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शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

केनोउपनिषद--ओशो ( पांचवां-प्रवचन)


यह तुम्‍हारा स्‍वरूप है—पांचवां—प्रवचन




प्रश्‍न सार :


*बुद्धि के उपयोग का सर्वोत्तम मार्ग क्या है?


*सक्रिय ध्यान के प्रारंभिक दिनों में होने वाली पीड़ा से कैसे पार पाएं?


*सक्रिय ध्यान का पांचवां चरण क्या है?


*यदि सक्रिय ध्यान के दौरान गहन शांति उतरने लगे तो क्या गतिविधियां बंद हो जाने दें?


पहला प्रश्न :

आपने कहा कि बौद्धिक समझ तथा ज्ञान से किसी को लाभ नहीं हुआ है, और उपनिषद कहते है कि किसी भी चीज का निषेध मत करो। यदि बुद्धि है और हमें उसका निषेध नहीं करना है तो फिर  कौन—सा सर्वाधिक उत्‍तम मार्ग है जिससे उसका उपयोग किया जाये?

पहली बात जो बुद्धि के बारे में समझ लेनी है वह यह है कि बुद्धि टिकी ही निषेध पर है। बुद्धि का सारा काम ही निषेध करना है, न करना है। निषेध न करने पर उपनिषदों का जोर है वह आधार भूत रूप से तुम्‍हें बौद्धिक कसरत से मुक्‍त करने के लिए है।
बुद्धि सदा कहती है, ‘’नहीं’’ अंत: जितना अधिक कोई बौद्धिक होता जाता है उतना ही वह हां कहने में असमर्थ होता जाता है। हां कहने का अर्थ होता है श्रद्धा, विश्‍वास; ना का अर्थ होता है संदेह; और बुद्धि संदेह पर निर्भर है। यदि तुम संदेह करते हो तो बुद्धि का काम शुरू होता है। यदि तुम संदेह नहीं करते तो बुद्धि का फिर कोई काम ही नहीं रह जाता।

बुद्धि का मतलब है निषेध। अंत: जब उपनिषद कहते है कि कुछ भी निषेध मत करो, तो उसका अर्थ होता है कि बुद्धि का कोई काम नहीं रह गया। अपने ही मन के बारे में जरा ख्‍याल करो।जब कभी तुम ना कहते हो तो मन काम करना शुरू कर देता है। जब कभी तुम हां कहते हो तो वह हां यात्रा की समाप्‍ति कर देता है। फिर कोई यात्रा आगे नहीं हो सकती।''
यह युग सर्वाधिक बौद्धिक युगों में से एक है, और यह जो बौद्धिक वातावरण चारों ओर निर्मित हुआ है वह सिर्फ हर चीज पर संदेह करने के कारण निर्मित हुआ है। जितनी बड़ी बुद्धि होगी, उतनी ही वह संदेहशील होगी। यदि तुम ना कहो तो वह बहुत त्वरा से काम करने लगेगी। और यदि तुम ही कह दो तो बुद्धि कट गई। इसीलिए सारे धर्मों का जोर श्रद्धा पर है क्योंकि श्रद्धा से बुद्धि नहीं चल सकती। फिर इसके चलने के लिए कोई आधार नहीं बचता। उसके आगे कोई लक्ष्य नहीं है। ही पर अंत आ जाता है। यदि तुम सारे अस्तित्व को ही कह सको तो सोच—विचार एकदम ठहर जाएगा। सोचने में निषेध का गुण छिपा है।
गुरु कहता है कि निषेध मत करो। निषेध के अभाव में बुद्धि विलीन हो जाती है। और तुम पूछते हो बूद्धि का क्या करें? वह वहा होगी ही नहीं। तुम्हें कुछ भी करने की जरूरत नहीं रह जाएगी। तुम्‍हें उसका निषेध नहीं करना पड़ेगा। और तुम बुद्धि का निषेध नहीं कर सकते क्योंकि निषेध करना ही बुद्धिगत है। यदि तुम बुद्धि का निषेध करते हो तो वह निषेध करना ही बुद्धिगत मन को और गहरी जड़ें प्रदान कर देता है। तुम उसके शिकार हो जाते हो। यदि तुम निषेध करते हो तो तुम बुद्धि के गहरे प्रयास के शिकार हो जाते हो। तुम उसका निषेध नहीं कर सकते। तुम उसका निषेध कैसे कर सकते हो? निषेध ही विचार को और उत्तेजित कर देता है। तुम कारण खोज सकते हो कि क्यों निषेध नहीं करें, लेकिन वे कारण ही बुद्धि के लिए आकर्षण हो जायेंगे। तुम्हें तर्क मिल जायेंगे कि क्यों निषेध करें, लेकिन वे तर्क भी बुद्धिगत ही होंगे।
विश्वास के पास कोई तर्क नहीं होते; न विरोध में, न पक्ष में। इसलिए वस्तुत: जिन लोगों ने भी परमात्मा के पक्ष में तर्क दिये हैं उन्हें मैं अधार्मिक कहता हूं। क्योंकि तर्कों का धर्म से कुछ लेना—देना नहीं है। सारे संसार में बहुत से जाने—माने चिंतक हुए हैं, विशेषकर पश्चिम में, जिन्होंने परमात्मा के होने को सिद्ध करने की कोशिश की है। मैं उन्हें अधार्मिक कहता हूं—क्योंकि यदि तुम परमात्मा के होने को सिद्ध कर सकते हो, तो फिर बुद्धि परमात्मा के अस्तित्व से भी बड़ी हो जाती है। जब परमात्मा बुद्धि से सिद्ध किया जा सकता है, तो उसे बुद्धि से असिद्ध भी किया जा सकता है। अत: जो लोग भी सिद्ध करने की कोशिश करते हैं, वस्तुत: वे ही दूसरों को चुनौती देते हैं कि वे उसे असिद्ध करें।
नास्तिक हैं ही इसलिए क्योंकि तार्किक आस्तिक मौजूद हैं। जब तुम कहते हो, ''इसलिए परमात्मा है, ''तो तुम किसी अन्य को चुनौती दे रहे हो, उसकी बुद्धि को ललकार रहे हो, जो कि कह सके, ''यह बात गलत है। '' और तर्क दोनों तरफ से दिये जा सकते हैं, पक्ष तथा विपक्ष में, अंतहीन, पर वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचाते। सच्चे धार्मिक लोगों ने ईश्वर के लिये कभी कोई तर्क नहीं दिया। उन्होंने उसे जीया है। उन्होंने इस तरह जीया है जैसे कोई जी सकता है यदि परमात्मा हो तो। तुम परमात्मा को देख नहीं सकते, लेकिन तुम किसी दिव्य पुरुष को देख सकते हो, जो कि जीता जागता ईश्वर हो। वही एकमात्र प्रमाण है, लेकिन वह प्रमाण बुद्धि के लिए नहीं होगा। वह प्रमाण बौद्धिक जरा भी नहीं होगा। वह प्रमाण बुद्धि के परे होगा। वह प्रमाण तो सीधा तुम्हारे हृदय को छुएगा, तुम उसे अनुभव कर पाओगे।
जब कभी तुम किसी रामकृष्ण अथवा रमण को देखोगे, जब कभी तुम जीसस जैसे व्यक्ति को देखोगे तो यह बुद्धि नहीं होगी जो इस निष्कर्ष पर पहुंचेगी कि यह आदमी दिव्य है। तुम पहले महसूस करोगे। तुम्हारा हृदय किसी दूसरे ही आयाम में धड़कने लगेगा; तुम्हें उनके स्वरूप की एक नई ही गंध आएगी। लेकिन यह अनुभूति है; तुम इसे सिद्ध नहीं कर सकते।
बुद्धि सिद्ध कर सकती है, अथवा असिद्ध कर सकती है। लेकिन वह तुम्हें कभी विश्वास नहीं करा सकती। जब वह कुछ भी सिद्ध करती है तब भी वह सिर्फ अपने को ही सिद्ध करती है, उससे तो कुछ सिद्ध नहीं होता। यदि तुम ईश्वर के होने को सिद्ध भी कर दो तो भी इससे उसका होना सिद्ध नहीं होता, सिर्फ तुमने इससे इतना ही सिद्ध किया है कि तुम एक बहुत बुद्धिशाली व्यक्ति हो, इससे ज्यादा नहीं। तुमने यह सिद्ध कर दिया कि तुम्हारे पास एक तीक्ष्ण बुद्धि है। तुमने सिर्फ अपना ही अहंकार सिद्ध कर दिया, इससे ज्यादा तो कुछ भी नहीं किया।
और बुद्धि अहंकार के लिए सबसे सूक्ष्म भोजन है। उसके कारण ही तुम्हें लगता है कि तुम जानते हो, तुम्हें लगता है कि तुम सिद्ध कर सकते हो, तुम्हें महसूस होता है कि तुम असिद्ध कर सकते हो। तुम्हें ऐसी प्रतीति होती है कि तुम केंद्र हो। तब परमात्मा भी तुम्हारे ऊपर निर्भर हो गया! यदि तुम उसे सिद्ध कर सकी, तो ही वह हो सकता है, यदि तुम कह दो नहीं, तो वह नहीं हो जाएगा। वह नंबर दो हो गया। याद रहे, बुद्धि के लिए हर चीज नंबर दो हो जाती है, और बुद्धि प्राथमिक हो जाती है। हर चीज गौण हो जाती है! और बुद्धि प्रथम बनी रहती है।
श्रद्धा कहती है कि बुद्धि की सर्वोपरिता को फेंको, तभी केवल समग्र स्वरूप अपना काम कर सकता है। तब हमारा स्वरूप, हमारा होना प्राथमिक होगा, और बुद्धि द्वितीय होगी। तब अस्तित्व प्राथमिक होगा, और बुद्धि सिर्फ उसका एक अंग होगी। बुद्धि तानाशाह है, श्रद्धा लोकतंत्रीय है। श्रद्धा तुम्हारे ,समूचे स्वरूप को अभिव्यक्ति देती है, बुद्धि सिर्फ एक हिस्सा है जो कि सर्वोपरि होने का दावा करता है। जब उपनिषद कहते हैं कोई निषेध न करो?. बुद्धि विलीन हो जाती है। यदि तुम निषेध करते ही नहीं तो फिर बुद्धि होगी ही नहीं तुम्हारे पास। 'नहीं' की जरूरत होती है। वही पैर रखने की जगह है। बिना नहीं के बूद्धि खड़ी नहीं रह सकती। इसलिए यह प्रश्न कि बुद्धि के लिए क्या करें पैदा ही नहीं होता। किसी भी बात का निषेध मत करो, और चिंता करने के लिए कोई बुद्धि नहीं बचेगी।

