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बुधवार, 17 जून 2015

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--201

फलाकांक्षा का त्‍याग—(प्रवचन—तीसरा)

अध्‍याय—18
सूत्र—

            नियतस्य तु संन्यास: कर्मणो नोययद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामम: यरिकीर्तित:।। 7।।
दु:खमित्येव यत्कर्म कायक्लेशमयाल्यजेत्।
स कृत्या राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ।। 8।।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्‍वा फलं चैव स त्याग: सास्थ्यिाए मत:।। 9।।

और हे अर्जुन, नियत कर्म का त्याग करना योग्य नही है, इसलिए मोह से उसका त्याग करना तामस त्याग कहा गया है।
और यदि कोई मनुष्य, जो कुछ कर्म है वह सब ही दुखरूप है, ऐसा समझकर शाशीरिक क्लेश के भय से कर्मों का त्याग कर दे, तो वह पुरूष उस राजस त्याग को करके भी त्याग के फल को प्राप्त नहीं होता है।
और हे अर्जुन, करना कर्तव्य है, ऐसा समझकर ही जो शास्त्र— विधि से नियत किया हुआ कर्तव्य कर्म आसक्‍ति को और फल को त्याग कर किया जाता है, वह ही सात्‍विक कहा जाते है।

मंगलवार, 16 जून 2015

जिन खोजा तिन पाइयां--( प्रवचन--16)

ओम् साध्य है, साधन नहीं—(प्रवचन—सौहलवां)

(दसवीं प्रश्नोत्तर चर्चा)

प्रश्न: ओशो कल सातवें शरीर के संदर्भ में ओम् पर कुछ आपने बातें की। इसी संबंध में एक छोटा सा प्रश्न यह है कि अर ऊ और म के कंपन किन चक्रों को प्रभावित करते हैं और उनका साधक के लिए उपयोग क्या हो सकता है? इन चक्रों के प्रभाव से सातवें चक्र का क्या संबंध है?


 ओम् के संबंध में थोड़ी सी बातें कल मैंने आपसे कहीं। उस संबंध में थोड़ी सी और बातें जानने जैसी हैं। एक तो यह कि ओम् सातवीं अवस्था का प्रतीक है, सूचक है, वह उसकी खबर देनेवाला है। ओम् प्रतीक है सातवीं अवस्था का। सातवीं अवस्था किसी भी शब्द से नहीं कही जा सकती। कोई सार्थक शब्द उस संबंध में उपयोग नहीं किया जा सकता। इसलिए एक निरर्थक शब्द खोजा गया, जिसमें कोई अर्थ नहीं है। यह मैंने कल आपसे कहा। इस शब्द की खोज भी चौथे शरीर के अनुभव पर हुई है। यह शब्द भी साधारण खोज नहीं है।

असल में, जब चित्त सब भांति शून्य हो जाता है—कोई विचार नहीं होते, कोई शब्द नहीं होते—तब भी शून्य की ध्वनि शेष होती है। शून्य भी बोलता है, शून्य का भी अपना सन्नाटा है। अगर कभी बिलकुल सूनी जगह में आप खड़े हो गए हों—जहां कोई आवाज नहीं, कोई ध्वनि नहीं—तों वहा शून्य की भी एक ध्वनि है, वहां शून्य का भी एक सन्नाटा है।

रविवार, 14 जून 2015

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--15)

धर्म के असीम रहस्य सागर में—(प्रवचन—पंद्रहवां)

(नौवीं प्रश्नोत्तर चर्चा)

धर्म और विज्ञान के भिन्न दृष्टिकोण:

प्रश्न : ओशो कल की चर्चा में आपने कहा कि विज्ञान का प्रवेश पांचवें शरीर स्पूचुअल बॉडी तक संभव है। बाद में चौथे शरीर में विज्ञान की संभावनाओं पर चर्चा की। आज कृपया पांचवें शरीर में हो सकने वाली कुछ वैज्ञानिक संभावनाओं पर संक्षिप्त में प्रकाश डालें।

