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शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

झरत दसहुं दिस मोती-(प्रवचन-08)

आठवां -प्रवचन

गगन मंडल में रास रचो रे

प्रश्न-सार:

01-ओशो,
क्या संसार में निराशा ही निराशा हाथ लगती है? क्या आशा रखना बिल्कुल ही व्यर्थ है?
02-ओशो,
मैं जब से यहां आया हूं तब से बस आपकी ही याद हृदय में समाई रहती है। शेष सब असार प्रतीत होता है। अब मैं क्या करूं?
03-ओशो,
मैं आपको समझ क्यों नहीं पाता हूं?
04-ओशो,
ऐसा लगता है कि हाथी जा चुका और मैं पूंछ को नाहक ही पकड़े हूं। सद्गुरु कृपा करो ताकि यह अंधकार जाए अब!


पहला प्रश्नः ओशो, क्या संसार में निराशा ही निराशा हाथ लगती है? क्या आशा रखना बिल्कुल ही व्यर्थ है?

आनंद तीर्थ! आशा के कारण ही निराशा हाथ लगती है, संसार के कारण नहीं। संसार को क्या पड़ी! संसार तो बिल्कुल तटस्थ है। सब खेल तुम्हीं रचा लेते हो। आशा बांधते हो, इससे निराशा हाथ लगती है। आशा का अर्थ है: तुम चाहते हो भविष्य ऐसा हो। तुम्हारी वासना के अनुकूल, तुम्हारी तृष्णा के अनुकूल। और यह विराट अस्तित्व तुम्हारी क्षुद्र वासनाओं के अनुकूल नहीं चल सकता। और एकाध ही कोई होता तो भी ठीक था, करोड़-करोड़ जन हैं, उनकी अरबों-खरबों वासनाएं हैं, अगर उन सब की वासनाओं के अनुकूल विश्व चले, एक पग भी नहीं चल सकेगा। अभी बिखर जाएगा। अभी खंड-खंड हो जाएगा। यह फिर ब्रह्मांड नहीं रहेगा। इसके भीतर जो अभी संगीत है, जो तारतम्य है, इस जगत के भीतर अभी जो एक समायोजन है, हर चीज एक-दूसरे से तालबद्ध है, वह सब बिखर जाएगा। तुम्हारी व्यक्तिगत आकांक्षा के कारण अस्तित्व उसका अनुसरण नहीं कर सकता। पूर्ण अंश के पीछे नहीं चल सकता।
और हम क्या हैं? हम छोटे-से अंश हैं। जैसे सागर की एक छोटी-सी तरंग। तरंग चाहे कि सागर मेरे अनुकूल चले, यह कैसे होगा? और यही हम चाह रहे हैं। इसी असंभव का नाम तृष्णा है। हां, सागर के साथ तरंग चल सकती है, तो जीतेगी, फिर कोई निराशा नहीं है। लेकिन सागर के साथ जब तरंग चलेगी, तो पहले तो आशा छोड़ देनी होगी। फिर जहां ले जाए विराट, जो उसकी मर्जी! ‘जेहि विधि राखे राम‘। फिर तुम्हारी कोई आशा नहीं है; इसलिए तुम्हारी कोई निराशा भी नहीं हो सकती। आशा के बीज बोओगे, निराशा की फसल काटोगे। सफलता की आकांक्षा असफलता की खाइयों में, खड्डों में गिरोगे। विजय चाहते हो, हार सुनिश्चित है।
इस महागणित को ठीक से समझ लो। इसे जिसने समझ लिया, वह बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया।
अगर जीतना हो, तो जीतने की बात ही छोड़ दो। फिर तुम्हें कोई हरा नहीं सकता। अगर जीवन में आनंदित होना हो, तो आनंद पाने की बात ही मत उठाना; आनंद की चर्चा ही मत छेड़ना; आनंद पर अपनी आशा मत टिकाना और आनंद की वर्षा हो जाएगी।
लाओत्सु ने कहा है: कोई देखूं मुझे हराए तो! कोई मुझे हरा नहीं सकता। उसके एक शिष्य ने पूछा, लेकिन बड़े-बड़े पहलवान हैं, आप ज्ञानी हैं जरूर, लेकिन देह में तो बड़े बलिष्ठ लोग हैं, वे आपको हरा सकते हैं। लाओत्सु ने कहा: कोई मुझे नहीं हरा सकता, क्योंकि मैं पहले से ही हारा हुआ हूं। मुझे वह हराएगा, उसके पहले ही मैं चारों खाने चित लेट जाऊंगा; फिर वह क्या करेगा?
हारे को कैसे हराओगे? और जो विराट के सामने हार गया है, वह जीत गया। परमात्मा के सामने हार कहीं होती है! वहां हारना तो विजय के हारों से लद जाना है, मोतियों के हारों से लद जाना है।
तुम पूछते हो: ‘क्या संसार में निराशा ही निराशा हाथ लगती है? ’
संसार का कुछ लेना-देना नहीं। संसार बिल्कुल तटस्थ है। सब तुम पर निर्भर है। तुम अगर जगत की अंतर्तम व्यवस्था के साथ चलो, तो जीत ही जीत है। आशा और आशा के दीये जलने लगेंगे। दीपावली हो जाएगी। ऐसे दीये जलेंगे जो कभी बुझते नहीं। तुम्हारी विजय-पताकाएं शाश्वत में उड़ेंगी। तुम ऐसे सिंहासन पर विराजमान हो जाओगे, जिससे कोई कभी उतरा नहीं। गुलाल कल उसी सिंहासन की बात कर रहे थे। सहस्रदल कमल खुलेगा तुम्हारे भीतर, उसके सिंहासन पर तुम विराजमान हो जाओगे। मगर यह सौभाग्य उनको मिलता है, जो इतनी हिम्मत रखते हैं कि अपने अहंकार को परमात्मा के चरणों में चढ़ा दें।
हां, तुम अगर चाहो कि तुम्हारा अहंकार जीते तो बुरे पिटोगे। जितना बड़ा अहंकार होगा, उतने ज्यादा पिटोगे। अहंकार के अनुपात में ही तुम्हारी पिटाई होती है। जो इतनी हारें, इतनी असफलताएं, इतने विषाद तुम्हारे जीवन में आते हैं, ये तुमने ही पुकारे हैं, ये तुमने ही आमंत्रित किए हैं। यह अहंकार चुम्बक की तरह इनको खींचता है। अहंकार भ्रांति है। तुम अलग नहीं हो अस्तित्व से, इसलिए तुम्हारी अलग आकांक्षा क्या, आशा क्या? तुम अगर अलग होते तो आकांक्षा अलग हो सकती थी, आशा अलग हो सकती थी। तुम विराट के साथ एक हो ही। जैसे कोई पत्ता वृक्ष का अपनी निजी आकांक्षा रखता हो, तो मुश्किल में पड़ेगा। जब वृक्ष नाचेगा हवाओं में, उस पत्ते को नाचना नहीं, अभी वह विश्राम कर रहा है। और जब वृक्ष शांत है और हवाएं नहीं बह रही हैं, तब उस पत्ते को नाचना है, उसका विश्राम पूरा हो गया। वह कभी वृक्ष के साथ अपने को पाएगा नहीं। और जब वृक्ष नहीं नाच रहा है तो पत्ता कैसे नाचेगा? और जब वृक्ष नाच रहा है, तो पत्ता अपने को नाचने से कैसे रोग पाएगा? हर घड़ी पत्ते को निराशा हाथ लगेगी, हर घड़ी ऐसा लगेगा कि सारा नियोजन मेरे विपरीत है, सब मेरे दुश्मन हैं। कोई तुम्हारा दुश्मन नहीं है, सिवाय तुम्हारे। और कोई तुम्हारा मित्र नहीं है, सिवाय तुम्हारे। अगर अहंकार गिरा दो तो तुम अपने मित्र हो, अगर अहंकार को उठाए रखो तो तुम अपने शत्रु हो।
संसार को मत दोष दो। दोष है तो तुम्हारे अपने ही मन का है। लेकिन अपने को दोष कोई देना नहीं चाहता। हम हमेशा कोशिश करते हैं कि कोई और मिल जाए जिसके कंधे पर हम अपने सारे दोषों का बोझ रख दें। तो हमने अच्छे-अच्छे शब्द गढ़ लिए हैं। मूढ़ता तुम करोगे, दोष संसार का है। तो फिर स्वभावतः इस तर्क की निष्पत्ति यह होती है कि अगर आनंदित होना है, संसार का त्याग करो। मूढ़ता का त्याग मत करना! क्योंकि मूढ़ता तो दोषी तुमने कभी ठहराई नहीं। संसार को छोड़ दो, लेकिन मूढ़ता तुम्हारे भीतर है, संसार छोड़ कर जहां भी जाओगे, मूढ़ता तुम्हारे साथ रहेगी। तुम जो भी करोगे, उसी में मूढ़ता होगी। तुम दुकान करोगे तो मूढ़ता होगी, तुम पूजा करोगे तो मूढ़ता होगी। तुम्हारी पूजा तुम्हारी मूढ़ता से ही निकलेगी न! तुम्हारी पूजा आएगी कहां से? तुम्हारी प्रार्थना कहां से आएगी? तुम्हारी प्रार्थना में भी वही रोग होगा जो दुकान में था, जो बाजार में था, वही मंदिर में होगा, वही तीर्थ में होगा। जो घर-गृहस्थी में था, वही हिमालय की गुफा में भी होगा। तुम्हारी प्रार्थना तुम से ही तो जन्मेगी। तुम्हारा ही रंग होगा तुम्हारी प्रार्थना में, तुम्हारा ही ढंग होगा। तुम वहां बैठकर भी फिर नया संसार बनाओगे। वहां बैठ कर फिर तुम कल्पनाओं का नया जाल रचोगे, फिर आशा बांधोगे।
गुफाओं में बैठे हैं जो लोग हिमालय की, तुम सोचते हो आशा से मुक्त हैं? आशा से मुक्त हों तो गुफाओं में बैठने की जरूरत क्या है? वहां बैठ कर वे स्वप्न देख रहे हैं स्वर्गों के। तुम्हारे सपने तो बहुत छोटे हैं। तुम्हारे सपने कुछ बहुत बड़े नहीं हैं। तुम सपने ही क्या देख रहे हो! यही कि कोई एक बड़ा मकान मिल जाए; यही कि कुछ थोड़ा धन हो, थोड़ी संपदा हो; यही कि कोई सुंदर पत्नी मिल जाए, पति मिल जाए, यही कि कोई अच्छा पद मिल जाए। तुम्हारे सपने भी छोटे-छोटे हैं। तुम्हारे सपने उतने बड़े नहीं हैं जितने संन्यासियों के, साधुओं के, तुम्हारे तथाकथित महात्माओं के। उनके सपने ये हैं: स्वर्ग मिलना चाहिए, कल्पवृक्ष मिलने चाहिए, जिनके नीचे बैठने से सारी आकांक्षाएं पूरी हो जाती हैं। कुछ करना नहीं पड़ता, बैठे वृक्ष के नीचे और जो सोचा, तत्क्षण पूरा हुआ। गजब के आलसियों ने यह कल्पना की होगी कल्पवृक्ष की! हाथ नहीं हिलाना पड़ता।
मैंने सुना है, एक आदमी भूले-भटके कल्पवृक्ष के नीचे पहुंच गया। उसे पता नहीं था कि यह कल्पवृक्ष है। थका-मांदा था, वृक्ष के नीचे बैठा था छाया देख कर, सोचा कि ऐसे में कहीं आसपास भोजन मिल जाता; कितनी भूख लगी है! कल्पवृक्ष था वह। तत्क्षण अप्सराएं स्वर्ण की थालियों में तरह-तरह के मिष्ठान्न, भोजन, मेवे लेकर उपस्थित हो गईं। वह इतना भूखा था कि उसने विचार भी नहीं किया कि यह तत्क्षण किस लोक से अप्सराएं उतरीं! रहा होगा कोई महात्मा। क्योंकि महात्मा इन बातों पर बड़ा भरोसा कर लेते हैं। सोचा होगा, है किसी पुण्य का फल; है जन्मों-जन्मों की कमाई। अरे, माला भी कुछ कम जपी है! यह कभी का होना चाहिए था, वैसे ही बहुत देर हो गई है। भोजन करके स्वभावतः ख्याल उठा कि कुछ लेटने की जगह होती, कुछ सुंदर तकिया-गद्दा होता, तो विश्राम कर लेते। एकदम एक सुंदर शय्या, स्वर्ण शय्या सुंदर गद्दे-तकिए..महात्मा तो एकदम लेट गया, सो गया! नींद खुली जब दो-तीन घंटे बाद, तो सोचा बड़ी प्यास लगी है, पानी होता! गुलाब की सुगंध से भरा हुआ जल। ऐसा स्वादिष्ट जल उसने कभी न पीया था। जल-पीते अब उसे जरा सोच-समझ लौटा, विचार लौटा कि यह मामला क्या है? पहले थालियां आईं, फिर शैय्या आई, पानी भी आ गया; इस झाड़ में कोई भूत-प्रेत तो नहीं है? सो भूत-प्रेत प्रगट हो गए। कल्पवृक्ष तो कल्पवृक्ष है। चारों तरफ एकदम नंग-धड़ंग भूत-प्रेत नाचने लगे। बहुत घबड़ाया, कहा कि अब मारे गए! सो मारा गया। भूत-प्रेत चढ़ बैठे उसकी छाती पर, खूब उसको दबोचा, खूब उसको पीटा, गर्दन दबा दी। जो सोचा, वह हुआ?