दूसरा प्रश्न:


सक्रिय ध्यान के पहले कुछ दिनों में मांस—पेशियां अकड़ जाती हैं और सब जगह दर्द होने लगता है। क्या कोई तरीका है इस कठिनाई को हल करने का?


जारी रखो। तुम उसके पार चले जाओगे। और कारण स्पष्ट हैं। दो कारण हैं. पहला, यह बहुत तीव्र व्‍यायाम है और तुम्हारे शरीर को इसके साथ समस्वर होना पड़ेगा। इसलिए तीन—चार दिनों के लिए ऐसा महसूस होगा कि सारा शरीर दुख रहा है। किसी भी नए व्यायाम के साथ ऐसा ही लगेगा। लेकिन कुछ दिनों के बाद तुम उसके पार हो जाओगे और तुम्हारा शरीर पहले से ज्यादा बलशाली महसूस होगा।
लेकिन यह बात भी आधारभूत नहीं है। आधारभूत बात तो गहरी चली जाती है, आधारभूत बात वह है जो कि आधुनिक मनोविज्ञान ने पता लगाई है। तुम्हारा शरीर सिर्फ भौतिक ही नहीं है। तुम्हारे शरीर में,तुम्‍हारी मांस—पेशियों में, तुम्हारे शरीर के ढांचे में बहुत—सी चीजें दमन के कारण प्रवेश कर गई हैं। यदि तुम क्रोध को दबा लेते हो तो वह शरीर में प्रवेश कर जाता है। वह मांस—पेशियों के भीतर चला जाता है, वह रक्त में चला जाता है। यदि तुम कुछ भी दबा लेते हो तो वह खाली मानसिक बात नहीं है, वह शारिरिक बात भी है, क्योंकि वस्तुत: तुम विभक्त नहीं हो।
तुम मन और शरीर, दो चीजें नहीं हो; तुम शरीर—मन हो, साइकोसोमेटिक हो। तुम दोनों हो एक साथ न। इसलिए जो भी शरीर के साथ किया जाता है वह मन तक चला जाता है तथा जो भी मन के साथ किया जाता है वह शरीर तक चला जाता है। मन और शरीर एक ही चीज के दो छोर हैं।
उदाहरण के लिए, यदि तुम क्रोधित होते हो तो शरीर के साथ क्या घटना घटती है पू जब कभी तुम क्रोध करते हो तो कुछ विशेष विष खून में छूट जाते हैं। बिना उन विषों के तुम क्रोध करने के लिए पागल नहीं हो सकते। तुम्हारे शरीर में विशेष प्रकार की ग्रंथियां हैं, और वे कुछ विशेष रसायन छोड़ती हैं।
अब यह बात वैज्ञानिक हो गई है। यह कोई दर्शनशास्त्र की बात नहीं रही। तुम्हारा रक्त विषाक्त हो जाता है। इसीलिए जब तुम क्रोध में होते हो तो ऐसा भी कोई काम कर सकते हो जो कि साधारणत: तुम नहीं कर सकते। क्योंकि तुम विक्षिप्त हो गए हो। तुम किसी बड़ी चट्टान को सरका सकते हो। तुम साधारणत: ऐसा नहीं कर सकते। बाद में तुम विश्वास भी नहीं कर सकते कि तुमने उस चट्टान को सरका दिया था, या कि उठा लिया था। जब तुम लौटकर फिर से सामान्य हो जाओगे तब तुममें इतनी शक्ति नहीं होगी कि तुम उस चट्टान को उठा सकी, क्योंकि अब तुम वही नहीं हो। कुछ विशेष रसायन तुम्हारे खून में बह रहे थे। तुम आपातकाल की स्थिति में आ गए थे। तुम्हारी सारी शक्ति सक्रिय हो गयी थी।
परंतु जब एक पशु क्रोधित होता है तो क्रोधित ही होता है। उसके पास कोई नैतिकता नहीं होती, कोई उसके लिए शिक्षा नहीं होती। वह सीधा क्रोधित हो जाता है और क्रोध निकल जाता है। जब तुम क्रोधित होते हो तो तुम भी पशु की भांति क्रोधित होते हो, किंतु फिर समाज है, नैतिकता है, व्यवहार की बातें हैं और दूसरी हजारों चीजें हैं और तुम क्रोध को नीचे दबा देते हो। तुम्हें दिखाना पड़ता है कि तुम क्रोधित नहीं हो; तुम्हें मुस्कुराना पड़ता है—एक चिपकाई हुई मुस्कान। तुम्हें मुस्कुराहट को निर्मित करना पड़ता है, और क्रोध को नीचे दबाना पडता है। शरीर को तब क्या हो रहा है? शरीर तो लड़ने के लिए तत्पर था—या तो लड़ने को, या फिर भागने को, खतरे से दूर भागने को; या तो सामना करने को या फिर बचकर निकलने को शरीर तैयार था। शरीर तैयार था कि कुछ करे, क्रोध सिर्फ कुछ करने के लिए तैयारी है। शरीर हिंसा के लिए, आक्रमण के लिए तैयार है।
यदि तुम हिंसक अथवा आक्रामक हो गए तो ऊर्जा मुक्त हो जाएगी। लेकिन तुम नहीं हो सकते। यह सुविधाजनक नहीं है, इसलिए तुम उसे भीतर दबा देते हो। तब फिर उन मांस—पेशियों का क्या होगा जो कि आक्रमण के लिए तैयार हो गई थीं? वे पंगु हो जायेंगी। ऊर्जा उन्हें धक्के मारेगी आक्रमण के लिए, और तुम उन्हें वापस धक्का दोगे कि आक्रामक मत होओ। एक द्वंद्व उठ खड़ा होगा। तुम्हारी मांस—पेशियों में, तुम्हारे खून में, तुम्हारे शरीर के कोषों में द्वंद्व पैदा हो जाएगा। वे सब कुछ अभिव्यक्त करना चाहते हैं और तुम उन्हें धक्का दे रहे हो कि अभिव्यक्त नहीं करें। तुम उन्हें दबा रहे हो। तुम्हारा शरीर पंगु हो जाता है। और यह बात प्रत्येक भाव के साथ होती है। और ऐसा रोज—रोज वर्षों तक होता रहता है। तब फिर तुम्हारा शरीर सब जगह से पंगु हो जाता है। सारी नसें पंगु हो जाती हैं। वे बहती हुई नहीं रहती, वे तरल नहीं रहती, वे जीवंत नहीं रह जाती हैं। वे मुर्दा हो जाती हैं, वे विषाक्त हो जाती हैं। वे सब उलझ जाती हैं, वे स्वाभाविक नहीं रहती हैं।
किसी भी पशु की ओर देखो और उसके शरीर की सुंदरता को देखो। मनुष्य के शरीर को क्या हो गया है? क्यों वह इतना सुंदर नहीं है? क्यों? प्रत्येक जानवर इतना सुंदर है, क्यों मनुष्य का शरीर ही सुंदर नहीं है? उसे क्या हो गया है? तुमने उसके साथ कुछ किया है। तुमने उसे नष्ट कर दिया है, और उसका स्वाभाविक बहाव खो गया है, और रुक कर सड़ गया है। तुम्हारे शरीर के हर हिस्से में विष भरा है। तुम्हारे शरीर की हर मांस—पेशी में दमित क्रोध, दमित काम, दमित लोभ, दमित ईर्ष्या, दमित घृणा दबी पड़ी है; वहा हर चीज दबी पड़ी है। सचमुच तुम्हारा शरीर रुग्ण है।
इसलिए जब तुम ध्यान करना प्रारंभ करते हो तो ये सारे विष छूटने लगते हैं। और जहां—जहां से शरीर रुक गया है, वहां—वहां से पुन: पिघलना शुरू करता है और फिर से तरल हो जाता है। और यह एक दुर्धर्ष प्रयास है। चालीस साल तक गलत ढंग से जीने के बाद अचानक ध्यान करना—सारे शरीर में एक तूफान आ जाता है। तुम्हें सारे शरीर में दर्द महसूस होता है। किंतु यह दर्द अच्छा है, और तुम्हें उसका स्वागत करना चाहिए। शरीर को फिर से बहने दो, फिर से वह सुंदर व बालवत हो जाएगा। फिर से तुम एक नई जीवंतता का अनुभव करने लगोगे। लेकिन इसके पहले कि वह जीवंतता आए, वे जो अंग मुर्दा हो गए हैं उन्हें फिर से जिंदा होना होगा, और यह थोड़ा पीड़ादायी तो होगा।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हमने शरीर के चारों ओर एक कवच बना रखा है, और वह कवच ही समस्या है। जब तुम्हें क्रोध आता है, यदि उस समय तुम्हें अभिव्यक्त करने की छूट दे दी जाए तो तुम क्या करोगे? तुम क्रोध में होते हो तो तुम अपने दात पीसने लगते हो, तुम अपने नाखूनों और हाथों से कुछ करने लगते हो क्योंकि वह पशु योनि से हमारे साथ आया है। तुम अपने हाथों से कुछ करना चाहते हों—किसी चीज को नष्ट करना चाहते हो।
यदि तुम कुछ भी नहीं करो तो तुम्हारी उंगलियां पंगु हो जाती हैं; उनकी सुंदरता व लावण्य खो जाता है। वे जीवित अंग नहीं रहेंगी और उनमें जहर भर जायेगा। इसके कारण ही जब तुम किसी से हाथ मिलाते हो तो वास्तव में कोई स्पर्श नहीं होता, क्योंकि उनमें कोई जीवन नहीं होता, वे मुर्दा हैं।
