जो हमारे सामने हो, उसके साथ हम अपनी पृथकता को कायम रख पाएं। तो जो भी देखें, जो भी जाने, जो भी अनुभव करें, उसके साथ एक दूरी को बनाए रखें, तो यह संन्यास की स्थिति कभी अनुभव में आएगी, जहां तुरीय ब्रह्म ही यज्ञोपवीत, तुरीय ब्रह्म ही शिखा हो जाता है।
ऋषि ने कहा है, चैतन्यमय होकर संसार—त्याग ही दंड है।
चैतन्यमय होकर संसार—त्याग! क्रोध में भी संसार का त्याग होता है, दुख में भी संसार का त्याग होता है, चिंता में भी संसार का त्याग होता है, लेकिन वह संन्यास नहीं है। आपका दिवाला निकल गया है, बैंक्रप्ट हो गए हैं, संन्यास का मन होने लगता है कि संन्यास ही ले लें, संसार में कोई सार नहीं। कल तक बिलकुल सार था। और बैंक्रप्ट होने से संसार का सार कैसे सूख गया, कुछ समझ में आता नहीं। क्योंकि आपके बैंक्रप्ट होने या न होने पर संसार के रस की कोई निर्भरता नहीं है। फूल अब भी वैसे ही खिल रहे हैं, सूरज अब भी वैसा ही चल रहा है, जिंदगी अपना गीत अब भी वैसे ही गाए जाती दो, नाच—रंग सब वैसा ही चल रहा है, सिर्फ आप दिवालिया हो गए हैं, तो आपको बड़ा विरस हो गया है।
रामकृष्ण कहा करते थे कि एक आदमी काली की पूजा के अवसर पर सैकडों बकरे कटवाता था, बडी पूजा करवाता था। फिर पूजा धीरे—धीरे उसने बंद कर दी। काली की पूजा के दिन अब भी आते। लेकिन उत्सव उसने समाप्त कर दिया। रामकृष्ण ने एक दिन उससे पूछा कि बात क्या है? उसने कहा, अब दांत ही न रहे! तो रामकृष्ण ने कहा कि वह काली की पूजा चलती थी कि दातों की? रामकृष्‍ण ने पूछा कि वह पूजा किसकी चलती थी? वह इतने बकरे कटते थे! हम तो यही समझे कि काली के लिए कटते हैं। उसने कहा, आप बिलकुल गलत समझे। काली तो सिर्फ बहाना थी, कटते तो अपने ही लिए थे। अब दांत ही न रहे।
आपके दांतों के साथ सारी दुनिया बदल जाती है। संन्यास नहीं है लेकिन वह, वह तो केवल शिथिलता है। वह तो खंडहर हो जाना है। वह तो केवल हार जाना है, पराजित हो जाना है। वह तो जिंदगी ने खुद ही आपसे छीन लिया सब। संन्यास त्याग है और जब जिंदगी ही छीन लेती है, तब त्याग का क्‍या सवाल है? आप खुद ही बैंक्रप्ट हैं। जिंदगी ने आपको दिवालिया कर दिया। अब आप त्याग की बातें करें, बेमानी है। अब कोई अर्थ नहीं है। लेकिन आदमी होशियार है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक बैलगाड़ी में बैठकर किसी गांव के पास से गुजर रहा है। साथ में उसका मित्र है, वह भी दुकानदार है। डाकुओं ने हमला कर दिया। मुल्ला ने कहा, एक मिनट रुको। खीसे से रूपये निकाले, अपने साथी को कहा कि ये पांच हजार रुपए तुझे मुझे देने थे, ले। हिसाब पूरा हो गया। डाकुऔ से कहा, अब जो तुम्हें करना है, करो। अब कोई डर न रहा।
छिनने का भी मौका आ जाए, छिन जाने का भी मौका आ जाए, तो भी हम कोशिश करते हो कि जैसे त्याग कर रहे हैं। लुट जाने का क्षण आ जाए, तो भी हम ऐसा दिखावा करते हैं कि हम लूटे नहीं, दान कर दिया है।
नहीं, ऋषि कहता है, चैतन्यमय होकर जिन्होंने संसार को छोडा। चैतन्यमय होकर! दुखमय होकर नहीं, क्रोध से भरकर नहीं, परेशान—पीड़ित होकर नहीं, पूरे आनदभाव से, लेकिन होश से जब उन्‍होंने देखा जिंदगी को कि वह बेकार है। यह बेकार होना किसी बाहरी कारण से नहीं, भीतरी बोध से।
यह बेकार होना दो तरह से हो सकता है। बहुत लोग कहते सुने जाते हैं कि धन में क्या रखा है! लेक्नि अक्सर ये वे ही लोग होते हैं, जिनके पास धन नहीं होता। इनकी बात का कोई भी बहुत अर्थ नहीं है। यह मन का समझाना है, कंसोलेशन है। यह बार—बार इनका कहना कि धन में क्या रखा है! और धन इनके पास है नहीं, इन्हें धन का पता भी शायद कुछ नहीं है। शायद धन में कुछ नहीं रखा है, ऐसा बार—बार कहकर अपने को भरोसा दिला रहे हैं कि अपन कुछ चूक नहीं रहे, अगर धन अपने पास नहीं है।
नहीं, जब किसी के पास धन है और वह कहता है, धन में क्या रखा है, तब इस बात के आमूल अर्थ बदल जाते हैं। आमूल ही अर्थ बदल जाते हैं। परिस्थिति प्रतिकूल हो, तब जो त्याग होता है, वह त्याग सम्यक त्याग नहीं है। परिस्थिति जब बिलकुल अनुकूल हो, तब जो त्याग होता है, वह सम्यक त्याग है। संसार को जिन्होंने पीडित होकर छोड़ दिया है, वे संसार से बंधे ही रह जाते हैं। क्योंकि जिससे हमें पीड़ा मिल सकती थी, अभी हम उसका त्याग नहीं कर सकते हैं।
इसे थोड़ा समझना पड़े। जिससे हमें पीडा मिल सकती थी, वह मिलती ही इसीलिए थी कि हमें अब भी उससे सुख पाने की अपेक्षा थी। अन्यथा पीड़ा का कोई कारण न था। इसीलिए जो जानता है, वह यह नहीं कहता कि संसार दुख है; वह कहता है, संसार असार है। इन दोनों में बड़ा फर्क है। वह यह नहीं कहता कि दुख है; वह कहता है, दुख के योग्य भी नहीं है। क्योंकि जिससे सुख मिल ही नहीं सकता, उसे दुख कहने का क्या अर्थ है। जिससे सुख मिलने की आशा बंधी है और नहीं मिलता, उससे लगता है कि दुख मिला।
जो जानता है, भीतर बोध जिसका जगता है, चैतन्यमय हो जाता है, वह देखता है, संसार असार है। इतना भी सार नहीं कि वह दुख दे सके—टोटली मीनिंगलेस। इतना भी अर्थ नहीं उसमें, दुख देने जैसा। क्योंकि जो दुख दे सकता है, वह सुख क्यों नहीं दे सकता!
