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मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-04

अज्ञान व ज्ञान के विसर्जन में परम अनुभव—चौथा प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर
27 मार्च 1972, प्रात:
माऊंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :
     

      वेदात्तविज्ञान सुनिश्रितार्था: संन्यास योगाद्यतय: शुद्धसत्वा:।
      ते ब्रह्मलोकेषु परान्‍तकाले परामृतात्यरिमुच्चत्ति सर्वे।। 4।।


अंततः वे ही योगी लोग परमतत्व को प्राप्त करने के अधिकारी होते हैं, जो वेदांत में निहित विज्ञान का सुनश्रित अर्थ जानते हैं और संन्यास व योगाभ्यास से अंतःकरण को परिशुद्ध करके ब्रह्मलोक में जाने का प्रयत्न करते हैं।। 4।।

कुछ शब्दों के अर्थ समझने से इस सूत्र को शुरू करे।

सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-03

ह्रदय—गुहा में प्रवेश: विराट अस्‍तित्‍व में प्रवेश—तीसरा प्रवचन

ध्‍यान योग शिविर
26 मार्च 1972, रात्रि
माऊंट आबू, राजस्‍थान।

सूत्र :
           

            न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशु:।
            परेण नाकं निहित गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशान्‍ति ।।3।।


उस परमतत्व को धन, संतान, अथवा कर्म के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। त्याग ही एक ऐसा मार्ग है, जिसके द्वारा ब्रह्मज्ञानियों ने अमृतत्व को प्राप्त किया है। स्वर्गलोक से ऊपर हृदय की गुफा ब्रह्मलोक में स्थित वह परमतत्व आलोकित है, जिसे निष्ठावान साधक ही प्राप्त कर सकते हैं।। 3।।

कैवल्‍य उपनिषद--प्रवचन-02

असंभव से प्रेम—संबंध है श्रद्धा—दूसरा प्रवचन

ध्‍यान योगशिविर
26 मार्च 1972, प्रात:
माऊंट आबू,
राजस्‍थान।

सूत्र :
           
           अथ अछलायनो भगवन्तं परमेष्ठिनं उपसमेत्योवाच:
                  अधीहि भगवन् ब्रह्मविद्यां वरिष्ठां
                    सदा सद्भि: सेव्यमानां निगूढाम्।
                     ययsचिरात सर्वपापं व्यपोह्य
                     परात्पर पुरुषमुपैति विद्वान ।।1।।
            तस्मै सहोवाच पितामहश्र—श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवैहि ।।2।।

तब ब्रह्मविद्या की जिज्ञासा से महर्षि अश्वलायन ब्रह्माजी के पास (शिष्यभाव से समिधा लेकर) गये और नम्रतापूर्वक कहा :

कैवल्‍य उपनिषद—ओशो

कैवल्‍य उपनिषद—ओशो

भारत के मानसिक इतिहास में एक शक्‍तिशाली समय भी था। जब कोई कौम अपनी पूरी मेधा से जलती है, जब कोई कौम अपनी पूरी आत्‍मा से प्रगट होती है। तब कमजोर नहीं होती; तब उसके वक्‍तव्‍य बड़े मूल्‍यवान होते है। और जब भी कोई कौम युवा होती है, ताजी होती है। बढ़ती होती है, शिखर की तरफ उठती है। जब कोई कौम के प्राणों में सूर्योदय का क्षण होता है। तब कोई भी चीज अस्‍वीकार नहीं होती। सभी स्‍वीकार होता है। और तब इतनी सामर्थ्‍य होती है कि कौम की आत्‍मा में कि वह जहर को भी स्‍वीकार करे तो अमृत हो जाता हे। वह जिसको भी छाती से लगा ले वही कांटा भी फूल जो जाता है। और जिस रास्‍ते पर पैर रखे वही स्‍वर्ण बिछ जाता है।

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-15)