तुम इसे अनुभव कर सकते हो। किसी छोटे बच्चे का हाथ छूकर देखो और तुम्हें उसमें कुछ सुक्ष्म अंतर महसूस होगा। जब बच्चा तुम्हारे हाथ में अपना हाथ देता है.. यदि बच्चा तुम्हें अपना हाथ देना नहीं चाहता तो वह तुमसे अपना हाथ दूर हटा लेगा। वह तुम्हें अपना मुर्दा हाथ नहीं देगा। वह हाथ दूर कर लेगा। लेकिन यदि वह अपना हाथ तुम्हें देना चाहता है तो तुम महसूस करोगे कि उसका हाथ तुम्हारे हाथ में पिघल रहा है। उसकी ऊष्णता, उसका बहाव ऐसा होगा जैसे कि सारा बच्चा ही उस हाथ में आ गया है। उसके इस स्पर्श में ही वह अपना सारा प्रेम व्यक्त कर देगा, जितना कि अभिव्यक्त किया जा सकता है।
लेकिन वही बच्चा जब बड़ा हो जाता है तो वह इस तरह से हाथ मिलाता है जैसे कि उसका हाथ एक मुर्दा चीज है। वह उस हाथ में नहीं आएगा, वह उसके द्वारा बहेगा नहीं। और ऐसा इसलिए हुआ है क्‍योंकि बीच में बहुत—सी बाधाएं आ गई हैं। क्रोध रुक गया है। वास्तव में, इसके पहले कि तुम्हारे हाथ पुन: जीवंत हो सकें उन्हें पीड़ा से गुजरना पड़ेगा, उन्हें क्रोध की गहरी अभिव्यक्ति से गुजरना पड़ेगा। यदि वह क्रोध मुक्त नहीं किया गया तो वह क्रोध रास्ते में अवरोध खड़े करेगा और प्रेम वहां से नहीं बह सकेगा।
केवल तुम्हारे हाथ ही नहीं बल्कि तुम्हारा सारा शरीर इस तरह रुक गया है। तुम किसी को सीने से। लगाओ, तुम किसी को अपनी छाती के निकट ले आओ, लेकिन उससे तुमने किसी को अपने हृदय के पास ले लिया है ऐसा नहीं होता। ये दोनों बातें, दो अलग चीजें हैं। तुम किसी को गले लगा सकते हो, यह एक शारीरिक घटना हुई। लेकिन यदि तुम्हारे हृदय के चारों ओर कवच है, भावों की रुकावट है तो आदमी इतना ही दूर रहेगा जितना कि वह दूर था, और कोई निकटता संभव नहीं है। लेकिन वास्तव में ली यदि तुम किसी को निकट ले आओ, यदि कवच नहीं हो, तुम्हारे और उसके बीच कोई दीवार नहीं हो, तो।  फिर तुम्हारा हृदय दूसरे के हृदय में पिघल जाएगा, और एक 'मिलन होगा, एक मैत्री होगी।
तुम्हारे शरीर को बहुत जहरों से मुक्त करना है। तुम विषाक्त हो चुके हो। और तुम्हें पीड़ा महसूस होगी क्योंकि ये सारे जहर जड़ें जमा चुके हैं। अब मैं फिर से अराजकता पैदा कर रहा हूं। यह ध्यान तुम्‍हारे भीतर पुन: अराजकता को पैदा करेगा ताकि तुम्हें पुनर्गठित किया जा सके, ताकि एक नई रचना संभव हो सके। जैसे तुम हो, तुम्हें तो नष्ट करना है, केवल तभी नया जन्म सकता है। जैसे तुम हो, तुम पूरी तरह गलत हो गये हो। तुम्हें तो नष्ट करना होगा, तभी कुछ नया निर्मित किया जा सकता है। उसमें पीड़ा होगी, वेदना होगी, लेकिन यह वेदना सहने योग्य है।
अत: ध्यान जारी रखो, और शरीर में पीड़ा होती है तो उसको होने दो। शरीर को रोको मत, शरीर को वेदना से गुजरने दो। यह पीड़ा तुम्हारे अतीत से आती है, लेकिन यह चली जाएगी, यदि तुम इसको जाने दोगे। और यह चली जाएगी तो पहली बार तुम्हारे पास शरीर होगा, अभी तो सिर्फ तुम्हारे पास एक कारागृह है, एक बंद कैपसूल है। तुम चारों ओर खोल में बंद हो; तुम्हारे पास एक स्फूर्तिभरा, जीवंत शरीर नहीं है। पशुओं के पास भी तुमसे ज्यादा सुंदर, ज्यादा जीवंत शरीर होता है।
इसीलिए हम कपड़ों से इतने ग्रसित हैं—क्योंकि शरीर दिखाने योग्य और देखने योग्य ही नहीं हैं। हम कपड़ों से बड़े ग्रसित हो गए हैं। जब कभी तुम नग्न खड़े हो तो तुम्हें दिखाई पड़ेगा कि तुमने शरीर का क्या कर डाला है। कपड़े तुमसे भी तुम्हारा शरीर छिपाये रखते हैं।
ऐसा मेरा अनुभव बहुत ध्यान शिविरों में हुआ है कि यदि कुछ लोग शिविर में नग्न हो पाते हैं तो ये वे ही लोग हैं जो शरीर से सुंदर हैं। इसलिए वे डरे हुए नहीं हैं। जिनके शरीर कुरूप हैं वे लोग आकर शिकायत करते हैं कि यह बात अच्छी नहीं है, कि लोग नंगे हो जायें। उनका डर स्वाभाविक है। वे दूसरों के नंगे होने से डरे हुए नहीं हैं, वे सच में अपने से भयभीत हैं। वे स्वयं अपने शरीर को नहीं देख सकते। और यह रुग्णता एक दुश्‍चक्र है, क्योंकि यदि तुम्हारे पास सुंदर शरीर नहीं है तो तुम इसे छिपाना चाहोगे। और जब तुम उसको छिपाते हो तो वह अधिकाधिक मृत हो जाता है। क्योंकि तब उसके प्रति सजग होने की जरूरत नहीं है कि वह जीवंत हो।
सदियों से वस्त्र पहनने के कारण हमने अपने शरीर से संबंध खो दिया है। यदि तुम्हारा सिर काट दिया जाए और तुम अपने शरीर को देखो तो मुझे पक्का विश्वास है कि तुम अपने शरीर को नहीं पहचान पाओगे कि यह तुम्हारा शरीर है। या कि पहचान लोगे? तुम उसे नहीं पहचान पाओगे क्योंकि तुम अपने शरीर से परिचित भी नहीं हो। तुम्हें उसकी कोई भी प्रतीति नहीं है। तुम सिर्फ उसमें रह रहे हों—बिना उसकी परवाह किये।
हमने हमारे शरीर के साथ बहुत हिंसा की है। इसीलिए जब मैं इस अराजकतापूर्ण ध्यान में तुम्हारे शरीर को पुन: जीवंत होने को बाध्य कर रहा हूं तो बहुत—सी बाधाएं टूटेंगी; बहुत थिर हो गई चीजें पिघलेगी, बहुत जम गई पद्धतियां तरल हो जायेगी। पीड़ा होगी, लेकिन उसका स्वागत करो। यह शुभ है, और तुम उसके पार हो जाओगे। यह एक आशीष है। जारी रखो। यह सोचने की जरूरत ही नहीं है कि क्या करें। तुम सिर्फ ध्यान को सतत जारी रखो। मैंने सैकड़ों लोगों को इस प्रक्रिया से गुजरते देखा है और थोड़े ही दिनों में पीड़ा चली जाती है। और जब पीड़ा चली जाती है तो तुम्हारे चारों ओर एक सूक्ष्म आनंद होता है।
तुम्हें वह आनंद अभी नहीं हो सकता, क्योंकि अभी तो पीड़ा है। तुम्हें पता हो या न हो, लेकिन सारे शरीर में पीड़ा है। तुम सिर्फ उसके प्रति बेहोश हो क्योंकि वह सदैव ही साथ चल रहा था। जो भी सदा साथ होता है, हम उसके प्रति मूच्छिर्त हो जाते हैं। ध्यान से तुम पुन: सजग हो जाओगे, और तब मन कहेगा : ''इसे मत करो; सारा शरीर दुख रहा है। '' मन की मत सुनो, सिर्फ करते चले जाओ।
थोड़े ही समय में दर्द चला जाएगा, और जब दर्द चला जाएगा, और तुम्हारा शरीर फिर से संवेदनशील हो जाएगा, और उसके चारों ओर कोई बाधाएं नहीं होंगी, कोई जहर नहीं होगा, तो तुम्हारे चारों ओर एक सूक्ष्म आनंद की अनुभूति तुम्हें होगी। जो भी तुम कर रहे हो, तुम सदा एक आनंद की लहर को तुम्हारे शरीर के चारों ओर अनुभव करोगे।
वास्तव में, आनंद का अर्थ ही यह है कि तुम्हारा शरीर एक लय में है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। कि तुम्हारा शरीर एक संगीत भरी लय में है, इससे ज्यादा कुछ और नहीं। आनंद कोई खुशी नहीं है। खुशी हमें किसी चीज से निकालनी पड़ती है। आनंद का अर्थ है बस तुम हो—जीवत, पूरी तरह थिरकते हुए, शक्ति से भरे। और तुम्हारे शरीर के चारों ओर एक सूक्ष्म संगीत, और तुम्हारे भीतर एक लयबद्धता—यही है आनंद। तुम आनंद से भर सकते हो जब कि तुम्हारा शरीर बह रहा हो, जब कि वह सरिता की भांति बह रहा हो।
वह आएगा लेकिन तुम्हें इस वेदना से गुजरना होगा, इस दर्द से गुजरना होगा। यह तुम्हारी नियति का एक हिस्सा है, क्योंकि तुमने ही इसका सृजन किया है। लेकिन यह चला जाता है। यदि तुम बीच में रोको नहीं तो यह चला जाता है।
यदि तुम बीच में ही रुक गए तो पुराना जमाव फिर आ जाएगा। और चार पांच दिन में ही तुम्हें सब कुछ ठीक वैसा ही लगेगा, जैसे कि पहले तुम थे। उस ठीक लगने के प्रति सावधान रहो।


