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गुरुवार, 27 नवंबर 2014

शिव--सूत्र (ओशो) प्रवचन--02

जीवनजागृति के साधनासूत्र(प्रवचनदूसरा)


दिनांक 12 सितंबर, 1874;
श्री ओशो आश्रम, पूना।
प्रात: काल।
सूत्र:

जाग्रतस्‍वप्‍नसुषुप्तभेदे तुर्याभोग सवित।
ज्ञानं जाग्रत।
स्वप्रोविकल्पा:।
अविवेको मायासौषुप्तमू।
त्रितयभोक्ता वीरेश:।

 जाग्रत स्‍वप्‍न और सुषुप्‍ति— इन तीनों अवस्थाओं को पृथक रूप से जानने से तुर्यावस्था का भी ज्ञान हो जाता है ज्ञान का बना रहना ही जाग्रत अवस्था है।
विकल्प ही स्‍वप्‍न हैं।’’
अविवेक अर्थात स्व—बोध का अभाव मायामय सुषुप्‍ति है।
तीनों का भोक्ता वीरेश कहलाता है।

जाग्रत, स्‍वप्‍न और सुषुप्ति— इन तीनों अवस्थाओं को पृथक रूप से जानने से तुर्यावस्था का भी ज्ञान हो जाता है। तुर्या है— चौथी अवस्था। तुर्यावस्था का अर्थ है— परम ज्ञान।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--095

सत्य कह कर भी नहीं कहा जा सकता—(प्रवचन—पिचानवां)

अध्याय 56

मान और अपमान के पार

जो जानता है, वह बोलता नहीं है;

जो बोलता है, वह जानता नहीं है।

इसके छिद्रों को भर दो, इसके द्वारों को बंद करो,

इसकी धारों को घिस दो, इसकी ग्रंथियों को निर्ग्रंथ करो,

इसके प्रकाश को धीमा करो, इसके शोरगुल को चुप करो;

-- यही रहस्यमयी एकता है।

तब प्रेम और घृणा उसे नहीं छू सकतीं।

लाभ और हानि उससे दूर रहती हैं।

मान और अपमान उसे प्रभावित नहीं कर सकते।

इसलिए वह सदा संसार से सम्मानित है।


"जो जानता है वह बोलता नहीं; और जो बोलता है वह जानता नहीं।'
यह तो बड़ी पहेली है। क्योंकि लाओत्से बोलता है। उपनिषद भी यही कहते हैं कि जो जानता है वह बोलता नहीं, जो बोलता है वह जानता नहीं। और उपनिषद भी बोलते हैं।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--094

शिशुवत चरित्र ताओ का लक्ष्य है—(प्रवचन—चौरनवां)

अध्याय 55

शिशु का चरित्र

जो चरित्र का धनी है, वह शिशुवत होता है।
जहरीले कीड़े उसे दंश नहीं देते,
जंगली जानवर उस पर हमला नहीं करते,
और शिकारी परिन्दे उस पर झपट्टा नहीं मारते।
यद्यपि उसकी हड्डियां मुलायम हैं,
उसकी नसें कोमल, तो भी उसकी पकड़ मजबूत होती है।
यद्यपि वह नर और नारी के मिलन से अनभिज्ञ है,
तो भी उसके अंग-अंग पूरे हैं।
जिसका अर्थ हुआ कि उसका बल अक्षुण्ण है।
दिन भर चीखते रहने पर भी उसकी आवाज भर्राती नहीं है;
जिसका अर्थ हुआ कि उसकी स्वाभाविक लयबद्धता पूर्ण है।
लयबद्धता को जानना शाश्वत के साथ तथाता में होना है,
और शाश्वतता को जानना विवेक कहलाता है।
लेकिन जीवन में संशोधन करना अशुभ लक्षण कहाता है;
और मनोवेगों को मन की राह देना आक्रामक है।
क्योंकि चीजें अपने यौवन पर पहुंच कर बुढ़ाती हैं;
वह आक्रामक दावेदारी ताओ के खिलाफ है।
और जो ताओ के खिलाफ है वह युवापन में ही नष्ट होता है।

भिक्षुगण भ्रांत धारणाओं के शिकार—(कथायात्रा—045)

 भिक्षुगण भ्रांत धारणाओं के शिकार—(एस धम्मो सनंतनो) 

गवान के जेतवन में रहते समय बहुत शीलसंपन्न भिक्षुओं के मन में ऐसे विचार हुए— हम लोग शीलसंपन हैं ध्यानी हैं जब चाहेगे तब निर्वाण प्राप्त कर लेने। ऐसी भ्रांत धारणाएं साधना— पथ पर अनिवार्य रूप से आती हैं।