 एक तो जिसे हम शरीर कहते हैं और जिसे हम आत्मा कहते हैं, ये ऐसी दो चीजें नहीं हैं कि जिनके बीच सेतु न बनता हो, ब्रिज न बनता हो। इनके बीच कोई खाई नहीं है, इनके बीच जोड़ है।
तो सदा से एक खयाल था कि शरीर अलग है, आत्मा अलग है; और ये दोनों इस भांति अलग हैं कि इन दोनों के बीच कोई सेतु, कोई ब्रिज नहीं बन सकता। न केवल अलग हैं, बल्कि विपरीत हैं एक—दूसरे से। इस खयाल ने धर्म और विज्ञान को अलग कर दिया था। धर्म वह था, जो शरीर के अतिरिक्त जो है उसकी खोज करे, और विज्ञान वह था, जो शरीर की खोज करे— आत्मा के अतिरिक्त जो है, उसकी खोज करे।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--200

सात्‍विक, राजस और तामस त्‍याग—(प्रवचन—दूसरा)

अध्‍याय—18
सूत्र—
निश्चय श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरूषव्‍याघ्र त्रिविध: संप्रकीर्तित: ।। 4।।
यज्ञदानतय:कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।। 5।।
एतान्ययि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्वा फलानि च ।
कर्तथ्यानीति मे पार्थ निशिचतं मतमुत्तमम्।। 6।।

परंतु हे अर्जुन, उस त्याग के विषय में तू मेरे निश्चय को सुन। हे पुरूषश्रेष्ठ, वह त्याग सात्‍विक राजस और तामस, ऐसे तीनों प्रकार का ही कहा गया है।
तथा यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागने के योग्य नही है, किंतु वह निःसंदेह करना कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ दान और तप, ये तीनों ही बुद्धिमान पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं। इसलिए हे पार्थ, यह यज्ञ, दान और तपरूप कर्म तथा और भी संपूर्ण श्रेष्ठ कर्म आसक्‍ति को और फलों को त्याग कर अवश्य करने चाहिए, ऐसा मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।

शुक्रवार, 12 जून 2015

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--199

अंतिम जिज्ञासा: क्‍या है मोक्ष, क्‍या है संन्‍यास—(प्रवचन—पहला)


अध्‍याय—18
सूत्र—

श्री मद्भगवद्गीता (अथ अष्‍टादशोउध्‍ण्‍याय)

अर्जुन उवाच:

            संन्यामस्य महाबाहो तत्त्वीमच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।। 1।।
भगवानवाच:
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
सर्व कर्मफलत्यागं प्राहुस्मागं विचक्षणा:।। 2।।
त्याज्यं दोश्वदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण:।
यज्ञदानतयकर्म न त्याज्यमिति चापरे ।। 3।।

अर्जुन बोला, हे महाबाहो, हे हषीकेश, हे वासुदेव, मैं संन्यास और त्याग के तत्‍व को पृथक— पृथक जानना चाहता हूं।
इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर श्री भगवान बोले, हे अर्जुन, कितने ही पंडितजन तो काम्य कर्मों के त्याग को संन्याम जानते हैं और कितने ही विचक्षण अर्थात विचार कुशल पुरुष सब क्रमों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।
तथा कई एक मनीषी ऐसा कहते हैं कि कर्म सभी दोषयुक्त है, इसलिए त्यागने के योग्य हैं। और दूसरे विद्वन ऐसा कहते हैं कई यज्ञ, दान और तप लय कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं।

गुरुवार, 11 जून 2015

मैं मृत्‍यु सिखाता हूं--(प्रवचन--15)

संकल्प से साक्षी और साक्षी से आगे तथाता की परम उपलब्धि—(प्रवचन—पंद्रहवां)


 (साक्षी की साधना करना बहुत बड़ा संकल्प है और तथाता की साधना करना तो साक्षी से भी बड़ा संकल्प है। यह महासंकल्प है। जब एक आदमी यह तय करता है कि मैं साक्षी बनकर जीऊंगा, तो इससे बड़ा संकल्प नहीं है दूसरा।)

भगवान श्री आपने कहा है कि यदि कोई साधक तीव्र संकल्प के साथ यह प्रयोग करे कि मैं मरना चाहता हूं मैं अपने केंद्र पर वापस लौटना चाहता हूं तो कुछ ही दिनों में उसके प्राण भीतर सिकुड़ने लगेंगे और साधक पहले भीतर से बाद में बाहर से अपने ही शरीर को मरा हुआ पड़ा देख सकता है तब उसका मृत्यु का भय सदा के लिए मिट जाता है। तो प्रश्न है कि क्या इस स्थिति में पुन: शरीर में सुरक्षापूर्वक वापस लौट सकें इसके लिए किसी विशेष तैयारी और सावधानी की आवश्यकता है? या वापस लौटना अपने आप हो जाता है? कृपया इस पर प्रकाश डालें।