तीसरा प्रश्न :

क्या आप हमें सक्रिय ध्यान के पांचवें चरण के बारे में कुछ संकेत करेंगे?

इसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है, इसीलिए मैंने कभी चर्चा नहीं की। चौथी अवस्था आखिरी अवस्था है जिसके बारे में बात की जा सकती है। पांचवीं अवस्था घटेगी, लेकिन उसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। और कोई जरूरत भी नहीं है। और पांचवीं अवस्था कोई अवस्था भी नहीं है, वह तुम्हारा स्वरूप है। पहली चार अवस्थाएं हैं; लेकिन पांचवीं कोई अवस्था, कोई चरण नहीं है। वह तम्हारा होना है, वह तुम्हारा स्वभाव है। लेकिन उसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। यदि तुम चौथी अवस्था में आ जाओ तो पांचवीं अपने आप घटेगी, इतना पक्का है। यदि चौथी अवस्था में समग्र मौन को उपलब्ध हो जाओ तो पांचवीं घटित होगी। यह तुम्हारे मौन का ही विकास है।
लेकिन उसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। और जो भी कहा जाएगा वह गलत समझा जाएगा। उदाहरण के लिए यदि मैं कहूं कि वह परम आनंद है—और ऐसा कहा गया है कि वह परम आनंद है—तो तुम उसे गलत समझ लोगे, क्योंकि तुम नहीं जानते कि आनंद क्या होता है। तुम थोड़े से सुख जानते हो और तुम सोचते हो कि आनंद भी सुखों जैसा ही होगा। नहीं, आनंद ऐसा नहीं है। तुम सिर्फ सुख की भाषाएं ही सोच सकते हो क्योंकि तुम उसी से परिचित हो। तुम सोच सकते हो कि वह असीम सुख होगा, लेकिन वह नहीं है। वह सुख जरा भी नहीं है।
अथवा तुम निषेध की भाषा में सोच सकते हो कि कोई पीड़ा नहीं होगी, कोई दुख नहीं होगा—जैसा कि बूद्ध ने कहा है। बुद्ध ने कहा है, ''उस चेतना की आत्यंतिक स्थिति में कोई दुख नहीं होगा। ''तब लोगों ने बुद्ध से कहा, इतना काफी नहीं है, कुछ और अधिक कहो। आप वह कह रहे हो जो नहीं होगा,  कृपया उसके बारे में भी कहो जो होगा। आप कह रहे हो कि वहा दुख नहीं होगा, लेकिन वहा क्या होगा?'' बुद्ध ने उत्तर देने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा, ''मैं कुछ भी नहीं कहूंगा। इतना ही मैं कह सकता हूं कि वहां कोई दुख नहीं होगा। ''
लेकिन यह भी गलत समझा जाएगा, क्योंकि इससे तो तुम बीच में ही छोड़ दिए गए हो। यदि वह कहा जाए कि आत्यंतिक अनुभव सुख जैसा होगा तो बात गलत हो जाएगी। यदि यह कहा जाए कि कोई दुख नहीं होगा, जो कि पहले कथन से ज्यादा ठीक है, लेकिन फिर भी बिलकुल सही नहीं है क्योंकि तुम्हें फिर भी यह खयाल तो हो ही जाएगा कि यह नकारात्मक बात ही होगी, जबकि वह ऐसी नहीं है। बुद्ध को इस देश में गलत समझा गया। उन्हें निषेधवादी, नकारवादी समझा गया, क्योंकि वह कह रहे थे कि निर्वाण में दुख नहीं होगा, बस इतना ही। न कोई सच्चिदानंद—सत्? चित्? आनंद—बल्कि सिर्फ दुख नहीं होगा।
लेकिन कुछ भी कहा जाए, गलत ही समझा जाएगा क्योंकि हम वही समझ सकते हैं जो हम जानते हैं। तुम सुख को जानते हो, तुम दुख को जानते हो, लेकिन पांचवीं अवस्था में दोनों नहीं होंगे। द्वैत मिट जाएगा : कोई दुख नहीं होगा, कोई सुख नहीं होगा। अब यह बात समझ के बाहर चली जाती है। फिर वह कैसी स्थिति होगी? यदि कोई दुख नहीं होगा, कोई सुख नहीं होगा; तो फिर क्या होगा, कैसा होगा? इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। तुम इसकी कल्पना नहीं कर सकते।
बर्ट्रेंड रसल ने कहीं पर कहा है कि यदि ऐसा ही है कि निर्वाण या वह आत्यंतिक अनुभव दुख और सुख की सीमा के पार होता है तो वह अवश्य गहरी नींद की भांति होगा—एक गहरी नींद होगा। यह बात तर्कपूर्ण लगती है। यदि कोई दुख अथवा सुख नहीं हो तो तुम चेतन कैसे होगे? चेतना के लिए आवश्यक है कि कुछ हो जिसके प्रति चेतन रहा जा सके। यदि कुछ भी नहीं हो—न दुख, न सुख—तो फिर चेतना के लिए कोई चुनौती नहीं बचती, अत: तुम गहरी मूर्च्छा में, कोमा में पड़ जाओगे।
हर बात गलत समझी जाएगी, इसीलिए मैं उसकी बात नहीं करता हूं। मैं सिर्फ तुम्हें मंदिर के द्वार तक ले जा सकता हूं और वहां तुम्हें प्रवेश करने और जानने को छोड़ देता हूं। मैं तुम्हें मंदिर के दरवाजे पर छोड़ देता हूं। ये चार चरण तुम्हें द्वार तक ले जाने में सहायक हैं—तब तुम सीधे अंदर जा सकते हो। तुम द्वार के सामने खड़े हो, और द्वार खुला है। और यदि मंदिर तुम्हें आकर्षित करता है, पुकारता है, चुनौती देता है, तो तुम उसमें प्रवेश कर जाओगे। पांचवें चरण से कोई वापस नहीं लौटा है। कोई लौट भी नहीं सकता क्योंकि वह आखिरी आनंद, अल्टीमेट एक्सटेसी है। तुम्हारा सारा अस्तित्व ही उसकी ओर आकर्षित होता है।
पांचवें को चर्चा के बाहर ही छोड़ दिया जाता है। वह तुम्हारा अपना स्वरूप है। वह कोई स्थिति अथवा अवस्था नहीं है। पहली चार अवस्थाएं हैं। पहली में तुम अपनी श्वास पर, अपनी प्राण ऊर्जा पर काम कर रहे हो। श्वास ही जीवन है। पहले चरण में तुम अपने जीवन पर काम कर रहे हो। तुम अपने श्वास के ढांचे को तोड़ रहे हो। अराजकतापूर्ण श्वास से तुम अपने व्यवस्थित श्वास लेने के ढंग को नष्ट कर रहे हो। और यदि तुम अपने श्वास लेने के ढांचे को नष्ट कर दो तो तुम्हारे शरीर के बाकी सारे ढांचे ढीले पड़ जायेंगे।
श्वास सबसे सूक्ष्म चीज है काम करने के लिए। तुमने इस पर कभी ध्यान नहीं दिया है, परंतु जब भी तुम्हारा मन बदलता है तो तुम्हारी श्वास बदल जाती है। जरा—सी तुम्हारे मन में बदलाहट होती है कि श्वास बदल जाती है। अथवा ज्यादा सही होगा कहना कि इसके पहले कि मन का भाव बदलता है, श्वास बदल जाती है। जब तुम प्रसन्न होते हो तो तुम दूसरी ही तरह से श्वास लेते हो। जब तुम क्रोध से भरे होते हो तो तुम दूसरी ही तरह से श्वास लेते हो। जब तुम तनाव से भरे होते हो तो श्वास की गति दूसरी होती है। जब तुम विश्राम में होते हो तो तुम भिन्न प्रकार से श्वास लेते हो। श्वास की लय हमेशा बदलती जाती है।