जिससे दुख मिल सकता है, उससे कम दुख भी मिल सकता है, ज्यादा दुख भी मिल सकता है। जिससे दुख मिल सकता है, उससे सुख क्यों नहीं मिल सकता! क्योंकि कम दुख, और कम दुख, और कम दुख सुख हो जाता है। और कम सुख, और कम सुख, और कम सुख दुख हो जाता है। तारतम्यताएं हैं, डिग्रीज हैं। पानी को थोड़ा और कम ठंडा करो, गर्म हो जाता है। पानी को थोड़ा और कम गर्म करो, ठंडा हो जाता है। गर्मी और सर्दी कोई शत्रु नहीं मालूम होते, तारतम्यताएं, डिग्रीज मालूम होते हैं। सुख—दुख भी ऐसे ही हैं
अगर कोई कहता है, संसार से बहुत दुख मिलता है इसलिए छोड़ दो, तो गलत कहता है। क्योंकि बहुत दुख जिससे मिलता है, उससे सुख मिल क्यों नहीं सकता! कोई कारण नहीं है। जिससे दुख मिल सकता है, उससे सुख मिल सकता है। क्योंकि जिससे सुख मिल सकता है, उससे दुख मिल सकता है। असल में सुख की आशा जहां है, वहीं दुख मिलता है। दुख मिलता ही इसलिए है कि उससे पहले सुख की आशा खड़ी थी।
नहीं, संसार असार है—जस्ट मीनिंगलेस। दुख भी नहीं है वहं।, सुख भी नहीं है वहा। वहां कुछ है ही नहीं। वहा जो भी हम देखते हैं, वह हमारा ही डाला हुआ है। वहां जो भी हम पाते हैं, वह हमारी ही देन है। वह हमने ही दिया है। संसार से जो भी हम पाते हैं, वह हमारी ही प्रतिध्वनि है।
इसलिए दुख के कारण जो छोड़ दे—प्रियजन मर गया हो, कि प्रियजन न मिल पाया हो, कि प्रियजन प्रिय सिद्ध न हुआ हो, वह आदमी संसार छोड़ दे—उसका छोड़ना स्युसाइडल है; रिनसिएशन नहीं, त्याग नहीं, आत्मघात है। आत्मघात जैसा है। जब धन नहीं होता, तो आदमी आत्महत्या करने की सोचने लगता है। प्रियजन बिछुड़ जाए, तो आत्महत्या की सोचने लगता है। प्रियजन प्रियजन सिद्ध न हो, तो आत्महत्या की सोचने लगता है। यश खो जाए, तो आत्महत्या की सोचने लगता है।
इसत्निए एक बहुत मजे की बात है कि जिन मुल्कों में संन्यासी ज्यादा होते हैं, उन मुल्कों में आत्महत्या की संख्या कम होती है। और जिन मुल्कों में संन्यासी कम होते हैं, उन मुल्कों में आत्महत्या की संख्या ज्यादा होती है। और दोनों का मिलाकर अनुपात सदा बराबर होता है।
अमरीका तब तक अपनी आत्महत्याए कम न कर पाएगा, जब तक कि वह संन्यास को न फैलाए। झूठा सही झूठा संन्यास भी आत्महत्या से तो रोक लेता है, क्योंकि विकल्प बन जाता है, आल्टरनेट। संन्यास लेने से भी आत्महत्या घटित हो जाती है। दुख है, परेशानी है, एक आदमी ने संन्यास ले लिया, मरने से भी बचे, संसार से भी बचे, बचे भी रहे।
लेकिन ऋषि कहता है, सम्यक संन्यास बाह्य कारणों से नहीं, आतरिक आविर्भाव, चैतन्य से होता है।
एक तो है बाहर की वस्तुओं से मिले हुए दुख के कारण आदमी सोचने लगता है। और ऐसा आदमी खोजना कठिन है जिसने कभी संन्यास के बाबत न सोचा हो। ऐसा आदमी ही खोजना कठिन है, जिसने कभी आत्महत्या के बाबत न सोचा हो।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हम जो —जो सोचते हैं, अगर करने लगें—जैसा कि कुछ लोग समझाते हैं कि जैसा विचार, वैसा आचरण—तो एक—एक आदमी को जिंदगी में कम से कम चार —चार दफे आत्महत्या करनी पड़े। यह हो तो नहीं सकता, क्योंकि एक ही दफे में खतम हो जाएगा। लेकिन अगर इसका कोई उपाय हो, तो एक—एक आदमी कम से कम, कम से कम, एवरेज, चार दफे आत्महत्या करे। जीवन तो रोज ऐसे मौके खड़े कर देता है, जब मन होता है कि खतम हो जाओ। वह तो और भी कमजोरियां हैं जो बचा लेती हैं।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने कमरे में फासी लगा रहे थे। पत्नी ने झांककर देखा और कहा कि नसरुद्दीन क्या कर रहे हो, यह क्या कर रहे हो? खड़े थे मेज पर। ऊपर रस्सी बंधी थी, कमर से रस्सी बंधी थी। पत्नी ने पूछा, यह क्या कर रहे हो? मुल्ला ने कहा, आत्महत्या कर रहे हैं। तो पत्नी ने कहा, लेकिन कमर में रस्सी? मुल्ला ने कहा, गले में बांधी तो बहुत सफोकेशन मालूम हुआ। पहले गले में बांधकर देखी थी, बहुत घबराहट होने लगी, इसलिए मैंने कमर में बांधी।
मरने के तो बहुत मौके आ जाते हैं, लेकिन सफोकेशन मालूम होता है। आदमी कमर में बाधकर निपटा देता है मौके। क्षणजीवी होते हैं भाव। फिर वापस खड़े हो जाते हैं अपनी दुनिया में। फिर सम्हल जाते हैं। फिर चलने लगते हैं।
दो बातें हैं। एक तो आब्जेक्टिव रिनसिएशन होता है, और एक सब्जेक्टिव रिनसिएशन। एक तो त्याग है जो वस्तुगत होता है, और एक त्याग है जो आत्मगत होता है। वस्तुगत त्याग वस्तु से हुई पीड़ा के कारण होता है। आत्मगत त्याग चैतन्य के बढ़ जाने के कारण होता है। इसलिए जो त्याग ध्यान के परिणामस्वरूप आता है, उसके अतिरिक्त और कोई त्याग त्याग नहीं है। क्योंकि ध्यान अकेली कीमिया है, जिससे आपकी चेतना बढ़ती है। ध्यान तेल है, जिससे भीतर की चेतना की ज्योति बड़ी और प्रखर होती है। ध्यान ईंधन है, जिससे भीतर की चेतना जगती है और आदोलित होती है।
चेतना भीतर बढ़ती है, तो जगत असार मालूम पड़ता है। अगर वस्तुओं के कारण आदमी त्याग की सोचता है, तो जगत दुखपूर्ण मालूम पड़ता है, पीड़ादाई मालूम पड़ता है। जगत शत्रु मालूम पड़ता है। जगत को छोड़ देने से सुख मिलेगा, ऐसा मालूम पड़ता है। लेकिन चैतन्य भीतर जगता है, तो जगत असार है। न उसे पकड़ने से सुख का कोई संबंध है, न उसे छोड़ने से सुख का कोई संबंध है।
ही, जगत चित्त से गिर जाए तो चित्त खाली हो जाता है—परमात्मा को झेलने और सम्हालने और देखने और पाने के लिए। भरा हुआ चित्त कैसे उसे जाने! जगह भी चाहिए भीतर, स्पेस चाहिए।
