दिनांक
12 सितंबर, 1874;
श्री
ओशो आश्रम, पूना।
प्रात:
काल।
सूत्र:
जाग्रतस्वप्नसुषुप्तभेदे
तुर्याभोग
सवित।
ज्ञानं
जाग्रत।
स्वप्रोविकल्पा:।
अविवेको
मायासौषुप्तमू।
त्रितयभोक्ता
वीरेश:।
जाग्रत
स्वप्न और
सुषुप्ति— इन
तीनों
अवस्थाओं को
पृथक रूप से
जानने से तुर्यावस्था
का भी ज्ञान
हो जाता है
ज्ञान का बना
रहना ही
जाग्रत
अवस्था है।
विकल्प
ही स्वप्न
हैं।’’
अविवेक
अर्थात स्व—बोध
का अभाव
मायामय
सुषुप्ति है।
तीनों
का भोक्ता
वीरेश कहलाता
है।
जाग्रत, स्वप्न
और सुषुप्ति—
इन तीनों
अवस्थाओं को
पृथक रूप से
जानने से तुर्यावस्था
का भी ज्ञान
हो जाता है।
तुर्या है—
चौथी अवस्था।
तुर्यावस्था
का अर्थ है—
परम ज्ञान।