सोमवार, 8 जून 2015

जिन खोजा तिन पाईया--(प्रवचन--14)

सात शरीर और सात चक्र—(प्रवचन—चौहदवां)

आठवीं प्रश्नोत्तर चर्चा:

साधक की बाधाएं:

प्रश्न: ओशो कल की चर्चा में आपने कहा कि साधक को पात्र बनने की पहले फिकर करनी चाहिए जगह— जगह मांगने नहीं जाना चाहिए। लेकिन साधक अर्थात खोजी का अर्थ ही है कि उसे साधना में बाधाएं हैं। उसे पता नहीं है कि कैसे पात्र बने कैसे तैयारी करे। तो वह मांगने न जाए तो क्या करे? सही मार्गदर्शक से मिलना कितना मुश्किल से हो पाता है।

 लेकिन खोजना और मांगना दो अलग बातें हैं। असल में, जो खोजना नहीं चाहता वही मांगता है। खोजना और मांगना एक तो हैं ही नहीं, विपरीत बातें हैं। खोजने से जो बचना चाहता है वह मांगता है, खोजी कभी नहीं मांगता। और खोज और मांगने की प्रक्रिया बिलकुल अलग है। मांगने में दूसरे पर ध्यान रखना पड़ेगा—जिससे मिलेगा। और खोजने में अपने पर ध्यान रखना पड़ेगा—जिसको मिलेगा।

यह तो ठीक है कि साधक के मार्ग पर बाधाएं हैं। लेकिन साधक के मार्ग पर बाधाएं हैं, अगर हम ठीक से समझें तो इसका मतलब होता है कि साधक के भीतर बाधाएं हैं; मार्ग भी भीतर है। और अपनी बाधाओं को समझ लेना बहुत कठिन नहीं है। तो इस संबंध में थोड़ी सी विस्तीर्ण बात करनी पड़ेगी कि बाधाएं क्या हैं और साधक उन्हें कैसे दूर कर सकेगा।

रविवार, 7 जून 2015

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--198

मन का महाभारत—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

अध्‍याय—17
सूत्र: 198

            सद्भावे साधुभावे च सदित्येतगयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्‍छब्द: पार्थ युज्यते।। 26।।
यज्ञे तपसि दाने च स्थिति: सीदति चौच्‍यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिप्रीयते ।। 27।।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्‍प्रेत्य नौ इह ।। 28।।

और सत्— ऐसे यह परमात्मा का नाम सत्य— भाव में और श्रेष्ठ— भाव में प्रयोग किया जाता है। तथा हे पार्थ, उत्तम कर्म में भी सत् शब्द प्रयोग किया जाता है।
तथा यज्ञ तय और दान में जो स्थिति है, वह भी सत् है, ऐसे कही जाती है। और उस परमात्मा के अर्थ किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत् है, ऐसे कहा जाता है।
और हे अर्जुन, बिना श्रद्धा के होम। हुआ हवन तथा दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ कर्म है वह समस्त असत् है ऐसे कहा जाता है। इसीलिए वह न तो हम लोक में लाभदायक है और न मरने के पीछे ही।

शनिवार, 6 जून 2015

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--13)

सात शरीरों से गुजरती कुंडलिनी—(प्रवचन—तैहरवां)


सातवीं प्रश्नोत्तर चर्चा:

मनुष्य के सात शरीर:

प्रश्न: ओशो कल की चर्चा में आपने कहा कि कुंडलिनी के झूठे अनुभव भी प्रोजेक्ट किए जा सकते हैं— जिन्हें आप आध्यात्मिक अनुभव नहीं मानते हैं मानसिक मानते हैं। लेकिन प्रारंभिक चर्चा में आपने कहा था कि कुंडलिनी मात्र साइकिक है। इसका ऐसा अर्थ हुआ कि आप कुंडलिनी की दो प्रकार की स्थितियां मानते हैं— मानसिक और आध्यात्मिक। कृपया इस स्थिति को स्‍पष्‍ट करें।