इतने बड़े मेहमान को बुलाते हैं, परमात्मा को, भीतर जगह नहीं, वहां कूड़ा—कबाड़ भरा हुआ है। वहा रत्तीभर जगह नहीं। परमात्मा कई दफे आपकी पुकार सुनकर चारों तरफ चक्कर लगाकर लौट जाता है। देखता है भीतर, भीतर कोई कबाड़ी की दुकान है! भीतर जगह ही नहीं है। आप खुद ही अपने भीतर घुसे, तो पता चलेगा। कितनी ही कोशिश करें, भीतर आप न पहुंच पाएंगे। इतना सब कचरा इकट्ठा किया हुआ है वहा कि वहां भीतर जगह भी तो चाहिए गति के लिए कोई।
इसीलिए तो आदमी बाहर रहता है। अपने दरवाजे पर गुजार देता है जिंदगी। क्योंकि भीतर जाए कौन, झंझट में पड़े कौन! और बाहर से सब कचरे को इकट्ठा करके भीतर डालता रहता है। खुद बाहर बैठा रहता है, कचरे को भीतर डालता रहता है। हिम्मत ही नहीं होती पीछे लौटकर देखने की भीतर।
जो लोग ध्यान में उतरना शुरू करते हैं, वे बहुत घबराते हैं। वे कहते हैं, हम अपने भीतर ऐसी चीजें देख रहे हैं, जो हमने सोची भी नहीं थीं कि हमारे भीतर हो सकती हैं। हैं ही, सोची नहीं थीं, भलीभांति जानते थे। आपने ही डालीं, क्योंकि वहां कुछ ऐसा नहीं हो सकता जो आपके बिना डाले हो। यह बात दूसरी है कि डाले बहुत देर हो गई हो, जन्म—जन्म हो गए हों। डाली आपने ही हैं। अभी भी डाल रहे हैं। अभी भी डाल रहे हैं।
अगर कोई आदमी किसी की निंदा सुनाने लगे तो चेतना ऐसी सजग हो जाती है, जीवन में रस आ जाता है, कान फैल जाते हैं, सजग हो जाते हैं, फिर बैंड—बाजे भी बजते रहें दुनिया में, वह सुनाई नहीं पड़ते। और वह आदमी फुसफुसाकर बोले, तो भी सुनाई पडता है।
मुल्ला नसरुद्दीन तो कहता था कि अगर ज्यादा लोगों को सुनवाना हो बात, तो कान में फुसफुसाकर बोलो, तो ज्यादा लोग सुनेंगे ही। जब तुम फुसफुसाते हो, तो दूसरा आदमी समझता है, जरूर कोई उपद्रव की बात आ रही है, सुनने जैसी है।
हम चारों तरफ से कचरा इकट्ठा करते हैं, बटोरते हैं। अगर कोई हीरा देने आए, तो हम मानेंगे नहीं कि यह हीरा है। हम कहेंगे, ले जाओ, नासमझ समझा है हमें? कोई ऐसा हीरा देने आता है? कोई कचरा देने आए, तो हमारी बांहें फैली हैं, हम बिलकुल तैयार हैं। हम सब एक—दूसरे के मन में कचरा डालते रहते हैं हजार—हजार उपाय से। पैसा भी खर्च करके आदमी अपने भीतर कचरे का इंतजाम करवाता है। कभी फिल्म देखता है, कभी कोई डिटेक्टिव नावेल पढ़ता है। न मालूम क्या—क्या आदमी करता है और किस—किस तरह से कचरा बटोरता है! अगर हम उसके कचरे बटोरने के श्रम का हिसाब रखें, तो कहना पड़ेगा कि आदमी एक चमत्कार है।
फिर भीतर जाने को जगह नहीं मिलती। और हम परमात्मा को बुलाते हैं, बहुत कठिन हो जाता है। भीतर जाना हो, तो भीतर खाली होना जरूरी है। और खाली वही हो सकता है, जो संसार को अपने भीतर प्रवेश न करने दे।
संन्यासी का सूत्र आपसे कहता हूं। संन्यासी भी संसार में रहता है और गृहस्थ भी संसार में रहता वै?। लेकिन एक बात में फर्क है। संन्यासी संसार में रहता है, लेकिन संसार संन्यासी में नहीं रहता। गृहस्थ भी संसार में रहता है, लेकिन संसार भी गृहस्थ में रहता है। अपने भीतर भरता चला जाता है सब। संन्यासी घूमता है, इन्हीं रास्तों पर चलता है, इन्हीं रास्तों पर बुद्ध गुजरते हैं, लेकिन इन रास्तों की धूल उन्तें नहीं छूती। इन्हीं बाजारों से महावीर भी गुजरते हैं, लेकिन बाजारों की ध्वनियां उनके कानों में प्रवेश नहीं करतीं।
झेन फकीर लिंची कहता था, जिस दिन तुम पानी में चलो और पानी तुम्हें न छू पाए, समझना कि तुम संन्यासी हो गए। इसीलिए कहता था कि संसार में चलो और संसार तुम्हें न छू पाए, तुम्हारे भीतर प्रवेश न कर पाए।
ऋषि कहता है, चैतन्यमय होकर जो संसार का त्याग करते हैं।
जिनके भीतर बोध इतना जग जाता है कि उस बोध के कारण जो कचरा है वह कचरा दिखाइ पड़ गया लगता है, फिर उसे सम्हालने की जरूरत नहीं रह जाती, हाथ से छूट जाता है और गिर जाता है। त्‍याग किया नहीं जाता, त्याग हो जाता है ज्ञान में। अज्ञानी त्याग करता है। ज्ञानी से त्याग होता है। इट जस्‍ट हैपेन्स विदाउट एनी एफर्ट। बिना किसी प्रयत्न के घटित होता है।
बुद्ध घर छोड्कर जा रहे हैं। उनका सारथी उनसे कहता है, ऐसा सुंदर महल, ऐसी प्रीतिकर पानी, नवजात शिशु, ऐसा साम्राज्य, सब सुख—सुविधाएं छोड्कर कहां जाते हो तुम? लौट चलो। तो सुद्ध ने कहा है, लौटकर पीछे देखता हूं? मुझे कोई महल दिखाई नहीं पड़ता, सिर्फ आग की लपटें दिखाई पड़ती हैं। लौटकर पीछे देखता हूं, मुझे कोई सुंदर प्रीतिकर पत्नी दिखाई नहीं पड़ती, सिर्फ अपने ही मोह का फैलाव मालूम पड़ता है। मुझे कोई साम्राज्य दिखाई नहीं पड़ता, सिर्फ भविष्य में हो जाने वाले खंडहर दिखाई पड़ते हैं।
तो बुद्ध त्याग करके नहीं जा रहे हैं, क्योंकि जिसे लपटें दिखाई पड़ रही हों महल में, उसे त्याग नहीं करना पड़ता, त्याग हो जाता है। आपसे भी हो जाए अगर लपटें दिखाई पड़े।
आपके घर में आग लग जाए, फिर आप घर का त्याग करते हैं? फिर ऐसे भागते हैं कि घर कहीं पकड़ न ले। कहीं रोक ही न ले कि जरा ठहरो! इतने दिन साथ दिया, कहां जाते हो? द्वार—दरवाजे बंद न कर दे घर। वह तो घर को आपसे कोई लगाव नहीं है, नहीं तो आग लग जाए, तो निकलने न दे बाहर कि अब जाते कहां हो! साथी का पता तो दुख में ही पड़ता है। अब मौका आया तो भाग रहे हो। यही तो अवसर है, पलायन करते हो, एस्केपिस्ट हो? रुको! तो घर को आपसे कोई मोह नहीं है। वह बड़ा प्रसन्न होता है कि चलो, मौका मिला, यह सज्जन गए। लेकिन आग लगी हो, तो फिर आपको छोड़ना नहीं पड़ता, छूट जाता है।