पंद्रहवां—प्रवचन

निर्वाण रहस्‍य अर्थात स्‍म्‍यक संन्‍यास, ब्रह्म जैसी चर्या और सर्व देहनाश

ब्रह्मचर्य शांति संग्रहणम्।
ब्रह्मचर्याश्रमैऽधीत्य वानप्रस्थाश्रमेऽधीत्य स सर्वविन्यासं संन्यासम्।
अते ब्रह्माखंडाकारम् नित्यं सर्व देहनाशनम्।
एतन्निर्वाणदर्शन शिष्य विना पुत्र विना न देयम।
              इत्युपनिषत्।

ब्रह्मचर्य और शांति जिनकी संपत्ति या संग्रह है।
ब्रह्मचर्याश्रम में, फिर वानप्रस्थाश्रम में अध्ययन से फलित सर्व त्याग ही संन्यास है।
            अंत में जहां समस्त शरीरों का नाश हो जाता है
            और ब्रह्मरूप अखंड आकार में प्रतिष्ठा होती है।
                        यही निर्वाण दर्शन है,

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-14)


चौदहवां प्रवचन

भ्रांति भंजन,कामादि वृत्‍ति दहन, अनाहत मंत्र और अक्रिया में प्रतिष्‍ठा




            निस्त्रैगुण्य स्वरूपानुसंधानम् समय भ्रांति हरणम्।
                        कामादि वृत्ति दहनम्।
                        काठिन्य दृढ़ कौपीनम्।
                           चिराजिनवास:।
                   अनाहत मंत्रम् अक्रिययैव जुष्टम्।
                    स्वेच्छाचार स्वस्वभावो मोक्ष:।
                              इति स्मृते:।
                        परब्रह्म प्लव वदाचरणम्।




त्रयगुणरहित स्वरूप के अनुसंधान में तथा भ्रांति के भंजन में समय व्यतीत करना।
                  कामवासना आदि वृत्तियों का दहन करना।
                सभी कठिनाइयों में दृढ़ता ही उनका कौपीन है।
                        सदैव संघर्षों में जिनका वास है।

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-13)


तेरहवां—प्रवचन

असार बोध, अहं विसर्जन और तुरीय तक यात्रा—चैतन्‍य और साक्षीत्‍व से





                  शिवम्तुरीयं यज्ञोपवीतं तन्‍यता शिखा।
                चिन्‍मयं चौत्‍सृष्‍टिदंड्म संतताक्षि कमंडलूम।
                        कर्म निर्मूलनं कन्‍था।
                मायाममताहकार दहन श्मशाने अनाहतागी।
      
     तुरीय ब्रह्म उनका यज्ञोपवीत है और वही शिखा है।
      चैतन्यमय होकर संसार—त्याग ही दंड हैब्रह्म का नित्य दर्शन कमंडलु है।
            और कर्मों का निर्मूल कर डालना कन्धा है।
श्मशान में जिसने दहन कर दिए हैं मायाममताअहंकार
वही अनाहत अंगी—पूर्ण व्यक्तित्व वाला है।

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-12)


बारहवां—प्रवचन

 सम्‍यक त्‍याग, निर्मल शक्‍ति और परम अनुशासन मुक्‍ति में प्रवेश





                  भय मोह शोक क्रोध त्‍यागस्‍त्‍याग:।
                       परावरैक्य रसास्वादनम्।
                     अनियामकत्व निर्मल शक्ति:।
            स्वप्रकाश ब्रह्मतत्त्वे शिवशक्ति समुटित प्रपंचच्छेदनम्।
                  तथा पत्राक्षाक्षिक कमंडलु: भावाभावदहनम्।
                        विम्रत्याकाशाधारम्।



            भय, मोह, शोक और क्रोध का छोडना, यही उनका त्याग है।
            परब्रह्म के साथ एकता के रस का स्वाद ही वे लेते हैं।
                  अनियामकपन ही उनकी निर्मल शक्ति है।
      स्वयं प्रकाश ब्रह्मतत्व में शिव—शक्ति से संपुटित प्रपंच का छेदन करते हैं।
जैसे इंद्रिय रूपी पत्रों से ढंका हुआ मंडल होता है, ऐसे ही ढंकने वाले भाव और अभाव के आवरण      को भस्म कर डालने के लिए वे आकाश रूप आधार को धारण करते हैं।