इसे जरा देखो, अपनी श्वास की गति को देखो। तुम सारे दिन एक ही तरह से श्वास नहीं लेते हो। सुबह तुम दूसरे ढंग से श्वास लेते हो, शाम को तुम दूसरे ढंग से श्वास लेते हो। सिर्फ तुम्हारी श्वास को जानने मात्र से तुम्हारे मन पर क्या हो रहा है उसे जाना जा सकता है।
देर— अबेर, जब चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान श्वास की घटना के भीतर गहरे प्रवेश कर सकेंगे तो वे उसका ग्राफ बना सकेंगे। तुम्हारे श्वास का ग्राफ यह बतायेगा कि सारे दिन में तुम कौन—कौन से भावों से गुजरे हो। जब तुम सो रहे होते हो तो तुम दूसरी ही तरह से श्वास लेते हो। जब तुम सजग होते हो तो तुम दूसरी ही तरह से श्वास लेते हो। जब तुम तंद्रा में होते हो तो तुम दूसरी तरह से श्वास लेते हो। श्वास को आसानी से बदला जा सकता है। और यदि तुम श्वास को बदल सको तो मन को बदल सकते हो। तुम दोनों तरह से काम कर सकते हो।
योग की बहुत—सी परंपरायें हैं। कुछ परपरायें, विशेषत: राजयोग, मन से प्रारंभ करता है। वे कहते हैं कि पहले मन को बदलों, उसके बाद श्वास अपने आप बदल जाएगी। और दूसरी परपरायें हैं, विशेषत: हठयोग, जो कि कहता है कि श्वास को बदल लो और मन उसके पीछे—पीछे आ जाएगा। और दोनों ही सही हैं क्योंकि दोनों ही एक—दूसरे से संबंधित हैं।
एक काम करो : किसी दिन अपनी आराम कुर्सी पर विश्राम में लेटे हुए, और जब सारा संसार आनंदित मालूम पड़ रहा हो और तुम भी शात और आनंदित हो तो अपनी श्वास का निरीक्षण करो। केवल भीतर आती—जाती श्वास को देखो कि तुम कैसे श्वास ले रहे हो, कितना समय भीतर लेने और बाहर करने में लगता है। सब कुछ नोट कर लो। उसके बाद एक काम और करो। जब कभी तुम क्रोध में हो तो उसी तरह से श्वास लो जिस तरह से तब ले रहे थे जब तुम विश्राम में थे। तब क्रोध करना असंभव होगा। तब तुम क्रोध नहीं कर सकोगे। तुम क्रोध कर ही नहीं सकते। वह असंभव होगा क्योंकि क्रोध के लिए एक भिन्न प्रकार की श्वास की गति चाहिए।
जब तुम प्रेम में हो, अपनी प्रेमिका, अपने मित्र अथवा अपनी पत्नी के निकट बैठे हो तब ध्यान रखो कि तुम किस भांति श्वास ले रहे हो। फिर उसी भांति दूसरी जगह श्वास लेने की कोशिश करो, और अचानक तुम्हें मालूम होगा कि प्रेम ऊपर उठकर आने लगा। इसे ध्यान रखो। बिस्तर पर अपनी प्रेयसी कै साथ लेटे हुए ध्यान रखो कि तुम किस भांति श्वास ले रहे हो। फिर तुम किसी वृक्ष के पास बैठ जाएगे और वैसे ही श्वास लो और अचानक तुम्हें लगेगा कि वह वृक्ष प्रेयसी हो गया। अब प्रेम बह रहा है।
बिना इस तथ्य को जाने तुम अपने लिए कितनी पीड़ा पैदा कर लेते हो। तुम गलत ढंग से गलत स्थानों पर श्वास लेते रहते हो, और तुम बहुत—सी झंझटें और परेशानियां पैदा कर लेते हो।
पहले चरण में, हम श्वास पर काम करते हैं और अराजकता पैदा करते हैं। क्योंकि जब तक एक अराजकता पैदा नहीं होगी, तुम्हारा जन्म नहीं हो सकता है। पहला चरण है कि श्वास के पुराने ढाचों को तोड़ दो।
दूसरे चरण में, हम सारे दमित भावों को उघाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यदि तुमने वास्तव में ही  गहरी व अराजकतापूर्ण श्वास ली है तो दमित भाव सरलता से ऊपर आ जायेंगे। वे अपने आप उपर ने लगेंगे और तुम्हें कुछ भी नहीं करना पड़ेगा। दूसरा चरण अपने आप आ जाएगा यदि पहला चरण सही रूप से किया गया है। यदि तुमने पहले चरण में कोई प्रतिरोध नहीं किया है तो दूसरा स्वत: उसका अनुकरण करता हुआ आ जाएगा। दूसरे चरण में, हम भावों को बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं—उन्हें बाहर अभिव्यक्त कर देना है, उन्हें बाहर फेंक देना है।
जब तुम किसी पर क्रोधित होते हो तो तुम उस पर अपना क्रोध फेंकते हो, तब तुम एक शृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हो। फिर वह भी क्रोध करेगा। और यह कई जीवनों तक चलेगा, और तुम दुश्मनी करते चले जाओगे। इसे तुम सदियों तक चला सकते हो। इसका कभी अंत नहीं होगा। यह कहां खतम होगा? केवल एक ही संभावना है. तुम उसे ध्यान में समाप्त कर दो, न कि कहीं और। क्योंकि ध्यान में तुम किसी और पर क्रोध नहीं कर रहे हो, तुम सिर्फ क्रोध कर रहे हो।
स्मरण रहे, यह बड़ा आधारभूत भेद है। तुम किसी और पर क्रोध नहीं कर रहे हो। तुम सिर्फ क्रोधित हो, और क्रोध समष्टि में निकल रहा है। तुम किसी के प्रति घृणा नहीं कर रहे हो। यदि घृणा का भाव आता है तो तुम सिर्फ घृणा कर रहे हो, और घृणा बाहर निकाली जा रही है। ध्यान में भाव किसी से संबंधित नहीं किये जा रहे हैं, वे असंबंधित हैं। वे आकाश में चले जाते हैं, और आकाश हर चीज को शुद्ध कर देता है।
स्मरण रहे कि यह ऐसे ही है जैसे कोई गंदी नदी सागर में गिरती है। सागर उसे शुद्ध कर देता है। जब कभी तुम्हारा क्रोध, तुम्हारी घृणा, तुम्हारी कामुकता समष्टि में जाती है, सागर में गिरती है, तो वह उसे शुद्ध कर देता है। जब कभी कोई गंदी नदी दूसरी नदी में गिरती है तो वह उसे भी गंदा कर देती है। जब तुम किसी और पर क्रोध करते हो तो तुम उस पर अपनी गंदगी फेंक देते हो। फिर वह भी अपनी गंदगी तुम पर फेंकेगा और यह एक—दूसरे को गंदा करने की प्रक्रिया हो जाएगी।