जरा सा कुछ हुआ कि आदमी सोचता है, बस.. .किसी ने जरा सा ध्यान साध लिया, किसी ने जरा सच बोल लिया, किसी ने जरा दान कर दिया, किसी ने जरा वासना छोड़ दी कि वह सोचता है बस, मिल गयी कुंजी, अब क्या देर है, जब चाहेंगे तब निर्वाण उपलब्ध कर लेंगे। आदमी बड़ी जल्दी पड़ाव को मंजिल मान लेता है। जहां रातभर रुकना है और सुबह चल पड़ना है, सोचता है—आ गयी मंजिल।


ऐसी प्रांत धारणाएं साधना— पथ पर अनिवार्य रूप से आती हैं।

अनाचरण छूटा तो आचरण पकड़ लेता है। धन छूटा तो ध्यान पकड़ लेता है। पाप छूटा तो पुण्य पकड लेता है। इधर कुआ, उधर खाई।

भगवान ने उन्हें अपने पास बुलाया और पूछा भिक्षुको क्या तुम्हारे संन्यस्त होने का उद्देश्य पूर्ण हो गया?

पूछना पड़ा होगा। क्योंकि देखा होगा, वे तो अकड़कर चलने लगे। देखा होगा कि वे तो ऐसे चलने लगे जैसे पा लिया, जैसे आ गए घर। तो बुलाया उन्हें और पूछा, क्या तुम्हारे संन्यस्त होने का उद्देश्य पूर्ण हो गया?

भिक्षुओं का गृहस्‍थों का निमंत्रित—(कथा यात्रा—044)

 भिक्षुओं का गृहस्‍थों के घर निमंत्रित होना—(एस धम्मो सनंतनो) 

भिक्षु गृहस्थों के घर निमंत्रित होने पर भोजनोपरांत दानानुमोदन करते थे। किंतु तीर्थक सुखं होतु आदि कहकर ही चले जाते थे। लोग स्वभावत: भिक्षुओं की प्रशंसा करते और तीर्थको की निंदा करते थे। यह जानकर तीर्थको ने हम लोग मुनि हैं मौन रहते हैं श्रमण गौतम के शिष्य भोजन के समय महाकथा कहते हैं बकवासी हैं ऐसा कहकर प्रतिक्रिया में निंदा शुरू कर दी।


बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को सदा कहा है कि जितना लो, उससे ज्यादा लौटा देना। कहीं ऋण इकट्ठा मत करना। इसलिए बुद्ध का भिक्षु जब भोजन भी लेता कहीं तो भोजन के बाद, धन्यवाद कै रूप में, जो उसको मिला है उसकी थोड़ी बात करता था। जो आनंद उसने पाया, जो ध्यान उसे मिला है, जो शील की संपदा उसे मिली है, जो नयी—नयी किरणें और नयी—नयी उमंगों के तूफान उसके

ब्राह्मण दार्शनिक-बुद्ध से विवाद-(कथा यात्रा-043)

 एक ब्राह्मण दार्शनिक का बुद्ध से विवाद-(एस धम्मो सनंतनो)

क ब्राह्मण दार्शनिक भगवान के पास आया और बोला हे गौतम! आप अपने शिष्यों को भिक्षाटन करने से भिक्षु कहते हैं। मैं भी भिक्षाटन करता हूं अत: मुझे भी भिक्षु कहिए। वह विवाद करने को उत्सुक था और किसी भी बहाने उलझने को तैयार था। शब्दों पर उसकी पकड़ थी सो उसने भिक्षु शब्द से ही विवाद को उठाने की सोची। उसे तो बस कोई भी निमित्त चाहिए था।

भगवान ने उससे कहा ब्राह्मण भिक्षाटन मात्र से कोई भिक्षु नहीं होता; लै भिखारी चाहो तो मान ले सकते हो। पर भिखारी और भिक्षु पर्यायवाची नहीं हैं। मैं भिक्षु उसे कहता हूं जिसने सब संस्कार छोड़ दिए। जिसके पास भीतर कोई संस्कार न बचे उसे भिक्षु कहता हूं।


जिसको जीसस ने पुअर इन स्तिट कहा है। ब्लेसेड आर द पुअर इन स्टिट, धन्य हैं वे जो भीतर से दरिद्र हैं। ईसाइयत के पास इसकी ठीक व्याख्या नहीं है कि क्या मतलब है जीसस का— भीतर से दरिद्र। बुद्ध के इस वचन में उसकी व्याख्या है। संस्काररहित। जिसने सारी कंडीशनिंग छोड़ दी।
समझो, यह बात बड़ी मूल्य की है। हम संस्कारों से जीते हैं। कोई कहता, मैं हिंदू कोई कहता, मैं मुसलमान; कोई कहता, मैं ईसाई; यह संस्कार है। कोई पैदा तो नहीं होता हिंदू की भांति, न कोई ईसाई की भांति।