कल्पवृक्ष की कल्पनाएं लिए बैठे हैं तुम्हारे महात्मा। आलसियों की कल्पनाएं हैं, काहिलों की कल्पनाएं हैं, मुप132तखोरों की कल्पनाएं हैं। तुम्हारी कल्पनाएं तो छोटी हैं, तुमको कहते हैं पापी और उनकी कल्पनाएं तुमसे बड़ी हैं और स्वयं को समझते हैं महात्मा! तुम पकड़ते हो छोटी-मोटी चीजों को, तो तुमको कहते हैं, लोभी, और वे पकड़ते हैं शाश्वत को और स्वयं को समझते हैं, निर्लोभ को उपलब्ध हो गए हैं।
मैंने सुना है, एक गांव में एक कंजूस रहता था..बड़ा कंजूस। उसने सुना कि पड़ोस के गांव में एक और भी बड़ा कंजूस है। और लोगों ने कहा कि तुम उसके आगे कुछ भी नहीं। दिल को बड़ी चोट लगी। अहंकार को बड़ा धक्का लगा। जब धीरे-धीरे पड़ोस के गांव के कंजूस की ख्याति बहुत दूर-दूर तक फैलने लगी, तो इस कंजूस ने सोचा कि मैं भी जाकर मिलूं, दर्शन करूं, देखूं कि ऐसा क्या है जो उसकी महानता की इतनी चर्चा हो रही है और मेरी कोई चर्चा नहीं!
सो उसने एक कागज लिया और उस कागज के ऊपर दो स्वस्थ सुंदर खरगोशों के चित्र बनाए और चित्र को एक डलिया में लेकर पड़ोस के गांव को रवाना हो गया। पहुंचा उस गांव जाकर, दस्तक दी द्वार पर, द्वार खुला, कंजूस का बेटा बाहर आया; उसने पूछा कि फलां सज्जन कहां हैं, मैं उनसे मिलने आया हूं। बेटे ने कहा: वे तो अभी बाहर गए हैं और दो-तीन दिन तक शायद ही वापिस आएं, लेकिन मैं हूं उनका बेटा, कहें, क्या सेवा करूं? उस कंजूस ने कहा कि मैं उनके लिए भेंट लाया था, और उसने निकाली डालिया में से उन सुंदर खरगोशों की तस्वीर और लड़के को देते हुए कि यह मेरी भेंट उन्हें दे देना और कहना मैं उनसे मिलने आया था; मैं उनके पास के गांव में ही रहता हूं। बेटे ने कहा कि जब आए हैं इतनी दूर से, चल कर आए हैं, तो कुछ भेंट हमारी तरफ से भी लेते जाएं। भीतर आएं। ले गया भीतर और कहा कि डलिया खोलें। खोली कंजूस ने डलिया, लड़के ने अपने हाथ से आम का आकार बनाया हवा में और कहा कि ये आम लेते जाएं। यह हमारी भेंट। अब आम तो थे नहीं, बस हवा में आम का आकार बनाया और उसकी झोली में डाल दिया।
कंजूस लौटा अपने घर तो मन ही मन सोचता आया कि जैसा सुना था वैसा ही पाया। अरे, मैं तो कम से कम कागज पर बना कर ले गया था खरगोश और लड़के ने तो एक कागज तक खर्च न किया, रंग खर्च न किए, हवा में ही आम बना कर दे दिए। जब बेटा इतना कंजूस है तो बाप से तो ईश्वर ही बचाए!
इधर दूसरे गांव से बाप घर लौटा, बेटे ने सारी गाथा उसे सुनाई और उसने कहा कि वह आदमी ये दो खरगोश भेंट दे गया है। और भेंट मैंने भी दे दी, खाली हाथ उसे जाने नहीं दिया, उसे मैंने कुछ आम भेंट दिए। लड़के ने पुनः आम की आकृति बनाई और कहा कि इस तरह मैंने उसकी डलिया में डाल दीं। बाप ने देखा तो जोर से एक चांटा अपने बेटे को मारा और कहा कि अरे, उल्लू के पट्ठे! जब मैं घर नहीं होता तब तू कुछ न कुछ गड़बड़ करता ही है! अरे नालायक, आखिर इतने बड़े-बड़े आम देने की क्या जरूरत थी? अरे, देने ही थे तो छोटे-छोटे भी दे सकता था! तू तो मुझे लुटवा कर रहेगा एक दिन!
जिनको तुम महात्मा कहते हो, उनकी कामनाएं तो देखो, उनकी वासनाएं तो देखो, उनकी तृष्णाएं तो देखो! तुम अगर छोटे कंजूस हो, तो वे महाकंजूस हैं। तुम अगर चीजों को पकड़ते हो, तो वे भी पकड़े हुए हैं। मगर वे ऐसी चीजों को पकड़ते हैं जो छीनी न जा सकें। तुम तो ऐसी चीजों को पकड़ रहे हो जो छिन जाएंगी। तुम क्या खाक लोभी हो! तुम भी जानते हो कि यह सब पड़ा रह जाएगा; ‘जब बांध चलेगा बंजारा,’ ‘सब ठाठ पड़ा रह जाएगा’, यह तो तुम जानते हो। उन्होंने नहीं पकड़ा है इसे, इसीलिए कि सब ठाठ पड़ा रह जाएगा। कुछ ऐसा पकड़ो कि पड़ा न रह जाए, साथ जाए। वे मरने के बाद भी साथ ले जाना चाहते हैं कुछ। तुम क्षणभंगुर पर अपनी आशाएं टिकाए हो, वे शाश्वत पर अपनी आशाएं टिकाएं हैं। भेद कहां हैं? मैं इनको महात्मा नहीं कहता हूं। ये महा सांसारिक हैं। मैं तो महात्मा उसे कहता हूं, जिसने यह सत्य समझा कि मैं अलग हूं ही नहीं। इसलिए मेरी क्या आकांक्षा! न धन में उसका भरोसा है, न पद में उसका भरोसा है, न कल्पवृक्षों, में न स्वर्गो में। वह किसी चीज पर अपनी आशा ही नहीं टिकाता। न क्षणभंगुर पर, न कालातीत पर। उसने अपनी आशा को ही व्यर्थ देख कर छोड़ दिया है। आशा के छूटते ही निराशा समाप्त हो जाती है।
जरा सोचो, अगर आशा न हो तो निराशा कैसे होगी? अगर तुम्हारे मन में आशा ही नहीं है, तो तुम कैसे हताश होओगे? असंभव। आशा गई तो निराशा गई। सफलता गई तो असफलता गई। दिन गया तो रात गई। वे साथ-साथ हैं, संयुक्त हैं। दोनों साथ ही हो सकते हैं..और साथ ही जाते हैं।
संसार को दोष मत दो! अपने मन को समझो। मन ही तुम्हारा असली संसार है। लेकिन मन की तो हम चिंता नहीं करते, मन को तो लिए फिरते हैं, मन को तो सजाते हैं, संसार को गालियां देते हैं। संसार जिसने तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ा नहीं। यह वृक्षों का संसार, यह चांद-तारों का संसार, ये आकाश में सूरज, ये बदलियां, इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा? यह विराट की अदभुत लीला, इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा? इसको गाली देते हो। कहते हो, यह सब माया। और भीतर तुम्हारे जो माया का मूल स्त्रोत है, तुम्हारी कल्पनाओं का जाल, तुम्हारी आकांक्षाओं का जाल, तुम्हारी तृष्णाओं का अनंत-अनंत फैलाव, उसको गटके बैठे हो! उसको उगलो! उसको थूको! वहीं है भूल।
मैं तुम्हारे मन को संसार कहता हूं।
रंगों के मनहर मेले!
चले गए छोड़ अकेले!!
टूटे अनुबंधों जैसे,
रूठे संबंधों जैसे,
बिखर रहे पल-अनुपल हम..
फूटे तटबंधों जैसे;
झरे-गिरे पीत पात से,
भरे-भरे गीत गात से;
पीड़ाओं में घुले-मिले,
आंसू से जी भर खेले!
शापित वरदान सरीखे,
बुझ कर भी जलते दीखे;
अर्थ हीन जीवन जीना,
जग आकर हमसे सीखे;
अपनों के तेवर बदले,
सपनों के जेवर बदले;
प्रज्वलित पलाश से नयन,
जैसे गेरू के ढेले!
सांसें घनसार हो गईं,
आशाएं क्षार हो गईं;
अधरों पर चिपकीं बेबस,
मुसकानें भार हो गईं;
रोम-रोम जलती होली
भाल लगी उलझन-रोली;
एक भाव से तटस्थ हो,
फाग-आग दोनों झेले!
रंगों के मनहर मेले!!
सब मेले तुम्हारे मन में हैं। ये सब रंग तुम्हारे मन में हैं। ये सब इद्रंधनुष तुम फैलाते हो। और फिर इन इंद्रधनुषों को फैलाते हो, फिर उनको पकड़ने चलते हो। फिर हाथ कुछ नहीं लगता तो रोते हो। फिर गालियां संसार को देते हो। मन के प्रति जागो! मन से जागो! मन के साक्षी बनो!
आनंद तीर्थ, मन के प्रति साक्षी बनते ही छुटकारा हो जाता है। इस संसार से ही नहीं, उस पारलौकिक संसार से भी। जैसे ही तुम मन के प्रति जागे और तुमने देखा कि मन सारा खेल कर रहा है...मन एक प्रोजेक्टर है। तुम फिल्म देखने जाते हो न, तो तुम्हारी आंखें तो पर्दे पर अटकी रहती हैं, तुम पीछे तो लौट कर देखते भी नहीं, असली खेल पीछे चल रहा है। वह जो प्रोजेक्टर पीछे लगा हुआ है, फिल्म वहां है। पर्दे पर तो केवल प्रक्षेपित होती है। लेकिन तुम पर्दे पर उलझे हो जहां कुछ भी नहीं है, सिर्फ धूप-छांव का खेल है। मगर कैसे उलझते हो! अगर कोई दुखांत दृश्य आ जाता है तो आंसू टप-टप झर जाते हैं। अगर कोई सुखांत दृश्य आ जाता है तो हंसी के फव्वारे छूट जाते हैं। तुम कितने रंगों में से गुजर जाते हो एक फिल्म को देखते हुए! और जानते भलीभांति कि परदा है और कुछ भी नहीं। फिर भी धोखा खा जाते हो, जान-जान कर धोखा खा जाते हो! लेकिन असली प्रोजेक्टर पीछे है। वहां प्रोजेक्टर कोई बंद कर दे, परदा खाली हो जाए।
मैं तुमसे यह कह रहा हूं कि संसार तो केवल परदा है, मन जो तुम्हारे भीतर छिपा है, वहां सारा खेल चल रहा है। उस खेल को तुम प्रक्षेपित करते रहते हो बाहर। जिस दिन भीतर मन से छूट जाओगे, उस दिन बाहर का संसार तत्क्षण बदल जाता है, इसके रंग-ढंग बदल जाते हैं। उस दिन संसार पाया ही नहीं जाता, परमात्मा ही पाया जाता है। उसका कोरा निर्दोष अस्तित्व तुम विकृत कर रहे हो। तुम डाले ही जाते हो अपनी आशाएं, अपनी तृष्णाएं। तुम फैलाए ही जाते हो ये मकड़ी के जाल! अपने ही भीतर से निकालती है मकड़ी और जाला रच देती है। ऐसे ही तुम भी अपने ही भीतर से निकालते हो ये जाले और रचते चले जाते हो। फिर अपने ही रचे जालों में उलझ जाते हो। फिर चीखते-चिल्लाते हो कि बचाओ!