ध्यान में तुम स्वयं को आकाश में फेंक रहे हो ताकि शुद्ध हो सको। जितनी भी ऊर्जा तुम फेंकते हो वह सब की सब शुद्ध हो जाती है। आकाश इतना विराट है, वह इतना बड़ा सागर है कि तुम उसे गंदा नहीं कर सकते। ध्यान में हम लोगों से संबंधित नहीं होते हैं। ध्यान में हम सीधे समष्टि से संबंधित होते हैं।
दूसरे चरण में, हम भावों को बाहर फेंकते हैं। यह एक केथार्सिस है, निर्जरा है। तीसरे चरण में, हम एक मंत्र का उपयोग कर रहे हैं—हू। यह एक सूफी ध्वनि है, जैसे कि हिंदुओं की एक ध्वनि है ओम्? लेकिन यह वर्तमान आदमी के लिए ज्यादा काम की है बजाय ओम् के। क्योंकि ओम् एक बहुत ही नाजुक ध्वनि है। जब तुम ओम् कहते हो तो वह हृदय से नीचे कभी नहीं जाता। यह बहुत आक्रामक नहीं है; यह बहुत ही अहिंसक है। सर्वाधिक अहिंसक ध्वनियों में से एक ध्वनि है ओम्।
यह ध्वनि तुमसे भिन्न प्रकार के लोगों के लिए खोजी गई थी। यह उनके लिए थी जो कि बहुत ज्यादा प्रेमपूर्ण तथा अहिंसक लोग थे, उनके लिए थी जो कि स्वभावत: सीधे व सरल लोग थे उनके लिए थी जो कि प्रकृति के बीच गांवों में रहते थे, उनके लिए थी जो कि अशिक्षित थे, पढ़े—लिखे नहीं थे, और संस्कारित तथा सुसंस्कृत नहीं थे। वे पशुओं की तरह थे—शुद्ध, सीधे, भोले— भाले। ओम् की ध्वनि उनके लिए खोजी गई थी। उन्हें बदलने के लिए इतना ही बहुत था। यह एक बहुत ही नाजुक चोट है—ओम्। यह हृदय पर बहुत ही हल्के से चोट करती है। उन लोगों के लिए इतना ही काफी था क्योंकि उनके पास हृदय थे। तुम्हारे लिए इससे काम नहीं चलेगा। तुम्हें तो बहुत ही हिंसक चोट चाहिए।
सूफियों ने इस दूसरी ध्वनि की खोज की—हू। यह अल्ला—हू का हिस्सा है। सूफी अल्लाह, अल्लाह की रट लगाते हैं, और जब तुम इसे बार—बार दोहराते हो तो यह अल्ला—हू अल्ला—हू हो जाता है। फिर उसके बाद प्रारंभ का हिस्सा गिरा दिया जाता है, अल्लाह गिरा दिया जाता है, केवल हू को रख लिया जाता है। उसके बाद केवल ' हू हू हू' बच जाता हे। जब तुम कहते हो '—हू', तो वह सीध तुम्‍हारे काम —केंद्र पर चला जाता है। वह सीधा काम—केंद्र में प्रवेश कर जाता है, वह काम—केंद्र पर चोट करता है।
आज का युग इतना काम —केंद्रित हो गया है कि तुम्हें काम —ऊर्जा पर चोट करने की जरूरत तै। ह्रदय अब है ही नहीं। यदि तुम ओम् से कोशिश करते हो तो तुम उस द्वार पर दस्तक देते हो जो कि खाली है। भ हा अब कोई नहीं रहता है। गुरुत्वाकर्षण का केंद्र वहां से हटकर अब काम—केंद्र पर आ गया हे। तुम्‍हारे केंद्र अब हृदय नहीं है। हृदय केंद्र हो सकता है यदि तुम प्रेम में केंद्रित हो, लेकिन अभी तुम 'काम में केंर्द्रित हो, न कि प्रेम में।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं—और वे ऐसा तुम्हारे अध्ययन से कहते है—कि प्रेम कुछ और नही बल्‍कि में जाने का खेल है। और उनकी बात सही है क्योंकि उनके सामने दूसरे कोई भी अन्‍य पहलू अध्‍ययन  के लिए नहीं हैं। वे तुम्हारा अध्ययन करते हैं, और यह निष्कर्ष निकालते हैं कि प्रेम कुछ और नहीं बल्कि काम के पहले खेले जाने वाला एक खेल है—केवल ऐसी स्थिति पैदा करना है जिसमें काम, सेक्‍स घटित हो सके. इससे ज्यादा कुछ नहीं। इसीलिए जब काम घटित हो जाता है, प्रेम विलीन हो जाता है। यह ऐसा ही है जैसे कि जब तुम्हें भूख लगती है तो तुम भोजन की ओर आकर्षित होने लगते हो और भोजन की ओर लुभावनी आंखों से देखते हो। परंतु जब भूख मिट जाती है, तो भोजन से आंखें मोड़ लेते है। सारा आकर्षण खो जाता है।
अत: जब तुम अपनी पत्नी अथवा अपने पति को प्रेम करते हो तो प्रेम सिर्फ एक औपचारिकता कि बात होती है यौन में उतरने के लिए, क्योंकि सीधे यौन में उतरना बहुत अशिष्टता होगी। अत: वह सिर्फ एक स्निग्धता लाने का काम करता है। जब यौन तृप्त हो जाता है तो पति बिस्तर पर दूसरी ओर करवट लेकर सो जाता है। वह समाप्त हुआ; सारा जादू खतम हुआ। वह फिर आएगा जब उसे पुन: वह विशिष्‍ट भूख लगेगी। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि प्रेम कुछ और नहीं है बल्कि एक पूर्व खेल है, केवल सभ्यता कर एक खेल है। और वे सही हैं क्योंकि वे किसी दूसरे प्रकार के आदमी को नहीं जानते हैं।
'ओम्' का आविष्कार किया गया था दूसरे ही प्रकार के व्यक्ति के लिए—उनके लिए जो कि प्रेम पूर्ण थे। ऐसा नहीं है कि उन्होंने काम को कभी नहीं भोगा था, उन्होंने भोगा था, अन्यथा तुम यहां नहीं हो सकते थे। उन्हें भी यौन की आवश्यकता थी. लेकिन बुनियादी फर्क यह था कि वे प्रेम में केंद्रित थे, और उनका काम सिर्फ प्रेम की ही अभिव्यक्ति था, इससे ज्यादा और कुछ नहीं। प्रेम आधारभूत था, और काम उसकी बहुत—सी अभिव्यक्तियों में से एक था। वह गहनतम अभिव्यक्ति था, लेकिन प्रेम की ही एक अभिव्यक्ति था। उन्होंने पहले प्रेम किया था, और फिर यौन घटित हुआ था। वह कोई बौद्धिक नहीं था, वह कोई पूर्व—नियोजित नहीं था।
यदि तुम कोई समकालीन शब्द का उपयोग करना चाहो तो मैं कह सकता हूं कि काम कुछ और नहीं था, बल्कि एक 'आफ्टर—प्ले' था। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि प्रेम और कुछ नहीं बल्कि एक 'फोर—प्‍ले है। लेकिन मैं कहता हूं कि तब यौन कुछ और नहीं बल्कि 'आफ्टर—प्ले' था। यह सिर्फ खेल को पूरा करने के लिए था। वह शिखर था, वह केंद्र नहीं था। प्रेम केंद्र था। तब हृदय एक दूसरी ही तरह से धड़कता था, भिन्‍न ही प्रकार से काम करता था। तब ' ओम्' पर्याप्त था काम करने के लिए। 'ओम्' उस आदमी की सहायता करता था जो कि बहुत प्रेमपूर्ण था, और जिसके पास हृदय था। यदि कोई आदमी इससे अन्यथा है तो वह उसके लिए काम का सिद्ध नहीं होगा।