अब जिसे संसार में ही व्यर्थता की, असारता की आग लगी दिखाई पड़े, उसे छोड़ना नहीं पड़ता, छूट जाता है। इसलिए ऋषि कहता है, चैतन्यमय होकर संसार का त्याग ही उनके हाथ की लकड़ी है, उनका दंड है। ब्रह्म का नित्य दर्शन ही उनका कमंडलु है। यह प्रतीक कह रहा है।
ब्रह्म का नित्य दर्शन ही उनका कमंडलु है और कर्मों को निर्मूल कर डालना ही उनकी झोली है।
इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है। कर्मों को निर्मूल कर डालना। कर्म पकड़ते हैं इसलिए कि हमें भ्रांति है कि हम कर्ता हैं। अगर कोई सोचता हो कि मैं कर्मों को निर्मूल कर दूंगा, तो वह निर्मूल करने के नए कर्म का बंध करेगा। कर्म बंधते इसलिए हैं कि मुझे खयाल है मैं कर्ता हूं। मैंने चोरी की, मैंने दान दिया। मैंने यह किया, मैंने वह किया। यह जो मैं हूं पीछे, मैं कर्ता हूं ऐसा जो भाव है, वह कर्मों को मुझसे जोड़ता चला जाता है।
जन्मों—जन्मों में न मालूम कितने कर्म का भाव हमारे भीतर इकट्ठा हो जाता है। हम बड़े कर्ता हो जाते हैं। जब कि कर्ता सिवाय परमात्मा के और कोई भी नहीं है। तो हम झूठ ही कर्ता होने का खयाल अपने भीतर बना लेते हैं। फिर सब कर्मों को सम्हालकर रखते हैं, लेखा—जोखा रखते हैं। क्या—क्या मैंने किया, क्या—क्या मैंने किया। वही हमारे चारों तरफ भीड़ इकट्ठी हो जाती है। वही हमारे भीतर भर जाता है कूड़ा—कबाड़। उसकी वजह से जीवन के सत्य का अनुभव नहीं हो पाता, प्रभु का नित्य दर्शन नहीं हो पाता। कैसे कटेंगे ये कर्म? यह ऋषि क्या कहता है? ये कर्म कैसे कटेंगे? ये कट जाते हैं एक क्षण में। अगर इतना ही स्मरणपूर्वक अपने भीतर कोई सजग हो जाए कि मैं अपने कर्मों का कर्ता नहीं, सब कर्म परमात्मा के हैं। मैं केवल उसके हाथ की बांसुरी हूं। स्वर उसके हैं, गीत उसके हैं, मैं सिर्फ बांस की पोंगरी हूं।
कबीर ने कहा है कि जिस दिन यह जाना कि मैं बांस की पोगरी हूं उसी दिन झंझट कट गई। अब वह जाने, उसकी झंझट जाने। अपना कोई लेना—देना न रहा।
मरने लगे कबीर तो काशी छोड्कर चले गए। काशी लोग मरने आते हैं। मरे मराए लोग काशी मरने आते हैं। खयाल है कि काशी में जो मरता है, वह स्वर्ग में जन्म लेता है। काशी के पास एक छोटा सा गांव है, मगहर। कि जो मगहर में मरता है, वह गधा होता है नर्क में। कबीर मरते वक्त मगहर चले गए। बहुत समझाया मित्रों ने, प्रियजनों ने, शिष्यों ने कि क्या करते हैं, मगहर में कोई मरता ही नहीं! मगहर में आदमी मर भी जाए, तो उसके रिश्तेदार उसे लेकर भागते हैं कि अभी थोड़ी सांस चल रही है, मगहर के बाहर निकाल लो, नहीं तो नर्क में गधा होता है। तो काशी लोग मरने आते हैं दूर—दूर से और तुम काशी जिंदगीभर रहे और मरने के वक्त मगहर जा रहे हो, दिमाग खराब तो नहीं हो गया!
कबीर ने कहा कि काशी में रहकर अगर मैं मरा और स्वर्ग में गया, तो कर्ता का भाव पकड़ जाएगा—अपनी वजह से। मगहर में मरूं, तो जहा उसकी मर्जी हो। नर्क का गधा बना दे, तो भी उसकी मर्जी रही। हम तो मगहर में ही मरेंगे। और अगर स्वर्ग गए तो फिर कह सकेंगे, तेरी अनुकंपा, तेरी कृपा। मरे तो मगहर में थे, होना तो गधा था। लेकिन काशी में मरकर अहंकार पकड़ेगा कि काशी में मरे, रहे काशी में, गए काशी—इसलिए। हमारे हर कर्म के पीछे कर्ता खड़ा हो जाता है, मैं कर रहा हूं।
कर्मों की निर्जरा न हो, तो मुक्ति नहीं है, स्वतंत्रता नहीं है, चेतना का परम विकास नहीं है। संन्यासी यह कहता है कि अब कुछ मैं नहीं करता। अब वह जो कराता है, कराता है। अब मैंने अपने सिर पर से वह बोझ हटा दिया। नर्क जाऊं, तो वह जाने, स्वर्ग जाऊं, तो वह जाने। जीऊं तो ठीक, मरूं तो ठीक। जो भी हो, अब मैं नहीं हूं अपने कर्मों के पीछे। अगर कोई ऐसा सरक जाए पीछे से कर्म के, तो आज के कर्म ही नहीं क्षीण हो जाते, अनंत—अनंत जन्मों के कर्मों से संबंध टूट जाता है।
कर्मों को निर्मूल कर डालना ही उसकी कन्था है।
और निर्मूल वे तभी होंगे, जब मूल कट जाए; और मूल है अहंकार। मूल है कर्ता का भाव कि मैं कर रहा हूं। मैं ध्यान कर रहा हूं इतना भी पकड़ जाए, तो कर्म का बंध होता है। मैं धर्म कर रहा हूं? प्रार्थना कर रहा हूं पूजा कर रहा हूं इतना भी पकड़ जाए, तो कर्म का बंध होता है।
उमर खय्याम ने बहुत प्यारा गीत लिखा है। उमर खय्याम बहुत कम समझा जा सका, क्योंकि बातें उसने ऐसी कहीं कि नासमझों को बहुत जंची। और नासमझों ने उनके अपने अर्थ लगा लिए जो उनको जंचे। तो उमर खय्याम, एक कीमती सूफी अनुभवी जिस बुरी तरह मिसइंटरप्रिटेड हुआ है सारी दुनिया में, उसका कोई हिसाब लगाना कठिन है। फिट्जराल्ड ने पश्चिम में जब उसका अनुवाद किया, तो मिट्टी कर दिया। बहुत अच्छा अनुवाद किया, लेकिन उसकी जो सूफियाना पकड़ थी, वह जरा भी न बची। भारत में भी बहुत अनुवाद उमर खय्याम के हुए हैं, लेकिन एक भी अनुवाद ठीक नहीं है। हो नही सकता। क्योंकि उन अनुवाद करने वालों में एक भी सूफी नहीं है। वे कवि हैं, तो गीत तो उतार देते है। ऐसा लगने लगा, आपने देखा होगा, शराबखानों के नाम लोगों ने रख लिए, उमर खय्याम। क्योंकि।। सा लगा, यह उमर खय्याम शराब पीने की गवाही देता है और कहता है पीयो। लेकिन उमर खय्याम सगइग नहीं जा सका।