 असल में, आदमी के पास सात प्रकार के शरीर हैं। एक शरीर तो जो हमें दिखाई पड़ता है—फिजिकल बॉडी, भौतिक शरीर। दूसरा शरीर जो उसके पीछे है और जिसे ईथरिक बॉडी कहें— आकाश शरीर। और तीसरा शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे एस्ट्रल बॉडी कहें—सूक्ष्म शरीर। और चौथा शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे मेंटल बॉडी कहें— मनस शरीर। और पांचवां शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे म्प्रिचुअल बॉडी कहें— आत्मिक शरीर। छठवां शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे हम कास्मिक बॉडी कहें—ब्रह्म शरीर। और सातवां शरीर जो उसके भी पीछे है, जिसे हम निर्वाण शरीर, बॉडीलेस बॉडी कहें— अंतिम।
इन सात शरीरों के संबंध में थोड़ा समझेंगे तो फिर कुंडलिनी की बात पूरी तरह समझ में आ सकेगी।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--197

क्रांति की कीमिया: स्‍वीकार—(प्रवचन—दसवां)

अध्‍याय—17
सूत्र—

            ओंम तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृत:।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिता: पुरा ।। 23।।
तस्मादोमित्युदह्रत्य यज्ञदानतप:क्रिया:।
प्रवर्तन्ते विधानोक्‍ता: सततं ब्रह्मवादिनाम् ।। 24।।
तदित्यनीभसंधाय फलं यज्ञतप:क्रिया:।
दानक्रियाश्च विविधा: क्रियन्तेमोक्षकांक्षिभि:।। 25।।

और हे अर्जुन, ओम तत् सत— ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानंदघन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदि काल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादिक रचे गए हैं। इसलिए ब्रह्मवादिन पुरुषों की शास्त्र— विधि से नियत की हुई यज्ञ, दान और तय— रूप क्रियाएं सदा ओम, ऐसे हम
परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरंभ होती हैं। और तत् अर्थात तत् नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है, इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार की यज्ञ तय— रूप क्रियाएं तथा दान—रूप क्रियाएं मोक्ष की इच्‍छा वाले पुरूषों द्वारा की जाती हैं।

बुधवार, 3 जून 2015

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--12)

सतत साधना : न कहीं रुकना, न कहीं बंधना—(प्रवचन—बाहरवां)


छठवीं प्रश्नोत्तर चर्चा:


 प्रश्न: ओशो आपने पिछली एक चर्चा में कहा कि सीधे अचानक प्रसाद के उपलब्ध होने पर कभी— कभी दुर्घटना भी घटित हो सकती है और व्यक्ति क्षतिग्रस्त तथा पागल भी हो सकता है या उसकी मृत्यु भी हो सकती है। तो सहज ही प्रश्न उठता है कि क्या प्रसाद हमेशा ही कल्याणकारी नहीं होता है? और क्या वह स्व— संतुलन नहीं रखता है? दुर्घटना का यह भी अर्थ होता है कि व्यक्ति अपात्र था। तो अपात्र पर कृपा कैसे हो सकती है?

 दो—तीन बातें समझ लेनी जरूरी हैं। एक तो प्रभु कोई व्यक्ति नहीं है, शक्ति है। और शक्ति का अर्थ हुआ कि एक—एक व्यक्ति का विचार करके कोई घटना वहां से नहीं घटती है। जैसे नदी बह रही है। किनारे जो दरख्त होंगे, उनकी जड़ें मजबूत हो जाएंगी; उनमें फूल लगेंगे, फल आएंगे। नदी की धार में जो पड़ जाएंगे, उनकी जड़ें उखड़ जाएंगी, बह जाएंगे, टूट जाएंगे। नदी को न तो प्रयोजन है कि किसी वृक्ष की जड़ें मजबूत हों, और न प्रयोजन है कि कोई वृक्ष उखाड़ दे। नदी बह रही है। नदी एक शक्ति है, नदी एक व्यक्ति नहीं है।

मंगलवार, 2 जून 2015

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--196

दान—सात्‍विक, राजस, तामस—(प्रवचन—नौवां)

अध्‍याय—17
सूत्र-

दातव्‍यमिप्ति यद्दानं दींयतेउनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्‍विक स्मृतम्।। 20।।
यत्तु प्रत्यक्कारार्थं फलमुद्दिश्‍य वा पन:।
दीयते च परिक्‍लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।। 21।।
अदेशकाले यद्दानमयात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्‍कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदष्ठतम्।। 22।।

है अर्जुन, दान देना ही कर्तव्य है, ऐसे भाव से जो दान देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर प्रत्युपकार न करने वाले के लिए दिया जाता है, वह दान तो सात्‍विक कहा गया है। और जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को उद्देश्य रखकर फिर हिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।
और जो दान बिना सत्कार किए अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश—काल में कुपात्रों के लिए दिया जाता है वह दान तामस कहा गया है।