सम्‍यक त्याग, निर्मल शक्ति और परम अनुशासन मुक्ति में प्रवेश

ऋषि ने पहले ही सूत्र में एक बहुत अनूठी बात कही।
कहा है, त्यागियों का त्याग है भय मोह शोक और क्रोध
इसका अर्थ हुआ, भोगियों का भी कुछ त्याग होता है। भोगी जब छोड़ता है कुछ, तो धन छोड़ता है, मोह नहीं। भोगी जब छोड़ता है कुछ, तो वस्तु छोड़ता है, वृत्ति नहीं। और वस्तु के त्याग से कुछ भी नहीं होता। क्योंकि वस्तु से कोई संबंध ही नहीं है, संबंध वृत्ति से है। दो बातें खयाल में ले लें।

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-11)

ग्‍यारहवां—प्रवचन

अंतर—आकाश में उड़ान, स्‍वतंत्रता का दायित्‍व और शक्‍तियां प्रभु—मिलन की और

 पांडरगगनम् महासिद्धांत:।
 शमदमादि दिव्यशक्लाचरणे क्षेत्र पात्र पटुता।
 परात्पर संयोग: तारकौपदेश:।
 अद्वैतसदानंदो देवता नियम:।
 स्वान्तरिन्द्रिय निग्रह:।
शुद्ध परमात्मा उनका आकाश है। यही महासिद्धांत है।
            शम—दम आदि दिव्य शक्तियों के आचरण में क्षेत्र और
                  पात्र का अनुसरण करना ही चतुराई है।
                  परात्पर से संयोग ही उनका तारक उपदेश है।
                        अद्वैत सदानंद ही उनका देव है।
            अपने अंतर की इंद्रियों का निग्रह ही उनका नियम है।

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-10)


दसवां—प्रवचन

आनंद और आलोक की अभीप्‍सा, उन्‍मनी गति और परमात्‍मा–आलंबन





                        योगेनसदानदस्वरूप दर्शनम्।
                              आनंद भिक्षाशी।
                        महाश्मशानेऽप्यानंद वने वास:।
                              एकांतस्थान मठम्।
                        उनमन्यवस्था शारदा चेष्टा।
                              उन्मनी गति:।
                        निर्मलगात्रम् निरालंब पीठम्।
                          अमृतकल्लोलानंद क्रिया।
         
         योग द्वारा वे सदैव आनंद—स्वरूप का दर्शन करते हैं।
                  आनंद—रूप भिक्षा का भोजन करते हैं।
         महाश्मशान में भी आनंददायक वन के समान निवास करते हैं।
                        एकांत ही उनका मठ है।
            प्रकाश—अवस्था के लिए वे नित—नूतन चेष्टा करते हैं।
                      अ—मन में ही वे गति करते हैं।
                  उनका शरीर निर्मल है, निरालंब आसन है।
          जैसे निनाद करती अमृत—सरिता बहती है, ऐसी उनकी क्रिया है।

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-09)

नौवां—प्रवचन 

साधक के लिए शून्‍यता, सत्‍य योग, अजपा गायत्री और विकारमुक्‍ति का महत्‍व

शून्यं न संकेत:।
परमेश्वर सत्
सत्यसिद्धयोगो मठ:।
अमरपदं न तत् स्वरूपम्।
आदिब्रह्म स्व—संवित्।
अजपागायत्री विकारदंडो ध्येय:।
मनोनिरोधिनी कन्‍था।
                        शून्य संकेत नहीं है।
                        परमेश्वर की सत्ता है।
            सच्चा और सिद्ध हुआ योग (संन्यासी का ) मठ है।
               उस आत्मस्वरूप के बिना अमरपद नहीं है।
                        आदि ब्रह्म स्व—चेतन है।
                  अजपा गायत्री है। विकार—मुक्ति ध्येय है।
                    मन का निरोध ही उनकी कन्था है।

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-05)

पांचवां—प्रवचन

संन्‍यासी अर्थात जो जाग्रत है, आत्‍मरत है, आनंदमय है, परमात्‍म—आश्रित है



                         विवेक रक्षा।
                        करुणैव केलि:।
                         आनंद माला।
              एकासन गुहायाम् मुक्‍तासन सुख गोष्ठी।
                        अकल्पित भिक्षाशी।
                           हंसाचार:।
              सर्वभूतान्तर्वर्तीम् हंस इति प्रतिपादनम्।



