अध्याय—18
सूत्र—
नियतस्य
तु संन्यास:
कर्मणो
नोययद्यते।
मोहात्तस्य
परित्यागस्तामम:
यरिकीर्तित:।।
7।।
दु:खमित्येव
यत्कर्म
कायक्लेशमयाल्यजेत्।
स
कृत्या राजसं
त्यागं नैव
त्यागफलं
लभेत् ।। 8।।
कार्यमित्येव
यत्कर्म
नियतं क्रियतेअर्जुन।
सङ्गं
त्यक्त्वा
फलं चैव स
त्याग:
सास्थ्यिाए
मत:।। 9।।
और
हे अर्जुन,
नियत कर्म का
त्याग करना
योग्य नही है, इसलिए मोह
से उसका त्याग
करना तामस
त्याग कहा गया
है।
और
यदि कोई
मनुष्य, जो
कुछ कर्म है
वह सब ही
दुखरूप है, ऐसा समझकर शाशीरिक
क्लेश के भय से
कर्मों का
त्याग कर दे, तो वह पुरूष उस
राजस त्याग को
करके भी त्याग
के फल को प्राप्त
नहीं होता है।
और
हे अर्जुन,
करना कर्तव्य है, ऐसा समझकर
ही जो शास्त्र—
विधि से नियत
किया हुआ
कर्तव्य कर्म
आसक्ति को और
फल को त्याग
कर किया जाता
है, वह ही
सात्विक कहा
जाते है।