शब्दो के धनी में दरिद्र भिक्षु ‘’हत्‍थक’’–(कथायात्रा—042)

शब्दो के धनी ध्यान में दरिद्र भिक्षु ’हत्‍थक’—(कथा—यात्रा)

एक भिक्षु थे— हत्थक। वे स्वयं को सत्य का अथक खोजी मानते थे।

स्वभावत:, जो अपने को सत्य का अथक खोजी माने, वह शास्त्रों में उलझ जाता है। जैसे कि शास्त्रों में सत्य हो। निकले सत्य की खोज को, खो जाते हैं शास्त्रों के अरण्य में। चाहते तो थे गहरे में जान लें कि जीवन क्या है, चाहते तो थे कि जान लें यह विराट अस्तित्व क्या है, लेकिन आंखें अटक जाती हैं शास्त्रों में। तो हत्‍थक बड़े शास्त्री बन गए। सत्य की खोज मन ने झुठला दी। मन ने कहा, सत्य चाहिए, शास्त्र में झांको। सत्य चाहिए, तो सारे सिद्धातों में झांको।


सत्य के खोजी अक्सर पंडित बन जाते हैं। वह मन ने धोखा दे दिया। सत्य की खोज का शास्त्र से क्या लेना—देना! शास्त्र से बडी तो सत्य के मार्ग में कोई और बाधा नहीं है! हां, तुम सत्य को जान लो तो शायद तुम शास्त्र में भी सत्य को पा सको, लेकिन इससे उलटा नहीं हो सकता कि तुम सत्य को बिना जाने और शास्त्र में पा सको। यह असंभव है। सत्य को जान लो, फिर शास्त्र को देखो तो शायद तुम्हें गवाहियां मिल जाएं कि हां, ठीक, जो मैंने जाना वही औरों ने भी जाना है। लेकिन तुम्हारा जानना प्राथमिक है। दूसरों का जानना दोयम, नंबर दो की बात है। तुमने न जाना हो तो दूसरों ने कितना ही जाना हो, इससे कुछ फर्क न पड़ेगा। और दूसरे जो कहेंगे, उसे तुम समझोगे कैसे?

महावीर वाणी--(भाग--2) प्रवचन--18

अलिप्तता है ब्राह्मणत्व—(प्रवचन—अठारहवां)

दिनांक 2 सितम्बर, 1973;
तृतीय पर्युषण व्याख्यानमाला,
पाटकर हाल, बम्बई

ब्राह्मण-सूत्र : 2

दिव्व-माणुसत्तेरिच्छं, जो न सेवइ मेहुणं
मणसा काय-वक्केणं, तं वयं बूम माहणं ।।भ
जहा पोम्मं जले जायं, नोवलिप्पइ वारिणा
एवं अलित्तं कामेहिं, तं वयं बूम माहणं ।।
आलोलुयं मुहाजीविं,
अणगारं अकिंचणं
असंसत्तं गिहत्थेसु,
तं वयं बूम माहणं ।।

जो देवता, मनुष्य तथा तियच संबंधी सभी प्रकार के मैथुन का मन, वाणी और शरीर से कभी सेवन नहीं करता, उसे हम ब्राह्मण कहते हैं।
जिस प्रकार कमल जल में उत्पन्न होकर भी जल से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार जो संसार में रहकर भी काम-भोगों से सर्वथा अलिप्त रहता है, उसे हम ब्राह्मण कहते हैं।
जो अलोलुप है, जो अनासक्त-जीवी है। जो अनगार (बिना घरबार का) है। जो अकिंचन है, जो गृहस्थों के साथ आने वाले संबंधों में अलिप्त है, उसे हम ब्राह्मण कहते हैं।

बुधवार, 26 नवंबर 2014

शिव--सूत्र-(ओशो)-प्रवचन--01

जीवन—सत्य की खोज की दिशा(प्रवचनपहला)

दिनांक 11 सितंबर, 1974;
श्री ओशो आश्रम, पूना।
प्रात: काल।
सूत्र:
      ओंम नम: श्रीशंभवे स्वात्मानन्दप्रकाशवपुषे।
अथ
शिव—सूत्र:
चैतन्यमात्मा
ज्ञानं बन्ध:।
योनिवर्ग: कलाशरीरम्।
क्समो भैरव:।
शक्तिचक्रसंधाने विश्वसंहार:।