उमर खय्याम कहता है पीयो, क्योंकि पिलाने वाला वही है। और इस भ्रम में मत पड़ना कि तुम पीना छोड़ दोगे, क्योंकि उसके बिना छुड़ाए कैसा छोड़ना! और फिर हमने सुना है कि वह बहुत रहीम है, रहमान है, हमने सुना है कि वह बड़ा दयावान है, तो हम पुण्य करने का बोझ अपने सिर पर को लें? हम जैसे हैं, वैसे रहे आएंगे। और उसके सामने मौजूद हो जाएंगे। अगर उमर खय्याम जैसे छाटे से आदमी के पाप भी उसकी दया से न धुल सके—छोटे से आदमी के छोटे ही पाप उसकी दया से न धुल सके—तो हमारी कोई बदनामी नहीं, उसी की दया बदनाम हो जाएगी।
मगर जिन्होंने इनके अनुवाद किए, उन्होंने तो सब खराब कर डाला। उन्होंने तो मतलब निकाला कि मजे से पीयो। वह रहीम है, रहमान है, मजे से पीयो! अपना क्या बिगको, उसी की बदनामी होगी। उमर खय्याम कुछ और ही बात कह रहा है। वह यह कह रहा है कि उसके बिना कराए क्या तहो।! न पकड़ सकते कुछ, न छोड़ सकते कुछ। और जब वह छुडाएगा, तो हमारी क्या ताकत कि हम पकदू रखेंगे! और जब तक वह पकड़ाए है, तो हम इस अहंकार को क्यों करें कि हम छोड़ देंगे।
शराब तो सिर्फ बहाना है, बातचीत का बहाना है। जो जानते हैं, वे कहते हैं, उमर खय्याम ने कभी शराब नहीं छुई! और सब बातें तो उसने शराब की ही लिखी हैं। सब बातें शराब की ही लिखी हैं। शराब उसके लिए प्रतीक है, सूफियों के लिए प्रतीक है। वह प्रतीक है कई अर्थों में। दों—तीन बातें खयाल में ले लेने जैसी हैं।
एक तो शराब पीकर आदमी इतना बेहोश हो जाता है कि उसे अपने होने का पता नहीं रहता। उमर खय्याम कहता है कि उस परमात्मा की शराब भी ऐसी है कि जो पी लेता है, उसे अपने होने का कोई पता नहीं रहता। वह कर्ता, वह मैं, वह खो जाता है।
शायद शराब का जो इतना आकर्षण है सारी जमीन पर, वह इसीलिए है कि हम इतने कर्ता से भरे हुए हैं कि थोड़ी देर के लिए भुलाने के लिए सिवाय शराब के हमारे पास और कोई उपाय नहीं है। इसलिए सच में ही इस शराब से वे ही लोग बच सकते हैं, जो परमात्मा की शराब पी लें, क्योंकि फिर कर्ता ही उनके पास नहीं बचता, जिसे भुलाने की जरूरत हो।
निर्मूल करना हो, जड़ से ही काट डालना हो, तो कर्ता को काटना पड़ता है, कर्मों को नहीं। कर्म तो पत्ते हैं, मूल नहीं हैं। और उस मूल अहंकार को कि मैं करने वाला हूं, कैसे काटेंगे? कौन सी तलवार काम पड़ेगी वहां? कौन सी कुदाली वहां खोदेगी? कौन सी कुल्हाड़ी वहा काटेगी?
जहा—जहा कर्ता का भाव हो, वहा— वहा साक्षी का भाव स्थापित कर लें। जहां—जहां लगे कि मैं कर रहा हूं वहीं—वहीं जानें कि मैं कर नहीं रहा हूं केवल ऐसा हो रहा है, इसे देख रहा हूं।
किसी के प्रेम में आप पड़ गए हैं। आप कहते हैं, मैं बहुत प्रेम करता हूं। लेकिन अब तक कोई प्रेमी सच नहीं बोला। सच इसलिए नहीं बोला कि प्रेम कभी किसी ने किया है? हो जाता है! नहीं तो करके दिखाएं। बता दें आपको कि यह रहा, इस आदमी को प्रेम करके बताओ। हा, फिल्म की स्टेज पर बात और है, बताया जा सकता है। लेकिन आप प्रेम करके बता नहीं सकते। इसके लिए आर्डर नहीं किया जा सकता कि चलो, करो प्रेम। अगर हो भी थोड़ा—बहुत, तो तिरोहित हो जाएगा एकदम, आर्डर सुनते ही।
इसलिए तो बच्चों का प्रेम नष्ट हो जाता है, क्योंकि बच्चों को हम आर्डर कर रहे हैं। कह रहे हैं, यह तुम्हारी मां है, करो प्रेम। यह पागलपन की बात है। अगर मां है तो प्रेम पैदा अब तक हो जाना चाहिए था। अगर मां है और अब तक प्रेम पैदा नहीं हुआ, तो क्या कहने से अब हो सकेगा? मां के होने से नहीं हुआ साथ रहकर, तो अब कहने से क्या होगा? लेकिन मां ही कह रही है कि चलो, करो प्रेम। चलो, यह तुम्हारी चाची है, इसके गले लगो। यह तुम्हारे पिताजी हैं, इनके पैर छुओ। बच्चे बेचारे जबर्दस्ती कर—करके उस हालत में पहुंच जाते हैं कि फिर उनसे कभी बिना जबर्दस्ती के होता ही नहीं। कंडीशनिंग हो जाती है। यह पत्नी है, करो प्रेम; यह पति हैं, करो प्रेम। फिर पूरी जिंदगी करो।
लेकिन प्रेम तो एक घटना है, हैपनिग है। किया नहीं जाता, हो जाता है। अगर जब आपको प्रेम हो, तब आप यह समझ पाएं कि यह हो रहा है, मैं कर नहीं रहा हूं तो आपको प्रेम का कर्म बांधेगा नहीं। आप कहेंगे, अवश हूं विवश हूं र मेरे हाथ के बाहर है, कुछ हो रहा है। तब आप साक्षी बन सकते हैं, द्रष्टा बन सकते हैं। और जो व्यक्ति प्रेम का द्रष्टा बन जाए, वह और सब चीजों का द्रष्टा बन सकता है, क्योंकि प्रेम बहुत गहरा अनुभव है। और सब चीजें तो ऊपर—ऊपर हैं, बहुत ऊपर—ऊपर हैं।
द्रष्टा बनें। जहां—जहा कता का भाव सघन होता हो, वहां—वहां द्रष्टा को लाएं। धीरे— धीरे जड़ कट जाएगी कर्म की और आप अचानक पाएंगे कि कर्मों का सारा जाल आपसे दूर होकर गिर पड़ा, जैसे आपके वस्त्र गिर गए हों और आप नग्न खड़े हैं। और जिस दिन कर्मों से नग्न होकर कोई खड़ा हो जाता है, उस दिन परमात्मा के लिए द्वार सीधा खुल जाता है। हमारे और उसके बीच कर्मों की श्रृंखला की आड़ है, दीवार है।
इसलिए ऋषि कहता है, कर्मों को निर्मूल कर डालना ही उनकी कन्या है
और अंतिम, श्मशान में जिसने दहन कर दिए माया ममता अहंकार वही अनाहत अंगी— पूर्ण व्यक्तित्व वाला है