सोमवार, 1 जून 2015

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--11)

मुक्ति सोपान की सीढियां—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)

पांचवीं प्रश्नोत्तर चर्चा:

शक्तिपात और प्रसाद:

प्रश्न: ओशो आपने नारगोल शिविर में कहा कि शक्तिपात का अर्थ है— परमात्मा की शक्ति आप में उतर गई। बाद की चर्चा में आपने कहा कि शक्तिपात और ग्रेस में फर्क है। इन दोनों बातों में विरोधाभास सा लगता है। कृपया इसे समझाएं।

 दोनों में थोड़ा फर्क है, और दोनों में थोड़ी समानता भी है। असल में, दोनों के क्षेत्र एक—दूसरे पर प्रवेश कर जाते हैं। शक्तिपात परमात्मा की ही शक्ति है। असल बात तो यह है कि उसके अलावा और किसी की शक्ति ही नहीं है। लेकिन शक्तिपात में कोई व्यक्ति माध्यम की तरह काम करता है। अंततः तो वह भी परमात्मा है। लेकिन प्रारंभिक रूप से कोई व्यक्ति माध्यम की तरह काम करता है।
जैसे आकाश में बिजली कौंधी; घर में भी बिजली जल रही है; वे दोनों एक ही चीज हैं। लेकिन घर में जो बिजली जल रही है, वह एक माध्यम से प्रवेश की है घर में—नियोजित है। आदमी का हाथ उसमें साफ और सीधा है। वह भी परमात्मा की है। वर्षा में जो बिजली कौंध रही है वह भी परमात्मा की है। लेकिन इसमें बीच में आदमी भी है, उसमें बीच में आदमी नहीं है। अगर दुनिया से आदमी मिट जाए तो आकाश की बिजली तो कौंधती रहेगी, लेकिन घर की बिजली बुझ जाएगी।

रविवार, 31 मई 2015

मैं मृत्‍यु सिखाता हूं--(प्रवचन--14)

धर्म की महायात्रा में स्वयं को दांव पर लगाने का साहस—(प्रवचन—चौहदवां)


 (प्रतीक्षा बना देती है दर्पण चेतना को। और जिस दिन हम दर्पण बन जाते हैं उसी दिन सब मिल जाता है। क्योंकि सब तो सदा ही था सिर्फ हम नहीं थे। दर्पण होकर हम हो जाते है।)


भगवान श्री जाति— स्मरण अर्थात पिछले जन्मों की स्मृतियों में प्रवेश की विधि पर आपने द्वारका शिविर में चर्चा की है। आपने कहा है कि चित्त को भविष्य की दिशा से पूर्णत: तोड़ कर ध्यान की शक्ति को अतीत की ओर फोकस करके बहाना चाहिए। प्रक्रिया का क्रम आपने बताया पहले पांच वर्ष की उम्र की स्मृति में लौटना फिर तीन वर्ष की फिर जन्म की स्मृति में फिर गर्भाधान की स्मृति में फिर पिछले जन्मों की स्मृति में प्रवेश होता है। आपने आगे कहा है कि मैं जाति— स्मरण के प्रयोग के पूरे सूत्र नहीं कह रहा हूं। पूरे सूत्र क्या हैं? क्या आगे के सूत्र का कुछ स्पष्टीकरण करने की कृपा कीजिएगा?

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--10)

आंतरिक रूपांतरण के तथ्य—(प्रवचन—दसवां)

चौथी प्रश्नोत्तर चर्चा


 प्रश्न : ओशो कल की चर्चा में आपने कहा कि शक्ति का कुंड प्रत्येक व्यक्ति का अलग— अलग नहीं है लेकिन कुंडलिनी जागरण में तो साधक के शरीर में स्थित कुंड से ही शक्ति ऊपर उठती है। तो क्या कुंड अलग— अलग हैं या कुंड एक ही है इस इस स्थिति को कृपया समझाएं।