 ओंम स्वप्रकाश आनंद—स्वरूप भगवान शिव को नमन
(अब) शिवसूत्र (प्रारंभ)
चैतन्‍य आत्मा है।
ज्ञान बंध है।
यौनिवर्ग और कला शरीर है।
उद्यम ही भैरव है।
शक्‍तिचक्र के संधान से विश्व क्त संहार खे जाता है।

जीवन—सत्य की खोज दो मार्गों से हो सकती है। एक पुरुष का मार्ग है—आक्रमण का, हिंसा का, छीन—झपट का। एक सी का मार्ग है—समर्पण का, प्रतिक्रमण का।
विज्ञान पुरुष का मार्ग है; विज्ञान आक्रमण है। धर्म सी का मार्ग है; धर्म नमन है।

शिव--सूत्र -ओशो

शिव—सूत्र—(ओशो)

(समाधि साधपा शिवर, श्री ओशो आश्रम, पूना। दिनांक 11 से 20 सितंबर, 1974 तक ओशो द्वारा दिए गए दस अमृत—प्रवचनो का संकलन।

 भूमिका:

 र्म की यात्रा के साधन क्या है? इस प्रश्र का समाधान प्रज्ञापुरुषों ने अपने अपने ढंग से किया है। परंतु सभी ने इस बात का स्पष्ट संकेत दिया है कि कोई भी साधन तभी उपयोगी हो सकता है जब साधक गहन से गहनतर चुनौतियों को झेलने के लिए अपने पूरे प्राणपण से तलर हो, कि वह स्वयं एक ऐसी आग में से गुजरने के लिए प्रतिबद्ध हो जो उसकी चेतना को पूरी तरह निखार सके।
परंतु यह यात्रा, इस यात्रा के साधन, और चुनौतियों का सामना करने के योग्य सामर्थ्य यह सब निर्भर करता है एक मुख्य तत्व पर—यात्रा का मार्गदर्शक। दूसरे शब्दों में, मात्र सद्गुरु ही सही साधन उपलब्ध कराते है। सदगुरू स्वयं एक चिरंतन प्रज्वलित अग्रि है जिसकी ऊर्जा व्यक्ति की चेतना को रूपांतरित कर देती है। चुनौती है सद्गुरु, उसके निकट आकर जैसे थे वैसे रह पाना असंभव है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--093

धर्म है समग्र के स्वास्थ्य की खोज—(प्रवचन—तिरनवां)

अध्याय 54

व्यक्ति और राज्य

जो दृढ़ता से स्थापित है, उसे आसानी से डिगाया नहीं जा सकता।
जिसकी पकड़ पक्की है, वह आसानी से छोड़ता नहीं है।
पीढ़ी दर पीढ़ी उसके पूर्वजों के त्याग अबाध रूप से जारी रहेंगे।
व्यक्ति में उसके पालन से, चरित्र प्रामाणिक होगा;
परिवार में उसके पालन से, चरित्र अतिशय होगा;
गांव में उसके पालन से, चरित्र बहुगुणित होगा;
राज्य में उसके पालन से, चरित्र समृद्ध होगा;
संसार में उसके पालन से, चरित्र सार्वभौम बनेगा।
इसलिए: व्यक्ति के चरित्र के अनुसार, व्यक्ति को परखो;
परिवार के चरित्र के अनुसार, परिवार को परखो;
गांव के चरित्र के अनुसार, गांव को परखो;
राज्य के चरित्र के अनुसार, राज्य को परखो;
संसार के चरित्र के अनुसार, संसार को परखो।
मैं कैसे जानता हूं कि संसार ऐसा है?
इसके द्वारा।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--092

संगठन, संप्रदाय, समृद्धि, समझ और सुरक्षा(प्रवचन—बानववां)

प्रश्न-सार

1--उनके पीछे संप्रदाय न बने, इसके लिए बुद्ध पुरुष उपाय क्यों नहीं करते?

2--आदमी की जरूरत, समृद्धि और धर्म में क्या संबंध है?

3--भगवान मनुष्य को वासनाएं क्यों देता है?

4--ताओ में प्रवेश विकास है या पीछे लौटना?

5--आप कैसे कहते हैं कि समझ काफी है?

6--आश्रम में सुरक्षा की व्यवस्था क्यों है?

