ध्यान
योग शिविर
27
मार्च 1972,
प्रात:
माऊंट
आबू, राजस्थान।
सूत्र
:
वेदात्तविज्ञान
सुनिश्रितार्था:
संन्यास
योगाद्यतय:
शुद्धसत्वा:।
ते
ब्रह्मलोकेषु
परान्तकाले
परामृतात्यरिमुच्चत्ति
सर्वे।। 4।।
अंततः
वे ही योगी
लोग परमतत्व
को प्राप्त
करने के
अधिकारी होते
हैं, जो
वेदांत में
निहित
विज्ञान का सुनश्रित
अर्थ जानते
हैं और
संन्यास व
योगाभ्यास से
अंतःकरण को
परिशुद्ध
करके
ब्रह्मलोक
में जाने का
प्रयत्न करते
हैं।। 4।।
कुछ
शब्दों के
अर्थ समझने से
इस सूत्र को शुरू
करे।