 ऐसा है, जैसे एक कुएं से तुम पानी भरो। तो तुम्हारे घर का कुआं अलग है, मेरे घर का कुआं अलग है, लेकिन फिर भी कुएं के भीतर के जो झरने हैं वे सब एक ही सागर से जुड़े हैं। तो अगर तुम अपने कुएं के ही झरने की धारा को पकड़कर खोदते ही चले जाओ, तो उस मार्ग में मेरे घर का कुआं भी पड़ेगा, औरों के घर के कुएं भी पड़ेंगे, और एक दिन तुम वहां पहुंच जाओगे जहां कुआं नहीं, सागर ही होगा। जहां से शुरू होती है यात्रा वहां तो व्यक्ति है, और जहां समाप्त होती है यात्रा वहां व्यक्ति बिलकुल नहीं है, वहां समष्टि है; इंडिविजुअल से शुरू होती है और एकोल्युट पर खतम होती है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--195

पूरब और पश्‍चिम का अभिनव संतुलन—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—17
सूत्र:
श्रद्धया परया तप्तं तयस्तन्त्रिविधं नरै ।
अफलाकंक्षिभिर्युक्तै: सात्त्विकं पश्चिक्षते।। 17।।
सत्कारमानपूजार्थ तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमब्रुवम्।। 18।।
मूढग्राहेणात्मनार्थं यत्पीडया क्रियते तय: ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदहतम्।। 19।।

है अर्जुन, कल को न चाहने वाले निष्कामी योगी परूषों द्वारा परम आ से किए हुए उस पूर्वोक्‍त तीन प्रकार के तय को तो सात्‍विक कहते हैं।
और जो तय सत्कार, मान और पूजा के लिए अथवा केवल पाखंड से ही किया जाता है वह अनिशचय और क्षणिक कल वाला तय का राजस कहा गया है।
और जो तय मूढतापूर्वक हठ से मन, वाणी और शरीर की बढ़ी के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है वह तय तामस कहा गया है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--194

शरीर, वाणी और मन के तप—(प्रवचन—सातवां)

अध्‍याय—7
सूत्र:--

देवद्धिजगुरूप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्‍यते।। 14।।
अनुद्वेगकरं वाक्‍यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्‍यमनं चैव वाङ्मय तय उच्यते।। 15।।
मन:प्रमाद सौम्यत्‍वं मौनमात्मीवनिग्रह:।
भावसंशुद्धिरित्‍येतत्तपो मानसमुच्‍यते।। 16।।

तथा हे अर्जुन, देवता, द्विज अर्थात ब्रह्मण, गुरू और ज्ञानीजनों का पूजन एवं पवित्रता, सरलता, ब्राह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर संबंधी तय कहा जाता है।
तथा जो उद्वेग को न करने वाला प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है और जो स्वाध्याय का अभ्यास है, वह नि:संदेह वाणी संबंधी तय कहा जाता है।
तथा मन की प्रसन्नता, शांत भाव, मौन, मन का निष्ठ और भाव की पवित्रता, ऐसे यह मन संबंधीं तय कहा जाता है।

शनिवार, 30 मई 2015

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--09)

श्वास की कीमिया—(प्रवचन—नौवां)

तीसरी प्रश्नोत्तर चर्चा

प्रश्न :  ओशो रूस के बहुत बड़े अध्यात्मविद् और मिस्टिक जॉर्ज गुरजिएफ ने अपनी आध्यात्मिक खोज— यात्रा के संस्मरण 'मीटिंग्स विद दि रिमार्केबल मेन' नामक पुस्तक में लिखे हैं। एक दरवेश फकीर से उनकी काफी चर्चा भोजन को चबाने के संबंध में तथा योग के प्राणायाम व आसनों के संबंध में हुई जिससे वे बड़े प्रभावित भी हुए। दरवेश ने उन्हें कहा कि भोजन को कम चबाना चाहिए कभी— कभी थी सहित भी निगल जाना चाहिए; इससे पेट शक्तिशाली होता है। इसके साथ ही दरवेश ने उन्हें किसी भी प्रकार के श्वास के अभ्यास को न करने का सुझाव दिया। दरवेश का कहना था कि प्राकृतिक श्वास—प्रणाली में कुछ भी परिवर्तन करने से सारा व्यक्तित्व अस्तव्यस्त हो जाता है और उसके घातक परिणाम होते हैं इस संबंध में आपका क्या मत है?

 इसमें पहली बात तो यह है कि यह तो ठीक है कि अगर भोजन चबाया न जाए, तो पेट शक्तिशाली हो जाएगा। और जो काम मुंह से कर रहे हैं वह काम भी पेट करने लगेगा। लेकिन इसके परिणाम बहुत घातक होंगे।