पहला प्रश्न:

आपने कल संप्रदायों को पगडंडी की संज्ञा दी और धर्म को राजपथ की। लेकिन प्रायः सभी संप्रदाय राजपथ से गुजरने वाले ज्ञानियों के पीछे निर्मित हुए। फिर इन परम ज्ञानियों ने इसकी चिंता क्यों नहीं की कि उनके पीछे संप्रदाय न बनें? और इसके निवारण के लिए आप क्या कर रहे हैं?

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--091

धर्म का मुख्य पथ सरल है—(प्रवचन—इक्‍यानवां)
 अध्याय 53

लूटपाट

मुख्य पथ (ताओ) पर चल कर,

मैं यदि तपःपूत ज्ञान को प्राप्त होता,

तो मैं पगडंडियों से नहीं चलता।

मुख्य पथ पर चलना आसान है;

तो भी लोग छोटी पगडंडियां पसंद करते हैं।

दरबार चाकचिक्य से भरे हैं,

जब कि खेत जुताई के बिना पड़े हैं और बखारियां खाली हैं।

तथापि जड़ीदार चोगे पहने, चमचमाती तलवारें हाथों में लिए,

श्रेष्ठ भोजन और पेय से अघाए, वे धन-संपत्ति में सराबोर हैं।

-- इससे ही संसार लूटपाट पर उतारू होता है।

क्या यह ताओ का भ्रष्टाचरण नहीं है?


त्य सरल है। क्योंकि सत्य स्वभाव है। और स्वभाव का मार्ग सभी जगह है। पंखुड़ी-पंखुड़ी पर, तारेत्तारे में, झरनों में, पहाड़ों में, पशुओं में, पक्षियों में, आदमियों में स्वभाव ऐसे ही पिरोया हुआ है जैसे मनके पिरोए हों धागे में। हर मनके के भीतर धागा है, ऐसे ही हर जीवन के भीतर स्वभाव का मार्ग है।

कहै कबीर दीवाना-(प्रवचन--17 )

उनमनि चढ़ा गगन-रस पीवै—(प्रवचन—सत्रहवां)
दिनांक 7 जून, 1975, प्रातः,
ओशो कम्यून इंटरनेशनल, पूना

सारसूत्र :

अवधू मेरा मन मतिवारा

उनमनि चढ़ा गगन-रस पीवै, त्रिभुवन भया उजियारा।। 

गुड़ करि ग्यान ध्यान करि महुआ, व भाठी करि भारा। 

सुखमन नारी सहज समानी, पीवै पीवन हारा।। 

दोउ पुड़ जोड़ि चिंगाई भाठी, चुया महारस भारी। 

काम क्रोध दोइ किया बलीता, छूटि गई संसारी।। 

सुंनि मंडल में मंदला बाजै, तहि मेरा मन नाचै 

गुरु प्रसादि अमृत फल पाया, सहजि सुषमना काछै।।

पूरा मिल्या तबै सुख उपज्यौ, तन की तपनि बुझानी 

कहै कबीर भव-बंधन छूटै, जोतिहिं जोति समानी।।
पनिषदों में एक वचन है : "उत्तिष्ठ, जाग्रत, प्राप्यवरान्निबोधत।" उठो, जागो और जो मिला ही हुआ है, उसे पा लो।
--जो मिला ही हुआ है। जिसे तुम खोजते हो, उसे अगर तुमने खो दिया होता तो उसे पाने का कोई उपाय न था। इस विराट अस्तित्व में खोए को खोज लेने का कोई उपाय नहीं।

कहे कबीर दीवाना--(प्रवचन--16)

सुरति का दीया—(प्रवचन—सोलहवां)
दिनांक 6 जून, 1975, प्रातः,
ओशो कम्यून इंटरनेशनल, पूनां

प्रश्नसार:

1—ज्ञानी साथ साथ रोता और हंसता है। क्या देखकर रोता है और क्या देखकर हंसता है?



2—क्या हम सबकी मनःस्थितियों को देखकर भी आप कह सकते हैं "साधो सहज समाधि भली"?

3—आपके पास कभी-कभी अकारण सघन पीड़ा का अनुभव। यह क्या है?


4—कृपया बताएं, कि ऊंट किस करवट बैठे?



पहला प्रश्न :

सुना है, कभी-कभी ज्ञानी साथ-साथ रोता है और हंसता है। वह क्या देखकर रोता है और क्या देखकर हंसता है?

भी-कभी नहीं, सदा ही ज्ञानी साथ-साथ रोता और हंसता है। हंसता है अपने को देखकर, रोता है तुम्हें देखकर। हंसता है यह देखकर, कि जीवन की संपदा कितनी सरलता से उपलब्ध है। रोता है यह देखकर, कि करोड़ों-करोड़ों लोग व्यर्थ ही निर्धन बने हैं।