इस सूत्र में बात को ऋषि पूरा करता है। जैसे किसी ने मरघट पर जाकर जला दिए हों सब—ममता, माया, अहंकार। असल में सब अहंकार का विस्तार है। अहंकार अपने को फैलता है ममता से। ममता उसकी शक्ति है, उससे अपने को बड़ा करता है। जब कोई कहता है, मेरा बेटा, तो अहंकार की परिधि बड़ी हो गई। बेटे को भी उसने उसी में समा लिया। मेरी जाति, अहंकार की परिधि बहुत बड़ी हो गई। अब पूरी जाति को उसने अपने अहंकार के साथ जोड़ लिया। अब अगर कोई उसकी जाति को गाली देगा, तो यह उसको दी गई गाली है। अगर अब कोई उसकी जाति का झंडा नीचा करेगा, तो यह उसका झंडा नीचा हो गया। मेरा राष्ट्र, और उसको कर लिया भयंकर बड़ा। और जितना बड़ा हो जाए, उतना पहचान में नहीं आता। क्योंकि इतना बड़ा हो जाता है कि हमारी आखें उसका ओर—छोर नहीं देख पातीं।
अगर मैं कहूं कि मैं बहुत महान व्यक्ति हूं तो फौरन दिखाई पड़ जाएगा कि बड़े अहंकारी हैं आप। लेकिन मैं कहता हूं हिंदू धर्म महान है, तो किसी को पता नहीं चलता कि हम केवल तरकीब कर रहे हैं। हम यह कह रहे हैं कि हिंदू धर्म महान है, क्योंकि हम हिंदू हैं। इस्लाम महान है, क्योंकि मैं मुसलमान हूं। इस्लाम महान है इसीलिए कि मैं मुसलमान हूं। अगर मैं न होता, तो महान नहीं हो सकता था।।rफर जहा मैं होता, वह महान होता।
मुल्ला नसरुद्दीन एक सभा में गया था। जरा देर से पहुंचा। बड़े आदमी को देर से पहुंचना चाहिए। सिर्फ छोटे आदमी वक्त पर पहुंचते हैं, बहुत छोटे और वक्त के पहले पहुंच जाते हैं। बड़ा आदमी जरा देर करके पहुंचता है। देर से पहुंचा। लेकिन भर गई थी सभा। और रास्ता नहीं था, अध्यक्ष जम चुके थे। नेता अपना व्याख्यान शुरू कर दिया था। मुल्ला इच्छा से गए थे कि किसी तरह मंच पर तो बैठ ही जाएंगे। लेकिन मंच तक जाने का उपाय नहीं था। तो मुल्ला दरवाजे पर ही बैठ गया, जहां लोगों ने जूते उतारे थे। और उसने वहीं गपशप करनी शुरू कर दी।
उसकी बातें तो बड़ी कीमती थीं ही। लोग धीरे—धीरे उसकी तरफ मुड़ गए। सभा का रुख बदल गया। अध्यक्ष चिल्लाया कि नसरुद्दीन, तुम बहुत गड़बड़ कर रहे हो। तुम्हें पता होना चाहिए कि अध्यक्ष का स्थान यहौ है! नसरुद्दीन ने कहा, नसरुद्दीन जहां बैठता है, अध्यक्ष का स्थान सदा वहीं होता है, और कोई जगह नहीं होता। अगर न मानो तो सभा से पूछ लो—पीठ किसकी तरफ है, मुंह किसकी तरफ है!
आदमी अपने को जहा बैठा मानता है, वही अध्यक्ष का स्थान है सदा। कोई लोग गलती में हों, वह बात दूसरी है। कहीं भी बैठ जाएं, उससे फर्क नहीं पड़ता। जहा मैं बैठता, वही अध्यक्ष का स्थान है। हर आदमी इस जगत में पूरे जगत का सेंटर है—हर आदमी। यही तो झगड़ा है, हर आदमी सेंटर है। उसको सेंटर मानकर पूरा जगत परिभ्रमण कर रहा है। चांद—तारे चल रहे हैं, सूरज निकल रहे हैं, परमात्मा सेवा में लगा है, सारा खेल चल रहा है। सेंटर पर आप हैं।
यह अहंकार छोटा होता है, तो दिखाई पड़ जाता है। आपको न भी पड़े, तो आपके पडोसी को दिखाई पड़ जाता है। बड़ा हो, तो पड़ोसी भी समा जाता है, फिर दिखाई नहीं पड़ता। जितना बड़ा हो जाए, उतना ही कम दिखाई पड़ता है।
इसलिए हमने चालाकियां की हैं और विराट। विराट करने की कोशिश की है अहंकारों को। जाति, राष्ट्र, धर्म, समाज—और अहंकार इस ढंग से हो जाता है कि फिर ठीक है, फिर कोई दिक्कत नहीं। मैं जोर से चिल्ला सकता हूं कि भारत दुनिया का सबसे श्रेष्ठ राष्ट्र है। कोई उपद्रव नहीं करेगा, कम से कम भारत में तो नहीं ही करेगा। क्योंकि वह उसका भी अहंकार है। वह कहेगा, बिलकुल ठीक है, उचित कहते हैं आप। पाकिस्तान में पाकिस्तान 'महान बना रहेगा, चीन में चीन महान बना रहेगा। और सबके अहंकार तृप्त होते रहते हैं। रस, पोषण पाते रहते हैं।
अहंकार जीता है ममता के विस्तार से, मेरे के विस्तार से। जितना बड़ा मेरे का घेरा होगा, उतना मेरा 'मैं बड़ा हो जाएगा और सुरक्षित होगा। इसलिए क्या—क्या मेरा है, इसको हम फैलाते चले जाते हैं। ममता, मेरे के फैलाव का नाम है। आप कितनी चीजों को मेरा कह सकते हैं, उतना ही आपका अहंकार पुष्ट होगा। लेकिन किसी चीज को मेरा कहना हो, तो पहले उसे माया से रंजित करना होता है। उसे इल्‍यूजरी करना पड़ता है। क्योंकि बिना इल्‍यूजन के कोई चीज को मैं मेरी नहीं कह सकता।
जिस जमीन पर मैं खड़ा होकर कहता हूं मेरी जमीन। मैं कैसे कह सकता हूं? जब मैं नहीं था, तब भी यह जमीन थी; और जब मैं नहीं रहूंगा, तब भी यह जमीन रहेगी। और यह जमीन अगर हंस सकती होगी, तो हंसती होगी, क्योंकि इस पर खड़े होकर न मालूम कितने लोगों ने कहा होगा, मेरी जमीन। और वे सब खो गए और जमीन अपनी जगह पड़ी है।
अगर मुझे मेरे का विस्तार करना है, तो मुझे बहुत ही हिम्मोटिक इल्यूजन में अपने को सम्मोहित करना पड़ेगा। एक भ्रम में, जिसमें मुझे सत्य को देखने की जरूरत नहीं, असत्य खड़े करने पड़ेंगे। और जितने असत्य झूठ मैं खड़े कर सकूंगा अपने पास, उतने ही मेरे का विस्तार होगा और उतना ही मेरे भीतर मैं मजबूत होगा। एक बहुत अदभुत खेल में हम लगे हैं। कैसा जाल हम बुनते हैं। माया का अर्थ है, हिम्मोटिक इत्थूजन! जैसा आपने देखा न, कभी कोई जादूगर एक झोले में से पौधा निकालता है। पौधा एकदम बड़ा हो जाता है, उसमें आम लग जाते हैं, वह आपको आम तोड़कर दे देता है। न कोई झाडू है वहां, न वहा कोई आम है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक जादूगर से मिलने गया था। जा तो रहा था दूसरे काम से, लेकिन जादूगर बीच में मिल गया। और जादूगर ने जैसे ही मुल्ला को देखा, उसने अपना डमरू बजाया। तो मुल्ला चौंका। डमरू बजाकर उसने अपने झोले में से एक पौधा निकाला। पौधा बड़ा हुआ। उसमें आम लगे। मुल्ला पास गया। मुल्ला ने कहा, गजब की चीज है, मैजिक बैग, जादू का थैला। क्या दाम हैं इसके? उसने कहा, पहले इसका पूरा राज तो समझ लो। पौधे को एक तरफ रख दिया। अंदर हाथ डाला। खरगोश एक निकाला, और अंदर हाथ डाला, चीजें निकलती आईं। जो उसने कहा, वही निकाला।