'हू आज के युग के लिए ध्वनि है। वह सीधे तुम्हारे काम—केंद्र पर चोट करती है। यदि तुम वस्तुत: जोर से 'हू हू हू ' की चोट करो तो भीतर तुम्हें एक सूक्ष्म चोट लगती हुई महसूस होगी। और काम—ऊर्जा दो रास्तों से गति कर सकती है : वह बाहर की ओर जा सकती है, वह भीतर की ओर जा सकती है।
जब तुम किसी स्त्री या पुरुष की ओर आकर्षित होते हो तो ऊर्जा बाहर की ओर जाने लगती है। वास्तव में, एक स्त्री अथवा एक पुरुष बाहर से तुम पर चोट करने लगा। यह शाब्दिक अर्थों में भी सही है। जब तुम्हें लगे कि कोई स्त्री तुम्हें आकर्षित कर रही है, तब यदि तुम ठीक से सजग होकर गौर करो तो तुम देखोगे कि सूक्ष्म रूप से तुम्हारे काम—केंद्र पर चोट पड़ रही है। स्त्री की ऊर्जा, अथवा पुरुष की ऊर्जा तुम्हारे उस केंद्र पर चोट कर रही है। वैसी ही चोट तुम्हें तब भी महसूस होगी जब तुम 'हू, की आवाज करोगे; पर यह चोट भीतर से होगी। और यदि तुम भीतर से काम—केंद्र पर चोट करते ही चले जाओ तो एक द्वार खुलेगा और ऊर्जा भीतर की ओर जाने लगेगी, ऊपर की ओर उठने लगेगी।
एक बार तुम्हें यह पता चल जाये कि इस ऊर्जा को ऊपर और भीतर की ओर कैसे ले जाया जाये तो तुम ऊंचे आरगाज्य—आनंद के ऊंचे शिखर को महसूस करोगे, जो कि तुम किसी भी स्त्री अथवा पुरुष के साथ महसूस नहीं कर सकते। एक आंतरिक मिलन होना प्रारंभ होगा।
पहला चरण है कि तुम्हारे प्राण को बदला जाए—तुम्हारी श्वास की प्रक्रिया को बदला जाए। दूसरा चरण है कि तुम्हारे दमित भावों को, तुम्हारे मन के दमित हिस्सों को बाहर फेंका जाए। और तीसरा चरण है कि तुम्हारी जीवन—ऊर्जा को ऊपर की ओर गतिमान किया जाए। और जब ऊर्जा उर्ध्वगमन करने लगती है, तब तुम्हें कुछ नहीं करना है, तुम्हें सिर्फ मुर्दे के भांति लेट जाना है, ताकि उसकी दिशा में कोई परिवर्तन न हो। ऊर्जा ऊपर की ओर उठने लगती है, और तुम्हें कुछ नहीं करना है। इसलिए मैं सदा जोर देता हूं कि हिलो—डुलो मत। जब मैं तीसरे चरण में कहता हूं 'स्टाप' तो पूरी तरह रुक जाओ। कुछ भी मत करो। क्योंकि कुछ भी किया तो वही विचलित होने का कारण बन जाएगा और तुम सारी बात से चूक जाओगे। जरा—सी कोई बात, एक खांसी या छींक, और तब तुम सारी चीज ही चूक सकते हो, क्योंकि मन विचलित हो गया। तब बहाव एकदम रुक जाएगा क्योंकि तुम्हारा ध्यान कहीं और चला गया।
कुछ भी मत करो। तुम मर जाने वाले नहीं हो। यदि छींक भी आ रही है और तुम दस मिनट के लिए नहीं छीको तो तुम मर नहीं जाओगे। यदि तुम्हें खासी आ रही हो, या तुम्हें कहीं खुजली आ रही हो, या गले में खराश चल रही हो और यदि तुम कुछ नहीं करो तो तुम मर नहीं जाओगे। डरो नहीं, आज तक कोई भी मरा नहीं है। जहा तक शरीर का प्रश्न है, मुर्दे हो जाओ, ताकि ऊर्जा एक बहाव में गति कर सके। जब ऊर्जा ऊपर की ओर बहती है तो तुम अधिकाधिक मौन हो जाते हो। मौन, ऊर्जा के ऊपर की ओर बहने की सह—उत्पत्ति है, और तनाव ऊर्जा के नीचे की ओर बहने की सह —उत्पत्ति है। तुम अधिकाधिक संताप में रहोगे जब ऊर्जा नीचे की ओर बह रही होती है। तुम अधिकाधिक शांत, मौन, स्थिर रहोगे जब ऊर्जा ऊपर तथा भीतर की ओर बह रही होगी। और ये शब्द 'नीचे' तथा 'बाहर' दोनों पर्यायवाची हैं; और ' भीतर' तथा 'ऊपर' ये दोनों शब्द भी पर्यायवाची हैं। तुम बिलकुल मौन हो गए और ऊर्जा बाढ़ की भांति बह रही है तो वह सारे चक्रों से होकर गुजर रही है, सारे केंद्रों से गुजर रही है। और जब वह सारे चक्रों से गुजरती है, तो वह उन्हें साफ करती है, उन्हें शुद्ध करती है। वह उन्हें सक्रिय तथा जीवंत करती है, और वह बाढ़ अंतिम चक्र तक चली जाती है।
काम पहला चक्र है, सबसे नीचे का और हम सबसे नीचे के चक्र पर ही जीते हैं। इसलिए हम जीवन को उसके न्यूनतम पर जानते हैं। जब ऊर्जा ऊपर की ओर बहती है और अंतिम चक्र पर पहुंचती है—सहस्रार पर पहुंचती है—तो ऊर्जा अपने अधिकतम पर होती है। जीवन अपने अधिकतम पर होता है। तब तुम्हें अनुभव होगा, कि सारा विश्व शात हो गया है, एक जरा—सी ध्वनि भी नहीं है। हर चीज पूर्णतया मौन हो गई होती है जब ऊर्जा अपने अंतिम, आखिरी चक्र पर आती है।
तुम पहले चक्र को जानते हो; उसी से समझना ठीक रहेगा। जब ऊर्जा काम केंद्र पर आती है तो तुम पूरी तरह तनाव से भर जाते हो। सारा शरीर ज्वर से तपने लगता है, तुम्हारा प्रत्येक कोष तप्त हो जाता है। तुम्हारा तापमान बढ़ जाता है, तुम्हारा रक्तचाप तेज हो जाता है, तुम्हारी श्वास विक्षिप्त हो जाती है। तुम्हारा सारा शरीर एक अस्थायी विक्षिप्त स्थिति में आ जाता है—निम्नतम पर।
इससे ठीक विपरीत बात होती है अंतिम चक्र पर। तुम्हारा सारा शरीर इतना शीतल, इतना शात हो जाता है कि जैसे विलीन हो गया हो। तुम उसका अहसास भी नहीं कर पाते हो। तुम शरीर—रहित हो जाते हो, जैसे कि शरीर है ही नहीं। और जब तुम शांत होते हो तो सारा अस्तित्व भी शांत होता है क्योंकि अस्तित्व कुछ और नहीं है बल्कि एक दर्पण है; वह तुम्हें ही प्रतिबिंबित करता है। हजारों—हजारों दर्पणों में वह तुम्हें ही प्रतिबिंबित करता है। जब तुम शात हो जाते हो तो सारा अस्तित्व भी शांत हो जाता है।
यह चौथा चरण है। और मैं पांचवें के विषय में कुछ भी नहीं कहूंगा। यह द्वार है—परिपूर्ण मौन। तब तुम मंदिर में प्रवेश कर सकते हो और तुम उसे जान सकते हो। लेकिन मैं इससे ज्यादा और कुछ नहीं कह सकता। और यदि तुम उसे जान लोगे तो तुम भी कुछ नहीं कह सकोगे। वह अनिर्वचनीय है।