अब तुम पूछ रहे हो, क्या संसार में निराशा ही निराशा हाथ लगती है? बहुत आशा की होगी, तो निराशा ही निराशा हाथ लगेगी। अगर आशा न की हो तो निराशा बिल्कुल हाथ नहीं लगती। मेरे हाथ तो निराशा बिल्कुल नहीं लगती। वर्षो से निराशा से मैं अपरिचित हूं। कभी-कभी कोशिश भी करता हूं कि निराशा हाथ लगे, नहीं लगती। प्रोजेक्टर टूट गया। और तुम कहते हो, क्या निराशा ही निराशा हाथ लगती है? सब तुम पर निर्भर है।
भूल कर भी तुम न आए!
आंख के आंसू उमड़ कर,
आंख ही में हैं समाए।।
सुरभि सेशंृगार कर..
नव वायु प्रिय-पथ में समाई,
अरुण कलियों ने स्वयं, सज,
आरती उर में सजाई।
बंदनाकार पल्लवों ने,
नवल वंदनवार छाए।।
मैं ससीम, असीम सुख से,
सींचकर संसार सारा।
सांस की विरुदावली से,
गा रहा हूं यश तुम्हारा।
पर तुम्हें अब कौन स्वर,
स्वरकार! मेरे पास लाए?
भूलकर भी तुम न आए!
परमात्मा को पुकारोगे तो तुमने पुकार में एक बात मान ली कि वह दूर है। और जिसने उसे दूर मान लिया, उसके लिए दूर है। सब मान्यता का खेल है। सच्ची प्रार्थना पुकार नहीं होती, मौन होती है, निःशब्द होती है। निःशब्द प्रार्थना का अर्थ है कि इतने करीब हैं कि उससे बोलें क्या? उससे कहें क्या? हमारे कहने के पहले वह जान लेता है; हमारे जानने कि पहले वह जान लेता है। हमें तो बहुत बाद में खबर होती है। हमें तो खबर होते-होते ही खबर होती है। पता चलते-चलते ही चल पाता है। वह तो हमारे अंतर्तम में विराजमान है। उससे कहना क्या है? उसे बताना क्या है? उसे सलाह क्या देनी है?
तुम मंदिरों में क्या कर रहे हो? मस्जिदों में क्या कर रहे हो? परमात्मा को सलाह दे रहे हो। ऐसा करो, वैसा करो, कि मेरी पत्नी बीमार है, उसको ठीक करो; कि मेरे बच्चे को नौकरी नहीं लग रही है, नौकरी लगाओ। मांगे जा रहे हो भिखमंगों की तरह। और अगर नौकरी न लगी तुम्हारे बेटे की, तो निराशा आ गई। अगर पत्नी ठीक न हुई, तो निराशा आ गई।
हो गई ठीक, संयोगवशत, तो भी झंझट है।
मैं जबलपुर में था। एक शाम अपने बगीचे में टहल रहा था और एक सज्जन मिलने आ गए; तो वहीं खड़ी कार से मैं टिक कर खड़ा हो गया और उनसे बातें करने लगा। उन्होंने जल्दी से नोट बुक निकाली, कुछ नोट करने लगे। मैंने कहा, क्या करते हो? उन्होंने कहा कि बस, इशारा आपने दे दिया। मैंने कहा, मैं अभी बोला भी नहीं, ऐसे तो मैं बोल-बोल कर परेशान हो जाता हूं तो भी लोगों को इशारे नहीं मिलते, तुम तो गजब के ज्ञानी मालूम होते हो! मैंने कहा, जरा देखूं, क्या नोट किया! नोट किया उन्होंने कार का नंबर। कहने लगे, मैं यही पूछने आया था कि लाटरी में कौन से नंबर का टिकट खरीदूं? आपने भी गजब कर दिया, नंबर से ही टिक कर खड़े हो गए। इशारा मैं फौरन समझ गया कि अरे वाह, मैंने कहा भी नहीं, पूछा भी नहीं अभी और आप हाथ रख कर नंबर पर ही खड़े हो गए। साफ कह दिया अब और क्या है! मैंने कहा: अब तुम मुझे झंझट में डालोगे। अगर यह नंबर न निकला, तब तो कुछ हर्जा नहीं, मेरा तुमसे छुटकारा हुआ, तुम कहीं और नंबर तलाशोगे। मगर संयोगवशात, भूल-चूक से यह नंबर कहीं अगर लग गया, तो तुम मेरी गर्दन से बंधे!
लोग वासनाओं से भरे हैं, तृष्णाओं से भरे हैं, अपनी कल्पनाओं के जाल से भरे चल रहे हैं। अब मैं भी उनसे कह रहा हूं कि मेरा कोई इशारा नहीं है, यह तो सिर्प मैं टिक कर खड़ा हो गया, तुमसे बात करनी थी; यह मेरे घूमने का समय था, तुम बेवक्त आ गए हो, गाड़ी पास थी तो टिक कर खड़ा हो गया हूं, मुझे क्षमा करो, गलती हो गई, मगर वे मेरी सुनने को राजी नहीं। वे तो जल्दी से नमस्कार किए और चलते बने, उन्होंने कहा कि बस चलता हूं, बात हो गई।
वासनाओं से भरा हुआ आदमी वही देखता है जो देखना चाहता है, वही सुनता है जो सुनना चाहता है। वासनाएं उसे वह नहीं देखने देतीं, जो है; वह नहीं देखने देतीं, जो चारों तरफ मौजूद है। वासनाएं उसे छोटा सा जगत देखने देती हैं..और वह जगत भी उसका अपना निर्मित होता है।
चंदूलाल उन दिनों सड़क के किनारे विज्ञापनों के बड़े-बड़े बोर्ड बनाया करता था। एक दिन वह ऊपर की सीढ़ी पर से नीचे आ गिरा तो उसे बहुत चोट आ गई। ढब्बू जी उसे देखने अस्पताल पहुंचे। देखा चंदूलाल को जगह-जगह 179ौक्चर पर पट्टियां बंधी हैं..सारे शरीर पर 179ौक्चर ही 179ौक्चर हैं; कुछ दिखाई नहीं पड़ता, बस आंखें दिखाई पड़ती हैं और मुंह दिखाई पड़ता है। ढब्बू जी को बहुत दुख हुआ और कहा कि बहुत दुखी हूं। तुम्हें बहुत दुख हो रहा होगा? चंदूलाल ने कहा कि ऐसे नहीं होता, हां जब हंसता हूं, तब जगह-जगह बहुत दुख होता है। ढब्बू जी ने कहा: लेकिन इसमें हंसने की बात ही कहां है? हंसते काहे के लिए हो?
तो चंदूलाल ने कहा: हंसने का कारण यह है कि अब कुछ न पूछो! न पूछो तो अच्छा! अरे, मैं जिस जगह काम कर रहा था, उसके सामने वाले मकान की खिड़की में एक नवयुवती अपनी ड्रेस बदल रही थी। वह अपना आखिरी कपड़ा उतारने ही जा रही थी कि सीढ़ी टूट गई और मैं नीचे आ गिरा और यह हालत हुई!
ढब्बूजी ने आश्चर्य से पूछा कि लेकिन सीढ़ी टूटी कैसे? क्या तुम्हारे वजन से सीढ़ी टूटी? चंदूलाल बोले: अरे साली मेरे वजन से कहां, वह तो पच्चीस आदमी और जो चढ़े हुए थे! उनके वजन के कारण टूटी। ...कोई मैं अकेला थोड़े ही सीढ़ी पर था, पूरा गांव ही चढ़ा हुआ था। सीढ़ी भी कब तक ठहरती! और इसीलिए कभी-कभी रह-रह कर उनको हंसी आ जाती है कि वाह रे वाह!!
लोग जो देख रहे हैं, लोग जो सुन रहे हैं, वह वह नहीं है जो है, उनकी अपनी कल्पना के जाल हैं। उनके लिए वे काफी कीमतें चुका रहे हैं। जिंदगी भर गंवाते हैं, हड्डी-पसली टूट जाती है, अस्थिपंजर रह जाते हैं, मगर रोग वही पुराने के पुराने। इसीलिए सत्य को कहना मुश्किल है।
कल रात ही एक भारतीय मित्र ने, जो अमरीका में निवास करते हैं, संन्यास लिया। मैंने उन्हें नाम दिया: अशोक मुनि। उनसे मैंने कहा: अशोक शब्द बुद्ध का शब्द है। बुद्ध के पहले ज्ञानी अशोक की बात नहीं करते थे। आनंद की बात करते थे। आनंद का अर्थ होता है विधायक और अशोक का अर्थ होता है, दुख नहीं, नकारात्मक। बुद्ध को मजबूरी में अशोक की बात करनी पड़ी कि लोग यह सुन कर कि परमात्मा सच्चिदानंद है, उसके प्रति ही वासना करने लगे। आनंद है तो पा कर रहेंगे। आनंद शब्द उनके भीतर गुदगुदी उठाने लगा। आनंद शब्द उनकी लार टपकाने लगा। आनंद शब्द पर उनको लोभ लगने लगा, वासना जगने लगी। आनंद है तो वे पा कर रहेंगे। आनंद से उन्होंने समझा कि महासुख, अंनत सुख, सुख ही सुख, जिसमें दुख बिल्कुल नहीं बचा, ऐसा, तो फिर दौड़ पड़े लोग! मगर आनंद की शर्त ही यही है कि जब तक वासना है तब तक उपलब्ध नहीं होता। परमात्मा ने भी खूब उलटी शर्तें लगा रखी हैं कि जब तक दौड़ोगे, जब तक वासना करोगे, तब तक आनंद उपलब्ध नहीं होगा। अब लगी फांसी! और आनंद चाहिए! मगर चाहिए तो मिलेगा नहीं। आनंद मिलता है उनको जिन्हें कुछ भी नहीं। जो कहते हैं, चाह ही गई। जिनके भीतर चाह का तूफान, अंधड़ नहीं रह जाता, उनको आनंद मिलता है।
लोग सोचते हैं परमात्मा तक को धोखा दे देंगे; वे कहते हैं, चलो यही सही, चलो चाह ही छोड़ देंगे! अगर चाह छोड़ने से ही आनंद मिलता हो तो हम इसके लिए भी राजी हैं। मगर भीतर उनके भाव अब भी वही हैं: मिलना चाहिए आनंद। चाह छोड़ने तक को राजी हैं! मुझसे लोग पूछते हैं, तब पक्का है कि मिलेगा? हम चाह भी छोड़ देंगे। मगर कहां चाह छोड़ रहे हो? तुम तो चाह को पक्का किए ले रहे हो। पक्का है, मिलेगा? चलो यह भी करेंगे, अगर चाह छोड़नी है तो यह शर्त भी पूरी कर देंगे, मगर ऐसा आदमी बीच-बीच में आंख खोल कर देखता रहेगा: अभी तक मिला नहीं! चाह की चाह गई और आनंद का कुछ पता नहीं! अब कितनी देर और लगेगी? मगर यह बीच-बीच में आंख खोल कर देखना ही बता देगा कि अभी चाह उतनी की उतनी मौजूद है जितनी पहले थी, छिपकर मौजूद है।
बुद्ध के पहले उपनिषदों ने परमात्मा की सीधी विधायक व्याख्या की थीः सच्चिदानंद; वह परम आनंद है। बुद्ध ने परिभाषा बदल दी। देखा कि लोग समझे नहीं उसे। लोगों ने गलत समझा। लोगों ने आनंद को ही अपना लक्ष्य बना लिया। बुद्ध ने कहा: परम अवस्था का केवल इतना ही अर्थ है कि वहां दुख नहीं है। सुख की मत बात करो, सिर्फ दुख नहीं है।
इस भेद को जरा समझना।
अगर कोई कहे कि वहां परम आनंद है, तो एकदम उछाह उठती है, उमंग उठती है, कि पा लें! और कोई कहे कि वहां दुख नहीं है, तो दिल बैठ जाता है, कि दुख नहीं, बस इतना ही! कुछ और बताएं; मिलेगा क्या? बुद्ध कहते हैं: मिलेगा यही कि दुख नहीं है। दुख-निरोध। बुद्ध ने शब्द उपयोग किया: दुख-निरोध। कि वहां दुख न रह जाएंगे। दोनों में बड़ा फर्क हो गया। बात एक ही थी। मगर वासनाग्रस्त लोगों को बुद्ध की बात नहीं जमी। इसलिए आज भी वे उपनिषद दोहराए जा रहे हैं और बुद्ध को तो कब का भुला चुके हैं! भारत से तो बुद्ध की जड़ें उखाड़ कर फेंक दीं। हालांकि बुद्ध ने जो किया था, वह महत कार्य था। बहुत अदभुत कार्य था। बुद्ध ने चेष्टा की थी कि तुम्हारे भीतर वासना को बिल्कुल ही काट दिया जाए, ताकि तुम्हें आनंद मिल जाए। मगर तुम चूक गए।