मुल्ला ने कहा, बहुत बढ़िया। जा रहे थे खरीदने कुछ सामान। मैजिक बैग खरीद लिया। निकले थे कुछ और काम से, लेकिन जब मैजिक बैग मिल रहा हो, तो कौन नहीं खरीदेगा? सोचा, वह फिर पीछे कर लेंगे। जरूरी चीजें फिर भी की जा सकती हैं, गैर—जरूरी चीजें चूकी नहीं जा सकतीं। खाना एक दिन का छोड़ा भी जा सकता है, लेकिन हीरे की अंगूठी के बिना नहीं चला जा सकता। जो गैर—जरूरी है, वह तात्कालिक मांग करता है। जो जरूरी है, उसे पोस्टपोन किया जा सकता है।
जा रहा था बहुत जरूरी काम से। पत्नी के लिए कुछ दवा वगैरह खरीदने निकला था। फिर सोचा कि दवा की जरूरत क्या, जब मैजिक बैग अपने पास है। इसी में से निकाल लेंगे। मन में तो खयाल पहले तो आया कि पत्नी के लिए दवा निकाल लेंगे, लेकिन मन ऐसा है कि मन ने सोचा कि नई पला ही क्यों न निकाल लें, जब मैजिक बैग ही पास है। मरने दो पुरानी को। फौरन जितने पैसे थे, दे दिए।
चलते वक्त उस आदमी ने कहा कि जरा एक बात खयाल रखना, दीज बैग्स आर वेरी टेंपरामेंटत। ये बड़े मूडी हैं। यह मैजिक बैग है, कोई साधारण नहीं है। यह जादू का झोला है। यह बहुत संवेदनशीप है। जरा होशियारी से, कुशलता से परसुएड करना। नाराज हो गया, तो मुश्किल हो जाएगी। मुल्ला ने कहा, मैं समझता हूं। जब इतनी ऊंची चीज है, तो टेंपरामेंटल तो होगी ही। लेकर और कहा कि जल्दबार्जो मत करना। घर जाना, आराम से बैठकर सुस्ताना। क्योंकि तब तक वह जादूगर जरा दूर निकल जाए न!
पर मुल्ला को घर पहुंचना बहुत मुश्किल हुआ। रास्ते में ही जोर से प्यास लग आई। उसने कहां, ऐसा भी क्या टेंपरामेंटल होगा, एक गिलास पानी तो दे ही सकता है। अंदर हाथ डाला और कहा, प्‍यारे जादू के बस्ते, जरा एक पानी का गिलास दो। वहां से कुछ भी न आया। कहा, अरे, क्या खरगोश और आम वगैरह निकालने की आदत तो नहीं है इसकी! कहा, कोई हर्ज नहीं, अच्छा आम का पौधा ही निकाल। उसका भी कोई पता नहीं चला। पूरे बैग में अंदर हाथ डाला, वह बिलकुल खाली था। जो चीजें निकल सकती थीं, वे निकल चुकी थीं। बहुत टेंपरामेंटल मालूम होते हो, उसने कहा। ऐसी भी क्या नाराजगी। अभी एक अपशब्द भी तुमसे नहीं बोला। अच्छा, जो तुम्हारी मर्जी हो, वही निकालो। हाथ डाला, फिर भी कुछ नहीं आया। बड़ी मुसीबत हो गई। पैसे भी खराब गए, अब क्या करें। इसका कोई उपयोग तो होना ही चाहिए।
आदमी ऐसा ही सोचता है। इतने पैसे खराब किए तो अब इसका कोई उपयोग तो होना ही चाहिए। तो उसने सोचा, अब इसका और क्या उपयोग हो सकता है? मुल्ला के पास एक गधा था, लेकिन उसके मुंह का जो तोबडा था, वह तो था। तो उसने सोचा इस तोबड़े के लिए एक गधा खरीद लेना चाहिए और क्या कर सकते हैं! भागा बाजार, गधा खरीदने लगा, तो गधा बेचने वाले ने कहा, दो —दो गधे का क्या करोगे? उसने कहा, दो—दो कहां, एक गधा और उसका तोबडा, और एक तोबडा और उसका गाग। दो—दो कहा हैं!
आदमी पूरे वक्त मैजिकल बैग लेकर जी रहा है। टेंपरामेंटल है। कुछ निकालो, कुछ निकल आता है। कभी नहीं भी निकलता। जो डालो, वही निकलता है।
यह जो हम जिसको माया कहते हैं, उसका अर्थ है कि हम इस पूरे जगत में बहुत से इन्यूजन्स पैदा करते हैं, बहुत से भ्रम पैदा करते हैं और उन भ्रमों के सहारे ही जीते हैं। नहीं तो जीना बहुत मुश्किल है। हर आदमी अपना मैजिक बैग लिए हुए है और उसी से चीजें निकालता रहता है। हालाकि कोई उसकी मानता नहीं, लेकिन कम से कम वह खुद मानता है। कोई नहीं मानता उसकी। वह खुद तो कम से कम भरोसा करता है। ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है...।
मैं पूरे मुल्क में घूमा। मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि आपने जो बात कही, वह हमारी तो समझ में आ गई, लेकिन साधारण आदमी की समझ में कैसे आएगी! पहले मैं सोचा कि कभी तो वह साधारण आदमी भी एकाध दफे आएगा और कहेगा, असाधारण लोगों की समझ में तो आ गई, मुझ साधारण की समझ में नहीं आती। वह अभी तक नहीं आया, वह साधारण आदमी! जब भी आता है, असाधारण आदमी आता है। वह कहता, हमारी समझ में तो आ गई, साधारण आदमियों की समझ में कैसे आएगी! अपने को छोड्कर बाकी को वह सब साधारण समझता है। वे बाकी भी यही समझते हैं।
हर आदमी अपना मैजिक बैग लिए है, उसमें से चीजें निकालता रहता है। कोई उसकी मानता नहीं, लेकिन वह अपनी तो मानता ही है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन अपनी पत्नी से कह रहा है कि तुझे मालूम है कि इस दुनिया में कितने महान पुरुष हैं? मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी ने कहा कि मुझे पक्का, भलीभांति मालूम है। तुम जितने सोचते हो, उससे एक कम। मुल्ला ने कहा, बर्बाद कर दिया। एक ही तो हम सोचते हैं। खतम। फैसला ही हो गया। घटाने की कोई जरूरत नहीं, एक तो हम सोचते ही हैं। दो का सवाल कहा है। नसरुद्दीन की पत्नी भी जानती है कि वह महान पुरुष कौन है, इसलिए उसने पहले ही एक घटा दिया कि तुम एक तो घटा ही दो, बाकी संख्या कोई भी हो, मैं राजी हो जाऊंगी।
हर आदमी अपने आसपास एक भ्रम—जाल खड़ा करके जी रहा है। उस भ्रम—जाल में वह न मालूम क्या—क्या निर्मित करता रहता है। वह सब माया है। वह सब झूठ है। वह है नहीं, वह सिर्फ दिखाई पड़ता है। और दिखाई भी उसको पड़ता है, जो देखने के लिए आतुर है। वह भी जरा सम्हलकर देखेगा तो दिखाई नहीं पड़ेगा, बैग खाली पाएगा। वहां कुछ भी नहीं है।