अंतिम प्रश्न :

सुबह के ध्यान तथा दोपहर के ध्यान में मैं जोरों से शारीरिक गतियों से प्रारंभ करता हूं लेकिन कहीं बीच में—विशेषत: जब 'संगीत और चारों ओर की चीख—पुकार बड जाती है—एक अजीब शांति मुझे घेर लेती है और धीरे—धीरे शरीर की गतियां मंद पड़ जाती हैं। जैसे—जैसे संगीत की आवाज बढ़ती जाती है यह शांति गहरी होती जाती है और मुझे ऐसा अनुभव होता है जैसे मैं इस चारों ओर के तूफान में एक शांति का केंद्र हूं यह स्वागत जैसा मालूम होता है।
क्या यह प्रतिक्रिया है और इसलिए क्या इसे निरुत्साहित करना चाहिए? क्या मैं संकल्प पूर्वक तेज शारीरिक गतिविधियां करता ही जाऊं और केवल अंत में ही शांत होऊं? अंत में भी जब हमें उत्सव मनाना होता है मुझे शांत रहने में ही आनंद आता है—और जितना अधिक संगीत व चीख—पुकार मचती है उतनी ही शांति गहरी होती जाती है।

यही वह शांति है जिसकी मैं अभी बात कर रहा था। जब ऊर्जा ऊपर की ओर बाढ़ की भांति गीत करती है तो ऐसी शांति तुम पर घटित होगी। इसे निरुत्साहित मत करो, इसी के लिए तो हम प्रयत्न कर रहे है। इसका स्वागत करो। यही है अतिथि जिसकी हम प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रारंभ तेजी से करो। लेकिन यदि तुम्‍हें लगे कि शरीर की गतियां तथा शोर अपने आप मंद होते जा रहे हैं, और एक गहरी शांति तुम पर उतर रही है, और चारों ओर का तूफान, शोर, चीख—पुकार आदि तुम्हारी शांति को प्रभावित नहीं करते बल्‍कि और गहरा करते है—तो तुम आश्वस्त हो सकते हो कि यह वास्तविक है, और तुम स्वयं को धोखा नहीं दे रहे हो। तो तुम शांत बने रहो। और अंत में यह घटित होगा, यदि तुम वास्तव में ही शांत हो गए हो तो शांति ही तुम्हारा महोत्सव होगी।
लेकिन यह बात अलग— अलग लोगों के साथ अलग—अलग रूप से घट सकती है। यह निर्भर करता है। यह लोगों के अपने—अपने ढंग के अनुसार घटित होगा। कुछ लोग अपना आनंद नाचकर व्यक्त करना चाहेंगे, कुछ गीत गाकर, और कुछ सिर्फ रोकर। लेकिन ये आंसू  दुख के नहीं होंगे, वरन आनंद में बहेंगे। कोई सिर्फ शात ही बना रहेगा—यही उसका महोत्सव होगा।
इसलिए इस बात की चिंता मत करो कि किस भांति महोत्सव मनायें। जैसे भी तुम्हारे साथ यह बात घटित हो, वही तुम्हारा महोत्सव होगा। और यदि इस प्रकार की शांति तुम पर उतरती है तो इसका स्वागत करो, आनंद लो। इसके साथ सहयोग करो ताकि यह अधिकाधिक गहरी हो सके।

दिनांक 1० जुलाई 1973; संध्या,  
माउंट आबू राजस्थान।