तुम बुद्ध से चूके, तुम बुद्धों से चूकते रहे हो, क्योंकि तुम्हारी भाषा का जाल बुद्ध ने तोड़ने की कोशिश की। बुद्ध ने नई भाषा रची। बुद्ध ने कहा: वह परम अवस्था, उसका नाम मोक्ष नहीं, उसका नाम निर्वाण। क्यों, मोक्ष क्यों नहीं? क्योंकि मोक्ष का अर्थ होता है: मैं रहूंगा वहां, मुक्त होकर रहूंगा। लेकिन मैं रहूंगा और मुक्त होकर रहूंगा। लेकिन जब तक ‘मैं’ है तब तक कहां मुक्ति? मुक्ति तो तभी है जब ‘मैं’ गया। ‘मैं’ से मुक्ति ही मोक्ष है। यह परिभाषा है मोक्ष की। और सुनने वालों ने कहा कि यह तो बड़ी अच्छी बात है, मोक्ष, कोई झंझट नहीं, कोई बंधन नहीं पत्नी, बच्चे, संसार, कोई उपद्रव नहीं। बैठे हैं सिद्धशिला पर, भोग रहे आनंद ही आनंद, एकदम वर्षा हो रही है अमृत की, झड़ी लगी है..मगर मैं हूं। अगर मैं हूं, तो मोक्ष नहीं। लेकिन मोक्ष शब्द में ‘मैं‘ बच जाता है। मोक्ष से ऐसा भाव लगता है कि मैं तो रहूंगा, मुक्त होकर रहूंगा।
बुद्ध ने कहा कि नहीं, तुम नहीं रहोगे। इसलिए निर्वाण शब्द चुना।
निर्वाण का अर्थ होता है: दीये का बुझ जाना। तुम तो ऐसे बुझ जाओगे जैसे दीया बुझ जाता है, तुम तो रहोगे ही नहीं। अब यह बात कुछ वासना जगाएगी? लोग बुद्ध से पूछे हैं बहुत बार कि आपकी बातें बड़ी अजीब हैं। अगर हम रहेंगे ही नहीं तो किसलिए हम ध्यान करें और किसलिए हम साधना करें? मिटने के लिए? आदमी ‘होने’ के लिए कुछ करना चाहता है, मिटने के लिए नहीं। यह तो आप अजीब शिक्षा दे रहे हैं कि शून्य हो जाओगे। अरे, शून्य हमें होना ही नहीं है। हमें पूर्ण होना है। उपनिषद ठीक कहते हैं, लोगों ने कहा, वह पूर्ण है और उस पूर्ण से पूर्ण ही पैदा होता है। उस पूर्ण से पूर्ण को निकाल लें तो भी पीछे पूर्ण ही शेष रहता है। उस पूर्ण में पूर्ण को जोड़ दें तो भी पूर्ण पूर्ण ही रहता है।
यह बात जंचती है। पूर्ण में कुछ आकर्षण मालूम होता है। पूर्णता अहंकार को और सजावट दे देती है,शंृगार दे देती है। बुद्ध कहते हैं: शून्यता, निर्वाण। उपनिषद कहते हैं: आनंद, बुद्ध कहते हैं: दुख-निरोध। उपनिषद कहते हैं: फूल ही फूल खिल जाएंगे, बुद्ध कहते हैं: कांटे नहीं होंगे। मगर कांटे नहीं होंगे, यह बात किसको राजी करेगी तप करने के लिए, योग करने के लिए! अगर तुम योग कर रहे हो, उपवास कर रहे हो, सिर के बल खड़े हो, महीनों का उपवास कर रहे हो, कोई पूछे: किसलिए? तुम कहोगे कि वहां दुख-निरोध। कि वहां दुख नहीं होगा। और इतना दुख यहां पा रहे हैं, नाहक, और कुल परिणाम इतना होते वाला है दुख-निरोध नकारात्मक। लेकिन जहां दुख नहीं है, वहीं आनंद का आविर्भाव है। बुद्ध उसको कहते नहीं। उसको कहने से भूल हो जाती है। क्योंकि तुम वही समझ सकते हो जो तुम समझ सकते हो।
एक सिनेमागृह में अच्छी फिल्म लगी हुई थी। चंदूलाल ने अपनी प्रेयसी से कहा कि पीछे की सीट के टिकट ले लेते हैं। प्रेयसी बोली, और अगर पीछे की सीट की टिकट न मिले तो? तो चंदूलाल बोला: तो क्या, फिर पिक्चर ही देखेंगे!
लोगों की अपनी भाषाएं हैं। लोगों के अपने हिसाब हैं। लोग बड़े बचकाने हैं।
छोटा बच्चा अपनी बूढ़ी दादी से पूछता है: दादी मां, क्या आप टें बोल सकती हैं? दादी मां ने कहा: हां बेटे, क्यों नहीं बोल सकती!
बच्चा बोला: अच्छा तो बोलिए! क्योंकि मां कह रही थी कि जब यह बुढ़िया टें बोलेगी तो बहुत सारा पैसा मिलेगा।
लेकिन बच्चे को क्षमा किया जा सकता है। वह बेचारा जितना समझ सकता था उतना समझा। कि सिर्फ टें बोलने की बात है तो बोल ही दो टें, बहुत सारा पैसा मिल जाए। उसे क्या पता कि टें बोलने के पीछे बड़े राज हैं। लेकिन बड़े-बड़ों की भी गति यही है। न तो तुम से जो कहा जाता है वह तुम समझते हो, न तुम जो देखते हो, वह तुम समझते हो। जब तक मन है तब तक तुम सब कुछ विकृत कर लोगे। मन से मुक्त होकर ही सत्य दिखाई पड़ना शुरू होता है। तब यह संसार अदभुत है। तब यह संसार माया नहीं है। माया इसे तुम्हारे मन ने बनाया है। माया का जाल तुम्हारे मन ने इस पर फैलाया है।
भरथरी घर-द्वार छोड़ कर जंगल चले गए। जंगल में ध्यान करने बैठे। सम्राट थे बहुत धन-दौलत थी, सब छोड़ आए थे। सुबह-सुबह अंधेरे में ध्यान कर रहे हैं, तभी सूरज की पहली-पहली किरणें उतरनी शुरू हुईं, प्रभात हुई, आंख खुली ध्यान से, देखा सामने ही पगडंडी पर एक बड़ा हीरा पड़ा है..सुबह की रोशनी में चमकता हुआ। इससे बड़े-बड़े हीरे छोड़ कर आए थे...आदमी का मन देखते हो! ...लेकिन एक क्षण को लालसा जग गई कि उठा लूं। चैंक गए, सम्हल गए, नहीं उठाया, मगर एक क्षण को वासना ने घेर लिया। एक क्षण को मन वापस लौट आया। भूल ही गए कि मैं सब छोड़ आया, इससे बड़े-बड़े हीरे छोड़ आया हूं, इस हीरे की क्या औकात, क्या बिसात! मेरे पास खजाने थे, जिनमें हीरे ही हीरे भरे थे, इनको छोड़ कर आया हूं और इस हीरे को, रास्ते पर पड़े हुए हीरे को उठाने की इच्छा उठ रही है! इसलिए घर छोड़ कर आया हूं, महल छोड़ कर आया हूं! मगर एक क्षण को वासना पकड़ ली।
वासना इतनी तीव्रता से पकड़ती है, इतनी गतिमान है...कहते हैं प्रकाश की गति बहुत तेज है। होगी, पर वासना के मुकाबले नहीं। कहते हैं वैज्ञानिक कि प्रकाश एक सेकेंड में एक लाख छियासी हजार मील चलता है। एक सेकेंड में सूरज की किरण एक लाख छियासी हजार मील पार कर जाती है। इससे बड़ी कोई गति नहीं। मगर वासना! वासना तो एक सेकेंड में कहां से कहां पहुंच जाए! उसका कोई हिसाब नहीं। कोई बंधी हुई गति भी नहीं है। अभी यहां, अभी चांद पर, अभी सूरज पर। ...एक क्षण में, क्षण के एक अंश में भरथरी खो गए; चैंक गए, सम्हाल लिया, नहीं गिरे, मगर तभी एक और दुर्घटना घटी।
दो घुड़सवार दोनों तरफ से रास्ते पर आए, दोनों की नजर एक साथ उस हीरे पर पड़ी, दोनों ने तलवारें निकाल कर हीरे पर टेक दीं और दोनों ने दावा किया कि पहले नजर मेरी पड़ी है, इसलिए हीरा मेरा है। भरथरी थोड़े मुस्कुराए भी। क्योंकि नजर तो पहले उनकी पड़ी थी। फिर इस बात पर मुस्कुराए कि मैं मुस्कुरा रहा हूं, तो अभी भी मैं दावेदार हूं। हालांकि अभी-अभी मैंने सोचा था कि अरे, यह मैंने क्या किया? यह कैसी वासना उठी? अब फिर मन में एक लहर उठी कि हो जाऊं खड़ा..पुराने क्षत्री! ..कि बता दूं इनको कि नजर किसकी पहले पड़ी! फिर रह गए, फिर सम्हल गए। उठ-उठ आ रही है माया; उठ-उठ आ रही है वासना।
और वे दोनों क्षत्री तो जूझ गए! वह तो कोई पीछे हटने को राजी नहीं था, पीछे हटना उन्होंने सीखा नहीं था, वह उनकी भाषा में नहीं था। तलवारें खिंच गयीं, तलवारें चल गयीं, घड़ी भर में यह सब हो गया, नहीं होना था, वह हो गया। दोनों गर्दनें कट गयीं; एक साथ दोनों की तलवारें एक-दूसरे पर पड़ीं। लाशें वहां पड़ी हैं, हीरा अपनी जगह जहां पड़ा था वहीं पड़ा है। हीरे को कुछ लेना-देना नहीं। न भरथरी से कोई प्रयोजन है, न ये दो आदमी मर गए, इनसे कोई प्रयोजन है।
हीरा माया है? हीरे में माया है? या माया मन में है? भरथरी को एक झोंका माया का आया था, फिर दूसरा झोंका भी आया, मगर सम्हाल गए। मगर ये दो आदमी मर मिटे। उस हीरे के लिए, जिस हीरे को इन दोनों का कोई कभी पता ही न चलेगा। उस हीरे के लिए, जिसको इन दोनों से कुछ लेना-देना न था, जो किसी का भी नहीं है; है तो परमात्मा का, नहीं तो किसी का भी नहीं है। और हीरा हीरा है, यह भी बस हमारी मान्यता है, नहीं तो पत्थर है। मानते हो तो हीरा है, जान लो तो पत्थर है। चमकदार होगा, सुंदर होगा, मगर है तो पत्थर ही!
जगत अगर हम मन से मुक्त होकर देखें, अति सुंदर है, अति आह्लादपूर्ण है, दिव्य है। लेकिन अगर हम मन से भर कर देखें, तो फिर उपद्रव ही उपद्रव है। फिर आशा-निराशा के खेल हैं; फिर सफलता-असफलता का जाल है; फिर अपने ही हाथ से लगाई गई फांसी है।
आनंद तीर्थ, संसार को दोष न दो, संसार तो बहुत प्यारा है, क्योंकि संसार तो परमात्मा की अभिव्यक्ति है, मन को पकड़ो, अपने मन को पकड़ो क्योंकि वहीं से क्रांति हो सकती है। मन को पकड़ने का उपाय ही ध्यान है। मन से जागने का उपाय ही ध्यान है। मन के अतिक्रमण का नाम ध्यान है। मन के साक्षी हो जाने का नाम ध्यान है। मन के साक्षी बनो! जैसे भरथरी ने दो बार मन को पकड़ लिया साक्षीभाव से, ऐसे ही मन को पकड़ते रहो। जब भी मन अपने जाल फैलाए, दूर हट कर खड़े हो जाओ। कहो मन से कि खेल खेल, मैं सम्मिलित नहीं हूं। अलग-थलग खड़े रहो। धीरे-धीरे मन पुरानी आदतें छोड़ देगा। देखेगा कि तुम्हारा अब कोई रस न रहा। पुकारेगा तुम्हें, बहुत तरह से लुभाएगा तुम्हें, बहुत तरह से समझाएगा तुम्हें, लेकिन अगर तुमने तय ही कर लिया, निर्णय ही कर लिया, संकल्प ही कर लिया, और आनंदतीर्थ, संन्यास का अर्थ यही है: संकल्प। इस बात का संकल्प कि अब मन के जाल में नहीं पड़ेंगे, अब मन से जागेंगे और साक्षी बनेंगे। जिस दिन साक्षी बन जाओगे, उसी दिन न कोई माया है, न कोई मन है, न कोई निराशा है, न कोई हताशा है। तब जीवन महोत्सव है।