                     विवेक ही उनकी रक्षा है।
                  करुणा ही उनकी क्रीड़ाखेल है।
                     आनंद उनकी माला है।
      गुह्य एकांत ही उनका आसन है और मुक्त आनंद ही उनकी गोष्ठी है।

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-06)


छठवां—प्रवचन

अनंत धैर्य, अचुनाव जीवन और परात्‍पर की अभीप्‍सा

धैर्य कन्‍था।
उदासीन कौपीनम्।
विचार दंड:।
ब्रह्ममावलोक योग पट्ट:।
श्रिया पादुका:।
परेच्छाचरणम्।
कुंडलिनी बंध:।
परापवाद मुक्तो जीवनमुका:।

                   धैर्य उनकी गुदड़ी (संन्यास की झोली ) है।
                        उदासीन वृत्ति लंगोटी है।
                              विचार दंड है।
                          ब्रह्म—दर्शन योग—पट्ट है।
                         संपत्ति उनकी पादुका है।
                  परात्पर की अभीप्सा ही उनका आचरण है।
                         कुंडलिनी उनकी बंध है।
             जो दूसरे की निंदा से रहित है, वह जीवन—मुक्त है।

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-04)

चौथा—प्रवचन

पावन दीक्षी—परमात्‍मा से जुड़जाने की



                        निरालंब पीठ:।
                         संयोगदीक्षा।
                         वियोगोपदेश:।
                        दीक्षासंतोषपावनम् च।
                     द्वादश आदित्यावलोकनम्।


                     आश्रयरहित उनका आसन है।
            (परमात्मा के साथ) संयोग ही उनकी दीक्षा है।
                     संसार से छूटना ही उपदेश है।
                     दीक्षा संतोष है और पावन भी।
                     बारह सूर्यों का वे दर्शन करते है।

शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-03)


तीसरा—प्रवचन

यात्रा—अमृत की, अक्षय की—नि:संशयता, निर्वाण और केवल—ज्ञान का

गगन सिद्धान्त: अमृत कल्लोलनदी।
                  अक्षय निरंजनम्।
                  निसंशय ऋषि:।
                  निर्वाणो देवता।
                  निष्कुल प्रवृत्ति:।
                  निष्केवलज्ञानम्।
                  ऊर्ध्वामाय:।

     उनका सिद्धांत आकाश के समान निर्लेप होता है,
अमृत की तरंगों से युक्त ( आत्मारूप ) उनकी नदी होती है।
            अक्षय और निर्लेप उनका स्वरूप होता है।
            जो संशय शून्य है वह ऋषि है। 
            निर्वाण ही उनका इष्ट है।
            वे सर्व उपाधियों से मुक्त हैं।
            वहा मात्र ज्ञान ही शेष है।   
            ऊर्ध्वगमन ही जिनका पथ है।

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-02)

दूसरा—प्रवचन

निर्वाण उपनिषद—अव्‍याख्‍यकी व्‍याख्‍या का एक दुस्‍साहस



ऋतम् वदिष्यामि। सत्यम् वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतुमाम्। अवतु वक्तारमवतु वक्तारम्।
                  ओम शांति: शांति: शांति:।।

                  अथ निर्वाणोपनिषदम् व्याख्यास्याम:
                  परमहंस: सोऽहम्।
                  परिव्राजक? पश्चिम लिंगा:।
                  मन्मथक्षेत्रपाला:।

मैं ऋत भाषण करूंगा, सत्य भाषण करूंगा। मेरी रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो। मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो।
                  ओम शांति, शांति, शांति।

निर्वाण-उपनिषद--(प्रवचन-01)

निर्वाण उपनिषद




पहला—प्रवचन

शांति पाठ का द्वार, विराट सत्‍य और प्रभु का आसरा:




शांति पाठ :

ओम वाङ्गमे मनसि प्रतिष्ठता, मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् आविरा: वीर्म एधिं वेदस्य म आणीस्थ: श्रुतम् मे माप्रहासीरनेन् आधीनेन अहोरात्रात् संदधामि।