ऋषि कहता है कि जिन्होंने अपनी माया, ममता, अपने अहंकार.. उलटा चल रहा है। माया सबसे बड़ा घेरा है हमारे भ्रम का। उसके बाद जो सेकेंड, जो दूसरी परिधि है, घेरा है, वह है ममता। और उसके भीतर जो सेंट्रल फोर्स है, वह है अहंकार। वह जो केंद्र पर शक्ति है, उसका ही यह सारा फैलाव है। जो माया को, ममता को, अहंकार को, जैसे मरघट पर जला दे चिता में, ऐसा जला देता, वही अनाहत अंगी है।
यह शब्द बहुत अदभुत है, अनाहत अंगी। इसका अर्थ है, वही पूर्ण व्यक्तित्व है। अनाहत, जिसका एक भी अंग आहत नहीं हुआ, जो पूर्ण है, द होल।
अंग्रेजी में शब्द है होली। होली बनता है होल से। पवित्र वही है, जो पूर्ण है। पावन वही है, जो पूर्ण है। जिसका कोई भी अंग आहत नहीं, खंडित नहीं।
लेकिन आदमी अजीब—अजीब काम करने लगता है। ऐसी कौमें हैं जमीन पर कि वे आपरेशन नहीं करवातीं शरीर के किसी अंग का। क्योंकि अगर आहत होकर मरे, खंडित होकर मरे! अगर कभी मौके—बेमौके ऐक्सीडेंट हो जाए, हाथ टूट जाए, कुछ हो जाए, तो उसको सम्हालकर रखते हैं। फिर जब आदमी मर जाता है, तो उसके हाथ वगैरह को जोड़कर, अनाहत अंगी करके, पूरे अंग करके उसको दफना देते हैं।
यह मतलब नहीं है। लंगड़ा भी अनाहत अंगी हो सकता है, अंधा भी अनाहत अंगी हो सकता है। शरीर बिलकुल न रहे, तो भी अनाहत अंगी हो सकता है। अनाहत अंगी होने का मतलब इस शरीर के अंगों से नहीं है। अनाहत अंगी होने का अर्थ है, भीतर जो अखंड है, एक है, बिना टूटा—फूटा है। जिसके भीतर कोई खंड नहीं, विभाजन नहीं, द्वैत नहीं, दुई नहीं। जिसके भीतर जिसे पूर्ण का अनुभव होता है, जिसे फुलफिलमेंट का अनुभव होता है, जिसे लगता है, बस सब पा लिया, अब कुछ पाने को नहीं। अगर परमात्मा भी सामने आकर पूछे कि कुछ और चाहिए? तो ऐसा अनाहत अंगी जो है, वह चुपचाप रह जाएगा। वह कहेगा कि जो है, वह पूर्ण से ज्यादा है। अब और क्या हो सकता है! अब कुछ भी नहीं चाहिए।
अनाहत अंगी का यह भी अर्थ है कि जो इंटीग्रेटेड है, समग्र है। जिसके भीतर भीड़ नहीं है, जिस पर भरोसा किया जा सकता है।
हम तो एक भीड़ हैं। हमें कोई कठिनाई नहीं है। अगर आप क्रोधित हैं, तो समझदार आदमी को इससे कोई चिंता नहीं पैदा होती, क्योंकि यह आपका पूरा हिस्सा नहीं, सिर्फ एक अंग है। दूसरा अंग है, उसको जरा फुसलाया जाए, आपका क्रोध चला जाएगा। वह दूसरा अंग निकल आएगा सामने। आप कितने ही नाराज हैं, आप कितने ही दुखी हैं, पीड़ित हैं, सब बदला जा सकता है। क्योंकि आपके दूसरे हिस्से भीतर पड़े हैं, उन्हें जरा ऊपर लाने की जरूरत है।
इंटीग्रेटेड का अर्थ है समग्र, जो एक ही है अपने भीतर। उसके वचन का वही अर्थ है, जो है। उसे बदला नहीं जा सकता।
लेकिन आपको तो आपके छोटे—छोटे बच्चे बदल लेते हैं। छोटा बच्चा कहता है, खिलौना चाहिए डैडी। आप भारी अकड़ दिखलाते हैं कि नहीं, कल ही लिवाया था। लेकिन बच्चा जानता है कि आप में कितनी अकड़ है और कितनी अकड़ आपकी चलेगी।
वह वहीं खड़ा है। वह कहता है, चाहिए। अब की दफा आप जरा डरकर देखते हैं। फिर भी रौब दिखाने की कोशिश करते हैं कि देखो, मैंने तुमसे कहा कि नहीं, अभी संभव नहीं है। वह वहीं खड़ा है। वह जानता है कि तुम्हारी कितनी ताकत है। थोड़ी दे में तुम्हारे दूसरे हिस्से को फुसला लेंगे। तीसरी बार आप ही भर देते हैं।
और एक दफे आपने यह कर दिया कि बच्चा सदा के लिए पहचान गया कि आप एक आदमी नही हैं, आपकी बात का कोई पक्का भरोसा नहीं है। आपको बदला जा सकता है। जरा जोर से पैर पटको, शोरगुल करो और आपको रास्ते पर लाया जा सकता है।
छोटे—छोटे बच्चे भी डिक्टेटोरियल ट्रिक सीख जाते हैं। आपको चलाते रहते हैं। आप समझते है कि आप अपने छोटे बच्चे को चला रहे हैं। बड़ी भूल में हैं। छोटे बच्चे भलीभांति जानते हैं कि आपकी कमजोरियां क्या हैं, कहां से आपको परेशान किया जा सकता है। छोटे—छोटे बच्चे तक अपने डैडी से कहते हैं कि हम मम्मी से कह देंगे।
नसरुद्दीन का बेटा नसरुद्दीन से पूछ रहा था, आप शेर से डरते हो? नसरुद्दीन ने कहा, बिलकुल नहीं। हाथी से डरते हो? नसरुद्दीन ने कहा, कैसी बातें कर रहा है, हाथी से मैं डरूंगा? हाथी मुझसे डरते हैं। सांप से डरते हो? नसरुद्दीन ने कहा, उठाकर फेंक देता हूं सांप को। पहाड़ से डरते हो? समुद्र से डरते हो?

नसरुद्दीन ने कहा, किसी से नहीं डरता बेटा। तो उसके बेटे ने कहा, तो क्या मम्मी को छोड़कर आप किसी से भी नहीं डरते? किसी से नहीं! न शेर से, न हाथी से, न सांप से, न पहाड़ से।

आपके भीतर हिस्से हैं बहुत, डिसइटीग्रेटेड, अलग—अलग। एक हिस्सा बहादुर का है, एक हिस्सा कायर का है। जब तक बहादुर का ऊपर है, तब तक आप और बातें कर रहे हैं। जब बहादुर का थक जाएगा और कायर का ऊपर आएगा, आप बिलकुल दूसरे आदमी सिद्ध होंगे।

अनाहत अंगी का अर्थ है, जिसके भीतर कोई खंड नहीं, जो एक, एकरस, एक जैसा ही है। ऋषि कहते हैं, लेकिन ऐसा अनाहत अंगी तभी कोई हो पाता है जब अहंकार, माया और ममता को भस्मीभूत कर डालता है।

लेकिन मरघट में नहीं जलती वह आग, जिसमें माया और ममता और अहंकार को भस्म किया जा सके। वह आग मंदिर में जलती है। वह आग प्रार्थना से जलती है, ध्यान से जलती है, पूजा से जलती है।

अब हम उस आग को जलाने में लगें।


आज इतना ही।