दूसरा प्रश्नः ओशो, मैं जब से यहां आया हूं तब से बस आपकी ही याद हृदय में समाई रहती है। शेष सब असार प्रतीत होता है। अब मैं क्या करूं?

कमलेश्वर! शेष सब असार प्रतीत हो, इससे ज्यादा सद्भभाग्य और क्या होगा! कुछ करके बाधा डालना चाहते हो! देखते रहो, घबड़ाओ मत..घबड़ाहट लगेगी, क्योंकि सब असार मालूम होगा। जहां-जहां सार था कल तक, वहां-वहां असार मालूम होगा, तो डर भी लगेगा कि यह मुझे क्या हो रहा है? कहीं विक्षिप्त तो नहीं हो रहा? क्योंकि सारी दुनिया जिन चीजों की तरफ दौड़ी जा रही है, वे मुझे असार दिखने लगीं। सारी दुनिया जिसके लिए पागल है..धन के लिए, पद के लिए, प्रतिष्ठा के लिए..मुझे उसमें सार नहीं मालूम होता। इतने सारे लोग तो विक्षिप्त नहीं हो सकते!
लेकिन तुमसे एक बात कहूं, इतने सारे लोग बुद्ध नहीं हो सकते। विक्षिप्त हो सकते हैं। हैं ही। बुद्ध तो इने-गिने हैं, अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं, अबुद्धों की भीड़ है, और तुम उसी भीड़ से हो, इसलिए स्वभावतः मन में बड़ी चिंताएं उठने लगेंगी कि मुझे कुछ गड़बड़ तो नहीं हो रहा! फिर कल तक जो चीजें सार मालूम होती थीं, उनके कारण जीवन में व्यस्तता थी, काम था, आज वे असार मालूम होने लगेंगी, तो व्यस्तता कम हो जाएगी, समय काटे नहीं कटेगा, लगेगा अब करना क्या है? यही तुम पूछ रहे हो कि अब मैं क्या करूं? अब परमात्मा को करने दो! तुमने बहुत कर लिया। पाया क्या? कर-कर के भी क्या पाया? हाथ क्या लगा? अब छोड़ ही दो उस पर। कहो कि अब तू कर। अब हम तेरी मर्जी से चलेंगे। जो करवाएगा, वह करेंगे, मगर अब हम कर्ता न बनेंगे, अब हम साक्षी ही रहेंगे। करना है तो करेंगे, तेरी आज्ञा है तो करेंगे, तू दुकान करवाए तो दुकान करेंगे, तू बाजार करवाए तो बाजार करेंगे, तू जो करवाएगा, करेंगे, लेकिन अब हम कर्ता नहीं होंगे, कर्ता तू है, अब तू समझ। पाप तेरे, पुण्य तेरे, धर्म तेरा, अधर्म तेरा, नीति तेरी, अनीति तेरी हमारा अब कुछ भी नहीं है। हम तो सिर्प साक्षी रहेंगे। हम तो दृष्टा से हिलेंगे नहीं, डिगेंगे नहीं। यह करो: दृष्टा से मत डिगो।
कमलेश्वर, एक शुभ घड़ी तुम्हारे जीवन में उदय हो रही है। लेकिन जब भी इतनी क्रांतिकारी घड़ियां आती हैं, जब इतने आमूल रूपांतरण होते हैं, तो बेचैनी भी होती है, क्योंकि सब अस्त-व्यस्त हो जाता है, कल का सब बना-बनाया सारा खेल एकदम खत्म। अब तक जिसको इतनी चेष्टा से, इतने श्रम से रचा था, वह एकदम तिरोहित हो गया। जैसे ताश का किसी ने घर बनाया, हवा का झोंका आया और घर गिर गया। जरा सा झोंका! और यहां तुम पहली ही दफा आए हो, हवा का जरा सा झोंका ही लगा है और तुम्हारा घर गिर गया है। तुम्हारी बेचैनी भी मैं समझ सकता हूं। तुमको लग रहा होगा; अब क्या करूंगा? अभी तक एक दौड़ थी, लगा रहता था; एक धुन थी; उलझा रहता था, एक रस था, एक लगाव था, यह करना, वह करना, यह सब छिन गया, अब चाहूंगा भी कि उसमें रस लूं तो मुश्किल मालूम होगा। रस तो तभी तक हो सकता था जब तक मूच्र्छा थी। अब तो करना भी पड़ेगा तो विरस होकर करूंगा। इसी को वैराग्य कहते हैं। वैराग्य का अर्थ भाग जाना नहीं है, वैराग्य का अर्थ है: करना तो वही जो परमात्मा करवा रहा है, लेकिन अब उसमें रस न रह जाए, विरस हो जाए। अभिनय रह जाए। बस, एक नाटक। गंभीरता से न लेना, हलके-फुलके मन से लेना। फिर कोई बोझ बोझ नहीं है।
ऐसे कुछ बदल गए हम!
बेमानी अब हर मौसम!!
रंग बरसे या झड़ी लगे,
वासंती ज्वार-ज्वर जगे,
किंतु नहीं सरसेंगे अब..
सपने पतझार के सगे,
सुमनों की हार हो गई,
बदशकल बहार हो गई,
ऐसे कुछ छाया भ्रम-तम,
धुंधलाया दिनकर का क्रम!
मन अब उन्मन-बेहाल हो,
कैसे जीवन निहाल हो;
सांसों का काफिला लुटा,
क्या अबीर क्या गुलाल हो;
टेसू के फूल जल रहे,
आग में पलाश ढल रहे;
ऐसे कुछ आंख हुई नम,
दृष्टि-दृष्टि लगती पुरनम!
फागुनी धमार क्या करें,
गूंजता खुमार क्या करें;
तार-तार अश्रु से कसा,
तान बेशुमार क्या करें;
मीड़ों में भरा क्लेश है,
केवल अवरोह शेष है;
ऐसे कुछ राग गए थम,
मौन हुआ असमय सरगम!
अब तक एक गीत गा रहे थे, अचानक टूट गया। अब तक एक सितार बजा रहे थे, तार छिन्न-भिन्न हो गए। तुम्हारी बेचैनी मैं समझ सकता हूं। मगर यह बेचैनी शुभ है। अगर तुम इसे झेलने को राजी हो जाओ, तो तुम्हारे जीवन में सूर्योदय हो सकता है। डर जाओ, पीठ मोड़ लो, फिर भागकर पुराने खेल में लग जाओ..और जोर से लग जाओ ताकि पता ही न चले, तो बात दूसरी। तो आ गए थे करीब कि तुम्हारे भीतर भी दीया जल जाता और आते-आते छिटक गए दूर। और पास आना तो कठिन, दूर जाना बहुत आसान। क्योंकि दूर जाना पुरानी आदत के अनुकूल और पास आना बिल्कुल नई घड़ी है।
कहते हो तुम, मैं जब से यहां आया हूं तब से बस आपकी ही याद हृदय में समाई रहती है। समाई रहने दो। ऐसे ही तो मैं तुम्हारे भीतर के पुराने तार तोडूंगा, पुरानी जड़ें काटूंगा। ऐसे ही तो मैं तुम्हारी पुरानी आदतों को उखाडूंगा। ऐसे ही तुम्हारी पोर-पोर में यह याद समा जाए तो तुम नए होकर आविर्भूत हो सकोगे, तुम्हारा पुनर्जन्म होगा। तुम द्विज बनोगे। तुम ब्राह्मण हो सकते हो, लेकिन मध्य-काल कठिनाई का होगा। पुराना चला जाएगा और नया आएगा नहीं और बीच में तुम त्रिशंकु की भांति बहुत दिन तक अटके रहोगे। यह तुम पर निर्भर है कि कितनी देर लगाओगे। अगर साहस हो तो यह समय जल्दी पूरा हो जाता है। एक क्षण में भी पूरा हो सकता है। और अगर साहस न हो तो जन्मों-जन्मों तक भी कोई त्रिशंकु की भांति लटका रह सकता है। न इधर का न उधर का।
एक बात पक्की है कि अब तुम कोशिश भी करोगे तो भी पुराने को फिर से जमाने में सफल न हो पाओगे। हवा का झोंका अगर एक बार गिरा गया तुम्हारे ताश के महल को, तो अब तुम लाख उपाय करो, इस बात को कैसे भुलाओगे कि यह ताश का महल है, हवा का एक झोंका इसे गिरा देने को काफी है। कागज की नाव एक दफा डूबते तुमने देख ली, तो अब कैसे अपने को समझाओगे कि यह कागज की नाव नहीं है और अब कभी नहीं डूबेगी।
सत्संग का इतना ही अर्थ है। सदगुरु तो एक हवा का झोंका है। डुबा दे तुम्हारी कागज की नावें, गिरा दे तुम्हारे ताश के महल। सद्गुरु तो आता है पहले एक चोट की तरह ही; झंझावात की तरह, एक तूफान की भांति। लेकिन जो उसे झेलने को राजी हो जाते हैं; वे निखर जाते हैं; वे साफ-सुथरे हो जाते हैं; वह तूफान उनकी धूल-धवांस झाड़ ले जाता है। मगर सद्गुरु को झेलने की कला है।