      ओम मेरी वाणी मन में स्थिर हो, मन वणी में स्थिर हो, हे स्वयंप्रकाश आत्मा! मेरे सम्मुख तुम प्रकट होओ। हे वाणी और मन! तुम दोनों मेरे वेद—ज्ञान के आधार हो, इसलिए मेरे वेदाभ्यास का नाश न करो। इस वेदाभ्यास में ही मैं रात्रि—दिन व्यतीत करता हूं।

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

निर्वाण-उपनिषद--ओशो


निर्वाण उपनिषद--ओशो 

(ओशो जी द्वारा निर्वाण उपनिषाद पर दिये गए 15 अमृत प्रवचनों का संकलन जो उन्होंने 25-9-1971 सेसे2-10-1971 तक शिविर में दिये गये प्रवचनों को संकलन)

उपनिषद का अर्थ होता है, द सीक्रेट डाक्ट्रिन। उपनिषद का अर्थ होता है, गुह्य रहस्य। उपनिषद शब्द का अर्थ होता है, जिसे गुरु के पास चरणों में बैठकर सुना। और निर्वाण उपनिषद का नाम सून कर तो मानों मन गद्द-गद्द हो उठता है। एक मिश्री की मिठास तन-मन को घेर लेती है।
सारे उपनिषद मूलत: किसी भी धर्म की शिक्षा नहीं देते। ये इतने शुद्धतम व्यिक्तत्व है, कि इनके आगे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं होती। एक-एक उपनिषद अपने में पूर्णता को समाएँ हुए हे। उपनिषदों के सूत्र—कोई ऐसे नहीं है कि उन सून हो और पूर्ण हो जाओ। ये तुम्‍हे जागरूक करने के, साधना करने के, आप अंदर अमृत्‍व भरने के लिए उत्‍साहित करते है। इस लिए एक बात कितनी अजीब है किसी भी उपनिषद के रचयिता का कोई पता नहीं है।

कठोउपनिषद--प्रवचन-17

अमृत की उपलब्‍धि मृत्‍यु के द्वार परसतरहवां प्रवचन 


शंत चैका च हदयस्य नाद्यस्तासां मूर्धानमभिनि: सुतैका।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वंङ्न्या उत्क्रमणे भवन्ति।।16।।

अंगुष्ठमात्र: पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्ट:।
तं स्वाच्छरीराह्मवृहेन्दुंजादिवेषीकां धैयेंण
तं विद्याच्छुक्रममृतं विद्याच्छूक्रममृतमिति।। 17।।

मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लम्ब्बा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्नम्।
ब्रह्मप्राप्तो विरजोडभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं वो विदध्यात्ममेव।।18।।



हृदय की (कुल मिलाकर) एक सौ एक नाड़िया हैं। उनमें से एक (नाड़ी) मूर्धा ( कपाल) की ओर निकली हुई है (इसे ही सुमुम्ना कहते हैं)। उसके द्वारा ऊपर के लोकों में जाकर (मनुष्य) अमृतत्व को प्राप्त हो जाता है। दूसरी एक सौ नाड़िया मरणकाल में (जीव को) नाना प्रकार की योनियों में ले जाने की हेतु होती हैं।।16।।

कठोउपनिषद--प्रवचन-16

कामना का विसर्जन ही मृत्‍यु का विसर्जनसोलहवां प्रवचन


 नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा।
अस्तीति ब्रुवतोsन्यत्र कथं तदुपलभ्यते।। 12।।

अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्वभावेन चोभयो:।
अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्वभाव: प्रसीदति।। 13।।

यदा सर्वे प्रमुव्यन्ते कामा येष्स्य हृदि श्रिता।
अथ मर्त्‍योsमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते।। 14।।

यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्धय:।
अथ मत्योंऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम्।। 15।।



वह परब्रह्म परमेश्वर न तो वाणी से न मन से ( और) न नेत्रों से ही प्राप्त किया जा सकता है। वह है ऐसा कहने वालों से अन्यत्र भिन्न पुरुषों को वह किस प्रकार उपलब्ध हो सकता है। 12।।