लाओत्सु ने कहा है..और उस वचन में लाओत्सु ने सत्संग का पूरा राज रख दिया है..कहा है लाओत्सु ने कि तूफान आता है बड़ा, बड़े-बड़े पेड़ अकड़े खड़े रहते हैं, तूफान से लड़ते नहीं, तूफान जिस दिशा में जा रहा हो, उसी दिशा में झुक जाते हैं। तूफान से लड़ते हैं, तो गिर जाते हैं। गिर गए तो फिर उठ नहीं सकते। छोटे-छोटे घास के पौधे तूफान आता है तो झुक जाते हैं, तूफान के साथ ही झुक जाते हैं; तूफान के साथ अपना तालमेल जोड़ लेते हैं, समर्पित हो जाते हैं, तूफान उनकी धूल-धवांस झाड़ कर चला जाता है, वे घास के पौधे फिर खड़े हो जाते हैं। वे जो बड़े-बड़े अहंकार से भरे हुए वृक्ष थे, अब दुबारा खड़े नहीं हो सकते।
सत्संग की कला है: विनम्र होना, समर्पित होना, घास के पौधे हो जाना। अगर तुम अकड़ कर खड़े रहे, मैं जो कह रहा हूं अगर तुमने उससे किसी तरह का विरोध अपने भीतर किया, प्रतिरोध किया, अपने को बचाने की कोशिश की, तो तुम मुश्किल में पड़ जाओगे। अगर तुम झुक गए, राजी हो गए, सहज भाव से स्वीकार कर लिया; देखा, समझा, पहचाना और जो रंग यहां बरस रहा है, उस रंग में अपने को डूब जाने दिया; और जो फूल यहां उड़ रहे हैं, जो गंध यहां उड़ रही है, उस गंध में अपने को निमज्जित हो जाने दिया, तो फिर कोई चिंता नहीं है, तुम ताजे हो जाओगे, तुम नए हो जाओगे। और तब वह जो बीच की घड़ी है, ज्यादा लंबी नहीं होगी। वह एक पल में पूरी हो सकती है। संक्रमण का काल कठिन तो होता है, लेकिन लंबा हो जाए तो दुखदाई हो जाता है। लंबा करना न करना तुम्हारे ऊपर निर्भर है।
मत पूछो कि अब क्या करूं? अब करना छोड़ो! अब सिर्प देखो। जो हो रहा है, उसे देखो। देखो कि सब असार हो गया। देखो कि तुम्हारे जीवन में एक नई घटना घट रही है, कि कोई नई याद तुम्हारे भीतर समाई जा रही है। न मैं तुम्हें धन दे सकता, न पद दे सकता, न प्रतिष्ठा दे सकता। मेरे साथ चलोगे तो शायद होगा भी तुम्हारे पास यह सब तो छिन जाएगा। मेरे कारण तुम्हें समाज में सम्मान नहीं मिलेगा, समादर नहीं मिलेगा। मेरे साथ चलोगे, पत्थर पड़ सकते हैं, अपमान हो सकता है, पागल समझे जाओगे। मेरे साथ चलना मंहगा सौदा है। लेकिन महंगा तभी तक लगता है जब तक तुम्हें वह दिखाई पड़ता है जो खो रहा है, जिस दिन तुम्हें वह दिखाई पड़ना शुरू हो जाता है जो मिल रहा है, फिर महंगा नहीं दिखाई पड़ता। फिर कौड़ियों के मोल मोती खरीद लिए, हीरे खरीद लिए। फिर फिर मिट्टी गवाईं और अमृत पा लिया कमलेश्वर शुभ घड़ी है इसे ऐसे ही मत बीत जाने देना।
आजीवन रहना है,
सुधि के तहखानों में!
नयनों में चुभी सुई,
बूंद-बूंद नींद चुई;
पीर से फकीर बने,
प्रीत चश्मदीद हुई;
लाज बनी दीवानी,
करती है मनमानी;
और एक नाम लिखो,
मीरा-रसखानों में!
अगर मेरी बात समझ में आने लगे, तो तुम्हारा नाम भी मीरा और रसखानों में लिखा जाए!
आजीवन रहना है,
सुधि के तहखानों में!
अब तो सुरति में जीओ! सुधि में, बोध में।
आजीवन रहना है,
सुधि के तहखानों में!
नयनों में चुभी सुई,
बूंद-बूंद नींद चुई;
यह मैं क्या कर रहा हूं? तुम्हारी आंखों में सुई चुभा रहा हूं। तभी तुम जागोगे। इससे कम उपाय काम करने वाला नहीं।
आजीवन रहना है,
सुधि के तहखानों में!
नयनों में चुभी सुई,
बूंद-बूंद नींद चुई;
पीर से फकीर बने,
प्रीत चश्मदीद हुई;
लाज बनी दीवानी,
करती है मनमानी;
और एक नाम लिखो,
मीरा-रसखानों में!
लेकिन इससे चूके अगर..चूक सकते हो; बहुत आते हैं और चूक जाते हैं; पाते-पाते चूक जाते हैं। नदी तट पर आ जाते हैं और अंजुलि नहीं बना पाते और जल नहीं पी पाते।
खुद से आजिज ऊबे,
तंहाई में डूबे;
मेरे तो भाल लिखे,
दो आंसू के सूबे;
ज्यों इतनी उमर कटी,
सकुची सिमटी-सिमटी;
बाकी भी गुजरेगी,
गम के मयखानों में!
चूके तो फिर गम के मयखाने हैं। फिर पिओ शराब और। तरह-तरह की शराबें हैं; धन की, पद की, प्रतिष्ठा की। जो-जो बेहोश करे, वही शराब। फिर पिओ शराब और डूबे रहो।
खुद से आजिज ऊबे,
तंहाई में डूबे;
मेरे तो भाल लिखे,
दो आंसू के सूबे;
अगर वही तुमने तय कर रखा है कि यही हमारी किस्मत है कि आंसू के सूबे ही बस हमारा राज्य होने वाले हैं, तो तुम्हारी मर्जी! मैं तुम्हारे आंसुओं को मोती बनाने को तैयार हूं, मैं तुम्हें वे सूबे देने को राजी हूं जो मोतियों से भरे हैं, मगर लेने की भी हिम्मत चाहिए। इस दुनिया में सबसे बड़ी हिम्मत परमात्मा को लेने की हिम्मत है। क्योंकि उसके लिए तुम्हें पूरी-पूरी शून्यता को अर्जित करना होता है। तुम्हें अपने पात्र को पूरा शून्य करना होता है, रिक्त करना होता है।
खुद से आजिज ऊबे,
तंहाई में डूबे;
मेरे तो भाल लिखे,
दो आंसू के सूबे;
ज्यों इतनी उमर कटी,
सकुची सिमटी-सिमटी;
बाकी भी गुजरेगी,
गम के मयखानों में!
तुम्हारी मर्जी फिर! फिर लौट जाओ .गम के मयख़ानों में! लेकिन लौट भी न सकोगे। चेष्टा कर सकते हो; हार जाओगे।
एक मित्र ने लिखा है कि कुछ दिन यहां आकर मस्त हुए, फिर थोड़ा डर लगा कि मस्ती कहीं सीमा के बाहर न हो जाए, तो भाग गए। लेकिन फिर घर टिक नहीं सके पांच दिन। पांच दिन बाद अब फिर आ गए हैं। अब क्या होगा, पूछा है। अब तुम्हारी मर्जी! या तो फिर भागो...अब की बार तीन दिन में लौटोगे...और या फिर ऐसे डूबो कि भागने की जरूरत न रह जाए। अगर जाओ भी तो डूब कर जाओ। तो फिर तुम जहां हो, वहीं मैं हूं। फिर कुछ आने की बात नहीं। या कभी-कभार जयराम जी करने चले आए। नहीं तो तुम जहां हो वहीं ठीक हो।
अब क्या सोचूं-समझूं,
कैसे सम्हलूं-सुलझूं;
दूर रहूं तो भी मन..
करता फिर-फिर उलझूं;
श्वांसों में घुलूं-मिलूं,
पलकों में खुलूं-खिलूं;
मन के माणिक मिलते,
ममता की खानों में!
यह तो प्रेम की दुनिया है, ममता की खान, यहां तो प्रेम लिया-दिया जा रहा है, यह तो प्रेम का मंदिर है, यह तो प्रेम की मधुशाला है..उलझो, डूबो! अब क्या सोचूं-समझूं! मत सोचो-समझो अब। सोच-सोच खूब तो गंवाया। अब जरा बिनसोचे भी एक कदम लो।
अब क्या सोचूं-समझूं,
कैसे सम्हलूं-सुलझूं;
दूर रहूं तो भी मन..
करता फिर-फिर उलझूं,
श्वांसों में घुलूं-मिलूं,
पलकों में खुलूं-खिलूं;
मन के माणिक मिलते,
ममता की खानों में!

आजीवन रहना है,
सुधि के तहखानों में!

नयनों में चुभी सुई,
बूंद-बूंद नींद चुई;
पीर से फकीर बने,
प्रीत चश्मदीद हुई;
लाज बनी दीवानी,
करती है मनमानी;
और एक नाम लिखो,
मीरा-रसखानों में!

तीसरा प्रश्नः ओशो, मैं आपको समझ क्यों नहीं पाता हूं?

किशोर! कौन समझ पाता है! इससे चिंता न करो। यही समझने की शुरुआत है। यह समझ पाना कि मैं नहीं समझ पाता हूं, समझने की शुरुआत है। जो सोचते हैं कि समझ पाते हैं, वे ही चूक रहे हैं। जिनको ख्याल है कि हम तो जानते ही हैं, जो पहले से ही बैठे हैं माने कि ज्ञान उन्हें हो चुका है, संभावना है कि वे चूकेंगे।
किशोर, तुम न चूकोगे। यह पहली किरण उतरी कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं। यह अहंकार पर पहली चोट पड़ी। और तुमने ठीक पूछा कि मैं आपको क्यों नहीं समझ पाता हूं? न समझ पाने का कारण क्या होगा? कारण अज्ञान नहीं होता, कारण सदा ज्ञान होता है। ज्ञान अटका होगा कहीं न कहीं। और इस देश में तो ज्ञान की कमी नहीं है। यह देश तो ज्ञान से मरा जा रहा है। इस देश के गले में ज्ञान की फांसी लगी है। जो देखो वही ज्ञानी है। अज्ञानी है ही कहां! खोजने निकलो, कोई मिलेगा अज्ञानी? पूछना जरा रास्ते पर किसी से कि भाई, क्या तुम अज्ञानी हो? एकदम गर्दन पकड़ लेगा वह कि तुमने समझा क्या है? शायद ही एकाध आदमी मिले, कोई सिरफिरा, जो कहे कि हां, मैं अज्ञानी हूं। कहो, क्या काम है? नहीं तो ज्ञानी ही ज्ञानी हैं।
ज्ञान सस्ती चीज है और अहंकार के लिए बड़ा आसान आभूषण है। मगर ज्ञान में रखा क्या है? गीता कंठस्थ हो गई, बाइबिल कंठस्थ हो गई, कुरान कंठस्थ हो गई..मिलेगा क्या? कंठ तक ही बात रहेगी। खोपड़ी में गूंजते रहेंगे ये शब्द, ये तुम्हारे प्राणों का रूपांतरण नहीं करेंगे। हां, एक खतरा जरूर हो जाएगा कि इन शब्दों के खोपड़ी में गूंजने के कारण तुम कुछ अगर कभी भूले-चूके भी किसी सदगुरु के पास पहुंच गए, तो उसे समझ नहीं पाओगे। क्योंकि ये शब्द अड़चन डालेंगे। तुम्हारे निष्कर्ष बाधा खड़ी करेंगे। तुम भीतर गुनतारा बिठाते रहोगे कि गीता से मेल खाती है यह बात या नहीं? कुरान के विपरीत तो नहीं जाती? बाइबिल में इसका समर्थन है या नहीं? और तुम इसी में उलझे रहोगे।
अगर तुम्हें लगेगा कि हां, इसका समर्थन है, तो भी तुम चूके, क्योंकि तब तुम्हारा आना व्यर्थ हुआ, बाइबिल तो तुम जानते ही थे। अगर बाइबिल के जानने से ही कोई क्रांति होनी थी तो पहले ही हो गई होती। मेरे द्वारा और बाइबिल को समर्थन मिल गया..और क्या हुआ? और अगर यह बाइबिल के विपरीत पड़ गया, तो तुम क्रुद्ध हो जाओगे, तुम नाराज हो जाओगे। और नाराजगी में थोड़े ही समझा जा सकता है! रुष्ट अवस्था में थोड़े ही कुछ समझा जा सकता है! समझ तो प्रीति मांगती है। प्रीति के सेतु से ही समझ चलती है। फिर जो एक चीज को जानता है, उसको यह भ्रांति होने लगती है कि वह सब जानता है। वह अपने ज्ञान को जगह-जगह लगाता फिरता है।
हेरोडोटस पहला आदमी था जिसने औसत का सिद्धांत खोजा। स्वभावतः जब उसने स्वयं सिद्धांत खोजा था, तो वह चैबीस घंटे औसत के सिद्धांत में उलझा रहता था। हर चीज में औसत निकालता रहता। पिकनिक को गया था पत्नी-बच्चों को लेकर, एक छोटे-से नाले को पार करना पड़ा, मौका चूका नहीं वह..पंडित मौके चूकते भी नहीं। पत्नी ने कहा कि बच्चों को सम्हालो नदी से, हाथ पकड़ लो, उसने कहा, तू रुक, तूने समझा क्या है? अरे, मैं हेरोडोटस, जिसने औसत का सिद्धांत खोजा! अभी निकालता हूं औसत बच्चों की ऊंचाई और औसत नदी की गहराई। जल्दी से..फुटा तो वह अपने साथ ही रखता था..बच्चे नापे, पांच-सात जगह जाकर नदी को नापा, रेत पर बैठ कर हिसाब लगाया, रेत पर ही लिख कर गणित किया और उसने कहा, बेफिक्र रहो, बच्चों की औसत ऊंचाई नदी की औसत गहराई से ज्यादा है; कोई चिंता की बात नहीं। अब पति कहे, तो पति तो परमात्मा है...और फिर हेरोडोटस जैसा ज्ञानी पति...पत्नी ने कहा: जब कहते हो तो ठीक है। हालांकि पत्नी को थोड़ा संदेह था। पत्नियां जल्दी से इस तरह सिद्धांत वगैरह मानती नहीं। मगर अब मजबूरी थी कि ठीक है!
पांच-छह बच्चे, आगे-आगे हेरोडोटस चला अपना फुटा लेकर, बीच में बच्चे चले, पीछे पत्नी चली..कुछ बच्चे बीच-बीच में डुबकी खाने लगे। पत्नी ने कहा कि बच्चे डुबकी खा रहे हैं, भाड़ में जाए तुम्हारा औसत का सिद्धांत, बच्चों को बचाओ! मगर हेरोडोटस ने बच्चों को नहीं बचाया, वह भागा, उसने कहा तो फिर गणित में कोई गलती हुई होगी। पंडित तो पंडित। किसी तरह पत्नी ने बच्चों को पकड़ा, किसी तरह बचाया। हेरोडोटस तो फिर अपना हिसाब रेत पर लगाने लगा था। कहीं कुछ भूल होनी चाहिए, नहीं तो यह हो ही कैसे सकता है!
दुनिया में सरकारें औसत के सिद्धांत से चलती हैं।
उन्नीस सौ सत्रह में जब रूस में क्रांति हुई तो उन्होंने औसत के सिद्धांत का खूब उपयोग किया, बड़ा प्रचार किया। पश्चिम से एक यात्री आया हुआ था, उसने कहा कि मैंने सुना कि आपके देश में शिक्षा सौ प्रतिशत बढ़ गई है। इतनी शीघ्रता से इतना विकास कैसे हुआ? जिस अधिकारी से उसने कहा था, उसने कहा: आओ, हम दिखाते हैं। वह पास के गांव में ले गया। वह यात्री तो बड़ा हैरान हुआ, वहां केवल एक शिक्षक था और दो विद्यार्थी, उसने कहा, हम कुछ समझे नहीं। उसने कहा कि क्रांति के पहले एक ही विद्यार्थी था, अब दो विद्यार्थी हैं। शिक्षा एकदम दुगुनी हो गई है।
सिद्धांत तो बिल्कुल सच है। सिद्धांतों से जीने वाले लोग हवाई कल्पनाओं में जीते हैं। फिर चाहे वे सिद्धांत गणित के हों, विज्ञान के हों, धर्म के हों, दर्शन के हों, इससे कुछ भेद नहीं पड़ता।
एक दिन ढब्बू जी ने देखा कि चंदूलाल अपनी प्यारी-प्यारी कोमल-कोमल श्वेत शुभ्र बिल्ली को साबुन लगा-लगा कर, अच्छा मल-मल कर स्नान करवा रहे हैं। और बिल्ली भाग निकलने की पूरी चेष्टा कर रही है। मगर चंदूलाल हैं कि लगे हैं पूरे प्राणपण से। जब ढब्बूजी ने देखा यह सब, तो वे चंदूलाल से बोले कि चंदूलाल, क्या आज मार ही डालोगे इसे? अरे, ये ठंड के दिन और तुम इसे नहला रहे हो!
चंदूलाल बोले कि तुम चिंता मत करो, आज इसे अच्छी तरह नहलाना है। और यह पानी कोई साधारण नहीं, गंगा का है, सो इसके जन्म-जन्म के पाप भी कट जाएंगे। अरे, गंगाजल में तो मुर्दे जिंदा हो जाते हैं, पापी पुण्यात्मा हो जाते हैं! और यह बिल्ली है, न मालूम कितने चूहे खा चुकी है, मैं इसका भविष्य सुधार रहा हूं। खुद भी चंदूलाल गंगा की यात्रा करते हैं, स्नान कर आते हैं..और पानी भी ले आते हैं दूसरों की सहायता के लिए।
आखिर चंदूलाल नहीं माने। और एक घंटे बाद जब ढब्बू जी लौट कर आए तो देखा कि बिल्ली मर चुकी है और उसके पास चंदूलाल बैठे हैं। बिल्ली को मरा देख ढब्बू जी बोले कि देखो, आखिर मार डाला न तुमने इसे! मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि इतनी ठंड में इसे मत नहलाओ, मगर तुम ठहरे पंडित, तुम मानो कैसे!
चंदूलाल ने कहा: स्नान करने से यह मरी नहीं, स्नान करने से यह मर सकती नहीं। ..यह गंगाजल है, शुद्ध गंगाजल! वह तो स्नान कराने के बाद जब मैंने इसे निचोड़ा, तब मरी।
पंडित हैं, उनके अपने सिद्धांत हैं।
तुम कहते हो, मैं आपको समझ क्यों नहीं पाता हूं? किशोर, कहीं-कहीं पांडित्य अटका होगा। जानकारी छोड़ो। नहीं तो गंगाजल बिल्ली को मारेगा। और ठंड के दिन हैं! और ऐसे न मरी तो निचोड़ने में मरेगी। तुम ज्ञान को सरका कर अलग रख दो, फिर तुम मुझे समझ पाओगे। मैं जो बातें कह रहा हूं, सीधी-साफ हैं। जरा भी उलझी नहीं हैं। मैं कोई पंडित नहीं हूं। संस्कृत का क ख ग भी मुझे आता नहीं। न फारसी जानता हूं, न अरबी। जो कह रहा हूं, वही सीधी-सादी बात है। कामचलाऊ, रोज की भाषा में बोल रहा हूं, इसमें कुछ उलझन नहीं है। यह कोई सैद्धांतिक लफ्फाजी नहीं है। यह सत्यों का सीधा-सीधा इशारा है, इंगित है।
लेकिन तुमने अच्छा किया कि पूछा। तुम्हारा मस्तिष्क बीच में उपद्रव खड़े कर रहा है। नए-नए आए भी हो, यह स्वाभाविक भी है। जो लोग धीरे-धीरे यहां बैठते-बैठते इस नये ढंग की गुफ्तगू में शरीक होते-होते रच-पच जाते हैं, उनको फिर बाधा नहीं पड़ती। मैं जितना कहता हूं उतना तो सिर्फ इंगित है, वे वह भी समझने लगते हैं जिसकी तरफ इंगित कर रहा हूं। जो कहता हूं, वह तो वे समझ ही जाते हैं, वह भी समझ जाते हैं जो नहीं कहा जा सकता। और आनंद तो उसी को समझने में है जो नहीं कहा जा सकता। कहना तो केवल निमित्त है, बहाना है। मगर जब तक तुम अपने मन को हटा कर न रख सकोगे, तब तक यह अदभुत राज समझ में नहीं आ सकता। बात सीधी-सादी है, बात छोटी है, मगर बड़ी गुरु-गंभीर है, बड़ी रहस्यपूर्ण है। जीवन की पोथी को हम पढ़ रहे हैं यहां..और किसी पोथी पर मेरा भरोसा नहीं है। तुम भी जीवन की पोथी पढ़ने को राजी हो जाओ। बस, मन को हटाने की कला सीखो!
तो सिर्प मुझको सुनो मत, ध्यान भी करो! जो सिर्फ मुझे सुनेगा, उसे यह अड़चन आती ही रहेगी। साथ-साथ ध्यान भी करो। वह उसका अनिवार्य अंग है। ध्यान तुम्हारी भूमिका को तैयार करेगा, क्योंकि मन को हटाएगा। इसलिए ध्यान के इतने आयोजन यहां चल रहे हैं। जो तुम्हें रुच जाए! मगर एक ध्यान में डुबकी मारो। ध्यान में नहाओ और फिर मुझे सुनो! फिर बात सीधी-सीधी पहुंच जाएगी। एकदम हृदय से हृदय तक पहुंच जाती है। यह हृदय की हृदय से बात है। इसमें सिर का कोई काम नहीं है।

आखिरी प्रश्नः ओशो, ऐसा लगता है कि हाथी मर चुका और मैं पूंछ को नाहक ही पकड़े हूं। सद्गुरु साहिब, कृपा करो ताकि यह अंधकार जाए अब!

संत! महाराज, न तो कोई हाथी है न कोई पूंछ! समझा-बुझा कर किसी तरह तुम्हें राजी किया तो हाथी को तो निकल जाने दिया, मगर पूंछ को पकड़े हो..इस आशा में कि कभी जरूरत पड़े तो हाथी को भी खींच लेंगे वापस। हाथी निकल कर जाएगा कहां जब तक पूंछ अपने हाथ में है! और संत जरा मजबूत आदमी हैं! सो सोच रहे होंगे कि कोई फिकर नहीं, निकल जाओ बेटा, पूंछ तो हाथ में है। जैसे ही लगा कि गलती हुई जा रही है, फौरन खींचकर भीतर कर लेंगे।
न कहीं हाथी है, संत, न कहीं पूछ है! सब ख्याल हैं! न तुम्हें किसी ने बांधा है, न तुम हो कि बांधे जा सको। अहंकार से बड़ा झूठ इस संसार में कुछ भी नहीं है। और अहंकार के झूठ से फिर हजार झूठ पैदा होते हैं। अहंकार के झूठ से मृत्यु का झूठ पैदा होता है। पहले अहंकार को मान लेते हो कि ‘मैं’ हूं, फिर डर लगता है कि अब मरना पड़ेगा। मैं हूं ही नहीं, तो डर भी गया, मरने का डर भी गया, बात ही खत्म हो गई..जब हूं ही नहीं तो मरेगा कौन? पहले मान लेते हो कि मैं हूं, फिर डर लगता है कि कहीं पाप न हो जाए, कहीं नरक में न सड़ना पड़े, तो पुण्य करूं, कि स्वर्ग में मजा लूंटू। यह सिर्फ ‘मैं’ के कारण सारा उपद्रव पैदा हो रहा है। और यह ‘मैं‘ अगर रहा, तो तुम्हारा नरक, तुम्हारा स्वर्ग, सब तुम्हारी कल्पनाएं मात्र हैं। न कहीं कोई नरक है, न कहीं कोई स्वर्ग है। जो है, यहां है, अभी है। जो होश से भरे हैं, वे अभी स्वर्ग में हैं जहां हैं वहीं स्वर्ग में हैं। और जो बेहोश हैं, वे जहां हैं वहीं नर्क में हैं। बेहोशी नरक है; होश स्वर्ग है।
संत, होश में आओ! कहां का हाथी, जरा गौर से तो देखो! कहीं कोई हाथी नहीं है। तो पूंछ तुम कैसे पकड़ोगे? और जब हाथी तक को निकल जाने दिया, तो इतनी कृपा और करो कि अब पूंछ को भी काहे को पकड़े हो! और नकली हाथी! तो हो सकता है हाथी जा ही चुका हो, सिर्प प्लास्टिक की पूंछ..और तुम बैठे हो पकड़े! जरा हिला-डुला कर भी तो देखो!
एक शराबघर में एक आदमी प्रविष्ट हुआ। उसने जाकर शराबघर के मालिक को कहा कि मैं अपनी एक आंख को काट सकता हूं, चाट सकता हूं।
आंख को काट सकता हूं, चाट सकता हूं! शराबघर का मालिक भी, इस तरह के झक्कियों से तो दिन-रात पाला पड़ता था, तो उसने कहा कि तुम्हारा प्रयोजन क्या है? तो उस आदमी ने कहा ये पांच सौ रुपये लगाता हूं दांव पर, अगर न काट सकूं, न चख सकूं, तो पांच सौ रुपये दूंगा। और अगर काट सकूं, चख सकूं, तो पांच सौ रुपये लूंगा।
दुकानदार ने भी सोचा कि पांच सौ हाथ आ रहे हैं, यह आदमी पागल मालूम पड़ता है, आंख को कैसे काटोगे, कैसे चखोगे? दांव लगा लिया। उस आदमी ने अपनी एक आंख बाहर निकाली..वह नकली आंख थी..जब उसने आंख बाहर निकाली, उसकी छाती पर सांप लोट गया, उसने कहा, मारे गए! उसने काटा भी और चखा भी और वापस लगा ली आंख; पांच सौ रुपये उठा कर खीसे में रख लिए। फिर बोला कि और इरादा है? दूसरी आंख भी काट सकता हूं और चख सकता हूं।
दुकानदार ने कहा कि दोनों आंखें अगर नकली हों तो यह आदमी यहां तक आ ही नहीं सकता। सीधा चला आया, न टकराया, न कुछ, न दरवाजे पर किसी से पूछा। अब तो यह हद कर रहा है! तो शराबघर के मालिक ने कहा कि ठीक है, मगर अब हजार रुपये दांव पर लगाऊंगा।
हजार लगा लो!
हजार रुपये दांव पर लगा दिए। उस आदमी ने अपने दांत निकाले..वे नकली थे..दांत निकाल कर उसने आंख को काट कर बता दिया। दुकानदार ने सिर ठोंक लिया। उसने कहा, हद हो गई; यह मैंने सोचा ही नही! उसने हजार रुपये उठा कर खीसे में रख लिए और बोला: और इरादे हैं?
दुकानदार ने पूछा: अब और क्या कर सकता है तू? अरे, दो ही आंख होती हैं, अब क्या करेगा? उसने कहा: देखते हो, वह दूसरे कोने पर जो प्याली रखी है टेबल पर, यहीं से उसमें पेशाब कर सकता हूं। होगा कोई पचास फीट का फासला।
दुकानदार ने कहा: हद हो गई! अब यह क्या करेगा? अब अपने दिए पैसे भी निकाल लेना ठीक है। उसने कहा: अब पांच हजार दांव पर लगाता हूं।
उसने कहा: ठीक। और उस आदमी ने पेशाब करनी शुरू कर दी। अब वह कहां पहुंचने वाली थी वहां तक! वह यहीं गिरने लगी कोई तीन-चार फीट की दूरी पर। टेबिल पर गिरी, फर्श पर गिरी और वह दुकानदार लेकर गमछा हंसता जाए; और पोंछता जाए, और उसने कहा कि अब मारे गए!
अरे, उसने कहा, तू बिल्कुल फिकर न कर! वह देखता है बाहर तीन आदमी खड़े हैं? उनसे मैंने शर्त लगाई है कि सारे शराबघर में पेशाब करूंगा और तुम देखोगे यह आदमी हंस-हंस कर अंगोछे से पोंछेगा। दस हजार रुपये की शर्त लगाई है!
संत महाराज, आंख नकली, दांत नकली, मगर वह दुकानदार नई-नई झंझटों में फंसता गया! पहले एक झंझट में फंसा, फिर दूसरी उसकी समझ में न आई, फिर दूसरी में फंस गया, फिर तीसरी भी उसकी समझ में न आई। जिंदगी बड़ी अदभुत है! एक झंझट से निकलो, दूसरी में फंसे; दूसरी से निकलो, तीसरी में फंसे। अब हाथी ही निकल गया, अब तुम पूंछ में उलझे हो! जरा छोड़ कर भी तो देखो कि पूंछ कहीं जाती कि नहीं? यहीं गिर पड़ेगी तीन-चार फीट दूर। इससे ज्यादा नहीं जा सकती। प्लास्टिक की पूंछ है।
लेकिन संत महाराज ध्यान करते रहते हैं बैठे...पहरेदारी का काम करते हैं, रात भर जगते हैं, सो उनको दिन में हाथी दिखाई पड़ते होंगे। अब रात भर जगोगे, तो उलटी-सीधी चीजें दिखाई पड़ती हैं! यहां कहां हाथी! यह कोई साधुओं की पुरानी जमात थोड़े ही है!
जाएगी, महाराज, पूंछ भी जाएगी, फिक्र न करो! भरोसा रखो! अरे, हाथी ही चला गया तो पूंछ कितने दिन बच सकती है!
और मैं देख रहा हूं, संत में क्रांतियां होती जा रही हैं। संत जब शुरू-शुरू में आए थे, तो पक्के पंजाबी थे। ध्यान भी करते थे...सक्रिय ध्यान उनका देखने लायक होता था। क्या घूंसे चलाते थे..हवा में! और क्या नपी-तुली गालियां देते थे..पंजाबी में! एक तो गाली और फिर पंजाबी में! लोग मुझसे आकर कहते थे कि और सबका ध्यान तो ठीक है, मगर ये संत किस तरह का ध्यान करते हैं?
भरा हुआ पड़ा है, पंजाब भरा हुआ पड़ा है, सो उसका निकलना जरूरी था। वह निकल गया। वहा तूफान गया। अब शांत हो गए हैं। अब न घूंसा चलाते, न गाली निकालते। अब वे दिन गए। अब एक गहन शांति आ गई है, जैसे तूफान के बाद एक शांति आती है। इसीलिए प्रश्न उठा है, इसीलिए पूछ रहे हैं कि भगवान, ऐसा लगता है कि हाथी जा चुका...हाथी यानि वही पंजाबी...और मैं पूंछ को नाहक ही पकड़े हूं। सदगुरु साहिब, कृपा करो ताकि अंधकार मिट जाए अब! जाएगा, महराज! जल्दी न करो! क्योंकि जल्दी चला जाए तो लौट कर आ जाता है। जाते-जाते जाने दो। इतने दिन धीरज रखा है, और धीरज रखे रहो। एक दिन तुम आकर कहोगे कि गया। पूंछ कहां है, एक दिन पूछोगे कि कम से कम पूंछ तो रहने देते। हाथी गया सो गया, अरे पूंछ थी हाथ में, तो कुछ भरोसा था।
जल्दी न करो! जीवन की क्रांति जन्मों-जन्मों के अंधकार को तोड़ना है; जन्मों-जन्मों के कचरे से छुटकारा पाना है। और अच्छा है कि आहिस्ता-आहिस्ता हो। क्योंकि जल्दी हो जाए तो शायद परिपूर्ण न हो पाए, समग्र न हो पाए।
मगर मैं खुश हूं, संत! तुम्हारे विकास को देख कर मैं परम आह्वदत हूं! ...मैं इस अर्थों में सौभाग्यशाली हूं कि मेरे पास जो लोग साधना में लगे हैं, वे सच में ही साधना में लगे हैं। वे किसी ढोंग में नहीं पड़े हैं..यहां ढोंग में पड़ने का उपाय नहीं है। वे किसी पाखंड में नहीं उलझे हैं..यहां पाखंड में उलझने का उपाय नहीं है। यहां मेरे पास जो लोग हैं, वे निश्चित ही गहन साधना में संलग्न हैं।
बुद्ध के बाद पृथ्वी पर संन्यास की इतनी विस्तीर्ण प्रक्रिया फिर कभी नहीं हुई और इस बार तो बात और भी बड़ी होती है। क्योंकि अभी तो यह शुरुआत है, अभी तो यह गंगोत्री है, अभी तो गंगा बहुत बड़ी होनी है। और जितनी बड़ी गंगा होगी, और जितने संन्यासियों का विस्तार होता जाएगा, उतनी ही साधना सुगम होती जाएगी। क्योंकि प्रत्येक संन्यासी अपने प्राणों की ज्योति से संन्यास को जगमग करेगा; प्रत्येक संन्यासी अपनी शांति का, अपने आनंद का, अपने उत्सव का दान करेगा। यह महोत्सव विराट होने को है। इस नाव में अनंत-अनंत लोग बैठ कर उस पार जाने को हैं।
संत, तुम्हारी जगह निश्चित है, तुम निश्चित रहो! पहरेदार तो बिठालना ही पड़ेगा न, कि नाव पर हर कोई न चढ़ जाए।

...पूंछ भी जाएगी!

 

आज इतना ही।

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